गांधी जी का जीवन परिचय, राजनीतिक विचार और शिक्षा दर्शन

महात्मा गांधी का जीवन परिचय एवं शिक्षा दर्शन

गाँधी जी की प्रारंभिक शिक्षा का श्रीगणेश पोरबंदर की एक पाठशाला में हुआ। जब ये 7 वर्ष के थे, इनके पिता राजकोट के दीवान हो गए थे। तक ये उनके साथ राजकोट चले गए और वहाँ के एक विद्यालय में पढ़ने लगे। पढ़ने में ये सामान्य स्तर के बालक थे। खेल-कूद में भी इनकी कम रुचि थी। हाँ, खेल-कूद, तमाशे और नाटक आदि देखने में ये रुचि लेते थे। सत्यवादी हरिश्चंद्र नाटक का इनके उपर बड़ा प्रभाव पड़ा जो आगे चलकर इनके जीवन दर्शन का आधार बना, ये सत्य के पुजारी बने। स्वभाव के ये शर्मीले और कुछ भीरू थे। जब ये केवल तेरह वर्ष के थे इनका विवाह कर दिया गया। अब तो इनका मन पढ़ने-लिखने में और भी कम लगने लगा। इस समय इन पर कुसंग का कुप्रभाव भी पड़ा परंतु ये उससे शीघ्र ही निकल आए।

महात्मा गाँधी का जन्म 2 अक्टूबर, 1869 में वर्तमान गुजरात प्रदेश के पोरबंदर नामक स्थान पर एक वैष्णव धर्मावलंबी, संपन्न एवं प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। इनका वास्तविक नाम मोहनदास कर्मचंद गाँधी था। इनके पिता कर्मचंद गाँधी पोरबंदर राज्य के दीवान थे और बड़े धार्मिक एवं सात्विक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। इनकी माता श्रीमती पुतलीबाई भी बड़ी धार्मिक एवं सात्विक प्रवृत्ति की महिला थीं। महात्मा गाँधी पर अपने इस पारिवारिक पर्यावरण का बड़ा प्रभाव पड़ा।

गाँधी जी की प्रारंभिक शिक्षा का श्रीगणेश पोरबंदर की एक पाठशाला में हुआ। जब ये 7 वर्ष के थे, इनके पिता राजकोट के दीवान हो गए थे। तक ये उनके साथ राजकोट चले गए और वहाँ के एक विद्यालय में पढ़ने लगे। पढ़ने में ये सामान्य स्तर के बालक थे। खेल-कूद में भी इनकी कम रुचि थी। हाँ, खेल-कूद, तमाशे और नाटक आदि देखने में ये रुचि लेते थे। सत्यवादी हरिश्चंद्र नाटक का इनके उपर बड़ा प्रभाव पड़ा जो आगे चलकर इनके जीवन दर्शन का आधार बना, ये सत्य के पुजारी बने। स्वभाव के ये शर्मीले और कुछ भीरू थे। जब ये केवल तेरह वर्ष के थे इनका विवाह कर दिया गया। अब तो इनका मन पढ़ने-लिखने में और भी कम लगने लगा। इस समय इन पर कुसंग का कुप्रभाव भी पड़ा परंतु ये उससे शीघ्र ही निकल आए।

1885 में आपने हाई स्कूल परीक्षा पास की और पिफर उच्च शिक्षा के लिए भावनगर के श्यामलाल काॅलिज में प्रवेश लिया। परंतु गाँधी जी का मन इस शिक्षा में नहीं लगा। 1887 में ये कानून की शिक्षा लेने इंग्लैण्ड गए। यहाँ इन्होंने कानून की शिक्षा के साथ-साथ ‘बाइबिल’ और ‘लाइट आफ एशिया’ के अध्ययन और श्रीमती एनी बेसेंट का सत्संग करने का अवसर भी मिला। इसका इनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। 1891 में ये बैरिस्ट्री की परीक्षा पास करके भारत लौटे।

यहाँ आकर इन्होंने बम्बई तथा राजकोट में वकालत शुरू की। इस कार्य में इन्हें अधिक सफलता नहीं मिली लेकिन पिफर भी ये यही कार्य करते रहे। 1893 में ये एक मुकदमे के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका गए। यहाँ इन्होंने भारतीयों की दीन-हीन दशा को देखा और उन पर होने वाले अत्याचार देखे। ये स्वयं भी इन अत्याचारों के शिकार हुए। इनकी आत्मा कराह उठी और ये वहाँ भारतीयों की दशा सुधारने में लग गए। इन्होंने अफ्रीका प्रवासी भारतीयों को संगठित किया और उनके सुधार के लिए ठोस कार्य करने प्रारंभ किए। 

1894 में इन्होंने वहाँ ‘नेटाल कांग्रेस’ की स्थापना की और इस संगठन के माध्यम से अफ्रीका की रंग भेद नीति के विरुद्ध आंदोलन शुरू किया। परंतु तभी इन्हें कुछ दिन के लिए भारत आना पड़ा। यहाँ आने पर इन्होंने लोकमान्य तिलक, गोपालकृष्ण गोखले, जमशेद जी टाटा और दादाभाई नौराजी से भेंट की और भारत में अंगे्रजों के विरुद्ध आंदोलन चलाने की चर्चा की। परंतु इससे पहले कि ये यहाँ अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन छेड़ते, इन्हें तार द्वारा अफ्रीका बुला लिया गया। इस बार ये वहाँ सपरिवार गए। वहाँ पहुँचकर इन्होंने रंगभेद नीति के विरुद्ध आंदोलन का नेतृत्व किया। वहाँ की सरकार ने इनके साथ बहुत अमानवीय व्यवहार किया, इन पर बहुत अत्याचार किए, परंतु गाँधी जी इन सबको सहते हुए निर्भीकता से अपना अहिंसात्मक आंदोलन चलाते रहे। 

1899 में बोअर युद्ध के समय गाँधी जी ने रेडक्रस सोसाइटी के सहयोग से समाज सेवा कार्य किए। 1901 में जब यह युद्ध समाप्त हुआ, गाँधी जी स्वदेश लौटे। यहाँ आने पर इन्होंने अपनी जीविका कमाने के लिए पुनः वकालत शुरू की। परंतु भारत को अंग्रेजों के अत्याचारों से मुक्त कराने का लक्ष्य भी इनके सामने था। ये यहाँ अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन छेड़ने ही वाले थे कि 1904 में इन्हें पिफर अफ्रीका बुला लिया गया। इनके वहाँ पहुँचते ही सत्याग्रह आंदोलन में उफान आ गया।  जनवरी, 1915 तक गाँधी जी वहाँ रहे।

अपने अफ्रीका प्रवास काल में गाँधी जी ने दो कार्य किए-एक राजनैतिक आंदोलनों का नेतृत्व और दूसरा शिक्षा केद्रों की स्थापना। शिक्षा के क्षेत्र में इनका सबसे पहला कार्य दक्षिण अफ्रीका के फोनिक्स स्थान पर एक आश्रम की स्थापना और उसके द्वारा सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह और ब्रह्मचर्य आदि की शिक्षा की व्यवस्था थी। इस आश्रम में हिंदी के माध्यम से शिक्षा दी जाती थी और चरित्र विकास पर सबसे अधिक बल दिया जाता था। 

1911 में इन्होंने ‘टाल्सटाॅय फार्म’ की स्थापना की। यहाँ पर बच्चों को हस्तकार्य और विभिन्न धर्मों के सामान्य सिद्धांतों की शिक्षा देने का प्रबंध किया गया। यह फार्म गाँधी जी के शिक्षा सिद्धांतों की एक प्रयोगशाला के रूप में विकसित हुआ। जनवरी, 1915 में गाँधी जी भारत लौटे।

अप्रफीका से लौटने के बाद गाँधी जी सर्वप्रथम गोपाल कृष्ण गोखले से मिलने पूना गए। गोखले को वे अपना गुरु मानते थे। उनसे मिलने के बाद ये गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर से मिलने शांति निकेतन गए और इनका आशीर्वाद प्राप्त कर भारतीय राजनीति में प्रवेश किया। इनके प्रवेश से यहाँ की राजनीति ने नया मोड़ लिया। इन्होंने राजनीति को सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह पर आधारित किया। 1915 में इन्होंने फोनिक्स फार्म की तरह का एक आश्रम साबरमती में स्थापित किया और उसका नाम ‘सत्याग्रह आश्रम’ रखा। 

1917 में इन्होंने चंपारन में अंग्रेजों के अत्याचारों के विरुद्ध आंदोलन किया। 1919 में इन्होंने असहयोग आंदोलन का श्रीगणेश किया जो 1921 में बड़े पैमाने पर दिखाई दिया। इसी समय इन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा योजना के संबंध में विचार प्रकट किए। 1924 में आपने हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए आंदोलन प्रारंभ किया। इनके आत्मिक बल का प्रभाव यहाँ की जनता और सरकार दोनों पर पड़ा। इसके बाद 1927 का खादी आंदोलन और विदेशी वस्तुओं के प्रयोग का बहिष्कार, 1930 का नमक कानून के विरुद्ध आंदोलन, 1932 का सत्याग्रह आंदोलन, 1933 का हरिजनोद्धार आंदोलन और 1934 से ग्रामोद्धार का बीड़ा, इनके मुख्य कार्य थे। इस समय इन्होंने अपना साबरमती आश्रम छोड़ दिया और बर्धा में एक नए सेवा ग्राम आश्रम की स्थापना की। इन्होंने प्रण किया कि भारत को स्वतंत्र कराने के बाद ही ये साबरमती आश्रम जाएँगे। वर्धा आश्रम में इन्होंने ग्राम सेवा आंदोलन चलाया। राष्ट्रीय आंदोलन के फलस्वरूप 1937 में प्रांतों में स्व सरकारों का गठन हुआ और ग्यारह प्रांतों में से सात में कांग्रेस मंत्राीमंडल बने। 

1937 में इन्होंने हमें बेसिक शिक्षा का विचार दिया जिसे कुछ प्रांतीय सरकारों ने उसी समय स्वीकार किया। 1ृ939 में द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ गया। कांग्रेस ने ब्रिटिश सरकार का साथ न देने का निर्णय लिया और सातों प्रदेशों के कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने इस्तीफा दे दिया।

1942 में स्वतंत्रता संग्राम का दौर पुनः प्रारंभ हुआ। गाँधी जी ने इस ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन का नेतृत्व किया और इसके फलस्वरूप 15 अगस्त, 1947 को देश स्वतंत्र हुआ। गाँधी जी अब सक्रिय राजनीति से दूर हो गए और देश ने इन्हें ‘राष्ट्र पिता’ के रूप में प्रतिष्ठित किया। राष्ट्रपिता गाँधी यूँ तो राष्ट्रीय आंदोलनों के प्रणेता और संचालक के रूप में अधिक प्रसिद्ध हैं परंतु सच बात यह है कि इन्होंने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में कार्य किए हैं। ये समाज सुधार, ग्रामोद्धार, हरिजनोद्धार और शैक्षिक सुधारों के लिए भी उतने ही आदर के साथ स्मरण किए जाएँगे। धर्म-दर्शन पर भी इन्होंने खुले मस्तिष्क से सोचा-समझा और लिखा है। 

गाँधी जी ने अपने विचारों को जन-जन तक पहुँचाने के लिए समाचार-पत्रों का सहारा लिया था। इन समाचार-पत्रों में यंग इंडिया, हरिजन, भूदान यज्ञ, नई तालीम और नया हिंद मुख्य हैं। अपने जीवन में गाँधी जी ने अनेक ग्रंथों की रचना भी की थी। इन ग्रंथों में-आत्म कथा, सर्वोदय, सत्याग्रह, मेरा धर्म, गीता बोध, गीता माता, हिंदू धर्म, मंगल प्रभात, नीति धर्म, ब्रह्मचर्य, अनाशक्ति योग और बेसिक शिक्षा मुख्य हैं। परंतु आजादी प्राप्त करने के बाद ये इस संसार में अधिक दिन नहीं रह सके। 


महात्मा गांधी
मोहन दास करम चन्द्र गांधी

महात्मा गांधी जीवन दर्शन

आधुनिक भारतीय जीवन और सोच पर सर्वाधिक प्रभाव महात्मा गांधी के विचारो का पड़ा, क्योंकि उनका तत्त्व चिंतन केवल वैचारिक न होकर प्रत्यक्ष अनुभूति तथा प्रयोग पर आधारित था। महात्मा गांधी के विचारो और कार्यों पर भारतीय चिन्तन विशेषत: उपनिषदो का तो प्रभाव पड़ा ही, साथ ही रस्किन, टाल्स्टॉय, थोरो जैसे विद्वानों के सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण का भी प्रभाव पड़ा। 

इन सबका समन्वित रूप गांधी जी का सर्वोदय दर्शन है जिसमें केन्द्र बिन्दु व्यक्ति से बढ़कर समष्टि तक हो गया है। लक्ष्य है आत्मोदय के साथ-साथ सबका उदय।

गांधी जी पर भारतीय दार्शनिक परम्परा का अत्यधिक प्रभाव था। इस महान परम्परा के दो श्रेष्ठ तत्त्वों- सत्य और अहिंसा को गांधी जी ने अपने सम्पूर्ण विचारों और कार्यों के केन्द्र में रखा।

सत्य - गांधी जी ने सत्य को अपनी आस्था के मूल केन्द्र में बताते हुए कहा ‘‘मेरे लिए सत्य सर्वोच्च सिद्धान्त है जिसमें अनेक अन्य सिद्धान्त भी अन्तभ्र्ाूत हो जाते है। यह सत्यवाणी की सत्यता ही नहीं बल्कि विचारो की सत्यता है और यह केवल हमारी मान्यता सम्बन्धी सत्य ही नहीं, बल्कि परम सत्य, सनातन सिद्धान्त अर्थात् ईश्वर है।’’ गांधी जी ने सत्य को सवर्था हितकर शक्ति मानते हुए कहा ‘‘मृत्यु के बीच जीवन जागता है, असत्य के बीच सत्य जागता है और अन्धकार के बीच प्रकाश जागता है। अत: मेरा निष्कर्ष है कि ईश्वर जीवन है, सत्य है, ज्योति है, वह प्रेम है, वह परमेश्वर है।’’

गांधी जी के अनुसार सत्य तथा ईश्वर एक दूसरे के पर्याय हैं। ईश्वर प्राप्ति का साधन अहिंसा है। अहिंसा वह भौतिक आधार है जिसमें अन्य मानवीय गुण विकसित होते है।

अहिंसा - महात्मा गांधी का अहिंसा का विचार अद्वितीय है। उन्होंने अहिंसा के व्यक्तिवादी नैतिक आधार को सामाजिक आधार प्रदान किया। गांधी जी के अनुसार अहिंसा केवल व्यक्ति का धर्म ही नहीं है, इसकी व्याप्ति राजनीति, अर्थनीति, शिक्षा, विज्ञान आदि सभी क्षेत्रों में होनी चाहिए।

गांधी जी का मानना था कि न्यूनतम मात्रा में भी सामाजिक न्याय हिंसा से प्राप्त नहीं किया जा सकता। संसार में मानवता का अस्तित्व सत्य एवं अहिंसा के कारण है। अहिंसा का तात्पर्य है सभी प्राणियों के प्रति द्वेष का सम्पूर्ण अभाव। अर्थात् सभी जीवों के प्रति सद्भाव रखने का कार्यान्वित रूप ही अहिंसा है। अहिंसा के पथ पर चलने के लिए अटूट धैर्य और साहस की आवश्यकता है। अहिंसा के भाव से प्रेरित व्यक्ति को सत्ता प्राप्त करने की कोशिश नही करनी पड़ती है, न ही सत्ता प्राप्ति उसका उद्देश्य होता है। समाज के उपेक्षित तबके को न्याय तभी प्राप्त हो सकता है जब सरकार चलाने वाले भी अहिंसा के सिद्धान्त का पालन करें। 

गांधी जी के शब्दों में ‘‘मेरे विचार से जनतंत्र उसे कहते है जिसमें कमजोर से कमजोर को भी वही अधिकार और अवसर मिले जो सबसे अधिक शक्तिशाली को प्राप्त होता है। ऐसा केवल अहिंसा के द्वारा ही संभव है।’’ 

एक अन्य स्थल पर अहिंसा को शाश्वत प्रेम से जोड़ते हुए महात्मा गांधी ने कहा ‘‘ अहिंसा का अर्थ है अनंत प्रेम और प्रेम का अर्थ है कष्ट सहने की असीम क्षमता।’’

महात्मा गांधी की महत्वपूर्ण रचनाएं

 गांधी जी के विचारों और सिद्धान्तों की जानकारी हमें इन रचनाओं से प्राप्त होती है’-
  1. Indian Case for Swarajya (1932)
  2. The Story of My Experiments with Truth (1940)
  3. Satyagraha (1935)
  4. Economics and Khadi (1949)
  5. The Science of Satyagraha (1957)
  6. Hind Swaraj and Indian Home Rule (1958)
  7. Trusteeship (1960)
इनके अतिरिक्त गांधी जी ने ‘Truth is God’, ‘Basic Education’, ‘Ethical Religion’, आदि रचनाएं भी लिखीं। गांधी जी के मुख्य सिद्धान्तों, मन्तव्यों और प्रयोगों का उल्लेख मुख्य रूप से उनकी प्रसिद्ध रचना ‘My Experiments with Truth’ में मिलता है। 

इन रचनाओं के अतिरिक्त गांधी जी ने अपने विचारों का प्रतिपादन हरिजन, यंग इंडिया, हरिजन सेवक, हरिजन बन्धु, नव जीवन आदि पत्रिकाओं मे भी किया।

महात्मा गांधी के राजनीतिक विचार

महात्मा गांधी ने राजनीति को कोई स्वतंत्र पेशा न मानकर जीवन का एक अंग माना जिस पर जीवन की मान्यताएं और मूल्य लागू होते हैं। मनुष्य का अंतिम लक्ष्य धर्माचरण है और राजनीति भी इसके अनुरूप होनी चाहिए। वस्तुत: राजनीति धर्म की अनुगामिनी है।

महात्मा गांधी की राजनैतिक कल्पना ‘रामराज्य’ की है। राम तानाशाह नहीं थे, वे समस्त राज्य के प्रतीक थे। वे केवल शासन ही नहीं करते थे वरन् स्वयं शासित भी थे। उनके द्वारा राज्य का परित्याग इसी भावना का परिचायक है। मानव एवं समाज के नैतिक विकास में जब ‘रामराज्य’ की स्थिति आती है तो दण्ड विधान को संचालित करने वाली राज्यसत्ता की आवश्यकता स्वत: ही समाप्त हो जाती है।

गांधी जी की राजनैतिक धारणाओं का मूल आधार ‘सर्वोदय’ है। ‘सर्वोदय’ का तात्पर्य है प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व के विकास का पूरा अवसर मिले। महात्मा गांधी कहते हैं ‘‘मेरा लक्ष्य समाज में एक ऐसी व्यवस्था को कायम करना है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को अपने उत्थान का समान अवसर एवं सुविधायें प्राप्त हों। ऐसे समाज को सर्वोदय समाज नाम देना उचित होगा।’’ गांधी जी ने केवल समाज को ही नहीं वरन् व्यक्ति को भी अपने चिंतन का विषय बनाया। उन्होंने जीवन को उसकी सम्पूर्णता में ग्रहण किया है। उनका विश्वास था कि व्यक्ति के पुनर्निर्माण के बिना समाज का पुनर्निर्माण असम्भव है।

महात्मा गांधी ने सत्ता के अन्यायपूर्ण कार्यों का विरोध हिंसा की जगह अहिंसक ढंग से करने हेतु जिस अमोघ अस्त्र का आविष्कार किया- वह है सत्याग्रह। सत्याग्रह का अर्थ है शान्तिपूर्ण आग्रह। इसका उद्देश्य है असत् राजनीति का अनुसरण करने वाली सरकार या अन्य सम्बन्धित व्यक्ति का हृदय परिवर्तन। सत्याग्रह के द्वारा ही गांधी जी ने विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली साम्राज्य के विरूद्ध लड़ाई जीती।

महात्मा गांधी के आर्थिक विचार

महात्मा गांधी भौतिकवाद एवं उपभोक्तावादी संस्कृति के खिलाफ थे। उनके आर्थिक विचार भी सत्य एवं अहिंसा के सिद्धान्तों पर आधारित थे। वे धन एकत्र करने के लिए धनोपार्जन करने के कट्टर विरोधी थे। उनकी दृष्टि मे धनी और निर्धन मे कोई अन्तर नहीं है। जिनके पास आवश्यकता से अधिक धन है उनसे यह आग्रह किया जा सकता है कि वे अपनी सम्पत्ति का प्रयोग उनके लिए भी करें जो निर्धन हैं। गांधी जी ने कहा ‘‘मैं चाहता हूँ कि धनी लोग गरीबों के ट्रस्टी बनकर उनके लिए अपने धन का इस्तेमाल करें। क्या आपको पता है कि ‘टाल्स्टॉय फार्म’ की स्थापना करते समय मैंने अपनी सारी सम्पत्ति का त्याग कर दिया था।’’

गांधी जी ने आर्थिक व्यवस्था के संचालन के लिए कुछ साधनों की सिफारिश की, ये मुख्य साधन हैं चरखा, स्वदेशी तथा खादी। उनका विचार था कि हम सुखी एवं नीति संगत जीवन तभी बिता सकते हैं, जब हम अपनी सांस्कृतिक आस्थाओं के अनुरूप कार्य करें। भारत की मूल संस्कृति ग्रामीण संस्कृति है, अत: इस देश के लिए चरखे का जो महत्व है वह बड़ी मशीनों का नहीं हो सकता है।

भूमंडलीकरण के नाम पर यूरोप और अमेरिका के बढ़ते प्रभाव एवं तृतीय विश्व को नए सिरे से आर्थिक उपनिवेश बनाने के प्रयासों के प्रति वे गंभीर थे। विकास की निरंतर प्रक्रिया की गलती के प्रति वे सचेत थे। यूरोप और अमेरिका में अपनाई गई आधुनिकीकरण की प्रक्रिया की अपर्याप्तता और दमनकारी चरित्र को पहले ही समझ गये थे। साथ ही शायद वे एकमात्र नेता थे जिन्होंने इन देशों की अंधी नकल करने के बजाए विकल्प के बारे में सोचा। मानव के भविष्य के लिए विकल्प के रूप में उन्होंने ग्राम-आधारित अर्थतंत्र और कार्य आधारित शिक्षा की कल्पना की थी। गांधी जी के लिए शिक्षा वास्तव में उनके संपूर्ण राजनीतिक कार्यक्रम का हिस्सा थी।

महात्मा गांधी का शिक्षा दर्शन 

महात्मा गांधी औपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था को भारत के लिए हानिकारक मानते थे। गांधी जी ने अंग्रेजों द्वारा विकसित शिक्षा पद्धति की तीन महत्वपूर्ण कमियाँ बताई-
  1. यह विदेशी संस्कृति पर आधारित थी, जिसने स्थानीय संस्कृति लगभग समाप्त कर दी थी। 
  2. यह हृदय और हाथ की संस्कृति की उपेक्षा कर पूर्णत: दिमाग तक ही सीमित रहता है। 
  3. विदेशी भाषा के माध्यम से सही शिक्षा संभव नहीं है।
 गांधी जी ने अंग्रेजी शिक्षा को मानसिक गुलामी का कारण बताया। वे कहते है ‘‘अंगे्रजी शिक्षा लेकर हमने अपने राष्ट्र को गुलाम बनाया है। अंग्रेजी शिक्षा से दंभ, राग, जुल्म वगैरह बढ़े है।’’

अत: गांधी जी ने असहयोग आंदोलन के दौरान सरकारी शैक्षिक संस्थाओ के बहिष्कार का आह्वान किया। औपनिवेशिक शिक्षा की जगह उन्होंने एक राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली के विकास का प्रयास किया जो मानव श्रम को उसका उचित स्थान देते हुए संवेदनशील हृदय तथा मस्तिष्क का समन्वित विकास कर सके।

महात्मा गांधी के अनुसार शिक्षा की परिभाषा

महात्मा गांधी ने शिक्षा को परिभाषित करते हुए कहा ‘‘शिक्षा से मेरा अभिप्राय बालक तथा मनुष्य मे निहित शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक श्रेष्ठतम शक्तियों का अधिकतम विकास है।’’ गांधी जी भारतीय जीवन को सुखी-सम्पन्न बनाना चाहते थे। वे व्यक्ति, समाज और देश की राजनैतिक, आर्थिक एवं सामाजिक दासता का विरोध कर स्वतंत्रता एवं स्वावलम्बन के आकांक्षी थे। अत: शिक्षा को वे सार्वभौमिक रूप मे प्रसारित करना चाहते थे। उनका मंतव्य था कि साक्षरता न तो शिक्षा का अन्त है न प्रारम्भ। यह मात्र एक साधन है, जिसके द्वारा स्त्री एवं पुरूष को शिक्षित किया जा सकता है।

महात्मा गांधी सच्ची शिक्षा उसे मानते थे जो बालक की आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक शक्तियों को विकसित करती है। वे चाहते थे कि शिक्षा द्वारा मनुष्य के शरीर, मस्तिष्क, हृदय तथा आत्मा की सारी शक्तियाँ पूर्ण रूप से विकसित हो। इन शक्तियों के विकास में समग्र एवं संतुलन की दृष्टि होनी चाहिए। नए भारत का निर्माण श्रम के प्रति निष्ठा एवं संतुलित दृष्टिकोण वाले व्यक्तियों से ही हो सकता है।

गांधी जी ने शारीरिक श्रम की नैतिकता पर आधारित शिक्षा दर्शन का विकास किया। इसे उपनिवेशवाद के आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभुत्ववादी शोषण के विकल्प के रूप में विकसित किया गया। गांधी जी स्वत: स्फूर्त संवेदी तरीको से श्रमिकों की मानसिक दुनिया से जुड़े हुए थे। उन्होंने अपना शिक्षा दर्शन ग्रामीण समाज में श्रमिकों के बच्चों की आवश्यकताओं और आकांक्षाओं की लय के साथ विकसित किया। शारीरिक श्रम पर उनका जोर अत्यधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि श्रमिकों के पास यही एक पूंजी होती है। औद्योगीकरण की प्रक्रिया में श्रम को विमानवीय किया जाता है और उसे खरीद बिक्री की वस्तु बना दिया जाता है। 

गांधी जी की दृष्टि में आधुनिक मशीनी सभ्यता अनैतिक थी और अन्तत: विनाश की ओर ले जाएगी। विनाश की इस प्रक्रिया को जड़ से समाप्त करने के एवं भारत के नवनिर्माण हेतु उन्होंने बुनियादी शिक्षा के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। यह जनता के स्वराज हासिल करने के लिए जनता की शिक्षा का राष्ट्रीय कार्यक्रम था।

बुनियादी शिक्षा या नई तालीम

महात्मा गांधी ने अपने शिक्षा-सिद्धान्त का विकास दक्षिण अफ्रीका में प्रवास के दौरान किया। सर्वोदय के सिद्धान्त के अनुरूप उन्होंने भारतीयों के सहयोगपूर्ण जीवन के लिए टाल्स्टॉय आश्रम की स्थापना की। बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था गांधी जी ने स्वयं की। वे आत्मकथा में लिखते है कि अक्षर ज्ञान के लिए अधिक से अधिक तीन घंटे रखे गए। उनका मातृभाषा के माध्यम से ही शिक्षा देने का आग्रह था। वे शारीरिक श्रम के महत्व पर प्रकाश डालते हुए टाल्स्टॉय आश्रम की शिक्षा व्यवस्था के संदर्भ मे कहते हैं, ‘‘हमलोगों ने यह सुनिश्चित किया है कि सबको कोई न कोई धंधा सिखाया जाए। इसके लिए मि0 केलनबैक चप्पल बनाना सीख आए, उनसे मैंने सीखकर बालको को सिखाया। आश्रम में बढ़ई का काम जानने वाला एक साथी था इसलिए यह काम भी कुछ हद तक बच्चों को सिखाया जाता था। रसोई का काम तो लगभग सभी बालक सीख गए थे।’’

1937 से जब प्रान्तों मे कांग्रेस की सरकार बनी तो शिक्षा का भार गांधी जी एवं उनके शिष्यों के कंधो पर आया। मद्य निषेध पर गांधी जी का जोर होने के कारण शिक्षा के लिए पर्याप्त पैसे जुटाने में कांग्रेसी सरकार असफल हो रही थी। टाल्स्टॉय आश्रम के अनुभव के आधार पर महात्मा गांधी ने शिक्षा को स्वावलंबी बनाने का विकल्प सामने रखा। इनके द्वारा प्रतिपादित बुनियादी शिक्षण की प्रमुख विशेषताएं थी-
  1. 6 से 14 वर्ष तक के उम्र के सभी बच्चों एवं बच्चियों को अनिवार्य एवं निशुल्क शिक्षा। 
  2. पूरी शिक्षण व्यवस्था के केन्द्र में कोई शिल्प या हस्त उद्योग हो।
  3. शिक्षण का माध्यम बच्चे की मातृभाषा हो।
  4. शिक्षा स्वावलंबी हो- यानि खर्च का वहन अध्यापकों एवं छात्रों द्वारा किए गए उत्पादन कार्यों से किया जाए।
  5. हिन्दी या हिन्दुस्तानी की शिक्षा पूरे भारतवर्ष में अनिवार्य हो। 
स्पष्टत: गांधी जी लाभ प्रदान करने वाले उत्पादक कार्य के जरिए शिक्षा देना चाहते थे। उनके अनुसार मुख्य प्रश्न आत्म-संतुष्टि का था। शारीरिक परिश्रम के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए महात्मा गांधी ने कहा ‘‘ शारीरिक कार्य के प्रशिक्षण का उद्देश्य विद्यालय म्युजियम के लिए वस्तुंए बनाना या खिलौने बनाना नहीं होगा, जिसका कोई मूल्य न हो। इसका उद्देश्य ऐसी वस्तुंए बनाना होना चाहिए जो बेची जा सकें। बच्चे इसे फैक्टरी की शुरूआती दिनों की तरह नहीं करेंगे, जब वे चाबुक के डर से काम करते थे। वे इसलिए काम करेंगे क्योंकि इससे उनका मनोरंजन होता है और बौद्धिक प्रेरणा मिलती है।’’

महात्मा गांधी के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य

1921 में यंग इंडिया मे लिखे गए एक लेख मे वे अपनी कल्पना की शिक्षा के संदर्भ मे कहते है ‘‘ऐसी शिक्षा तीन उद्देश्य पूरा करेगी, शिक्षा को आत्मनिर्भर बनाना, बच्चे के शरीर एवं दिमाग दोनों का ही विकास करना और विदेशी धागे और कपड़ों के बहिष्कार का रास्ता खोलना, इस प्रकार बच्चों को आत्मनिर्भर एवं स्वतंत्र बनने के लिए तैयार करना।’’ वे कहते थे कि, ऐसी शालाओं मे बच्चों का खेल हल जोतना होगा। ग्रामीण हस्तशिल्प के जरिए विद्यार्थियों को शिक्षित कर वे उन्हें दूरगामी अहिंसक सामाजिक क्रांति का वाहक बनाना चाहते थे।

गांधी जी ने शिक्षा के व्यापक उद्देश्य निश्चित किये। इन्हें दो भागों में वर्गीकश्त किया जा सकता है- वैयक्तिक उद्देश्य एवं सामाजिक उद्देश्य।

1. वैयक्तिक उद्देश्य 
  1. चरित्र निर्माण- महात्मा गांधी ने चरित्र निर्माण को शिक्षा का उच्चतम लक्ष्य माना। उनके अनुसार अगर विद्यार्थियों के चरित्र की नींव मजबूत पड़ जाए तो अन्य सब बातें स्वत: सीखी जा सकती है। 
  2. सर्वांगीण विकास- महात्मा गांधी केवल बौद्धिक विकास को विकलांगता मानते थे। उन्होंने सर्वांगीण विकास के लिए तीन ‘एच’ की शिक्षा देना आवश्यक माना- हेड (मस्तिष्क), हैण्ड (हाथ) और हार्ट (हृदय)। इन तीनों की समन्वित शिक्षा ही व्यक्ति को उच्चतम विकास तक ले जा सकती है। 
2. सामाजिक उद्देश्य 
  1. स्वावलंबी नागरिक का निर्माण- महात्मा गांधी देश के हर व्यक्ति को शारीरिक श्रम द्वारा उत्पादन कार्य करते हुए देखना चाहते थे। मानव श्रम की शिक्षा देकर वे कुशल नागरिकों का निर्माण करना चाहते थे। 
  2. सर्वोदय समाज का विकास- गांधी जी समाज के सभी व्यक्तियों को विकास का अवसर देने की वकालत करते थे। समाज के निर्धनतम व्यक्ति का विकास ही महात्मा गांधी का सपना था। वे इस क्रांतिकारी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए शिक्षा को शक्तिशाली साधन मानते थे। 
  3. ग्राम स्वराज की स्थापना- गांधी जी केवल अंग्रेजी दासता से ही मुक्ति नहीं चाहते थे वरन् वे मानव का मानव के द्वारा शोषण की हर संभावना को समाप्त करना चाहते थे। इसके लिए वे ग्राम स्वराज की स्थापना करना चाहते थे। इस प्रकार महात्मा गांधी शिक्षा के द्वारा न केवल व्यक्ति वरन् समाज एवं राष्ट्र की समस्त बुराईयों को समाप्त करना चाहते थे।

शिक्षा का पाठ्यक्रम 

अपने शिक्षा-सिद्धान्त के अनुरूप ही महात्मा गांधी ने बुनियादी शिक्षा के पाठ्यक्रम का निर्माण किया। बच्चे, समाज और देश के आवश्यकता को देखते हुए उन्होंने क्रियाशील पाठ्यक्रम का निर्माण किया। अपने द्वारा प्रस्तावित नयी तालीम या बुनियादी शिक्षा के लिए उन्होंने निम्नलिखित विषयों को अपनी पाठ्यचर्चा मे स्थान दिया-
  1. शिल्प या हस्त उद्योग (कताई-बुनाई, बागवानी, कृषि, काष्ठ कला, चर्मकार्य, मिट्टी का काम आदि मे से कोई एक) 
  2. मातृभाषा 
  3. हिन्दी या हिन्दुस्तानी 
  4. व्यवहारिक गणित ( अंकगणित, बीजगणित, रेखागणित, नापतौल आदि) 
  5. सामाजिक विषय (समाज का अध्ययन, नागरिक शास्त्र, इतिहास, भूगोल आदि) 
  6. सामान्य विज्ञान (बागवानी या वनस्पति विज्ञान, प्राणि विज्ञान, रसायन एवं भौतिक विज्ञान)
  7. संगीत एवं चित्रकला 
  8. स्वास्थ्य विज्ञान (सफाई, व्यायाम एवं खेलकूद)
  9. आचरण शिक्षा (नैतिक शिक्षा, समाज सेवा आदि) 
यहाँ यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि गांधी जी के पाठ्यक्रम में क्राफ्ट(शिल्प) और शिक्षा नहीं है वरन् यह शिल्प के माध्यम से शिक्षा है। इस तरह के पाठ्यक्रम से बच्चे के मस्तिष्क, हृदय और हाथ का समन्वित विकास होना संभव है।

शिक्षण विधि 

महात्मा गांधी ज्ञान की अखंडता पर विश्वास करते थे। वे केवल सुविधा की दृष्टि से ज्ञान को शाखाओं में विभक्त करते थे। महात्मा गांधी ने बच्चों को समन्वित रूप से शिक्षा देने के लिए ‘‘समन्वय विधि’’ या ‘‘समवाय विधि’’ का प्रयोग किया। इस विधि के केन्द्र मे किसी शिल्प या उद्योग या कार्यकलाप को रखा। अन्य विषयों को इससे जोड़कर पढ़ाया जाना चाहिए। जैसे अगर कताई-सिलाई सिखाते हुए विभिन्न सभ्यताओं में उपयोग किए जाने वाले वस्त्रों का ज्ञान देकर इतिहास का व्यवहारिक ज्ञान दिया जा सकता है। इसी तरह से कच्चे माल की खरीद मे कितने पैसे लगे और तैयार किए समान को बेचने के बाद कितना लाभ हुआ, इसकी गणना अगर छात्र करें तो उन्हें गणित का जीवन मे उपयोग करना आ जायेगा।

समन्वय विधि के अन्य दो महत्वपूर्ण आयाम है। प्राकृतिक वातावरण से समन्वय एवं सामाजिक वातावरण से समन्वय।

प्राकृतिक वातावरण से समन्वय से तात्पर्य है प्राकृतिक परिवेश अथवा काल परिवर्तन से होने वाले प्राकृतिक परिवर्तनों को केन्द्र बिन्दु मानकर विभिन्न विषयों का समन्वय। उदाहरण स्वरूप जाड़े में गेहँू बुआई एवं ग्रीष्म ऋतु में कटाई से गेहँू के उत्पादन की प्रक्रिया, भारत और विश्व में इसके उत्पादन क्षेत्र, गेहँू के लिए मिट्टी, खाद, पानी, की आवश्यकता आदि कई पक्षों की शिक्षा दी जाती है।

 सामाजिक वातावरण से समन्वय के अन्र्तगत सामाजिक परिवेश तथा समय-समय पर आने वाले सामाजिक, धार्मिक एवं राष्ट्रीय पर्व-त्योहार तथा अन्य सांस्कृतिक आयोजन आते हैं। इनके माध्यम से भी भाषा, गणित, कला इत्यादि का प्रभावशाली अध्ययन कराया जाता है।

शिक्षा का माध्यम 

शिक्षा के माध्यम के रूप मे महात्मा गांधी मातृभाषा के पक्ष मे थे। वे अंग्रेजी को शोषण का एक माध्यम मानते थे, जो अभिजात्य वर्ग और जन सामान्य के मध्य की दूरी को बढ़ाता था। इसके लिए वे माता-पिता को भी दोषी मानते थे। उन्होंने आत्मकथा में कहा ‘‘जो हिन्दुस्तानी माता-पिता अपने बच्चों को बचपन से ही अंग्रेजी बोलने वाला बना देते है वे उनके और देश के साथ द्रोह करते हैं। इससे बालक अपने देश की धार्मिक और राजनीतिक विरासत से वंचित रहता है। और उस हद तक वह देश की तथा संसार की सेवा के लिए कम योग्य बनता है। वे अंग्रेजी भाषा के किस हद तक विरोधी थे, यह उनके निम्नलिखित घोषणा से स्पष्ट होता है- ‘‘मैं यदि तानाशाह होता तो आज ही विदेशी भाषा में शिक्षा दिया जाना बन्द कर देता। जो आनाकानी करते उन्हें बर्खास्त कर देता। मैं पाठ्य पुस्तकों के तैयार किये जाने का इन्तजार न करता।’’

महात्मा गांधी किताबी पढ़ाई, परीक्षा की ओर झुकाव और रटने के विरूद्ध थे। उन्होंने बहुत किताबें न रखने की सलाह दी। उनका कहना था कि भारत जैसे गरीब देश में किताबें सोच समझ कर ही रखवानी चाहिए और उनकी संख्या कम होनी चाहिए। वे पाठ्य पुस्तको से अधिक महत्वपूर्ण अध्यापक को मानते थे। उनका कहना था ‘‘मेरा ख्याल है शिक्षक ही विद्यार्थियों की पाठ्य पुस्तक है।’’

(i) गांधी जी की छात्र सकंल्पना- गांधी जी हर बालक-बालिका में परमात्मा का निवास मानते थे। सभी बालकों की आत्मा समान है पर व्यक्तित्व में भिन्नता हो सकती है। गांधी जी चौदह वर्ष तक के उम्र के सभी बच्चों को नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा देने के पक्ष मे थे। वे शिक्षा को बच्चों का मूलभूत अधिकार मानते थे।

गांधी जी की दृष्टि में सुचारू रूप से अध्ययन करने के लिए पवित्र जीवन आवश्यक है। वे छात्रों को सम्बोधित करते हुए कहते हैं ‘‘तुम्हारी शिक्षा सर्वथा बेकार है, यदि उसका निर्माण सत्य और पवित्रता की नींव पर नहीं हुआ है। यदि तुम अपने जीवन की पवित्रता के बारे में सतर्क नही हुए तो सब व्यर्थ है, चाहे तुम महान विद्वान ही क्यों न हो जाओ।’’

(ii) गांधी जी की दृष्टि में अध्यापक- महात्मा गांधी विद्याथिर्यों के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आत्मिक विकास में शिक्षा की भूमिका को अत्यन्त महत्वपूर्ण मानते थे। वे शिक्षकों के आचरण को शिष्यों के लिए अनुकरण योग्य होने पर हमेशा जोर देते थे। वे अध्यापकों के कर्त्तव्य के संदर्भ मे कहते है ‘‘आत्मिक शिक्षा अध्यापक किताबों के द्वारा नहीं, बल्कि अपने आचरण के द्वारा ही दे सकता है। मैं स्वंय झूठ बोलूँ और अपने शिष्यों को सच्चा बनाने का प्रयत्न करूँ, तो वह व्यर्थ ही होगा। डरपोक शिक्षक शिष्यों को वीरता नहीं सीखा सकता। व्यभिचारी शिक्षक शिष्यों को संयम किस प्रकार सिखायेगा? अध्यापकों को अपने लिए नहीं तो कम से कम शिष्यों के लिए अच्छा बना रहना चाहिए।’’

गांधी जी विद्यार्थी के दोषों कें लिए बहुत हद तक शिक्षक को जिम्मेदार मानते हैं। टाल्स्टॉय आश्रम में दो विद्यार्थियों की अनुशासनहीनता पर स्वंय उन्होंने उपवास कर आश्रम के सम्पूर्ण वातावरण को शुद्ध कर दिया। साथ ही महात्मा गांधी अध्यापक एवं छात्र में अन्तर नहीं मानते थे। 

टाल्स्टॉय आश्रम के संदर्भ मे उनका कहना है ‘‘टाल्स्टॉय आश्रम में शुरू से ही यह रिवाज डाला गया था कि जिस काम को हम शिक्षक न करें, वह बालकों से न कराया जाय, और बालक जिस काम मे लगे हों, उसमें उनके साथ काम करने वाला एक शिक्षक हमेशा रहें।’’ इसलिए बालकों ने जो कुछ सीखा, उमंग के साथ सीखा।

गांधी जी ‘वेतन’ तथा ‘अध्यापन कार्य’ को एक दूसरे के साथ मिलाना अनुचित मानते थे। शिक्षक केवल वेतन के लिए काम नहीं करता है। अगर वह अध्यापन को वेतन के साथ जोड़ दे तो वह अपने कर्तव्य को पूरा नहीं कर सकता है। गांधी जी के अनुसार अध्यापन कार्य में सबसे अधिक आवश्यक है समर्पण की भावना।

अनुशासन 

महात्मा गांधी ने अनुशासन सम्बन्धी अपने विचारों का विकास निम्नलिखित धारणाओं के आधार पर किया-
  1. बच्चे जन्मजात बुरे नहीं होते, वातावरण उन्हें अच्छा या बुरा बनाता है। 
  2. प्राकृतिक एवं सामाजिक परिवेश को स्वच्छ एवं सहयोग पर आधारित कर अनुशासन को बनाये रखा जा सकता है। 
  3. विद्यार्थियों के आचरण को सर्वाधिक प्रभावित अध्यापक का आचरण करता है। 
  4. अनैतिक कार्य भी शारीरिक रोग के समान व्याधि है, इसे दूर करने के लिए शिक्षक की सहानुभूति आवश्यक है, दण्ड नहीं। 
गांधी जी आत्म अनुशासन पर जोर देते थे। वे छात्रों को शारीरिक दण्ड देने के प्रबल विरोधी थे। अध्यापकों का उच्च चरित्र और पवित्र आचरण छात्रों को अनुशासन का पाठ पढ़ाने मे सर्वाधिक प्रभावशाली है।

बुनियादी शिक्षा की असफलता के कारण 

बुनियादी शिक्षा का कार्यक्रम सामान्य असफल रहा। प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री जे0 पी0 नायक (1998) ने बुनियादी शिक्षा की असंतोषजनक प्रगति के निम्नलिखित कारण बताए-
  1. इसका सर्वप्रमुख कारण सत्ताधारी वर्ग द्वारा बुनियादी शिक्षा को अस्वीकार किया जाना है। इन वर्गों मे शारीरिक श्रम के प्रति उदासीनता की परम्परा रही है। उनका आकर्षण पुस्तक आधारित शिक्षा पर रहा है। इस वर्ग ने स्कूल के पाठ्यक्रम में शारीरिक श्रम और उत्पादक कार्य आरम्भ करने के विरोध मे सामाजिक और मानसिक दबाव डाला। 
  2. जनसाधारण द्वारा भी बेसिक शिक्षा प्रणाली की आलोचना की गई। आम जनता साधारणत: उच्च एवं मध्य वर्ग का अनुकरण करना चाहती है। वे इस बात से असहमत थे कि शहरी मध्य वर्ग को पुस्तक केन्द्रित अंगे्रजी शिक्षा दी जाये और ग्रामीण बच्चों को शिल्प आधारित शिक्षा। वे इसे दोयम दर्जे की शिक्षा मानते थे। उन्होंने ने भी बुनियादी शिक्षा को अस्वीकार कर दिया। 
  3. इसके साथ अन्य तकनीकी समस्यांए भी थी। बुनियादी विद्यालयों मे शिल्प की शिक्षा दी जाती थी। इसके लिए कच्चे माल की आपूर्ति में कठिनाई होती थी। कृषि के लिए भूमि चाहिए थी। साथ ही शिल्प सिखाने के लिए प्रशिक्षित अध्यापकों की सर्वथा कमी थी। साथ ही तैयार उत्पादों को बेचने की सन्तोषजनक व्यवस्था नहीं की जा सकी। 
  4. छात्रों की संख्या मे द्रुतगति से विस्तार की एक अन्य प्रमुख समस्या थी। यदि यह प्रयोग प्रारम्भ में सीमित पैमाने पर होता तो शायद सफल हो सकता था। अनेक स्कूलों मे जहाँ सही प्रकार के अध्यापक उपलब्ध हुए और आवश्यक सुविधांए प्रदान की गयी, यह कार्यक्रम सफल भी हुआ, परन्तु कार्यक्रम के बड़े स्तर पर विस्तार के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध नहीं थे।
  5. वित्त की दृष्टि से बुनियादी विद्यालयों का अनुभव मिश्रित रहा। इसके कारण प्राथमिक शिक्षा के लिए सरकारी निवेश में किसी प्रकार की कमी नहीं हुई। अत: स्वतंत्र भारत मे भी सरकारों ने इस कार्यक्रम मे विशेष रूचि नहीं दिखलाई। 
इस प्रकार अभिजात वर्ग के विरोध के कारण बुनियादी शिक्षा का क्रांतिकारी प्रयोग असफल रहा।

संदर्भ -
  1. शिक्षा के दार्शनिक और सामाजिक आधार, माथुर, एस.एस., विनोद पुस्तक मंदिर।
  2. शिक्षा के दार्शनिक आधार, शर्मा, ओ.पी.।

Bandey

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