अभिवृत्ति का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं और अभिवृत्ति मापन की विधियाँ

अभिवृत्ति सामाजिक मनोविज्ञान का एक केन्द्रीय विषय है। सामाजिक मनोवैज्ञानिकों की रूचि विगत कई दशकों से अभिवृत्ति में रही है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि मनुष्य के व्यवहार को अभिवृत्ति बहुत प्रभावित करती है अभिवृत्ति का अभिप्राय सामाजिक विश्व के किसी पक्ष के हमारे मूल्यांकन से है (फैजिया व रॉस्कॉस-एवोल्डसेन, 1994 (ट्रेसर व मार्टिन, 1996)- सामाजिक विश्व के कोई और हर तत्व मुद्दे, विचार, व्यक्ति, सामाजिक समूह, वस्तु-के प्रति हम जिस हद तक सकारात्मक या नकारात्मक प्रतिक्रियाएँ रखते है।

अभिवृत्ति का अर्थ

व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष उसकी अभिवृत्तियाँ हैं। अभिवृत्ति वास्तव में एक मनो-सामाजिक प्रत्यय है जो विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों में व्यक्ति के द्वारा किये जाने वाले व्यवहार की प्रवृत्ति को बताता है। विभिन्न वस्तुओं, व्यक्तियों, संस्थाओं, स्थितियों, योजनाओं आदि के प्रति व्यक्ति विशेष के विचार व पूर्व धारणाएँ ही उस व्यक्ति की अभिवृत्तियों का निर्धारण करते हैं। अभिवृत्तियों की सहायता से व्यक्ति के व्यवहार का पूर्व आकलन व विश्लेषण करना संभव होता है।

अभिवृत्ति क्या है? इस प्रश्न का उत्तर देना व्यक्तित्व के अर्थ को स्पष्ट करने की तरह से एक कठिन कार्य है। अभिवृत्ति के मनोभावों अथवा विश्वासों को इंगित करती हैं। ये बताती हैं कि व्यक्ति क्या महसूस करता है अथवा उसके पूर्व विश्वास क्या हैं? अभिव्यक्ति से अभिप्रायः व्यक्ति के उस दृष्टिकोण से है, जिसके कारण वह किन्हीं वस्तुओं, व्यक्तियों, संस्थानों, परिस्थितियों, योजनाओं आदि के प्रति किसी विशेष प्रकार का व्यवहार करता है। दूसरे शब्दों में अभिवृत्ति व्यक्ति के व्यक्तित्व की वे प्रवृत्तियाँ हैं, जो उसे किसी वस्तु, व्यक्ति आदि के संबंध में किसी विशिष्ट प्रकार के व्यवहार को प्रदर्शित करने का निर्णय लेने को प्रेरित करती है। अभिवृत्तियों का निर्माण व्यक्ति के द्वारा विगत में विभिन्न परिस्थितियों में अर्जित अनुभवों को सामान्यीकृत करने के फलस्वरूप होता है। अभिवृत्ति के निर्माण में व्यक्ति के व्यवहार के प्रत्यक्षात्मक, संवेगात्मक, प्रेरणात्मक तथा क्रियात्मक पक्ष निहित रहते हैं। 

अभिवृत्ति की परिभाषा

मनोवैज्ञानिकों ने ‘अभिवृत्ति’ शब्द को भिन्न-भिन्न ढंग से परिभाषित किया है।

आलपोर्ट (1935) ने अभिवृत्ति को परिभाषित करते हुए लिखा है कि, ‘‘अभिवृत्ति मानसिक तथा स्नायुविक तत्परता की एक स्थिति है, जो अनुभव द्वारा निर्धारित होती है और जो उन समस्त वस्तुओं तथा परिस्थितियों के प्रति हमारी प्रतिक्रियाओं को प्रेरित व निर्देशित करती है, जिनसे कि वह अभिवृत्ति सम्बन्धित है।’’ 

बी. कुप्पुस्वामी (1975 : 109) ने भी अभिवृत्ति को स्पष्ट करते हुए उसके समस्त अवयवों पर प्रकाश डाला है। उनका कहना है कि, ‘‘अभिवृत्ति एक ऐसी स्थायी प्रणाली है, जिसमें एक संज्ञानात्मक अवयव, एक अनुभूति सम्बन्धी अवयव तथा एक सक्रिय प्रवृत्ति सम्मिलित होती है। अभिवृत्ति में भावनात्मक अवयव भी सम्मिलित है। यही कारण है कि जब भी कभी कोई अभिवृत्ति बनती है तो यह परिवर्तन की प्रतिरोधी हो जाती है। 

यह सामान्यत: नये तथ्यों के प्रति अनुक्रिया नहीं करती। अभिवृत्ति में आस्थाओं और मूल्याँकनों का भी समावेश होता है। उच्चतर जाति का कोई व्यक्ति किसी हरिजन के बारे में प्राय: प्रतिकूल अभिवृत्ति रखता है। किसी पाकिस्तानी या चीनी के बारे में किसी भारतीय की अभिवृत्ति प्रतिकूल होती है। इन अभिवृत्तियों में अन्य समूहों के बारे में कुछ जानकारी (संज्ञानात्मक अवयव), अप्रियता की कुछ भावनाएँ (प्रभावी, मूल्याँकनात्मक अवयव) तथा आक्रमण आदि से बचने की एक पूर्व प्रवृत्ति (क्रियात्मक अवयव) का समावेश होता है।’’

वी.वी. अकोलकर (1960 : 231) ने अभिवृत्ति की अति संक्षिप्त परिभाषा देते हुए लिखा है कि, ‘‘किसी वस्तु या व्यक्ति के विषय में अभिवृत्ति उस वस्तु या व्यक्ति के विषय में एक विशेष ढंग से सोचने, अनुभव करने और क्रिया करने की तत्परता की दशा है।’’ दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि किसी वस्तु या व्यक्ति के बारे में विशेष तरह से सोचने, अनुभव करने या क्रिया करने की तत्परता की स्थिति को अभिवृत्ति कहते हैं।

अभिवृत्ति की विशेषताएं 

अभिवृत्ति की विशेषताएं (abhivritti ki visheshta) हैं –
  1. अभिवृत्ति की पहली विशेषता यह है कि, यह एक मानसिक एवं स्नायविक अवस्था है,
  2. दूसरी विशेषता यह है कि यह प्रतिक्रिया करने की एक तत्परता है।
  3. तीसरी विशेषता यह है कि यह एक जटिल एवं हस्तक्षेपीय या मध्यस्थ अवधारणा है। जटिल और संगठित इसलिए है कि, इसमें जो संघटक हैं- भावनात्मक, संज्ञानात्मक और व्यवहारात्मक, ये तीनों अत्यन्त जटिल होते हैं। इसलिए अभिवृत्ति भी जटिल होती है। कई संघटकों के कारण यह संगठित होती है। जहाँ तक मध्यस्थ या हस्तक्षेपीय अवधारणा की बात है अभिवृत्ति स्वतंत्र चर का न केवल परिणाम होती है अपितु स्वयं में भी स्वतंत्र चर (किसी व्यवहार या प्रतिक्रिया का निर्धारक होने के कारण) होती है।
  4. अभिवृत्ति की चौथी विशेषता यह है कि, यह अर्जित की जाती है। व्यक्ति अपने जीवन काल में विविध कारकों के सहयोग से अभिवृत्तियों को अर्जित करता या सीखता है।
  5. पाँचवी विशेषता यह है कि अभिवृत्ति बहुधा स्थायी होती है। विशेष परिस्थितियों में इसमें परिवर्तन भी पाया जाता है।
  6. इसकी अन्तिम छठी विशेषता यह है कि इसमें एक दिशा और तीव्रता होती है। दिशा या तो सकारात्मक होती या नकारात्मक। सकारात्मक या नकारात्मक अभिवृत्ति में तीव्रता के आधार पर अन्तर होता है। जैसे किन्हीं दो व्यक्तियों में किसी के प्रति घृणा या पसन्दगी की मात्रा कम या ज्यादा हो सकती है। सकारात्मक या नकारात्मक अभिवृत्ति में अनुकूल या प्रतिकूल व्यवहार या प्रतिक्रिया के पेर्र क गुण होते है।

अभिवृत्ति निर्माण

अभिवृत्तियों के निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत सामाजिक सीख है। सामाजिक सीख वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा हम अन्य लोगों से नई जानकारी, व्यवहार के तरीके या मनोवृत्तियाँ ग्रहण करते हैं। हमारी अधिकांश अभिवृत्तियाँ उस समूह से विकसित होती है, जिससे हम सम्बद्ध होते है। बाल्यावस्था से ही बच्चा परिवार में सामाजीकरण की प्रक्रिया के दौरान विविध वस्तुओं, व्यक्तियों इत्यादि के प्रति सकारात्मक एवं नकारात्मक अभिवृत्ति को निर्मित करता है। परिवार के साथ-साथ व्यक्ति अपने संगी-साथियों और समूह के अन्य सदस्यों से भी सामाजिक सीख के द्वारा अभिवृत्तियों का निर्माण चलता है। 

अभिवृत्ति मापन की विधियाँ

निःसंदेह अभिवृत्तियों का सामाजिक विज्ञानों में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा सार्थक स्थान है, यही कारण है कि मनोवैज्ञानिक, शिक्षाशास्त्राी, प्रशासकगण, समाजशास्त्राी आदि अभिवृत्तियों के मापन के प्रयास करते रहे हैं। अभिवृत्तियों की प्रकृति आन्तरिक होने के कारण इनका मापन करना सदैव ही कठिन समस्या रही है, फिर  भी समय-समय पर आवश्यकताओं के अनुरूप अभिवृत्तियों के मापन के विभिन्न प्रयास मनोमितिकों के द्वारा किये जाते रहे हैं। अभिवृत्ति मापन के इतिहास के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि अभिवृत्तियों के मापन के प्रयास अपेक्षाकृत नवीन है। लगभग छः दशक पूर्व ही अभिवृत्ति मापन के लिए विधिवत ढंग से परीक्षण बनाने की प्रविधियां विकसित की जा सकी थीं। इसके पूर्व तक साक्षात्कार तथा अवलोकन जैसी अपरिष्कृत विधियों की सहायता से ही अभिवृत्तियों का मापन करने का प्रयास किया जाता था।

सन् 1927 में थर्सटन ने तुलनात्मक निर्णय का नियम का प्रतिपादन किया। इस नियम के प्रतिपादन ने अभिवृत्तियों को विधिवत ढंग से मापने का मार्ग प्रशस्त कर दिया तथा इस नियम के आधार पर अनेक मनोवैज्ञानिक परिमापन विधियाँ विकसित की गयीं, जिनका प्रयोग आज भी अभिवृत्तियों को मापने के लिए किया जाता है। थर्सटन ने अपने तुलनात्मक निर्णय नियम का प्रयोग करते हुए सन् 1927 में युग्म-तुलनात्मक निर्णय विध् का विकास भी किया। दो वर्ष उपरान्त सन् 1929 में थर्सटन ने चेव के सहयोग से समदृष्टि अन्तर विधि का प्रतिपादन किया।

सन् 1932 में लिकर्ट ने योग निर्धारण विधि को विकसित किया। थर्सटन व चेव के द्वारा प्रस्तुत समदृष्टि अन्तर विधि तथा लिकर्ट के द्वारा प्रस्तुत योग निर्धारण विधि का वर्तमान समय में अभिवृत्ति मापन के लिए सर्वाधिक प्रयोग किया जाता है तथा इन विधियों को अभिवृत्ति मापन के क्षेत्र में अमूल्य योगदान के रूप में स्वीकार किया जाता है। सफीर ने सन् 1937 में थर्सटन के द्वारा विकसित परन्तु अप्रकाशित एक विधि को क्रमब( अन्तराल विधि के नाम से प्रस्तुत किया। 

गटमैन ने सन् 1945 में अभिवृत्ति मापन के लिए स्वैफलोग्राम विधि का प्रतिपादन किया। सन् 1948 में एडवर्डस तथा किलपैट्रिक ने मापनी भेदक विधि का प्रतिपादन किया। आसगुड ने सन् 1957 में विभेद शाब्दिक विधि को विकसित किया। रेमर्स ने सन् 1934 में एक ही वर्ग की अनेक वस्तुओं के प्रति अभिवृत्ति के मापन के लिए मास्टर या सामान्यीकृत प्रकार की मापनी को प्रस्तुत किया। 

इसके अतिरिक्त अन्य विद्वानों ने भी अभिवृत्ति मापन के क्षेत्र में अनेक प्रयास किये। स्पष्ट है कि विगत साठ वर्षों में अभिवृत्ति मापन के क्षेत्र में काफी विकास हुआ है तथा आधुनिक समय में विभिन्न वस्तुओं, व्यक्तियों, परिस्थितियों आदि के प्रति-अभिवृत्ति का मापन करने के लिए अनेक प्रकार के अभिवृत्ति मापन उपकरण उपलब्ध है। अभिवृत्ति के मापन की तीन मुख्य विधियाँ हैं
  1. प्रत्यक्ष प्रश्न विधि
  2. प्रत्यक्ष अवलोकन विधि
  3. स्केलिंग विधि
प्रथम दो विधियों में अभिवृत्ति का मापन व्यक्ति के दिन-प्रतिदिन के व्यवहार के माध्यम से करते हैं। इसलिए इन दोनों विधियों को व्यावहारिक विधि या प्रत्यक्ष विधि भी कहते हैं। स्पष्ट है कि व्यावहारिक विधियों में व्यक्ति से सीधे-सीधे प्रश्न पूछ कर अथवा उसके व्यवहार का प्रत्यक्ष अवलोकन करके उसकी अभिवृत्तियों को जाना जाता है। यह विधि अत्यन्त सरल है, परन्तु इसकी अपनी कुछ परिसीमाएँ हैं। अभिवृत्ति मापन की तीसरी विधि को मनोवैज्ञानिक विधि या अप्रत्यक्ष विधि भी कहा जाता है। इस विधि के अंतर्गत मनोवैज्ञानिक सातत्य पर व्यक्ति की स्थिति को परिमापन करके उसकी अभिवृत्ति का मापन किया जाता है। परिमापन की अनेक विधियाँ हैं।

1. प्रत्यक्ष प्रश्न विधि

इस विधि में किसी व्यक्ति की किसी वस्तु, व्यक्ति आदि के प्रति अभिवृत्ति को ज्ञात करने के लिए सीधे-सीधे प्रश्न पूछे जाते हैं। व्यक्ति के द्वारा उन प्रश्नों पर दिये गये उत्तरों के द्वारा उसकी अभिवृत्ति के संबंध में जानकारी मिल जाती है। इस विधि की तार्किक मान्यता है कि यदि किसी वस्तु या व्यक्ति के संबंध में अन्य व्यक्तियों के विचारों को जानना चाहते हैं तो उसकी सर्वोत्तम विधि उससे प्रश्न पूछना है। प्रत्यक्ष प्रश्न करना वास्तव में कुछ उद्देश्यों की पूर्ति में बड़ा ही उपयुक्त व संतोषप्रद होता है। इस विधि का प्रयोग करके व्यक्तियों को उनकी अभिवृत्ति के आधार पर तीन वर्गों-(i) ऐसे व्यक्ति जिनकी अनुकूल अभिवृत्ति है, (ii) ऐसे व्यक्ति जिनकी प्रतिकूल अभिवृत्ति है, तथा (iii) ऐसे व्यक्ति जो यह कहते हैं कि वे अभिवृत्तियों के संबंध में कोई स्पष्ट मत नहीं बना पा रहे हैं, पर बाँटा जाना संभव है। 

उदाहरण के लिए किसी राष्ट्रीय सर्वेक्षण में आप से पूछा जाये कि आपकी मंडल आयोग के द्वारा संस्तुत पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण के संबंध में क्या अभिवृत्ति है? तो इसका अर्थ है कि साक्षत्कारकत्र्ता प्रत्यक्ष प्रश्न विधि की सहायता से आपकी अभिवृत्ति की जानकारी करके आपको उपरोक्त तीन वर्गों में से किसी एक वर्ग में वर्गीकृत करने का प्रयास कर रहा है। यदि आप आरक्षण के प्रति अपनी सहमति अथवा पसंद का प्रदर्शन करते हैं तो आपको उपरोक्त वर्णित आरक्षण के प्रति अनुकूल अभिवृत्ति रखने वाले वर्ग में सम्मिलित किया जायेगा। 

इसके विपरीत यदि आप आरक्षण के प्रति अपनी असहमति अथवा नापसंद का प्रदर्शन करते हैं तो आपको उपरोक्त वर्णित आरक्षण के प्रति प्रतिकूल अभिवृत्ति वाले वर्ग में रखा जायेगा और यदि आप आरक्षण के प्रति अपने विचार व्यक्त करने में झिझक रहे हैं। या आपके विचारों में अस्पष्टता है तो आपको उपरोक्त वर्णित आरक्षण के प्रति अनिश्चित अभिवृत्ति वाले वर्ग में सम्मिलित किया जायेगा।

अभिवृत्ति ज्ञात करने की प्रत्यक्ष प्रश्न विधि कोई वैज्ञानिक विधि नहीं है। यद्यपि इस विधि में कम समय में अधिक व्यक्तियों की अभिवृत्ति का ज्ञान किया जा सकता है। यह विधि अत्यन्त सुगम है तथा अप्रशिक्षित व्यक्ति भी इस विधि का सफलतापूर्वक उपयोग कर सकते हैं, फिर भी इस विधि की कुछ सीमाएँ हैं। प्रथम, अनेक व्यक्ति अपने विचारों, भावों या अभिवृत्तियों को सार्वजनिक रूप से प्रकट करने में झिझक का अनुभव करते हैं, वे भय अथवा सामाजिक वांछनीयता, दबाव आदि के कारण अपने विचारों को प्रकट करने के लिए अनिच्छुक होते हैं। 

इस विधि से अभिवृत्ति का ठीक-ठीक मापन तभी संभव होता है जब सामाजिक वातावरण विभिन्न प्रकार के दबावों से मुक्त होता है तथा व्यक्ति सहर्ष अपने विचारों को सही-सही ढंग से प्रकट करने के लिए तत्पर होता है उदाहरण के लिए अनेक ऐसे व्यक्ति हैं, जो सती प्रथा, दहेज अथवा छुआछूत के प्रति सकारात्मक अभिवृत्ति रखते हैं, परन्तु सामाजिक भय तथा वांछनीयता के कारण अपने को इन प्रथाओं का विरोधी बताते हैं, एवं वास्तविक व्यवहार में वे इन प्रथाओं के अनुरूप कार्य करते हैं। इन प्रथाओं के संबंध में यदि व्यक्तियों से गुप्त मतदान के द्वारा विचार माँगे जाए तो संभवतः गुप्त मतदान में अनेक परंपरावादी व्यक्ति इन प्रथाओं के पक्ष में मत देंगे, जबकि ऐसे व्यक्ति मुक्त मतदान में या तो अनिश्चित रहेंगे अथवा इन प्रथाओं के विरुद मत देंगे। स्पष्ट है कि प्रत्यक्ष प्रश्न विधि में व्यक्ति अपनी स्पष्ट तथा वास्तविक राय को विभिन्न सामाजिक कारणों से व्यक्त करने में झिझक सकता है जिसके कारण इस विधि से प्राप्त परिणाम कम वैध होते हैं।

प्रत्यक्ष प्रश्न विधि की द्वितीय परिसीमा इसकी विश्वसनीयता में कमी होना है। व्यक्ति कभी-कभी अपने विचारों के संबंध में अस्पष्ट होता है। उनकी किसी वस्तु या व्यक्ति के बारे में वास्तव में क्या राय है, वे उससे अनजान रहते हैं तथा क्षणिक उत्तेजनाओं में अपनी वास्तविक अभिवृत्ति से भिन्न विचारों का प्रदर्शन करते हैं। अनेक अध्ययनों में पाया गया है कि व्यक्ति की प्रदर्शित अभिवृत्ति तथा वास्तविक अभिवृत्ति में पर्याप्त अन्तर हो सकता है।

2. प्रत्यक्ष अवलोकन विधि

अभिवृत्ति ज्ञात करने की प्रत्यक्ष अवलोकन विधि में व्यक्तियों के व्यवहार का अवलोकन करके उसकी अभिवृत्ति का पता लगाया जाता है। इस विधि की मान्यता है कि व्यक्ति के द्वारा अपने दिन-प्रतिदिन की दिनचर्या के दौरान किये जाने वाले व्यवहार के द्वारा किसी वस्तु, व्यक्ति अथवा संस्था के प्रति उसकी अभिवृत्ति को ज्ञात किया जा सकता है। इस विधि के द्वारा भी व्यक्तियों को उनकी अभिवृत्ति के आधार पर तीन वर्गों-अनुकूल अभिवृत्ति, प्रतिकूल अभिवृत्ति तथा अनिश्चित अभिवृत्ति में बाँटा जा सकता है क्योंकि अवलोकित होने वाले व्यक्ति को अपने अवलोकित होने का ज्ञान नहीं होता है तथा वह अपने वास्तविक व्यवहार को प्रकट कर देता है। इसलिए प्रत्यक्ष प्रश्न विधि की अपेक्षा, प्रत्यक्ष अवलोकन विधि अधिक उपयुक्त है। 

उदाहरणार्थ यदि कोई व्यक्ति हरिजन के हाथ का बना भोजन नहीं करता है अथवा उसके यहाँ सामाजिक सौजन्यता के लिए नहीं जाता है अथवा अपने घर में उसको उचित आसान व सम्मान नहीं देता है, तो इससे यह अभिप्राय निकाला जा सकता है कि वह व्यक्ति हरिजनों के प्रति प्रतिकूल अभिवृत्ति रखता है।

निःसंदेह प्रत्यक्ष प्रश्न विधि की तुलना में प्रत्यक्ष अवलोकन विधि अधिक श्रेष्ठ है फिर भी इस विधि की भी अनेक सीमाएँ हैं। प्रथम, अधिक व्यक्तियों की अभिवृत्ति का मापन करने में अत्यधिक समय लगता है तथा कठिनता आती है। उदाहरणार्थ, यदि हम संपूर्ण भारतवर्ष (या किसी राज्य) के नागरिकों के किसी बड़े प्रतिदर्श की राष्ट्रपति प्रणाली के प्रति अभिवृत्ति जानना चाहे तो प्रत्यक्ष अवलोकन विधि के द्वारा प्रतिदर्श के सभी नागरिकों के व्यवहार का अवलोकन करके उनकी अभिवृत्ति को ज्ञात करना अत्यन्त कठिन ही नहीं वरन् लगभग असंभव कार्य होगा। द्वितीय व्यक्ति सामाजिक कारणों से अपने कुछ वास्तविक परन्तु अवांछनीय व्यवहारों को छिपाकर करता है। 

उदाहरण के लिए प्रतिदिन शराब पीने वाला व्यक्ति भी सामाजिक कारणों से अन्य व्यक्तियों से छिपकर शराब तो पीता है, परन्तु शराब के विरु( बातें कहता है। इसके विपरीत शराब के प्रति वास्तविक रूप में ऋणात्मक अभिवृत्ति रखने वाला व्यक्ति भी सामाजिक माँग के कारण अपने घर पर आयोजित पार्टी में शराब की व्यवस्था करने को विवश हो जाता है। इसी प्रकार से चलचित्र के प्रति ऋणात्मक अभिवृत्ति रखने वाला व्यक्ति भी अपने मित्रों के दबाव में आकर चलचित्रा देखने जा सकता है तथा दहेज के प्रति धनात्मक अभिवृत्ति वाला व्यक्ति सामाजिक दबावों तथा कानूनी बंधनों के कारण दहेज लेने के विपरीत बातें करता है। स्पष्ट है कि प्रत्यक्ष व्यवहार तथा वास्तविक अभिवृत्ति में संबंध का होना सदैव ही आवश्यक नहीं है। 

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि प्रत्यक्ष प्रश्न तथा प्रत्यक्ष अवलोकन विधियों के द्वारा अभिवृत्ति मापन से प्राप्त परिणाम कम विश्वसनीय तथा वैध होते हैं। इसीलिए मनोवैज्ञानिकों ने अभिवृत्ति मापन की कुछ अधिक विश्वसनीय विधियों की खोज की है। इनके अंतर्गत परिमापन विधियां आती हैं, जिनकी विस्तार से आगे चर्चा की जाएगी।

3. परिमापन विधियां 

प्रत्यक्ष प्रश्न विधि तथा प्रत्यक्ष अवलोकन विधि के द्वारा अभिवृत्ति मापन में होने वाली कमियों के कारण अभिवृत्ति मापन के लिए परिमापन विधि का प्रदुर्भाव हुआ है, जिसके फलस्वरूप अभिवृत्ति मापनी के निर्माण की अनेक विधियां विकसित हुई तथा उनके द्वारा अभिवृत्ति मापनियों का निर्माण करके अभिवृत्ति मापन के कार्य को अधिक तर्कसंगत ढंग से किया जाने लगा। भौतिक चरों के मापन के लिए भौतिक सातत्य का प्रयोग किया जाता है, जो विभिन्न वस्तुओं को उनके गुणों की मात्रा के आधार पर क्रमबद्ध रूप में व्यवस्थित कर देता है। जैसे भार के मापन के लिए वस्तुओं को उनके भार के आधार पर 0 kg, 1 kg, 2 kg, 3 kg...... के सातत्य पर वर्गीकृत किया जाता है, लंबाई के मापन के लिए वस्तुओं को 0 cm. 1 cm, 2 cm...... के सातत्य पर वर्गीकृत किया जाता है तथा तापमान के लिए वस्तुओं को 0ºC, 1ºC, 2ºC ...... के सातत्य पर वर्गीकृत किया जाता है। ठीक इसी प्रकार से वस्तुओं या व्यक्तियों को उनसे संबंध्ति प्रतिक्रियाओं या निर्णयों के आधर पर मनोवैज्ञानिक सातत्यों पर क्रमबद्ध किया जा सकता है। कुछ मनोवैज्ञानिक सातत्यों को उदाहरणार्थ आगे प्रस्तुत किया गया है।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं। मैंने अपनी पुस्तकों के साथ बहुत समय बिताता हूँ। इससे https://www.scotbuzz.org और ब्लॉग की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

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