अभिवृत्ति किसे कहते हैं? परिभाषा और विशेषताएं

अभिवृत्ति किसे कहते हैं? (abhivrtti kise kahate hain?) अभिवृत्ति सामाजिक मनोविज्ञान का एक केन्द्रीय विषय है। सामाजिक मनोवैज्ञानिकों की रूचि विगत कई दशकों से अभिवृत्ति में रही है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि मनुष्य के व्यवहार को अभिवृत्ति बहुत प्रभावित करती है। अभिवृत्ति का अभिप्राय सामाजिक विश्व के किसी पक्ष के हमारे मूल्यांकन से है (फैजिया व रॉस्कॉस-एवोल्डसेन, 1994( ट्रेसर व मार्टिन, 1996)- सामाजिक विश्व के कोई और हर तत्व मुद्दे, विचार, व्यक्ति, सामाजिक समूह, वस्तु-के प्रति हम जिस हद तक सकारात्मक या नकारात्मक प्रतिक्रियाएँ रखते है।

अभिवृत्ति की परिभाषा

अभिवृत्ति की परिभाषा (abhivritti ki paribhasha) मनोवैज्ञानिकों ने ‘अभिवृत्ति’ शब्द को भिन्न-भिन्न ढंग से परिभाषित किया है।

आलपोर्ट (1935) ने अभिवृत्ति को परिभाषित करते हुए लिखा है कि, ‘‘अभिवृत्ति मानसिक तथा स्नायुविक तत्परता की एक स्थिति है, जो अनुभव द्वारा निर्धारित होती है और जो उन समस्त वस्तुओं तथा परिस्थितियों के प्रति हमारी प्रतिक्रियाओं को प्रेरित व निर्देशित करती है, जिनसे कि वह अभिवृत्ति सम्बन्धित है।’’ 

बी. कुप्पुस्वामी (1975 : 109) ने भी अभिवृत्ति को स्पष्ट करते हुए उसके समस्त अवयवों पर प्रकाश डाला है। उनका कहना है कि, ‘‘अभिवृत्ति एक ऐसी स्थायी प्रणाली है, जिसमें एक संज्ञानात्मक अवयव, एक अनुभूति सम्बन्धी अवयव तथा एक सक्रिय प्रवृत्ति सम्मिलित होती है। अभिवृत्ति में भावनात्मक अवयव भी सम्मिलित है। यही कारण है कि जब भी कभी कोई अभिवृत्ति बनती है तो यह परिवर्तन की प्रतिरोधी हो जाती है। 

यह सामान्यत: नये तथ्यों के प्रति अनुक्रिया नहीं करती। अभिवृत्ति में आस्थाओं और मूल्याँकनों का भी समावेश होता है। उच्चतर जाति का कोई व्यक्ति किसी हरिजन के बारे में प्राय: प्रतिकूल अभिवृत्ति रखता है। किसी पाकिस्तानी या चीनी के बारे में किसी भारतीय की अभिवृत्ति प्रतिकूल होती है। इन अभिवृत्तियों में अन्य समूहों के बारे में कुछ जानकारी (संज्ञानात्मक अवयव), अप्रियता की कुछ भावनाएँ (प्रभावी, मूल्याँकनात्मक अवयव) तथा आक्रमण आदि से बचने की एक पूर्व प्रवृत्ति (क्रियात्मक अवयव) का समावेश होता है।’’

वी.वी. अकोलकर (1960 : 231) ने अभिवृत्ति की अति संक्षिप्त परिभाषा देते हुए लिखा है कि, ‘‘किसी वस्तु या व्यक्ति के विषय में अभिवृत्ति उस वस्तु या व्यक्ति के विषय में एक विशेष ढंग से सोचने, अनुभव करने और क्रिया करने की तत्परता की दशा है।’’ दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि किसी वस्तु या व्यक्ति के बारे में विशेष तरह से सोचने, अनुभव करने या क्रिया करने की तत्परता की स्थिति को अभिवृत्ति कहते हैं।

अभिवृत्ति की विशेषताएं 

अभिवृत्ति की विशेषताएं (abhivritti ki visheshta) हैं –
  1. अभिवृत्ति की पहली विशेषता यह है कि, यह एक मानसिक एवं स्नायविक अवस्था है,
  2. दूसरी विशेषता यह है कि यह प्रतिक्रिया करने की एक तत्परता है।
  3. तीसरी विशेषता यह है कि यह एक जटिल एवं हस्तक्षेपीय या मध्यस्थ अवधारणा है। जटिल और संगठित इसलिए है कि, इसमें जो संघटक हैं- भावनात्मक, संज्ञानात्मक और व्यवहारात्मक, ये तीनों अत्यन्त जटिल होते हैं। इसलिए अभिवृत्ति भी जटिल होती है। कई संघटकों के कारण यह संगठित होती है। जहाँ तक मध्यस्थ या हस्तक्षेपीय अवधारणा की बात है अभिवृत्ति स्वतंत्र चर का न केवल परिणाम होती है अपितु स्वयं में भी स्वतंत्र चर (किसी व्यवहार या प्रतिक्रिया का निर्धारक होने के कारण) होती है।
  4. अभिवृत्ति की चौथी विशेषता यह है कि, यह अर्जित की जाती है। व्यक्ति अपने जीवन काल में विविध कारकों के सहयोग से अभिवृत्तियों को अर्जित करता या सीखता है।
  5. पाँचवी विशेषता यह है कि अभिवृत्ति बहुधा स्थायी होती है। विशेष परिस्थितियों में इसमें परिवर्तन भी पाया जाता है।
  6. इसकी अन्तिम छठी विशेषता यह है कि इसमें एक दिशा और तीव्रता होती है। दिशा या तो सकारात्मक होती या नकारात्मक। सकारात्मक या नकारात्मक अभिवृत्ति में तीव्रता के आधार पर अन्तर होता है। जैसे किन्हीं दो व्यक्तियों में किसी के प्रति घृणा या पसन्दगी की मात्रा कम या ज्यादा हो सकती है। सकारात्मक या नकारात्मक अभिवृत्ति में अनुकूल या प्रतिकूल व्यवहार या प्रतिक्रिया के पेर्र क गुण होते है।

अभिवृत्ति निर्माण

अभिवृत्तियों के निर्माण (abhivrttiyon ke nirman) का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत सामाजिक सीख है। सामाजिक सीख वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा हम अन्य लोगों से नई जानकारी, व्यवहार के तरीके या मनोवृत्तियाँ ग्रहण करते हैं। हमारी अधिकांश अभिवृत्तियाँ उस समूह से विकसित होती है, जिससे हम सम्बद्ध होते है। बाल्यावस्था से ही बच्चा परिवार में सामाजीकरण की प्रक्रिया के दौरान विविध वस्तुओं, व्यक्तियों इत्यादि के प्रति सकारात्मक एवं नकारात्मक अभिवृत्ति को निर्मित करता है। परिवार के साथ-साथ व्यक्ति अपने संगी-साथियों और समूह के अन्य सदस्यों से भी सामाजिक सीख के द्वारा अभिवृत्तियों का निर्माण चलता है। 

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