अभिवृत्ति की अवधारणा, विशेषताएं एवं निर्माण

अनुक्रम
अभिवृत्ति सामाजिक मनोविज्ञान का एक केन्द्रीय विषय है। सामाजिक मनोवैज्ञानिकों की रूचि विगत कई दशकों से अभिवृत्ति में रही है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि मनुष्य के व्यवहार को अभिवृत्ति बहुत प्रभावित करती है। अभिवृत्ति का अभिप्राय सामाजिक विश्व के किसी पक्ष के हमारे मूल्याँकन से है (फैजिया व रॉस्कॉस-एवोल्डसेन, 1994( ट्रेसर व मार्टिन, 1996)- सामाजिक विश्व के कोई और हर तत्व मुद्दे, विचार, व्यक्ति, सामाजिक समूह, वस्तु-के प्रति हम जिस हद तक सकारात्मक या नकारात्मक प्रतिक्रियाएँ रखते है।

अभिवृत्ति के मनोविज्ञान में निम्नाँकित आधारभूत समस्याएँ है। (शेरिफ और शेरिफ 1969 : 333)- अभिवृि त्त के क्या गुण है। अवलोकित व्यवहार के किस तरीके से किसी अभिवृत्ति को जाना जा सकता है? वैध अभिवृत्ति सूचकों को प्राप्त करने के लिए किस प्रकार की शोध प्रक्रियाओं की आवश्यकता होती है? एक दी गई वस्तु के प्रति एक व्यक्ति की अभिवृत्ति दूसरे व्यक्ति की अभिवृत्ति से तुलना करने के लिए कौन सी उपयुक्त पैमाना है? शेरिफ और शेरिफ का मानना है कि किसी भी चीज का माप करने के लिए हमें माप की जाने वाली वस्तु की विशेषताओं को जानना चाहिए।

एक बार अभिवृत्ति का निर्माण हो जाने पर उसमें परिवर्तन लाना अत्यन्त कठिन हो जाता है। प्रस्तुत अध्याय में हम अभिवृत्ति की अवधारणा को विविध विद्वानों की परिभाषाओं द्वारा समझने का प्रयास करेंगे। हम यह भी जानने का प्रयास करेंगे कि अभिवृत्तियों का निर्माण कैसे होता है, क्या वे सचमुच मानव व्यवहार को प्रभावित करती हैं, अभिवृत्तियो के क्या-क्या गुण हैं और क्या वे सचमुच कभी-कभी परिवर्तित होती है, इत्यादि।

अभिवृत्ति की अवधारणा 

अभिवृत्ति के सन्दर्भ में विविध सैद्धान्तिक दृष्टिकोणों/उपागमों के चलते मनोवैज्ञानिकों तथा समाज-मनोवैज्ञानिकों में उसकी कोई एक सर्वमान्य परिभाषा के सन्दर्भ में एकमत्य नहीं है। आलपोर्ट (1935) ने अभिवृत्ति को परिभाषित करते हुए लिखा है कि, ‘‘अभिवृत्ति मानसिक तथा स्नायुविक तत्परता की एक स्थिति है, जो अनुभव द्वारा निर्धारित होती है और जो उन समस्त वस्तुओं तथा परिस्थितियों के प्रति हमारी प्रतिक्रियाओं को प्रेरित व निर्देशित करती है, जिनसे कि वह अभिवृत्ति सम्बन्धित है।’’

आलपोर्ट की उपरोक्त परिभाषा को विश्लेषित किया जाये तो स्पष्ट होता है कि यह मानसिक एवं स्नायुविक तत्परता की एक स्थिति है तथा किसी वस्तुओं या परिस्थितियों के सन्दर्भ में व्यक्ति के मन के भाव पक्ष या मूल्यांकन पक्ष को अभिव्यक्त करती है। चूँकि यह अनुभवों द्वारा निर्धारित होती है अत: जन्मजात नहीं होती अपितु मनुष्य के अनुभवों द्वारा निर्धारित या प्राप्त की जाती है। आलपोर्ट ने मूल रूप से अभिवृत्ति को विशिष्ट प्रकार से अनुक्रिया करने के एक समुच्चय (सेट) के रूप में माना है।

उन्होंने इसके पाँचों महत्वपूर्ण पक्षों को अपनी परिभाषा में समाहित किया है। ये पाँचों पक्ष हैं- (1) अभिवृत्ति को मूर्तरूप में देखना संभव नहीं है। इसके दो मुख्य पक्ष होते हैं- मानसिक तथा स्नायुविक। (2) अभिवृत्ति प्रतिक्रिया करने की तत्परता है। यह कोई प्रतिक्रिया नहीं है, अपितु प्रतिक्रिया करें की मानसिक तत्परता है। (3) यह संगठित होती हैं। इसके विविध संघटकों-संज्ञानात्मक, भावात्मक तथा क्रियात्मक के मध्य घनिष्ट सम्बन्ध होता है। (4) अभिवृत्ति अनुभव के आधार पर अर्जित की जाती है; और (5) अभिवृत्तियों का निर्देशित या गत्यात्मक प्रभाव पड़ता है। यह व्यवहार की दिशा निर्धारित करने के साथ-साथ एक खास तरह का व्यवहार करने की शक्ति भी प्रदान करती है।

बी. कुप्पुस्वामी (1975 : 109) ने भी अभिवृत्ति को स्पष्ट करते हुए उसके समस्त अवयवों पर प्रकाश डाला है। उनका कहना है कि, ‘‘अभिवृत्ति एक ऐसी स्थायी प्रणाली है, जिसमें एक संज्ञानात्मक अवयव, एक अनुभूति सम्बन्धी अवयव तथा एक सक्रिय प्रवृत्ति सम्मिलित होती है। अभिवृत्ति में भावनात्मक अवयव भी सम्मिलित है। यही कारण है कि जब भी कभी कोई अभिवृत्ति बनती है तो यह परिवर्तन की प्रतिरोधी हो जाती है। यह सामान्यत: नये तथ्यों के प्रति अनुक्रिया नही करती। अभिवृत्ति में आस्थाओं और मूल्याँकनों का भी समावेश होता है। उच्चतर जाति का कोई व्यक्ति किसी हरिजन के बारे में प्राय: प्रतिकूल अभिवृत्ति रखता है। किसी पाकिस्तानी या चीनी के बारे में किसी भारतीय की अभिवृत्ति प्रतिकूल होती है। इन अभिवृत्तियों में अन्य समूहों के बारे में कुछ जानकारी (संज्ञानात्मक अवयव), अप्रियता की कुछ भावनाएँ (प्रभावी, मूल्याँकनात्मक अवयव) तथा आक्रमण आदि से बचने की एक पूर्व प्रवृत्ति (क्रियात्मक अवयव) का समावेश होता है।’’

बी. कुप्पुस्वामी (1975 : 110) का मानना है कि, ‘‘हमारी अभिवृत्तियाँ प्राथमिक रूप से सामाजिक प्रभावों से उत्पन्न होती है। जन्म से ही मानव प्राणी ऐसी सामाजिक संस्थाओं के जाल में उलझ जाता ह,ै जो भौतिक जगत् के रूप में उसके परिवेश का निर्माण करती है। प्रथम सामाजिक इकाई के रूप में परिवार का किसी व्यक्ति के अभिवृत्ति निर्माण पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि बाद में प्राप्त होने वाले अनुभव आसानी से हम अभिवृत्तियों में बदल नहीं सकते क्योंकि अभिवृत्तियाँ व्यक्तियों, समूहों और अन्य सामाजिक वस्तुओं के प्रति हमारी अनुक्रियाओं को एक संगति पद्र ान करती हं,ै इसका भी यही कारण है।’’

क्रच एवं क्रचफील्ड तथा अन्य (1962) के अनुसार ‘‘व्यक्ति का सामाजिक व्यवहार उसकी अभिवृत्तियों को प्रतिबिम्बित करता है- यह किसी सामाजिक वस्तु के प्रति धनात्मक या ऋणात्मक मूल्यांकनों, संवेगात्मक भावों तथा पक्ष या विपक्ष के क्रियात्मक झुकावों की अपेक्षाकृत स्थायी पद्धतियाँ है। ‘‘ अभिवृत्ति को परिभाषित करते हुए क्रच एवं क्रचफील्ड (1948 : 152) ने लिखा है कि, ‘‘व्यक्ति की दुनिया के किसी पक्ष से सम्बन्धित अभिप्रेरणात्मक, संवेगात्मक, प्रत्यक्षात्मक और संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं के एक सुस्थिर संगठन को अभिवृत्ति के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। ‘‘स्पष्ट है कि अभिवृत्ति अभिप्रेरणात्मक, संवेगात्मक, प्रत्यक्षात्मक तथा संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं का एक संगठन होती है।

वी.वी. अकोलकर (1960 : 231) ने अभिवृत्ति की अति संक्षिप्त परिभाषा देते हुए लिखा है कि, ‘‘किसी वस्तु या व्यक्ति के विषय में अभिवृत्ति उस वस्तु या व्यक्ति के विषय में एक विशेष ढंग से सोचने, अनुभव करने और क्रिया करने की तत्परता की दशा है।’’ दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि किसी वस्तु या व्यक्ति के बारे में विशेष तरह से सोचने, अनुभव करने या क्रिया करने की तत्परता की स्थिति को अभिवृत्ति कहते हैं।

उपरोक्त परिभाषाओं के विश्लेषण से अभिवृत्तियों के कुछ प्रमुख आयाम स्पष्ट होते हैं। एच.सी. ट्राइण्डिस (1971 : 13) ने किसी अभिवृत्ति-विषय के प्रति व्यवहार के दो प्रमुख आयामों का उल्लेख किया है- (i) सकारात्मक बनाम् नकारात्मक और (ii) सम्पर्क इच्छुक बनाम् सम्पर्क से बचना।

सकारात्मक अभिवृत्ति 
(उसी दिशा में जाने वाली) 
सम्पर्क से बचना सम्पर्क इच्छुक (दूर जाने वाला का)     十         (उसी दिशा में जानेवाला going toward) 
नकारात्मक अभिवृत्ति 
(विपरीत दिशा में जाने वाली) 

कुप्पुस्वामी (1975रू110) ने इसमें एक चौथा प्रकार्य और जोड़ दिया है और वह है कि अभिवृत्तियों से लोगों को समूह के अनुरूप बनने और इस प्रकार समूह से अधिकाधिक पुरस्कार प्राप्त करने में भी सहायता मिलती है। काट्ज (1960) ने अभिवृत्तियों द्वारा व्यक्तित्व सम्बन्धी चार प्रकार्यों का उल्लेख किया है- (i) समायोजन सम्बन्धी प्रकार्य, जो बहुमत की अभिवृित्त् से सहमत होकर अधिकाधिक पुरस्कार और दण्ड की प्राप्ति में सहायक होता है, (ii) अहम्-रक्षात्मक प्रकार्य, जो व्यक्ति को अपने सम्बन्ध में अप्रिय मूलभूत सत्यों को स्वीकार करने की क्षमता प्रदान करने में सहायक होता है; (iii) मूल्य अभिव्यक्तात्मक प्रकार्य, जिनमें अभिवृत्तियों के प्रकट होने पर व्यक्ति को प्रसन्नता होती है, क्योंकि उससे उन मूल्यों का पता चलता है, जिनका वह समर्थन करता है, जैसे शाकाहारी या नशाबन्दी इत्यादि, (iv) ज्ञानात्मक प्रकार्य, जो व्यक्ति के संसार को एक सुव्यवस्थित रूप प्रदान करने और इसे समझने की उसकी आवश्यकता पर आधारित होते हैं।

स्मिथ और उसके सहयोगियों (1956) ने अभिवृत्ति के एक अन्य प्रकार का उल्लेख किया है। वह है कुछ आन्तरिक समस्याओं को बाºयीकरण प्रदान करना यानि किसी मुद्दे से सम्बन्धित अपनी प्रतिक्रियाओं को बाहरी समूहों की दिशा में मोड़ देना।

अभिवृत्ति की विशेषताएँ 

आलपोर्ट (1935), बी. कुप्पुस्वामी (1975) क्रच एवं क्रचफील्ड तथा अन्य (1962) इत्यादि की परिभाषाओं एवं व्याख्याओं से अभिवृत्ति के जिस स्वरूप का पता चलता है, उससे इसकी निम्नांकित विशेषताएँ स्पष्ट होती है। इन विशेषताओं में से कई का ऊपर पहले ही उल्लेख किया जा चुका है। अभिवृत्ति की पहली विशेषता यह है कि, यह एक मानसिक एवं स्नायविक अवस्था है, दूसरी विशेषता यह है कि यह प्रतिक्रिया करने की एक तत्परता है। तीसरी विशेषता यह है कि यह एक जटिल एवं हस्तक्षेपीय या मध्यस्थ अवधारणा है। जटिल और संगठित इसलिए है कि, इसमें जो संघटक हं-ै भावनात्मक, संज्ञानात्मक और व्यवहारात्मक, ये तीनों अत्यन्त जटिल होते हैं। इसलिए अभिवृत्ति भी जटिल होती है। कई संघटकों के कारण यह संगठित होती है। जहाँ तक मध्यस्थ या हस्तक्षेपीय अवधारणा की बात है अभिवृत्ति स्वतंत्र चर का न केवल परिणाम होती है अपितु स्वयं में भी स्वतंत्र चर (किसी व्यवहार या प्रतिक्रिया का निर्धारक होने के कारण) होती है। अभिवृत्ति की चौथी विशेषता यह है कि, यह अर्जित की जाती है। व्यक्ति अपने जीवन काल में विविध कारकों के सहयोग से अभिवृत्तियों को अर्जित करता या सीखता है। पाँचवी विशेषता यह है कि अभिवृत्ति बहुधा स्थायी होती है। विशेष परिस्थितियों में इसमें परिवर्तन भी पाया जाता है। इसकी अन्तिम छठी विशेषता यह है कि इसमें एक दिशा और तीव्रता होती है। दिशा या तो सकारात्मक होती या नकारात्मक। सकारात्मक या नकारात्मक अभिवृत्ति में तीव्रता के आधार पर अन्तर होता है। जैसे किन्हीं दो व्यक्तियों में किसी के प्रति घृणा या पसन्दगी की मात्रा कम या ज्यादा हो सकती है। सकारात्मक या नकारात्मक अभिवृत्ति में अनुकूल या प्रतिकूल व्यवहार या प्रतिक्रिया के पेर्र क गुण होते है।

अभिवृत्ति की उपरोक्त विशेषताओं के आधार पर हम इसके पाँच पहलूओं का उल्लेख कर सकते हैं- दिशा, तीव्रता, केन्द्रीयता, प्रमुखता तथा सुसंगति।

शेरिफ और शेरिफ (1969 : 334-335) ने अन्य आन्तरिक कारकों से अभिवृत्ति में विभेद के आधारों का उल्लेख किया है। उनका कहना है कि, अभिवृत्ति किसी सार्थक वस्तु, व्यक्ति या घटना के प्रति सकारात्मक या नकारात्मक विशेषता, सुसंगति और व्यवहार के चुने हुए तरीकों से ज्ञात होती है। जबकि उस तरह के सभी व्यवहार के तरीके किसी अभिवृत्ति को अभिव्यक्त करते हैं। उदाहरण के लिए, किसी भी नवजात सामान्य शिशु को, जब वह भूखा हो और स्तन दिया जाये, तो वह अपना सिर उस ओर करके स्तनपान करने लगता है। इस प्रकार के व्यवहार की व्याख्या के लिए अभिवृत्ति जैसी अवधारणा की जरूरत नहीं है।

अभिवृत्तियों को अस्थायी समुच्चयों या अपेक्षाओं, स्थितियों और जैवकीय दशाओं या अभिप्रेरकों से विभेद करने के लिए अलग आधारों की आवश्यकता है। निम्नांकित आधारों से विभेद स्पष्ट होगा- (i) अभिवृत्तियाँ सहज (जन्मजात) नहीं होती है, (ii) अभिवृत्तियाँ सावयव की अस्थायी दशाएँ नहीं होती हैं अपितु निमिर्त हो जाने पर ज्यादा या कम बनी रहती हैं (iii) अभिवृत्तियाँ व्यक्ति और वस्तु के सम्बन्धों को स्थापित करती हैं। (iv) व्यक्ति वस्तु सम्बन्धों में अभिप्रेरणात्मक प्रभावी गुण होते हैं, (v) अभिवृत्ति निर्माण में छोटी या बड़ी मात्रा में विशिष्ट मदों की श्रेणियों का निर्माण जुड़ा होता है। (vi) सामान्य अभिवृत्ति निर्माण में जो सिद्धान्त लागू होते हैं वे सामाजिक अभिवृत्ति निर्माण में भी लागू होते हैं।

अभिवृत्ति निर्माण 

अभिवृत्ति का निर्माण कैसे होता है? हम कैसे अपनी क्रिया के बारे में मत धारण करते हैं। सामाजीकरण के दारै ान कैसे एक खास प्रकार की अभिवृत्ति निमिर्त होती है? व्यक्तिगत अनुभवों से बनने वाली अभिवृत्ति कैसी होती है? सामाजिक तुलना के आधार पर भी क्या मनोवृत्तियों का निर्माण होता है? इत्यादि अनेकों प्रश्न हैं जो अभिवृत्ति निर्माण को जानने-समझने के लिए विशेष रूचि उत्पन्न करते हैं।

अभिवृत्तियाँ आती कहाँ से हैं? क्या वे हमारे साथ पैदा होती हैं? जन्मजात होती हैं या अर्जित की जाती हैं? या क्या आप जीवन के एक लम्बे काल के दौरान अनुभवों से इसे सीखते हैं? पुन: ये प्रश्न, हमें इसके बारे में सोचने को बाध्य करते हैं। पहले ही इस सन्दर्भ में विस्ततृ चर्चा की जा चुकी है कि अभिवृत्तियाँ सीखी जाती है। हमने आलपोर्ट और शेरिफ एवं शेरिफ के विचारों से इसकी विशेषताओं और आधारों को जाना है।

सामाजिक अधिगम मनोवृत्ति का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है, लेकिन सप्रमाण यह ज्ञात हुआ है कि मनोवृत्तियों पर अनुवांशिक कारकों का भी प्रभाव पड़ता है। रॉबर्ट ए. बैरन एवं डौन बायर्न (2004) ने इस सन्दर्भ में व्यापक विश्लेषण किया है।

अभिवृत्तियों के निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत सामाजिक सीख है। सामाजिक सीख वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा हम अन्य लोगों से नई जानकारी, व्यवहार के तरीके या मनोवृत्तियाँ ग्रहण करते हैं। रॉबर्ट ए. बैरन तथा डॉन बायर्न (2004 : 108) ने इसे और भी स्पष्ट करते हुए लिखा है कि, ‘‘हमारे अनेक मत उन परिस्थितियों में ग्रहण किये जाते हैं जहाँ हम दूसरों के साथ परस्पर क्रिया करते हैं, या सिर्फ उनके व्यवहार का निरीक्षण करते हैं।’’

हमारी अधिकांश अभिवृत्तियाँ उस समूह से विकसित होती है, जिससे हम सम्बद्ध होते है। बाल्यावस्था से ही बच्चा परिवार में सामाजीकरण की प्रक्रिया के दौरान विविध वस्तुओं, व्यक्तियों इत्यादि के प्रति सकारात्मक एवं नकारात्मक अभिवृत्ति को निर्मित करता है। परिवार के साथ-साथ व्यक्ति अपने संगी-साथियों और समूह के अन्य सदस्यों से भी सामाजिक सीख के द्वारा अभिवृत्तियों को निर्मित करता चलता है। उदाहरण के लिए बच्चे कुछ खाद्य पदाथांर्,े खिलौनों, वस्तुओं के प्रति सकारात्मक अभिवृत्ति विकसित करते हैं और कुछ के प्रति नकारात्मक अभिवृत्ति विकसित करते हैं। हमारी अभिवृत्तियाँ बड़े होने पर भी निमिर्त होती रहती है। कुछ अभिवृत्तियों में आंशिक परिवतर्न होता हैं। कुछ में और भी बदलाव आता है। अभिवृत्तियों के बनने, विकसित होने, परिवर्तित होने की प्रक्रिया चलती रहती है। जहाँ एक ओर बहुसंख्यक अभिवृत्तियाँ उस समूह के प्रभाव से निर्मित होती है, जिसके हम सदस्य होते हैं। वहीं कुछ अभिवृत्तियों का निर्माण व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर भी होता है। व्यक्तिगत अनुभवों विशेषकर ऐसा अनुभव जो किसी त्रासदी से सम्बन्धित हो से बनी अभिवृत्ति अपेक्षाकृत ज्यादा तीव्र होती है।

बी. कुप्पुस्वामी (1975 : 118) का कहना है कि, ‘‘अभिवृत्ति-निर्माण प्राथमिक रूप से बाल्यकालीन और किशोरवय की अधिगम प्रक्रिया या सीखने की प्रक्रिया के रूप में ही आरम्भ होता है। जब एक बार अभिवृत्ति बन जाती है तो संज्ञानात्मक संगति के सिद्धान्त का प्रभाव अधिकाधिक महत्व का होता है। व्यक्ति में अब प्राथमिक निष्क्रियता जारी नही रह सकती। वह अब तक जो कुछ सीख चुका होता है, उसके अनुसार ही नई सूचना का संस्कार करना आरम्भ कर देता है। वह असंगत सूचना को अस्वीकार करने और उस सूचना को अधिक उत्साह के साथ ग्रहण करने लगता है, जो उसकी अभिवृत्ति की दृष्टि से संगत होती है।

अभिवृत्ति निर्माण को समझने के लिए मनोवैज्ञानिकों एवं समाज-मनोवैज्ञानिकों ने व्यापक अध्ययन किया है। सामान्यत: इस सम्बन्ध में दो महत्वपूर्ण उपागमों-सीखना (Learning) और पुनबर्लन (Rein-forcement) के अन्तर्गत ही विषय को समझने के लिए वैज्ञानिक अध्ययन किए गए हैं।

दूसरों से अभिवृत्तियाँ सामाजिक सीख के द्वारा ग्रहण की जाती है। सामाजिक सीख की तीन प्रक्रियाओं का उल्लेख रॉबर्ट ए. बैरन तथा डॉन बायर्न (2004 : 108-110) ने किया है-

  1. अनुबंधित अनुक्रिया (साहचर्य पर आधारित सीख)
  2. साधन अनुकूलन (सही मत धारण करने के लिए सीख)
  3. निरीक्षणात्मक सीख (उदाहरण से सीखना)।

सामाजिक सीख का उपरोक्त तीनों प्रक्रियाओं के विवरण से हम अभिवृत्ति निर्माण को आसानी से समझ सकते हैं।

साहचर्य पर आधारित सीख यानि अनुबंधित अनुक्रिया को हम मनोविज्ञान के उस सिद्धान्त से समझ सकते हैं जिसमें यह बताया गया है कि जब एक उद्दीपक लगातार दूसरे के पहले आता है, तो पहले वाला शीघ्र दूसरे के लिए संकेतक बन जाता है। एक उदाहरण के द्वारा इसे समझा जा सकता है। एक बच्चा अपने पिता को एक खास जाति के व्यक्ति या धार्मिक व्यक्ति को देखकर नाक भां ै सिकोड़ते या बड़बड़ाते हुए देखता हैं। तो धीरे-धीरे वो बच्चा भी जो पहले उस जाति या धर्म के व्यक्ति के प्रति उदासीन था, प्रतिकूल मनोवृत्ति निर्मित कर लेता है। स्पष्ट है कि लगातार प्रतिकूल या अनुकूल संवेगात्मक प्रतिक्रियाओं से सामना होते रहने का बच्चे पर तद्नुरूप प्रभाव पड़ता है। इस तरह अनुबंधित अनुक्रिया सीखने का एक आधारभूत रूप है, जिसमें एक उद्दीपन, प्रारम्भ में उदासीन, किसी अन्य उद्दीपन के साथ बार-बार दुहराये जाने पर प्रतिक्रिया पैदा करने की क्षमता ग्रहण कर लेता है। एक तरह से एक उद्दीपन दूसरे के घटित होने या प्रस्तुत होने के लिए संकेत हो जाता है।

क्राँस्निक व अन्य (1992) ने अपने एक अध्ययन से यह स्पष्ट किया है कि अभिवृत्ति अवचेतन अनुबन्ध (अनुबन्धित अनुक्रिया जो उद्दीपनों के प्रति चेतन जागरुकता की अनुपस्थिति में होती है) के द्वारा प्रभावित हो सकती है।

अनुबन्धित अनुक्रिया को एक उदाहरण तथा रेखाचित्र द्वारा बैरन तथा बायर्न (2004 : 109) ने सरलतम रूप में स्पष्ट किया है।

प्रारम्भिक              स्थिति माँ-बाप में संवेगात्मक उदासी

अल्पसंख्यक समूह के सदस्य              ↓
             ↓
कोई प्रबल प्रतिक्रिया              नहीं बच्ची उदास हो जाती है

अल्पसंख्यक समूह के सदस्य एवं
माँ-बाप की उदासी का
बार-बार युग्मित होना

अल्पसंख्यक समूह के सदस्य              माँ-बाप में संवेगात्मक उदासी
             ↓                                                    ↓
बच्ची उदास हो जाती हैं              बच्ची उदास हो जाती है

चित्र : अभिवृत्ति की अनुबन्धित अनुक्रिया प्रारम्भ में एक छोटी बच्ची की किसी अल्पसंख्यक समूह के सदस्यों की दृश्य विशेषताओं के प्रति कम या कोई संवेगात्मक प्रतिक्रिया नहीं होती है। यदि वह अपनी माँ को इन व्यक्तियों की उपस्थिति में जब प्रतिकूल प्रतिक्रिया करते देखती है तो वह भी धीरे-धीरे उनके प्रति प्रतिकूल प्रतिक्रिया सीख जाती है।

सामाजिक सीख की दूसरी प्रक्रिया ‘साधन अनुकूलन’ होती है, इसके अन्तर्गत सही मत धारण करने के लिए सीख को रखा जाता है और भी स्पष्ट करने के लिए यह कहा जा सकता है कि साधन अनुकूलन सीख का वह मूलभूत रूप है, जिसमें सकारात्मक परिणाम पैदा करनेवाली या नकारात्मक परिणाम को नकारने वाली प्रतिक्रियाओं को मजबूत बनाया जाता है, इसे सक्रिय सम्बद्ध अनुक्रिया भी कहा जाता है। (बैरन एवं बायर्न 2004 : 110) इस प्रक्रिया में पुरस्कार, प्रशंसा, प्यार के द्वारा एक बच्चे की अभिवृत्तियों को निर्मित किया जाता है। ऐसे व्यवहारों को बच्चा बार-बार करने लगता है, जिसके अनुसरण से उसको प्यार प्रशंसा या पुरस्कार मिलता है। ऐसे व्यवहार जो सकारात्मक परिणाम देते है। वे पुष्ट होते हैं, वहीं ऐसे व्यवहार जिनको करने पर प्रशंसा, प्यार, पुरस्कार कुछ नहीं मिलता है, को दबा दिया जाता है। परिवार में बड़े बुजुर्ग, माँ-बाप एवं अन्य वयस्क सदस्य बच्चों की अभिवृत्तियों को निर्मित करने में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। इसीलिए अधिकांश बच्चे बाल्यावस्था में अपने पारिवारिक मूल्यों के अनुरूप ही विचारों को रखते हैं, यद्यपि कुछ बच्चे ऐसा नहीं भी करते हैं। कालान्तर में बड़े हो जाने पर उनकी अभिवृत्ति अन्य कारकों द्वारा प्रभावित होकर परिवर्तित हो जाती है या सकती है। अमेरीकी हाईस्कूल के छात्रों पर जेनिंग्स और नीमी (1968) ने अध्ययन किया है। उनके अध्ययन से स्पष्ट हुआ कि 76 प्रतिशत हाईस्कूल के छात्र उसी राजनीतिक दल के समर्थक थे, जिनके समर्थक उनके माता-पिता थे। मात्र दस प्रतिशत छात्र ही ऐसे थे जिनकी पसन्दगी अपने माता-पिता से अलग थी। इसके विपरीत न्यूकाम्ब (1943) ने स्पष्ट किया है कि युवा छात्र या व्यक्ति जब परस्पर मतों से प्रभावित होने लगते हैं, तो उनकी अभिवृत्ति भी परिवर्तित हो जाती है।

उपरोक्त उपागमों से स्पष्ट है कि इसमें दण्ड और पुरस्कार अभिवृत्ति निर्माण में भूमिका अदा करते हैं। बच्चा या एक मनुष्य उन व्यवहारों को सीखता है जिनके करने से किसी पुनर्बलन की प्राप्ति होती है। अभिवृत्तियों की अभिव्यक्ति मौखिक रूप से ज्यादा होती है, इसलिए प्रशंसा, डाँट तथा निन्दा, शक्तिशाली पुनर्बलन का कार्य करती है। सीख की तीसरी प्रक्रिया, जिसके द्वारा अभिवृत्तियों का निर्माण होता है, उसे निरीक्षणात्मक सीख कहा जाता है। इसमें व्यक्ति दूसरों को देखकर नये प्रकार के व्यवहार या विचार ग्रहण करता है। बच्चों के द्वारा धूम्रपान करना और उनके प्रति अनुकूल विचार रखना निरीक्षणात्मक सीख का एक सरलतम उदाहरण है। बच्चों, युवाओं एवं व्यस्क सदस्यों द्वारा जनसंचार माध्यमों (प्रिंट एवं इलेक्ट्रानिक दोनों ही) से अभिवृत्तियों को निर्मित करना भी इसके अन्तर्गत ही आता है।

अभिवृ़ित्तयों का निर्माण सामाजिक सीख के द्वारा ही नहीं होता है, अपितु सामाजिक तुलना द्वारा भी होता है। व्यक्ति सामाजिक यथार्थता के बारे में अपने विचारों की सत्यता जानने के लिए सामाजिक तुलना का सहारा लेता है। व्यक्ति अपने विचारों की तुलना बाकि लोगों से करते हैं। यदि बाकि लोगों के विचार भी उससे मिलते जुलते हैं तो वह निश्चिंत हो जाता है कि उसके विचार सही हैं। सामाजिक तुलना की प्रक्रिया अभिवृत्तियों के परिवर्तन लाती है और नई अभिवृत्तियों को निर्मित भी करती हैं। फेस्टिंगर (1954) ने अपनी पुस्तक में सामाजिक तुलना द्वारा अभिवृत्ति निर्माण पर प्रकाश डाला है। मैओ, ऐसेस व बेल (1994); शेव (1993) इत्यादि के अध्ययनों से स्पष्ट होता है कि दूसरे लोगों से किसी समूह के बारे में नकारात्मक विचार सुनकर व्यक्ति बगैर उनसे मिले ही उस समूह के प्रति नकारात्मक अभिवृत्ति निर्मित कर लेते हैं।

अभिवृत्तियाँ जन्मजात नहीं होतीं अपितु सीखी या निमिर्त की जाती है। कई विद्वानों अर्वे व अन्य (1989), केलर व अन्य (1992) इत्यादि के अध्ययनों से यह प्रमाणित होता है कि अभिवृत्ति निर्माण में आनुवांशिक कारकों का भी योगदान होता है। इस मत की पुष्टि समरूप जुड़वा बच्चों की अभिवृत्तियों में समानता द्वारा की गयी है। ऐसा पाया गया है कि समरूप जुड़वो की मनोवृत्ति भिन्न जुड़वों की अपेक्षा अधिक सह-सम्बन्धित थी साथ ही परिणामों ने यह भी प्रमाणित किया कि कुछ मनोवृत्तियों का निर्माण आनुवांशिक कारकों द्वारा भी होता है।

अभिवृत्ति के संघटक तत्त्व 

अभिवृत्ति जिन तत्वों से संरचित होती है, उन्हें ही अभिवृत्ति के संघटक तत्व कहा जाता है। अभिवृत्ति की परिभाषाओं से ही उसके संघटक तत्त्वों का अनुमान लग जाता है, चाहे यह परिभाषा आलपोर्ट की हो या क्रच एवं क्रचफील्ड तथा अन्य की हो। वास्तव में अभिवृत्ति उन तीन संघटकों का स्थायी तंत्र है जिन्हें संज्ञानात्मक, भावात्मक तथा क्रियात्मक संघटक के रूप में जाना जाता है। अभिवृत्ति के तीनों संघटकों का संक्षिप्त विवरण निम्नवत् है।

मनुष्य प्रत्येक वस्तु, व्यक्ति या अन्यों के प्रति प्रत्यक्षीकरण जिस किसी भी रूप में करते हैं (शाब्दिक अथवा मौखिक या गैर मौखिक), वह संज्ञानात्मक संघटक को इंगित करता है। कुछ ब्राह्मणों का दलितों के प्रति एक विशेष प्रकार की धारणा अभिवृत्ति के संज्ञानात्मक संघटक का बोध कराती है। अभिवृत्ति-वस्तु (जो उपरोक्त उदाहरण में दलित है) के प्रति सकारात्मक या नकारात्मक विश्वास, अभिवृत्ति का संज्ञानात्मक या प्रत्यक्षात्मक संघटक है। यह विश्वास बहुधा स्थिर प्रकृति का होता है। इसमें परिवर्तन भी होता है और इसकी तीव्रता कम या ज्यादा हो सकती है। अभिवृत्ति प्रतिक्रिया करने की तत्परता की मानसिक एवं स्नाविक स्थिति है, यह अभिवृत्ति-वस्तु के प्रति विश्वास को अभिव्यक्त करती है।

अभिवृत्ति का दूसरा संघटक भावात्मक संघटक है। भावनाएँ एवं संवेग इसके अन्तर्गत आती है। जो अभिवृत्ति-वस्तु के प्रति व्यक्ति के भावों (पसन्दगी अथवा नापसन्दगी) को अभिव्यक्त करती है। भावात्मक संघटक किसी भी अभिवृत्ति का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। किसी अभिवृत्ति-वस्तु को अत्यधिक पसन्द करना, कम पसन्द करना या किसी अभिवृत्ति वस्तु को अत्यधिक नापसन्द करना, थोड़ा नापसन्द करने का भाव यह स्पष्ट करता है कि इसकी तीव्रता में व्यक्ति-व्यक्ति में अन्तर हो सकता है।

अभिवृत्ति का तीसरा संघटक तत्त्व क्रियात्मक संघटक होता है। चूँकि यह अभिवृत्ति वस्तु के प्रति व्यक्ति की क्रिया को अभिव्यक्त करता है, अत: इसे व्यवहार-संघटक भी कहा जाता है। अभिवृत्ति-वस्तु के प्रति व्यक्ति कैसा व्यवहार करता है? क्या वह उससे दूरी बना लेता है या आक्रामक व्यवहार करता है या उससे घनिष्ठता बढ़ा लेता है? यह सब अभिवृत्ति-वस्तु के प्रति व्यक्ति की सकारात्मक अथवा नकारात्मक धारणा पर निर्भर करता है। अभिवृत्ति वस्तु के प्रति पसन्दगी या ना पसन्दगी व्यवहार के एक विशेष रूप को प्रदर्शित करती है। क्रियात्मक संघटक के अन्तर्गत अभिवृत्ति वस्तु से दूरी बना लेना, निकटता स्थापित करना, प्रेम करना, आक्रामक व्यवहार करना, शक्ति का प्रयोग करना इत्यादि सम्मिलित होता है।

उपरोक्त तीनों ही संघटक की किसी अभिवृत्ति वस्तु में उपस्थिति को एक उदाहरण द्वारा ही स्पष्ट किया जा सकता है। मान लीजिए कि एक अत्यन्त परम्परागत ब्राह्मण की अभिव्यक्ति-वस्तु एक दलित व्यक्ति है। दलित व्यक्ति (अभिव्यक्ति-वस्तु) को देखते ही उसका विश्वास ताजा हो जाता है कि वह एक गन्दा व्यक्ति है यह विश्वास संज्ञात्मक संघटक है, फिर उसके गन्दे होने के प्रति विश्वास के कारण वह उसे नापसन्द करता है जो भावात्मक संघटक है, नापसन्दगी के चलते वह उससे पर्याप्त दूरी बना लेता है। यह दूरी बना लेना क्रियात्मक संघटक है। इसी तरह से प्रत्येक अभिवृत्ति-वस्तु के प्रति मनुष्य का व्यवहार संचालित होता रहता है।

अभिवृत्ति के संघटकों का विश्लेषण यह भ्रम पैदा कर सकता है कि यह मनुष्य के व्यवहार की ही तीन स्थितियाँ है। वास्तविकता यह है कि अभिवृत्ति और व्यवहार में अन्तर है। 1930 के दौरान प्रसिद्ध सामाजिक मनोवैज्ञानिक रिचर्ड टी ला पियरे ने गहन शोध कार्य करके यह प्रमाणित किया कि अभिवृत्ति और व्यवहार में अन्तर है। अभिवृत्ति मनुष्य के व्यवहार को प्रभावित करती है लेकिन यह भी सच है कि अभिवृत्तियाँ हमारे बाहरी व्यवहार में कभी-कभी परिलक्षित नहीं भी होती हैं। आधुनिक काल में भी अभिवृत्ति और व्यवहार के मध्य सम्बन्धों के विविध पक्षों पर शोध कार्य जारी है। ला पियरे (1934) का अध्ययन स्पष्ट करता है कि मनोवृत्ति और व्यवहार में पर्याप्त अन्तर है। इसे आप एक सरल उदाहरण से आसानी से समझ सकते हैं कि लोग बोलते कुछ है। और करते कुछ हैं। इतना ही नहीं जटिलता तब बढ़ सकती है जब हम यह कहते हैं कि मनुष्य सोचता कुछ है, बोलता कुछ है और करता कुछ है। वास्तविकता यह है कि, ‘‘अनेक कारक मनोवृत्ति व व्यवहार के मध्य सम्बन्ध के मॉडरेटर के रूप में काम करते हैं, और इस सम्बन्ध के सामथ्र्य को भी प्रभावित करते हैं।
  1. परिस्थितिजन्य निरोध हमें अपनी मनोवृत्ति को बाºय रूप से अभिव्यक्त करने से रोकते है। इसके अतिरिक्त हम वैसी स्थितियों को पसन्द करते हैं जो हम अपनी मनोवृत्तियों को व्यक्त करने की अनुमति देती है। और इससे ये मत भी मजबूत होते हैं। 
  2. मनोवृत्तियों के अनेक पहलू भी मनोवृत्ति-व्यवहार सम्बन्ध को मॉडरेट करते हैं। इनके अन्तर्गत मनोवृत्ति-उत्पत्ति (कैसे मनोवृत्ति का निर्माण होता है), मनोवृत्ति-सामथ्र्य (इसके अन्दर मनोवृत्ति अभिगम्यता एवं महत्व शामिल है), और मनोवृत्ति विशिष्टता आते हैं। 
  3. मनोवृत्ति अनेक तंत्रों के द्वारा व्यवहार को प्रभावित करती है। जब हम अपनी मनोवृत्ति को सावधानीपूर्वक विचार देते हैं, तो हमारी मनोवृत्ति से उत्पन्न अभिप्राय व्यवहार की बहुत अधिक भविष्यवाणी करता है। वैसी स्थितियों में जहाँ हम सोचे-समझे विचार में संलग्न रहते हं,ै मनोवृत्ति उस स्थिति के बारे में हमारे प्रत्यक्षीकरण का निर्माण कर व्यवहार को प्रभावित करती है। तत्परता, वैयक्तिक मानदण्ड एवं आदिरूप भी मनोवृत्ति-व्यवहार सम्बन्ध पर असर डालते हैं।’’

पूर्वाग्रह और अभिवृत्ति परिवर्तन 

यह सच है कि अभिवृत्तियों में स्थायित्त्व होता है। यद्यपि इनमें परिवर्तन भी देखा जा सकता हैं। परिवर्तन के विविध कारक होते है। अभिवृत्ति के संज्ञानात्मक संघटक में परिवर्तन भावनात्मक संघटक और क्रियात्मक संघटक में भी परिवर्तन लाता है।

अभिवृत्ति-वस्तु के प्रति पूर्वाग्रह सकारात्मक या नकारात्मक विश्वास को बल देता है। सामान्यत: पूर्वाग्रह नकारात्मक अभिवृत्ति को इंगित करता है, परिणामस्वरूप क्रिया भी नकारात्मक ही होती है।

पूर्वाग्रह और अभिवृत्ति परिवर्तन की चर्चा के पूर्व पूर्वाग्रह के अर्थ को जानना जरूरी है। पूर्वाग्रह किसी व्यक्ति या सामाजिक समूह के सदस्यों के प्रति नकारात्मक मनोवृत्ति का द्योतक है। सामाजिक मनोवैज्ञानिकों ने पूर्वाग्रह और विभेदीकरण में अन्तर किया है। विभेदीकरण पूर्वाग्रह का क्रियात्मक पक्ष है। इसे क्रियात्मक पूर्वाग्रह भी कह सकते हैं। नकारात्मक मनोवृत्ति से नकारात्मक व्यवहार (विभेदीकरण) होता है।

उच्च जातियों का दलितों के प्रति पूर्वाग्रह होता है, पुरुषों का महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह होता है, गोरों का कालों के प्रति पूर्वाग्रह देखा जाता है, इसी तरह से पूर्वाग्रह के अनेक आधार होते हैं।

अभिवृत्तियाँ सीधे अनुभव के माध्यम से बदल जाती है। इसलिए कभी-कभी जब हम किसी के प्रति पूर्वाग्रही होते हैं और वो हमारे पूर्वाग्रह के आधारों को अपनी योग्यता कुशलता या अन्य आधारों पर तोड़ देता है तो हमारी पूर्वाग्रही अभिवृत्ति भी परिवर्तित हो जाती है। पूर्वाग्रह और नया अनुभव मनुष्य के संज्ञान के मध्य प्रत्याशा और अनुभव या वास्तविकता के मध्य असंगति उत्पन्न कर देता है। इस असंगति को सामान्यत: मनुष्य पुनव्र्यवस्थित करते हुए अपनी अभिवृत्ति में परिवर्तन करता है। यह परिवर्तन आंशिक भी हो सकता है, पूर्ण भी हो सकता है और एक बार में ही हो सकता है, या कई बार के बाद हो सकता है। अति साफ-सुथरे दलित से मिलकर या अति धार्मिक दलित से मिलकर या अति धार्मिक दलित से मिलकर या अति सात्विक दलित से मिलकर पूर्वाग्रही सोच इसलिए प्रभावित होती है कि अनुभव पूर्व धारणाओं से पूर्णत: अलग है। सोच और अनुभव की असंगति या प्रत्याशा और अनुभव असंगति अभिवृत्ति परिवर्तन का कारण बनती है।

भारत में महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह एक विशेष प्रकार की अभिवृत्ति को अभिव्यक्त करता रहा है। आधुनिक काल में उनके प्रति पूर्वाग्रह और परिणामस्वरूप अभिवृत्तियों में व्यापक परिवर्तन आ रहा है। अभिवृत्तियों के संज्ञानात्मक संघटक की अपेक्षा क्रियात्मक संघटक में ज्यादा परिवर्तन परिलक्षित हो रहा है, और इसके प्रमुख कारण को आसानी से समझा जा सकता है, वह है कानूनी प्रावधान। व्यक्ति विशेष, समूह विशेष, जाति विशेष इत्यादि के प्रति एक विशेष प्रकार का नकारात्मक क्रियात्मक पक्ष कानून द्वारा प्रतिबन्धित हो जाने के कारण उसमें परिवर्तन स्पष्ट परिलक्षित है।

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