पुरुषोत्तम दास टण्डन का जीवन परिचय एवं शैक्षिक विचार

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अनुक्रम
राजर्षि पुरूषोत्तम दास टण्डन का जन्म इलाहाबाद में 1 अगस्त, 1882
को हुआ। उनके पूर्वज मूलत: पंजाब के निवासी थे। उनके पिता श्री शालिग्राम
टंडन इलाहाबाद के एकाउण्टेण्ट जनरल आफिस में क्लर्क थे और राधास्वामी
सम्प्रदाय के मतावलम्बी थे। पिता संत प्रकृति के थे अत: उनके व्यक्तित्व का
प्रभाव बालक पुरूषोत्तम पर प्रारम्भ से ही पड़ा। बालक पुरूषोत्तम का
लालन-पालन बड़े लाड़-प्यार से हुआ क्योंकि उनके अनुज राधानाथ टण्डन
उनसे छह वर्ष छोटे थे।

बालक पुरूषोत्तम की शिक्षा का प्रारम्भ एक मौलवी साहब की देख-रेख
में हुआ जो उन्हें हिन्दी पढ़ाया करते थे। इसके उपरान्त इलाहाबाद की प्रसिद्ध
शिक्षण संस्था सी0ए0वी0 स्कूल में प्रवेश लिया। वे एक मेधावी छात्र के रूप
में जाने जाते थे। इसके उपरान्त उन्होंने गवर्नमेन्ट हाईस्कूल में प्रवेश लिया।
यहाँ वे वाग्विर्द्धनी सभाओं, व्यायाम-क्रीड़ाओं तथा अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों
में भाग लेकर अपने बहुआयामी व्यक्तित्व को उजागर करने लगे। वे कायस्थ
पाठशाला के भी विद्याथ्री रहे। 1899 में उन्होंने इन्टर की परीक्षा उत्तीर्ण की।
इसके उपरान्त अत्यन्त ही प्रतिष्ठित शिक्षण संस्था म्योर सेन्ट्रल कॉलेज में
प्रवेश लिया। स्नातक परीक्षा 1904 में उत्तीर्ण करने के उपरांत उन्होंने कानून
की पढ़ाई की और 1907 में इतिहास विषय में स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण की।
पूरे विद्याथ्री जीवन में उन्होंने अपने साधुस्वभाव, सजग प्रतिभा, परिश्रमशाीलता,
स्वध्याय प्रियता तथा सच्चरित्रता के कारण अपनी अलग पहचान बनाये
रखा।

हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के उपरांत 1897 में ही पुरूषोत्तम
का विवाह चन्द्रमुखी देवी से कर दिया गया। वे एक आदर्श जीवन संगिनी
सिद्ध हुई। इनके सात पुत्र एवं दो कन्याएं हुई। वास्तव में पुरूषोत्तम दास
टण्डन आदर्श गृहस्थ और वीतराग सन्यासी- दोनों ही एक साथ थे।

हिन्दी भाषा के प्रति टण्डन के अनुराग का एक महत्वपूर्ण कारण
उनका महान समाजसेवी एवं राजनेता पं0 मदन मोहन मालवीय एवं प्रसिद्ध
साहित्यकार पंडित बालकृष्ण भÍ के सम्पर्क में आना था। टण्डन ने 1908 में
इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वकालत की शुरूआत की जहाँ उन्हें उस समय
के ख्यातिलब्ध अधिवक्ताओं : तेज बहादूर सप्रू एवं कैलाश नाथ काटजू के
सहयोगी के रूप में कार्य करने का अवसर मिला। वकालत के पेशे में भी
टण्डन ने अपनी छाप छोड़ी क्योंकि वे झूठे मुकदमे नहीं लेते थे।

पुरूषोत्तम दास टण्डन का कार्यक्षेत्र अत्यन्त ही विशाल था। उन्होंने
राष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों यथा राजनीतिक, सामाजिक, साहित्यिक, शैक्षिक को
गहराई से प्रभावित किया। 1906 में कांगे्रस के कलकत्ता अधिवेशन के लिए
राजर्षि टण्डन इलाहाबाद से प्रतिनिधि चुने गये। इस सम्मेलन हेतु इलाहाबाद
से अन्य प्रतिनिधि थे- तेज बहादुर सप्रू, मोती लाल नेहरू एवं पंडित
अयोध्यानाथ।

हिन्दी साहित्य सम्मेलन का प्रथम अधिवेशन 10 अक्टूबर, 1910 में पं0
मदन मोहन मालवीय की अध्यक्षता में इलाहाबाद में आयोजित किया गया।
टण्डन मंत्री चुने गये। तीन-चार वर्षों में ही सम्मेलन का समस्त कार्यभार उन
पर आ पड़ा। वस्तुत: जब तक वे जीवित रहे साहित्य सम्मेलन का इतिहास
टण्डन का इतिहास कहा जा सकता है। टण्डन अभ्युदय नामक पत्रिका के
यशस्वी सम्पादक रहे। साथ ही हिन्दी प्रदीप में भी लगातार लिखते रहे।

1919 में वे इलाहाबाद नगरपालिका के प्रथम चेयरमेन चुने गये। 1921
में सत्याग्रह आन्दोलन के दौरान टण्डन को कारावास की सजा हुई। उन्होंने
राष्ट्रसेवा के लिए हमेशा के लिए वकालत छोड़ दी। 1923 में गोरखपुर में
कांग्रेस का अठाहरवां प्रान्तीय अधिवेशन हुआ जिसमें टण्डन सर्वसम्मति से
अध्यक्ष चुने गये। अब टण्डन गाँव-गाँव में किसानों की सभायें करने लगे। वे
किसान जागरण एवं आन्दोलन के अग्रदूत बन गए। 1930 और 1932 में लगान
बन्दी के कार्यक्रमों का टण्डन ने नेतृत्व किया।

इस बीच टण्डन के हिन्दी प्रचार-प्रसार सम्बन्धी कार्य भी जारी रहे।
1923 में कानपुर में सर्वसम्मति से हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभापति चुने
गए। इसमें प्रसिद्ध साहित्यकार महावीर प्रसाद द्विवेदी स्वागताध्यक्ष थे।
सम्मेलन की नियमावली तैयार करना हो या धन संग्रह, सारी जिम्मेदारी
टण्डन पर ही थी। हिन्दी साहित्य सम्मेलन में ‘मंगला प्रसाद’ पारितोषिक की
स्थापना टण्डन ने ही की। प्रसिद्ध राष्ट्रवादी नेता लाला लाजपत राय के
आग्रह पर 1925 से 1929 तक वे पंजाब नेशनल बैंक के मैनेजर के रूप में
लाहौर और आगरा में कार्यरत रहे। महात्मा गाँधी के आग्रह पर टण्डन 1929
में लोक सेवा मण्डल के अध्यक्ष बने। नमक सत्याग्रह के दौरान उन्हें डेढ़ वर्ष
की कारावास की सजा हुई। उन्होंने सत्याग्रह हेतु अपनी निजी भूमि ‘तपोभूमि’
को राष्ट्र को समर्पित किया। 1931 में कानपुर में सम्प्रदायिक दंगों में गणेश
शंकर विद्याथ्री की हत्या हो गई। इस संदर्भ में भगवान दास की अध्यक्षता में
गठित जाँच समिति की रिपोर्ट हिन्दू-मूस्लिम समस्या पर राष्ट्रीय दृष्टिकोण
का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। किसानों के अधिकार के लिए वे लगातार संघर्षरत
रहे। वे 1934 में बिहार प्रान्तीय किसान सभा के भी अध्यक्ष रहे। वे उत्तर प्रदेश
विधान सभा का तेरह वर्षों तक (जुलाई 31, 1937 से अगस्त 10, 1950 तक)
अध्यक्ष रहे। 1946 में वे भारतीय संविधान सभा (कांस्टीट्यून्ट एसेम्बली) के
सदस्य चुने गए। कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में टण्डन ने देश के विभाजन
का मुखर विरोध किया। विभाजन के विरोध स्वरूप 15 अगस्त, 1947 के
स्वतंत्रता दिवस समारोह में उन्होंने भाग नहीं लिया। 1950 में पं0 जवाहर
लाल नेहरू के विरोध के बावजूद वे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष
चुने गए। अंतत: महान आत्मा की तरह बिना हर्ष या विषाद के उन्होंने अध्यक्ष
पद से इस्तीफा दे दिया। 1952 में टण्डन इलाहाबाद से लोकसभा के लिए
और 1956 में उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए चुने गए। 5 मई, 1956 को
संसदीय विधिक और प्रशासकीय शब्दों के संग्रह हेतु गठित समिति के
टण्डन सभापति बनाए गए। एक वर्ष के अथक परिश्रम के बाद उन्होंने
कुशलतापूर्वक इस कार्य को सम्पादित किया।

सम्पूर्ण राष्ट्र पुरूषोत्तम दास टण्डन की अमूल्य सेवाओं के महत्व को
श्रद्धा की दृष्टि से देख रहा था। कृतज्ञ राष्ट्र ने उन्हें 1961 में ‘भारत रत्न’ की
उपाधि दी पर वे तो इस उपाधि से भी कहीं बड़े थे। सरयू तट पर 15 अप्रैल,
1948 को देवरहवा बाबा द्वारा प्रदत्त विशाल जनसमूह की हर्षध्वनि के मध्य
उन्होंने ‘राजर्षि’ उपाधि का सम्मान बढ़ाया। वे वास्तव में राजनीति में सर्वोच्च
पदों पर रहते हुए ऋषि बने रहे। 1 जुलाई, 1962 को इस महान संत,
साहित्यकार, राजनेता एवं समाजसेवी का देहावसान हो गया। उनकी मृत्यु
पर इलाहाबाद के प्रमुख दैनिक भारत ने लिखा ‘‘बाबू पुरूषोत्तम दास टण्डन
की मृत्यु से भारत का एक बहुमूल्य रत्न चला गया जिसने कि लगभग
चालीस वर्षों तक राष्ट्रीय जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।’’

‘‘श्री टण्डन अनन्य देशभक्त थे और राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में
उन्होंने जो कार्य किए वे चिरस्मरणीय रहेंगे। आप ऐसे राजनेता थे जो अपने
कर्तव्य के प्रति ईमानदार और सच्चाई के लिए प्रख्यात थे। अपने दाढ़ीयुक्त
भव्यता से आप राजर्षि नहीं अपितु अपने आहार-व्यवहार से भी आप इस नाम
को सार्थक करते थे। राजर्षि होने के बावजूद भी आप सात्विक जीवन व्यतीत
करते थे और ऐश्वर्य, भोग तथा विलास-प्रसाधनों से बहुत दूर रहते थे।’’

राजर्षि टण्डन के राजनीतिक एवं सामाजिक विचार एवं
कार्य 

राजर्षि टण्डन एक साथ राजनेता, साहित्यकार, पत्रकार एवं समाजसेवी
थे। पर विद्वानों के अनुसार उनकी चरम उपलब्धि संत की है। बाल्यावस्था एवं
छात्रजीवन में उन्हें पतंग, शतरंज, क्रिकेट पसन्द थे। क्रिकेट में वे जीवन के
अंत तक रूचि लेते रहे, परन्तु उनकी एकान्तनिष्ठा किसी और ही दिशा में
थी। उनकी साधना पारलौकिकतापरक होने के कारण जागतिक व्यापारों में
भी ऐहिकता का मिथ्याभाष होने का ज्ञान बना रहता था। उनके
राजनीतिक-सामाजिक आदर्श इसी निष्ठा का परिणाम था।

राजनीति में भारतीय संस्कृति के पोषक 

राजर्षि टण्डन भारतीय संस्कृति
के पक्के समर्थक थे। प्रथम भारतीय संस्कृति सम्मेलन, प्रयाग (1948) में
उन्होंने निम्नलिखित प्रस्ताव रखा जो उनके दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है
‘‘देश की वर्तमान स्थितियों में और देश के भविष्य को सामने रखते हुए यह
आवश्यक है कि भारतीय संस्कृति की आधारशिला पर ही देश की राजनीति
का निर्माण हो। इन सिद्धान्तों को व्यवहार में स्वीकार करने और बरतने से ही
देश की सरकार जनता का सच्चा प्रतिनिधित्व कर उससे शक्ति प्राप्त कर
सकती है।’’ उनका यह मानना था कि ‘‘संसार में जिस प्रकार दो मनुष्य
बिल्कुल एक नहीं होते उसी प्रकार संसार के इतिहास में दो घटना समूह भी
कभी एक नहीं हुए। एक ही मार्ग सभी स्थलों में नहीं चल सकता। हमें भी
सदा स्मरण रखना चाहिए कि भारतवर्ष की स्थिति में रास्ता खोलने वाले के
लिए किसी की नकल, शक्तिदायिनी न होगी। हमें अपने जलवायु, स्वभाव,
अपनी मर्यादा और संस्कृति के अनुकूल रास्ते अपनाने होंगे और उन रास्तों पर
खुली रीति से जनता को ले चलना होगा। उभरी हुई, सुलझी हुई, बलिदान
के लिए तैयार शक्तिवान जनता पर ही हमारा अंतिम भरोसा है।’’ लेकिन
उनमें प्राचीन या नवीन संस्कृति के प्रति व्यामोह या दंभ नहीं था। उन्हें
संकुचित भौगोलिक या धार्मिक सीमायें कभी भी बाँध नहीं सकीं। देश के
अन्तर्गत वह विभिन्न संस्कृतियों में समन्वय चाहते थे।

प्राचीन एवं आधुनिक संस्कृतियों में समन्वय के समर्थक 

प्राचीन
भारतीय संस्कृति के पक्षधर होने के बावजूद राजर्षि टण्डन वर्तमान समय की
आवश्यकताओं की उपेक्षा नहीं करते थे। उनका कहना था कि ‘‘संसार व्यापी
राजनैतिक संघर्षों का सामना करने के लिए हमारे सामाजिक संगठन की उस
प्राचीन आंतरिक शक्ति का उद्बोधन किया जाय, जिसने विरोधिनी परिस्थितियों
में हमारी संस्कृति की रक्षा की है और जो भविष्य में भी प्राचीन मर्यादाओं की
रक्षा करते हुए संसार के वैज्ञानिक आविष्कारों से लाभ उठा सकेगी, साथ ही
संसार की परिस्थितियों पर अपना प्रभाव डालते हुए उनसे सामन्जस्य कर
सकेगी।’’

संत साहित्य में आस्था 

संत साहित्य में राजर्षि टण्डन की गहरी आस्था
थी। वे लिखते हैं ‘‘हिन्दी में संत साहित्य जिस ऊँची श्रेणी का है वह न
संस्कृत में है और न किसी अन्य भाषा में है। उसकी जड़ ही हिन्दी में पड़ी
है। कबीर दास इस साहित्य के सिरमौर है। गुरूनानक, दादू, पलटू, रैदास,
सुन्दरदास, मीराबाई, सहजोबाई आदि प्रसिद्ध महात्माओं में कबीर की बानी
की छाप स्पष्ट दिखाई पड़ती है। इन्हीं का विस्तृत प्रभाव मुझे गुजरात और
महाराष्ट्र के सन्तों पर दिखाई पड़ता है।’’

डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद के अनुसार राजर्षि टण्डन आरम्भ से ही संत
विचारधारा से प्रभावित थे और जीवन-भर संत-मत के नियमों तथा अनुशासन
का पालन करते रहे। उन्होंने व्यक्ति और समाज के जीवन में आदर्श के स्थान
तथा महत्व को हृदयंगम कर लिया था। इस आदर्श के लिए हर प्रकार का
बलिदान अथवा त्याग करना उनके लिए संभव ही नहीं अनिवार्य रहा है।

एक साहित्यिक की भावुकता और एक सार्वजनिक कार्यकर्त्ता तथा
लोकनायक की दृढ़ता के साथ-साथ डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद के अनुसार उनके
जीवन का एक व्यावहारिक तथा समन्वयात्मक पक्ष भी है। उनका त्याग
ऐहिक जीवन के प्रति उदासीनता की भावना उत्पन्न नहीं करता है। उनकी
अध्यात्मिकता का आधार व्यक्ति का ही नहीं बल्कि समाज का भी कल्याण
है।

किसानों के हितों के संरक्षक 

राजर्षि टण्डन, महात्मा गाँधी की ही तरह,
भारत को किसानों का देश मानते थे। उनका मानना था कि जब तक भूमि
व्यवस्था में सुधार नहीं होगा किसानों की स्थिति में सुधार संभव नहीं है।
उन्होंने पूरे उत्तरप्रदेश में किसान आन्दोलन का नेतृत्व किया और भूमिकर देने
का विरोध किया। वे उत्तरप्रदेश में कृषक आन्दोलन के जन्मदाता थे। 1910
में उन्होंने किसान संघ की स्थापना की। 1921 में प्रादेशिक आधार पर
किसानों को संगठित किया। किसानों के मध्य वे इतने लोकप्रिय हुए कि
बिहार की किसान-सभा ने भी उन्हें अपना अध्यक्ष चुना। उत्तरप्रदेश में
जमीन्दारी उन्मूलन बिल पारित कराने में उन्होंने सक्रिय योगदान दिया।
लाल बहादुर शास्त्री के अनुसार ‘‘टण्डन जी ने देश को बहुत कुछ दिया।
परन्तु उनकी विशेष देन किसानों को है और हिन्दी को।… भूमि व्यवस्था और
समाज निर्माण पर उनके विचार क्रांतिकारी रहे और उनका समर्थन सदा
निर्बलों को प्राप्त हुआ।’’ वंचितों, दलितों और ठुकराये हुए वर्ग के प्रति टण्डन
जी के दर्द को महसूस करते हुए श्री वियोगी हरि लिखते है ‘‘समाज में
उपेक्षित और आखिरी पंक्ति में खड़े अंग ने, जिसे छुने में भी परहेज किया
जाता था, अपने प्रति ममता भरी स्नेह की भावना टण्डन मे पाई थी।’’

प्रजातांत्रिक पद्धति के समर्थक 

टण्डन जी की प्रजातांत्रिक शासन प्रणाली
में गहरी आस्था थी। वे चाहते थे कि शासन-सूत्र का संचालन तो बहुमत के
हाथों में रहे परन्तु बहुमत ऐसा हो जो अल्पमत की उपेक्षा न करे। विरोधी पक्ष
की भावनाओं एवं विचारों का वे अत्यधिक सम्मान करते थे। उत्तर प्रदेश
विधान सभा के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में घोषणा की ‘‘यदि
विरोधी दल के थोड़े से व्यक्ति भी मुझसे कहें कि मैं उनका विश्वासभाजन नहीं
हूँ तो मैं अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देकर पृथक हो जाऊँगा।’’

रूढ़िवाद के कÍर विरोधी 

भारतीय संस्कृति एवं परम्परा के प्रबल समर्थक
राजर्षि टण्डन कÍरवाद के विरोधी थे और वे इससे बचने की सलाह देते थे।
परम्परागत और बहुत दिनों से चली आ रही अनेक धारणाओं का वे खण्डन
करते थे। उनका कहना था कि बहुत से पुरूष इन रूढ़ियों में फंस जाते हैं और
इनसे निकलने की कोशिश नहीं करते। इस प्रकार की प्रवृत्ति को उन्होंने
‘मूढ़ाग्रह’ कहा।

हिन्दी के विकास हेतु कार्य 

हिन्दी भाषा के प्रति राजर्षि टण्डन की अटूट निष्ठा थी। हिन्दी भाषा
के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ही उन्हें राजनीति में खींच लाई। 17 फरवरी, 1951
को मुजफ्फरपुर में साहित्यकारों की एक सभा में उन्होंने स्वयं कहा ‘‘लोग
कहते हैं कि मैं राजनीति और साहित्य से समन्वित दोहरा व्यक्तित्व रखता हूँ।
पर सच्ची बात यह है कि मैं पहले साहित्य में आया और प्रेम से आया। हिन्दी
साहित्य के प्रति मेरे उसी प्रेम ने उसके हितों की रक्षा और विकास पथ को
स्पष्ट करने के लिए मुझे राजनीति में सम्मिलित होने को बाध्य किया।’’

हिन्दी के विकास एवं प्रसार में हिन्दी साहित्य सम्मेलन की महत्वपूर्ण
भूमिका रही है। इसके निर्माण में टण्डन जी का महत्वपूर्ण योगदान था।
इसकी स्थापना 10 अक्टूबर, 1910 को हुई। पं0 मदन मोहन मालवीय इसके
अध्यक्ष एवं राजर्षि टण्डन मंत्री चुने गए। वस्तुत: सम्मेलन का सारा कार्यभार
राजर्षि टण्डन पर ही था। सन् 1910 से लेकर अपने जीवन के अन्तिम दिनों
तक वह लगातार इस संस्थान के हित सम्बर्द्धन के लिए अपने को तिल-तिल
होम करते रहे। उनके प्रयासों से सम्मेलन एक राष्ट्रीय संस्था घोषित कर दी
गई। प्रसिद्ध साहित्यकार लक्ष्मीनारायण सुधांशु हिन्दी भाषा और साहित्य के
प्रति राजर्षि टण्डन के योगदान का उल्लेख करते हुए लिखते हैं- ‘‘उन्होंने
हिन्दी भाषा और साहित्य क्षेत्र में कोई सर्जनात्मक कृति नहीं दी है, कुछ तुकबन्दियों तथा लेखों के अतिरिक्त उन्होंने और कुछ नहीं लिखा। लेकिन
उनकी वास्तविक कृति है अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन का
संगठन। इसके द्वारा उन्होंने हिन्दी साहित्य की परीक्षाओं का जो संचालन
किया, उससे साधारण जनता में हिन्दी साहित्य के प्रति अभिरूचि, साहित्य
की जानकारी और लोक साहित्य में जागश्ति की भूमिका बनी। सम्मेलन की
परीक्षाओं का जाल सम्पूर्ण भारत में बिछ गया। सन् 1910-1950 के मध्य
राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी के प्रचार-प्रसार का श्रेय टण्डन जी को है। इसीलिए
लोग उन्हें राष्ट्रभाषा हिन्दी का प्राण कहा करते थे।’’

पं0 जवाहरलाल नेहरू और उनके समर्थक स्वतंत्र भारत में ‘हिन्दुस्तानी’
को राष्ट्रभाषा बनाना चाहते थे। राजर्षि टण्डन हिन्दी भाषा और देवनागरी
लिपि के पक्ष में थे। डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद ने इस संदर्भ में लिखा है ‘‘संविधान
सभा में उन्होंने हिन्दी का बड़ी दृढ़ता से समर्थन किया। यद्यपि कुछ लोग,
विशेषकर अहिन्दी भाषी, इस दृढ़ता से अप्रसन्न भी हुए, पर उनके प्रति श्रद्धा
और प्रेम में कमी नहीं आई।’’ राजर्षि टण्डन रोमन अंको के उपयोग के भी पक्ष
में नहीं थे। अन्तत: राजर्षि टण्डन के सद्प्रयासों से ही देवनागरी लिपि में
लिखी जाने वाली हिन्दी को राजभाषा का दर्जा मिल सका। हिन्दी के प्रति
उनकी सेवाओं का मूल्यांकन करते हुए हिन्दी के प्रसिद्ध आलोचक आचार्य
नगेन्द्र लिखते हैं ‘‘राष्ट्रभाषा हिन्दी के इतिहास में राजर्षि पुरूषोत्तम दास
टण्डन शब्द आज अभिधान मात्र न रहकर प्रतीक बन गया है: जिस प्रकार
‘प्रसाद’ के नाम में राष्ट्रभाषा की सांस्कृतिक समृद्धि समाहित है, ‘प्रेमचंद’ में
उसकी जनकल्याणकारी भावना, ‘मैथिलीशरण’ में राष्ट्रीयता और ‘सुमित्रानन्दन
पंत’ में उसकी सौन्दर्यविभूति, इसी प्रकार ‘पुरूषोत्तम दास टण्डन’ शब्द में
राष्ट्रभाषा का कार्मिक उत्साह प्रज्ज्वलित है। उनका अभिनन्दन राष्ट्रभाषा के
रूप में हिन्दी के अभिषेक का अभिनन्दन है।’’

राजर्षि टण्डन के शैक्षिक विचार 

रूढ़ अर्थों में राजर्षि पुरूषोत्तम दास टण्डन को शिक्षाशास्त्री नहीं कहा
जा सकता पर वास्तव में उनका सम्पूर्ण जीवन ही भारतीयों के लिए शिक्षा का
एक महत्वपूर्ण स्रोत रहा है। वे शिक्षा का भारतीयकरण करना चाहते थे साथ
ही प्राच्य एवं पाश्चात्य संस्कृतियों के श्रेष्ठ तत्वों का प्रचार-प्रसार करना
चाहते थे और शिक्षा के माध्यम के रूप में मातृभाषा को प्रतिष्ठित करना चाहते
थे। राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी की स्वीकृति के लिए उन्होंने अपना सर्वस्व
न्यौछावर कर दिया। हिन्दी को विश्वविद्यालय स्तर पर स्वीकृति दिलाने में
उनका महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने शिक्षा के द्वारा भारतीयों में आत्मगौरव
एवं आत्मबल का संचार किया। अत: यह कहा जा सकता है कि राजर्षि
टण्डन का शिक्षा के क्षेत्र में योगदान अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

शिक्षा का उद्देश्य 

राजर्षि टण्डन को शिक्षा के प्रभाव पर अटूट विश्वास था। वे शिक्षा के
द्वारा अनेक राष्ट्रीय एवं सामाजिक उद्देश्यों को प्राप्त करना चाहते थे। उनके
कार्यों के अनुशीलन से स्पष्ट होता है कि उन्होंने शिक्षा के निम्नलिखित
उद्देश्य रखे :

  1. राष्ट्रीयता की भावना का विकास : राजर्षि टण्डन एक प्रखर
    राष्ट्रवादी नेता थे और शिक्षा के द्वारा नई पीढ़ी में राष्ट्रीयता की
    भावना भरना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने हमेशा राष्ट्रीय
    शिक्षण संस्थाओं को सहयोग दिया। जैसा कि हमलोग देख चुके
    हैं वे भारत राष्ट्र का आधार भारतीय संस्कृति को बनाना चाहते
    थे। 
  2. भारतीय संस्कृति का संरक्षण : राजर्षि टण्डन भारतीय संस्कृति
    को भावी विकास का आधार मानते थे। इस संदर्भ में उनका
    जवाहर लाल नेहरू से मतभेद भी रहा। राजर्षि टण्डन का कहना
    था ‘‘मैं प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की इस बात से सहमत हूँ कि
    राष्ट्र को समय के साथ चलना चाहिए। लेकिन आगे बढ़ते हुए
    उसे यह ध्यान रखना है कि जो लम्बी और शक्तिशाली श्रृंखला
    उसे भूतकाल से जोड़ती है, वह टूट न जाए प्रत्युत और मजबूत
    बने। हमारा मूल ध्यान होना चाहिए कि हम भूतकाल से
    सम्बन्ध रखकर वर्तमान में आगे बढ़ें। पश्चिम में जो भी चटकीला
    और चमकदार है, वह सब सोना नहीं है। भारत ने ऐसे उच्च
    विचार और परम्पराएं पैदा की है जो कालयापन के साथ-साथ
    मनुष्य जाति के भाग्य को अधिकाधिक प्रभावित करेगी।’’ इसी
    विचार के अनुरूप राजर्षि टण्डन शिक्षा के द्वारा भारतीय संस्कृति
    का संरक्षण करना चाहते थे जो सम्पूर्ण विश्व के लिए कल्याणकारी
    है। 
  3. चरित्र का निर्माण : राजर्षि टण्डन का चरित्र ऋषियों की
    तरह उज्ज्वल एवं धवल था। वे शिक्षा के द्वारा चरित्रवान
    युवक-युवतियों को तैयार करना चाहते थे। उनका स्पष्ट संदेश
    था- ‘‘हमारा जीवन सादा और विचार स्तर उच्च होना चाहिए।
    हमारी आवश्यकताएँ सीमित होनी चाहिए और ईमानदारी के
    साथ अपने दूसरे भाईयों की सेवा करने का आदर्श हमें सदा
    अपने सामने रखना चाहिए।’’ नवयुवकों में ऊँची नैतिकता और
    सच्चरित्रता भरने का जैसा वे निरन्तर ध्यान रखते थे, विवाहित
    कन्याओं को भी पतिव्रत धर्म का ध्यान दिलाते रहते थे। 
  4. हिन्दी का प्रचार-प्रसार : राजर्षि टण्डन भारतीय जनमानस को
    मानसिक दासता से मुक्त करने के लिए अंग्रेजी के प्रभुत्व को
    समाप्त करने एवं सम्पूर्ण राष्ट्र में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के प्रबल
    समर्थक थे। उनके द्वारा स्थापित संस्थाओं का एक महत्वपूर्ण
    उद्देश्य था हिन्दी भाषा एवं साहित्य की उच्चतम स्तर की शिक्षा
    की व्यवस्था करना। प्रसिद्ध साहित्यकार माखनलाल चतुर्वेदी ने
    राजर्षि टण्डन के संदर्भ में लिखा ‘‘वे (राजर्षि टण्डन) अपनी
    संतुलित शक्तियों को कभी बेकार नहीं रहने देते थे। अपने सारे
    प्रयत्नों को केवल भारत की स्वतंत्रता और हिन्दी के उद्धार में
    लगाते थे।’’ उनके लिए देश की स्वतंत्रता से हिन्दी का प्रश्न कम
    महत्वपूर्ण नहीं था। उनका कहना था कि ‘‘हिन्दी ही एक ऐसी
    भाषा है जो विभिन्न प्रदेशों को प्रेम के ऐक्य सूत्र में बाँध सकती
    है।’’ अत: वे शिक्षा का उद्देश्य हिन्दी का प्रचार-प्रसार करना भी
    मानते थे। 
  5. निरक्षरता-उन्मूलन : महात्मा गाँधी की ही तरह राजर्षि टण्डन
    निरक्षरता को देश के लिए अभिशाप मानते थे। वे एक तरफ तो
    शिक्षा के प्रसार द्वारा नई पीढ़ी को निरक्षर होने के कलंक से
    बचाना चाहते थे तो दूसरी ओर वे शिक्षित नवयुवक, नवयुवतियों
    को इसके लिए प्रेरित करते थे कि वे प्रौढ़ निरक्षरों के मध्य जाकर
    उन्हें साक्षर बनायें। प्रौढ़ निरक्षरों को अक्षर-ज्ञान देने का कार्य वे
    तब भी करते रहे जब वे उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष थे।

इस प्रकार राजर्षि टण्डन के अनुसार शिक्षा के उद्देंश्य अत्यन्त
व्यापक थे।

पाठ्यक्रम 

शिक्षा के पाठ्यक्रम के संदर्भ में राजर्षि टण्डन का विचार बहुत ही
उदार था। वे परम्परागत भारतीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान दोनों का ही
समन्वय चाहते थे पर पश्चिमी संस्कृति की चकाचौंध में भारतीय ज्ञान की
उपेक्षा को वे राष्ट्र विरोधी दृष्टिकोण मानते थे।

राजर्षि टण्डन आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देने के पक्षधर थे पर
वे इसके लिए अंग्रेजी को अनिवार्य नहीं मानते थे। उनका कहना था कि ‘‘इस
देश में अंगे्रजी का प्रभुत्व रहते हुए देश मानसिक और बौद्धिक दृष्टि से स्वतंत्र
और आजाद नहीं हो सकता है।’’ राजर्षि टण्डन सम्पूर्ण भारत में हिन्दी को
पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना चाहते थे। हिन्दी में भी भक्ति साहित्य को वे
सर्वश्रेष्ठ मानते थे। कबीर पर उनकी गहरी निष्ठा थी। कबीर की छाप वे अन्य
भाषाओं के कवियों पर भी पाते हैं। उनके अनुसार ‘‘जैन कवि ज्ञानानन्द,
विजय, यशोविजय, आनन्दघन आदि की कृतियों में, हिन्दी और गुजराती
दोनों प्रकार की माणिक मालाओं में गुंथने वाला तार मुझे वही कबीर दास की
बानी से निकला हुआ रहस्यवाद दिखाई देता है। इनकी बानी उसी रंग में
रंगी है और उन्हीं सिद्धान्तों को पुष्ट करने वाली है जिनका परिचय कबीर
और मीरा ने कराया है।’’ इस प्रकार टण्डन के पाठ्यक्रम में भक्ति साहित्य
का महत्वपूर्ण स्थान है।

राजर्षि टण्डन भारत के गौरवशाली इतिहास को पाठ्यक्रम का
महत्वपूर्ण हिस्सा बनाना चाहते थे। इससे लोगों के सोये स्वाभिमान को
जगाया जा सकता था, साथ ही उनके अनुसार बिना अतीत को आधार बनाये
बेहतर भविष्य का निर्माण नहीं किया जा सकता है।

राजर्षि टण्डन छात्रों को राजनीति एवं प्रजातांत्रिक जीवन पद्धति की
सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक शिक्षा देना चाहते थे। वे उच्च स्तर पर अरविन्द
के दर्शन, विवेकानन्द तथा रामतीर्थ के ग्रन्थ, पतंजलि की विभूति और
कैवल्यपाद के अध्ययन की अनुशंसा करते हैं।

राजर्षि टण्डन बच्चों एवं नवयुवकों के लिए खेल एवं व्यायाम को
आवश्यक मानते थे। साथ ही वे प्राकृतिक चिकित्सा के भी प्रशिक्षण के
पक्षधर थे। इस संदर्भ में उनका सिद्धान्त था ‘‘अस्पतालों और शय्याओं की
संख्या बढ़ाने के बदले स्वस्थ जीवन के समुचित साधनों को उपलब्ध कराना
राष्ट्रीय जीवन के लिए परम आवश्यक है।’’

इन सबके अतिरिक्त वे पूरी शिक्षा प्रक्रिया को इस तरह से क्रियान्वित
करना चाहते थे कि छात्रों में नैतिकता और सदाचार का विकास हो सके।

राजर्षि टण्डन लिखावट को शिक्षा का महत्वपूर्ण अंग मानते थे और
इस पर बहुत ध्यान देते थे। वे न केवल विद्यालयों-महाविद्यालयों के विद्यार्थियों
को ही नहीं वरन् अपेक्षाकृत प्रौढ़ लोगों को भी देवनागरी को सही ढ़ंग से
लिखने की विधि बताया करते थे। तेजी से लिखते समय ‘एकार’ एवं ‘ओकार’
की मात्रा को दाहिनी ओर झुकाने के वे विरोधी थे। वे इन्हें बांयी ओर झुकाने
का आग्रह करते थे। टण्डन ‘ए’ के स्थान पर ‘ये’ लिखना शुद्ध बताते थे।
अंग्रेजी शब्दों को अल्प विराम के बीच बन्द कर देने या रेखांकित कर देने के
आग्रही थे।

प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम 

राजर्षि टण्डन भारत को साक्षर देखना चाहते थे। वे अपने प्रांत,
उत्तरप्रदेश, में प्रौढ़ शिक्षा के द्वारा निरक्षरता को समाप्त करने के प्रयास में
व्यक्तिगत रूप से लगे रहे। इस संदर्भ में उनकी भूमिका को ओंकार शरद के
लेख ‘एक इस्पाती व्यक्तित्व’ के निम्नलिखित अंश से समझा जा सकता है।

‘‘टण्डन जी संयुक्त प्रांत के स्पीकर थे। पूरे प्रांत भर में उनका साक्षरता
आन्दोलन चल रहा था। यह आन्दोलन उन्हीं का था। प्रांत का कोई भी
व्यक्ति निरक्षर न रह जाय- यही उनका सपना था।

इलाहाबाद में घंटाघर के नीचे, चौड़ी सड़क पर, एक दिन सुबह-सुबह
दोनों ओर पÍियां बिछा दी गई। और उस पर बैठाए गए गरीब, मजदूर, बूढ़े
जो निरक्षर थे। उन्हें एक-एक स्लेट दी गई और टण्डन जी उन्हें अक्षर ज्ञान
करा रहे थे।

तब हम सब थे उनके सिपाही। हजारों की संख्या में बैठे लोग
अक्षर-ज्ञान कर रहे थे और टण्डन जी एक सार्वजनिक शिक्षक बने सबों को
ककहरा सिखा रहे थे। यह क्रम विभिन्न रूपों में- रात्रि पाठशाला और
सामूहिक विद्यालय की शक्ल में भी हमलोग बहुत दिनों तक चलाते रहे।
असंख्य लोग टण्डन जी की प्रेरणा से साक्षर हुए। हजारों लोग अंगूठा टेक के
अभिशाप से मुक्त हुए।’’

राजर्षि टण्डन द्वारा स्थापित शैक्षिक-सामाजिक संस्स्थायें 

राजर्षि टण्डन ने अनेक शैक्षिक सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं
की स्थापना की। इनमें से प्रमुख संस्थायें हैं-

गौरी पाठशाला 

राजर्षि टण्डन लड़कियों की शिक्षा को समाज और राष्ट्र की प्रगति के
लिए आवश्यक मानते थे। वे उनको चरित्रवान एवं सुसंस्कृत बनाना चाहते थे
ताकि वे भविष्य में पतिव्रता पत्नी एवं योग्य माता सिद्ध हो सकें। इस उद्देश्य
को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपने मुहल्ले में महामना मालवीय एवं बालकृष्ण
भÍ के सहयोग से गौरी पाठशाला की स्थापना की। राजर्षि टण्डन इस संस्था
के अध्यक्ष थे। इस कन्या विद्यालय के विकास में उनकी पुत्रवधू श्रीमती रानी
टण्डन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह विद्यालय वर्तमान में उच्चतर माध्
यमिक विद्यालय हो गया है जिसमें एक हजार से भी अधिक लड़कियाँ अध्ययन करती हैं।

हिन्दी विद्यापीठ 

हिन्दी भाषा एवं साहित्य में उच्चस्तरीय शिक्षा की व्यवस्था हो सके
इसके लिए महेवा, प्रयाग में राजर्षि टण्डन ने हिन्दी विद्यापीठ की स्थापना
की। इस संदर्भ में प्रसिद्ध कवि हरिवंश राय ‘बच्चन’ अपने लेख ‘बाबू
पुरूषोत्तम दास टण्डन : एक संस्मरण’ में कहते हैं ‘‘हिन्दी के उच्चकोटि के
साहित्य का पठन-पाठन विधिवत् हो सके, उसके लिए उन्होंने प्रयाग में
हिन्दी विद्यापीठ की स्थापना की थी। हमें यह नहीं भूलना नहीं चाहिए कि
यह वह समय था जब हिन्दी को विश्वविद्यालयों में प्रवेश की बात तो दूर उसे
झरोखों से झाँकने की भी आज्ञा नहीं थी। इण्टरमीडिएट में भी नहीं पढ़ाई
जाती थी, उसका साहित्य केवल हाईस्कूल तक पढ़ाने योग्य समझा जाता
था।’’ अहिन्दी भाषी भी हिन्दी को सीख सके इसके लिए राजर्षि टण्डन ने
डॉ0 काटजू के सहयोग से नैनी में हिन्दी विद्यापीठ की स्थापना की। दक्षिण
भारत के हिन्दी सीखने वाले बहुत सारे विद्यार्थियों के खर्च का वहन वे स्वयं
करते थे या किसी सहयोगी को इस कार्य के लिए प्रेरित करते थे।

हिन्दी साहित्य सम्मेलन 

जैसा कि हमलोग देख चुके हैं हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थापना
10 अक्टूबर, 1910 को हुई। महामना मालवीय इसके प्रथम अध्यक्ष एवं राजर्षि
टण्डन मंत्री बने पर सम्मेलन का सारा कार्य टण्डन ही सम्पादित करते थे।
इस संदर्भ में राजर्षि टण्डन के योगदान का उल्लेख करते हुए श्री प्रकाश
लिखते हैं ‘‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन के रूप में उन्होंने अपनी अमर कीर्ति
छोड़ी है। इसके द्वारा सारे देश में सहस्त्रों नर-नारियों ने हिन्दी को प्रेम से
पढ़ा और उसकी परीक्षाओं में उत्तीर्ण होकर भाषा पर काफी अधिकार भी
प्राप्त किया। वह हिन्दी भाषा और नागरी लिपि का आग्रह करते रहे। अंको
के लिए भी उसका अन्तर्राष्ट्रीय रूप लेना उन्होंने अस्वीकार कर दिया।’’

पंजाब में हिन्दी पाठशालाओं को सहयोग 

1925 से 1939 तक वे पंजाब नेशनल बैंक के मैनेजर के रूप में लाहौर
एवं आगरा में कार्यरत थे। पंजाब में निवास के दौरान उन्होंने हिन्दी पाठशालाओं
की स्थापना और संचालन में गहरी रूचि दिखाई। इस दौरान वे अपने वेतन
का एक भाग पंजाब में चलाई जा रही हिन्दी पाठशालाओं के लिए खर्च करते
थे।

तिलक स्कूल ऑफ पालिटिक्स (लोक सेवा मण्डल) 

1921 में लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की स्मृति में लाला लाजपत
राय ने ‘तिलक स्कूल ऑफ पालिटिक्स’ की स्थापना की। इसका कार्य
जनसामान्य की सेवा करना तथा भारतीयों के मध्य राजनीतिक जागरूकता
को बढ़ाना था। इस संस्था के संचालन में राजर्षि टण्डन ने महत्वपूर्ण भूमिका
निभायी। बाद में इसका नाम बदलकर ‘लोक सेवा मंडल’ कर दिया गया। 17
नवम्बर, 1928 को लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई। महात्मा गाँधी के
आग्रह पर जनवरी, 1929 में राजर्षि टण्डन लोक सेवक मण्डल के अध्यक्ष बने।
राजर्षि टण्डन के नेतृत्व में लाला लाजपत राय स्मारक निधि के लिए पाँच
लाख रूपये का संग्रह किया गया।

इन संस्थाओं के अतिरिक्त राजर्षि टण्डन ने विभिन्न नगरों में अनेक
संस्थाओं की स्थापना की, जैसे कानपुर में व्यायामशाला, फैजाबाद में राजनीतिक
कान्फ्रेन्स आदि। इलाहाबाद में प्रौढ़ शिक्षा की व्यापक व्यवस्था इन्हीं के
प्रयासों का परिणाम था। राजर्षि टण्डन द्वारा स्थापित एवं संचालित इन
संस्थाओं से कहीं महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि वे स्वयं एक संस्था थे जिनसे
राजनेता, शिक्षक, साहित्कार सभी प्रेरणा ग्रहण करते थे। प्रसिद्ध साहित्यकार
माखन लाल चतुर्वेदी ने उनके बारे में यथार्थ टिप्पणी की ‘‘ज्ञान जब काला
पड़ने लगता है और उद्योग जब शिथिल होने लगता है, तब टण्डन जी को
देखकर बल मिलता है।’’

राजर्षि टण्डन की नीतियों एवं कार्यों की आलोचना 

अनेक राजनीतिज्ञों एवं बुद्धिजीवियों ने राजर्षि टण्डन की नीतियों की
आलोचना की है। हिन्दू संस्कृति का कÍर समर्थक बताकर उन्हें सम्प्रदायिकता
के विकास में एक कारक माना है। पर शायद पं0 जवाहर लाल नेहरू एवं
उनके समर्थक टण्डन के विचारों को सही ढ़ंग से समझ नहीं पाये। श्री वियोगी
हरि इस संदर्भ में राजर्षि टण्डन के दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं
‘‘हिन्दू धर्म की चन्द घिसी पिटी मान्यताओं या परम्पराओं पर विश्वास करना,
इसी को बहुतेरे लोग संस्कृति मानते हैं। टण्डन जी ऐसे विश्वासों से बहुत दूर
थे। ‘कल्चर’ शब्द को भी वह संस्कृति के रूप में नहीं लेते थे। जो कृति सम्यक
हो, सच्ची हो, दूसरों का उद्वेग करने वाली न हो और सब प्रकार से समीचीन
हो, सुन्दर हो, उसी को वह भारतीय संस्कृति मानते थे। वह आक्रमणात्मक
नहीं, किन्तु समन्वयात्मक थे। मगर समन्वय वह, जिसमें न तो तुष्टीकरण
होता है और न स्वार्थ की गंध पाई जाती है। इसी संस्कृति के टण्डन उपासक
थे और इसी के पुनरूद्धार के लिए वह व्याकुल रहते थे।’’

राजर्षि टण्डन की दूसरी आलोचना हिन्दी के प्रति उनके अत्यधिक
लगाव के कारण की गई है। उन्होंने संविधान सभा में जिस दृढ़ता से हिन्दी
का पक्ष रखा उसकी अनेक लोग सराहना नहीं करते हैं। पर इस तथ्य से
इंकार नहीं किया जा सकता है कि स्वतंत्र राष्ट्र की एक राष्ट्रभाषा होनी ही
चाहिए और हिन्दी इसके लिए सबसे उपयुक्त है। राजर्षि टण्डन अंग्रेजी के
प्रभुत्व के विरूद्ध थे। उनकी मान्यता हिन्दी को लोकग्राह्य बनाने और उसे
साकार रूप देने में है। राजर्षि टण्डन उर्दू के विरोधी नहीं थे। उसे तो वह
हिन्दी की ही एक विशिष्ट शैली मानते थे। उन्होंने कहा था ‘‘हिन्दी वाले
अनगिनत अरबी-फारसी शब्दों को पचाये हुए हैं, पर उर्दू वाले अपरिचित और
दुरूह शब्दों से अपनी भाषा को क्लिष्ट और बोझिल बना कर हिन्दी से इसे
अलग करते जा रहे हैं।’’

इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि राजर्षि टण्डन भारत की उन
महान विभूतियों में गिने जाते हैं जिन्होंने देश और समाज की नि:स्वार्थ सेवा
करना ही अपने जीवन का चरम लक्ष्य माना। उन्होंने देश की सेवा विभिन्न
रूपों में किया- राजनेता के रूप में, समाज सेवक के रूप में, साहित्यकार के
रूप में, पत्रकार के रूप में और अध्यापक के रूप में। उनका सम्पूर्ण जीवन
भारतीयों को प्रेरणा देता रहेगा।

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