व्यक्तित्व का अर्थ, परिभाषा एवं निर्धारक

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प्रत्येक व्यक्ति में कुछ विशेष गुण या विशेषताएं होती है जो दूसरे व्यक्ति में नहीं होतीं। इन्हीं गुणों एवं विशेषताओं के कारण ही प्रत्येक व्यक्ति दूसरे से भिन्न होता है। व्यक्ति के इन गुणों का संगठन ही व्यक्ति का व्यक्तित्व कहलाता है। व्यक्तित्व का अंग्रेजी रूपान्तरण पर्सनलिटी (Personality) है जो लेटिन भाषा के पर्सोना (Persona) शब्द से विकसित हुआ। पर्सोना का अर्थ बाह्य आवरण या मुखौटा (Mask) होता है जिसको पहनकर या धारणकर कलाकार रूप बदलकर नाटक प्रस्तुत करते है। रोमन में विशेष गुणयुक्त पात्र को ही पर्सोना कहा जाता था। इस दूसरे अर्थ को ही आधुनिक मनोविज्ञान के पर्सोनलिटी में लिया गया है।

जनसाधारण में व्यक्तित्व का अर्थ व्यक्ति के बाह्य रूप एवं पहनावे से लिया जाता है, परन्तु मनोविज्ञान में व्यक्तित्व का अर्थ व्यक्ति के रूप गुणों की समष्ठी से है, अर्थात् व्यक्ति के बाह्य आवरण के गुण और आन्तरिक तत्व, दोनों को माना जाता है। दर्शन में व्यक्तित्व को आन्तरिक तत्व ‘जीव’ माना जाता है। व्यक्तित्व एक स्थिर अवस्था न होकर एक गत्यात्मक समष्ठी है जिस पर परिवेश का प्रभाव पड़ता है और इसी कारण से उसमें बदलाव आ सकता है। व्यक्तित्व विशेष लक्षणों का योग न होकर व्यक्ति के व्यवहार का समग्र गुण (Total quality) है। व्यक्ति के आचार-विचार, व्यवहार, क्रियाएं और गतिविधियों में व्यक्ति का व्यक्तित्व झलकता है। व्यक्ति का समस्त व्यवहार उसके वातावरण या परिवेश में समायोजन करने के लिए होता है। 

व्यक्तित्व परिभाषाएं

मनोवैज्ञानिकों, दार्शनिकों एवं समाज शास्त्रियों ने व्यक्ति के विभिन्न पहलुओं को ध्यान में रखते हुए विभिन्न परिभाषाएं दी हैं। इस तरह व्यक्तित्व की सैकड़ों परिभाषाएं दी जा चुकी हैं। गिलफोर्ड  ने इन परिभाषाओं को चार वर्गों में बांटा है जो है-

संग्राही परिभाषाएं-

परिभाषाएं-इस वर्ग में वे परिभाषाएं आती है जो व्यक्ति की समस्त अनुक्रियाओं, प्रतिक्रियाओं तथा जैविक गुणों के समुच्चय पर ध्यान देती है। इसमें कैम्फ तथा मार्टन प्रिंस की परिभाषाएं महत्वपूर्ण है। कैम्फ के अनुसार ‘‘व्यक्तित्व उन प्राभ्यास संस्थाओं का या उन अभ्यास के रूपों का समन्वय है जो वातावरण में व्यक्ति के विशेष सन्तुलन को प्रस्तुत करता है।’’  मार्टन प्रिंस की परिभाषा को डा.जायसवाल ने इस प्रकार प्रस्तुत किया है ‘‘व्यक्तित्व, व्यक्ति की समस्त जैविक, जन्मजात विन्यास, उद्वेग, रुझान, क्षुधाएं, मूल प्रवृत्तियां तथा अर्जित विन्यासों एवं प्रवृत्तियों का समूह है।’’

समाकलनात्मक परिभाषाएं-

इस वर्ग की परिभाषाओं में व्यक्तित्व के विभिन्न रूपों, गुणों एवं तत्वों के योग पर बल दिया जाता है। इन गुणों के समाकलन से व्यक्ति में एक विशेषता उत्पन्न हो जाती है। इस वर्ग की परिभाषाओं में वारेन तथा कारमाइकल (1930) तथा मेकर्डी की परिभाषाएं उल्लेखनीय है। वारेन तथा कारमाइकल के अनुसार ‘‘व्यक्ति के विकास की किसी अवस्था पर उसके सम्पूर्ण संगठन को व्यक्तित्व कहते है।’’ मेकर्डी की परिभाषा को डा.जायसवाल इस प्रकार प्रस्तुत किया है ‘‘व्यक्तित्व रूचियों का वह समाकलन है जो जीवन के व्यवहार में एक विशेष प्रकार की प्रवृत्ति उत्पन्न करता है।’’

सोपानित परिभाषाएं -

विलियन जैम्स तथा मैस्लो जैसे कुछ मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्तित्व के कई सोपान बताए है। इन मनोवैज्ञानिकों ने मुख्य रूप से व्यक्तित्व के चार सोपान माने है।
  1. भौतिक व्यक्तित्व (Material self)
  2. सामाजिक व्यक्तित्व (Social self) 
  3. आध्यात्मिक व्यक्तित्व (Spiritual self) 
  4. शुद्ध अहम् (Pure Ego) 
प्रथम सोपान के अन्तर्गत व्यक्ति के शरीर की बनावट में आनुवांशिकता से प्राप्त विशेष गुण सम्मिलित है जबकि द्वितीय सोपान में सामाजिक सम्बन्धों और सामाजिक विकास का उल्लेख होता है। व्यक्तित्व का तीसरा सोपान जैम्स ने आध्यात्मिक व्यक्तित्व माना है। उनके अनुसार इस सोपान वाले व्यक्ति की रूचि आध्यात्मिक विषयों में होती है और सामाजिक सम्बन्धों से इसे अधिक महत्व देता है। अब उसके आध्यात्मिक व्यक्तित्व का विकास होने लगता है। चौथे सोपान में व्यक्ति अपने आत्म स्वरूप का पूर्ण ज्ञान कर लेता है और सभी वस्तुओं में आत्म दर्शन करता है और तब वह अपने व्यक्तित्व के अंतिम सोपान पर पहुंचता है। श्री अरविन्द ने भी व्यक्ति विकास के क्रम में करीब-करीब इसी प्रकार के विचार प्रकट किये है। उन्होंने भौतिक (Physical), भावात्मक या प्राणिक (Vital), बौद्धिक (Mental) चैत्य (Psyche), आध्यात्मिक (Spiritual) तथा अति मानसिक (Supramental) आदि पदों का उल्लेख किया है। 

समायोजन आधारित परिभाषाएं-

इस वर्ग की परिभाषाओं में मनोवैज्ञानिक व्यक्ति के समायोजन को महत्वपूर्ण मानते हैं और इसी के आधार पर व्यक्तित्व का अध्ययन तथा व्याख्या की जाती है। इस वर्ग में वे परिभाषाएं आती है जिनमें समायोजन पर विषेश बल दिया जाता है। व्यक्ति में ऐसे गुण जो उसको समायोजित करने में उसकी सहायता करते है, चाहे वे शारीरिक हों या मानसिक इन सभी का गठन इस प्रकार का होता है कि वे निरन्तर गतिशील रहते हैं। व्यक्ति में इन गुणों की गत्यात्मकता के कारण ही एक विशेष प्रकार की अनन्यता या अपूर्वता (uniqueneSS) पैदा हो जाती है। 

बोरिंग के अनुसार ‘‘व्यक्तित्व व्यक्ति का उसके वातावरण के साथ अपूर्व व स्थायी समायोजन है।

व्यक्ति के व्यक्तित्व को सम्पूर्ण रूप से परिभाषित करने में उपरोक्त परिभाषाएं आंशिक है। किसी व्यक्ति का चाहे कितने ही मानसिक या शारीरिक गुणों का योग हो, कितना ही चिन्तनशील या ज्ञानी हो, परन्तु उसके व्यवहार में गतिशीलता न होने पर उसका व्यवहार और समायोजन अधूरा रह जाता है। आलपोर्ट ने इस बात को ध्यान में रखकर अपने विचारों को व्यक्त करके व्यक्तित्व की परिभाषा को सर्वमान्य बनाने का पूर्ण एवं सफल प्रयास किया। उसकी परिभाषाएं अधिकांश मनोवैज्ञानिकों द्वारा पूर्ण परिभाषा के रूप में स्वीकार की गई है। अत: इस वर्ग की परिभाषाओं में आलपोर्ट की परिभाषा महत्वपूर्ण है। 

जायसवााल के अनुसार आलपोर्ट  ने व्यक्तित्व को इस प्रकार परिभाशित किया है ‘‘व्यक्तित्व व्यक्ति की उन मनोशारीरिक पद्धतियों का वह आन्तरिक गत्यात्मक संगठन है जो कि पर्यावरण में उसके अनन्य समायोजनों को निर्धारित करता है।’’ 

व्यक्तित्व के निर्धारक 

 व्यक्तित्व को प्रभावित करने में कुछ विशेष तत्वों का हाथ रहता है उन्हें हम व्यक्तित्व के निर्धारक कहते है। इन्हीं तत्वों के प्रभाव से इन्हीं तत्वों के अनुरूप व्यक्तित्व का विकास होता है। कुछ विद्वानों ने व्यक्तित्व के निर्धारण में जैविक आधार को प्रमुख माना है तो कुछ ने पर्यावरण संबंधी आधार को प्रधानता दी है, परन्तु व्यक्तित्व के विकास में इन दोनों निर्धारकों का प्रभाव रहता है। अत: इन दोनों निर्धारकों - 1. जैविक 2. पर्यावरण का अध्ययन आवश्यक है।

जैविक निर्धारक -

 मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्तित्व प्रभावित करने वालें चार जैविक निर्धारकों को प्रमुख माना है -

आनुवांशिकता -

व्यक्तित्व में कुछ गुण पैतृक या आनुवांशिक होते है। शरीर का रंग, रूप, शरीर की बनावट गुणों से युक्त हो सकते है। इसका कारण बालक को प्राप्त हुए अपने माता-पिता के पितृय सूत्र क्रोमोसोम्स है। बालक की आनुवांशिकता में केवल उसके माता-पिता की देन ही नहीं होती। बालक की आनुवांशिकता का आधा भाग माता-पिता से, एक चौथाई भाग दादा-दादी से, नाना-नानी से व आठवां भाग परदादा-दादी और अन्य पुरखों से प्राप्त होता है। अत: बालक के व्यक्तित्व पर पैतृक गुणों का प्रभाव पड़ता है। उसका रंग-रूप या शारीरिक गठन के गुण उसके माता या पिता से या उसके दादा या दादी के गुणों के अनुरूप हो सकते है। इसी तरह उसमें बुद्धि एवं मानसिक क्षमताओं के गुण अपने पूर्वजों के अनुरूप हो सकते है। कई अध्ययनों में यह देखा गया है कि पूर्वजों की मानसिक व्याधियों के गुण उनकी पीढ़ी के किसी भी व्यक्ति में प्रकट हो सकते है। इस तरह हम देखते है कि पैतृक गुणों का व्यक्ति के व्यक्तित्व गठन पर कम या ज्यादा प्रभाव पड़ता है।

शारीरिक गठन और स्वास्थ्य -

शारीरिक गठन के अन्तर्गत व्यक्ति की लम्बाई, बनावट, वर्ण, बाल, आंखें व नाक नक्शा आदि अंगों की गणना होती है। ये शारीरिक विशेषताएं इतनी स्पष्ट होती है कि बहुत से लोग इन्हीं से व्यक्ति का बोध करते है। हालांकि यह दृष्टिकोण ठीक नहीं है फिर भी ये विशेषताएं व्यक्तित्व की द्योतक अवश्य है। शरीर से हृष्ट-पुष्ट और सुन्दर व्यक्ति को देखकर लोग प्रभावित होते है। वे उसके शरीर के गठन की प्रशंसा करते है। इससे उस व्यक्ति के मानसिक पहलू पर प्रशंसा का प्रभाव ऐसा पड़ता है कि दूसरों की अपेक्षा वह अपने को श्रेष्ठ समझने लगता है और उसमें आत्मविश्वास और स्वावलम्बन के भाव पैदा हो जाते है। शारीरिक गठन ठीक न होने और शारीरिक अंगहीनता रहने पर व्यक्ति में हीन भावना पैदा हो जाती है। वह अपने आपको गया बीता व हीन समझता है और उसमें आत्मविश्वास की कमी हो सकती है, वह अपने कार्य की सफलता में सदा आशंकित रहता है और अभाव की पूर्ति के लिए वह असामाजिक व्यवहार को अपना सकता है। व्यक्तित्व विकास पर स्वास्थ्य का भी असर पड़ता है। जो व्यक्ति शारीरिक रूप से स्वस्थ रहता है वह अच्छा सामाजिक जीवन व्यतीत करता है और उसमें सामाजिकता विकसित होती है। स्वस्थ्य व्यक्ति अपने कार्य को सफलता से समय पर पूरा करके अपने उद्देश्य की प्राप्ति कर लेता है। इसके ठीक विपरीत अस्वस्थ्य व्यक्ति का व्यक्तित्व अधूरा रह जाता है। अस्वस्थता के कारण अपने कार्यों को समय पर पूरा नहीं कर पाता जिससे वह अपने लक्ष्य की प्राप्ति समय पर नहीं कर पाता। उसमें कार्य करने की रुचि भी कम रहती है। अस्वस्थ व्यक्ति दूसरों को प्रभावित भी नहीं कर सकता। इस तरह, व्यक्तित्व पर शारीरिक गठन और स्वास्थ्य का काफी प्रभाव पड़ता है।

अंत:स्रावी ग्रंथियां एवं व्यक्तित्व - 

व्यक्तितव के विकास में अन्त:स्रावी ग्रंथियों का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। ये प्रत्येक मनुष्य के शरीर में पायी जाती है। इन ग्रंथियों को नलिका विहीन ग्रंथियां भी कहते है। ये बिना नलिकाओं के शरीर में स्राव भेजती हैं। इनके स्राव न्यासर या हार्मोन्स कहलाते है। विभिन्न ग्रंथियां एक या एक से अधिक हार्मोन्स का स्राव करती है। मुख्य रूप से ये ग्रंथियां 8 होती है। ये है-इन ग्रंथियों के स्राव का व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास पर किस प्रकार प्रभाव पड़ता है, इसका संक्षेप में वर्णन आगे किया जा रहा है।
  1. पियूष ग्रंथि- इस ग्रंथि को मास्टर ग्लेण्ड भी कहते है। इससे पिट्यूटिराइन नामक हार्मोन्स उत्पन्न होते है। ये हार्मोन्स शरीर के अन्य ग्रंथियों के हार्मोन्स पर नियंत्रण करते है। इन हार्मोन्स के मुख्य हार्मोन सोमेटोट्रोपिक है। शारीरिक विकास पर इस हार्मोन का बहुत प्रभाव पड़ता है। विकास काल में इस ग्रंथि की क्रिया तीव्र होने पर व्यक्ति की अस्थियां, मांसपेशियां और लम्बाई तेजी से बढ़ती है। सामान्य से अधिक मात्रा में इस हार्मोन का स्राव हो तो व्यक्ति की लम्बाई असामान्य या दानवाकार हो जाती है। उसकी लम्बाई 7 से 9 फीट तक बढ़ जाती है। व्यक्ति के विकास काल में स्राव सामान्य से कम मात्रा में होने से व्यक्ति बौना रह जाता है यद्यपि उसकी बुद्धि सामान्य स्तर की रहती है, परन्तु शारीरिक गठन आकर्षक नहीं होता है। पियूष ग्रंथि के दो भाग होते है-अग्र एवं पश्च भाग। पश्च भाग रक्त चाप, वृक्क-कार्य एवं वसा चयापचय को नियंत्रित करता है। जबकि अग्र भाग उपरोक्त शारीरिक विकास को नियंत्रित करता है। 
  2. पीनियल ग्रंथि - यह ग्रंथि मस्तिष्क में स्थित होती है। यह रहस्यमयी ग्रंथि है। पूर्व में इसको आत्मा व शरीर का सेतु माना जाता था। इसके कार्य व स्राव अभी भी रहस्यमयी है फिर भी यह अनुमान लगाया जाता है कि ये शारीरिक वृद्धि और युवावस्था को बनाये रखने में सहायक है। 
  3. गल ग्रंथि - यह ग्रंथि कण्ठ में स्थित होती है। इस ग्रंथि से थायरोक्सिन नामक हार्मोन स्रावित होता है जो शरीर में आयोडीन की मात्रा को नियंत्रित करता है। यदि बाल्यावस्था में आयोडीन की मात्रा की कमी हो तो शरीर व मस्तिष्क का उचित विकास नहीं होता है फलस्वरूप व्यक्ति मन्द बुद्धि और छोटे कद का होता है। उसके शरीर में दुर्बलता होती है। जब यह ग्रंथि अधिक सक्रिय हो जाती है तब व्यक्ति को भूख ज्यादा लगती है। हृदय की धड़कन बढ़ जाती है। थायरोक्सिन का प्रभाव व्यक्ति के भावों व संवेगों पर भी पड़ता है। इसमें स्रावित होने वाली आयोडीन की कमी से गलगण्ड नामक रोग हो जाता है। 
  4. उपगल ग्रंथि -ये ग्रंथियां गल ग्रंथि के पास ही स्थित होती है। ग्रंथियों के स्राव शरीर को शक्तिमान बनाये रखती है। यदि उपगल ग्रंथियों को अलग कर दिया जाए या ग्रंथियों कि अस्वस्थता हो तो इनके स्राव के अभाव के कारण सम्पूर्ण शरीर का अनुपात नष्ट हो जाता है और शरीर में ऐंठन तथा मरोड़ पैदा हो जाती है जिससे मनुष्य की मृत्यु तक हो जाती है। 
  5. थाइमस ग्रंथि - यह ग्रंथि सीने के अग्र भाग की गुहा में स्थित होती है। इसके कार्य तथा स्रावों के बारे में निश्चित जानकारी नहीं है फिर भी ऐसा माना जाता है कि युवावस्था में यह यौन ग्रंथियों पर नियंत्रण रखती है तत्पश्चात यह ग्रंथि सिकुड़कर छोटी हो जाती है और अपना कार्य बन्द कर देती है।
  6. अधिवृक्क ग्रंथि  -इस ग्रंथि से अधिवृक्कीय नामक हार्मोन स्रावित होता है। जिसका व्यक्तित्व पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। सामान्य मात्रा में यह पुरुषों और स्त्रियों में उनके सामान्य गुणों को बनाये रखता है। अधिक मात्रा में स्रावित होने पर स्त्रियों में पुरुषोचित गुणों को बढ़ा देता है। स्त्रियों में अधिवृक्की हार्मोन की मात्रा बढ़ जाने से स्त्रियों के अंगों की गोलाई खत्म हो जाती है और आवाज भारी हो जाती है। यह आपत्ति के समय जीव की शक्तियों का संगठन करता है। इसकी अधिकता से दिल की धड़कनें तेज हो जाती है। रक्तचाप बढ़ जाता है, पसीना आता है तथा आंखों की पुतलियां फैल जाती है। अधिवृक्क के अभाव में एडिसन नामक बिमारी हो जाती है जिससे शरीर में निर्बलता और शिथिलता बढ़ जाती है, चयापचय (डमजंइवसपेउ) की क्रिया मंद पड़ जाती है, सर्दी-गर्मी सहन करने की क्षमता भी कम हो जाती है और चिड़चिड़ापन बढ जाता है। 
  7. अग्न्याशय ग्रंथि -यह ग्रंथि अग्न्याशय रस स्रावित करती है जिसमें इन्सुलीन नामक हार्मोन होता है। यह हार्मोन रक्त में शर्करा को पचाता है जिससे शरीर को ऊर्जा प्राप्त होती है। इसकी कमी या अभाव में शर्करा का पाचन नहीं हो पाता जिससे मधुमेह नामक रोग हो जाता है। इससे व्यक्ति को चक्कर आते है, कार्य करने की क्षमता कम हो जाती है। स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है और भय की भावना बढ़ जाती है। 
  8. जनन ग्रंथि - जनन ग्रंथियों के स्राव का भी व्यक्ति पर विशेष: प्रभाव पड़ता है। यौन सम्बन्धित रुचि के विकास में यह ग्रंथि सहायक होती है। किशोर अवस्था में ये ग्रंथियां विशेष रूप से सक्रिय होती है अत: इस आयु में स्त्रियों और पुरुषों में यौन चिन्ह प्रकट होने लगते है। पुरुषों में पुरुषोचित यौन लक्षण दाड़ी, मूंछ, भारी आवाज आदि का विकास होता है। ये परिवर्तन टेस्टोस्टेरोन हार्मोन स्रावित होने के कारण होते है। इसी तरह स्त्रियों में स्त्री सुलभ लक्षण जैसे दुग्ध ग्रंथियों आदि का विकास एस्ट्रोजन हार्मोन के स्राव के कारण होता है। 

शारीरिक रसायन-

अन्त:स्रावी ग्रंथियों एवं शरीर रचना के अतिरिक्त व्यक्तित्व के जैविक कारकों में शारीरिक रसायन का उल्लेख भी आवश्यक है। प्राचीन काल से मनुष्य के स्वभाव का कारण उसके शरीर के रसायन के तत्वों को भी माना गया है। ईसा से लगभग 400 वर्ष पूर्व यूनान के प्रसिद्ध चिकित्सक व विचारक हिपोक्रेटीज ने शरीर में पाये जाने वाले रसायनों के आधार पर व्यक्ति के स्वभाव का निरूपण किया है। लगभग इस प्रकार का वर्णन आयुर्वेद में भी किया है। ये शारीरिक रसायन चार प्रकार के होते है।
  1. रक्त, 
  2. पित्त, 
  3. कफ और 
  4. तित्लीद्रव्य। 
  5. रक्त की अधिकता से व्यक्ति आदतन आशावादी और उत्साही (fenguine) होता है। पित्त की अधिकता वाले व्यक्ति चिड़चिड़े या कोपशील (Choleric) प्रकृति के होते है। जिस व्यक्ति में कफ अथवा श्लेष्मा की प्रधानता होती है वे शान्त व आलसी होते है। ऐसे व्यक्ति को श्लेष्मिक (Phelgmatic) प्रकृति का कहते है। जिस व्यक्ति में तिल्ली द्रव्य या श्याम पित्त की प्रधानता होती है। ऐसे व्यक्ति उदास (Melancholi) रहने वाले होते है इन्हीं के आधार पर हिप्पोक्रेटीज ने व्यक्तित्व के प्रकारों का वर्णन किया है। उपरोक्त जैविक कारकों के अतिरिक्त कुछ अन्य जैविक कारक भी है जो व्यक्तित्व को प्रभावित करते है, ये कारक है-बुद्धि, रंगरूप, लिंग ।

पर्यावरण सम्बन्धी निर्धारक -

 इसमें निम्न तीन निर्धारक आते हैं-

प्राकृतिक निर्धारक-

मनुष्य प्राकृतिक पर्यावरण में रहता है अत: उसके जीवन तथा व्यक्तित्व पर भौगोलिक परिस्थितियों एवं जलवायु का प्रभाव पड़ता है। भौगोलिक परिस्थितियों और जलवायु का उसके स्वास्थ्य, शरीर की बनावट तथा मानसिक स्थितियों पर प्रभाव पड़ता है। जैसे ठण्डी जलवायु में रहने वाले व्यक्तियों का रंग गोरा होता है जबकि गर्म जलवायु में रहने वाले व्यक्ति सांवले रंग के होते है। भौगोलिक परिस्थितियों का भी शारीरिक गठन पर प्रभाव पड़ता है जैसे पहाड़ी लोगों का शारीरिक गठन। जिन जगहों पर भूकम्प या प्राकृतिक आपदाएं ज्यादा होती है वहां के लोगों में सुरक्षा की भावना कम होती है। यदि व्यक्ति की भौगोलिक परिस्थितियों या जलवायु बदल दी जाये तब उनके व्यक्तित्व में भी परिवर्तन आ जाता है। जैसे ऊष्ण प्रदेश में रहने वाले लोगों को शीत प्रदेश में रखा जाए तो उनके कार्य करने की क्षमताएं घट सकती है और स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है। इसी तरह ठण्डे प्रदेश में रहने वाले व्यक्तियों को यदि ऊष्ण प्रदेश में रखा जाए तो ऐसा ही प्रभाव उन लोगों पर पड़ता है।

सामाजिक निर्धारक-

व्यक्ति सामाजिक प्राणी है और समाज की इकाई भी। जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त वह समाज में रहता है। अत: समाज का, समाज की संरचना का और समाज के लोगों का उस पर बहुत प्रभाव पड़ता है। परिवार के लोगों से लेकर समाज के लोगों तक का व्यक्ति के व्यक्तित्व पर किस प्रकार प्रभाव पड़ता है इसकी व्याख्या हम आगे कर रहे है।

(A) परिवार या घर का प्रभाव (Effect of Family or Home)-
(iमाता-पिता का प्रभाव (Effect of Parents)- सभी मनोवैज्ञानिकों का यह मानना है कि व्यक्तित्व के विकास में घर के परिवेश का बड़ा प्रभाव पड़ता है। परिवार के सदस्यों का भी बालक के व्यक्तित्व के विकास पर प्रभाव पड़ता है। जन्मकाल से ही मनुष्य का व्यक्तित्व का विकास प्रारम्भ हो जाता है। जन्म के समय उसकी माता तक ही उसका परिवार सीमित रहता है। उसे अपने सभी प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपनी माता पर निर्भर रहना पड़ता है। अत: माता के विवेकशील और व्यवहार कुशल रहने पर तथा बालक को सही ढंग से देखभाल करने से सन्तान या बालक का व्यक्तित्व विकास उचित ढंग से होता है। शिवाजी, महाराणा प्रताप जैसे महापुरुषों के व्यक्तित्व विकास का श्रेय उनकी माताओं को है। माता-पिता द्वारा आवश्यकताओं की उचित पूर्ति होने से बालक आगे चलकर आशावादी, कर्मवीर व परोपकारी बनता है, किन्तु माता-पिता द्वारा आवश्यकताओं की उचित पूर्ति न करने से तथा पर्याप्त स्नेह न देने से बालक कर्महीन व निराशावादी बन जाता है। बाल्यकाल में तिरस्कृत रहने पर वह हीन भाव एवं असुरक्षित भाव से पीड़ित रहता है तथा उसमें आत्म विश्वास की कमी रहती है। आगे चलकर वह परावलम्बी स्वभाव का हो जाता है। वह अपनी छोटी-छोटी आवश्यकताओं को पूर्ति के लिए भी दूसरों का मुंह देखता रहता है। फलस्वरूप उसके व्यक्तित्व का विकास उचित दिशा में नहीं होता। 

माता-पिता के प्रेम के अभाव का सभी बालकों पर एक सा प्रभाव पड़ता है क्योंकि इसमें बालक के जन्मजात स्वभाव और प्रवृत्तियों का बड़ा महत्व है। माता-पिता के प्रेम की अवहेलना और ताड़ना से एक बालक दब्बू बन सकता है परन्तु दूसरा बालक दबंग और उद्दंड बन सकता है। आलपोर्ट के अनुसार ‘‘वहीं आग जो मक्खन को पिघलाती है अण्डे को कठोर बनाती है।’’ माता-पिता द्वारा बच्चे को झिड़कना और गोद में न लेना भी उसके व्यक्तित्व को प्रभावित करता है।


(ii) घर के अन्य सदस्यों का प्रभाव (Effeect of other members of family)- बालक के व्यक्तित्व पर घर के अन्य सदस्यों का काफी प्रभाव पड़ता है। घर में रहने वाले दादा-दादी या नाना-नानी, ताऊ-ताई, चाचा-चाची, मामा-मामी, बड़े भाई-बहन या अन्य कोई रिश्तेदार जो उसके परिवार में रहते है, का प्रभाव बालक के व्यक्तित्व के विकास पर पड़ता है। बालक इनके व्यवहारों को देखता है और सीखता है। कालान्तर में ये व्यवहार उसके व्यक्तित्व का एक भाग बन जाता है। परिवार में बड़े लोग बालक के सामने आदर्श के समान होते है बालक उन जैसा बनना चाहता है और वह तादाम्य क्रिया अपनाता है। यदि परिवार में बालक इकलौती सन्तान है तो परिवार में उसे आवश्यकता से अधिक लाड़-प्यार मिलता है फलस्वरूप वह जिद्दी व शरारती हो जाता है। बच्चे के लिए शरारती होना एक आवश्यक गुण है और इससे आगे चलकर वह निभ्र्ाीक व साहसी बनता है परन्तु आवश्यकता से अधिक शरारती होने से वह नियंत्रण की सीमा तोड़ देता है और वह समाज विरोधी व्यवहारों को सीखकर उसमें रुचि रखने लगता है। अत: उसका व्यक्तित्व विकास उचित रूप से नहीं हो पाता। यदि परिवार बड़ा है, संयुक्त परिवार है, उसके सदस्यों के व्यवहारों में समायोजन नहीं है, घर में कलहपूर्ण स्थिति रहती है तो उसका प्रभाव बालक के व्यक्तित्व के विकास पर पड़ेगा और बालक का समायोजन आगे चलकर गड़बड़ा सकता है।


यदि परिवार के सदस्यों में आपराधिक प्रवृत्तियां है तो उसका प्रभाव भी बालक के व्यक्तित्व के विकास पर पड़ता है और बालक में भी आपराधिक प्रवृत्तियां जन्म लेती है और आगे चलकर वह बालक सामाजिक अपराध करने लगता है। इसी प्रकार भग्न परिवार  भी किशोर अपराध का मुख्य कारण है।

(iii) जन्म क्रम का प्रभाव (Effect of birth order)- प्राय: यह बात आमतौर पर स्पष्ट है कि परिवार के छोटे-बड़े, सबसे बड़े या सबसे छोटे आदि विभिन्न क्रम के बालकों के प्रति एक सा व्यवहार नहीं किया जाता। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक एल्फ्रैड एडलर के अनुसार परिवार में बालक के जन्मक्रम का उसके व्यक्तित्व पर बड़ा प्रभाव पड़ता है, उसकी शारीरिक स्थिति तथा उसके कार्यशैली पर भी प्रभाव पड़ता है। सबसे छोटा बालक सभी से लाड़-प्यार पाता है अत: वह दूसरों पर अत्यधिक निर्भर बन जाता है। सबसे बड़ा बालक स्वावलम्बी व निर्दयी बन जाता है, क्योंकि कुछ दिन तक इकलौते रहने के कारण न तो कोई उसकी चीजों में हिस्सा बांटता है और न कोई उसका अधिकार छीनने वाला होता है परन्तु दूसरे बालक के जन्म से पहले बालक के मन पर बड़ा प्रभाव पड़ता है क्योंकि इससे उसका एकाधिकार छिन जाता है और कभी-कभी तो उसकी अवहेलना होने लगती है। अत: वह छोटे बालक के प्रति ईष्र्या करने लगता है और अपना अधिकार बनाये रखने की कोशिश करता है। एडलर के इस कथन में बहुत कुछ सत्यता है कि व्यक्ति अपनी जीवन शैली बहुत कुछ परिवार में प्रारम्भिक जीवन से ही निश्चित कर लेता है, परन्तु यह मानने के निश्चित प्रमाण नहीं है कि बचपन की यह शैली आजीवन अपरिवर्तित रहती है।

(B) विद्यालय का प्रभाव ( Effect of School ) बालक के व्यक्तित्व विकास पर विद्यालय, विद्यालय में होने वाले अध्ययन, विद्यालय के शिक्षक, बालक के सहपाठी तथा विद्यालय की भौगोलिक स्थिति का बहुत प्रभाव पड़ता है। आगे इन कारकों का संक्षिप्त में वर्णन किया जा रहा है।

(i) शिक्षा का प्रभाव (Effect of education) - विद्यालय में शिक्षा किस प्रकार की दी जाती है इसका प्रभाव बालक के व्यक्तित्व पर पड़ता है। कई विद्यालयों में धार्मिकता, कट्टर धार्मिकता की शिक्षा दी जाती है इससे बालक के व्यक्तित्व का विकास संकीर्णन और एक निश्चित धर्म की तरफ होता है। इससे बालक दूसरे धर्मों के प्रति ईष्र्या और द्वेष करने वाला बन जाता है। कई अंग्रेजी भाषा के विद्यालयों में बालक को मातृभाषा या अन्य भाषाएं बोलने नहीं दी जाती, बल्कि केवल अंग्रेजी भाषा ही बोलने को बाध्य किया जाता है, ऐसी स्थिति में बालक पर मानसिक दबाव बढ़ जाता है तथा उसमें निराशा एवं कुण्ठाएं उत्पन्न हो जाती है, जिससे आगे चलकर बालक के व्यक्तित्व विकास में तथा समायोजन में बाधा आती है।

कई विद्यालयों में संतुलित शिक्षा नहीं दी जाती। आज की शिक्षा प्रणाली में यह सबसे बड़ा दोष है। बालक के मानसिक और शारीरिक विकास पर समुचित ध्यान नहीं दिया जाता बल्कि उसके पाठ्यक्रम की कितनी ज्यादा पुस्तकें बढ़ाई जाये इस पर ध्यान दिया जाता है। बालक के बस्ते का बोझ, गृह कार्य की मार बालक के सर्वांगीण विकास में बाधक बनती है। और उसके सन्तुलित व्यक्तित्व विकास, सर्वांगीण विकास और मूल्यों के विकास के लिए विद्यालय में संतुलित एवं नैतिक शिक्षा दी जानी चाहिए। प्रायोगिक आधारित शिक्षा मूल्य-परक शिक्षा, अनेकान्त धार्मिक शिक्षा तथा शारीरिक विकास की शिक्षा भी बालक के व्यक्तित्व के विकास में बहुत सहायक होती है।

(ii) शिक्षकों का प्रभाव (Effect of educators) - जिस प्रकार बालक परिवार में माता या पिता से तादात्म्य कर लेता है उसी प्रकार विद्यालय में भी शिक्षकों से तादात्म्य कर लेता है। यदि शिक्षक का व्यक्तित्व प्रभावशाली हो तो बालक के व्यक्तित्व विकास पर उसका अनुकूल प्रभाव पड़ता है। कई बार बालक शिक्षकों के नकारात्मक गुणों को सीख जाता है। शिक्षकों द्वारा बालकों से बीड़ी, सिगरेट मंगवाना और उनकी उपस्थिति में उनका प्रयोग करना घातक है क्योंकि इसका तादाम्य कर बालक बीड़ी, सिगरेट पीना सीख जाता है। यदि शिक्षकों में अच्छे गुण है तो बालक भी उन गुणों का तादात्म्य कर लेता है, फलस्वरूप बालक के व्यक्तित्व विकास में वे गुण जुड़ जाते है। संक्षेप में आमतौर से बालक के प्रति व्यवहार में प्रकट होने वाले शिक्षक के व्यक्तित्व के सभी गुण-दोष बालक के व्यक्तित्व विकास पर अच्छा-बुरा प्रभाव डालते है।

(iii) सहपाठियों का प्रभाव (Effcet of peers)- बालक के व्यक्तित्व विकास पर उसके सहपाठियों या विद्यालय के साथियों का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। विद्यालय में उसको सभी प्रकार के साथियों के साथ रहना पड़ता है। कई सहपाठी आयु में उससे भिन्न होते है, कई स्नेह करने वाले तो कई इश्र्यालु विद्याथ्र्ाी भी उसके साथ होते है। इन सभी साथियों के साथ बालक अपनी विद्यालय की दिनचर्या व्यतीत करता है। छोटी आयु या छोटी कक्षा का विद्याथ्र्ाी बड़े विद्याथ्र्ाी से दबता है। यह दबना आदर्श सूचक भी हो सकता है और भय सूचक भी। अत: इन कारकों का प्रभाव बालक के व्यक्तित्व पर पड़ता है। कई बार बालक अभद्र बालकों के व्यवहारों को सीख जाता है जिसमें गाली-गलौच, विद्यालय से भागने, शिक्षकों तथा माता-पिता के साथ अभद्र व्यवहार करना सीख जाता है, जो उसके व्यक्तित्व के विकास को प्रभावित करता है। सहपाठियों का बालक के व्यक्तित्व पर सबसे अधिक प्रभाव खेल-क्रीड़ा समूह के प्रभाव के रूप में पड़ता है। विद्यालय में साथ-साथ खेलने वाले या प्रतियोगिता करने वाले विद्याथ्र्ाी अपना-अपना दल बना लेते है और दल के नेतृत्व के लिए नेता का चुनाव भी करते है। इस तरह विभिन्न क्रियाओं का संचालन करने के लिए छात्र दल अलग-अलग ढंग से कार्य करता है जो उसके व्यक्तित्व विकास में सहायक है। अपने साथियों के साथ में प्रतियोगिता और प्रतिद्विन्द्वता रखने से बालक परिश्रम करता है जो उसके व्यक्तित्व विकास में सहायक होता है।

(iv) विद्यालय की भौगोलिक स्थिति (Geographic situation of school) - विद्यालय की भौगोलिक स्थिति कैसी है? इसका प्रभाव भी बालक के व्यक्तित्व के विकास पर पड़ता है। विद्यालय कहां स्थित है तथा विद्यालय भवन की क्या स्थिति है? इसका भी प्रभाव बालक के व्यक्तित्व विकास पर पड़ता है। यदि विद्यालय प्रदूषण जनित जगह पर स्थित है, जहां वायु प्रदूषण तथा ध्वनि प्रदूषण हो तो ऐसे विद्यालय में अध्ययन करने वाले बालकों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है। यदि विद्यालय ऐसे मौहल्ले में स्थित है जहां समाज कंटक जैसे शराबी, जुआरी, वेश्यावृत्ति करने वाले और चोरी करने वाले रहते है तो ऐसे क्षेत्र के विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों के व्यक्तित्व विकास पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। इसमें बालक समाज विरोधी व्यवहार सीख सकता है। यदि विद्यालय का भवन स्वच्छ नहीं है और क्षीर्ण-जीर्ण और खण्डहर अवस्था में है तो उस स्थान पर पढ़ने वाले बालकों के व्यक्तित्व के विकास पर बुरा प्रभाव पड़ता है। उनके मन में हर समय भवन के ढह जाने का भय रहता है तथा उनमें अन्य व्याधियां भी उत्पन्न हो सकती है जो उनके व्यक्तित्व विकास में बाधक होते है।

(C) समाज का प्रभाव-(Effect of society) जैसा कि पूर्व में लिखा जा चुका है कि व्यक्ति समाज का अंग और इकाई है। अत: समाज का व्यक्तित्व विकास पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। समाज की परम्पराओं रीति-रिवाजों, सामाजिक नियमों का व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। व्यक्ति समाज के लोगों के आचरण तथा प्रतिमानों को अपनाता है। जाति, वर्ण तथा व्यवसाय के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति की समाज में स्थिति अलग-अलग होती है। परिवार की सामाजिक स्थिति से बालकों के व्यक्तित्व पर भी प्रभाव पड़ता है। वर्णभेद जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा जातिभेद अर्थात् विभिन्न जातियों की सामाजिक स्थितियां भिन्न-भिन्न है। कुछ लोग जाति-प्रथा, पर्दा-प्रथा, बाल विवाह के पक्षधर होते है तो कुछ घोर विरोधी। कुछ लोग समाज के प्रत्येक नियम को तोड़ने को तत्पर दिखाई देते है जबकि कुछ लोग उनका कठोरता से पालन करते दिखाई पड़ते है। ऊंची जाति के बालकों में बड़प्पन की भावना और नीची जातियों में हीनता की भावना देखी जा सकती है। ऊंचे घरानों के बालकों का व्यक्तित्व संयमित दिखाई पड़ता है परन्तु इसके लिए कोई ठोस मनोवैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

बालक के व्यक्तित्व के विकास पर समाज सुधारकों, सामाजिक कार्यकर्त्ताओं तथा समाज विरोधी व्यक्तियों का भी प्रभाव पड़ता है। समाज सुधारक, समाज सेवी तथा सामाजिक कार्यकर्त्ता समाज के कल्याण तथा समाज के उत्थान के लिए कार्य करते है और इनका प्रभाव बालकों के व्यक्तित्व विकास पर पड़ता है। इसी तरह समाज विरोधी कार्य करने वाले और सामाजिक कंटकों का भी प्रभाव व्यक्तित्व विकास पर पड़ता है। समाज विरोधी लोग या समाज कंटक, समाज विरोधी कार्य जैसे जेबकतरी (पॉकिट मार), चोरी, शराबखोरी, वेश्यावृत्ति आदि कार्यों को करते है और इनका प्रभाव बालकों के व्यक्तित्व विकास पर पड़ता है। समाज सेवक समाज के विभिन्न लोगों जैसे वृद्ध, निराश्रित, गरीब की सेवा करते है और समाज की सुरचना करने का प्रयत्न करते है। उनकी परोपकारी सेवा भावनाओं का भी प्रभाव अन्य व्यक्तियों के व्यक्तित्व विकास पर पड़ता है। अन्य व्यक्ति भी परोपकारी भावनाओं को अपनाकर अपने व्यक्तित्व का सकारात्मक विकास कर सकते है।

3. सांस्कृतिक निर्धारक-

व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास पर संस्कृति की अहम् भूमिका है। व्यक्ति का व्यक्तित्व संस्कृति के अनुरूप होता है। जन्मकाल से ही शिशु का पालन-पोषण तथा समाजीकरण उसकी सांस्कृतिक परम्परा के अनुरूप होता है। प्रत्येक संस्कृति में शिशु के सामाजीकरण की एक विधि होती है क्योंकि इसी विधि के द्वारा संस्कृति अपने को सुरक्षित रखती है। संस्कृति और व्यक्तित्व एक दूसरे के पूरक होते है। आज के अधिकतर मनोवैज्ञानिकों का यह विचार है कि संस्कृति और व्यक्तित्व दो भिन्न वस्तुएं नहीं है, बल्कि एक ही वस्तु के दो पहलू है। जिस संस्कृति में बालक का लालन-पालन होता है उसी संस्कृति के गुण उसके व्यक्तित्व में आ जाते है। मैकाईवर और पेज के शब्दों में ‘‘संस्कृति हमारे रहने व सोचने के ढंगों में, दैनिक कार्यकलापों में, कला में, साहित्य में, धर्म में, मनोरंजन और सुखोपभोग में हमारी प्रकृति की अभिव्यक्ति है।’’ इस तरह संस्कृति कार्य करने की शैलियों, मूल्यों, भावात्मक लगावों और बौद्धिक अभियान का क्षेत्र है। एक संस्कृति दूसरी संस्कृति से इन्हीं गुणों के आधार पर भिन्न होती है। अलग- अलग संस्कृतियों के अलग-अलग मूल्य होते है। जैसे-प्राचीन काल में भारतीय लोग धर्मपरायण और आध्यात्मिक थे। आधुनिक भारतीय उतने आध्यात्मिक एवं धार्मिक नहीं है। फिर भी उनमें आध्यात्मिक एवं धार्मिक मूल्य उच्च स्तर के है। इसका कारण हमारी संस्कृति का प्रभाव ही है। पाश्चात्य लोगों के लिए भौतिक व मानसिक मूल्य उच्च स्तर के है। इसी तरह अलग-अलग संस्कृति के समाजों में रहन-सहन, रीति-रिवाज, धर्म, कला, मूल्यों और परम्पराओं में भिन्नताएं देखी जा सकती है। कुछ संस्कृतियों की जातियों में मनुष्य हत्या को पाप समझते है तो दूसरी ओर नागा संस्कृति में उन लोगों का बड़ा सम्मान होता है जो नर मुण्ड काट के लाते है। जो व्यक्ति जितने ज्यादा नर मुण्ड काटता है उतनी ही समाज में उसकी प्रतिष्ठा बढ़ती है और उतने ही ज्यादा स्त्रियों के विवाह के प्रस्ताव आते है। जबकि दूसरी संस्कृति में नर हत्या करने वाले के साथ समाज के लोग अपनी बेटी का विवाह नहीं करना चाहते। भारतीय संस्कृति के कुछ परिवारों में तलाक देना अच्छा नहीं माना जाता परन्तु कुछ जनजातियों में जो स्त्री जितने अधिक तलाक पाती है, उसकी प्रतिष्ठा उतनी ही अधिक बढ़ती है। पाश्चात्य देशों में तलाक को बुरा नहीं माना जाता है। कुछ समाज में कुंआरी कन्या के गर्भवती हो जाने पर कोई उससे विवाह नहीं करता, परन्तु कुछ जन-जातियों में विवाह से पहले संतानोत्पत्ति करना लड़की के विवाह में सहायक होता है। इस तरह की सांस्कृतिक भिन्नताएं बालक के व्यक्तित्व के विकास पर प्रभाव डालती है। बालक का जिस संस्कृति के परिवेश में विकास होता है उस संस्कृति के खान-पान, रहन-सहन, रीति-रिवाज, धर्म, परम्परा, विवाह, सामाजिक समारोह और सामाजिक संस्थाओं आदि का प्रभाव पड़ता है। जनजातियों की संस्कृति में भी भारी भिन्नताएं है। जैसे नागा लोग सिरों के शिकारी  है तथा भील लड़ाकू है और संथाल सीधे-साधे है। इस तरह सांस्कृतिक परिवेश में सामाजिक रचना, सामाजिक स्थितियां, सामाजिक कार्य तथा नियम संहिताएं मनुष्य के व्यक्तित्व को प्रभावित करते है

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