गैर सरकारी संगठन (NGO) क्या है?

By Bandey 5 comments
अनुक्रम
गैर सरकारी संगठन (NGO) के अन्तर्गत ऐसे समूह व संस्थान आते हैं जो पूर्ण रुप
से या अधिकांश रुप से गैर-सरकारी होते हैं। इनका उद्देश्य व्यवसायिक न होकर
मुख्यत: मानव मात्र के कल्याण और सहकारी तौर पर काम करना होता है। औद्योगिक
देशों में ये प्राइवेट एजेंसियां होती हैं ये (एजेसियां) संगठन अंर्तराष्ट्रीय विकास के लिए
सहायता प्रदान करती हैं। यह सहायता प्रादेशिक स्तर पर या राष्ट्रीय स्तर पर गठित
देशीय (ग्रुपों) समूहों और गांवों के सदस्य समूहों को भी प्रदान की जाती है। गैर
सरकारी संगठनों के अंतर्गत ऐसी परोपकारी और धार्मिक संस्थाएं समाविष्ट होती हैं जो
विकास कार्यों, खाद्य सामाग्री के वितरण और परिवार नियोजन सेवाओं के विभिन्न और
सामुदायिक संगठनों को प्रोत्साहन देने के लिए (गैरसरकारी) निजी तौर पर फंड (पैसे)
एकत्रित करती है। इनके अन्तर्गत स्वतंत्र समितियां, सामुदायिक संस्थाएं, पानी का
प्रयोग करने वाली सोसाइटियां (समाजिक समूह), महिला समूह तथा अन्य समूह भी आते
हैं। संक्षेप में जो समूह नागरिकों में जागरुकता पैदा करते हैं और प्रभावकारी नीतियाँ
अपनाते है। वे ही गैर सरकारी संगठन कहलाते हैं।

  1. गैर सरकारी संगठन लाभ अर्जित न करने वाला स्वयंसेवी, सेवा भाव
    वाला/विकास प्रवृत्ति वाला एक ऐसा संगठन है, जो अपने संगठन के मूल
    सदस्यों या जन समुदाय के अन्य सदस्यों के हितों के लिए काम करता है। 
  2. यह निजी व्यक्तियों द्वारा बनाया गया एक ऐसा संगठन है जो कुछ मूलभूत
    सामाजिक सिद्धान्तों पर विश्वास करता है, और अपनी गतिविधियों का गठन
    समुदाय के एक ऐसे वर्ग के विकास के लिए करता है जिसको वह अपनी सेवाएं
    प्रदान करना चाहता है। 
  3. यह एक समाज विकास प्रेरित संगठन है जो समाज को सशक्त और समर्थ
    बनाने में सहयोग देता है।
  4. यह एक ऐसा संगठन या जनता का एक ऐसा समूह है, जो स्वतंत्र रुप से कार्य
    करता है और इस पर किसी तरह का कोई बाहरी नियंत्रण नहीं होता। प्रत्येक
    (एन.जी.ओ.) गैर सरकारी संगठन के अपने कुछ खास उद्देश्य और लक्ष्य होते हैं,
    जिनके आधार पर वे किसी समुदाय, इलाके या परिस्थिति विशेष में उपयुक्त
    बदलाव लाने के लिए अपने निर्दिश्ट कार्यो को पूरा करते हैं। 
  5. यह स्वतंत्र लोकतांत्रिक और गैर-सम्प्रदायिक व्यक्तियों का एक ऐसा संगठन है
    जो आर्थिक और सामाजिक स्तर से नीचे के स्तर के लोगों के समूहों को
    सशक्त-समर्थ बनाने का काम करता है। 
  6. यह एक ऐसा संगठन है जो किसी भी राजनीतिक समूह से जुड़ा नहीं होता और
    आम तौर पर जनसमुदाय को मदद देने, उनके विकास और कल्याण के कार्यो में
    जुड़ा रहता है। 
  7. यह एक ऐसा संगठन है जो जन समुदाय द्वारा बनाए जाते हैं या जन समुदाय
    के लिए बनाए जाते हैं, और जिनमें सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होता या
    बहुत ही कम होता है। ये धर्मार्थ संगठन ही नहीं होते बल्कि, ये
    सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक गतिविधियों का भी आयोजन करते हैं। गैर
    सरकारी संगठनों को इन नामों से भी जाना जाता है, 
    • स्वयं सेवी संगठन (VOs)
    • स्वयं सेवी एजेन्सियां (VAs)
    • स्वयं सेवी विकास संगठन  (VDOs)
    • गैर सरकारी विकास संगठन  (NGDOs)

 गैर सरकारी संगठनों तथा स्वयं सेवी संगठनों में कुछ अन्तर भी पाए जाते है जो हैं :-

गैर सरकारी संगठन (NGO) स्वयं सेवी संगठन (VO)
1.  मानदेय/पारिश्रमिक सहित कार्य
करता है
किसी मानदेय की आशा नहीं करता।
2.  मन के अनुरुप कार्यो का सुनिश्चित
किन्तु अवधि, आरंभ, समापन
सम्बन्धी नियंत्रण वित्त प्रदाता संस्था
मन के अनुरुप कार्यों का चुनाव किन्तु
अवधि, आरंभ, समापन सम्बंधी स्वनियंत्रण
का
3.  निश्चित संविधान, पंजीयन,
पदाधिकारी और कार्य पद्धति
अनिवार्यता नहीं।
4.  नियमित कार्यकाल एवं कार्यावधि
होती है
आवश्यकता नहीं।
5.  चाहे तो स्वयंसेवी संगठन की तरह
पारिश्रमिकविहीन कार्य भी कर
सकता है।
चाहे तो गैर सरकारी संगठन की तरह
कार्य कर सकता है। शर्ते पूरी करनी
होगी’-ऐच्छिक रुपेण।
6.  दस्तावेजों का संधारण करने की
अनिवार्यता होती है।
वस्तुत: संक्षेप में गैर सरकारी संगठन को हम इस प्रकार से समझ सकते हैं – 
  1. वयस्क व्यक्तियों का ऐसा संगठन, जो स्वतंत्र रुप से गठित किया गया हो। 
  2. संगठन की वैधानिकता कानूनों और सरकार की नीतियों के परिप्रेक्ष्य में प्रामाणित
    हो।
  3. शासन के किसी विभाग के व्यक्तियों की सेवा के अन्तर्गत किए जाने वाले कार्यो
    के क्रियान्वयन हेतु उसे गठित न किया गया हो।
  4. प्रजातांत्रिक मूल्यों व पद्धतियों पर विश्वास अभिव्यक्त होता हो। 

आवश्यकता को जन्म देने में जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि सरकार चलाते हुए,
नौकरशाहों को यह सिखाने में असफल ही रहे हैं कि उनका कत्तर्व्य भारत के
बहुसंख्यक समाज का जिसमें गरीब, शोशित, पीड़ित और पिछड़ो की तादाद भरी पड़ी
है, कल्याण करना और उन्हें मुसीबतों के दुश्चक्र से निजात दिलाना ही है। उलटे
नौकरशाहों और बाजारीकरण की नयी दवा ने सरकारों को जल्दी से जल्दी
कल्याणकारी मानसिकता से अपना पिंड छुड़ा लेना चाहिए। सरकारों ने इसमें इतना
आकर्षण देखा कि उन्होंने इस पर अमल करने में जरा भी देर नहीं लगाई। शिक्षा,
स्वास्थ्य और सामाजिक-विकास के क्षेत्रों में इसके दुष्परिणामों की झलक भी दिखाई
देने लगी है। सरकारी कार्यालयों के अधिकारी और कर्मचारी एक ऐसी ‘‘सरकारी
संस्कृति’’ में ढल गए हैं, जो उन्हें आम-नागरिकों से अलगांव रखने के लिए दुश्प्रेरित
करती है। उनके कक्ष के बाहर पीड़ित आरै फरियादी लोगों की भीड़ लगी रहती है
और वे अंदर बेहद इत्मीनान से फाइलों पर या तो झुके रहते हैं या फोन पर बातें करते
हैं, कोई जरुरतमंद पहुंच जाए तो उसकी सुनवाई नहीं होती और उसे नजरअंदाज कर
दिया जाता है। अत्एव जन संस्कृति के ज्ञान के लिए पिछड़ों के लिए, गरीबों, किसानों,
महिलाओं, बच्चों, शहरी मलिन-बस्तियों तथा पहाड़ी और घुमंतु जातियों का अनौपचारिक
अध्ययन गैरसरकारी संगठनों के लिए अनिवार्य हो जाता है और यही इन संगठनों की
आवश्यकता की जननी भी मानी जा सकती है। गैर सरकारी संगठनों की अवधारणा को वास्तविक रुप से एक उदाहरण समझा सकता
है जो कि है :-इस दुनिया में ऐसे लोग भी हैं जो व्याकुल भी हैं और
बेचैन भी है, क्योंकि वो बनी बनायी जीवन शैली और बंधी -बंधायी जिन्दगी से सहमत
नहीं होते। उनके लिए व्याकुलता ही ऐसे लोगों की पूंजी होती है, वही दुनिया को बदल
डालने का करगर औजार भी होती है। और इसी के दम पर समाज का बिगड़ा स्वरुप
बदलता है। तभी शेष समाज को हैरानगी होती है और वह कुछ कुछ अवाक हो जाता
है कि अरे हमने पहले ऐसा क्यूँ नहीं सोचा ? 

अत: मूल रुप में गैर सरकारी संगठन की ‘अवधारणा’ के अन्तर्गत हम इसे एक ऐसी
संस्था के रुप में परिकल्पित करते हैं, जिसकी संरचना कुछ व्यक्तियों ने मिलकर या
व्यक्तियों की एक समिति ने मिलकर की हो। इसका एक निश्चित नाम तथा उद्देश्य
होता है। यह संगठन पंजीकृत भी हो सकता है, और नहीं भी। परन्तु जब यह संगठन
कोई लोकोपकारी या अन्य सामाजिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए बाहर से वित्तीय
सहायता प्राप्त करना चाहता है तो धन मुहैया कराने वाली एजेंसियां (अन्तर्राश्ट्रीय तथा
राष्ट्रीय) चाहती है कि वो एक वैध संगठन को ही दान स्वरुप धन दें तथा वह वैधता
की कसौटी पर खरी उतरें। और यह वैधता हर संगठन के लिए आवश्यक होती है
और यह स्वरुप तभी प्राप्त होता है जब व्यक्तियों के समूह को किसी लागू कानून के
अन्तर्गत पंजीकृत करा दिया गया हो। कानून जो कि किसी भी संगठन हेतु आवश्यक है
वो इस प्रकार है:- 
  1. एक धमार्थ ट्रस्ट के रुप में; 
  2. सोसाईटी पंजीकरण अधिनियम के तहत एक सोसाइटी के रुप में, 
  3. कम्पनी अधिनियम, 1956 की धारा 25 के अन्तर्गत एक लाईसेंस प्राप्त कम्पनी के
    रुप में पंजीकृत हो। 

गैर सरकारी संगठन के प्रकार्य 

सरकार ने अपनी राज्य नीति के निर्देशित सिद्धांतों के तहत राज्य को कल्याणकारी
राज्य का दर्जा दिया है। अत: निश्चित रुप से सोसाइटी और सामाजिक संगठनों के
लिए यह आवश्यक हो जाता है, कि वे भी अनाथ, दलित और कमजोर वर्गो (महिला
और बच्चों) की समस्याओं को हल करने के लिए उनकी मूलभूत आवश्यकताओं और
सुविधाओं को प्रदान करने के लिए अपनी विशेष भूमिका निभाएं। सरकार ने नागरिकों के
जीवन स्तर और उनकी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए, कुछ योजनाएं निर्धारित
की है जिनमें (एन.जी.ओ) गैर सरकारी संगठन और स्वयं सेवी संगठन अपना योगदान
दे सकते हैं। इनका विस्तृत उल्लेख नीचे किया है :- 
  1. वृद्धों का संरक्षण 
  2. कृषि 
  3. पशुकल्याण 
  4. कला व दस्तकारी 
  5. शिशु कल्याण 
  6. शहर और नगर 
  7. संस्कृति और धरोहर 
  8. विकलांगता 
  9.  शिक्षा 
  10. पर्यावरण 
  11. स्वास्थ्य 
  12. मानव संसाधन 
  13. ग्रामीण विकास 
  14. जनजातीय लोग 
  15. कूडे़ -कर्कट का नियंत्रण 
  16. महिला विकास 

अन्य सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियां और भी कई अन्य क्षेत्र ऐसे हैं
जो कि एन.जी.ओ को कार्यों के तहत आते हैं। वस्तुत: समाज के कल्याण
हेतु हर एक क्षेत्र ही गैरसरकारी संगठनों के कार्यो व उद्देश्यों के तहत आते
हैं। 

मुख्य रुप से इन कार्यो को गैरसरकारी संगठनों के प्रकार्यो के रुप में
अपेक्षा की जाती है, –

गैरसरकारी संगठन:- 

  1. जन-संस्कृति के साथ तालमेल को तत्पर रहते हैं। 
  2. खदु को जनता का हिस्सा मानते हैं व जन-मनोविज्ञान को समझने की चेष्टा
    करते हैं। 
  3. अपने कार्यकाल से उनका उतना ही सरोकार होता है, जितना रिकार्ड –
    रजिस्टर आदि के संधारण के लिए आवश्यक होता है। 
  4. वे किसी कार्यविधि के अधीन नहीं होते। 
  5. विकास की समग्रता व निरंतरता ही उनका सबसे बड़ा मुद्दा होता है।
  6. मशीनी-प्रक्रिया और लक्ष्य पर आधारित कार्य उनके लिये अस्प्रष्य होते हैं। 
  7. उनके मन में सामाजिक मूल्य तथा विशेष अवधारणाएं होती है। इन्ही की
    स्थापनाओं के लिए वे कार्य करते हैं। 
  8. वे उन्ही परियोजनाओं का चुनाव करते हैं जो उनके मूल उद्देश्यों और
    अवधारणाओं के अनुकूल हों। 
  9. अपने कार्यों में लोकतांत्रिक पद्धति तो अपनाते ही हैं, संगठन में उसे वरीयता देते
    हैं। 
  10. सामूहिक चर्चाओं और विचार-विमर्श से निश्पादित निर्णयों को ही अंगीकृत करते
    हैं।
  11.  पारदर्षिता और सुचिता उनकी कसौटी होते हैं। 
  12. वे लोकप्रियता की बजाय जन आस्था से भरपूर होते हैं। 
  13. वे राष्ट्रीय नीतियों और अंतरराष्ट्रीय रुझानों को भी ध्यान में रखते हैं। 
  14. नैसर्गिक न्याय समतामूलक समाज के निर्माण में आस्था रखते हैं। 
  15. धर्म, लिंग जातिगत भेदभाव से दूर होते हैं।
  16. जन अधिकारों के प्रति सजग रहना उनका प्रकार्य व दायित्व होता है। 
  17. अपने ज्ञान व कोषल को सदैव परिभाषित करते रहते हैं। 
  18. सतत् अध्ययन और सहचिंतन जीवन का अभिन्न अंग होता है। 

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