सहकारी आंदोलन क्या है?

अनुक्रम
सहकारिता के विचार ने भारत में ठोस रूप सबसे पहले उस समय ग्रहण किया जब गॉवों में विधमान ऋृण भार का सामना करने के लिए 1904 में सहकारी ऋण समितियां अधिनियम पारित हुआ। इस अधिनियम में केवल ऋण समितियों की रचना के लिए ही व्यवस्था की गयी थी इसलिए गैर ऋण समितियों की रचना के लिए 1912 में एक दूसरा अधिनियम पास किया गया। दूसरी प्रकार की समितियों का काम गॉव के उत्पादन, क्रय विक्रय बीमा तथा आवास आदि का व्यवस्था करना था। इसके पष्चात भारत सरकार द्वारा 1914 में नियुक्ति की गयी मैकलेगन समिति ने सहकारी आन्दोलन में अधिकाधिक गैर सरकारी सहयोग के लिए सिफारिष की।

सहकारी अधिनियम 

1919 के अधिनियम के अनुसार यद्यपि सहकारिता को प्रान्तीय सरकार का विषय बना दिया गया तथापि भारत इस आन्दोलन के विकास में रूचि लेता रहा और 1935 में रिजर्व बैक में एक ‘कृषि ऋण विभाग’ खोला गया। 1945 में भारत सरकार द्वारा सहकारी योजना समिति नियुक्त की गयी जिसने यह सिफारिष की कि प्राथमिक समितियों की बहुउद्देशीय समितियों में बदल दिया जाय,ख्यउे। इसने एक सुझाव यह भी रखा कि रिजर्व बैक सहकारी समितियों की अधिक सहायता दे।

रिजर्व बैक का सर्वेक्षण 

1951 में रिजर्व बैक ने एक निर्देशन समिति नियुक्त की जिसने देश की ग्रामीण ऋण व्यवस्था का सविस्तार सर्वेक्षण किया और दिसम्बर 1945 में अपना प्रतिवेदन प््रकाशित कर दिया। सर्वेक्षण से पता चला कि ग्रामीण ऋण के क्षेत्र में 40 वर्षों के सहकारी प्रयास के बावजूद गॉवों में महाजनों और व्यापारियों का ही बोलबाला रहा। उन लोगों के लाभ के लिए जिनका सभी ओर से शोषण होता हो सामाजिक आर्थिक नीतियों के परिपालन के विषय में सहकारी आन्दोलन की सार्थकता स्वीकार करते हुए समिति इस निश्कर्ष पर पहुॅची की अभी तक असफल होने के बावजूद सहकारी आन्दोलन सफल अवश्य होगा और इसकी सफलता के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा की जानी चाहिए। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए समिति ने ग्रामीण ऋण के सम्बन्ध में एक संगठित योजना सुझायी। इस योजना के सम्बन्ध में यह आवश्यक है कि सरकार सभी प्रकार की सहकारी संस्थाओं में भाग ले, ऋण सम्बन्धी तथा अन्य आर्थिक कार्यो के बीच पूर्ण समन्वय स्थापित किया जाये, प्राथमिक कृषि ऋण समितियों का विकास किया जाए, गोदामों आदि की सुविधाओं की व्यवस्था हो। समिति ने इम्पीरियल बैक ने राष्ट्रीयकरण के लिए भी सिफारिष की जिससे वह अपनी “ााखाओं के माध्यम से सहकारी तथा अन्य बैकों को भुगतान आदि की अधिक सुविधाएॅ दे सके।

सहकारी विकास के विभिन्न कार्यक्रमों में समन्वय स्थापित करने तथा राजय सरकारों की सहायता देने के उद्देश्य से समिति ने ‘रिजर्व बैक ऑफ इण्डिया अधिनियम’ में उपयुक्त संशोधन करने तथा केन्द्र में एक ‘राष्ट्रीय सहकारी विकास एवं गोदाम मंडल’ स्थापित करने का भी सुझाव दिया।

समिति की सिफारिसों के अनुसार ‘रिजर्व बैक ऑफ इण्डिया अधिनियम’ में मई 1955 में संशोधन कर दिया गया। एक संशोधन के अनुसार रिजर्व बैक आफ इण्डिया को दो निधियॉ चालू करने का अधिकार दे दिया गया-
  1. राष्ट्रीय कृषि ऋण (दीर्धकालीन) निधि तथा 
  2. राष्ट्रीय कृषि ऋण (स्थिरीकरण) निधि।
पहली निधि फरवरी 1956 में 10 करोड़ रूपये के प्रारम्भिक विनियोग के साथ चालू कर दी गयी जिसमें 1955-56 तथा 1957-58 में 5.5 करोड़ रूपये और सम्मिलित कर दिए गये। इसी प्रकार दूसरी निधि भी 1 करोड़ के प्रारम्भिक विनियोग के साथ 1956-57 में स्थापित की गयी जिसमें 1956-57 में 1 करोड़ रूपये और सम्मिलित कर दिए गये।

सरकार की ओर से ‘कृषि उत्पादन (विकास एवं गोदाम) निगम अधिनियम’ के अन्तर्गत 1 सितम्बर 1956 को एक ‘राष्ट्रीय सहकारी विकास एवं गोदाम मंडल’ स्थापित कर दिया गया। इसी अधिनियम के अन्तर्गत 2 मार्च 1967 को एक ‘केन्द्रीय गोदाम निगम’ भी स्थापित किया गया।

स्ंसद के एक अधिनियम के अन्तर्गत इम्पीरियल बैक पर सरकार द्वारा अधिकार कर दिये जाने के फलस्वरूप 1 जुलाई 1955 को भारत के सरकारी बैक (स्टेट बैक) की भी स्थापना हुई। इस बैक का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य अपनी शाखाओं का व्यापक रूप् से विस्तार करना है। इसके अनुसार स्टेट बैक ने दिसम्बर 1957 के अन्त तक देश में अपनी 157 शाखाए स्थापित कर ली।

सहकारी कर्मचारियों का प्रशिक्षण 

इसी प्रकार सहकारी कर्मचारियों के प्रशिक्षण की योजनाओं का कार्य भी आरम्भ किया जा चुका है। केन्द्रीय सहकारी प्रशिक्षण समिति ने सभी प्रकार के सहकारी कर्मचरियों के प्रशिक्षण की एक सविस्तार योजना भी तैयार कर ली है। इस योजना के अन्र्तगत सहकारी विभागों के उच्च अधिकारियों के प्रशिक्षण के लिए पूना में एक अखिल भारतीय सहकारी प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त अन्य कई प्रशिक्षण केन्द्र और भी है। 5 प्रादेशिक प्रशिक्षण केन्द्रों में सहकारी हाट व्यवस्था के विशेष पाठ्यक्रमों तथा इनमें से एक केन्द्र में भूमि के बन्धक रखे जाने से सम्बन्धित बैकिंग के विशेष पाठ्यक्रम की व्यवस्था की गयी है।

ग्रामीण ऋण सर्वेक्षण समिति 

ग्रामीण ऋण सर्वेक्षण समिति की सिफारिशों के अनुसार द्वितीय योजना काल में सहकारी विकास का एक संगठित कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की जा चुकी है। द्वितीय पंचवष्र्ाीय योजना में अल्पकालीन सहकारी ऋण के लिए 1.50 अरब रूपये, मध्यकालीन ऋण के लिए 50 करोड़ रूपये तथा दीर्धकालीन ऋण के लिए 25 करोड़ रूपये का लक्ष्य रखा गया है जो सहकारी समितियों द्वारा कृषकों को 1960-61 के अन्त तक प्राप्त हो चुकेंगे। योजना में 10400 बड़ी समितियों, 1800 प्राथमिक हाट व्यवस्था समितियों, 35 सहकारी चीनी कारखानों, 48 सहकारी कपास ओटाई मिलों तथा 118 अन्य सहकारी विधायन समितियों के संगठन के लिए भी व्यवस्था की है। केन्द्रीय तथा राज्यीय गोदाम निगमों द्वारा 350 गोदामों, हाट व्यवस्था समितियों के लिए 11500 गोदामों तथा बड़ी प्राथमिक कृषि ऋण समितियों के लिए 4000 गोदामों के निर्माण की व्यवस्था की गयी है। सरकारी विकास के क्षेत्रों में रिजर्व बैक ऑफ इण्डिया ने महत्वपूर्ण कार्य किया है। इसका एक महत्वपूर्ण कार्य सहकारी आन्दोलन के लिए वित्त की व्यवस्था करना है।

सहकारी आन्दोलन के स्तर 

सहकारी आन्दोलन सामान्यत: 3 हिस्सों में बॅटा हुआ है, जिसके अनुसार राज्य स्तर पर शीर्श समितियॉ, जिला स्तर पर केन्द्रीय समितियॉ तथा ग्राम स्तर पर प्राथमिक समितियॉ स्थापित की जाती है। 5 व्यक्तियों से मिलकर बने एक औसत भारतीय परिवार को आधार मानकर साधारणत: यह अनुमान लगाया जा सकता है कि 1955-56 के अन्त तक 8.81 करोड़ व्यक्तियों अथवा 22.8 प्रतिशत भारतीय जनता को सहकारिता का लाभ मिलने लगा था।

1955-56 में देश में कुल 240395 सहकारी समितियॉ थी जिनके सदस्यों की संख्या 17621978 थी और जिनकी चालू पूॅजी कुल मिला कर 4 अरब 68 करोड 81 लाख 69 हजार रूपये की थी। 1955-56 में सहकारी समितियों को 626.95 लाख रूपये का लाभ हुआ जिसमें से राज्यीय तथा केन्द्रीय बैक को 114.56 लाख रूपये का राज्यीय तथा केन्द्रीय गैर ऋण समितियों को 123.63 लाख रूपये का, प्राथमिक कृषि ऋण समितियों को 139.80 लाख रूपये का, अनाज बैकों को 17.25 लाख रूपये का, प्राथमिक कृषि गैर ऋण समितियों को 2.80 लाख रूपये का, प्राथमिक गैर कृषि ऋण समितियों को 143.21 लाख रूपये का, प्राथमिक गैर कृषि ऋण समितियों को 71.59 लाख रूपये का तथा भूमि बन्धक बैकों को 14.11 लाख रूपये का लाभ हुआ।

प्राथमिक समितियॉ 

गॉव के स्तर पर संगठित तथा व्यक्तिगत सदस्यों वाली प्राथमिक समितियॉ सहकारिता के आधार का काम करती है। जून 1956 के अन्त में सभी प्रकार की 240395 सहकारी समितियॉ में से 236426 प्राथमिक समितियॉ थी। वे अधिकांषत: (178443) ऋण सम्बन्धी कार्य ही करती थीं जिनमें से 168410 समितियॉ कृषि ऋण का तथा 10033 समितियॉ कृषि भिन्न ऋण का काम करती थी। शेष 30268 कृषि गैर ऋण समितियॉ की संख्या बढ़कर 3232400 हो गयी तथा इन प्राथमिक समितियों की सदस्य संख्या लगभग 52721 थी।

1955-56 में कृषि सम्बन्धी ऋण समितियॉ अनाज बैक, गैर ऋण समितियॉ तथा प्राथमिक भूमि बन्धक बैक और कृषि भिन्न ऋण समितियॉ गैर ऋण समितियॉ तथा बीमा समितियॉ क्रमश: 159939; 8169; 30268 तथा 308 और 10003; 27745 तथा 30 थी। इनके सदस्य क्रमश: 7790850; 730428; 2391826 तथा 313827 और 3072600; 3322447; 286521 थे।
  1. कृषि ऋण समितियॉ (Agricultural credit Societies)- जून 1956 के अन्त में कृषि ऋण समितियॉ की चालू पूॅजी 7910 करोड़ रूपये की थी। 1955-56 में 49.62 करोड़ रूपये के ऋण दिए गये, 59.84 करोड़ रूपये के अदत्त ऋण तथा 14.69 करोड़ रूपये के पिछले ऋण थे। 1966.67 में यह राशि 282510 और बढ़ गयी। सहकारिता आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य उसके आरम्भ काल से ही कृषकों के लिए कम ब्याज पर वित्त की व्यवस्था करना रहा है जिसे वे सुगमता से दे सकें। इस दिशा में थोड़ी ही सफलता प्राप्त हुई क्योंकि ब्याज की दरें फिर भी ऊॅची ही रही।
  2. कृषि गैर ऋण समितियॉ-(Agricultural Non-Credit societies)- ये समितियॉ बीज, खाद तथा मषीनी औजार जैसी वस्तुएॅ खरीदने के कृषि सम्बन्धी कार्य करती है। 1955-56 में ऐसी समितियॉ में से क्रय तथा विक्रय, उत्पादन तथा विक्रय उत्पादन, समाज सेवा तथा आवास सम्बन्धी समितियॉ क्रमश: 2761; 15068; 6530; 5681 तथा 228 थी जिनके सदस्य क्रमश: 451070; 1348757; 389636; 195558 तथा 6805 थे।
  3. गैर कृषि ऋण समितियॉ (Non-agricultural Credit societies) - इन समितियों में कर्मचारी ऋण समितियॉ तथा शहरी बैक भी सम्मिलित रहते है। 1955-56 में इनके निक्षेप 53.54 करोड़ रूपये (चालू पूॅजी का 62.44 प्रतिशत) के थे। इस वर्ष 2.42 करोड़ रूपये का सामान प्राप्त हुआ तथा 2.27 करोड़ रूपये की बिक्री हुई। जून 1967 के अन्त तक इन समितियॉ की संख्या 13616 थी और इनमें 194.03 करोड़ करोड़ रूपये डिपाजिट थे।
  4. गैर कृषि गैर ऋण समितियॉ (Other Non Agricultural Credit societies) - इन समितियों में से क्रय तथा विक्रय, उत्पादन तथा विक्रय, उत्पादन, समाज सेवा, आवास तथा बीमा सम्बन्धी समितियॉ क्रमश: 8177; 11524; 2557, 2728 तथा 30 थी जिनके सदस्यों की सख्या क्रमश: 1630, 229; 932608; 154540; 150470; 171579 तथा 283021 थी।
  5. प्राथमिक भूमि बन्धक बैक (Primary Land Mortgage Banks)- 1955-56 के अन्त में देश में 302 प्राथमिक भूमि बन्धक बैक थे जिनके सदस्यों की संख्या 313827 थी। इन बैकों ने 1.74 करोड़ रूपये के ऋण दिए तथा इनकी चालू पूॅजी 1.35 करोड रूपये की थी। ऋण लेने वाले से साढे़ 5 से 10 प्रतिशत ब्याज लिया गया।

केन्द्रीय समितियॉ

ग्राम स्तर की प्राथमिक समितियों तथा राज्यीय स्तर की शीर्ष समितियों के बीच जिला स्तर की 3 प्रकार की केन्द्रीय समितियॉ होती है-
  1. केन्द्रीय बैक तथा बैक संघ (Cental banks and federations)- केन्द्रीय सहकारी बैकों का मुख्य कार्य उससे सम्बद्ध बैकों के बीच सन्तुलन स्थापित करना तथा प्राथमिक समितियों के लिए धन उपलब्ध कराना है। 1955-56 में देश में 478 केन्द्रीय बैक संघ थे जिनके सदस्यों की संख्या 299555 थी, जिन्होंने 79 करोड़ 83 लाख 43 हजार रूपये के ऋण दिए तथा जिनकी चालू पूॅजी 92 करोड़ 66 लाख 65 हजार रूपये की थी।1955-56 के अन्त तक केन्द्रीय सहकारी बैकों ने 23.28 करोड़ रूपये का विनियोग कर रखा था जिसमें से 13.06 करोड़ रूपये सरकारी तथा अन्य न्यासी सिक्योरिटियों में लगे हुए थे। 1966-67 में इन बैकों की संख्या 346 तथा सदस्य संख्या 352365 थी तथा 49935 लाख रूपये ऋण में दिए गये थे।
  2. केन्द्रीय गैर ऋण समितियॉ (Central non-credit societies)- इन समितियों में से हाट व्यवस्था, थोक तथा उपलब्धि, औद्योगिक, दुग्ध तथा अन्य प्रकार के संघ क्रमश: 2354; 114; 113; 67; तथा 116 थे जिनके सदस्यों में व्यक्ति तथा समितियॉ क्रमश: 1803369; तथा 45365; 9443 तथा 12275 तथा 10164 तथा 3534; 9086 तथा 1276 और 12479 तथा 4469 थी।
  3. केन्द्रीय भूमि बन्धक बैक (Central land mortgage banks)- केन्द्रीय भूमि बन्धक बैक अपनी निधियों की पूर्ति मुख्यत: ऋणपत्र जारी करके करते है जो राज्य सरकार द्वारा प्रत्याभूत होते है। 1955-56 के अन्त में 14.94 करोड़ रूपये के ऋणपत्र जारी थे और देश में ऐसे 9 बैक थे जिनके सदस्यों की संख्या 90786 थी।
  4. शीर्ष समितियॉ : राज्य स्तर पर कार्य करने वाली शीर्ष समितियॉ अपने से सम्बद्ध जिला स्तर की समितियॉ के संतुलन केन्द्रों के रूप में कार्य करती है। ये समितियॉ दो प्रकार की होती है- 1. सरकारी बैक तथा 2. सरकारी गैर ऋण समितियॉ।
    1. सरकारी सहकारी बैक (Government Cooperative banks)- 1955-56 में देश में 24 सरकारी सहकारी बैक थे जिनके सदस्य 36394 तथा जिनकी चालू पूॅजी 63 करोड 33 लाख 93 हजार रूपये की थी।
    2. सरकारी गैर ऋण समितियॉ Government non Credit Societies)- 1955-56 में इनमें से हाट व्यवस्था थोक तथा उपलब्धि, औद्योगिक, आवास तथा अन्य प्रकार के संघ क्रमश: 1995245 तथा 25 थे जिनके सदस्यों में व्यक्ति तथा समितियॉ क्रमश: 4014 तथा 3535; 1839 तथा 827; 1693 तथा 4579; 512 तथा 534 और 4295 तथा 1066 थी।

अन्य संस्थाए

  1. निरीक्षण संघ (Supervision federation)- 1955-56 में देश में 582 निरीक्षण संघ थे जिनसे 39254 समितियॉ सम्बद्ध थी। इन समितियों की सदस्य संख्या 3285936 तथा इनकी चालू पूॅजी 5424 करोड़ रूपये की थी। 1966-67 में निरीक्षण संघ 788 हो गये और इनसे 45510 समितियॉ सम्बद्ध थी।
  2. सहकारी संघ तथा सहकारी संस्थाए Cooperative federation and Cooperative institutions)- जून 1956 के अन्त में देश में ऐसे 30 संघ थे जिनसे 41267 प्राथमिक तथा 713 केन्द्रीय समितियॉ सम्बद्ध थी। और इनके व्यक्तिगत सदस्य 1120 थे। इनको 3955 लाख रूपये की कुल आय हुई तथा इन्होंने कुल 45.32 लाख रूपये व्यय किये।
  3. बीमा समितियॉ (Insurance societies)- जून 1956 के अन्त में देश में 24 सहकारी जीवन बीमा समितियॉ थी जिनके सदस्य 278543 थे और जिन्होंने 5.25 करोड रूपये की बीमा राशि के लिए 39503 बीमा पत्र जारी किये। इनके अतिरिक्त 4 अग्नि तथा सहकारी सामान्य बीमा समितियॉ भी थी। 2 सहकारी मोटर बीमा समितियों ने 1955-56 में 2165 बीमापत्र जारी किये। 1955-56 के आरम्भ में 13616 सहकारी समितियॉ भंग की जा रही थी तथा इस वर्ष 2335 नयी समितियॉ पंजीकृत की गयी।

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