विकास के सिद्धान्त का अर्थ, परिभाषा एवं प्रारूप

अनुक्रम
विकास का व्यक्ति, समूह और समाज पर प्रभाव पड़ता है और सामाजिक परिवर्तन का विकास से सह-सम्बन्ध है। विकास का प्रारूप आर्थिक हो अथवा सामाजिक, राजनैतिक हो अथवा संसथागत, भौतिक हो अथवा अभौतिक जन-भावना की सन्तुश्टीकरण से सैद्धान्तिक रूप से जुड़ा है।

विकास के सिद्धान्त का अर्थ एवं परिभाषा

विकास एक उध्र्वगामी प्रक्रिया है जिसे नियोजित किया जाता है। विकास एक पक्षीय अवधारणा है। विकास की केवल एक ही गति है उध्र्वगामी विकास। विकास एक मुल्यात्मक अवधारणा है जिसके साथ किसी न किसी रूप में मूल्य अवश्य जुड़ा होता है। मूल्य से तात्पर्य है वह अवधारणा जिसके साथ सामाजिक ता का समर्थन व्यापक रूप से विद्यमान होता है। विकास एक सचंतन प्रक्रिया है। विकास सम्बन्धी कार्य दूसरा विकास के परिणाम की स्थिति।

विकास से सिद्धान्त से तात्पर्य है विकास के वे नियम जिन्हें समाज समय-काल परिस्थिति के अनुसार अपनाया और जिनका प्रारूप विचारधारायें उद्देश्यों और लक्ष्यों के अनुरूप रही और जिनका गर समाज के लिए सामान्य परिणाम रहा अर्थात जिनका विश्वव्यापी उपयोग रहा और आधार वैज्ञानिक। विज्ञान के चरणों के आधार पर जो निश्कर्श निकालते जाते हैं औजिन निष्कर्शो में तटस्थता, सत्य और सर्वव्यापक उपयोग का गुण होता है उन्हें सिद्धान्त की संज्ञा दी जाती है और जिनका सीधा सम्बन्ध विकास से होता है उन्हें विकास से सिद्धान्त कहते हैं। विकास से सिद्धान्तों को प्रमुखतया आर्थिक, संस्थागत, प्रतिक्रियात्मक, वैश्विक आदि उपबन्धों में विष्लेशित किया जा सकता है।

आदम स्मिथ का सिद्धान्त 

अपनी पुस्तक ‘ऐन इन्क्वायरी इन्टू दी नेचर एण्ड कॉजेज आफ दी वेल्थ ऑफ नेशन्स’ जिसका प्रथम प्रकाशन 1776 में हुआ था और जो आर्थिक विकास के संदर्भ में प्रारम्भिक रूप से थी आदम स्मिथ का महत्वपूर्ण कार्य माना जा सकता है।
  1. प्राकृतिक नियम : आदमस्मिथ का मानना है कि आर्थिक कारोबार प्राकृतिक नियम पर आधारित है। प्रत्येक व्यक्ति अपने हितों का निर्धारक एवं निर्णायक होता है और यदि उसे स्वतंत्ररूप से कार्य करने दिया जाये तो वह अपना भला तो करेगा ही सार्वजनिक हित में भी कार्य करेगा और अपने अर्थ साध्य का अधिकतक रूप प्राप्त करने में सफल होगा और अपना धन अधिक से अधिकतम बनाने में सफल होगा। इसीलिये वे लैसे फेयर (Laisserz-Faire) की नीति के समर्थक थे और सरकारी मध्यस्थता विशेषकर उद्योग और वाणिज्य के क्षेत्र में होने का विरोध करते रहे।
  2. श्रमविभाजन : श्रमविभाजन से श्रमिक उत्पादन की वृद्धि में सुधार लाकर उत्पादन बढ़ायेगा क्योंकि (1) कार्यकुशलता बढे़गी (2) उत्पादन में श्रम-समय की बचत होगी और (3) श्रम बचाने वाले मशीनों का आविष्कार बढे़गा। परन्तु अंतिम परिणाम अर्थात मशीनों के अविष्कार और नये मशीनों का खोज हेतु पूंजी की आवश्यकता होगी। नये तकनीक, नये बाजार श्रमविभाजन बढ़ायेगा। वाणिज्य और अन्तर्राश्ट्रीय व्यापार में वृद्धि होगी। (3) पूंजी विस्तार से आर्थिक प्रगति होगी (4) राष्ट्रीय बचत की स्थिति उत्पन्न होगी। (5) अंतत: स्थिरता की स्थिति अर्थात् प्राकृतिक संसाधनों की कमी हो जायेगी, जनसंख्या वृद्धि, प्रतियोगिता, पूंजीस, लाभ सबकी स्थिति गतिहीन हो जायेगी। आदम स्मिथ के सिद्धान्त का आधार ग्रेट ब्रिटेन और योरप है विकासशील और बनने ही देता। शुम्पीटर साहसिय निवेशकों की भूमिका की अनदेखी मिलती है जबकि शुम्पीटर नयापन को विकास का आधार मानते हैं और नयापन परिवर्तन का आधार भी है और विकास का भी।

रिकोर्डो का सिद्धांत 

डैविड रिकार्डो अपनी पुस्तक’ दी प्रिन्सीपुल्स आफ पोलिटिकल इकानामिक एंड टैक्शेशन’ जिसका प्रकाशन 1917 में हुआ था ऐसे विचारों से भरा हुआ है जिसे अनेक अर्थशास्त्री आर्थक विचारों से भरा हुआ है। जिसे अनेक अर्थशास्त्री आर्थिक विकास का आधार बनाया।
  1. रिकार्डियन सिद्धान्त का आधार ‘मारजिनल तथा’ सरप्लस’ सिद्धान्त राष्ट्रीय उत्पादन में खर्च के विवरण अर्थात ‘शेयर आफ रेन्ट से सम्बन्धित विवरण प्रस्तुत करता है और ‘सरप्लस’ सिद्धान्त बचे हुए भाग (शेयर ) का वेतन और लाभ में विभाजन बताता है। प्रमुख मान्यतायें जिन पर रिकार्डियन, सिद्धांत आधारित है:-
    1. सभी भूमि अन्न उत्पादन में प्रयोग की जाती है और कृशि में लगी हुई श्रमशक्ति से उद्योग में लगने वाली श्रमशक्ति का निर्धारण होता है। 
    2. कृषि से उत्पादन कम होने लगता है। 
    3. भूमि सीमित है। 
    4. अन्न की मांग कभी कम कभी अधिक होती है। 
    5. श्रमिकों तथा पूंजी की प्राप्ति बदलती रहती है। 
    6. श्रमिकों को निर्वाह हेतु ही वेतन प्राप्त होता है। 
    7. पूर्ण प्रतियोगिता होती है 
    8. लाभ में पूंजी निर्मित होती है। 
    9. भुमि स्वामी, श्रमिक, पूंजीपति तीन अर्थ व्यवस्था के आधार पर स्तम्भ होते है। 
    10. पूंजी बचत एवं बचत की इच्छा से बढ़ती है। 
    11. रिकार्डो स्वतंत्र व्यापार के समर्थक हैं। 
इनके सिद्धान्त में (1) तकनीतिक के प्रभाव का प्रभाव नहीं दर्शाया गया है।(2) सिद्धान्त का आधार ‘लैसे फेयरे’ नीति पर आधारित है जो अव्यवाहिक है।(3) संस्थागत कारकों की अवहेलना की गयी है जबकि संस्थायें विकास का आधार स्तम्भ है। (4) यह वितरण का सिद्धान्त है न कि विकास का सिद्धान्त है। (5) भूमि खाद्यान्न के अतिरिक्त अन्य पदार्थ भी उत्पन्न करता है।

थामस राबर्ट माल्थस का सिद्धान्त 

माल्थस की पुस्तक ‘प्रिंसिपुल्स आफ पोलिटिकल अकानामी’ का प्रकाशन 1820 में हुआ जिसके ‘बुक ‘जिसका शीर्शक है ‘‘ दी प्राग्रेस आफ वेल्थ ‘‘ में आर्थिक विकास का विश्लेषण है। इनका सिद्धान्त जनसंख्या का सिद्धान्त है:-
  1. आर्थिक विकास की अवधारणा- माल्थस का मानना था कि आर्थिक विकास अपने आप नहीं होता बल्कि जनसाधारण के प्रयासों से ही सम्भव है। 
  2. जनसंख्या वृद्धि और आर्थिक विकास केवल जनसंख्या में वृद्धि से ही विकास नहीं होता। पूंजी विस्तार से श्रमिकों की मांग बढ़ती है। 
  3. उत्पादन एवं वितरण सही अनुपात में राष्ट्र को विकास के पथ पर ले जाते है। 
  4. भूमि, श्रम, पूंजी और संगठन पर राष्ट्रीय आधारित होता है।
 इनका सिद्धान्त अनेक प्रकार से पिछडे़ देशों के लिये उपयोगी है। स्पेन, पुर्तगाल, हंगरी, टर्की, आयरलैण्ड तथा सम्पूर्ण एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के आर्थिक विकास के कारणों पर प्रकाश डाला है। कृशि के विकास से औद्योगिक क्षेत्र का विकास इन्होंने माना है कि बाधित होता है। गरीबी दूर करने के उपायों में इन्होंने भूमि सुधार पर बल दिया है। अविकसित देशों में आय का स्तर न्यून होता है, उपभोग की ओर रूझान उपभोग को बढ़ाती हैं और बचत का स्तर न्यूनतम। आवश्यक है कि सेवायोजन के स्तर को बढ़ाया जाये, आय वृद्धि हो, और विकास हेतु बचत हो।

जान स्टूअर्ट गिल का सिद्धान्त 

गिल 1848 में अपनी पुस्तक ‘प्रिंसिपुल्स आफ इकानमी प्रकाशित की। इन्होंने भूमि, श्रमिक और पूंजी को आर्थिक विकास का आधार माना। टूल्स, मशीन, श्रमशक्ति की गुणवता को ही सम्पति माना। गिल माल्युसियन की जनसंख्या सिद्धान्त के समर्थक थे। वर्कशक्ति को ही गिल जनसंख्या मानते रहे और तकनीकी प्रगति के फल से सिक्त होने की श्रमिकों की स्थिति को पूंजी वृद्धि का आधार माना वेतन वृद्धि पर उन्होंने बल दिया। लाभांस की बचत को पूंजीवृद्धि का आधार माना। लैसे फेयर में उनका विश्वास था। तकनीकी प्रगति, बचत पूंजीवृद्धि को पिछड़े देशों के विकास में सहायक माना।

कार्ल मार्क्स का सिद्धान्त 

मार्क्स और एंजिल्स की ‘कम्यूनिस्ट मैनीफेस्टो’ कार्लमाक्र्स की ‘दास कैपिटल’ में साम्यवाद की सामाजिक एवं
आर्थिक विकास की अन्तिम अवस्था की भविश्यवाणी का आधार उनका (1) इतिहास का भौतिकवादी विश्लेशण, (2) पूंजीवादी विकास की शक्तियों के प्रति अनादर का भाव, (3) आर्थिक विकास का सुनियोजित विकास में उनकी आस्था प्रमुख थी।

उनका विश्वास था कि इतिहास ‘उत्पन्न सम्बन्धों के आधार पर उत्पन्न ‘वर्ग संघर्श ‘ से भरा पड़ा है। शुम्पीटर ने ‘माक्र्सवाद’ को धर्म माना। माक्र्स ‘पूंजीपति’ और ‘सर्वहारा’ समाज को दो वर्गो में देखा। और उत्पन्न संर्घश को ‘सामाजिक क्रान्ति’ की संज्ञा दी। वह लाभ जो कवेल पूंजीपति ही सहेजते हैं और जो श्रमिकों के श्रम की देन है को उन्होंने ‘सरप्लस वैलू’ माना जा अन्तत: वर्ग संघर्श का कारण बनता है।

मार्क्स का सिद्धान्त पश्चिमी दुनिया में पूंजीवाद के विस्तार और सम्बन्धित समस्याओं से सम्बन्धित है।

शुम्पीटर का सिद्धान्त 

जोसेफ अन्नायस शम्पीटर की पुस्तक ‘थियरी आफ इकनामिक डेवलपमेन्ट जर्मन में 1911 में प्रकाशित हुई जिसका अंग्रजी रूपान्तर वर्श 1934 में आया। इनकी ‘विजिनेश सायकिल्स’ 1939 में और ‘कैपिटालिज्म, सोशलिज्म और डिमाक्रेसी 1942 में प्रकाशित हुई। शुम्पीटर ‘चक्रिय वहाब’ को आर्थिक व्यवस्था का प्रारूप मानते हैं और ‘नवीनता’ पर बल देते हैं और मानते हैं कि नये साहसिक व्यक्ति, नये उत्पाद, नये बाजार, नये तकनीक, नये कच्चे माल से नये उत्पाद, नये बाजार, नये तकनीक, नये कच्चे माल से नये उत्पाद विकास के मार्ग को प्रशस्त कर सकते हैं। नयापन लाने वाले कर्ता को आदर्शपुरश मानते हैं। आर्थिक विकास चक्रिय बहाव का परिणाम है। बैकिंग व्यवस्था पर उन्होंने बल दिया और पूंजीवाद से समाजवाद की ओर समाज का झुकावा माना है।

डब्लू0 डब्लू0 रोस्टो का सिद्धान्त 

प्रोफेसर रोस्टो की पुस्तक ‘दी स्टेजेज आफ इकानामिक ग्रोथ, 1960 में ‘दी प्रोसेस आफ इकनामिक ग्रोथ् 1953 में आयी । रोस्टो आर्थिक विकास के पाँच स्तर स्पश्ट किये :
  1. परम्परागत समाज का स्तर, 
  2. ‘टेक आफ’ से पूर्व का स्तर, 
  3. ‘टेक आफ’ का स्तर 
  4.  परिपक्वता का स्तर 
  5.  उच्च प्रकार के उपभोक्ता की स्थिति का स्तर, 
पहले स्तर को न्यूटोनियम विज्ञान से पूर्व की दशा का स्तर माना जिसमें तकनीक और विज्ञान और भौतिक संसार के प्रति रूझान तो कम न थी परन्तु ज्ञान का अभाव रहा तकनीक की कमी थी औजारों की कमी थी, कृशि आजीविका का प्रमुख साधन था। सामाजिक संरचना सोचानात्मक थी परिवार और वंशावली का बोलबाला था।

दूसरा स्तर ‘टेक आफ’ से पहले का था जिसमें चार शक्तियाँ -नया ज्ञान प्राप्ति जागरण की अवस्था, नये प्रकार का राजतंत्र, नया विश्व और नया धर्म अथवा सुधार की दशा की प्रमुख भुमिका रही। ‘आस्था’ और ‘शक्ति’ का स्थान ‘तर्क और अविश्वास/संदेह’ ने ले लिया। सामाजिक प्रवृत्ति प्रत्याशा, संरचना और मूल्यों में परिवर्तन आया और लगभग सभी क्षेत्रों में अनेक परिवर्तन हुए।

तीसरे ‘टेक-आफ के स्तर पर आधुनिकता की शक्तियों का आगमन हुआ। आदतों और संस्थाओं में भारी परिवर्तन आया। ग्रेट ब्रिटेन में यह स्तर 178-1802 में, फ्रांस में 1830-1860 और जापान में 1878-1900 और भारत तथा चीन में 1952 में प्रारम्भ हो गया था।

चौथा स्तर ‘परिकल्पना’ का आधुनिक तकनीक लगभग सभी संसााधनों के उपयोग में छा गयी थी और विकास धारणीय स्तर पर पहुँच गया था। ग्रेट ब्रिटेन में 1850, युनाइटेड स्टेटस में 1900 जर्मनी में 1910, स्वेडेन में 1930, जापान में 1940, रूस में 1950 और कनाडा में भी 1950 में तकनीकी परिपक्वता का स्तर आ गया था। लोग नगरीय बोलबाना, आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा का विकास होना प्रारम्भ हो गया था।

पांचवा अंतिम स्तर ‘उच्च उपभोक्ता’ के सार्वजनिक प्रारूप् का आया। नगरों की ओर प्रवास, स्वचालित, मशीनों, कारों, गृह सामग्रियों उपभोक्ता सामग्रियों का प्रचलन सामने आया। वितरण से मांग का स्तर उच्च होता गया।

विकास के संस्थागत, प्रतिक्रियात्मक और वैश्विक सिद्धान्त 

जीन हर्स (Jeanne Herseh) के शब्दों में शक्ति (Power) ‘‘वह योग्यता है जो वस्तुओं और व्यक्तियों पर अपनी धारणा लादी जाती है।’’ (Power is defined, in Jeanne Hersch’s words as the ability to impose one’s own will on things on human beings.) प्रत्येक मानव कार्यो में शक्ति व्यापत है। परम्परागत स्थायित्व का सिद्धान्त हो अथवा नियो-क्लाषीसिज्म (Neo-Classicism) हो आर्थिक सोंच में शक्ति का स्थान आधार स्तम्भ स्वरूप वाला है। शक्ति का प्रारूप बहुआयामी, तकनीकी, राजनैतिक तथा सामाजिक है। इसीलिए ‘सामूहिक जागरूकता’ (Collective Consciousness) की आवश्यकता सरकार को भी शक्ति के संदर्भ में पड़ती है। इसीलिए विकास के नये उपागम में जे0पी0 सारत्रे (J.P. Sartre) का कथन राष्ट्र के भीतर और राष्ट्रों में ‘बैड-फेथ’ विश्व समुदाय के सामने एक चुनौती बना हुआ है। और आज ‘हितों के संघर्श’ की स्थिति में संसार अवगत है और अग्रसर भी। आज इसी संदर्भ में संघर्श का औचित्य ढूढ़ने की आवश्यकता आ गयी है दो सान्य माडल्स वर्गीकरण और खोज की आवश्यकता हेतु केवल दशाओं से अवगत होने हेतु उद्धत किये जा सकते हैं और वे है (1) मैक्स वेबर मोडेल और दूसरा (2) एंटी-वेबर माडेल।

मॅक्स वेबर माडेल में तीन आदर्श प्रारूपों में औचित्य के आधार पर शक्ति बनती है आरै आधर हैं परम्परा, उपयोग, और चमत्कार जो पारस्परिक रूप में एक दूसरे का प्रभावित करती हैं और आदशर् प्रारूप निमिर्त करतीं है। विधिक निर्णयों के साथ औचित्य की अवधारणा विद्यमान होती है तभी निर्णय कार्यान्वित होती है। परन्तु अदालती निर्णय और चुनाव के निर्णय की कार्यविधियाँ अनेक संदेहों से परे होती है पर विचार करना आवश्यक है और औचित्य नैतिकता तो और भी विचारणीय है। ऐन्टी- वेबर माडेल को तो एक ही बात से अभिव्क्ति हो जाती है कि ‘हिन्सा के समापन से राजनीति का प्रारम्भ हो जाता है (Politics begings where violence ends)- विधिक रूप से हिंसा जो संस्थागत जीवन का ही प्रभाग है का गहन अध्ययन करके ही हिन्सा को कम किया जा सकता है  समाज विविध वर्गो का समग्र है और कछु की बातें ‘कहीं’ और कछु की ‘अनकही’ रह जाते हैं। संस्थागत जीवन में विवेचनाओं से अनेक बातें उभरकर सामने आती हैं। इस माडेल सांस्कृमिक परिवर्तन की दशायें प्रशस्त होती हैं। सांस्कृतिक आदान प्रदान बढ़ने से व्यक्ति की आन्तरिक दशायें सामने आयेगी प्रत्याशायें बढे़गी और विकास का स्तर सार्वभौमिक होगा। आर्थिक और सामाजिक विकास की अस दशा को समाज की आत्मा की जागृति की अवस्था कह सकते हैं। यूनेस्को ने अपने 1977-82 के योजना के पृ0 64 पैराग्राफ 3106 पर लिखी है कि *More and more, development is thought of as an awakening of the very soul of society.*

अत: आज का युग है, मानव क्षमताओं के पहचाननें की , पूंजी निवेश, पूंजी निर्माण, संरचनात्मक अभिवृद्धि, निर्माण, उत्पादन में वृद्धि, उत्पादन मशीनों के आयात निर्यात, उत्पादन के वितरण की। बहुआयामी अभिवृद्धि से वैश्विक आत्मनिर्भरता शान्ति प्रक्रिया, पर्यावरण सुधार, मानव संसाधनों का सदुपयोग और प्राकृमिक संसाधनों का सांस्ककृतिक उपयोग होगा। पारम्परिक सहयोग की दशाओं की वृद्धि होगा और विश्व की नयी विकास की नीति का आधार होगा। सबका सर्वाधिक विकास। नयी संस्थायें, नयी कम्पनियाँ, अन्तर्राश्ट्रीय कम्पनिया, प्रदान संयुक्त साहसिकता, वाणिज्य और उत्पादन सहयोग और प्रतिभागिता, ऋण, तकनीाकी आदान प्रदान, सभी का नयी नीति से क्रियान्वयन वैश्विक संरचना का विकास चरम सीमा पर पहुँच सकेगा 1980 में फर्दीनन्द टानीज की जर्मनी में योगदान सामाजिक सम्बन्धों को विकास के संदर्भ में दो भागों में (1) औद्योगिकरण के पूर्व और (2) औद्योगिक समाजों के रूप में अर्थात गेमीन्सैफ्ट और जेलेससैफ्ट प्रारूपों में देखा जा सकता है पहले में एकता और दूसरें में अनेकता का प्रकार विद्यमान होना। माक्र्स, वेबर, दुख्र्ाीम, लिन्डन, जोम्बाई ने भी इसी आधारभूत बात को स्पश्ट किया और डैनियल लर्नर ने अपनी पुस्तक ‘दी पासिंग आफ टे्रडिशनल सोसायटी में परम्परागत समाज को अ-सहभागी और आधुनिक समाज को सहभागी समाज माना। परन्तु टानीज की घनिष्टता सम्बन्ध, साथ-साथ रहने का सम्बन्ध गेमीन्सैफ्ट (समुदाय) की विशेषता है और जेसेलसैफ्ट (समाज) सार्वजनिक जीवन का प्रतिमान है जिसे संसार माना जा सकता है। इसी प्रकार का जोड़े वाली तुलना टालकर पारसन्स का पैटर्न वैरियेबुल्स का भी है। टालकट पारसन्स, इडवर्ड शिल्स, नेन जो स्मेल्सर, रावर्ट एफ0 बेल्स ने सामाजिक विकास की बात की। बेल्स की अनर्तक्रिया की प्रक्रिया का विवरण तीन प्रकार की विभिन्नताओ (1) सामूहिक कार्यो की विभिन्नता (2) विभिनन कार्यो में व्यक्तियों की विभिन्नता, और (3) कार्य की दशा में समय की विभिन्नता, से सम्बन्ध रखता है।

अमेरिकन मूल्यों की प्रवृति से सम्बन्धित कुछ बातें क्लाइड क्लूक्खोन (Clyde Kulchohn) ने की हैं वे निम्नांकित है:-
  1. ‘‘साहूहिक मूल्यों’’ की तुलना में व्यक्तिगत मूल्य का महत्व के हो रहे हैं भले ही वे एक संगठन के, एक समुदाय के, एक सामाजिक वर्ग के, किसी एक व्यवसाय, एक अल्पसंख्यक अथवा एक हित परक समूह के ही क्यों न हों। 
  2. ‘‘मनोवैज्ञानिक मूल्यों’’ जैसे मानसिक स्वास्थ्य सम्बन्धी, शिक्षा, बाल प्रशिक्षण से सम्बन्धित मूल्यों में बृद्धि हो रही है। 
  3. ‘‘सम्मानीय और सुरक्षा’’ के मूल्य ‘‘भावी सफलता’’ के मूल्य को पछाड़ रहे हैं।
  4. सौन्दर्य सम्बन्धी मूल्यों की वृद्धि हुई है। 
  5. संस्थागत धार्मिक मूल्य बढ़े है। 
  6. ‘‘विजातियता’’ अमेरिकन मूल्य व्यवस्था को संगठित करने लगी हैं।
  7. वह्य मूल्यों को बढ़ावा मिल रहा है। तात्पर्य है कि क्लूक्खोन और बेल की मान्यता है कि सामूहिक कृत्यों से समयान्तर परिवर्तन हो रहे हैं। जो स्तरों पर होती है। स्मेलर भी मानते हैं कि मूल्यों में परिवर्तन हो रहे हैं और वे संस्थागत जीवन के भाग बनते जा रहे हैं। 

डैनियल लर्नन की ‘‘पसिंग आफ टे्रडिशनल सोसाइटी’’ 

स्मेलक ने है संरचनात्मक- संस्थागत अर्थो में औद्योगिक युग के आगमन की बात कही है डैनियल लर्नन ने जीवन के झुकावों में मनोवैज्ञानिक-सांस्कृतिक झुकाव दर्शाया है जिनसे मूल्यों की प्राथमिकताओं में परिवर्तन आया है। ‘‘ग्रामीण ग्रोसर आफ बालगाट पर आधारित फिल्म की कहानी ग्रोसर को नये संसार की झलक देकर नये ग्रोसरी स्टोर बनाने की स्वप्न दिखा देता है और अनके इच्छायें भर देता है। कल्पना और इच्छा पर आधारित एक वास्ततिक ग्लोसरी स्टोर ‘‘लोहे की शीटों की दीवाल वाला, ऊपर से नीचे तक और अगल-बगल भी जैसे परेड के सिपाही हों ‘‘ इसमें भविश्य की इच्छा की पूर्ति की मनोकामना हैं। लर्नर का सिद्धान्त धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का आधुनिकीकरण है। मानसिक क्षितिज के आकार प्रकार में बढो़तरी अनुभव के क्षितिज में भी बृद्धि करता है ऐगे आने वाले कल की आवश्यकताओं से अवगत कराता है। इसी को मनो-सांस्कृतिक आनुनिकीकरण लर्नर मानते हैं। जब ये इच्छायें संस्थागत, आर्थिक, जनांकिकीय कारकों के कारण संतोश नहीं दे पाती तो ‘‘बढ़ते हुए असंतोश और कुण्ठा की क्रान्ति’’ की उत्पन्न होती है।

मैक्लीलैण्ड की ‘‘अचीविंग सोसाइटी’’ 

मैक्लीलैण्ड ‘प्राप्ति’ पे्ररक अध्ययन ‘मूल्यों’ और’ आर्थिक विकास’ में सम्बन्ध दर्शाये हैं। मैक्सवेबर से लेकर लगभग सभी विचारकों ने माना संस्कृतिकों ने माना संस्कृतिक विशेष वाले आर्थिक विकास की ओर अधिक उन्मख्ु ा होते है। मैक्लीलैण्ड अपने ‘अचीमिंग सोसाइटी में मनो-सांस्कृतिक कारकों को आर्थिक विकास हेतु अधिक महत्व दिया है। ये मनोवैज्ञानिक कारक ‘‘प्राप्ति की परमावश्यक’’ तत्व हैं उनका मानना है कि विकास की दर/गति का प्राप्ति की प्रेरणा से अत्यन्त घनिष्ठ सह-सम्बन्ध है। इतिहास भी इसकी पुश्टि करता है। मैक्लीलैण्ड, अठकिंसन, क्लार्क और लावेल ने एक विधि विकसि की (अपनी पुस्तक ‘दी अचांममेन्ट मोटिंग, न्यूयार्क): अपिल्टन-सेन्चुरी-क्रोफ्टस, 1953) जिससे प्राप्ति की आवश्यकता का पता लगाना और मापन हो सकता था अर्थात, प्रतियोगिता की स्थितियों से आगे बढ़ने की आवश्यकता समझना। इस विधि का नाम ‘यूजिंग थिमैटिक एयरसेप्सन टेस्ट’ रखा जो व्यक् िकी कल्पना की उड़ान सम्बन्धी विचार सीमित समय में कहानी के माध्यम से अभिव्यक्त हो जाता है। ‘‘प्राप्ति’’ के सम्बन्ध में अध्ययनों के निम्नांकि निश्कर्श स्पश्टीकरण के योग्य है:-
  1. निश्चित संस्कृति के कुछ सामाजिक -आर्थिक समूह दूसरों की तुलना में अत्यधिक प्राप्ति- पेर्रणा वाले होते है। 
  2. अपने इतिहास के दौरान सभ्यता विशेष के लोगों की विशेषता रही कि उनकी प्राप्ति के प्रेरणा अत्यधिक अंशो वाली रही। 
  3. कुछ संस्कृतियों में प्राप्ति की पे्ररणा अन्य संस्कृतियों की तुलना में अधिक सह-सम्बन्धित है। 
  4. कई धर्मो से सम्बन्धित समूह में प्राप्ति के प्रति अधिक पेर्र णा होती है और पा्र प्ति के कल्पना (achievement imagery) कुछ धार्मिक व्यवस्थाओं में अन्यों की अपेक्षाकृत अधिक होती है।’प्राप्ति की कल्पना’ भौतिक पर्यावरण से भी सम्बन्धित होती है। भौतिक पर्यावरण में परिवर्तन ‘प्राप्ति की कल्पना’ और प्राप्ति की प्रेरणा में भी परिवर्तन लाता है।’अवसर संरचना’ से भी ये भली भाँति सम्बन्धित होते है। ऐसे समाजों मे जहाँ कट्टरता के करण परिवर्तन सम्भव नहीं होता वहाँ लोग ‘निराशा’ आरै ‘भाग्य में विश्वास’ करना प्रारम्भ कर देते है। ऐसे समाजों के विकास से सभी का विकास सम्भव होगा। 

विकास के प्रारूप 

पूंजीवादी विकास के प्रारूप 

आर0एफ0हेराड, ई डोमर, जे0आर हिक्स, आर सोलो आदि के विचार केनेसियन माडेल पर आधारित हैं अत: केनेसियन माडेल का विश्लेशण आवश्यक हो जाता है।
  1. जोन मेयनार्ड कीन्स माडेल- ए सिसिल पिगू के सामान्य एकरूपता के सिद्वान्त पर आधारित जे0एम0 कीन्स के माडेल की प्रमुख विशेषताए है। 
    1. धन ऐसे पर्यावरण में भ्रमण करता है जिसमें उसके प्रभाव का त्वरित विस्तार होता है।
    2. ब्याज की दर से बढने और घटने पर विकसित पूंजी वाली आर्थिक व्यवस्था अनुपयुक्त पूंजी का उपयोग बढता है। 
    3. अनुपयुक्त संसधानो का भी उपयोग होने लगता है जैसे प्रशिक्षित श्रमिकों , उत्पादन के मशीनों आदि का उपयोग होने लगता है।? 
    4. ऋण का भुगतान, खर्च से बचत, आयात में वृद्वि होती है। 
    5. अधिक धन राशि का आगमन होता है। 
    6. अनिक्षित बेरोजगारी विकास में बांधा नही बनती 
    7. निर्यात की बहुलता, पूंजी निवेश जैसे प्रभावी बन जाती है। 
  2. कीन्स के माडल विकसित देशों के लिए तो है परन्तु विकासशील देशों के सन्दर्भ में उतना प्रभावी इसलिए नही माना जा सकता क्योकि विकसित देशों में विकास हेतु ही उनका माडल अधिक महत्वपूर्ण है।
  3. टालकाट पारसन्स एक्षन माडेल : पारसन्स का मानना है कि परिवर्तन दो प्रमुख आधारभूत प्रकियाओं के माध्यम से होता है। 
    1. कार्य करने की प्रकिया जिनसे बाधाए दूर की जाती है और एकीकरण वाली संरचनात्मक व्यवस्था को जैसे का तैसा बने रहने दिया जाता है तथा अनुकूलन की प्रकिया में तेजी लायी जाती है। 
    2. सीख की प्रकिया से व्यवस्था में संरचनात्मक परिवर्तन लाया जाता है। 
वेबर का माडेल वेबर का मानना है कि प्रत्येक संस्कृति के लोग मशीन के युग की आवाश्यकतानुसार अपने प्रकार से सक्रिय रूप से तादाम्य स्थापित कर कार्य करेंगे। विवेकीकरण में उनका अटूट विश्वास था जिन पर आधुनिक व संस्थागत कार्य होंगे और देश विकास के पथ पर अग्रसर होगा

सामाजवादी विकास के प्रारूप 

सामाजवादी विकास के प्रारूप के सम्बन्ध में कहा जाता है कि इसका आधार नये प्रकार के विकास की मॉग से सहसम्बन्धित है जिसके उददेश्य और तरीके अथवा ढंग बहुआयामी है। इसका पूरा जोर विकासशील और ओद्योगिक देशों के सम्पूर्ण सामाजिक, राजनैतिक आर्थिक संरचनात्मक ढाचे को पूरी तरह से पुन: संरचित करने पर रहा है।

आचार्य नरेन्द्र जय प्रकाश नारायण, विनोबा भावे, महात्मा गॉधी के वैकल्पिक माडेल आचार्य नरेन्द्र जय प्रकाश नारायण का समाजवाद सबको (समानता) बिना किसी भेदभाव के बिना किसी जाति पाति धर्म के बन्धन को प्रदान करता है सभी को अपने अधिकार और कर्तव्यो का निर्वाह करना समाज द्वारा अपेक्षित।

आर्थिक समाजिक न्याय का अधिकार सभी को है। क्षेत्र , भाशा, प्रजाति ,रंग, लिंग आदि अनेक आधारो पर कोई किसी से अलग नही समझा जाना चाहिए। अपने व्यक्तिगत- समाजिक - राजनितिक जीवन में सभी को अपना विकास करने का अवसर मिलना चाहिए । आजिविका, शिक्षा, रोजगार, कर्मकाण्ड जाति धर्म का भेद न करते हुए प्रत्येक क्षेत्र के लोगो को समानता के आधार पर अधिकार प्रदान करना सरकार का कर्तव्य एवं कल्याणकारी राज्य का दायित्व भी है।

Comments