मजदूरी एवं वेतन का अर्थ, परिभाषा, उद्देश्य, सिद्धांत

मजदूरी एवं वेतन का अर्थ

किसी कर्मचारी को उसके कार्य के बदले में जो पारितोषण प्राप्त होता है उसे मजदूरी अथवा वेतन कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, मजदूरी अथवा वेतन एक प्रकार की क्षतिपूर्ति राशि है, जिसे एक कर्मचारी अपनी सेवाओं के बदले में अपने सेवायोजक से प्राप्त करता है। सामान्य प्रचलन में ‘मजदूरी’ तथा ‘वेतन’ शब्दों को कभी-कभी समानाथ्र्ाी समझ लिया जाता है, परन्तु दोनों में कुछ अन्तर होता है, जो कि निम्नलिखित प्रकार से है :

मजदूरी क्या है?

मजदूरी से आशय उस भुगतान से है, जो सेवायोजक द्वारा कर्मचारियों को उनकी सेवाओं के बदले में पारिश्रमिक के रूप में प्रति घंटा अथवा प्रतिदिन अथवा प्रति सप्ताह अथवा प्रति द्वि-सप्ताह के आधार पर दिया जाता है। सामान्यत:, मजदूरी उत्पादन एवं अनुरक्षण में लगे हुए तथा गैर-पर्यवेक्षकीय अथवा ब्लू कॉलर कर्मचारियों को दी जाती है। मजदूरी अर्जित करने वाले कर्मचारियों को केवल उनके द्वारा सम्पन्न किये गये वास्तविक कार्य घंटों के लिए पारिश्रमिक का भुगतान किया जाता है। मजदूरी की राशि में अन्तर कार्य के घंटों में परिवर्तन के अनुरूप होता है।

वेतन क्या है?

वेतन से आशय उस भुगतान से है, जो कर्मचारियों को मासिक अथवा वार्षिक आधार पर एक निश्चित राशि के रूप में दिया जाता है। लिपिकीय, व्यावसायिक, पर्यवेक्षकीय तथा प्रबन्धकीय अथवा व्हाइट कॉलर कर्मचारी सामान्यत: वेतन भोगी होते हैं। वेतन भोगी कर्मचारियों को भुगतान कार्यानुसार नहीं, बल्कि समय (मासिक अथवा वार्षिक) के आधार पर किया जाता है, जो कि सामान्यत: स्थायी रहता है। मजदूरी एवं वेतन के बीच यह अन्तर इन दिनों मानव संसाधन अभिगम के विषय में तर्कसंगत प्रतीत नही होता, जिसमें कि सभी कर्मचारियों को मानवीय संसाधनों के रूप में माना जाता है तथा सभी को बराबरी से देखा जाता है। अत:, इन दोनों शब्दों को एक दूसरे के लिए प्रयोग किया जा सकता है। इस प्रकार, शब्द मजदूरी तथा/अथवा वेतन को किसी कर्मचारी को एक संगठन के प्रति उसकी सेवाओं के प्रतिपूरण के लिए प्रत्यक्ष पारिश्रमिक के भुगतान के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।

न्यूनतम मजदूरी क्या है?

न्यूनतम मजदूरी से आशय उस मजदूरी से है जो श्रमिक एवं उसके परिवार को जीवित रहने का आश्वासन प्रदान करने के साथ-साथ श्रमिक की कार्य कुशलता को भी अनुरक्षित करती है। इस प्रकार, न्यूनतम मजदूरी के अन्तर्गत यह आशा की जाती है कि यह जीवन की अनिवार्यताओं को पूरा करने के अतिरिक्त श्रमिकों की कार्यक्षमताओं को भी बनाये रखेगी, अर्थात् समुचित शिक्षा, शारीरिक आवश्यकतायें तथा सामान्य जीवन-निर्वाह के लिए भी पर्याप्त मात्रा में सुविधायें प्रदान की जायेगीं।

उचित मजदूरी क्या है?

उचित मजदूरी उस मजदूरी के समकक्ष होती है जो श्रमिकों द्वारा समान निपुणता, कठिनाई अथवा अरूचि के कार्य सम्पन्न करने के लिए प्राप्त की जाती है। मार्शल के अनुसार, ‘‘किसी भी विशिष्ट उद्योग में मजदूरी की प्रचलित दर को उस समय ही उचित मजदूरी कहा जा सकता है, जबकि वह मजदूरी के उस स्तर के समकक्ष हो जो अन्य व्यवसायों में उन कार्यो को सम्पन्न करने के लिए औसत रूप से दी जाती है, जो समान कठिनाई एवं समान अरूचि के हों तथा जिनमें समान स्वाभाविक क्षमताओं एवं समान व्यय के प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है।’’ 

जीवन निर्वाह मजदूरी क्या है?

जीवन निर्वाह मजदूरी से आशय कम से कम इतनी मजदूरी से है जो किसी श्रमिक की अनिवार्यताओं एवं आरामदायक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त हो। इसके अन्तर्गत प्राय: मजदूरी के उस स्तर का समावेश किया जाता है, जिससे श्रमिक केवल अपनी तथा अपने परिवार के अन्य सदस्यों की मूलभूत आवश्यकताओं को ही सन्तुष्ट करने में समर्थ नहीं होता है, बल्कि उन आरामदायक आवश्यकताओं को भी पूर्ण करने में समर्थ होता है, जिनसे वह समाज में एक सभ्य नागरिक की भांति जीवन व्यतीत कर सके।

मजदूरी एवं वेतन प्रशासन के उद्देश्य 

मजदूरी एवं वेतन प्रशासन के प्रमुख उद्देश्यों को निम्नलिखित प्रकार से समझा जा सकता है :
  1. समान कार्यो के लिए समान पारिश्रमिक के भुगतान को प्रदान करते हुए एक निष्पक्ष एवं न्यायसंगत पारिश्रमिक की व्यवस्था को विहित करना। 
  2. योग्य एवं सक्षम लोगों को संगठन के प्रति आकर्षित करना तथा उन्हें सेवायोजित करना। 
  3. कर्मचारियों के प्रतिस्पध्र्ाी समूहों के साथ मजदूरी एवं वेतन स्तरों में सामंजस्य बनाये रखने के द्वारा वर्तमान कर्मचारियों को संगठन में बनाये रखना।
  4. संगठन की भुगतान करने की क्षमता की सीमा के अनुसार श्रम एवं प्रबन्धकीय लागतों को नियन्त्रित करना। 
  5. कर्मचारियों के अभिप्रेरण एवं मनोबल में सुधार करना तथा श्रम प्रबन्ध सम्बन्धों में सुधार करना। 
  6. संगठन की समाज में एक अच्छी छवि को बनाने का प्रयास करना तथा मजदूरियों एवं वेतनों से सम्बन्धित वैधानिक आवश्यकताओं का अनुपालन करना। 

मजदूरी एवं वेतन प्रशासन के सिद्धांत

मजदूरी एवं वेतन प्रशासन की योजनाओं, नीतियों तथा अभ्यास के अनेक सिद्धांत है।। उनमें से कुछ महत्वपूर्ण निम्नलिखित प्रकार से हैं :
  1. मजदूरी एवं वेतन की योजनायें तथा नीतियां पर्याप्त रूप से लचीली होनी चाहिये। 
  2. कार्य मूल्यांकन वैज्ञानिक तरीके से किया जाना चाहिये। 
  3. मजदूरी एवं वेतन प्रशासन की योजनायें सदैव सम्पूर्ण संगठनात्मक योजनाओं एवं कार्यक्रमों के अनुकूल होनी चाहिये। 
  4. मजदूरी एवं वेतन प्रशासन की योजनायें एवं कार्यक्रम देश के सामाजिक एवं आर्थिक उद्देश्यों, जैसे - आय के वितरण की समानता की प्राप्ति तथा मुद्रा स्फीति सम्बन्धी प्रवृत्तियों पर नियन्त्रण के अनुसार होनी चाहिये। 
  5. मजदूरी एवं वेतन प्रशासन की योजनायें एवं कार्यक्रम स्थानीय तथा राष्ट्रीय दशाओं के परिवर्तन के प्रति उत्तरदायी होनी चाहिये। 
  6. ये योजनायें अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल बनाने तथा शीघ्र निपटाने वाली होनी चाहिये। 

भारत में मजदूरी नीति 

राष्ट्रीय नीतियों में से मजदूरी नीति आर्थिक एवं सामाजिक दोनों ही दृष्टियों से अत्यधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि श्रमिकों की सामान्य स्थिति, कार्य कुशलता, कार्य करने की इच्छा, कार्य के प्रति वचनबद्धता, मनोबल, श्रम-प्रबन्ध सम्बन्ध तथा श्रमिकों का सम्पूर्ण जीवन इससे प्रभावित होते हैं।

भारत में सर्वप्रथम श्रम आयोग द्वारा मजदूरी नियमन की दिशा में सरकारी हस्तक्षेप की संस्तुति की गयी। इस आयोग ने यह विचार व्यक्त किया कि मजदूरी भुगतान की वैधानिक व्यवस्था तथा न्यूनतम मजदूरी निर्धारण के लिए मजदूरी बोर्डो की नियुक्ति की व्यवस्था की जानी चाहिये। इसकी संस्तुतियों के आधार पर 1936 में मजदूरी भुगतान अधिनियम के पारित किये जाने का बावजूद भी सम्बन्धित मजदूरी नीति में कोई विशेष प्रगति न हो सकी। मजदूरी सम्बन्धी नीति के नियमन के क्षेत्र में द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् ही राज्य का सक्रिय हस्तक्षेप प्रारम्भ हुआ। श्रम जांच समिति ने मजदूरी निर्धारण के सन्दर्भ में वैज्ञानिक मनोवृत्ति के अपनाये जाने पर बल दिया। इसके द्वारा मजदूरी नीति के तीन विशिष्ट तत्व स्पष्ट किये गये :
  1. कठिन परिश्रम वाले उद्योगों, व्यवसायों एवं कृषि में न्यूनतम मजदूरी का वैयक्तिक रूप से निर्धारण। 
  2. उचित मजदूरी सम्बन्धी अनुबन्धों को प्रोत्साहन। 
  3. बागानों में कार्य करने वाले श्रमिकों के लिए जीवन-निर्वाह मजदूरी प्रदान करने की दिशा में किये गये प्रयास।
1947 के औद्योगिक शान्ति प्रस्ताव में कठोर परिश्रम की अपेक्षा करने वाले उद्योगों में वैधानिक रूप से न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने एवं आर्थिक संगठित उद्योगों में उचित मजदूरी सम्बन्धी अनुबन्धों को प्रोत्साहित करने पर बल दिया गया। इस प्रस्ताव के अनुपालन में न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 पारित किया गया तथा उचित मजदूरी समिति एवं लाभ-सहभाजन समिति का गठन किया गया।

1950 में लागू भारतीय संविधान में वर्णित राज्य के नीति निर्देशक सिद्धान्तों के अन्तर्गत मजदूरी सम्बन्धी नीति व्यक्त की गयी है, जो कि इस प्रकार है : ‘‘स्त्रियों एवं पुरुषों दोनों के लिए समान कार्य के लिए समान भुगतान हो’’ (चतुर्थ भाग, अनुच्छेद 39-द) तथा ‘‘राज्य उपयुक्त विधान अथवा आर्थिक संगठन अथवा अन्य किसी प्रकार से कृषि से सम्बन्धित, औद्योगिक अथवा अन्य सभी श्रमिकों के कार्य, जीवन-निर्वाह मजदूरी, सभ्य जीवन स्तर एवं रिक्त समय तथा सामाजिक एवं सांस्कृतिक अवसरों के पूर्ण आनन्द को प्रदान करने वाली कार्य की शर्तो को प्रदान करने के लिए प्रयत्न करेगा’’ (अनुच्छेद 43)।

‘समान कार्य के लिए समान पारिश्रमिक’ सम्बन्धी नीति निर्देशक सिद्धांत को, समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 नामक एक विशिष्ट विधान पारित करते हुए कार्यात्मक रूप प्रदान किया गया।

इसके अतिरिक्त, प्रथम पंचवश्र्ाी योजना से लेकर वर्तमान समय तक जितनी भी योजनायें लागू की गयी है उनमें मजदूरी के विषय में विशेष रूप से प्रावधान किये गये हैं।

बोनस 

उत्पादकता में अधिकतम वृद्धि के इच्छित राष्ट्रीय उद्देश्य की प्राप्ति के लिए बोनस सहित अनेक प्रकार की योजनायें चलायी जाती रही है।। बोनस एक प्रकार का प्रलोभन है। प्रलोभन शब्द का प्रयोग उत्साहित करने वाली एक ऐसी शक्ति को सम्बोधित करने के लिए किया जाता है, जिसका समावेश एक लक्ष्य की प्राप्ति के सक साधन के रूप में किया जाता है।

‘बोनस’ शब्द को मजदूरी के अतिरिक्त श्रमिकों के पुरस्कार के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। भारत में बोनस भुगतान का प्रारम्भ प्रथम विश्व युद्ध के समाप्त होने के बाद हुआ। अनेकों गोष्ठियों, समितियों, आयोगों एवं न्यायिक संस्थाओं ने समय-समय पर बोनस के भुगतान की संस्तुति की थी। परिणामस्वरूप 1961 में एमआर. मेहर की अध्यक्षता में बोनस आयोग का गठन किया गया। इस आयोग ने 1964 में अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। इसी वर्ष सरकार ने आयोग द्वारा प्रस्तुत किये गये प्रतिवेदन की सिफारिशों को कुछ संशोधनों के साथ स्वीकार कर लिया। आयोग द्वारा प्रस्तुत की गयी सिफारिशों की कार्यान्वित करने के लिए सरकार ने 1965 में एक अध्यादेश जारी किया जिसका स्थान बाद में बोनस भुगतान अधिनियम, 1965 ने लिया। इस प्रकार, बोनस के भुगतान को उत्पादकता के साथ सम्बन्धित करने तथा बोनस को प्रलोभन के रूप में प्रयोग में लाने को वैधानिक स्वीकृति प्रदान कर दी गयी।

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