निष्पादन मूल्यांकन क्या है?

अनुक्रम
निष्पादन मूल्यांकन के लिए अनेक पर्यायवाची शब्दों का भी प्रयोग किया जाता है, जैसे-कर्मचारी मूल्यांकन, कर्मचारी निष्पादन,समीक्षा,कार्मिक मूल्यांकन, निष्पादन मूल्यांकन तथा कर्मचारी मूल्यांकन आदि। ये सभी शब्द समानार्थक हैं। निष्पादन मूल्यांकन की कुछ प्रमुख परिभाषायें निम्नलिखित प्रकार से है: डेल एस. बीच के अनुसार, ‘‘ निष्पादन मूल्यांकन किसी व्यक्ति का कार्य पर उसके निष्पादन तथा उसके विकास की सम्भावनाओं के सम्बन्ध में व्यवस्थित मूल्यांकन है।’’ माइकल आर. कैरेल एवं फ्रैन्क ई. कुजमिट्स के अनुसार, ‘‘निष्पादन मूल्यांकन कार्य स्थल पर कर्मचारियों के व्यवहारों का मूल्यांकन करने की एक पद्धति है, सामान्यत: इसमें कार्य-निष्पादन के परिणात्मक तथा गुणात्मक दोनों पहलू सम्मिलित होते हैं।’’

निष्पादन मूल्यांकन की विशेषतायें 

  1. निष्पादन मूल्यांकन, कर्मचारियों के कार्यों के सम्बन्ध में उनकी क्षमताओं एवं कमजोरियों का मूल्यांकन करने तथा व्यवस्थित एवं निष्पक्ष विवरण प्रस्तुत करने की प्रक्रिया है। 
  2. निष्पादन मूल्यांकन के द्वारा यह पता लगाने कि कोई कर्मचारी कितनी अच्छी तरह से कार्य-निष्पादन कर रहा है तथा भविष्य में उसके सुधार हेतु एक योजना का निर्माण करने का प्रयास किया जाता है। 
  3.  निष्पादन मूल्यांकन नियमित अन्तराल पर एक निश्चित योजना के अनुसार आयोजित किये जाते हैं। 
  4. निष्पादन मूल्यांकन से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर कर्मचारियों के प्रशिक्षण, विकास, अभिपेर्रण, पदोन्नति तथा स्थानान्तरण आदि के विषय में निणर्य लिये जाते है।
  5. निष्पादन मूल्यांकन उद्देश्यपूर्ण निर्णय करने की एक प्रक्रिया है। 
इस प्रकार स्पष्ट है कि निष्पादन मूल्यांकन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी संगठन के कर्मचारियों का उनके वर्तमान कायांर् े के सन्दर्भ में क्षमताओं, परिणामों एवं भविष्य की सम्भावनाओं का व्यवस्थित मूल्यांकन किया जाता है, जिससे कि इनसे प्राप्त सूचनाओं के आधार पर कर्मचारियों के प्रशिक्षण, विकास, पदोन्नति, स्थानान्तरण, वेतन निर्धारण तथा अभिपेर्र ण आदि के सम्बन्ध में निर्णय लिये जा सकें।

निष्पादन मूल्यांकन के उद्देश्य 

कर्मचारियों के निष्पादन मूल्यांकन से सम्बन्धित सूचनायें विभिन्न उद्देश्यों के लिए अभिलिखित, अनुरक्षित तथा उपयोग की जाती हैं, ये उद्देश्य है-
  1. कर्मचारियों के निष्पादन के एक सन्तोषजनक स्तर को स्थापित करना तथा उसे बनाये रखना। 
  2. योग्यता तथा निष्पादन पर आधारित पदोन्नतियों के विषय में निर्णय लेना। 
  3. कर्मचारियों के प्रशिक्षण एवं विकास की आवश्यकताओं का निर्धारण करना।
  4. चयन परीक्षणों एवं साक्षात्कार तकनीकों का परीक्षण करना तथा उनकी प्रमाणिकता को सिद्ध करना। 
  5. कर्मचारियों को उनेक कार्य निष्पादन परिणामों से अवगत कराना तथा उनके विकास के उद्देश्य का ध्यान में रखते हुए रचनात्मक समालोचना तथा निर्देशन के द्वारा सहायता प्रदान करना। 
  6. वरिष्ठ अधिकारियों को उनके अधीनस्थों के विषय में समुचित जानकारी रखने में सहायता प्रदान करना। 
  7. निष्पादन पर आधारित निष्पक्ष एवं न्यायोचित पारिश्रमिक के निर्धारण को सरल बनाना। 
  8. संगठनात्मक प्रभावशीलता को सुनिश्चित करने हेतु कर्मचारियों की कार्य क्षमताओं में सुधार करना तथा कर्मचारी व्यवहारों में अपेक्षित परिवर्तन के लिए सुझाव देना।
  9. कर्मचारियों को उनकी कार्यक्षमताओं के अनुरूप नये कार्यों पर नियुक्त करना। 
  10. कर्मचारियों को उनके कार्य निष्पादन परिणामों के अनुरूप अभिप्रेरित करना।
  11. जबरी छुट्टी एवं छँटनी के सम्बन्ध में निर्णय लेने हेतु सूचनायें प्रदान करना। 
  12. मानव संसाधन अनुसंधान करना। 

निष्पादन मूल्यांकन की आवश्यकता 

निष्पादन मूल्यांकन की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से अनुभव की जाती है:
  1. वेतन निर्धारण, पदौéति, स्थानान्तरण तथा पद अवनति आदि के सम्बन्ध में जो निर्णय लिये गये हैं, उनके आधार पर निष्पादन श्रेणियों के विषय में सूचनाओं की प्राप्ति हेतु। 
  2. वेतन-वृद्धि तथा लाभांश के अनुपान के निर्धारण के लिए उचित आधार हेतु कार्य निष्पादन परिणामां के विषय में सूचनाओं की प्राप्ति हेतु। 
  3. वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा अपने अधीनस्थों की उपलब्धि के स्तरों तथा व्यवहारों के विषय में प्रतिपुष्टि सूचनाओं की प्राप्ति हेतु। यह सूचनायें अधीनस्थों के निष्पादनों की समीक्षा करने, निष्पादन की कमियों को सुधारने तथा यदि आवश्यक हो तो, नवीन मानकों को निर्धारित करने में सहायता प्रदान करती है।
  4.  वे सूचनायें जो कि अधीनस्थों को परामर्श देने में सहायता प्रदान करती हैं, उनकी प्राप्ति हेतु। 
  5. ज्ञान एवं निपुणताओं के सम्बन्ध में कर्मचारियों की कमियों का निदान करने, प्रशिक्षण एवं विकासात्मक आवश्यकताओं का निर्धारण करने, कर्मचारी-विकास के साधनों को विहित करने तथा कार्य पर नियुक्तियों को ठीक करने के लिए आश्यक सूचनाओं की प्राप्ति हेुत।
  6. परिवीक्षाधीन कर्मचारियों के स्थायीकरण के लिए उनके कार्य निष्पादन सम्बन्धी सूचनाओं की प्राप्ति हेतु। 
  7. परिवेदनाओं तथा अनुशासनहीनता की गतिविधियों का निवारण करने हेतु।
  8. विभिन्न कर्मचारियों के मध्य उनकी कार्य कुशलता में वृद्धि करने के लिए प्रतिस्पर्धा उत्पन्न करने हेतु। 

निष्पादन मूल्यांकन की विषय-वस्तु 

प्रत्येक संगठन को निष्पादन मूल्यांकन के कार्यक्रम के अनुमोदन से पूर्व मूल्यांकन की जाने वाली विषय-वस्तु के विषय में निर्णय करना होता है। सामान्यत: मूल्याकंन की जाने वाली विषय-वस्तु का निर्धारण कार्य विश्लेषण के आधार पर किया जाता है। मूल्यांकन की जाने वाली विषय-वस्तु संगठनात्मक उद्देश्यों (मानकों) जैसे- उत्पादन, लागत-बचत तथा पूँजी पर प्रतिलाभ आदि के प्रति योगदान के रूप में हो सकती है। मूल्यांकन के अन्य मानक इन पर आधारित होते हैं: (i) व्यवहार जो कि दर्शनीय शरीरिक क्रियाओं एवं गतिविधियों का मापन करता हैं। (ii) उद्देश्य, जो कि कार्य सम्बन्धी परिणामों, जैसे- जमा धन की कुल राशि का सचल होना, का मापन करते है। तथा (iii) लक्षण, जो कि कर्मचारियों के कार्य-क्रियाकलापों में दर्शनीय व्यक्तिगत विशेषताओं के रूप में मापे जाते है। प्राय: एक अधिकारी के निष्पादन मूल्यांकन के प्रारूप के अन्तर्गत विषय-वस्तु के रूप में निम्नलिखित बातों का समावेश किया जा सकता है:
  1. उपस्थिति की नियमितता 
  2. आत्माभिव्यक्ति: मौखिक एवं लिखित 
  3. दूसरों के साथ कार्य करने के योग्यता 
  4. नेतृत्व शैली तथा योग्यता 
  5. पहल शक्ति 
  6. तकनीकी निपुणतायें 
  7. तकनीकी योग्यता/ज्ञान 
  8. नवीन बातों को ग्रहण करने की योग्यता 
  9. तर्क करने की योग्यता 
  10. मौलिकता तथा सूझ-बूझ 
  11. रचनात्मक निपुणतायें
  12. रूचि का क्षेत्र 
  13. उपयुक्तता का क्षेत्र 
  14. निर्णयन की निपुणतायें
  15. सत्यनिष्ठा 
  16. उत्तरदायित्वों को ग्रहण करने की क्षमता 
  17. अधीनस्थों द्वारा स्वीकार किये जाने का स्तर
  18. ईमानदारी एवं सद्भाव 
  19. कार्य एवं संगठनात्मक ज्ञान में सम्पूर्णता 
  20. कार्य-प्रणालियों एवं प्रक्रियाओं का ज्ञान
  21. सुधार के लिए प्रस्तुत सुझावों की गुणवत्ता 

मूल्यांकन कौन करे ?

मूल्यांकनकर्ता, कोई भी वह व्यक्ति हो सकता है, जो कि कार्य विषय वस्तु मूल्याकंन की जाने वाली विषय-वस्तुओं एवं विषय-वस्तुओं के मानकों आदि के विषय में पूरी जानकारी रखता हो तथा जो कर्मचारी को कार्य निष्पादन के दौरान ध्यान से देखता हो। मूल्यांकनकर्ता को, क्या अधिक महत्वपूर्ण है तथा तुलनात्मक रूप से क्या कम महत्वपूर्ण है, उसका निर्धारण करने के समर्थ होना चाहिए। उसे प्रतिवेदनों को तैयार करना तथा बिना पक्षपात के निर्णय करना चाहिए। विशिष्ट मूल्यांकनकर्ता होते है: पर्यवेक्षक, समकक्ष कर्मचारी, अधीनस्थ, स्वयं कर्मचारी, सेवाओं के उपभोक्ता तथा परामर्शदाता। इन सभी पक्षकारों द्वारा किया गया निष्पादन मूल्यांकन, 3600 निष्पादन मूल्यांकन कहलाता है।

पर्यवेक्षक- 

पर्यवेक्षकों में कर्मचारियों के वरिष्ठ अधिकारी, अन्य वरिष्ठ अधिकारी जो कि कर्मचारियों के कार्यों के विषय में जानकारी रखते हैं तथा विभागाध्यक्ष अथवा प्रबन्ध सम्मिलित होते हैं। सामान्यत: निकटतम वरिष्ठ अधिकारी निष्पादन का मूल्याकन करते है। जिसकी पुन: विभागाध्यक्षों अथवा प्रबन्धकों द्वारा समीक्षा की जाती है। ऐसा इसलिए कि पर्यवेक्षक अपने अधीनस्थों का संचालन करने के लिए उत्तरदायी होते है। तथा उनके पास अधीनस्थों का निरन्तर अवलोकन निर्देशन तथा नियन्त्रण करने का अवसर होता है।

समकक्ष कर्मचारी -

समकक्ष कर्मचारियों द्वारा मूल्यांकन उस स्थिति में विश्वसनीय हो सकता है, यदि कार्य समूह यथोचित रूप से एक दीर्घ अवधि से अधिक तक के लिए स्थिर हो तथा उन कार्यों को सम्पन्न करता हो जिनके लिए अन्त:क्रिया आवश्यक हों। तथा इस सम्बन्ध में उपयुक्त जानकारी प्रदान कर सकते है।

अधीनस्थ -

आजकल अधीनस्थ द्वारा वरिष्ठ अधिकारियों के मूल्यांकन की अवधारणा अधिकांश संगठनों में उपयोग में लायी जाती है, विशेष रूप से विकसित देशों में इस प्रकार की नवीन पद्धति, वरिष्ठ अधिकारियों एवं अधीनस्थों के मध्य सौहार्दपूर्ण है। इस प्रकार के मामलों में, अधीनस्थों का मूल्यांकन, समक्ष वरिष्ठ अधिकारियों की पहचान करने में उपयोगी हो सकता है।

कर्मचारी स्वयं -

यदि कर्मचारी को संगठन द्वारा उनसे अपक्षित उद्देश्यों एवं उन मानकों जिनके द्वारा उनको मूल्यांकन किया जाना है उनकी पूर्ण जानकारी होती है, तो वे अपने स्वयं के निष्पादन के मूल्यांकन के लिए सर्वश्रेष्ठ स्थिति होती है। चूँकि कर्मचारी विकास का अर्थ आत्म-विकास भी होता है। अत: वे कर्मचारी जो कि अपने स्वयं के निष्पादन का मूल्यांकन करते हैं वे अधिक अभिप्रेरित हो सकतों हैं सेवाओं के उपभोक्ता : सेवा प्रदान करने वाले संगठनों में, व्यवहारों, उचित समय, कार्य सम्पé करने की गति तथा परिशुद्धता आदि से सम्बन्धित कर्मचारी मूल्यांकन का उनकी सेवाओं के उपभोक्ताओं द्वारा बेहतर तरीके से निर्णय किया जा सकता है।

मूल्यांकन कितने अन्तराल पर किया जायें ? 

अनौपचारिक निष्पादन मूल्यांकन तब आयोजित किये जाते है, जब कभी भी पर्यवेक्षक अथवा मानव संसाधन प्रबन्धक अनुभव करते है कि ऐसा करना अनिवार्य हो गया है। परन्तु व्यस्थित एवं योजनाबद्ध निष्पादन मूल्यांकन नियमित रूप से आयोजित किये जाते हैं। मूल्यांकन का समय-अन्तराल काफी सीमा तक प्रबन्धकीय दर्शन पर निर्भर करता है। सामान्यत: विभिé संगठनों में मूल्याकंन कार्यक्रम वर्ष में एक बार आयोजित किये जाते हैं। इस सम्बन्ध में कुछ विचारणीय बातें भी हैं, जो कि निम्नलिखित प्रकार से है:
  1. मूल्यांकन का समय अन्तराल कार्य के उद्देश्यों के अनुकूल होना चाहिये। यदि मूल्यांकन चयन प्रक्रिया के लिए किया जाना हो, जो कि वर्ष में दो बार की जाती है तो मूल्यांकन कार्यक्रम भी वर्ष में दो बार आयोजित किया जाना चाहिए। 
  2. नये कर्मचारियों तथा नये कार्यों के लिए मूल्यांकन का समय अन्तराल कम होना चाहिए, अर्थात इसे कई बार आयोजित किया जाना चाहिए। 
  3. मूल्यांकन के लिए संगठन की सुविधानुसार जो भी समय अन्तराल निर्धारित किया जाये उसका कठोरता से पालन किया जाना चाहिये। 

निष्पादन मूल्यांकन की विधियाँ 

कर्मचारी-मूल्यांकन व्यवस्था की उत्पत्ति एवं विकास के साथ-साथ निष्पादन मूल्यांकन की अेनक विधियाँ अथवा तकनीकें विकसित की गयी है। इन विधियों को दो भागों में विभाजित करके समझा जा सकता है।

परम्परागत विधियाँ -

आरेखील मूल्यांकन पैमाना विधि -

यह निष्पादन मूल्यांकन की अत्यन्त प्राचीन एवं सर्वाधिक उपयोग की जाने वाली विधि है। इसमें मूल्यांकनकर्ताओं को प्रत्येक कर्मचारी के लिए एक के हिसाब से छपे हुए प्रपत्र दे दिये जाते हैं तथा उनसे इन पर कर्मचारियों के विषय में अपना मत व्यक्त करने की अपेक्षा की जाती है। इन प्रपत्रों में मूल्यांकन किये जाने वाले कुछ निश्चित गुणों , जैसे -कार्य की मात्रा एवं गुणवत्ता, कार्य ज्ञान, सहयोग की भावना, विश्वसनीय , पहल शक्ति, कार्य क्षमता, कार्य के प्रति रूचि एवं मनोवृत्ति आदि (कर्मचारियों के मामलों में) तथा विश्लेषणात्मक योग्यता, निर्णय क्षमता, रचनात्मक योग्यता, पहल शक्ति, नेतृत्व के गुण एवं संवेगात्मक स्थिरता आदि के लिए एक आरेखीय मूल्यांकन पैमाना बना होता है। इन पैमाने की सहायता से ही मूल्यांकन किया जाता हैं ये अरेखील मूल्यांकन पैमाने दो प्रकार के होते है। निरन्तर मूल्यांकन पैमाना तथा विच्छिन्न मूल्यांकन पैमाना।

निरन्तर मूल्यांकन पैमाने में कर्मचारी के प्रत्येक मूल्यांकन किये जाने वाले गुण तथा उसके स्तर को प्रदर्शित करने वाली संख्याये जैसे-1,2,3,4,5,6,7................आदि लिखी होती है। इन संख्याओं को कर्मचारी में उन गुणों के सम्भावित स्तर की सीमा के आधार पर विभिन्न श्रेणियों, जैसे- कार्य में अरूचि, लापरवाही, कार्य में रूचि तथा इसी प्रकार अन्य में बाँट दिया जाता है। असमें मूल्यांकनकर्ता निरन्तरता के रूप में कही भी निर्धारित चिहृ द्वारा निशान लगाकर किसी कर्मचारी के विशिष्ट गुणों के स्तरों पर अपने विचार व्यक्त करता है।

आरेखीय मूल्यांकन पैमाना विधि के अन्तर्गत प्रत्येक गुण के सम्बन्ध में कर्मचारी के निष्पादन को मूल्यांकनकर्ता द्वारा दिये गये अंको द्वारा ज्ञात किया जाता है। मूल्यांकनकर्ता द्वारा प्रत्येक गुण के लिए दिये गये अंको को, सम्पूर्ण निष्पादन ज्ञात करने के लिए जोड़ लिया जाता है। इस प्रकार, प्रत्येक कर्मचारी के निष्पादन का मूल्यांकन हो जाता है। यह निष्पादन मूल्यांकन की अत्यन्त ही सरल विधि है, जिससे बहुत से कर्मचारियों का शीघ्रतापूर्वक मूल्याकंन किया जा सकता है। परन्तु इस विधि का सबसे बड़ा दोष यह है कि इसमें मूल्यांकनकर्ता के पक्षपातपूर्ण होने की सम्भावना रहती है।

श्रेणीयन विधि 

इस विधि के अन्तर्गत कर्मचारियों का कुछ विशेषताओं के लिए सर्वोत्तम से लेकर बुरे तक मूल्यांकन किया जाता है। इसमें सर्वप्रथम, मूल्यांकन किये जाने वाले कार्य सम्बन्धी विशिष्ट गुणों का निर्धारण कर लिया जाता हैं जो कि इस प्रकार हो सकते हैं, जैसे- कार्य ज्ञान, कार्य की मात्रा, कार्य की गुणवत्ता, सहयोग विश्वसनीयता, पहल शक्ति, निर्णय क्षमता तथा नेतृत्व आदि। इसके पश्चात् इन चयनित विशिष्ट गुणों के लिए कुछ महत्वपूर्ण श्रेणियाँ बना ली जाती है तथा उन्हें कोड प्रदान कर दिये जाते है।जैस-अ-सर्वोत्तम; ब-उत्तम; स- अच्छा; द- औसत; य- बुरा; तथा र-बहुत बुरा। जैसा कि चित्र संख्या 10.3 से स्पष्ट हैं

क्रम
सं
गुणसर्वोत्तम
(अ)
उत्तम
(ब)
अच्छा
(स)
औसत
(द)
बुरा
(य)
 बहुत बुरा
(र)
1कार्य ज्ञान
2कार्य की मात्रा
3कार्य की गुणवत्ता
4सहयोग
5विश्वसनीयता
6पहल शक्ति
7निर्णय क्षमता


इस प्रकार से छपे हुए प्रपत्र को मूल्यांकनकर्ता को दे दिया जाता हैं। वह कर्मचारियों के निष्पादनों का अवलोकन करके कर्मचारियों को कार्य सम्बन्धी प्रत्येक विशिष्ट गुण के विषय में सर्वोत्तम से लेकर बुरे तक के लिए स्तर प्रदान करने हेतु किसी भी स्थान पर निर्धारित चिहृ द्वारा निशान लगाकर अपना मत व्यक्त कर सकता है।

जाँच सूची विधि 

यह एक बहुप्रचलित विधि है। इस विधि के अन्तर्गत सर्वप्रथम कार्य-निष्पादन के लिए आवश्यक गुणों की एक सूची तैयार कर ली जाती है। वस्तुत: यह प्रश्नों की सूची होती है। ये प्रश्न कर्मचारी के कार्य-व्यवहार के विषय में होते है। इसी सूची को जाँच सूची कहा जाता है। मूल्यांकनकर्ता इस सूची में दिये गये प्रश्नों के आधार पर प्रत्येक कर्मचारी के निष्पादन का मूल्यांकन करता है। मूल्यांकनकर्ता मूल्यांकन के लिए जो गुण कमर्च ारी में विद्यमान हैं, उनके लिए ‘हाँ’ तथा जो गुण कर्मचारी में विद्यमान नहीं है। उनके लिए ‘नहीं’ के कोष्ठक में निर्धारित चिहृ द्वारा निशान लगाकर अपना मत व्यक्त कर देता है। इसके पश्चात् समस्त गुणों पर लगे चिहृों के आधार पर कर्मचारी के निष्पादन को मूल्यांकन किया जाता हैं:-

क्रम सं.प्रश्नहाँ नहीं 
1क्या कर्मचारी की कार्य पर उपस्थिति सन्तोषजनक है?
क्या कर्मचारी की अपने कार्य में रूचि रखता है? 
क्या कर्मचारी को कार्य का तकनीकी ज्ञान है?
4 क्या कर्मचारी द्वारा आदेशों का पालन किया जाता है?
क्या कर्मचारी अपना कार्य निर्धारित समय में पूर्ण कर लेता है?

जाँच सूचियाँ भारित अथवा अभारित हो सकती है। भारित जाँच सूचियाँ में विभिन्न प्रश्नों को उनके महत्व के अनुसार भार प्रदान किया जाता है। इस विधि में मूल्यांकन का कार्य कर्मचारी के निकटतम वरिष्ठ अधिकारी द्वारा किया जाता है। क्योंकि वह कर्मचारी के कार्य एवं गुणों से परिचित होता है। परन्तु निष्पादन मूल्यांकन का अन्तिम निर्णय मानव संसाधन विभाग के विशेषज्ञों द्वारा किया जाता है। यह एक सरल विधि है तथा इसके द्वारा पक्षपात रहित मूल्यांकन किया जा सकता है। परन्तु इस विधि में महत्वपूर्ण दोष यह है कि कर्मचारी में किसी गुण के विद्यमान होने के विभिन्न स्तरों के लिए इसमें कोई स्थान नहीं होता, केवल गुण के विद्यमान होने अथवा नहीं होने का ही उल्लेख होता है।

निर्णायक घटना विधि  -

इस विधि के अन्तर्गत कर्मचारियों का मूल्यांकन महत्वपूर्ण घटनाओं एवं परिस्थितियों में उनके द्वारा प्रदर्शित प्रत्युत्तरों के अधार पर किया जाता है। इसमें पर्यवेक्षक निरन्तर कर्मचारियो के व्यवहारों का अवलोकन करते हुए महत्वपूर्ण घटनाओं के विषय में उनके निष्पादनों को (सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों) अभिलिखित करते रहते हैं। एक कर्मचारी के कार्य के सम्बन्ध में निम्नलिखित घटनायें निर्णायक अथवा महत्वपूर्ण हो सकती हैं, जो कि उसके निष्पादन मूल्यांकन में सहायक होती है: 1. प्रक्रिया एवं निर्देशों को सीखना एवं उन्हें याद रखना 2. निर्णय क्षमता एवं बुद्धि 3. यन्त्रों एवं उपकरणों की जानकारी 4. उत्पादकता 5. विश्वसनीयता 6. पर्यवेक्षण को स्वीकार करना; 7. पहल शक्ति 8. उत्तरदायित्वों का निर्वाह करना; तथा 9. कार्य में सुधार हेतु सुझाव आदि।

इस विधि का एक प्रमुख लाभ यह है कि इसमें कर्मचारी का मूल्यांकन व्यक्तिपरक न होकर महत्वपूर्ण घटनाओं सम्बन्धी साक्ष्यों पर आधारित होता है। इसके अतिरिक्त, कर्मचारी के निष्पादन के सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों पक्षों के अभिलेख उपलब्ध होने से उसके प्रशिक्षण एवं विकास में सहायता प्राप्त होती है। परन्तु इस विधि के कुछ कमियाँ भी हैं जो कि इस प्रकार हैं। पहली कायर् से सम्बन्धित सभी महत्वपूर्ण घटनाओं का सार्वभौमिक रूप से निर्धारण करना कठिन हैं दूसरी कार्य स्थल पर होने वाली समस्त घटनाओं को अभिलिखित कर पाना अत्यन्त दुष्कर है। तीसरी पर्यवेक्षक द्वारा घटनाओं के अभिलेखन से कर्मचारियों की कार्य क्षमता पर विपरीत पड़ता है।

क्षेत्र समीक्षा विधि -

 निष्पादन मूल्यांकन के लिए इस विधि का भी काफी प्रयोग किया जाने लगा हैं। इस विधि के अन्तर्गत मानव संसाधन विभाग का एक प्िर शक्षित एवं कुशल अधिकारी कार्य स्थल पर जा कर प्रत्येक पर्यवेक्षक से उसके अधीनस्थ कर्मचारियों के निष्पादन के विषय में विशिष्ट सूचनायें एकत्रित करता है। यह अधिकारी पर्यवेक्षक से प्राप्त सूचनाओं को लिपिबद्ध करके एक प्रतिवेदन तैयार करता है। इसके पश्चात वह उस प्रतिवेदन को पर्यवेक्षक के पास समीक्षा करने, परिवर्तन करने तथा अनुमोदित करने हेतु भेज देता है। अनुमोदनोपरान्त उसे अन्तिम रूप से स्वीकार्य मान लिया जाता है। चूँकि इस विधि में एक विशेषज्ञ द्वारा पर्यवेक्षक के साथ परामर्श करते हुए मूल्यांकन प्रक्रिया को सम्पन्न किया जाता है। इसलिए मूल्याकंन अधिक विश्वनीय होता है। परन्तु इस विधि का एक महत्वपूर्ण दोष यह है कि इसकी सफलता कुशल एंव प्रशिक्षित विशेषज्ञ पर निर्भर करती हैं, क्योंकि यदि वह योग्य होता है तो ही कर्मचारियों के विषय में उपयुक्त सूचनायें प्राप्त कर सकता हैं।

आधुनिक विधियाँ -

मूल्यांकन केन्द्र विधि -

यह स्वयं में निष्पादन मूल्यांकन की एक विधि नहीं है। वस्तुत: यह एक व्यवस्था अथवा संगठन है, जहाँ भिन्न-भिन्न कर्मचारियों का मूल्यांकन विभिन्न विशेषज्ञो द्वारा अनेक विधियाँ के प्रयोग के माध्यम से किया जाता है। इन विधियेां में इस अध्याय में पूर्व में वर्णित विधियों के अतिरिक्त इन-बास्केट रोल-प्लेइंग केस स्टडीज तथा ट्रान्सऐक्शनल ऐनालिसिस आदि विधियाँ सम्मिलित होती हैं।

इस विधि के अन्तर्गत विभिन्न विभागों के कर्मचारियों को साथ-साथ लाया जाता है। जिससे कि वे ऐसा व्यक्तिगत अथवा सामूहिक कार्य करते हुए दो अथवा तीन दिन व्यतीत करें, जैसा कि वे अपनी पदोन्नति होने के बाद कार्य करेंगे। मूल्यांकनकर्ता प्रत्येक प्रतिभागी के निष्पादन को योग्यता के उचित क्रम में श्रेणीबद्ध करते है। इसके पश्चात् उनके द्वारा कर्मचारियों के निष्पादन मूल्यांकन का प्रतिवेदन तैयार किया जाता हैं चूँकि मूल्यांकन केन्द्र मूल रूप से पदोन्नति प्रशिक्षण एवं विकास के लिए विचार करने हेतु कर्मचारियों की सम्भावनाओं के मूल्यांकन का माध्यम हैं, अत: ये मूल्यांकन प्रक्रियाओं के वस्तुनिष्ठ तरीके से संचालन करके उत्कृष्ट साधनों को प्रस्तुत करते हैं। इस विधि में प्रत्येक कर्मचारी को अपनी योग्यता को प्रदर्शित करने का समान अवसर प्राप्त होता है। इसके साथ ही इसमें मूल्याकंनकर्ताओं के द्वारा पक्षपात करने की सम्भावना नहीं होती है। परन्तु इसमें दोष भी है। जो इस प्रकार है: पहला इसमें बहुत अधिक समय, धन एवं श्रम लगता है; दूसरा यह विधि वास्तविक कार्य परिणामों की अपेक्षा कर्मचारियों की अन्त: शक्तियों पर अधिक बल देती है।

मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन विधि -

मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन, कर्मचारी-सम्भावनाओं का मूल्याकंन करने के लिए आयोजित किये जाते है। मनोवैज्ञानिक मूल्यांकनों में गहन साक्षात्कार माोवैज्ञानिक परीक्षण, कर्मचारी के साथ विचार-विमर्श एवं परामर्श, वरिष्ठों -अधीनस्थों-समकक्ष कर्मचारियों के साथ विचार-विमर्श तथा अन्य मूल्यांकनों की समीक्षा आदि सम्मिलित होते हैं। यह मूल्यांकन जिन बिन्दअु ों एवं विषयों के लिए आयोजित किया जाता है, वे है:-
  1. कर्मचारी की प्रतिभा सम्पन्नता 
  2. संवेगात्मक स्थिरता 
  3. अभिपेर्रणात्मक प्रत्युत्तर 
  4. तर्कशक्ति एवं विश्लेषणात्मक योग्यता 
  5. विवेचन एवं निर्णयन की निपुणता 
  6. सामाजिकता 
  7. कर्मचारी की अभिव्यक्त करने की क्षमता। मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन के परिणाम कर्मचारियों की कार्य पर नियुक्ति प्रशिक्षण एवं विकास तथा वृत्ति नियोजन एवं विकास के सम्बन्ध में निर्णय-निर्माण के लिए उपयोगी होते हैं। 

निष्पादन मूल्यांकन की प्रक्रिया 

निष्पादन मूल्यांकन का आयोजन एक व्यवस्थित प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता है। इस प्रक्रिया में चरण सम्मिलित होत है।
  1. पहले चरण में , कार्य विवरण एवं कार्य विशिष्टता पर आधारित निष्पादन-मानकों को स्थापित किया जाता है। इन मानकों का स्पष्ट एवं वस्तुनिष्ट होना तथा इसमें सभी घटकों को सम्मिलित किया जाना आवश्यक है 
  2. दूसरे चरण में, मूल्यांकन कर्ता सहित सभी कर्मचारियों को इन मानकों के विषय में जानकारी प्रदान की जाती है। 
  3. तीसरे चरण में मूल्याकन कर्ता द्वारा मूल्याकंन के लिए निर्धारित निर्देशों का पालन करते हुए अवलोकन, साक्षात्कार, अभिलेखन तथा प्रतिवेदन तैयार करने के माध्यम से कर्मचारी निष्पादन का मापन किया जाता है। 
  4. चौथे चरण में , मानकों, कार्य-विश्लेषण तथा आन्तरिक एवं बाह्य परिस्थितियेां में आवश्यक परिवर्तनों के लिए सुझाव प्रस्तुत किये जाते हैं। 
  5. पाँचवे चरण में, कर्मचारी के वास्तविक निष्पादन की तुलना अन्य कर्मचारियों के वास्तवित निष्पादनों के साथ की जाती है। इससे यह ज्ञात होता है कि कर्मचारी के निष्पादन का स्तर क्या है। यदि सभी कर्मचारियों के निष्पादनों को उच्च अथवा निम्न स्तर पर श्रेणीबद्ध किया जाता है। तो इसका अर्थ यह हुआ कि मानकों एवं कार्य विश्लेषण में कोई त्रुटि है। 

निष्पादन परामर्श 

किसी कर्मचारी के निष्पादन का मूल्यांकन हो जाने के पश्चात् वरिष्ठ अधिकारी का यह कर्तव्य है कि वह उसे उसके निष्पादन के स्तर, उसके कारणों उसके लिए आवश्यकताओं तथा निष्पादन में सुधार के तरीकों के विषय में सूचित करें। वरिष्ठ अधिकारी द्वारा कर्मचारी को उसके निष्पादन तथा उसमें सुधार के तरीकों के विषय में परामर्श देना चाहिए। निष्पादन परामर्श किसी ऐसे कर्मचारी के जीवन में एक नियोजित एवं सुव्यस्थित हस्तक्षेप है, जो कि लक्ष्यों का चयन करने तथा अपने स्वयं के विकास का निर्देशन करने के योग्य होता है। इस प्रकार निष्पादन परामर्श का उद्देश्य कर्मचारी को उसके निष्पादन, उसकी क्षमताओं एवं कमियों, निष्पादन में विकास के लिए उपलब्ध अवसरों तथा प्रौद्योगिकीय परिवर्तनों के रूप में आशंकाओं की जानकारी प्राप्त करनें में सहायता प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त निष्पादन परामर्श वरिष्ठ अधिकारी एवं कर्मचारी के मध्य सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध की स्थापना में सहायक होता है तथा कर्मचारी की सम्पूर्ण संगठन के प्रति निष्ठा एवं अपनत्व की भावना को विकसित करता है।

साक्षात्कार 

अधिकांश संगठनों द्वारा मूल्यांकन के पश्चात् साक्षात्कार को मूल्यांकन प्रक्रिया के एक अतिआवश्यक अंग के रूप में माना जाता है। यह साक्षात्कार कर्मचारी के लिए प्रतिपुष्टि सूचना तथा मूल्यांकनकर्ता के लिए उसे कर्मचारी से उसके मूल्यांकन एवं मूल्यांकन हेतु विचार किये गये उसके लक्षणों एवं व्यवहारों को स्पष्ट करने का अवसर प्रदान करता है। यह कर्मचारी को भी उसकी श्रेणी, मानकों अथवा लक्ष्यों, मूल्यांकन पैमाने निष्पादन के निम्न स्तर के लिए आन्तरिक एवं बाहृय कारकों तथा निष्पादन के लिए उसके उत्तरदायी संसाधनों आदि के विषय में विचारों को प्रकट करने का अवसर प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त यह दोनों पक्षों को मानकों की समीक्षा करने एवं वास्तविक घटकों पर आधारित नये मानकों को निर्धारित करने तथा मूल्यांकन कर्ता के लिए उसके द्वारा कर्मचारी का उसकी प्रगति के लिए सुझाव, सहायता मार्गदर्शन एवं शिक्षा देने में सहायता प्रदान करता है।

एक प्रभावी निष्पादन मूल्यांकन कार्यक्रम की अनिवार्यतायें 

प्रत्येक संगठन को कर्मचारियों के निष्पादन मूल्यांकन हेतु कार्यक्रम को पूर्व निर्धारित कर लेना चाहिए। एक प्रभावी निष्पादन मूल्यांकन कार्यक्रम में निम्नलिखित बातों का सामवेश किया जाना आवश्यक होता है।
  1. निष्पादन मूल्यांकन कार्यक्रम को आयोजित किये जाने से पूर्व इसके उद्देश्यों का स्पष्ट रूप से निर्धारण कर लिया जाना चाहिये। 
  2. मूल्यांकन हेतु आवश्यक कार्य-गुणों एवं निष्पादन मानकों का निर्धारण तथा उनकी स्पष्ट रूप से व्याख्या की जानी चाहिए। 
  3. संगठन द्वारा एक वर्ष में किये जाने वाले कुल मूल्यांकनों की संख्या एवं उनकी अवधि को भी निर्धारित कर देना चाहिये।
  4. प्रत्येक संगठन को अपने व्यवसाय, कार्य-प्रणालियों तथा कर्मचारियों के स्तरों को ध्यान में रखते हुए ही मूल्यांकन की विधियों का चयन करना चाहिए। इस सम्बन्ध में प्रतिस्पध्र्ाी संगठनों में प्रचलित मूल्यांकन विधियों का भी समुचित अध्ययन कर लिया जाना चाहिये। 
  5. मूल्यांकन हेतु ऐसी विधियों का चयन किया जाना चाहिए जो कि सही परिणाम दे सकें तथा जिससे कर्मचारियों में संगठन के प्रति विश्वास का सृजन हो सके। 
  6. मूल्यांकन कार्यक्रमों के लक्ष्यों एवं उद्देश्यों, मूल्यांकन की प्रक्रिया तथा इसकी विधियों आदि के विषय में कर्मचारियों को पूर्ण रूप से अवगत कराना चाहिए। 
  7. सम्पूर्ण मूल्यांकन प्रक्रिया निष्पक्ष एवं न्यायपूर्ण होनी चाहिए 
  8. मूल्याकंन के परिणामों की सूचना भी सम्बन्धित कर्मचारियों को दी जानी चाहिये, जिससे कि वे उनके विषय में अपनी प्रतिक्रियायें व्यक्त कर सकें तथा यदि आवश्यक हो तो, अपने निष्पादन में सुधार कर सके। 
  9. मूल्यांकन कार्यक्रम की समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिये, जिससे कि उनमें आवश्यकतानुसार संशोधन किया जा सके। 
  10. मूल्यांकन का कार्य योग्य एवं निष्पक्ष मूल्यांकन कर्ताओं को सौंपा जाना चाहिये, जो कि उद्देश्यपूर्ण रूप से एंव विवेक के आधार पर अच्छी तरह से सोच-विचार कर निर्णय कर सके।

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