पत्रकारिता के क्षेत्र एवं उनकी रिपोर्टिंग

Table of content


पत्रकारिता का सबसे महत्वपूर्ण अंग रिपोटिर्ंग है। अगर रिपोर्टिंग ही न हो तो पत्रकारिता की कल्पना भी नहीं की जा सकती। आज भी आम आदमी के मन में पत्रकार के रूप में सिर्फ रिपोर्टर की ही छवि बनती है। रिपोर्टर वाकई में पत्रकारिता का सबसे अधिक सार्वजनिक चेहरा है। रिपोर्टर से उसके अखबार की पहचान होती है तो रिपोर्टर की पहचान उसकी रिपोर्टो से होती है। पत्रकारिता में कार्य की सुविधा के लिए रिपोर्टरों को अलग-अलग क्षेत्र में काम करने का अवसर दिया जाता है। इन अलग-अलग क्षेत्रों को सामान्य अथोर्ं में ‘बीट’ कहा जाता है मसलन अपराध की खबरों की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार की ‘बीट’ अपराध कही जाएगी और राजनीति में काम करने वाले की पॉलीटिकल बीट। बीट पर पत्रकारिता के कई अलग-अलग क्षेत्र हैं जैसे अपराध रिपोटिर्ंग, खेल रिपोटिर्ंग एवं शिक्षा रिपोर्टिंग आदि। इन अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाले रिपोर्टर को अपने-अपने क्षेत्र में रिपोर्टिग करने के लिए कुछ अलग तरीके से अपने को तैयार करना होता है। हर क्षेत्र के अपने कुछ खास कायदे और नियम हैं। उन्हें जाने समझने बिना पत्रकार अपने क्षेत्र का अच्छा रिपोर्टर नहीं बन सकता। और आज तो वैसे भी विषेशज्ञता पत्रकारिता का जमाना है आज एक पत्रकार रिर्फ खेल पत्रकारिता से कैरियर शुरू कर खेल के संपादक के पद तक पहुंच सकता है। ऐसा ही दूसरे क्षेत्रों में भी है। इसलिए पत्रकार जो भी क्षेत्र अपने लिए चुने उसे वहां विषेशज्ञता हासिल करने की पूरी-पूरी कोशिश करनी चाहिए। इंट जितनी मजबूत होगी इमारत उतनी ही मजबूत बनेगी। इलेक्ट्रानिक मीडिया ने खेल, व्यापार, धर्म, अपराध आदि क्षेत्रों में रिपोर्टिंग को एक नया तेवर और नया अंदाज दिया है।

इलेक्ट्रानिक मीडिया के कारण पत्र-पत्रिकाओं में भी रिपोटिर्ंग के तौर तरीके बदल रहे हैं। आप किसी बड़े मैच की खबर का प्रस्तुतिकरण और उसके लिखे जाने का तरीका एकदम बदल गया है। खबर अब अधिक सजीव, संक्षिप्त और जानकारियों से भरी होने लगी हैं। रिपोर्टिग का बदलता चेहरा पत्रकारिता में नई उम्मीदों का चेहरा है इसलिए किसी भी नए पत्रकार को रिपोर्टिंग के हर गुर को बारीकी से सीखने और स्वयं को उसके अनुरूप विकसित करने पर जोर देना चाहिए।

अपराध रिपोर्टिंग

 पत्रकारिता के बदलते स्वरूप के साथ ही अपराध पत्रकारिता भी पूरी तरह बदल गयी है। वर्तमान में अपराध की खबरों को प्रमुखता से प्रकाशित किया जाने लगा है। प्रथम पृश्ठ से लेकर अन्य अन्य महत्वपूर्ण पृश्ठों पर भी अपराध की खबरें प्रमुखता से दिखती हैं। जिस तरह अपराध पत्रकारिता की खबरें बढ़ रही हैं, उसी तरह इसमें बेहतर रिपोर्टिंग करने वालों की भी मांग बढ़ी है। समाज में घटने वाली दैनिक घटनायें जैसे- लूट, डकैती, हत्या, बलात्कार, अपहरण, दुर्घटना आदि की कवरेज करने वाले को अपराध संवाददाता कहा जाता है। अपराध संवाददाता की समाज में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अगर वह गलत तथ्य प्रस्तुत कर देता है, तो इससे समाज को काफी नुकसान भी हो सकता है। अगर अपराध संवाददाता अपने पेशे का सम्मान करते हुए समाज के सामने असलियत प्रस्तुत करने की हिम्मत करता है तो वह बेखौफ पत्रकार की ख्याति अर्जित कर लेता है। अपराध बीट की रिपोर्टिंग बेहद संवेदनशील होती है। इस बीट के रिपोर्टर को अत्यंत व्यवहार कुशल और हरफनमौला होना चाहिये। इस बीट को रफ एंड टफ माना जाता है। इस बीट के रिपोर्टर का अपराधियों से लेकर अक्खड़ पुलिस वालों तक से वास्ता पड़ता है। इसलिए हमेशा चौकन्ना रहने की आवष्यकता होती है। उसके सामने प्रतिदिन कई तरह के मुष्किल हालात पैदा हो जाते हैं। कभी किसी निर्दोश को पुलिस बड़ा अपराधी बताकर पेश कर देती है। इसमें अखबार को भी हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। कभी कोई शातिर अपराधी कानून की धाराओं में रिपोर्टर को उलझा देता है। रिपोर्टर के सामने कई तरह की चुनौतियां भी आती है। जिनमें रिपोर्टर को अत्यंत संजीदगी से रिपोर्टिंग करने की आवष्यकता होती है। कुशल अपराध रिपोर्टिंग के लिए व्यावहारिक ज्ञान के साथ ही अपराध से जुडे़ कानूनों की भी पूरी जानकारी होनी चाहिये।

खासकर भारतीय दंड संहिता, वरिश्ठ पुलिस अधिकारियों की शक्तियां, न्यायालयों की शक्तियां, गिरफ्तारी के नियम, शाति व सदाचार कायम रखने के लिए जमानत के नियम, पुलिस का कामकाज, पुलिस के पास जांच की शक्तियां, हाजिर होने को विवशा करने वाली आदेशिकायें आदि के बारे में रिपोर्टर को विस्तृत जानकारी होनी चाहिये। शहर की कानून व्यवस्था कैसी है, किस तरह के अपराधी अधिक सक्रिय है  किन अपराधियों को सफेदपोषों का वरदहस्त प्राप्त है, पुलिस की कार्यशैली किस तरह की है, इन बिन्दुओं को बारीकी से समझे बिना अच्छी रिपोर्टिंग नहीं हो सकती। अपराध संवाददाता को पुलिस मैनूअल भी पढ़ना चाहिये। इससे पुलिस की शक्तियों व कानूनी कार्यशैली का ज्ञान भी हो जाता है।

रिपोर्टिंग की शुरुआत करते ही रिपोर्टर को सभी थानों, पुलिस चौकियों, डी एस पी, एस पी, एस एस पी, डी आई जी आदि अधिकारियों के बारे में जानकारी और उनके फोन नंबर हासिल कर लेने चाहिये। इसके साथ ही पुलिस अधिकारियों से लेकर थानाध्यक्षों, ए एस आई व थाने के मुंशी तक के साथ मुलाकातों व तालमेल शुरू कर देना चाहिये। जितने अधिक संपर्क बनेंगे, उतनी जल्दी सूचना मिलेगी। इसके बाद उस सूचना को डेवलप करने का भी मौका मिलेगा।

इससे प्रतिट्ठंट्ठी अखबार की तुलना में अधिक ठोस व तथ्यात्मक रिपोर्टिंग हो सकेगी। इसके साथ ही अपराध की खबरों के लिए मुख्यतौर पर थाने के अलावा अस्पताल भी मुख्य केन्द्र होता है। अस्पताल में पुलिस केस बनने लायक आये लड़ाई-झगड़ों से लेकर एक्सीडेंट, आत्महत्या, हत्या के प्रयास जैसे मामले आते हैं।

अपराध संवाददाता को कवरेज के समय कई और महत्वपूर्ण मामलों पर ध्यान देने की आवष्यकता होती है। अगर दहेज के मामले में की गई हत्या की रिपोर्टिंग करनी है, तो इसे बेहद संजीदगी से करने की जरूरत होती है। दहेज विरोधी कानून महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों को रोकने के उददेष्य से बनाया गया है, जिससे कि दहेज लोभियों को सख्त सजा मिल सके। वर्तमान में अधिकांश मामलों में इस कानून का दुरूपयोग होता दिख रहा है। महिला किसी भी कारण से क्यों न मरी हो, लेकिन लड़की के घर वाले लड़के के परिवार के सभी सदस्यों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवा देते हैं। इसमें कई बार निर्दोश व्यक्ति भी फंस जाता है। इस स्थिति में रिपोर्टर को केवल पुलिस थाने में रिपोर्ट के आधार पर ही खबर नहीं बनानी चाहिये, बल्कि पूरे मामले की अपने स्तर से भी तहकीकात करनी चाहिये। इस कार्य को संवाददाता को अपनी जिम्मेदारी समझकर करना चाहिये। इससे समाज में उसकी साख तो बढ़ेगी ही, साथ ही खबर भी संतुलित होगी।

राजनैतिक रिपोर्टिंग 

किसी भी समाचार पत्र के लिए राजनीति की खबरें बेहद महत्वपूर्ण होती हं।ै इस समय अखबारों से लेकर टीवी चैनलों में राजनीति की खबरों को ज्यादा ही प्रमुखता दी जा रही है। इस बीट से निकलने वाली खबरों के पाठकों का दायरा भी विशाल होता है। राजनीतिक बीट अपने आप में विविधतायें लिये हुए है। इस बीट की खबरों की कवरेज के लिए रिपोर्टर की भी बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है। इस बीट के संवाददाता को अपने क्षेत्र में दक्ष होना चाहिये। तभी वह बेहतर रिपोर्टिंग कर सकता है। उसे अपने क्षेत्र के सभी नेताओं से संपर्क स्थापित करना चाहिये। सभी बडे़ नेताओं के फोन नंबर भी रखने चाहिये। ताकि जब कभी भी उनका वर्जन जानने की जरूरत पड़े, तो आसानी से बात हो सके।

संवाददाता को सबसे पहले राजनीतिक दलों के बारे में विस्तार से जानकारी ले लेनी चाहिये। किस दल की क्या नीतियां है। और किन उदेदष्यों को लेकर एजेंडा तैयार किया जाता है। कौन सी पार्टी किस विचारधारा से जुड़ी हुई है। राजनीतिक दल राश्टी्रय स्तर पर काम करने वाला हो या राज्य स्तर पर या फिर जिला स्तर पर रिपोर्टर को सभी राजनीतिक दलों की नीतियों को अवष्य समझना चाहिये।

संवाददाता को अपने क्षेत्र के राजनीतिक समीकरणों को समझने की भी कोशिश करनी चाहिए। विधायकों, मंत्रियों के साथ कौन-कौन से चेहरे नजर आते हैं, इनके साथ चलने वाले लोग कैसे हैं, किन उद्योगपतियों, व्यापारियों से किन-किन नेताओं के संबंध हैं। नेताओं के संरक्षण में किन अपराधियों को संरक्षण मिल रहा है, इन सबकी भी उसे खबर रखनी चाहिए।

राजनैतिक संवाददाता को नेताओं की गतिविधियों पर नजर रखनी होती है। सार्वजनिक समारोहों में आते-जाते रहने से संवाददाता के संतरी से लेकर मंत्री तक से उसके संबंध हो जाते हैं। लगातार संपर्क में रहने से राजनीतिक समीकरण भी अच्छी तरह समझ में आने लगते हैं। इसके बाद समाचार बनाने में आसानी होने लगती है। राजनीतिक संवाददाता को राजनीतिक दलों की धड़ेबंदी को भी समझने का प्रयास करना चाहिये। लगभग सभी दलों में राश्टीय स्तर से लेकर जनपद व नगर स्तर तक दलों में गुटबाजी नजर आती है। इस तरह की गुटबाजी सबसे अधिक चुनावों के समय नजर आती है। पार्टी के जिस कार्यकर्ता को टिकट मिल जाता है, वह चुनाव प्रचार में लग जाता है। लेकिन, जिसे टिकट नहीं मिलता है, वह अपनी ही पार्टी से टिकट पाने वाले का विरोध करने लगता है। यहां तक कि उसके वोट काटने का भी प्रयास करता है। चुनाव के समय की गुटबाजी फिर बाद तक चलती रहती है।

नेता चुनाव में सहयोग नहीं करने वाले को अपने रास्ते से हटाने की भी कोशिश करता है। इस तरह की गुटबाजी व धड़ेबंदी को समझ कर संवाददाता अच्छी खबरें बना सकता है। खबर तथ्यात्मक व प्रामाणिक भी होनी चाहिए। परिपक्व खबर ही पाठकों को पसंद आती हैं। राजनीतिक संवाददाता के लिए रेफरेंस लायब्रेरी अत्यंत आवष्यक हैं। अगर उसके पास प्रदेश स्तर की राजनीतिक घटनाओं का पूरा ब्यौरा होगा, तो उसे खबर बनाने में आसानी होगी। इसके साथ ही वह खबर का बारीकी से विष्लेशण कर सकता है। पुराने तथ्यों के साथ कई ऐंगल से खबर बना सकता है। इसके लिए संवाददाता के पास प्रदेश की राजनीति से जुड़ी अहम खबरों की कतरनें, चुनावी आंकडे़, विधानसभा में होने वाली कार्रवाई की प्रकाशित रिपोर्टें आदि होनी चाहिये।

राजनीति बीट में काम करना बेहद चुनौतीपूर्ण भी है। अगर पत्रकार अपने क्षेत्र की राजनीति की बारीक समझ रखता है तो वह कई मौकों पर पुर्वानुमान आदि भी कर सकता है। वह अपनी विष्लेशण शक्ति से राजनीति के समीकरण बदल भी सकता है। लेकिन राजनीतिक पत्रकारिता कर रहे संवाददाता को इस चीज का हतेशा ध्यान रखना चाहिए कि उसके राजनेताओं से सम्बन्ध सिर्फ पेशेवर हैं, व्यक्तिगत नहीं, और इसी लिए उसे नेताओं के व्यक्तिगत प्रभाव में आने से बचने की नीति पर चलना चाहिए।

न्यायिक रिपोर्टिंग 

अदालतों के समाचारों में सबसे अधिक सावधानी बरतने की आवष्यकता होती हैं। न्यायिक कार्रवाई के समाचारों को लिखते समय विषेश रूप से ध्यान रखना होता है। जब तक किसी व्यक्ति पर अभियोग सिद्ध नहीं हो जाता है, वह अपराधी नहीं हो शेसकता है। इसलिए समाचार लिखते समय ध्यान रहे कि उसे अपराधी न लिखा जा सकता है। अपराधी तभी लिखा जाए जब मुकदमे के फैसले के बाद अपराध सिद्ध हो जाए। अपराध सिद्ध न होने तक उसे आरोपी या अभियुक्त लिखा जा सकता है।

मुकदमे से पहले लिखाई गई रिपोर्ट के आधार पर भी समाचार लिखा जा सकता है लेकिन इसमें सूत्र का उल्लेख अवष्य किया जाना चाहिये। शिकायतों, आरोपों, गिरफ्तारियों तथा कानूनी कागजों के आधार पर समाचार लिखे जा सकते हैं।

अदालती कार्रवाई के समाचार सुनी-सुनाई बातों पर नहीं लिखे जा सकते हैं। संवाददाता द्वारा लिखी गयी खबर एकतरफा भी नहीं होनी चाहिये। दूसरे व्यक्ति के मान-सम्मान में ठेस पहुंचे, ऐसा नहीं लिखा जाना चाहिये। अदालतों के समाचारों की भाशा बेहद संयत होनी चाहिये। भाशा के साथ रिपोर्टर को कानून की जानकारी भी होनी चाहिये। विभिन्न न्यायालयों जैसे-उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय, सत्र न्यायालय, मजिस्टेट कोर्ट आदि की जानकारी होनी जरूरी है। अगर रिपोर्टर विभिन्न न्यायालयों की न्यायिक प्रक्रिया को अच्छी तरह समझता है तो उसे रिपोर्टिंग करने में आसानी होगी। इसके साथ ही वह अच्छी खबरें लिख सकता है। अदालती कार्रवाईयों को समझने के लिए वकीलों के संपर्क में रहना चाहिये। कोर्ट के लिपिक से भी संबंध बनाये रखना चाहिये। जब तक अदालती कार्रवाई की भाशा समझ में नहीं आती है, तब तक खबर नहीं बनानी चाहिये। इसे समझने के लिए वकील से संपर्क करना चाहिये। अदालत के किसी फैसले के बाद आपके लिखे समाचार से जनता में अविष्वास की भावना नहीं पनपनी चाहिये। कानून संवाददाता के रूप में बेहतर कार्य से ख्याति भी अर्जित की जा सकती है। इन दिनों सभी प्रमुख समाचार पत्रों में लॉ रिपोर्टर की मांग बढ़ रही है।

महत्वपूर्ण फैसलों की कापी देखने के बाद ही खबर लिखी जानी चाहिए। कई बार सम्बन्धित वकील अपने पक्ष के नजरिए से ही फैसले का विवरण बता देते हैं। इस विवरण के आधार पर ही खबर बना देने से खबर गलत या एक पक्षीय हो सकती है। जिन मामलों में अदालती कार्रवाई चल रही हो उनकी खबरें बनाते समय अति उत्साह से बचना चाहिए। जो रिपोर्टर को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि वह सिर्फ पत्रकार है, अदालत नहीं, हालांकि मौजूदा दौर में पत्रकारिता के दबाव के कारण कई बड़े आपराधिक मामलों में न्याय जल्दी हुआ है लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अयोध्या विध्ंवस के मुकदमें और आरूशी हत्या काण्ड जैसे मामलों में अदालतों को पत्रकारों को अपनी सीमा में रखने के लिए निर्देश तक जारी करने पडे़ थे।

खेल रिपोर्टिंग 

वर्तमान में खेलों के प्रति लोगों का रूुझान अधिक बढ़ गया है। इसके चलते देश के प्रमुख समाचार पत्रों में एक या दो पृश्ठ खेल समाचारों के ही होते हैं। इसमें सबसे अधिक समाचार क्रिकेट से संबंधित होते हैं। इसके अलावा हाकी, फुटबाल से लेकर जूडो, बास्केटबॉल,शतरंज, एथलैटिक्स, निशानेबाजी, बैडमिंटन, तैराकी, स्केइंग, घुडदौड, डॉग शो जैसे खेल मुख्य हैं। जिनसे संबंधित समाचार समय-समय पर प्रकाशित होते रहते हैैं। इसलिए अब प्रत्येक अखबारों व चैनलों में खेल पत्रकार मांग बढ गयी है।

एक सफल खेल पत्रकार बनने के लिए खेल की समझ होना सबसे जरूरी है। खेल पत्रकारिता एक तरह की विषेशज्ञता पत्रकारिता है इस लिए यदि खेल पत्रकार को खेलों के नियम, प्रतियोगिताओं आदि की जानकारी नहीं होगी तो वे अच्छी रिर्पोर्टिग कर ही नहीं सकता। एक अच्छा खेल पत्रकार बनने के लिए खेलों से जुड़ी शब्दावली व भाशा की समझ भी विकसित करनी पड़ती है। संवाददाता को विभिन्न समाचार पत्र, पत्रिकाओं के अलावा खेल पत्रिकाओं का नियमित अध्ययन करना चाहिये। खेल पत्रकार को सबसे पहले जिला व प्रदेश स्तर से सीखने की जरूरत होती है। विद्यालय स्तर व कालेज स्तर पर खेलों का आयोजन होता है। इनकी कवरेज पर नजर रखनी चाहिये। इसके अलावा जिला, मंडल व प्रदेश स्तर ख्ेोल अधिकारी होते हैं। खेलों से संबंधित विभिन्न संगठन होते हैं। इनके माध्यम से समय-समय पर खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। खेल पत्रकार को अपने क्षेत्र में दक्ष बनने के लिए स्वयं को खिलाडी महसूस करना चाहिये। खेलों से संबंधित शब्दों की जानकारी होनी चाहिये। संवाददाता जिस शहर में भी कार्य कर रहा है, उस क्षेत्र में स्टेडियम और खेल के मैदान की स्थिति पर खबर बना सकता है। सरकार द्वारा खेलों के प्रोत्साहन के लिए क्या-क्या किया जा रहा है। इसके साथ ही उभरते खिलाडियों से संबंधित खबरें छापी जानी चाहिये। वरिश्ठ खिलाडियों के साक्षात्कार भी प्रकाशित किये जाते हैं।

खेल पत्रकारिता के लिए यह भी जरूरी है कि पत्रकार अपने क्षेत्र के प्रमुख खिलाड़ियों, खेल विषेशज्ञों और खेलों से जुड़ी संस्थाओं के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं से बेहतर सम्बन्ध बना कर रखे। खिलाड़ियों से व्यक्तिगत सम्बन्ध कई बार बेहद लाभदायक होते हैं।

खेल पत्रकार को अपने क्षेत्र से सम्बन्धित हर खेल और खिलाड़ी से जुड़े आंकड़े और सन्दर्भ जमा रखने चाहिए। कम्प्यूटर में भी इन्हें सुरक्षित रखा जा सकता है। ताकि जब भी जरूरत पड़े उनका इस्तेमाल कर अपनी खबर को सबसे अलग बनाया जा सके।

कला, संस्कृति व फिल्म रिपोर्टिंग 

कला, संस्कृति व फिल्म रिपोर्टिंग बेहद संवेदनशील होती है। कला व संस्कृति से जुड़ी खबरें पाठक को सुकून प्रदान करने वाली होती हैं। इस क्षेत्र में काम करने वाले संवाददाता में साहित्यिक समझ जरूर होनी चाहिये, कला की समझ होनी चाहिये। भाशा को साहित्यिक बनाने का प्रयास करना चाहिये। निरंतर स्तरीय साहित्य पढने, लेखन “ौली में कलात्मकता से यह विधा आसानी से सीखी जा सकती है। कला व संस्कृति से जुडी खबरों के प्रस्तुतिकरण के लिए संबंधित कला की जानकारी होनी भी आवष्यक है। इस बीट से संबंधित खबरों में विषेशणों का प्रयोग किये जाने से रोचकता बढ जाती है।

शहर में कोई कलाकार आया हो, सांस्कृतिक कार्यक्रम हो रहे हों, रंगमंच की गतिविधियां हों, किसी मूर्तिकार की कृति पर लिखना हो तो यह कला व सास्कृतिक रिपोर्टर का काम है। इस बीट के रिपोर्टर को सांस्कृतिक संगठनों, सभागारों के प्रबंधकों, कला से जुडे लोगों से निरंतर संपर्क बनाये रखना होता है। इससे समय-समय पर आयोजित कार्यक्रमों की जानकारी मिल जाती है। इस बीट में दैनिक कार्यक्रमों में ही साक्षात्कार, फीचर और खास अभिनय से जुडी घटनाओं की रिपोर्टिंग की जा सकती है।

कला व फिल्म से संबंधित खबरों का भी अलग पाठक वर्ग होता है। समाचार पत्रों में तो अब फिल्म समाचार के लिए अलग पृश्ठ होता है। इसमें कलाकारों की बडी-बडी तस्वीरों के अलावा उनके साक्षात्कार प्रकाशित किये जाते हैं। नई फिल्मों की समीक्षा प्रकाशित की जाती है। इसलिए रिपोर्टर को फिल्मों की जानकारी होनी आवष्यक है। कलाकारों से लेकर निर्देशक व उससे जुडे लोगों के संपर्क में रहना चाहिये। फिल्म पत्रकारिता का मुख्य क्षेत्र मुंबई है लेकिन छोटे शहरों में भी क्षेत्रीय फिल्मों से लेकर फिल्म जगत से संबंधित कार्यक्रमों को कवरेज करने का मौका मिल जाता है।

यह भी एक विषेशज्ञ क्षेत्र है। संगीत हो या चित्रकला अगर रिपोर्टर को उसकी समझ ही नहीं होगी तो वह अच्छी रिपोर्टिंग नहीं कर सकेगा। ऐसे क्षेत्र में रिपोर्टर को रिपोर्ट लिखने से पहले खुद इस बात के लिए संतुश्ट होना जरूरी है कि वह जो खुद लिख रहा है उसमें कुछ अर्थ का अनर्थ तो नहीं हो रहा है। कलाकारों का मन बेहद आतुर होता है अत: किसी की समीक्षा करने से पहले उसकी भावनाओं को भी समझा जाना जरूरी है। इस बीट के संवाददाता का कला के प्रति संवेदनशील होना जरूरी है।

फिल्म पत्रकारिता आज रिपोर्टिंग का एक लोकप्रिय क्षेत्र है, लेकिन इसके लिए भी रिपोर्टर में समर्पण होना जरूरी है। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि सामने वाले फिल्म स्टार से रिपोर्टर खुद इतना प्रभावित न हो जाए कि रिपोर्टिंग महज प्रषंसा कर न रह जाए। फिल्म रिपोर्टिंग के लिए भी फिल्मों के इतिहास और फिल्मों की बारीक जानकारी होनी आवष्यक है।

शिक्षा रिपोर्टिंग 

बदलते जमाने के साथ ही समाचार पत्र के पाठकों की सोच में भी बदलाव आ रहा है। अगर युवाओं को कैरियर संबंधी जानकारी चाहिये या फिर शिक्षा से संबंधित कोई जानकारी, इसके लिए आज समाचार पत्र ही सबसे अधिक लाभदायक हो गए है। शिक्षा के स्वरूप को जानना अब लोगों के लिए जरूरत बन गया है। सामान्य शिक्षा से लेकर प्रोफेशनल स्तर तक की शिक्षा हासिल करने में आज की युवा पीढी की रूचि तेजी से बढ रही है। इसके चलते शिक्षा बीट का महत्व तेजी से बढ गया है। विष्वविद्यालयों की गतिविधियों, कैंपस की हलचल, विभिन्न पाठयक्रमों से संबंधित जानकारी आदि की खबरें इस बीट की महत्वपूर्ण खबरें हो सकती हैं। इसके अलावा विद्यालयों में होने वाले आयोजन भी अपने आप में खबरें होती हैं। शिक्षा विभाग के नई योजनाओं के अलावा उनके क्रियान्वयन का तरीका, शिक्षक संगठनों की बैठकें और उनके आंदोलनों की खबरें भी शिक्षा बीट के रिपोर्टर को निरंतर मिलते रहती हैं। सरकारी स्कूलों की हालत कैसी है? क्या विभागीय मानकों के आधार पर सब ठीक-ठाक चल रहा है? सरकारी स्कूलों की शिक्षा प्रणाली के अलावा निजी स्कूलों के शिक्षा व्यवस्था पर भी खबरें बनायी जा सकती हैैं।

दाखिले के समय किन कालेजों में एडमिशन के लिए मारामारी रहती है। किन विशयों को अधिक पसंद किया जा रहा है? लडकियों की रूचि किन विशयों में ज्यादा है? किस विद्यालय व कालेज का परीक्षा परिणाम कैसा रहा? इसके अलावा शिक्षा से संबंधित विषेश खबरें व फीचर भी लिखे जाते हैं। तथ्यों पर आधारित फीचर लिखे जा सकते हैं। इसके साथ-साथ ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में शिक्षा के स्तर में अंतर को भी आधार बनाकर फीचर तैयार किये जा सकते हैं। पाठक इस तरह की खबरों को बडे चाव से पढते हैं। इसके साथ ही कॅरियर संबंधी लेखों में भी पाठकों की दिलचस्पी होती है। इसके लिए संवाददाता को शिक्षा से जुडे लोगों से अधिक से अधिक संपर्क स्थापित करना चाहिए। शिक्षाविदों से भी संबंध स्थापित करना चाहिये।

शिक्षा के व्यवसायीकरण के साथ-साथ शिक्षा का निजी क्षेत्र भी अब समाचार समूहों के लिए एक बड़ा विज्ञापन दाता वर्ग हो गया है। निजी शिक्षा संस्थान अपने संस्थानों की छवि को अधिक से अधिक बढ़ा चढ़ा कर पेश करना चाहते हैं, वे इसके लिए सम्बन्धित रिपोर्टर पर दबाव बनाने से भी बाज नहीं आते। कई बार रिपोर्टर को अपने संस्थान के विज्ञापन विभाग से भी इस तरह के दबाव सहने पड़ते हैं। ऐसे में रिपोर्टर को पत्रकारिता की साख बनाने की कौशलता जरूर आनी चाहिए। शिक्षा रिपोर्टिंग का एक बड़ा सकारात्मक पहलू यह भी है कि इसके जरिए रिपोर्टर भावी पीढ़ी को एक रास्ता दिखा सकता है। उसके जीवन की दिशा बदल सकता है।

बाल पत्रकारिता की रिपोर्टिग 

युवा व बुजुर्ग ही नहीं बल्कि अब बच्चे भी अखबार पढने पढने में रूचि दिखा रहे हैं। इसलिए समाचार पत्रों में बच्चों से संबंधित सामाग्री भी प्रकाशित की जा रही है। इसमें और अधिक कार्य करने की आवष्यकता है। बच्चों की कहानियां, कार्टून के माध्यम से जागरूक करना मुख्य उदेदष्य होना चाहिये। बच्चों का ज्ञानवर्धन करने के साथ ही उनका मनोरंजन करने के लिए शिक्षाप्रद कहानियां लिखनी होती हैं। अब कुछ प्रमुख समाचार पत्र सप्ताह में एक बार बच्चों के लिए कुछ न कुछ प्रकाशित करते रहते हैं। इसमें विज्ञान व तकनीकी की जानकारी होती है। जानवरों से संबंधित कहानियां होती हैं। स्वास्थ्य संबंधी टिप्स दिये होते हैं। इसके जरिये बच्चों को विष्व स्तरीय अनेक जानकारियां दिये जाने का प्रयास रहता है। वैसे अब बच्चों से संबंधित कई पत्रिकायें भी प्रकाशित हो रही हं।ै बच्चों की सृजनात्मकता बढाने के लिए क्विज प्रतियोगिता भी आयोजित की जाती है। इसके बाद समाचार पत्रों में बच्चों द्वारा लिखित सामाग्री भी प्रकाशित की जाती है।

बाल पत्रकारिता एक बेहद संवेदनशील विशय है। बच्चों का मन अत्यन्त नाजुक होता है, कोई भी नई बात, विचार या जानकारी उस पर गहरा असर डालती है। इसलिए बाल पत्रकारिता या बच्चों के लिए रिपोर्टिंग करना बडी जिम्मेदारी का काम है। आज के बच्चों में सीखने की ललक पिछले दौर के बच्चों से कही अधिक है। बच्चों की रचनात्मकता का भी अब अधिक तेजी से विकास हो रहा है। बच्चे खुद पत्रकारिता करने लगे हैं। इसलिए बाल पत्रकारिता का क्षेत्र बहुत अधिक विषेशज्ञ दक्षता वाला क्षेत्र हो गया है। आज बच्चों की अनेक पत्रिकाएं निकल रही है जिस कारण इस क्षेत्र में रोजगार के अवसर भी बढ़ रहे हैं, लेकिन यह काम दायित्व बोध वाला काम है। इस बात को हर नए पत्रकार केा ध्यान में जरूर रखना चाहिए।

खोजी पत्रकारिता की  रिपोर्टिंग

आधुनिक पत्रकारिता ने जिस तरह विकास किया है, उसी तरह उसके स्वरूप में भी बदलाव आया है। खोजी पत्रकारिता आज पत्रकारिता का एक नया आयाम बन गयी है। वर्तमान में खोजी पत्रकारिता पत्रकारिता का महत्वपूर्ण हिस्सा हो गयी है। प्रिंट मीडिया के साथ ही इलेक्टानिक मीडिया ने भी खोजी पत्रकारिता को नई पहचान दी है।

खोजी पत्रकारिता को आरंभ करने का श्रेय अमेरिका के समाचार पत्र न्यूयार्क वल्र्ड के संपादक जोसेफ पुलित्जर को दिया जाता है। पष्चिम में खोजी पत्रकारिता आज भी बहुत अधिक महत्व रखती है। भारत में अभी इसके और विस्तार की अत्याधिक सम्भावनाएं हैं।

समाज में कई घटनायें आसानी से सामने नहीं आ पाती हं।ै पहुंच और रसूख वाले लोग बडे मामलों को पचाने में लगे रहते हैं। इस स्थिति में खोजी पत्रकार को निभ्र्ाीकता से तथ्यों की खोज करनी होती है। इसके लिए कई माध्यमों का सहारा लिया जाता है। जोखिम भरे इस कार्य के लिए उसे गोपनीय सूचनाओं को एकत्रित करने के बाद सच को सामने लाना होता है। खोजी पत्रकारिता एक तरह का युद्ध होता है। रिपोर्टर को अन्याय, असत्य, अनैतिकता, बुराई में लिप्त लोगों को बेनकाब करना होता है। इसमें बडे अपराधी भी हो सकते हैं, या फिर राजनेता और नौकरशाह भी हो सकते हैं। रिपोर्टर के लिए बेहद गोपनीय सूचनाओं को एकत्रित करना और उनका विष्लेशण कर जनता के सामने प्रस्तुत करना एक चुनौतीभरा काम है।

लेकिन, वर्तमान में खोजी पत्रकारिता का महत्व बढ रहा है। युवा पत्रकार निभ्र्ाीकता से समाज के लिए कलंक बन चुके लोगों के सफेदपोश चेहरों को बेनकाब करने में जुटे हैं।

इलेक्ट्रानिक मीडिया ने खोली पत्रकारिता को नई पहचान और नए आयाम दिये हैं। स्टिंग आपरेशन खोजी पत्रकारिता का एक आक्रामक रूप है लेकिन नए पत्रकार को उस स्तर तक पहुंचने के लिए काफी मेहनत और अनुभव की आवष्यकता होती है। लालांकि यह भी सच है कि नए पत्रकार में अपार ऊर्जा होती है और वह चाहे तो छोटी-छोटी खबरों की गहरी छानबीन कर खोजी पत्रकारिता के नए मापदण्ड स्थापित कर सकता है।

विकास पत्रकारिता की रिपोर्टिंग 

मीडिया के प्रति लोगों की धारणा बदल रही है। अब पत्रकारिता केवल सीमित विशयों पर ही केन्द्रित नहीं रह गयी है। नई पत्रकारिता सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, प्राविधिक संबंधी समग्र विकास के पहलुओं पर प्रकाशडालने वाली विकास पत्रकारिता है। विकास पत्रकारिता विकास पर आधारित होती है। यह विकास चाहे उद्योग, औशधि, विज्ञान अथवा किसी अन्य क्षेत्र का हो अथवा मानव संसाधन का हो इस क्षेत्र में आता है। राज्य सरकारें अपनी विकास योजनाओं को जनता तक पहुंचाने के लिए पत्र तक निकालती हैं। इन योजनाओं को खबरों के माध्यम से भी किया जाता है।

विकास पत्रकारिता सामान्य पत्रकारिता से हटकर होती है। इसमें सरकार की नीतियां, आर्थिक बदलाव, सामाजिक कार्यक्रम शामिल रहते हैं। पंचवश्र्ाीय योजना से संबंधित खबरें बनायी जा सकती हैं। विभागीय मुददों पर आधारित जानकारी रिपोर्टर खबर के माध्यम से प्रस्तुत कर सकता है। सरकार व उससे जुडे संगठनों की योजनायें, कार्यक्रम, परियोजनायें जनता के हित में कितने कारगर है इनका क्रियान्वयकन कौन कर रहा है और किस तरह हो रहा है, यह सब इस क्षेत्र के विशय हैं। खाद्य उत्पादन, नई सडकों का निर्माण, घरों का निर्माण, पीने के पानी की आपूर्ति, बिजली, दूरसंचार आदि की सुविधाओं का हाल शहरों के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में भी देखा जाना चाहिए और उस पर खबरे बनाई जानी चाहिए। लोगों के लिए हास्पिटल, स्वास्थ्य केन्द्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र और विद्यालयों खुलने की जरूरत पर आधारित रपट पठनीय तो होती ही है साथ ही समाज के विकास में सहयोगी भी होती हैं। इस तरह की खबरों से नेताओं के कान भी खुलते हैं।

इस बीट में कार्य करने वाले संवाददाता को दक्ष होने की आवश्यकता है। अगर संवाददाता योग्य है तो सफलतापूर्वक रिपोर्टिंग कर सकता है। रिपोर्टर विभिन्न विकास कार्यक्रमों से सूचना एकत्रित कर सकता है। परियोजनाओं के प्रमुखों का साक्षात्कार किया जा सकता है।

आज जिस तरह विकास की परिभाशा बदल रही है। विकास के नए-नए माडल सामने आ रहे है। उसी तरह विकास पत्रकारिता का महत्व और जरूरत भी बदलती जा रही है। विकास आज राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा है। सरकारें विकास के लिए नित नए -नए कार्यक्रम और योजनाएं बनाती है। विकास पत्रकारिता इन पर नजर रख कर इनकी गड़बड़ियों, भ्रश्टाचार, अव्यवस्थाओं और कमियों को उजागर कर समाज के रखवाले का काम भी करती है। इस लिए इस क्षेत्र के पत्रकार के लिए रिपोर्टिंग करना महज पत्रकारिता नहीं बल्कि एक तरह का आंतरिक सुख भी होता है।

ग्रामीण एवं कृषि पत्रकारिता की रिपोर्टिंग 

आकाशवाणी से प्रसारित ग्राम जगत, दूरदर्शन से प्रसारित कृषि जगत कार्यक्रम एवं कृषि से सम्बन्धित पत्रिकाएं ग्रामीण एवं कृषि पत्रकारिता से हमारा परिचय कराते हैं। भारत कृषि प्रधान देश है यहां की लगभग 70 प्रतिशत जनता गांव में निवास करती है और गांव की अधिकतम जनसंख्या कृशि पर निर्भर है। भारत एक कृषि प्रधान देश तो है, लेकिन अत्यन्त विकास के बावजूद भी गांवों में आज तक पिछड़ेपन की झलक स्पष्ट नजर आती है। गांवों में नवीन चेतना और जागृति तथा विज्ञान के विकास के स्वरों को समाचार पत्र-पत्रिकाओं व जनसंचार माध्यमों द्वारा ही यहां तक पहुंचाया जा सकता है।

Comments