समाचार संपादन क्या है?

अनुक्रम
‘समाचार संपादन’ में ‘समाचार’ संकलन एवं समाचार लेखन की चर्चा की गई है। इसके साथ ही समाचार संपादन कैसे होता है उस पर भी चर्चा की गई है। फीचर लेखन, लेख लेखन, साक्षातकार की चर्चा भी सविस्तार से की गई है।

समाचार संकलन 

एक पत्रकार को समाचार संकलन में यह स्रोत ही काम आता है क्योंिक कभी भी कोई समाचार निश्चित समय या स्थान पर नहीं मिलते। समाचार संकलन के लिए पत्रकारों को फील्ड में घूमना पड़ता है। क्योंिक कहीं भी कोई ऐसी घटना घट सकती है जो एक महत्वपूर्ण समाचार बन सकती है। किसी भी समाचार के लिए जरूरी सूचना एवं जानकारी प्राप्त करने के लिए समाचार संगठन एवं पत्रकार को कोई न कोई स्रोत की आवश्यकता होती है। यह समाचार स्राते समाचार संगठन के या पत्रकार के अपने हाते े हैं। स्रोतो में समाचार एजेंि सया भी आती हैं। इस समाचार स्रोतों को तीन श्रेणियो में बांट सकते हैं-
  1. प्रत्याशित स्रोत, 
  2. पूर्वानुमाति स्रोत, 
  3. अप्रत्याशित स्रोत 

प्रत्याशित स्रोत 

इस तरह के स्रोत पत्रकारों की जानकारी में पहले से ही होती है, सिर्फ उनसे संपर्क साधने और उनके द्वारा समाचार पाए जाने की कुशलता पत्रकार में होनी चाहिए। इनमें प्रमुख स्रोत है-
  1. पुलिस विभाग- सूचना का सबसे बड़ा केन्द्र पुलिस विभाग का होता है। परू े जिले में होनवे ाली सभी घटनाओं की जानकारी पुि लस विभाग को होती है, जिसे पुलिसकर्मी-प्रेस के प्रभारी पत्रकारों को बताते हैं।
  2. प्रेस विज्ञप्तियाँ- सरकारी विभाग, सार्वजनिक अथवा व्यक्तिगत प्रतिष्ठान तथा अन्य व्यक्ति या संगठन अपने से संबंधित समाचार को सरल और स्पष्ट भाषा में लिखकर ब्यूरो आफिस में प्रसारण के लिए भिजवाते हैं। सरकारी विज्ञप्तियाँ चार प्रकार की होती हैं। 
    1. प्रेस कम्युनिक्स- शासन के महत्वपूर्ण निर्णय प्रेस कम्युनिक्स के माध्यम से समाचार-पत्रों को पहुँचाए जाते हैं। इनके सम्पादन की आवश्यकता नहीं होती है। इस रिलीज के बाएँ ओर सबसे नीचे कोने पर संबंधित विभाग का नाम, स्थान और निर्गत करने की तिथि अंकित होती है। जबकि टीवी के लिए रिपोर्टर स्वयं जाता है। 
    2. प्रेस रिलीज- शासन के अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण निर्णय प्रेस रीलिज के द्वारा समाचार-पत्र आरै टी.वी. चैनल के कार्यालयो को प्रकाशनार्थ भेजे जाते हैं।
    3. हैण्ड आउट- दिन-प्रतिदिन के विविध विषयो, मंत्रालय के क्रिया-कलापो की सूचना हैण्ड-आउट के माध्यम से दी जाती है। यह प्रेस इन्फारमेशन ब्यूरो द्वारा प्रसारित किए जाते हैं। 
    4. गैर-विभागीय हैण्ड आउट- मौखिक रूप से दी गई सूचनाओं को गैर-विभागीय हैण्ड आउट के माध्यम से प्रसारित किया जाता है। 
  3. सरकारी विभाग- पुलिस विभाग के अतिरिक्त अन्य सरकारी विभाग समाचारों के केन्द्र होते हैं। पत्रकार स्वयं जाकर खबरों का संकलन करते हैं अथवा यह विभाग अपनी उपलब्धियों को समय-समय पर प्रकाशन हेतु समाचार-पत्र और टीवी कार्यालयों को भेजते रहते हैं। 
  4. कारपोरेट आफिस- निजी क्षेत्र की कम्पनियों के आफिस अपनी कम्पनी से संबंधित समाचारों को देने में दिलचस्पी रखते हैं। टेलीविजन में कई चैनल व्यापार पर आधारित हैं। 
  5. न्यायालय- जिला अदालतां,े उच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले व उनके द्वारा व्यक्ति या संस्थाओं को दिए गए निर्देश समाचार के प्रमुख स्रोत होते हैं। 
  6. साक्षात्कार- विभागाध्यक्षो अथवा अन्य विशिष्ट व्यक्तियों के साक्षात्कार समाचार के महत्वपूर्ण अंग होते हैं। 
  7. पत्रकार वार्ता- सरकारी तथा गैर सरकारी संस्थान अक्सर अपनी उपलब्धियों को प्रकाशित करने के लिए पत्रकारवार्ता का आयोजन करते हैं। उनके द्वारा दिए गए वक्तव्य समाचारों को जन्म देते हैं। 
  8. समाचारों का फालो-अप या अनुवर्तन- महत्वपूर्ण घटनाओं की विस्तृत रिपोर्ट रुचिकर समाचार बनते हैं। दर्शक चाहते हैं कि बड़ी घटनाओं के संबंध में उन्हें सविस्तार जानकारी मिलती रहे। इसके लिए संवाददाताओं को घटनाओं की तह तक जाना पडत़ा है।
  9. समाचार समितियाँ- देश-विदेश में अनेक ऐसी समितियाँ हैं जो विस्तृत क्षेत्रों के समाचारों को संकलित करके अपने सदस्य अखबारों और टीवी को प्रकाशन और प्रसारण के लिए प्रस्तुत करती हैं। 
मुख्य समितियों में पी.टी.आई. (भारत), यू.एन.आई.(भारत), ए.पी.(अमेरिका), ए.एफ.पी.(फ्रान्स), रायटर (ब्रिटेन) आदि। उपर्युक्त स्रोतों के अतिरिक्त सभा, सम्मेलन, साहित्यिक व सांस्कृतिक कार्यक्रम, विधानसभा, संसद, नगर निगम, नगरपालिका की बैठकें, मिल, कारखाने और वे सभी स्थल जहाँ सामाजिक जीवन की घटना मिलती है, समाचार के महत्वपूर्ण स्रोत होते हैं।

पूर्वानुमानित स्रोत 

इस श्रेणी में वे स्रोत होते हैं जहां से समाचार मिलने का अनुमान तो है लेकिन निश्चितता नहीं होती है। केवल अनुमान के आधार पर ऐसे स्रोतों से समाचार पाने के लिए निकाला जा सकता है। जैसे बडे नगरों में गंदी बस्तियो की समस्या, छोटे नगरों में गंदी सड़कों एवं नालियों की। इनसे जन जीवन कितना और किस तरह प्रभावित हो रहा है? अस्पतालों सफाई और स्वच्छता की क्या स्थिति है? वहां लंबी-लंबी लाईनें क्यों लगी रहती है? क्या चिकित्सकों की कमी है या नर्स और कंपाउंडर पूरे नहीं हैं? मरीजो को जमीन पर बिस्तर बिछाकर क्यों लिटाया जाता है? इसी तरह विश्वविद्यालय, महाविद्यालय, विद्यालय में शैक्षणिक समस्याएँ, इसकी आंतरिक राजनीति के क्या हाल हैं? सरकारी योजनाएं लागू की जाती है। उसे लागू करने के बाद उसका लोगों को लाभ मिला या नहीं। शिलान्यास किए जाने के बाद उस पर काम हुआ या नहीं? किसी निर्माण कार्य की प्रगति आदि ऐसे स्रोत हैं जहां पूर्वानुमाति होते हैं और महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

अप्रत्याशित स्रोत 

इस श्रेणी के स्रोतों से समाचार का सुराग पाने के लिए पत्रकार का अनुभव काम आता है। सतर्क दृश्टिवाले अनुभवी पत्रकारों को, जिनके संपर्क सूत्र अच्छे होते हैं, इस प्रकार के स्रोतों से समाचार प्राप्त करने से ज्यादा कठिनाई नहीं होती। इस प्रकार के समाचारों के संकेत बहुधा सहसा मिलते हैं, जिसे अनुभवी पत्रकार जल्दी ही पकड़ लते े हैं आरै उसके बाद उनकी खोज में लग जाते हैं। उदाहरण स्वरूप-

नगर के निर्माण विभाग ने एक बहुमंजिली विशालकाय इमारत बनाने का काम हाथ में लिया था। इसे दो वर्ष में पूरा हो जाना चाहिए था लेकिन डेढ़ साल के बाद भी अभी तक इसमें केवल चार मंजिलें बनकर तैयार हुई है जबकि काम दो तीन महीन से बंद पड़ा है। उधर से गुजरते हुए एक पत्रकार का ध्यान इस ओर गया तो उसने यह जानना चाहा कि इसका कारण क्या है? थोड़ी पूछताछ के बाद पता चला कि ठेकेदार ने काम बंद कर रखा है। ठेकेदार से बात करने पर पता चला कि उसने अपने बिलों के भुगतान के बारे में बहुत तंग किए जाने और अधिकारियो से लंबे समय तक संघर्ष करने के बाद अब काम बंद कर देना ही उचित समझा।

लेकिन विभागीय अधिकारियो का कहना कुछ और था। अधिशासी अभियंता का कहना था कि ठेकेदार ने काम निर्धारित निर्देशों के अनुसार नहीं किया, अत: उनके बिलों का भुगतान रोक दिया गया था, अब जांच कराई जा रही है। जब पत्रकार फिर ठेकेदार से मिला तो ठेकेदार ने उल्टे अधिकारियो पर आरोप लगाते हुए कहा कि चूँकि अधिकारीगण काफी मात्रा में पैसा खाना चाह रहे थे और वह ऐसा करने को तैयार नहीं था, इसीलिए उन्होनं े काम सही न होने का झूठा मामला बनाकर उसे सबक सिखाना चाहा था। पत्रकार के सामने जब स्थिति स्पष्ट न हो सकी तो वह एक स्वतंत्र स्थापत्य विशेषज्ञ से मिला और अपने समाचार पत्र का हवाला देते हुए उसने यह जानने का प्रयास किया कि क्या सचमुच में काम विशिष्ट निर्देशों के अनुसार नहीं हुआ है। पत्रकार ने स्थापत्य विशेषज्ञ से कहा कि मामला जनहित का है, इसलिए आपकी सहायता आवश्यकता है। स्थापत्य विशेषज्ञ ने पत्रकार में रुचि लेते हुए उसकी सहायता की। कुछ दिनों के सूक्ष्म निरीक्षण के बाद स्थापत्य विशेषज्ञ ने पत्रकार को स्पष्ट कर दिया कि यह बात सही है कि काम पूरी तरह से विशिष्ट निर्देशों के अनुसार नहीं किया गया है, लेकिन अब तक बन चुकी इमारत को कोई खतरा नहीं है।

अब समाचार एक सही दिशा की ओर बढ़ने लगा। जब संबंधित अधिकारियों की निजी संपत्ति के बारे में जानने का प्रयास किया तो यह पता चला कि दो अधिकारी इसी समय अपने अपने मकान भी बनवा रहे हैं। उनकी इमारतो पर आनवे ाला सामान आरै मजदूर आदि उसी ठेकेदार के थे जो बहुमंजिली सरकारी इमारत बनवा रहा था, लेकिन अब इन लोगो ने भी काम बदं कर दिया है। गहराई से छानबीन करने पर अंत में पता चला कि यह सारा मामला एक बहुत बड़ा घोटाला है जिसमें ठेकेदार और अधिकारी मिलकर सार्वजनिक धन का दुरूपयोग कर रहे हैं।

विभिन्न स्रोतो से समाचारों का सफलतापूर्वक अच्छा दोहन वही पत्रकार कर सकता है जो व्यवहार कुशल हो तथा मानव मन और स्वभाव को समझने की क्षमता रखता है। कहना न होगा कि स्रोतों का भरपूर लाभ उठाना अपने आप में एक कला है और इस कार्य में जो पत्रकार जितना दक्ष होगा उसके समाचारो में उतनी गहनता, नवीनता, सक्ष्ूमता और उपयोगिता होगी।

समाचार लेखन 

विभिन्न स्रोतों से जानकारियां हासिल करने के बाद पत्रकार उस सूचनाओं को समाचार के प्रारूप में ढालकर पाठकों की जिज्ञासा पूर्ति करने लायक बनाता है। समाचार लेखन की एक अलग शैली होती है जो साहित्य लेखन से भिन्न होती है। समाचार में पाठकों की जिज्ञासा जैसे कौन, क्या, कब, कहां, क्यों और कैसे प्रश्नो का उत्तर देना होता है। समाचार लिखते समय एकत्रित सामग्री से इन्हीं प्रश्नो का उत्तर पत्रकार को तलाशना होता है और पाठको तक उसके संपूर्ण अर्थ में पहुंचाना होता है। जब एक पत्रकार इन 2प्रश्नों के उत्तर समाचार में देने में सक्षम होता है तो पाठक/दर्शक/श्रोता में संबंधित समाचार संगठन के प्रति विश्वसनीयता बनी रहती है।

समाचार लेखन के सूत्र 

विज्ञान विषय की तरह समाचार लिखने का एक सूत्र है। इसे उल्टा पिरामिड सिद्धांत कहा जाता है। यह समाचार लेखन का सबसे सरल, उपयोगी और व्यावहारिक सिद्धांत है। समाचार लेखन का यह सिद्धांत कथा या कहनी लेखन की प्रक्रिया के ठीक उलटा है। इसमें किसी घटना, विचार या समस्या के सबसे महत्वपूर्ण तथ्यों या जानकारी को सबसे पहले बताया जाता है, जबकि कहनी या उपन्यास में क्लाइमेक्स सबसे अंत में आता है। इसे उल्टा पिरामिड इसलिये कहा जाता है क्योंिक इसमें सबसे महत्वपूर्ण तथ्य या सूचना पहले बताना पड़ता है। इसके बाद घटते हुये क्रम में सबसे कम महत्व की सूचनाये सबसे निचले हिस्से में होती हैं।

समाचार लेखन की उल्टा पिरामिड शैली के तहत लिखे गये समाचारों को सुविधा की दृश्टि से मुख्य रूप से तीन हिस्सों में विभाजित किया जाता है-मुखड़ा या इंट्रो या लीड, बाडी या विवरण और निष्कर्ष या पृश्ठभूमि। इसमें मुखड़ा या इंट्रो समाचार के पहले और कभी-कभी पहले और दूसरे दोनों पैराग्राफ को कहा जाता है। मुखड़ा किसी भी समाचार का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है क्योंिक इसमें सबसे महत्वपूर्ण तथ्यों और सूचनाओं को लिखा जाता है। इसके बाद समाचार की बाडी आती है, जिसमें महत्व के अनुसार घटते हुये क्रम में सूचनाओं का ब्यौरा देने के अलावा उसकी पृष्ठभूमि का भी जिक्र किया जाता है।

समाचार लिखने का दूसरा सूत्र है छ ‘क’ कार - क्या, कहां, कब, कौन, क्यों और कैसे का समावेश अनिवार्य है। क्योंिक समाचार में पाठकों की जिज्ञासा जैसे कौन, क्या, कब, कहां, क्यों आरै कैसे प्रश्नों का उत्तर देना होता है।

श्रेष्ठ समाचार लेखन की विशेषताएँ 

एक अच्छे पत्रकार के लिए यह जानना आवश्यक है कि सिर्फ घटनाओं का उसी रूप में प्रस्तुत कर दिया जाना काफी नहीं होता है आज के समाचार पत्र किसी समाचार की पृष्ठभूमि को काफी महत्व प्रदान करते हैं क्योंिक समाचारपत्रों द्वारा दी गई सूचनाओ पर व्यक्ति की निर्भरता में निरंतर वृद्धि हुई है। इसलिए शुद्ध और सटिक रिपोटिर्ंग की आवश्यकता बढ़ी है। अत: समाचार लिखना भी एक कला है। इस कला में प्रवीण होने के लिए कई चीजो पर ध्यान देना होता तब जाकर कोई समाचार श्रेष्ठ समाचार की श्रेणी में आता है।

किसी सूचना को सर्वश्रेष्ठ समाचार बनने के गुण कौन, क्या, कब, कहां, क्यों और कैसे के प्रश्नों में छिपा हुआ रहता है। पत्रकारिता में इसे छ ‘क’ कार कहा जाता है। यह छह ककार (’’क’’ अक्षर से शुरू होनेवाले छ प्रश्न) समाचार की आत्मा है। समाचार में इन तत्वों का समावेश अनिवार्य है। इन छह सवालों के जवाब में किसी घटना का हर पक्ष सामने आ जाता है। और समाचार लिखते वक्त इन्हीं प्रश्नो का उत्तर पत्रकार को तलाशना होता है और पाठकों तक उसे उसके सपूंर्ण अर्थ में पहुचं ाना होता है। जैसे
  1. क्या- क्या हुआ? जिसके संबंध में समाचार लिखा जा रहा है। 
  2. कहां- कहां? ‘समाचार’ में दी गई घटना का संबंध किस स्थान, नगर, गांव प्रदेश या देश से है। 
  3. कब- ‘समाचार’ किस समय, किस दिन, किस अवसर का है। 
  4. कौन- ‘समाचार’ के विषय (घटना, वृत्तांत आदि) से कौन लोग संबंधित हैं। 
  5. क्यो- ‘समाचार’ की पृष्ठभूमि। 
  6. कैसे- ‘समाचार’ का पूरा ब्योरा। 
उपरोक्त छ ‘क’ कार के उत्तर किसी समाचार में पत्रकार सही ढंग से दे दिया तो वह सर्वश्रेष्ठ समाचार की श्रेणी में आ जाता है।

दूसरी विशेषता है समाचार में तथ्य के साथ नवीनता हो। साथ ही यह समसामयिक होते हुए उसमें जनरुचि होना चाहिए। समाचार पाठक/दर्शक/श्रोता के निकट यानी की उससे जुड़ी कोई चीज होनी चाहिए। इसके साथ साथ यह व्यक्ति, समूह एवं समाज तथा देश को प्रभावित करने में सक्षम होना चाहिए। पाठक वर्ग की समस्या, उसके सुख दुख से सीधे जुड़ा हुआ हो। समाचार समाचार संगठन की नीति आदर्श का प्रतिनिधित्व करना चाहिए। सामान्य से हटकर कुछ नया होना चाहिए और व्यक्ति, समाज, समूह एवं देश के लिए कुछ उपयोगी जानकारियां होनी चाहिए। उपरोक्त कुछ तत्वों में से कुछ या सभी होने से वह समाचार सर्वश्रेष्ठ की श्रेणी में आता है।

तीसरी विशेषता है समाचारों की भाषा, वाक्य विन्यास और प्रस्तुतीकरण ऐसा हो कि उन्हें समझने में आम पाठक को कोई असुि वधा या मुश्किल या खीज न हो। क्योंकि आमतौर पर कोई भी पाठक/दर्शक/श्रोता हाथ में शब्दकोष लेकर समाचार पत्र नहीं पढ़ता है या देखता है या सुनता है। समाचार सरल भाषा, छोटे वाक्य और संक्षिप्त पैरागा्रफ में लिखे जाने चाहिए। पत्रकार को अपने पाठक समुदाय के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए। दरअसल एक समाचार की भाषा का हर शब्द पाठक के लिए ही लिखा जा रहा है और समाचार लिखने वाले को पता होना चाहिए कि वह जब किसी शब्द का इस्तेमाल कर रहा है तो उसका पाठक वर्ग इससे कितना वाकिफ है और कितना नहीं।

चौथी विशेषता है, समाचार लिखे जाने का उल्टा पिरामिड सिद्धांत को अपनाना चाहिए। इस शैली में समाचार में सबसे पहले मुखड़ा या इंट्रो या लीड होता है। दूसरे क्रम में समाचार की बाडी होती है जिसमें घटते हुए क्रम में सूचनाओं का विवरण दिया जाता है। इसका अनुपालन कर समाचार लिखे जाने से समाचार सर्वश्रेष्ठ समाचार की श्रेणी में गिना जाता है।

समाचार संपादन 

समाचार लेखन के विभिन्न बिंदुओं की जानकारी के बाद अब प्रश्न उठता है कि उपलब्ध तथ्यों को समाचार के रूप में कैसे दिया जाए? कौन सी बात पहले रखी जाए और कानै सी बात बाद में। घटनाओं को क्रमबद्ध करने का कौन सा तरीका अपनाया जाए कि समाचार अपने में पूर्ण और बोलता हुआ सा लगे। हमने पहले से चर्चा की है कि समाचार लेखन में उल्टा पिरामिड सिद्धांत सबसे प्रभावी होता है। इस हिसाब से क्रम इस प्रकार होगा-षीर्शक, आमुख या इंट्रो और विवरण।

समाचार का शीर्षक लेखन 

समाचार को आकर्षक बनाने में शीर्षक की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। समाचारो के लिए शीर्षक लिखना भी एक कला है, साथ ही महत्वपू र्ण भी। समाचार को उचित ढंग से प्रस्तुत करने के लिए उचित शीर्षक अत्यंत जरूरी होता है। शीर्षक के द्वारा किसी समाचार को संवारा/बिगाड़ा जा सकता है। कभी कभी एक बहुत अच्छा समाचार उचित शीर्षक के अभाव में पाठकों का ध्यान आकर्षित नहीं कर पाता है। दूसरी बात यह है कि कुछ लोग केवल समाचारो के शीर्षक पढ़ने के आदि होते हैं और वे इसी आधार पर ही समाचार के बारे में निर्णय ले लेते हैं। इस तरह यह कहा जा सकता है कि शीर्षक पाठकों को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करता है। इसके साथ ही समाचार पत्र की पाठकों में एक छवि बनती है। समाचारों के लिए शीर्षक देत े समय निम्न बातां े का ध्यान रखना चाहिए-
  1. शीर्षक संक्षिप्त और सारगर्भित हो। 
  2. शीर्षक स्पष्ट, अर्थपूर्ण और जीवंत होने चाहिए 
  3. भाषा विषयानुकूल होनी चाहिए 
  4. शीर्षक इस तरह होने चाहिए कि वह सीमित स्थान पर पूरी तरह फिट बैठे। 
  5. शीर्षक विशिष्ट ढंग का और डायरेक्ट होना चाहिए 
  6. केवल सुप्रचलित संि क्षप्त शब्दों का ही प्रयोग शीर्षक में होना चाहिए, अप्रचलित का नहीं 
  7. शीर्षक में है, हैं, था, थे आदि शब्दों के इस्तेमाल से बचना चाहिए। 
समाचार पत्र में छपे कुछ नमूने इस प्रकार हैं-

दिमाग से भी हटनी चाहिए लाल बत्ती 
          गुजरात को भी काबू करने उतरेगी दिल्ली 
शेयर बाजार धडाम 
          दाल में नरमी चीनी में गरमी 

आमुख या इंट्रो या लीड 

समाचार का पहला आकर्षण उसका शीर्षक होता है। शीर्षक के बाद जो पहला अनुच्छेद होता है उसे आमुख या इंट्रो(अंग्रेजी के इंट्रोडक्शन का संक्षित रूप) कहते हैं। पहला अनुच्छेद और बाद के दो-तीन अनुच्छेदों को मिलाकर समाचार प्रवेश होता है जिसे अंग्रेजी में ‘लीड’ नाम दिया गया है।

शीर्षक द्वारा जो आकर्षण पाठक के मन में पैदा हुआ, यदि समाचार का प्रथम अनुच्छेद उसे बनाए नहीं रख सका तो समाचार की सार्थकता संदिग्ध हो जाती है। पहला पैराग्राफ समाचार की खिड़की की तरह होता है। पहले पैराग्राफ को पढ़ने के बाद यदि पाठक में आगे पढ़ने की जिज्ञासा जमी तो वह पूरा समाचार बिना रूके पढ़ा जायेगा। इंट्रो की भाषा सरल और स्पष्ट होनी चाहिए। इंट्रो लिखते समय खंड वाक्यों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। कम से कम “ाब्दों में अधिक से अधिक संदेश पहुंचाने में ही इटं्रो की सफलता निहित है।

समाचार पत्रों के भी अपने अपने दृष्टिकोण होते हैं और इसलिए एक ही समाचार को विभिन्न पत्र अलग अलग लीड देकर प्रकाशित करते हैं। फिर भी समाचार लेखन में अच्छे इंट्रो या लीड के कुछ सामान्य मापदंड हैं, जिन्हें सर्वत्र अपनाया जाना चाहिए-
  1. उसे समाचार के अनुकूल होना चाहिए। यदि समाचार किसी गंभीर या दुखांत घटना का है तो लीड में छिछोरापन नहीं होना चाहिए। मानवीय रुचि या हास्यास्पद घटनाओ के समाचारों की लीड गंभीर न होकर हल्की होनी चाहिए, उसे हास्य रस का पुट देकर लिखा जाए तो और भी अच्छा है। 
  2. उसमें समाचारों की सबसे महत्वपूर्ण या सर्वाधिक रोचक बात तो आ जानी चाहिए। 
  3. लीड यथासंभव संक्षित हाने चाहिए। संक्षित लीड पढ़ने में तो आसानी हाते ी है उसमें सप्रेंषणीयता भी अधिक होती है। 
लीड़ लिखने से पूरा समाचार अपने दृष्टि पटल पर लाइए, इसके बाद स्वयं अपने से प्रश्न कीजिए कि उसमें सबसे महत्वपूर्ण और रोचक क्या है? किन्तु निर्णय करते समय अपनी रुचि के स्थान पर बहुसंख्यक पाठको की रुचि का ध्यान रखिए।

विवरण 

उपयुक्त और शीर्षक और अच्छा आमुख या इंट्रो लिखे जाने के बाद समाचारों की शेष रचना सरल जरूर हो जाता है, लेकिन सही इंट्रो लिख देने से ही पत्रकार की संपूर्ण दक्षता का परीक्षण समाप्त नहीं हो जाता। यदि आपका इंट्रो ने पाठक के मन में पूरी खबर पढ़ने की रुचि पैदा की है तो उसे समाचार के अंत तक ले जाना भी आपका काम है। अत: समाचार इस प्रकार लिखा जाना चाहिए कि पाठक उसे अद्योपांत पढ़े और पढ़ने के बाद उसे पढ़ने का पूर्ण संतोष मिले।

समाचार उल्टा पिरामिड के समान होता है जिसका चौड़ा भाग ऊपर और पतला भाग नीचे होता है। समाचार लेखन में सबसे पहले महत्वपूर्ण तथ्यों को समेटा जाता है फिर धीरे धीरे कम महत्वपूर्ण तथ्य सामने आते हैं। यह पत्रकारिता की दृश्टि से भी सहायक तरीका है। कभी कभी समाचार प्रकाशन करने के लिए पर्याप्त स्थान नहीं होता है तो समाचार को आसानी से काटा जा सकता है, जिसका पूरे समाचार की समग्रता पर बहुत कम असर पड़ता है। समाचार लिखते समय निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिए-

(क) सरलता (ख) सुस्पष्टता (ग) तारतस्य (घ) छह ककारो के उत्तर (ड) आवश्यक पृष्ठभूमि (च) विषयानुकूल भाषा समाचार में अनुच्छेदों का आकार छोटा रखा जाना चाहिए। 

इससे पठनीयता बढ़ती है और समाचार रोचक और अच्छा लगता है। एक ही प्रकार के शब्दों या वाक्य खंडों का बार-बार प्रयोग नहीं करना चाहिए। ‘कहा’, ‘बताया’, ‘मत व्यक्त किया’, ‘उनका विचार था’ आदि शब्दों और खंड वक्यों का भाव के अनुरूप बदल बदलकर प्रयोग करना चाहिए।

समाचार का समापन करते समय यह ध्यान रखना चाहिये कि न सिर्फ उस समाचार के प्रमुख तथ्य आ गये हैं बल्कि समाचार के मुखड़े और समापन के बीच एक तारतम्यता भी होनी चाहिये समाचार में तथ्यों और उसके विभिन्न पहलुओं को इस तरह से पेश करना चाहिये कि उससे पाठक को किसी निर्णय या निष्कर्ष पर पहुंचने में मदद मिले।

फीचर लेखन 

फीचर को हिंदी में रूपक भी कहा गया है। लेकिन पत्रकारिता में फीचर से हमारा आशय समाचार पत्र पत्रिकाओ में प्रकाशित उन विशिष्ट लेखो से है जो हमें आनंदित और प्रफुल्लित करते हैं। इन लेखों में वण्र्य विषय का प्रस्तुतीकरण इस प्रकार किया जाता है कि उनका रूप प्रत्यक्ष हो जाता है और इसीलिए इन्हें फीचर कहा जाता है। विद्वानो द्वारा फीचर की विभिन्न परिभाषाए की गई है जिनके आधार पर निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि फीचर सरल मधुर और अनुभूितपूर्ण भावाभिव्यक्ति है। फीचर में सामयिक तथ्यों का आश्यकतानुसार समावेश तो होता ही है लेकिन अतीत की घटनाओं तथा भविष्य की संभावनाओं के सूत्र भी उसमें होते हैं।

फीचर की विशेषताएँ 

किसी अच्छे फीचर की कुछ प्रमुख विशेषताएं निम्न होती है-
  1. फीचर का आरंभ रोचक होना चाहिए न कि नीरस, उबाऊ, क्लिष्ट और व्यर्थ की अलंकृत शब्दावली से भरा। 
  2. हृदय पक्ष से जुड़ा होने के कारण इसमें भाषागत सौंदर्य और लालित्य का विशेष स्थान है। 
  3. फीचर में अनावश्यक विस्तार से बचा जाना चाहिए। गागर में सागर भरना फीचर की अपनी कलात्मकता होती है। 
  4. काव्य का सा आनंद देनवाले फीचर श्रेष्ठ फीचर हो सकते हैं। 
  5. फीचर में प्रयुक्त कल्पनाएं सटीक और सारगर्भित हो। 
  6. अपने विषय के सभी संबंधित पहलुओं को छूता चलता है। लेकिन विषयों का संतुलित वर्णन आवश्यक है। 

फीचर लेखन के तत्व 

फीचर और उसकी प्रमुख विशेषताओं को जानने के बाद इतना तो स्पष्ट हो ही जाता है कि फीचर लेखन भी पत्रकारिता क्षेत्र में अपनी तरह का एक विशिष्ट लेखन है, जिसके लिए प्रतिभा, अनुभव और परिश्रम की विशेष आवश्कता होती है।

फीचर की विशिष्टता और उत्कृष्टता के लिए लेखक का उसकी भाषा पर पूर्ण अधिकार होना चाहिए ताकि वह छोटे वाक्यों और कम शब्दों में लालित्यपूर्ण चमत्कार और सहजता बनाए रख सके। फीचर लेखक के पास कवि सा भावुक हृदय, समीक्षक का सा प्रौढ़ चिंतन, इतिहासकार सा इतिहास बोध, वैज्ञानिक की सी तार्तिकता, समाजशास्त्री सा समाजबोध तथा भविष्य को परखने की क्षमता होनी चाहिए।

फीचर लेखक को अपने परिवेश के प्रति पर्याप्त सजग होना चाहिए और उसके पास एक ऐसी सूक्ष्म दृश्टि होनी चाहिए जो आसपास के विविध विषयो को फीचर का विषय बनाने की प्रेरणा दे सके।

फीचर के प्रकार 

विषयागत विविधता को देखते फीचर के कई प्रकार हो सकते हैं-
  1. व्यक्तिगत फीचर- इसमें साहित्य, संगीत, चित्रकला, नाटî, खेल जगत, राजनीतिक, विज्ञान, धर्म आदि क्षेत्रों में समाज का नेतृत्व करनेवाले व्यक्तियो- विशिष्ट व्यक्तियों पर फीचर लिखे जाते हैं। 
  2. समाचार फीचर - ऐसे फीचर का मूलभाव समाचार होते हैं। किसी घटना का पूर्ण विवेचन विश्लेषण इसके अंतर्गत किया जाता है। 
  3. त्यौहार पर्व संबंधी फीचर- विभन्न पर्वों और त्यौहारों के अवसर पर इस तरह के फीचर लिखने का प्रचलन है। इसमें त्यौहारों पर्वों की मूल संवेदना उनके स्रोतों तथा पौराणिक संदर्भों के उल्लेख के साथ साथ उन्हे आधुनिक सदंर्भों में भी व्याख्यायित किया जाता है। 
  4. रेडियो फीचर- जहां पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित फीचर केवल पढ़ने के लिए होते हैं वहां रेडियो फीचर केवल प्रसारण माध्यमो से सुनने के लिए होते हैं इनमें संगीत और ध्वनि पक्ष काफी प्रबल होता है। रेडियो फीचर संगीत और ध्वनि के माध्यम से किसी गतिविधि का नाटकीय प्रस्तुतीकरण है। 
  5. विज्ञान फीचर- नवीनतम वैज्ञानिक उपलब्धियों से पाठकों को परिचित कराने अथवा विज्ञान के ध्वंसकारी प्रभावों की जानकारी देने का यह एक सशक्त और महत्वपूर्ण माध्यम है। 
  6. चित्रात्मक फीचर- ऐसे फीचर जो केवल बोलते चित्रों के माध्यम से अपना संदेश पाठकों को दे जाते हैं। इसे फोटो फीचर कहते हैं। 
  7. व्यंग्य फीचर- सामाजिक, राजनीतिक परिदृश्य की ताजा घटनाओं पर व्यंग्य करते हुए सरस और चुटीली भाषा में हास्य का पुट देकर लिखे गए फीचर इस कोटी में आते हैं। 
  8. यात्रा फीचर- यात्राएं ज्ञानवर्धक और मनोरंजक साथ साथ होते हैं। इन यात्राओं का प्रभावपूर्ण एवं मनोहारी संस्मरणात्मक चित्रण इन फीचरो में होता है। 
  9. ऐतिहासिक फीचर- अतीत की घटनाओं के प्रति मनुष्य की उत्सुकता स्वाभाविक है। ऐतिहासिक व्यक्तियो, घटनाओं और स्मारकों अथवा नई एेि तहासिक खोजों पर भी भावपूर्ण ऐतिहासिक फीचर लिखे जा सकते हैं। 

लेख लेखन 

लेख समाचार पत्र का एक अंग है। इसके माध्यम से समाचार पत्र तथा पत्रिकाएँ अपने विचार प्रस्तुत करते हैं तो कुछ लेखों से पाठकों का ज्ञान वर्धन होता है। जिस विषय पर आप लेख लिखना चाहते हैं, उस विषय का गहन अध्ययन कीजिए तथा उस विषय से संबंधित सभी तरह की संभावित जानकारी एवं आकं ड़ े प्राप्त कीजिए। तत्पश्चात मस्तिष्क को अन्य विचारों से मुक्त और एकाग्र करके विषय पर लिखना शुरू कीजिए। लेख में आप संबंधित विषय की पिछली बातों का हवाला और आगे की संभावनाओं का जिक्र कर सकते हैं। लेख में विषय की आवश्यकतानुसार उसके सामाजिक, राजनीतिक, ऐतिहासिक, पौराणिक, पुरातात्विक या आर्थिक पहलुओं का भी विवेचन होना् चाहिए। महत्वपूर्ण लोगों के विषय संबंधी उद्धरण भी आप अपने समर्थन में प्रस्तुत करके लेख को ज्यादा विश्वसनीय बना सकते हैं पर ये बात हमेशा ध्यान में रखें कि आप अपने विषय के आसपास ही रहें विषय से भटकाव लेख की एकाग्रता को भंग करके उसकी संप्रेषण शक्ति को कम कर देगा। यथासंभव लेख एकांत वातावरण में बैठकर लिखा जाए, ताकि विचारों का क्रम आरै तारतम्य बना रहे और लेख में किसी तरह का बिखराव आने की संभावना कम रहे।

लेख को रफ कर लेने के बाद यदि उसको एक-दो बार फिर से पढ़ लिया जाए तो जहां त्रुटियों के पकड़ में आ जाने से लेख में शुद्धता आएगी, वही कुछ छटू गए या नए पनप गए विचारो को यथा स्थान समायोजित कर देने का भी अवसर प्राप्त हो जाएगा। कभी कभी लेख को फेयर करते समय भी कुछ नए विचार जोड़ने पड़ जाते हैं।

लेख और फीचर में अंतर 

लेख और फीचर दोनों का समाचार के साथ कोई संबंध नहीं है फिर भी दोनों समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं में अपनी अपनी एक जगह है। दोनों की सुंदरता सुंदर गद्य शैली पर निर्भर है, लेकिन कुछ खास किस्म का अंतर होता है। इस अंतर को समझना लेख और फीचर दोनों को समझने के अत्यतं जरूरी है। किताबी ज्ञान और आंकड़ों की सजावट से लेख लिखा जा सकता है लेकिन फीचर लिखने के लिए आँख-कान, भावो- अनुभूितयो, मनोवेगों और अन्वेषण का सहारा लिया जा सकता है। लेख लंबा, अरुचिकर और भारी भी हो सकता है, लेकिन फीचर में यह सब नहीं चलेगा। फीचर को मजेदार रुचिकर और चित्ताकर्षक होना ही पड़गे ा। फीचर लिखते समय अपेक्षाकृत नया और मनोरंजक तरीका अपनाना होता है। दरअसरल फीचर एक प्रकार का गद्य गीत है, जो नीरस, लंबा और गंभीर हो ही नहीं सकता। फीचर की विशेषता है कि इसे मनोरजंक और तडपदार होना चाहिए ताकि उसे पढ़कर लोगों के दिल हिले या चित्त प्रसन्न हो या पढ़कर दिन में गम का दरिया बहने लगे।

लेख हमें शिक्षा देता है, जबकि फीचर हमारा सात्विक किस्म का मनोरंजन करता है। लेख आवश्यकता से अधिक छोटा तथा पढ़ने में उबाऊ होने पर भी अच्छा हो सकता है, लेकिन फीचर मुख्य रूप से आनंद और विनोद के लिए होता है। लेख जानकारी बढ़ाने वाला होता है और उसमें दिलचस्प या उससे निकलनेवाले नतीजों का समावेश किया जा सकता है, जबकि फीचर में अपनी मनोवृत्ति और समझ के अनुसार किसी विषय या व्यक्ति विशेष का चित्रण करना पड़ता है।

साक्षात्कार 

साक्षात्कार पत्रकारिता का अनिवार्य अंग है। हर पत्रकार को साक्षात्कार लेना चाहिए, वाहे वह किसी पत्र-पत्रिका का संपादक-उपसंपादक-संवाददाता-रिपोर्टर हो अथवा आकाशवाणी-टेलीविजन का प्रतिनिधि। साक्षात्कार लेना एक कला है। इसे पत्रकारों के अतिरिक्त लेखकों ने भी अपनाया है। दुनिया के हर क्षेत्र में, हर भाषा में साक्षात्कार लिए जाते हैं। पत्र-पत्रिका, आकाशवाणी, टेलीविजन हर जगह साक्षात्कार देखे जा सकते हैं। इस विद्या का प्रचलन बढ़ता ही जा रहा है।

मनुष्य में दो प्रकार की प्रवृत्ति होती है। एक तो यह कि वह दूसरों के विषय में सब कुछ जान लेना चाहता है और दूसरी यह कि वह अपने विषय में या अपने विचार दूसरों को बता देना चाहता है। अपने अनुभवों से दूसरों को लाभ पहुचांना और दूसरों के अनुभवों से लाभ उठाना यह मनुष्य का स्वभाव है। अपने विचारों को प्रकट करने के लिए उसने मौखिक के अलावा अनेक लिखित रूप अपनाए हैं। साक्षात्कार भी मानवीय अभिव्यक्ति का एक माध्यम है। इसे भेटं वार्ता, इंटरव्यू, मुलाकात, बातचीत, भंटे आदि भी कहते हैं।

साक्षात्कार लेनेवाला साक्षात्कार के लिए तय किए गए व्यक्ति से मिलता है और उससे प्रश्न पछू कर उससे व्यक्तित्व, ‟तित्व तथा विचारों को जानने की कोशिश करता है। इस जानकारी से दूसरो को अवगत कराने के लिए इसे किसी पत्र-पत्रिका-पुस्तक में प्रकाशित किया जाता है या टेलीविजन अथवा अन्यत्र उसके विशेष कैमरे के सामने लिए जाते हैं। आकाशवाणी के लिए साक्षात्कार आकाशवाणी की ओर से रिकार्ड किए जाते हैं। अन्य साक्षात्कार लिखे जाते हैं। इन्हें पहले टेप करके बाद में लिखा जा सकता है। टेलीविजन पर साक्षात्कार लेने देनेवाले की आवाज के साथ साथ बातचीत के दृश्य भी होते हैं। साक्षात्कार प्राय: किसी विशिष्ट राजनेता, साहित्यकार, पत्रकार, कलाकार, खिलाड़ी आदि का लिया जाता है। साधारण या निम्न समझे जानेवाले किसी व्यक्ति का भी साक्षात्कार लिया जा सकता है।

साक्षात्कार का मुख्य उद्देश्य तो साक्षात्कार पात्र की अभिव्यक्ति को जनता के सामने लाना होता है। यद्यपि इसमें साक्षात्कार लेनेवाले का भी काफी महत्व होता है। साक्षात्कार लेनेवाला उसका सूत्रधार है तो उसे देनेवाला साक्षात्कार नायक होता है।

साक्षात्कार के प्रकार 

साक्षात्कार अनेक प्रकार के होते हैं। कोई साक्षात्कार छोटा होता है, कोई बड़ा। किसी में बहुत सारी बातें पूछी जाती है तो किसी में सीमित। कोई साक्षात्कार बड़े आदमी का होता है तो कोई साधारण या निम्न समझे जानेवाले आदमी का। किसी में केवल सवाल-जवाब होता है तो किसी में बहस होती है किसी साक्षात्कार में हंसी-मजाक होता है तो कोई गंभीर चर्चा लिए होता है। कुछ साक्षात्कार पत्र या फोन द्वारा भी लिए जाते हैं। कुछ पूर्णत: काल्पनिक ही लिखे जाते हैं। कोई साक्षात्कार पत्र-पत्रिका के लिए लिखे जाते हैं तो कोई आकाशवाणी या टेलीविजन के लिए। इस तरह साक्षात्कार के अनेक रूप हैं। साक्षात्कार के विभिन्न आधार पर उसके प्रकार निम्न हैं-
1. स्वरूप के आधार पर 
व्यक्तिनिष्ठ, विषयनिष्ठ
2. शैली के आधार पर 
विवरणात्मक, वर्णनात्मक, विचारात्मक, प्रभावात्मक, हास्य-व्यंग्यात्मक, भावात्मक, प्रश्नोत्तरात्मक
3. औपचारिकता के आधार पर 
औपचारिक, अनौपचारिक
4. संपर्क के आधार पर 
प्रत्यक्ष भेटं, पत्र व्यवहार द्वारा, फाने वार्ता, काल्पनिक
5. आकार के आधार 
लघु, दीर्घ
6. विषय के आधार पर 
साहित्यिक, साहित्योत्तर
7. वार्ताकार के आधार पर 
पत्र-पत्रिका प्रतिनिधि द्वारा, आकाशवाणी प्रतिनिधि द्वारा, टेलीविजन प्रतिनिधि द्वारा, लेखकों द्वारा, अन्य द्वारा
8. वार्ता-पात्रों के आधार पर 
विशिष्ट अथवा उच्च पात्रों क,े साधारण अथवा निम्न पात्रों क,े आत्म साक्षात्कार
9. प्रस्तुति के आधार पर 
पत्र-पत्रिका में प्रकाशित, आकाशवाणी में प्रसारित, टेलीविजन में प्रदर्शित, प्रस्तुति के लिए प्रतीक्षारत 
10. अन्य आधार पर 
योजनाबद्ध, आकस्मिक, अन्य

साक्षात्कार लेने की प्रक्रिया 

साक्षात्कार लेने की एक प्रक्रिया होती है। किसी व्यक्ति का साक्षात्कार लिया जाए यह तय करना इस प्रक्रिया का पहला चरण है। व्यक्ति का चयन कई बातों पर निर्भर करता है। सामान्यत: लोग बड़े नेताओ, साहित्यकारों, कलाकारों, खिलाड़ियों आदि के विषय में जानने की उत्सुक होते हैं। इसलिए पत्रकार ऐसे व्यक्तियो के साक्षात्कार लेने के अवसर ढूढं ते रहते हैं। कभी कभी समाचार संगठन की ओर से निर्देश या सुझाव आते हैं कि अमुक व्यक्ति का साक्षात्कार लेना है। नगर में कोई विशिष्ट व्यक्ति आता है, कोई समारोह में कोई विशिष्ट जन उपस्थित होता है तो उसे साक्षात्कार का पात्र बनाया जा सकता है। यदि पत्रकार किसी दूसरे स्थान पर जाता है और वहां कोई विशिष्ट व्यक्ति रहता है तो उसे भी साक्षात्कार का पात्र बनाने के बारे में सोचा जा सकता है। कभी कभी किसी योजना के अंतर्गत साक्षात्कार लिए जाते हैं। बहुत से पत्रकार किसी साधारण निम्न समझे जानेवाले व्यक्ति से भी साक्षात्कार लेते हैं और उसके बारे में जानकारी व उसके विचार जनता के सामने प्रस्तुत करते हैं। कोई विशेष घटना घटित होने पर उससे जुड़े व्यक्तियों के भी साक्षात्कार लिए जाते हैं।

व्यक्ति या पात्र का तय हो जाने के बाद उससे किस विषय पर साक्षात्कार लेना है, यह विचार किया जाता है। साक्षात्कार लेनेवाला को कवि से कविता पर, नेता से राजनीति पर, कलाकार से उसकी कला पर ही सामान्यत: बात करना चाहेगा। मौका मिलने पर अन्य बातें भी पूछी जा सकती है। साक्षात्कार लेनेवाले को यह तय करना है कि साक्षात्कार पात्र के उसे जीवन, ‟तित्व, प्रेरणा स्रोत, दिनचर्या, रूचियो, विचारों आदि सभी बिदुंओं पर बात करनी है या केवल विषय को लेकर ही चलना है।

पात्र और विषय तय हो जाने के बाद साक्षात्कार लेने की योजना बनाई जाती है। साक्षात्कार पात्र से भेटं वार्ता की अनुमति लेगें आरै पूछ जानेवाले प्रश्नों की सूची बनाएंग।े साक्षात्कार का स्थान तय करेगें परंतु कई बार यह सब नहीं हो पाता। साक्षात्कार अचानक लेने पड़ते हैं। उसका स्थान जैसे हवाई अड्डा, समारोह स्थल, रेलवे प्लेटफर्म आदि होता है। ऐसे में लिखित प्रश्नावली बनाने का अवकाश नहीं होता। ऐसी स्थिति में भी एक रूपरेखा तो दिमाग में रखनी पड़ती है।

योजना या रूपरेखा बन जाने पर उस व्यक्ति से भेटं करके प्रश्न पूछे जाते हैं। प्रस्तावित प्रश्नों से वे पूरक प्रश्नों से वांछित सूचना, तथ्य, विचार निकलवाने का प्रयास किया जाता है। कोई साक्षात्कार पात्र सहज रूप से उत्तर दे देता है, कोई किसी प्रश्न को टाल जाता है, उत्तर नहीं देता, तथ्य छिपा लेता है, अपने विचार प्रकट नहीं करता है। कभी कभी वह साक्षात्कार लेनेवाले से प्रतिप्रश्न भी कर देता है। ऐसी स्थिति में साक्षात्कार लेनवे ाल े को सावधानीपूर्वक काम लेना होगा। उन प्रश्नो की भाषा बदलकर पुन: उसके सामने रखा जा सकता है। समय के अनुसार ऐसे प्रश्न छोड़ना भी पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में कटुता उत्पन्न न हो और साक्षात्कार पात्र का मान भंग न हो इस बात का ध्यान रखना जरूरी है।

पत्रकार को शार्ट हैंड आता हो यह जरूरी नहीं है। इसलिए साक्षात्ककार पात्र द्वारा प्रकट किए गए विचार उसके द्वारा दिए गए उत्तर उसी रूप में साथ ही साथ नहीं लिखे जा सकते। सामान्य ढंग से लिखने से समय अधिक लेगेगा। फिर भी तेज गति से कुछ बिंदु अंकित किए जा सकते हैं जिन्हें बाद में विकसित किया जा सकता है। कोई चीज छूट न जाए इसके लिए साक्षात्कारकर्ता के पास रिकार्डर हो तो सबसे बड़ी सुविधा होगी।

साक्षात्कार लेकर साक्षात्कारकर्ता लौटने के बाद विभिन्न बिंदुओं व बातचीत की स्मृति के आधार पर साक्षात्कार लिखता है। यदि बातचीत टेप की गई है तो उसे पुन: सुनकर साक्षात्कार लिख लिया जाता है। साक्षात्कार लिखते समय उन बातों को छोड़ देना चाहिए जिसके लिए साक्षात्कार पात्र ने संकेत किया हो या उनका लिखा जाना समाज व देश के हित में न हो। साक्षात्कार के आरंभ में उसके पात्र का संक्षिप्त परिचय भी दिया जा सकता है।

साक्षात्कार तैयार कर उसे पत्र या पत्रिकाा में प्रकाशन के लिए भेज दिया जाता है। कुछ साक्षात्कार पुस्तक में भी प्रकाशित होते हैं। कुछ साक्षात्कारकर्ता साक्षात्कार तैयार करके उसे पात्र को दिखा देते हैं और उससे स्वी‟ति प्राप्त कर लेते हैं। इस समय पात्र साक्षात्कार के कुछ संशोधन भी सुझा सकता है। इन पंिक्तयों का लेखक साक्षात्कार तैयार होने के बाद उसे पात्र को दिखाने और उसकी स्वीकृति लेने की जरूरत नहीं समझता। आज के इस व्यस्त जीवन में किसी के पास इतना समय भी नहीं है। फिर साक्षात्कार लेनेवाला भी एक जिम्मेदार व्यक्ति होता है।

साक्षात्कार के समय सावधानियाँ 

साक्षात्कार लेते समय बहुत सी बातों का ध्यान रखना होता है।
  1. साक्षात्कार लेने से पहले पात्र और विषय से संबंधित कुछ जानकारी प्राप्त करें। 
  2. साक्षात्करकर्ता को सभी विषयों में जानकारी रखना संभव नहीं है फिर भी जितना हो प्रयास करें। 
  3. पुस्तकालय व विषय से संबंधित अन्य व्यक्तियो से सहायता ली जा सकती है। 
  4. साक्षात्कार पात्र की सम्मान की रक्षा हो और उसकी अभिव्यक्ति को महत्व मिले। 
  5. साक्षात्कार पात्र के व्यक्तित्व, परिधान, भाषा की कमजोरी, शिक्षा की कमी, गरीबी आदि को लेकर उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। 
  6. साक्षात्कार लेनेवाले घमंड, रूखापन, अपनी बात को थोपना, पात्र की उपेक्षा, वाचलता, कटुता, सुस्ती आदि से बचना चाहिए। 
  7. साक्षात्कारकर्ता में जिज्ञासा, बोलने की शक्ति, भाषा पर अधिकार, बात निकालने की कला, पात्र की बात को ध्यान सुनने का धैर्य, तटस्थता, मनोविज्ञान की जानकारी, नम्रता, लेखन शक्ति, बदलत हुई परिस्थति के अनुसार बातचीत को मोड़ देना आदि गुण होने चाहिए। 
  8. ज्यादा जिद या बहस से बचें 
  9. साक्षात्कार लेनेवाले में किसी प्रकार का पूर्वाग्रह न हो 
  10. साक्षात्कार में सच्चाई होनी चाहिए। पात्र के कथन आरै उसके द्वारा दी गई जानकारी को तोड़ मरोड़कर पेश नहीं किया जाना चाहिए। 
  11. साक्षात्कार में ऐसी बातें न पूछी जाए जिससे देश हित पर विपरीत असर पड़े या सांप्रदायिक सद्भाव बिगड़े या फिर किसी का चरित्र हनन हो। 
  12. प्रारंभ एवं अंत में हल्के एवं मध्य में मुख्य प्रश्न पूछे जाने चाहिए। 
  13. साक्षात्कार यथा संभव निर्धारित समय में पूरा होना चाहिए। 
  14. उत्तर में अधिकाधिक नई बातें सामने आनी चाहिए 
  15. साक्षात्कार पूरा होने पर पात्र को धन्यवाद देना न भूलिए।

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