श्रम विधान क्या है?

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आधुनिक प्रचलन में ‘विधान’ शब्द से उच्च प्राधिकार से युक्त तथा जनता का प्रचुरता से प्रतिनिधित्व करने वाले विशिष्ट राजकीय अभिकरणों द्वारा बनाए गए विधि के नियमों का बोध होता है। इस दृष्टिकोण के अनुसार, विधान के अन्तर्गत मुख्यत: जनता के समर्थन प्राप्त विधानमंडलों तथा अन्य मान्यता प्राप्त सक्षम प्राधिकारियों द्वारा बनाए गए कानून सम्मिलित होते हैं। व्यवहार में, विधान को मुख्यत: इसी अर्थ में देखा जाता है। कार्यकारिणी द्वारा अस्थायी अवधि के लिए बनाए गए अध्यादेश भी विधान के अंतर्गत आते हैं, क्योंकि इनका बाद में स्थायी रूप से विधान मंडलों द्वारा ही स्वीकृत किया जाना आवश्यक होता है। कभी-कभी न्यायपालिका के निर्णय भी पूरक विधान का रूप ले लेते हैं।

आधुनिक प्रजातांत्रिक व्यवस्था में विधान बनाने की शक्ति किसी केन्द्रीय अभिकरण (संघ या राज्य के स्तर पर)- सामान्यत: विधानमंडलों में निहित होती है तथा उनके द्वारा बनाए गए विधान प्रचिलन सभी नियमों, लिखतों या निदेशें से सर्वोच्च होते हैं। कुछ प्रकार की राजनीतिक व्यवस्थाओं, जैसे- तानाशाही में विधान बनाने का कार्य, अलग से कोई विशेष अभिकरण नहीं संपन्न करता। ऐसी व्यवस्थाओं में कार्यकारिणी, विधायिका एवं न्यायपालिका तीनों के कार्य किसी एक ही व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह में निहित हो सकते हैं। व्यवहार में, आधुनिक विधान सक्षम विधानमंडलों द्वारा अनुमोदित नियमों को सम्मिलित किया जाता है। इस अध्याय में आधुनिक श्रम-विधान के संदर्भ में ‘विधान’ शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में किया गया है।

विधान का अर्थ 

‘विधान’ शब्द का प्रयोग और भी व्यापक अर्थ में किया जाता है। कई विचारकों के अनुसार विधान के अंतर्गत विधानमंडलों द्वारा स्वीकृत विधियों और नियमों तथा अध्यादेशों के अतिरिक्त, कार्यकारिणी प्रशासन और क्षेत्रीय एवं स्थानीय निकायों द्वारा बनाए गए नियमों तथा विनियमों को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए। लेकिन, इस अध्याय के प्रयोजन के लिए विधान के इस अर्थ को आधुनिक श्रम विधान के संदर्भ में नहीं अपनाया गया है।

स्वतांत्रिक राजनीतिक संस्थाओं एवं कल्याणकारी राज्य के उदय के पूर्व विधान को अत्यंत ही व्यापक अर्थ में देखा जाता था। आधुनिक विधानमंडलें या विधि बनाने वाले विशिष्ट अभिकरणों के आगमन के पहले सदियों तक व्यक्तियों एवं उनके समूहों के आचरण, कार्यकलाप तथा उनकी दशाओं पर नियमन विविध प्रकार के लिखतों एवं अनौपचारिक निदेशों द्वारा होता था। इन लिखतों या निदेशों में धार्मिक निदेशों प्रथागत नियमों, व्यक्तिगत विधायकों की संहिताओं, राजकीय आदेशों, स्थानीय प्रशास्कों एवं अभिकरणों द्वारा बनाए गए नियमों और लोकरीतियों का उल्लेख किया जा सकता है। सामान्यत: ये आधुनिक विधान की तरह लागू होते थे। उनका उल्लंघन दंडनीय उपराध समझा जाता था। प्राचीन एवं मध्यकालीन युग के श्रम-विधानों की विवेचना में इन लिखतों और अनौपचारिक निदेशों को विधान के अंतर्गत सम्मिलित किया गया है। आधुनिक विधान के उदय से ये महत्वहीन होते गए और अंनत: विधान की सर्वोच्चता स्थापित हुई।

श्रम विधान का अर्थ 

वास्तव में श्रम विधान सामाजिक विधान का ही एक अंग है। श्रमिक समाज के विशिष्ट समूह होते हैं। इस कारण श्रमिकों के लिये बनाये गये विधान सामाजिक विधान की एक अलग श्रेणी में आते हैं। औद्योगिक के प्रसार, मजदूरी अर्जकों के स्थायी वर्ग में वृद्धि, विभिन्न देशों के आर्थिक एवं सामाजिक जीवन में श्रमिकों के बढ़ते हुये महत्व तथा उनकी प्रस्थिति में सुधार, श्रम संघों के विकास, श्रमिकों में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता, संघों श्रमिकों के बीच शिक्षा के प्रसार, प्रबन्धकों और नियोजकों के परमाअधिकारों में हास तथा कई अन्य कारणों से श्रम विधान की व्यापकता बढ़ती गई है। श्रम विधानों की व्यापकता और उनके बढ़ते हुये महत्व को ध्यान में रखते हुये उन्हें एक अलग श्रेणी में रखना उपयुक्त समझा जाता है। सिद्धान्त: श्रम विधान में व्यक्तियों या उनके समूहों को श्रमिक या उनके समूह के रूप में देखा जाता है।

आधुनिक श्रम विधान के कुछ महत्वपूर्ण विषय है - मजदूरी की मात्रा, मजदूरी का भुगतान, मजदूरी से कटौतियां, कार्य के घंटे, विश्राम अंतराल, साप्ताहिक अवकाश, सवेतन छुट्टी, कार्य की भौतिक दशायें, श्रम संघ, सामूहिक सौदेबाजी, हड़ताल, स्थायी आदेश, नियोजन की शर्ते, बोनस, कर्मकार क्षतिपूर्ति, प्रसूति हितलाभ एवं कल्याण निधि आदि है।

श्रम विधान के उद्देश्य 

  1. औद्योगिक के प्रसार को बढ़ावा देना। 
  2. मजदूरी अर्जकों के स्थायी वर्ग में उपयुक्त वृद्धि करना। 
  3. विभिन्न देशों के आर्थिक एवं सामाजिक जीवन में श्रमिकों के बढ़ते हुये महत्व तथा उनकी प्रस्थिति में सुधार को देखते हुये भारतीय परिदृष्य में लागू कराना।
  4. श्रम संघों का विकास करना।
  5. श्रमिकों में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाना। 
  6. संघों श्रमिकों के बीच शिक्षा के प्रसार को बढ़ावा देना। 
  7. प्रबन्धकों और नियोजकों के परमाअधिकारों में हास तथा कई अन्य कारणों से श्रम विधान की व्यापकता को बढ़ाना। 

आधुनिक श्रम-विधान के कुछ महत्त्वपूर्ण सिद्धांत 

आधुनिक श्रम-विधान के कई सिद्धांत है, जिनमें कुछ महत्त्वपूर्ण सिद्धांतों की विवेचना नीचे की जाती है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि इन सिद्धांतों में अधिकांश एक-दूसरे से जुड़े है और उनमें किसी एक को पूर्णत: पृथक समझना भांतिपूर्ण होगा। फिर भी, सुविधा की दृष्टि से इन सिद्धांतों की निम्नलिखित वर्गो में रखा जा सकता है-

संरक्षा का सिद्धांत - 

संरक्षा के सिद्धांत के अनुसार, श्रम एवं सामाजिक विधान का उद्देश्य ऐसे श्रमिकों और समाज के समूहों को संरक्षा प्रदान करना है, जिन्हें संरक्षा की आवश्यकता तो है, पर वे स्वयं अपनी संरक्षा नहीं कर सकते। जैसा कि सर्वावदित है, औद्योगिकीकरण के प्रारंभिक काल में बालकों, स्त्रियों, यहां तक कि वयस्क पुरुष-श्रमिकों के कार्य एवं जीवन की दशाएं अत्यंत ही दुश्कर थी। बहुत ही कम उम्र के छोटे-छोटे बच्चों का कारखानों में नियोजन, कार्य के अत्यधिक घंटे, स्त्रियों और बालकों का रात्रि में तथा खतरनाक कामों पर नियोजन, विश्राम-अंतराल का अभाव, अपर्याप्त प्रकाश एवं संवातन, धूल-धुएं से दूषित पर्यावरण तथा अन्य प्रकार की अस्वास्थ्यकर एवं दुश्कर भौतिक कार्य की दशाएं प्रारंभिक औद्योगिकीकरण की कुछ उल्लेखनीय ज्यादतियां थीं। साथ ही, श्रमिकों को मजदूरी भी बहुत ही कम दी जाती थी। मजदूरी भुगतान की न तो कोई निश्चित अवधि होती थी और न ही श्रमिक सदा ही नकद भुगतान की आशा कर सकते थे।

अनुशासनहीनता, खराब काम, आदेशों के उल्लंघन, अनुपस्थिति, सामान और मशीनों की क्षति आदि के बहाने श्रमिकों पर मनमाने ढंग से जुर्माने लगाए जाते और उन्हें मजदूरों से काटकर वसूल कर लिया जाता। वयस्क श्रमिक अपने संगठन बनाकर कार्य की दशाओं में सुधार लाने के लिए नियोजकों पर सामूहिक रूप से दबाव डालने का प्रयास करते, लेकिन बालक, स्त्री तथा छोटे-छोटे प्रतिष्ठानों के असंगठित वयस्क श्रमिक इन ज्यादतियों से अपनी रक्षा करने में असमर्थ थे।

अनियंत्रित पूंजीवाद और मुक्त प्रतिस्पर्द्धा वाली उम्र संयम की अर्थव्यवस्था में नियोजकों का एकमात्र लक्ष्य अधिक-से-अधिक मुनाफा अर्जित करना था। वे उद्योग के मानवीय तत्वों की अवहेलना करते, जिससे स्थिति और भी बिगड़ती गई। ऐसी स्थिति में राज्य ही संरक्षात्मक श्रम-विधान बनाकर श्रमिकों को इन ज्यादतियों से रक्षा प्रदान कर सकता था। धीरे-धीरे खानों एवं अन्य औद्योगिक प्रतिष्ठानों में भी इस प्रकार के संरक्षात्मक श्रम-विधान की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी। अंतत: राज्य की ओर से कारखानों में श्रम की दशाओं को विनियमित करने के उद्देश्य हस्तक्षेप शुरू हुआ। कालांतर में, श्रमिकों की विभिन्न क्षेत्रों में संरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से श्रम-विधान बनाने का सिलसिला स्थायी होता गया।

विश्व का पहला कारखाना-विधान इंगलैंड में शिक्षु स्वास्थ्य एवं नैतिकता अधिनियम, 1802 के रूप में बनाया गया। इसका मुख्य उद्देश्य सूती वस्त्र-कारखानों में काम करने वाले शिशु-बालकों के स्वास्थ्य एवं नैतिकता की रक्षा करना था। धीरे-धीरे इंगलैंड में क्रम में कई कारखाना अधिनियम बनाए गए। बाद में भारत तथा विश्व के अन्य देशों में भी कारखाना अधिनियम बनाए गए। समय के गुजरने के साथ-साथ इन अधिनियमों के विस्तार-क्षेत्र, विषय, मानक एवं प्रशासन में सुधार किए गए। कारखाना-विधान की तरह कुछ अन्य संरक्षात्मक श्रम-विधान भी बनाए गए, जैसे- खान-विधान, बागान-श्रम-विधान, दुकान एवं प्रतिष्ठान-श्रम-विधान, बाल-श्रमिक-विधान, न्यूनतम मजदूरी-विधान तथा मजदूरी-भुगतान-विधान। इस सिद्धांत को ध्यान में रखकर बनाए गए कुछ भारतीय अधिनियम है- कारखाना अधिनियम, 1948, खान अधिनियम, 1952, बागान श्रमिक अधिनियम, 1951, दुकान एवं प्रतिष्ठान अधिनियम, मोटर-परिवहन कर्मकार अधिनियम, बालश्रम (प्रतिशेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986, मजदूरी भुगतान अधिनियम, 1936, तथा न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948। संरक्षात्मक श्रम-विधानों के कुछ महत्वपूण विषय है- कार्य के अधिकतम घंटे, साप्ताहिक अवकाश, विश्राम-अंतराल, रात्रि-कार्य, कार्य की भौतिक दशाएं, जैसे- सफाई, प्रकाश और संवातन, सुरक्षा, स्वास्थ्य, बालकों के नियोजन की निम्नतम उम्र, खान के भीतर काम, न्यूनतम मजदूरी और मजदूरी के भुगतान से संबद्ध कदाचारों का नियंत्रण।

इसी तरह, कुछ सामाजिक विधान समाज के अन्य कमजोर वर्गो या समूहों की संरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से बनाए गए है। इनमें बालकों की अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा-संबंधी विधान, स्त्रियों के हितों की रक्षा के लिए बनाए गए विवाह और संपत्ति के अधिकार से संबंद्ध विधान तथा अनुसूचित जातियों और जनजातियों के हितों की रक्षा के लिए बनाए गए विधानों का उल्लेख किया जा सकता है। भारतीय संविधान में भी बालकों, स्त्रियों, अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों तथा समाज के अल्पसंख्यक समूहों की रक्षा में संबंद्ध महत्वपूर्ण उपबंध हैं।

सामाजिक न्याय का सिद्धांत - 

सामाजिक न्याय का सिद्धांत सामाजिक संबंधों में समानता की स्थापना पर जोर देता है। यह सिद्धांत समानता के स्वीकृत मानकों के आधार पर मनुष्यों एवं उनके समूहों के बीच भेदभाव का अंत चाहता है। सभ्यता के आरम्भ से ही समाज में किसी-न-किसी प्रकार की असमानताएं रही है। विश्व के प्राय: सभी देशों में समाज के प्रभावशाली वर्ग कुछ दुर्बल समूहों का शोषण करते आए है। समाज के एक ही वर्ग या समूहों के बीच भी भेदभाव के अनेक उदाहरण मिलते है। जैसा कि इस अध्याय में पहले उल्लेख किया जा चुका है-प्राचीन एवं मध्यकालीन युग में दासों एवं कृषि-दासों को अन्य श्रेणियों के श्रमिकों को उपलब्ध अधिकारों से वंचित रखा गया। इसी तरह बंधुआ और करारबद्ध श्रमिकों तथा बलात श्रम पर लगाए जाने वाले श्रमिकों का कई प्रकार से शोषण होता आ रहा है, औद्योगिक और कृषि श्रमिकों के बीच भी भेदभाव होते आ रहे हैं। पुरुषों की तुलना में स्त्रियों को भी कई प्रकार के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक भेदभावों का सामना करना पड़ा है। इसी तरह जाति, धर्म, प्रजाति, सप्रदाय आदि के आधारों पर मनुष्यों के बीच असमानताएं रही है। सामाजिक न्याय का सिद्धांत मनुष्यों और उनके समूहों के बीच समानता पर जोर देता है।

अंतराष्ट्रीय श्रम-संगठन ने भी सामाजिक न्याय की स्थापना पर प्रारंभ से ही जोर दिया है। इस महत्त्वपूर्ण अंतराष्ट्रीय संगठन द्वारा पारित ‘श्रमिकों की स्वतंत्रता के अधिकारपत्र‘ में स्पष्ट उल्लेख किया गया है- ‘‘(1) श्रम कोई वस्तु नही है। (2) धारित प्रगति के लिए अभिव्यक्ति एवं संघ बनाने की स्वतंत्रता के अधिकार अनिवार्य है। (3) निर्धनता कहीं भी सभी जगह समृद्धि के लिए खतरनाक होती है।’’ फिलाडेल्फिया में 1944 में हुए अंतराष्ट्रीय श्रम-सम्मेलन द्वारा अपनाए गए संगठन के लक्ष्यों, उद्देश्यों और सिद्धांतों से संबद्ध घोषणापत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया कि स्थायी शांति तभी स्थापित हो सकती है, जब यह सामाजिक न्याय पर आधृत हो। घोषणापत्र में यह भी पुष्टि की गई - ‘‘सभी मनुष्यों को, प्रजाति, संप्रदाय या लिंग के भेदभाव के बिना स्वतंत्रता और गरिमा, आर्थिक सुरक्षा और समान अवसर की दशाओं में अपने भौतिक कल्याण तथा आध्यात्मिक विकास दोनों के परिशीलन का अधिकार है।’’

भारतीय संविधान में भी सामाजिक न्याय की स्थापना से संबद्ध महत्वपूर्ण उपबंध है। समता के मूल अधिकार के अंतर्गत कानून के समक्ष समता, धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग के जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव के प्रतिशेध और रोजगार के विषय में अवसर की समानता का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। स्वतंत्रता, शोषण में रक्षा जिसमें बलात श्रम, बालश्रम और व्यक्तियों के क्रय-विक्रय के प्रतिशेध सम्मिलित है। तथा अल्पसंख्यकों के अपनी संस्कृति, भाषा और लिपि के संरक्षण के अधिकार भी सामाजिक न्याय की स्थापना से संबद्ध महत्वपूर्ण सांविधानिक उपबंध है। राज्यनीति के निर्देशक सिद्धांतों के अंतर्गत स्पष्ट कहा गया है, ‘‘सरकार ऐसी सामाजिक व्यवस्था की भरसक कारगर रूप में स्थापना करके और उसका संरक्षण करके लोक-कल्याण को प्रोत्साहन देने का प्रयास करेगी, जिसमें राष्ट्रीय जीवन के सभी क्षेत्रों में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय का पालन हो।’’ इन सिद्धांतों में समान कार्य के लिए समान वेतन, सभी स्त्री-पुरुषों को जीवनज्ञापन के लिए यथेष्ट तथा समान अवसर, बाल्यावस्था एवं युवावस्था की शोषण एवं नैतिक परित्याग से रक्षा और समाज के दुर्बल समूहों की सामाजिक अन्याय और शोषण से रक्षा का स्पष्ट उल्लेख किया गया है।

सामाजिक न्याय के सिद्धांत पर बनाए गए श्रम एवं सामाजिक विधान के उदाहरण है -दास, कृषि-दास करारबद्ध, बंधुआ तथा बलात श्रम-प्रथाओं के अनुबद्ध संबंधी विधान, समान पारिश्रमिक-विधान, जाति निर्योग्यता-निवारण-विधान, अस्पृष्यता-निवारण-विधान स्त्री तथा लड़की अनैतिक व्यापार-दमन-विधान तथा रक्षावृत्ति-निवारण-विधान। इस सिद्धांत को ध्यान में रखकर बनाए गए कुछ भारतीय अधिनियम है- भारतीय दासता अधिनियम, 1843, जाति निर्योग्यता निवारण अधिनियम, 1850, समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976, बंधुआ श्रम-पद्धति (उत्पादन) अधिनियम, 1976, सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 तथा अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956।

नियमन का सिद्धांत - 

औद्योगिक विकास के प्रारंभिक चरणों में श्रमिकों और नियोजकों के संबंधों में व्यापक असमानताएं थीं। नियोजक अपने आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक प्रभुत्व का लाभ उठाकर औद्योगिक श्रमिकों का अनेक प्रकार से शोषण किया करते थे। नियोजकों के शोषण से मुक्ति पाने तथा अपने हितों की रक्षा के लिए श्रमिकों ने संगठित होना शुरू किया। लेकिन, राज्य की ओर से उनका दमन होने लगा। आपराधिक शड्यंत्र, व्यापार-अपरोध तथा संविदा भंग आदि आधारों पर संगठन या संघ बनाने वाले श्रमिकों पर मुकद्मा चलाया जाता और उन्हें जुर्माने और कारावास का दंड दिया जाता। जब लोक विधि के इन आरोपों से संबद्ध उपबंध श्रमिकों के संगठनों पर अंकुश डालने में अप्रभावी प्रतीत होने लगे, तब उन्हें स्पष्ट रूप से अवैध घोषित करने के लिए विशेष अधिनियम बनाए गए। इंगलैंड के केबिनेशन अधिनियम, 1799, 1800 इस तरह के दमनकारी श्रमसंघ अधिनियम के उदाहरण है। बाद में, श्रमिकों के अथक प्रयासों, समाजवादी और सामूहिक सिद्धांतों के प्रसार, प्रजातांत्रिक संस्थाओं के उदय, श्रमिकों के प्रति राज्य की प्रवृत्ति में परिवर्तन तथा कई अन्य कारणों से श्रमिकों के संगठनों पर लगाए गए विधिक प्रतिबंध हटाए जाने लगे और अंत में उन्हें विधिक मान्यता मिली।

विधिक मान्यता मिलते ही, श्रमसंघों की संख्या में अप्रत्याशित रूप से वृद्धि हुई और आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक जीवन में उनका प्रभाव बड़ी तेजी से बढ़ने लगा। वे नियोजकों के साथ सौदेबाजी करते, तथा अपनी मांगों और विवादों को लेकर हड़ताल तथा अन्य प्रकार की औद्योगिक कार्रवाइयां करते। वे बराबरी के स्तर पर और अधिकारस्वरूप नियोजन की दशाओं में सुधार लाने और श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए नियोजकों और सरकार पर दबाव डालते। कहीं-कहीं श्रमसंघ इतने शक्तिशाली हो गए कि नियोजक ही उनसे परेषान होने लगे। हड़ताल, प्रदर्शन, धरना, घेराव आदि औद्योगिक कार्रवाइयों से जनजीवन भी व्यापक रूप से प्रभावित होने लगा। श्रमसंघों के बीच प्रतिद्धद्धिता के कारण भी औद्योगिक संबंध बिगड़ने लगे।

श्रम-विधान के नियमन का सिद्धांत मुख्यत: श्रमसंघों और नियोजकों के बीच के संबंधों में संतुलन लाने के प्रभुत्त पर जोर देता है। अगर नियोजक अधिक शक्तिशाली होते है।, नियोजन-विधान द्वारा श्रमसंघों को विशेष अविष्कार दिये जाते हैं। जब श्रमसंघ अपनी बढ़ती हुई शक्ति का दुरुपयोग कर नियोजकों, अपने सदस्यों या सरकार पर अनावश्यक रूप से दबाव डालते है, तब उनके क्रियाकलाप पर अंकुश डालने के लिए भी विधान बनाए जाते है। दोनों के बीच विवादों को सुलझाने के लिए श्रम-विधान द्वारा संबंधों की स्थापना भी की जाती है। श्रमसंघों और नियोजकों के बीच के संघर्षो से उत्पन्न औद्योगिक कार्रवाइयों से समुदाय के हितों की रक्षा के लिए हड़ताल, तालाबन्दी, धरना आदि पर प्रतिबंध लगाने के लिए भी कानून बनाए जाते हैं। श्रम-विधान द्वारा सामूहिक सौदेबाजी के विभिन्न पहलुओं को भी नियंत्रित किया जाता है। इस तरह, नियामक श्रम-विधान के कुछ महत्वपूर्ण विषय है- श्रमिकों को संघ बनाने का अधिकार, श्रमसंघों के अधिकार और दायित्व, श्रमसंघों का पंजीकरण, औद्योगिक विवाद सुलझाने के तरीके और संयंत्र, सामूहिक सौदेबाजी, प्रबंध में श्रमिकों की भागीदारी, परिवेदना-निवारण, हड़ताल, तालाबन्दी तथा अन्य औद्योगिक कार्रवाइयां, श्रमसंघों की मान्यता, प्रतिनिधि श्रमसंघ का चयन, अनुचित श्रम-व्यवहार आदि। सामान्यत: औद्योगिक संबंध पर बनाए गए विधान नियामक श्रम-विधान के अंतर्गत आते हैं। इस सिद्धांत पर आधृत कुछ महत्त्वपूर्ण श्रम-अधिनियम हं-ै ग्रेट ब्रिटेन के श्रमसंघ अधिनियम, श्रमसंघ एवं श्रम-संबंध अधिनियम, 1974, औद्योगिक न्यायालय अधिनियम, 1919, औद्योगिक संबंध अधिनियम, 1971, श्रमसंघ एवं श्रम-संबंध (समेकन) अधिनियम, 1992, संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रीय श्रम-संबंध अधिनियम, 1935 और श्रम-प्रबंध संबंध अधिनियम, 1947, औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947, औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 तथा राज्यों के औद्योगिक संबंध और औद्योगिक विवादों से संबद्ध अधिनियम।

समाज के विभिन्न समूहों के बीच के संबंधों को विनियमित करने के लिए भी विधान बनाए जाते है।। इनमें प्रजाति-संबंधों, संप्रदाय-संबंधों, अल्पसंख्यकों और बहुतसंख्यकों के बीच के संबंधों, सामाजिक समानता, धर्मो और जातियों के बीच के संबंधों पर बनाए गए विधानों को सम्मिलित किया जा सकता है।

कल्याण का सिद्धांत - 

वास्तव में, श्रम और सामाजिक विधान के कल्याण का सिद्धांत संरक्षा और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों से जुड़ा है। ‘कल्याण’ शब्द का अर्थ व्यापक होता है और इसके अंतर्गत समाज के आम नागरिकों के भौतिक एवं अभौतिक उन्नयन के अतिरिक्त, विभिन्न समूहों या वर्गो के लिए विशेष सेवाएं या सुविधाएं भी सम्मिलित होती है। साथ ही, ‘कल्याण’ के अंतर्गत समाज के दुर्बल समूहों के हितों को रक्षा तथा विभिन्न समूहों के बीच भेदभाव के उन्मूलन को भी सम्मिलित किया जाता है। श्रम एवं सामाजिक विधान के सिद्धांतों के विशेष परिवेष में कल्याण का सिद्धांत समाज के विशेष समूहों एवं आम नागरिकों के हितों के विकास के लिए अतिरिक्त सुविधाएं प्रदान करने पर जोर देता है। कई श्रम एवं सामाजिक विधानों में सामाजिक न्याय और संरक्षा के प्रावधान के अतिरिक्त कल्याणकारी सुविधाएं प्रदान करने से संवाद अलग से विशेष उपबंध रखे गए है। विश्व के कई देशों में श्रमिकों और उनके परिवार के सदस्यों को आवासीय, चिकित्सीय, मनोरंजनात्मक, शैक्षिक तथा सांस्कृतिक सुविधाएं प्रदान करने के उद्देश्य से ‘कल्याण-निधि’ विधान बनाए गए है। इसी प्रकार, समाज के कुछ अल्पसुविधा प्राप्त समूहों, जैसे बालकों, महिलाओं प्रवासी श्रमिकों आदि को अतिरिक्त सुविधाएं प्रदान करने के उद्देश्य से भी विधान बनाए गए है। कही-कहीं आवासीय, चिकित्सकीय एवं शैक्षिक सुविधाओं से संबद्ध सामान्य विधान भी बनाए गए हैं।

‘कल्याण’ के सिद्धांत को ध्यान में रखकर बनाए गए कुछ श्रम एवं सामाजिक विधान के उदाहरण हैं - संरक्षात्मक अधिनियमों में कल्याण-संबंधों उपबंध, कोयला खान श्रम-कल्याण निधि अधिनियम, 1947, अभ्रक खान श्रम-कल्याण निधि अधिनियम, 1946, लौह अयस्क, मैंगनीज अयस्क, चूना-पत्थर, डोलोमाइट, क्रोम अयस्क, बीड़ी कर्मकार, असम चाय-बागान तथा राज्य सरकारों के श्रम-कल्याण निधि अधिनियम, राज्य सरकारों के आवासीय बोर्ड अधिनियम, बालक अधिनियम, विवाह में संबद्ध कानून, जैसे हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955, विशेष निवाह अधिनियम, 1954, अंतराज्यीय प्रवासी कर्मकार अधिनियम, 1979 तथा दहेज अधिनियम, 1961।

कुछ संरक्षात्मक श्रम-अधिनियमों, जेसे- कारखाना अधिनियम, खान अधिनियम, बागान श्रमिक अधिनियम के अधीन श्रमिकों के लिए कई तरह की कल्याणकारी सुविधाएं उपलब्ध कराना अनिवार्य है। इन सुविधाओं में कैंटीन, विश्राम-कक्ष, शिशु-कक्ष, नहाने धोने की सुविधा, प्राथमिक उपचार साधन तथा एंबुलेंस कमरा की व्यवस्था तथा कल्याण अधिकारी की नियुक्ति का विशेष रूप से उल्लेख किया जा सकता है।

सामाजिक सुरक्षा का सिद्धांत -

व्यापक अर्थो में सामाजिक सुरक्षा समाज कल्याण का ही एक अंग है, लेकिन विगत वर्षो में सामाजिक सुरक्षा-विधान के बढ़ते हुए महत्व के कारण इसे अलग श्रेणी में रखना उपयुक्त प्रतीत होता है। औद्योगिक समाज में दुर्घटना, बीमारी, वृद्धावस्था, आशक्तता, बेरोजगारी, प्रसूति, अर्जक की मृत्यु आदि आकस्मिकताओं की स्थिति में अर्जकों या उनके परिवार के सदस्यों को अनेक प्रकार की आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। मजदूरी-अर्जकों के स्थायी वर्ग में आने वाले व्यक्तियों की संख्या में अप्रत्याशित रूप से वृद्धि होने के कारण उपर्युक्त आकस्मिकताओं से उत्पन्न खतरे और भी जटिल हो गए हैं; क्योंकि ऐसे व्यक्तियों को जीवनयापन के लिए केवल मजदूरी पर ही आश्रित रहना पड़ता है। जीवन के इन खतरों के प्रति आर्थिक सुरक्षा की व्यवस्था करना ही सामाजिक सुरक्षा है। सामाजिक सुरक्षा के दो मुख्य आधारस्तंभ होते हैं - (क) सामाजिक बीमा और (ख) सामाजिक सहायता। सामाजिक बीमा में हिताधिकारियों को हितलाभ के लिए सामान्यत: अंशदान देना पड़ता है। हितलाभ के लिए राशि बीमित व्यक्तियों और नियोजकों तथा सरकार के अनुदान से आती है। योग्यता की शर्ते पूरी करने पर हिताधिकारियों को हितलाभ अधिकारस्वरूप मिलते है और उनमें निरंतरता कायम रहती है। सामाजिक सहायता में सरकार या अन्य अभिकरणों द्वारा जरूरतमंद व्यक्तियों को बिना किसी अंशदान की शर्त पर सहायता दी जाती है। सामाजिक सुरक्षा-विधान में सामाजिक बीमा और सामाजिक सहायता दोनों प्रकार के विधान सम्मिलित होते हैं।

प्रारम्भ में सामाजिक सुरक्षा-विधान मुख्यत: औद्योगिक श्रमिकों के लिए बनाए गए, लेकिन बाद में सामान्य नागरिकों के लाभ के लिए भी ऐसे विधान बनाए गए। धनी संपन्न देशों में सामाजिक सुरक्षा विधान विकसित अवस्था में है। निर्धन देशों में सामाजिक सुरक्षा की आवश्यकता अधिक होती है, लेकिन वे इसकी संतोषजनक रूप से व्यवस्था करने में असमर्थ होते है।। सामाजिक सरु क्षा-विधान के अंतर्गत आने वाले कुछ महत्वपूर्ण विषय है - दुर्घटनाओं की स्थिति में क्षतिपूर्ति, प्रसूति के लाभ, अशक्तता-हितलाभ, अनियोजन हितलाभ, उत्तरजीवी या आश्रित हितलाभ बर्धक्य पेंशन, भविष्य निधि, परिवार भत्ता तथा उपदान।

सामाजिक सुरक्षा के सिद्धांत को ध्यान में रखकर बनाए गए कुछ महत्त्वपूर्ण विधानों के उदाहरण है- भारत में कर्मकार क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923, प्रसूति हितलाभ अधिनियम, 1961, कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 कोयला-खान भविष्य-निधि तथा प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1948, कर्मचारी भविष्य निधि तथा प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952, तथा उपदान संदाय अधिनियम, 1972, गेट्र ब्रिटेन में राष्ट्रीय बीमा अधिनियम, राष्ट्रीय बीमा (औद्योगिक दुर्घटना) अधिनियम तथा राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा अधिनियम और संयुक्त राज्य अमेरिका का वृद्धावस्था, उत्तरजीवी, असमर्थता तथा स्वास्थ्य बीमा अधिनियम।

निवारण का सिद्धांत - 

समाज में होने वाले परिवर्तन और विकास के साथ-साथ मूल्य-प्रणालियों, प्रथाओं, रीति-रिवाजों, सामाजिक संस्थाओं और सामाजिक समूहों के पारस्परिक संबंधों में परिवर्तन होते रहते हैं। परिवर्तन और विकास की इस प्रक्रिया में कुछ प्रथाएं सामाजिक प्रगति एवं मानवीय हितों के विकास में बाधक हो जाती है। इनमें कई समाज के कुछ समूहों के शोषण को प्रोत्साहित करती है, जिनके फलस्वरूप अनेक लोगों के जीवन दयनीय हो जाते हैं। इन कुप्रथाओं में सती-प्रथा, शिशु-हत्या, बालविवाह, दहेज-प्रथा, अस्पृष्यता, वेष्यावृित्त्, भिक्षावृत्ति, दास, कृषि दास, बलात एवं बंधुआ श्रम प्रथाओं, बहुविवाह, मद्यपान आदि का उल्लेख किया जा सकता है। इन सामाजिक कुप्रथाओं को रोकने के उद्देश्य से भी समय-समय विधान बनाए गए हैं। भारतीय संविधान में बलात श्रम, मनुष्यों के क्रय-विक्रय, मध्यपान, अस्पृष्यता, मनुष्यों में अनैतिक व्यापार आदि कुप्रथाओं को रोकने से संबद्ध महत्त्वपूर्ण उपबंध है। सामाजिक कुप्रथाओं को रोकने के लिए कुछ अधिनियम हैं - बंगाल (1829), मद्रास (1830) और बंबई (1830) के सती विनियम, बालक-विवाह अवरोध अधिनियम, 1929, अस्पृष्यता विधान सम्बन्धी नागरिक अधिकार संरक्षा अधिनियम, 1856, अनैतिक (निवारण) अधिनियम, 1956 राज्य संरक्षकों के भिक्षावृत्ति निराय नशाबंदी से संबद्ध अधिनियम दहेज प्रतिशेध अधिनियम, 1961, सती-कृत्य (निवारण) अधिनियम, 1987 और महिला अषिश्ट व्यपदेशन (प्रतिशेध) अधिनियम, 1986।

आर्थिक विकास का सिद्धांत - 

किसी भी देश में अनसमुदाय की सुख-समृद्धि वहां के आर्थिक विकास की अवस्था पर निर्भर करती है। जहां कुल और प्रतिव्यक्ति राष्ट्रीय आय अधिक वहां लोगों का रहन-सहन भी उंचे स्तर का होता है। विश्व के सभी देशों में आर्थिक विकास के लिए राज्य की ओर कदम उठाए गए है। इनमें कई ने योजनाबद्ध आर्थिक विकास के कार्यक्रम अपनाएं है। आर्थिक विकास के विभिन्न क्रमों में उद्योग, कृषि, परिवहन एंव संचार खनिज शक्ति के साधन, सिंचाई, वन्य संपदा, वाणिज्य-व्यापार, नवीय संसाधनों और सेवाओं के विकास, जनसंख्या की वृद्धि पर अंकुष और उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि तथा आय के वितरण सम्मिलित होते हैं।

श्रम और सामाजिक विधान के माध्यम से आर्थिक विकास की गति तेज की जा सकती है। इससे साधनों के अनुचित बंटवारे में भी सहायता मिलती है। श्रम-विधानों द्वारा कार्य की भौतिक दशाओं में सुधार लाकर उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है। इसी तरह समुचित कार्य के घंटे, कल्याणकारी सुविधाओं, स्वास्थ्यप्रद पर्यावरण एवं उचित मजदूरी की व्यवस्था से लोगों की कार्यक्षमता बढ़ाई जा सकती है और आर्थिक प्रगति की गति तेज की जा सकती है। सामाजिक शोषण की रोकथाम, समाज के दुर्बल समूहों की रक्षा, सामाजिक समानता की स्थापना, हड़ताल, तालाबंदी तथा अन्य प्रकार की औद्योगिक कार्रवाइयों पर रोक, सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था, श्रम-प्रबंध-सहयोग को प्रोत्साहन तथा औद्योगिक विवादों को सुलझाने के लिए संयंत्र की व्यवस्था का उत्पादन, उत्पादकता और आर्थिक विकास पर प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव पड़ता है। विधान द्वारा मजदूरी की मात्रा, मजदूरी में अंतर, उत्पादन से जुड़ा बोनस, भविष्य-निधि, कल्याण-निधि, मजदूरी के भुगतान, महंगाई-भत्ते की मात्रा तथा अन्य भत्तों का नियमन कर राष्ट्रीय आय के वितरण, उत्पादन तथा लोगों के जीवन सतर में सुधार लाया जा सकता है। श्रम विधानों के माध्यम से बचत और निवेश की भी प्रोत्साहित किया जा सकता है, जिससे बेरोजगारी की समस्या के समाधान में मदद मिलेगी। जनसंख्या के नियंत्रण-संबंधी सामाजिक विधान का आर्थिक विकास से गहरा संबंध होता है। भिक्षावृत्ति, विवाह, सामाजिक कुरीतियों, नशाबंदी, सामाजिक शोषण से संबद्ध सामाजिक विधानों का भी आर्थिक समृद्धि पर प्रभाव पड़ता रहता है।

उपर्युक्त कारणों से कई देशों में आर्थिक विकास की नीति और कार्यक्रम बनाते समय श्रम और सामाजिक विधानों की भूमिका पर भी गंभीरता से विचार किया जाता है। कुछ देशों में श्रम-विधान तो आर्थिक विकास के कार्यक्रम के आवश्यक अंग होते है।। मजदूरी, बोनस, औद्योगिक संबंध और सामाजिक सुरक्षा से सुबद्ध विधान आज विभिन्न देशों की राष्ट्रीय आर्थिक नीतियों और विकास कार्यक्रमों से गहराई से जुड़े होते हैं। जिन देशों में जनसंख्या का एक बड़ा भाग श्रमिकों का बना होता है, उनमें आर्थिक विकास के लिए श्रम एवं सामाजिक विधान का महत्व और भी अधिक होता है।

अंतराष्ट्रीय दायित्व का सिद्धांत - 

कई श्रम और सामाजिक विधान अंतराष्ट्रीय दायित्वों को निवाहने के लिए भी बनाएं जाते हैं। विश्व के विभिन्न देश प्रथम विश्वयुद्ध के बाद बने राष्ट्रसंघ और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बने संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य रहे हैं। वे इन संगठनों के विशिष्ट अभिकरणों, जैसे - अंतराष्ट्रीय श्रम संगठन, संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन, संयुक्त राष्ट्र बाल कोष, विश्व स्वास्थ्य संगठन तथा अन्य अंतराष्ट्रीय संगठनों के भी सदस्य है या उनके क्रियाकलाप में सक्रिय रूप से भाग लेते रहे है।। इन अंतराष्ट्रीय संगठनों के सदस्य होने के नाते सदस्य-देशों का यह कर्त्तव्य होता है कि वे इनके द्वारा पारित किए गए प्रस्तावों एवं निर्णयों का सम्मान करें। श्रम एवं सामाजिक दशाओं के क्षेत्र में अनेक अंतराष्ट्रीय प्रस्ताव पारित किए गए है।, जिनके उपबंधों को लागू करने के लिए विभिन्न देशों में कानून बनाए गए हैं।

श्रम एवं सामाजिक क्षेत्रों में अंतराष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा पारित किए गए प्रस्तावों की भूमिका अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण रही है। संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य अंतराष्ट्रीय श्रम संगठन के भी सदस्य होते हैं। इस संगठन के तीन अवयव होते हैं। ये है - अंतराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन, शास्ी निकाय तथा अंतराष्ट्रीय श्रम कार्यालय अंतराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन की बैठक वर्ष में एक बार होती है। इस सम्मेलन में प्रत्येक सदस्य राज्य चार प्रतिनिधि भेजता है, जिनमें दो सरकार के, एक श्रमिकों के और एक नियोजकों के प्रतिनिधि होते हैं। अंतराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन का एक अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण कार्य श्रम एवं सामाजिक विषयों पर प्रस्ताव पारित करना है। इनमें कुछ प्रस्ताव अभिसमयों तथा कुछ सिफारिशों का रूप लेते हैं। दोनों के पारित होने के लिए सम्मेलन की कम-से-कम दो-तिहाई सदस्यों की उपस्थिति और दो-तिहाई का बहुमत आवश्यक होता है। सम्मेलन ही निर्णय करता है कि कौन सा प्रस्ताव अभिसमय का रूप लेगा और कौन सा सिफारिश का। अगर कोई प्रस्ताव अभिसमय का रूप लेता है, तो उसे अनुसमर्थन के लिए सदस्य राज्यों की सरकारों के पास भेजा जाता है। सदस्य राज्य किसी अभिसमय को अनुर्धित करने या नही करने के लिए स्वतंत्र है। अगर कोई राज्य किसी अभिसमय को अनुसमर्थित करने का निर्णय लेता है, तो उसका कर्त्तव्य होता है कि वह श्रम-विधान बनाकर या अन्य तरीके से उसे लागू करे। अगर वह किसी अभिसमय का अनुसमर्थन नहीं करने का निर्णय करता है, तो उसका कर्त्तव्य होता है कि अंतराष्ट्रीय श्रम संगठन को अनुसमर्थित नहीं करने के कारणों को भेजे। सिफारिशों के साथ अनुसमर्थित करने या नहीं करने का प्रश्न नहीं उठता। उन्हें सदस्य-राज्यों की सरकारों के पास इस अनुरोध के साथ भेजा जाता है कि श्रम और सामाजिक नीति संबंधी निर्णय करते समय या कार्यक्रम चलाते समय सिफारिशों के उपबंधों को लागू करने का प्रयास करें।

अभिसमयों और सिफारिशों के कुछ महत्त्वपूर्ण विषय रहे हैं - कार्य की दशाएं, कार्य के घंटे, साप्ताहिक अवकाश, संवेतन छुट्टी, बालकों और अल्पवयों का नियोजन, स्त्रियों का नियोजन, औद्योगिक स्वास्थ्य, सुरक्षा और कल्याण, सामाजिक सुरक्षा, औद्योगिक संबंध, नियोजन एवं अनियोजन आदि। अवतक अंतराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन द्वारा 185 अभिसमय पारित किए जा चुके हैं। अलग-अलग सदस्य राज्यों ने अलग-अलग अभिसमयों को अनुसमर्थित कर श्रम विधान बनाए है। कुछ देशों ने बड़ी संख्या में अभिसमयों की अनुसमर्थित किया है, तो कुछ देशों ने कम संख्या में भारत ने अब तक 39 अभिसमयों को अनुसमर्थित किया है। इन अमिसमयों को लागू करने का सबसे महत्वपूर्ण तरीका श्रम और सामाजिक विधान बनाना रहा है। इस तरह, विश्व के विभिन्न देशों ने अंतराष्ट्रीय श्रम-संगठन के प्रति अपने दायित्व निवाहने के उद्देश्य से कई श्रम और सामाजिक विज्ञान बनाएं है। कुछ सामाजिक विधानों के पीछे अन्य अंतराष्ट्रीय संगठनों के प्रस्तावों का भी हाथ रहा है। महिलाओं के अधिकारों, वेष्यावृत्ति उन्मूलन, नागरिक अधिकारों, प्रजातीय भेदभाव की रोकथाम, बालक-विकास, बाल-अपराध, सार्वजनिक स्वास्थ्य, अशिक्षा एवं निरक्षरता आदि क्षेत्रों में अंतराष्ट्रीय प्रस्ताव पारित किए गए है। कई देशों ने इन प्रस्तावों को लागू करने के लिए भी विधान बनाए हैं।

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