केंचुआ खाद (वर्मीकम्पोस्ट) बनाने की विधि

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अनुक्रम

खाद बनाने की विभिन्न विधियों में से सर्वाधिक उपयोगी विधि है
वर्मी कम्पोस्टिंग। वस्तुत: वर्मीकम्पोस्टिंग वह विधि है जिसमें कूड़ा कचरा
तथा गोबर को केंचुओं तथा सूक्ष्म जीवों की सहायता से उपजाऊ खाद
अथवा ‘‘वर्मीकास्ट’’ में बदला जाता है यही वर्मी कम्पोस्ट अथवा केंचुआ
खाद कहलाती है।

वर्मी कम्पोस्ट के लाभ 

वर्मी कम्पोस्ट अन्य खादों की अपेक्षा कई दृष्टियों से ज्यादा लाभकारी
है। अन्य खादों जैसे गोबर की खाद कम्पोस्ट खाद की तुलना में वर्मी
कम्पोसट की प्रमुख विशेषताएं हैं-

विवरण  गोबर की खाद कम्पोस्ट खाद  वर्मीकम्पोस्ट 
तैयार होने में लगने वाली अवधि
पोषक तत्वों की मात्रा
नाइट्रोजन
फास्फोरस
पोटाश
लाभदायक जीवों की संख्या
प्रति एकड़ आवश्यकता :
सामान्य फसलें
औषधीय पौध
खरपतवार नियन्त्रण पर खर्च

6 माह

0.3 से 0.5
0.4 से 0.6%
0.4 से 0.5%
बहुत कम मात्रा में

4 टन
8 टन
काफी अधिक
खर्च होता है

4 माह

0.5 से 1%
0.5 से 0.9%
1%
कम मात्रा में

4 टन
8 टन
अपेक्षाकृत कम
खर्च होता है

2 माह

1.2 से 1.6%
1.5 से 1.8%
1.2 से 2%
काफी अधिक मात्रा में

1.5 टन
3 टन
खरपतवार नियंत्रण पर
खर्च बिल्कुल नहीं

तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट है कि अन्य पद्धतियों से बनाई गई खादों
की तुलना में वर्मीकम्पोस्ट ज्यादा उपयुक्त है। इसमें न केवल फसल के लिए
आवश्यक पोषक तत्व ज्यादा मात्रा में उपलब्ध है बल्कि दूसरी खादों की तुलना
में इसकी कम मात्रा से ही काम चल जाता है। उदाहरणार्थ यदि 20 क्विंटल
वर्मीकम्पोस्ट प्रति एकड़ किसी खेत में डालते हैं तो उससे लगभग 50 किलो
नाइट्रोजन (2 बोरी यूरिया के बराबर), 30 कि.ग्रा. फास्फोरस (सिंगल सुपर
फास्फेट की चार बोरी के बराबर) तथा 30 किलो पोटाश (एक बोरी म्यूरेट ऑफ
पोटाश के बराबर) प्राप्त हो जाती है।

  1. वर्मी कम्पोस्ट में कई प्रकार के एन्जाइम तथा हार्मोन्स जैसे
    ऑक्सीन, जिब्रालिन साईटोकाइनिन आदि भी पाए जाते हैं। ये एन्जाइम
    अन्य जैविक खादों में प्राय: नहीं पाए जाते तथा बाजार में जिन रासायनिक
    रूपों में ये मिलते हैं वे बहुत महंगे होते हैं।
  2. वर्मी कम्पोस्ट के इस्तेमाल से भूमि में स्फुर घोलक जीवाणुओं,
    तथा नाईट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले जीवाणुओं की संख्या में वृद्धि होती
    है तथा इसके साथ ही इनके उपयोग से भूमि का अम्लीय एवं क्षारीय प्रभाव
    भी सुधरता है। 
  3. वर्मी कम्पोस्ट के इस्तेमाल से जमीन में सिंचाई की भी अपेक्षाकृत
    कम आवश्यकता पड़ती है।
  4. वर्मीकम्पोस्ट खेत में डालते समय उसके साथ केंचुए भी जमीन में
    जाते हैं जो भोजन की प्राप्ति, मल विसर्जन एवं प्राण वायु पाप्त करने के
    लिए दिन भर में 7 से 10 बार ऊपर-नीचे आते-जाते हैं। इस प्रक्रिया में
    जमीन में स्वत: ही 14 से 20 छिद्र बन जाते हैं जिससे जमीन पोली होने के
    साथ-साथ इसमें वायु की आवाजाही होना आसान हो जाती है। तथा
    उसकी जलधारण क्षमता में भी वृद्धि होती है।
  5. केंचुओं का शरीर 85 प्रतिशत पानी से बना रहता है इसलिए सूखे
    की स्थिति में 60 प्रतिशत पानी की कमी हो जाने पर भी ये जीवित रहते हैं
    एवं मर कर भी ये जमीन में पौधों के लिए भोजन छोड़ जाते हैं। 
  6. केंचुए हानिकारक जीवाणुओं को खाकर लाभप्रद ह्यूमस में परिवर्तित
    कर देते हैं। 
  7. केंचुओं की विष्ठा (कास्टिंग) में पेराटापिक झिल्ली होती है जो ध्
    ाूलकणों से चिपककर वाष्पीकरण की प्रक्रिया को रोकती है। 
  8. परम्परागत गोबर खाद के कई बार कच्ची रह जाने के कारण
    फसल को दीमक अथवा गोबर की सुण्डी आदि से हानि हो सकती है परन्तु
    क्योंकि केचुआ खाद पूर्णतया पकी हुई होती है अत: इसके उपयोग से
    फसल में किसी प्रकार के गोबर के कीड़े अथवा दीमक आदि के लगने की
    संभावनाएं नहीं रहतीं। 

वर्मीकम्पोस्ट बनाने की विधि 

वर्मीकम्पोस्ट बनाने के लिए मुख्यतया चार संसाधनों की आवश्यकता
होगी-(अ) उपयुक्त प्रजाति के केंचुए, (ब) गोबर एवं कार्बनिक अवशेष, (स)
पानी (द) बांस बल्ली तथा (इ) उपयुक्त स्थान एवं अन्य व्यवस्थाएं। इन
संसाधनों की विशिष्टयां होना वांछित है-

उपयुक्त प्रजाति के केंचुए

केंचुएं मुख्यतया दो प्रकार के होते
हैं- एन्डोजीइक या नाइट कालर्स तथा ईपीजीइक या सरफेस फीडर्स। इनमें
से एन्डोजीइक (नाईट कालर्स) जमीन के अंदर रहते हैं। ये 8 से 10 इंच लंबे
होते हैं, इनका वज़न लगभग 5 ग्राम तक होता है तथा ये 90 प्रतिशत मिट्टी
एवं 10 कार्बनिक पदार्थ खाते हैं। अधिकांशत: हमारे आसपास यही केंचुए
पाए जाते हैं तथा बहुधा ये वर्षातु में दिखाई देते हैं। ये केंचुए वर्मीकम्पोस्ट
बनाने में काम नहीं आते। केंचुओं की दूसरी किस्म ईपीजीइक या सरफेस
फीडर्स कहलाती है। ये अपेक्षाकृत कम लम्बाई के होते हैं तथा इनका वजन
लगभग 0.5 से 1 ग्राम तक होता है। इनका रंग लालिमा लिए हुए बैंगनी
होता है। ये वनस्पतिक अवशेष तथा गोबर खाते हैं, ये मिट्टी पसंद नहीं
करते। वर्मीकम्पोस्ट बनाने हेतु यही उपयुक्त होते हैं। इनमें से वर्मीकम्पोस्ट
बनाने हेतु सर्वाधिक उपयुक्त प्रजाति ‘‘आइसिनिया फेटिडा’’ है। ये केंचुए
टाइगर केंचुए अथवा ब्राण्डलीग केंचुए के नाम से भी जाने जाते हैं। इनका
शरीरा लम्बा, पतला, गोल तथा दोनों सिरों पर नुकीला होता है। तथा यह
100 से 122 खण्डों में विभाजित होता है। इस प्रजाति के केंचुए प्रकाश, तीव्र
तापक्रम तथा गैसीय द्रव्यों जैसे एसिटिक एसिड आदि के प्रति काफी
संवेदनशील होते हैं। इनकी सक्रियता के लिए मध्यम तापक्रम तथा आर्द्रता
ज्यादा अनुकूल रहती है। इनका जीवनचक्र 130 से 150 दिन का होता है
तथा जन्म के छ: से सात सप्ताह के बाद ये प्रजनन योग्य हो जाते हैं। ये
केंचुए 6 सेल्सियस से 35 अंश सेल्सियस तक का तापक्रम सह लेते हैं।

गोबर अथवा कार्बनिक अवशेष 

वर्मीकम्पोस्ट बनाने के लिए
दूसरी आवश्यकता होगी- अधपका वनस्पतिक कचरा, अधपका गोबर (ताजा
गोबर कदापि नहीं) या गोबर गैस से निकली स्लरी, बची हुई शाक सब्जियां,
घास-फूस एवं कूड़ा कचरा, सब्जियों के छिलके, सूबबूल की पत्तियां, नीम
की पत्तियां आदि।

पानी 

केंचुओं के संवर्धन तथा उन्हें जिन्दा बनाए रखने के लिए
नमी बनाई रखी जाना आवश्यक होती है जिसके लिए पानी की आवश्यकता
होगी। एक 3×15 फीट के गङ्ढे के लिए प्रति दिन लगभग 15 से 45 लीटर
पानी की आवश्यकता होती है।

औज़ा़र 

वर्मीकम्पोस्टिंग की इकाई स्थापित करने के लिए
किन्हीं सामान्य औज़ारों की भी आवश्यकता होगी जैसे फावड़ा, परात,
टोकरी, झारा, प्लास्टिक पाइप, छानने हेतु छलना, कचरे अथवा पत्तों अथवा
मुलायम टहनियों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटने के लिए कुट्टी मशीन,
हाथ ट्राली आदि।

उपयुक्त स्थान 

केंचओं के संवर्धन हेतु ऐसे उपयुक्त स्थान की
आवश्यकता होगी जिसमें उपयुक्त नमी तथा उपयुक्त तापमान स्थिर रखा
जा सके, अत: इसके लिए एक टापरी अथवा शेड अथवा अस्थाई छाया
तैयार करनी उपयुक्त होती है। इस प्रकार की टापरी स्थानीय रूप से
उपलब्ध घास-फूस तथा बांस-बल्ली की सहायता से बनाई जा सकती है।
ऐसा छप्पर अथवा टापरी 5 फीट चौड़ा तथा 20 फीट लम्बा होना चाहिए
तथा यह इतना ऊंचा होना चाहिए कि इसमें घुस कर पानी दिया जा सके।

वर्मीकम्पोस्ट उत्पादन की  प्रक्रिया

  1. सर्वप्रथम उपयुक्त स्थान (छप्पर आदि) बना लेने के उपरान्त
    इसके नीचे 3 फीट चौड़ा, एक फीट गहरा तथा 15 फीट लम्बा गङ्ढे बनाएं। 
  2. इस गङ्ढे के तल को कंकर पत्थर या र्इंट के टुकड़े आदि डालकर
    इसे अच्छी प्रकार मजबूत कर लें। (इसे पक्का करने की आवश्यकता नहीं है)
    ताकि केंचुए जमीन में नीचे न जा सकें। एक छप्पर अथवा शेड के अंदर
    बनाए जाने वाले गङ्ढे की संख्या तो एक से अधिक हो सकती है परन्तु
    प्रत्येक गङ्ढे के बीच कम से कम एक फीट की दूरी रखी जानी चाहिए। 
  3. प्रत्येक गङ्ढे में अधपके नमीयुक्त वनस्पतिक कचरे की छ: इंच की
    समान रूप की तह लगा दें। यदि कचरा अधपका न हो तो उसमें पहले
    थोड़ा गोबर मिलाकर उस पर 15 दिनों तक अच्छी प्रकार पानी डालें ताकि
    इसके सड़ने पर बनने वाली गर्मी को समाप्त किया जा सके। 
  4. इस छ: इंच ऊँचे वनस्पतिक कचरे की तह पर लगभग छ: इंच
    पका हुआ गोबर समान रूप से फैलाएं। 
  5. इस गोबर की तह पर 100 केंचुए प्रति वर्गफीट के मान से डाल
    दें। उदाहरणार्थ 3×15 फीट (45 वर्गफीट) के बेड पर 4500 केंचुओं की
    आवश्यकता होगी। 
  6. इस तह के ऊपर 1 फीट ऊँची वनस्पतिक कचरे की तह समान
    रूप से फैला दें। यह वनस्पतिक कचरा जितना बारीक तथा अधसड़ा होगा,
    केचुओं के लिए यह उतना ही उपयुक्त आहार होगा। 
  7. अब इस ढेर को, जो कि डोम के आकार का होगा, जूट के बोरों
    से ढंक दें तथा इस पर नियमित रूप से (ठंड के मौसम में दिन में एक बार
    तथा गर्मी के मौसम में दिन दो बार) पानी का छिड़काव करते रहें ताकि गङ्ढे
    में नमी बनी रहे तथा कचरा नर्म रहे जिसे केंचुएं आसानी से खा सकें। 
  8. गङ्ढे में डाले गए समस्त वनस्पतिक कचरे एवं गोबर को लगभग
    30-35 दिन में हाथों से अथवा पंजे की सहायता से (फावड़ा अथवा गेती का
    इस्तेमाल किए बिना) धीरे-धीरे पलटते रहे। इससे गोबर से निकलने वाली
    गैस भी बाहर निकल जाएगी, वायु का संचार भी ठीक होगा तथा गोबर का
    तापमान भी ठीक रहेगा। 
  9. ढेर सदा केले के पत्तों अथवा बोरियों से ढंका रहना चाहिए तथा
    शेड में सदा अंधेरा बना रहना चाहिए क्योंकि अंधेरे में केंचुए ज्यादा
    क्रियाशील रहते हैं। 
  10. उपरोक्त क्रियाएं विधिवत कर लेने पर जब 50-60 दिनों के
    उपरान्त ढेर पर से जूट के बोरे हटाए जाते हैं तो ढेर में चाय की पत्ती के
    समान केंचुओं द्वारा विसर्जित कास्टिंग की ढेरियां दिखाई देंगी। यदि केंचुए
    पर्याप्त संख्या में डाले गए होंगे (अथवा जीवित बने होंगे) तो सारा कचरा
    कास्टिंग के रूप में परिवर्तित हो चुका होगा। 
  11. अब 10-15 दिनों तक पानी का छिड़काव बंद कर दें तथा तैयार
    वर्मी कम्पोस्ट को बैड से बाहर निकालकर पौलीथीन शीट पर ढेर लगा दें।
    दो-तीन घंटे के उपरान्त केंचुए पौलीथीन के फर्श पर नीचे चले जायेंगे। इस
    स्थिति में वर्मी कम्पोस्ट को अलग करके नीचे इकट्ठे हुए केंचुओं को आगे
    वर्मी-कम्पोस्ट खाद बनाने के काम में लिया जा सकता है। यदि ऐसा न
    करना हो तो जितनी भी वर्मी कम्पोस्ट तैयार हो जाए उसे निकालते रहें।
    आखिर में थोड़ी सी खाद की मात्रा तथा कुछ केंचुए बच जाते हैं। इसी बैड
    के पास नई बैड लगा दी जाती है तथा जैसे ही केंचुओं को उपयुक्त
    वातावरण मिलता है, वे अपने आप ही नई बैड में आ जाते हैं। इस विधि से
    मात्र 60-70 दिन में 3×1×10 फीट की एक बैड से लगभग 6 से 10 क्विंटल
    अच्छी प्रकार पकी हुई वर्मीकम्पोस्ट तैयार हो जाती है तथा इसमें डाले गए
    3000 केंचुए बढ़कर लगभग 9000 तक हो जाते हैं। 

वर्मीकम्पोस्ट बनाते समय रखी जाने वाली प्रमुख सावधानियां 

  1. वर्मी कम्पोस्ट के निर्माण के लिए गाय का गोबर सर्वोतम होता है
    परन्तु कभी भी आंकड़ा के पत्ते तथा धतूरे के पत्ते इस मिश्रण में नहीं डालने
    चाहिए क्योंकि आंकड़े तथा धतूरे के पत्ते केंचुओं के लिए जहरीले होते हैं।
  2. वर्मीकम्पोस्ट का बैड छायादार जगह पर ही बनाया जाना चाहिए
    तथा इसे जमीन से ऊंचा रखा जाना चाहिए अन्यथा बरसात में इसमें से
    केंचुए बहकर बाहर जा सकते हैं। 
  3. वर्मीकम्पोस्ट के बैड पर अंधेरा बनाए रखना चाहिए क्योंकि अंधेरे
    में केंचुए ज्यादा क्रियाशील होते हैं। 
  4. सड़े-गले कार्बनिक पदार्थ व गोबर को अच्छी प्रकार मिलाना
    चाहिए ताकि कार्बन-नाइट्रोजन का अनुपात संतुलित रहे। 
  5. कभी भी ताजा गोबर इस्तेमाल नहीं करना चाहिए क्योंकि इसमें
    से निकलने वाली गर्मी (गैस) से केंचुए मर सकते हैं। इस प्रकार गोबर 10
    से 15 दिन पुराना होना चाहिए। 
  6. वर्मीकम्पोस्ट बैड का तापमान 25 से 300 सेल्शियस बनाए रखना
    चाहिए तथा इसमें 30 से 35 प्रतिशत तक नमी रहनी चाहिए। ऐसा बेड में
    से वर्मीकम्पोस्ट पदार्थ को मुट्ठी में लेकर उसको लड्डू बनाकर देखने से
    किया जा सकता है। सही स्थिति में लड्डू बन जाना चाहिए परन्तु हाथ
    गीला नहीं होना चाहिए। 
  7. कठोर टहनियों का प्रयोग नहीं करना चाहिए तथा खरपतवार
    अवशेषों को भी फूल आने से पूर्व ही काम में ले लेना चाहिए। 
  8. खरपतवार तथा कूड़े कचरे में प्लास्टिक, कांच तथा पत्थर आदि
    नहीं होने चाहिए। 
  9. वर्मीकम्पोस्ट बेड को तैयार कर लेने के 5-6 दिन बाद ही केंचुए
    छोड़े जाने चाहिये क्योंकि तब तक बेड का तापमान उपयुक्त हो जाता है।
    इसी प्रकार माह में कम से कम एक बार बेड में पंजा चलाते रहना चाहिए।
    जिससे बेड में वायु का संचार होता रहे। केंचुओं को उनकी बढ़त के लिए
    उपयुक्त वातावरण मिलता रहे। 
  10. केंचुओं को पालने के लिए बनाए जाने वाले गड्ढों के तले पक्के
    नहीं करने चाहिये क्योंकि यदि छिड़काव के दौरान गङ्ढे में पानी अधिक हो
    गया तो गïा पक्का होने के कारण पानी रिसेगा नहीं जिससे केंचुए मर
    सकते हैं। अत: गङ्ढे के तले को सख्त तो बनाएं, पक्का नहीं। यदि पक्का
    बनावें तो प्रति फीट फर्श का ढलाव कम से कम दो इंच रखें जिससे पानी
    निकाल कर नीचे आ जाएगा जोकि वर्मीवाश के रूप में भी प्रयुक्त हो सकता
    है। 
  11. जूट के थैलों से वर्मीकम्पोस्ट
    के गङ्ढे अनिवार्यत: ढंक कर रखें जिससे
    गङ्ढे की नमी सुरक्षित रहे। 
  12. गङ्ढे को चीटियों, मकोड़ों,
    मुर्गियों, कौओं तथा पक्षियों आदि से
    सुरक्षित रखें। 
  13. गङ्ढे की लंबाई तो सुविधानुसार
    कुछ हो सकती है परन्तु इनकी
    चौड़ाई तीन फीट से ज्यादा नहीं होनी
    चाहिए अन्यथा कार्य करने में असुविधा
    होगी
वर्मीकम्पोस्ट अथवा केंचुआ खाद

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