लाभांश नीति का अर्थ, आवश्यक तत्व एवं प्रकार

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लाभांश नीति एक बहुत ही लोचपूर्ण एवं व्यापक शब्द है। लाभांश नीति दो शब्दों लाभांश नीति से
मिलकर बना है। लाभांश से अभिप्राय कम्पनी की आय में से अंशधारियो को मिलने वाले हिस्से से नीति से
अभिप्राय ‘व्यवहार के तरीके’ या ‘कार्य करने के सिद्धान्तों’ से होता है। अत: लाभांश नीति का अर्थ लाभांश
वितरित करने के सिद्धान्तों व योजना से होता है। लाभांश वितरण के सम्बन्ध में योजना संचालकों द्वारा
बनाई जाती है। लाभांश नीति या योजना बनाते समय पिछले वर्षों में बाँटा गया लाभांश, वर्तमान वर्ष के लाभ
उद्योग की स्थिति इत्यादि तत्वों को ध्यान में रखा जाता है। वैस्टन एवं ब्रिघम ने लाभांश नीति के विषय में
मत व्यक्त करते हुए लिखा है कि, “प्रबन्धकों के सामने यह विकल्प नहीं होता है कि लाभांश बाँटे अथवा न
बाँटै, हाँ यह प्रश्न अवश्य होता है कि कितना बाँटें?” इस प्रश्न का उत्तर लाभांश नीति से मिलता है।
लाभांश नीति को परिभाषित करते हुए वैस्टन एवं ब्रिघम ने लिखा है, “लाभांश नीति अर्जनों का अंशधारियों
को भुगतान एवं प्रतिधारित अर्जनों मे विभाजन निश्चित करती है।” अत: लाभांश वितरण के सम्बन्ध में
कर्यकारी योजना को लाभांश नीति कहा जाता है। प्रत्येक प्रबन्धक यह चाहता है कि वह एक आदर्श या
समुचित लाभांश नीति का अनुसरण करे। लाभांश नीति समता अंश पूँजी से सम्बन्धित नीति है। पूर्वाधिकार
अंश पूँजी पर लाभांश की घोषणा एवं दर पूर्व निर्धारित होने के कारण ये अंश लाभांश नीति से सम्बन्धित
नहीं होते हैं।

एक सुदृढ़ लाभांश नीति के आवश्यक तत्व

स्थायित्व – 

स्थिरता का आशय लाभांश के वितरण में नियमितता बनाये रखने से है।
यदि कोई संस्था एक वर्ष तो बहुत अच्छा लाभांश घोषित कर देती है लेकिन अगले ही वर्ष लाभांश नहीं बाँट
पाती तो इसे अच्छा नहीं कहा जा सकता। इसके विपरीत यदि कोई संस्था मध्यम दर से ही प्रतिवर्ष लाभांश
देती रहती है तो उससे अंशधारी सन्तुष्ट रहते हैं और अंशों के मूल्यों में सट्ठा नहीं होता हे।

लाभांश दरों में क्रमश: वृद्धि – 

संस्था को हमेश इस बात
पर प्रयत्नशील रहना चाहिए कि उसकी लाभांश दरों में वृद्धि हो। मूल्य-स्तर बढ़ने व कम्पनी की आय
अधिक होने पर अंशधारी भी यही चाहते हैं कि उनकी आय में भी वृद्धि हो। अत: संस्था को अपनी लाभांश
दरों को भी थोड़ा-थोड़ा बढ़ाते रहना चाहिए। यह वृद्धि संस्था की आय में वृद्धि पर निर्भर करेगी। यदि
किसी वर्ष अत्यधिक लाभ हो तो अतिरिक्त लाभांश भी वितरित किये जाने चाहिए।

लाभांश का नकद में वितरण – 

लाभांश का वितरण
अधिकतर नकदी के रूप में ही किया जाना चाहिए, परन्तु जब संस्था में संचित कोषों की राशि बहुत अधिक
हो जाए तो स्कन्ध लाभांश भी घोषित किया जा सकता। स्कन्ध लाभांश का वितरण उचित सीमा के अन्दर
ही रखा जाना चाहिए, नहीं तो संस्था अति-पूँजीकरण का शिकार हो सकती है।

प्रारम्भ में कम लाभांश – 

संस्था को प्रारम्भ के वर्षों मे कुछ समय तक कम
दर पर ही लाभांश घोषित करना चाहिए जिससे संस्था की वित्त्ाीय स्थिति सुदृढ़ हो जाती है। बाद में संस्था
की प्रगति के साथ-साथ लाभांश में भी धीरे-धीरे वृद्धि कर देनी चाहिए।

अन्य बातें – 

लाभांश का भुगतान केवल अर्जित लाभों में से ही किया जाना
चाहिए। यदि लाभ-हानि खाते में कोई हानि पिछले वर्षों से चली आ रही है तो पहले उसे अपलिखित करना
चाहिए, उसके बाद लाभांश की घोषणा करनी चाहिए। लाभांश अधिकांशत: वर्ष में एक बार ही दिया जाता है
लेकिन अंशधारियों के उत्साह में वृद्धि के लिए अन्तरिम लाभांश भी वितरित किये जा सकते हैं।

लाभांश नीति  के प्रकार

लाभांश नीति के निर्धारण के लिए कोई सामान्य या सर्वमान्य सूत्र नहीं दिया जा सकता है जो
प्रत्येक स्थिति में लागू होता हो। लाभांश नीति प्रबन्धकीय नीति एवं कम्पनी की परिस्थितियों पर निर्भर करती
है। प्रबन्धकों द्वारा प्राय:  वर्णित तीन प्रकार की लाभांश नीतियाँ अपनायी जा सकती है-

कठोर लाभांश नीति

कठोर या अनुदार लाभांश नीति अपनाने पर प्रबन्धकगण कम्पनी की वित्त्ाीय सुदृढ़ता एव ंव्यवसाय
को सर्वोपरि रखते हैं तथा अंशधारियों की वर्तमान आशाओ ंको गौण स्थान देते हैं। इस नीति में प्रबन्धक
लाभ का अधिकांश भाग व्यवसाय में पुनर्विनियोजित करना चाहते हैं तथा सदस्यों को लाभांश कम से कम
देते हैं। इसलिए इस नीति को अनुदार या कठोर लाभांश नीति के नाम से जाना जाता है। इस नीति में
भुगतान अनुपात (Payout Ratio) बहुत कम या कभी-कभी शून्य होता है। एक विकासशील कम्पनी जिसको
सुधार एवं विस्तार के लिए पर्याप्त अतिरिक्त पूँजी की आवश्यकता हो, इस प्रकार की लाभांश नीति
बुद्धिमतापूर्ण मानी जाती है’ क्योंकि दीर्घकाल में अंशधारियों को इससे लाभ होता है। किन्तु ऐसी नीति
अपनाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि यह नीति कहीं अंशधारियों की धैर्य-सीमा को पार न
कर जाये।

उदार लाभांश नीति

लाभांश की इस नीति मे प्रबन्धक लाभ के अधिकांश भाग का वितरण सदस्यों मे ंलाभांश के रूप में
कर देते हैं। कम्पनी द्वारा लाभ का केवल उतना ही भाग प्रतिधारित किया जाता है जितना अत्यन्त आवश्यक
समझा जाये। इस नीति में भुगतान अनुपात (Payout Ratio) उच्च होता है जैसे 90 प्रतिशत या 95 प्रतिशत
– अर्थात् प्रति सौ रुपये की आय में 90 या 95 रुपये लाभांश के रूप में वितरित कर दिये जाते हैं तथा
व्यवसाय में केवल 10 या 5 रुपये ही रखे जाते हैं। इस नीति में सदस्यों के दीर्घकालीन हितों की अपेक्षा
वर्तमान हितों को अधिक महत्व दिया जाता है। इस नीति का पालन करने पर कम्पनी में विकास व
प्रतिस्थापना के लिए कोषों की कमी आ सकती है तथा अंशों के मूल्य में सट्टा बढ़ जाता है जिससे कम्पनी
की वित्त्ाीय सुदृढ़ता को हानि पहँुच सकती है। कभी-कभी प्रबन्धक अपने स्वार्थों की सिद्धि के लिए या
प्रबन्ध-दक्षता प्रदर्शित करने के लिए अधिक लाभांश बाँटने के जोश में अनुचित तरीकों का भी प्रयोग करते
हैं। अत: उदार लाभांश नीति अपनाते समय प्रबन्धकों को कम्पनी के हितों तथ सदस्यों की अपेक्षाओ ंमें
ताल-मेल बैठाना चाहिए।

सुस्थिर लाभांश नीति

लाभांश भुगतान की यह नीति दीर्घकालीन होती है तथा इसमें साधारणतया लम्बी अवधि तक कोई
महत्त्वपूर्ण परिवर्तन नहीं किये जाते है। इस नीति में कम्पनी की भावी आवश्यकताओं व सदस्यों की वर्तमान
अपेक्षाओं को समान महत्व दिया जाता है। साधारणतया जितना लाभ लाभांश के रूप में वितरित किया जाता
है, लगभग उतना ही लाभ व्यवसाय में पुनर्विनियोजित भी किया जता है। सम्पन्न वर्षों में भी साधारणतया
उतना ही लाभांश दिया जाता है जितना कि सामान्य अथवा प्रतिकूल वर्षों में । सम्पन्नता या अधिक लाभ
वाले वर्षों में पर्याप्त कोषों का निर्माण कर लिया जाता है जिनका प्रयोग कम लाभ वाले वर्षों में लाभांश दर
को स्थिर बनाये रखने मे किया जाता है। अत: यह एक मध्यमार्गी नीति है। निश्चित एवं अनिश्चत सभी
सम्भावनाओं के लिए पर्याप्त आयोजन कर लिये जाते हैं। अत: यह नीति कम्पनी को साख एवं प्रतिष्ठा बनाये
रखने में सहायक होती है।

सुस्थिर लाभांश नीति (Stable Dividend Policy) में प्रबन्धकों द्वारा यह प्रयत्न किया जाता है कि सदस्यों को दिये जाने वाले लाभांश की दर में यथासम्भव परिवर्तन नहीं हो। इसके लिए विभिन्न वर्षों में आय तथा कर रहित लाभों में उतार-चढ़ाव होते रहने पर भी लाभांश दर मे परिवर्तन नहीं किया जाता है। यहाँ यह बता देना आवश्यक है कि कम्पनी के संचालक मण्डल को सुरक्षित भुगतान अनुपात (Stable Payout Ratio) की अपेक्षा सुस्थिर लाभांश दर (Stable Dividend Rate) की नीति अपनानी चाहिए। इसका प्रमुख कारण यह है कि अंशधारी नियमित एवं स्थायी रूप से मिलने वाले लाभांश को अधिक अच्छा समझते है।

सुस्थिर लाभांश नीति के लाभ

सुस्थिर लाभांश नीति की प्रमुख विशेषताएँ लाभांश की स्थिरता एवं नियमितता है। यदि लाभांश नीति में स्थायित्व का अभाव होता है तो इससे संस्था की स्थायी साख नहीं बन पाती तथा अंशधारियों की स्थिति भी संदिग्ध हो जाती है। जब अंशों के बाजार मूल्यों में उतार-चढ़ाव होता रहता है तो इससे संस्था व अंशधानियों दोनों पर ही बुरा प्रभाव पड़ता है। ऐसी स्थिति का सटोरिये लाभ उठा लेते हैं और यह स्थिति संस्था के अस्तित्व को भी चुनौती दे सकती है। सुस्थिर लाभांश नीति के लाभ हो सकते हैं-

  1. अंशधारियों के मन में विश्वास (Confidence among Shareholders)- नियमित एवं स्थायी लाभांश मिलते रहने से अंशधारियों के मन में अंशों के प्रति विश्वास जम जाता है। किसी वर्ष लाभ कम होने पर भी संस्था लाभांश में कटौती नहीं करती और कोषों में से नियोजन करके लाभांश वितरित कर देती है तो पूँजी बाजार में इन अंशों की साख अच्छी रहती हे।
  2. अंशधारियों में सन्तोष (Satisfaction among Shareholders)- कुछ अंशधारी आय के प्रति बहुत ही सतर्क एवं जागरूक होते हैं और वे नियमित दर से प्रति वर्ष मिलने वाले लाभों को अधिक महत्व देते है। अत: एक नियमित लाभांश नीति अपना कर अंशधारियों को सन्तुष्ट रखा जा सकता है।
  3. अंशों के बाजार मूल्यों में स्थिरता (Comparative Stability in Market Price of such Shares) – जिन अंशों पर नियमित दर से लाभांश मिलता है उनके बाजार मूल्यों में अपेक्षाकृत कम उतार-चढ़ाव आते हैं तथा ऐसे अंशों में सट्टेबाजी की सम्भावनाएँ कम रहती है।
  4. साख में वृद्धि (Strengthens Goodwill) – संस्था की साख बढ़ जाने से संस्था सफलतापूर्वक ऋण प्राप्त कर सकती है। 
  5. दीर्घकालीन नियोजन में सहायक (Helpful in Long-term Planning) – संस्था के विकास के लिए दीर्घकालीन योजना बना सकते हैं, क्योंकि इस नीति के अन्तर्गत वित्त्ाीय आवश्यकताओं तथा उनकी पूर्ति के साधनों का मूल्यांकन किया जा सकता है।
  6. राष्ट्रीय आय में स्थायित्व (Stability in National Income) – यदि राष्ट्र की अधिकांश संस्थाएँ सुस्थिर लाभांश नीति का पालन करती हैं तो इससे राष्ट्रीय आय में भी स्थायित्व आता है जो सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था के स्थायित्व का सूचक है। अत: उपर्युक्त लाभों को देखते हुए कुशल एवं अनुभवी प्रबन्धक सदैव इस बात का प्रयत्न करते है कि उकने द्वारा सुस्थिर लाभांश नीति का पालन किया जाए।

सुस्थिर लाभांश नीति का निर्माण

प्रत्येक संस्था के लिए एक सुस्थिर लाभांश नीति का निर्माण करना एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य है जिस पर प्रबन्धकों को सबसे ध्यान देना चाहिए। संस्था की भावी प्रगति तथा बाजार में उसकी साख एवं प्रतिष्ठा के लिए सुस्थिर लाभांश नीति अनिवार्य है। सुस्थिर लाभांश नीति का निर्माण करते है समय इन बातों को ध्यान में रखा जाना चाहिए-

  1. लाभांश की स्थिरता एवं नियमितता।
  2. कम्पनी की नकद स्थिति।
  3. केवल अर्जित लाभ अथवा अधिशेष में से ही लाभांश का भुगतान किया जाना चाहिए। 
  4. अधिक लाभ के वर्षों मे नियमित लाभांश की दर में अचानक वृद्धि करने की अपेक्षा अतिरिक्त लाभांश दिया जाना चाहिए।
  5. स्कन्ध लाभांश का वितरण उचित सीमा के अन्दर ही रखा जाना चाहिए, अन्यथा आये दिन स्कन्ध लाभांश देने से अति-पूँजीकरण की स्थिति आ सकती है। 
  6. प्रारम्भिक वर्षों में कुछ समय मामूली लाभांश दिया जा सकता है। बाद में संस्था की प्रगति के साथ-साथ इसमें वृद्धि की जा सकती है।
  7. यदि लाभ-हानि खाते में पहले से हानि की रकम चली आ रही है तो जब तक वह अपलिखित न हो जाए तब तक लाभांश की घोषणा नहीं करनी चाहिए।
  8. स्थायित्व को बनाये रखने के लिए लाभांश समानीकरण कोष (Dividend Equalisation Fund) की स्थापना की जानी चाहिए जिससे कम लाभ के वर्षों में उसमें से लाभांश दिया जा सके। 

किसी संस्था द्वारा पिछले वर्षों में दिये लाभांश का लेख संस्था की सही स्थिति का मूल्यांकन करने का एक उचित आधार माना जाता है। लाभांश दर तथा संस्था के चिट्ठे के आधार पर संस्था की वित्त्ाीय स्थिति एवं सफलता का सही अनुमान लगाया जा सकता है। सुस्थिर लाभांश की नीति को बनाये रखने के लिए कम्पनी के स्वामित्व के ढाँचे एवं प्रबन्ध में भी स्थायित्व रहना आवश्यक है। जिस संस्था में प्रबन्धक, आये दिन बदलते रहते हैं, उसमें स्थायी लाभांश नीति का पालन किया जाना सम्भव नहीं होता। ऐसी संस्था विनियोजकों का विश्वास खो देती है, जिसे पुन: प्राप्त करना कठिन होता है।

लाभांश नीति को प्रभावित करने वाले तत्व

लाभों की स्थिति –

लाभांश का वितरण लाभों में से ही किया जाता है। अत: कम्पनी को यह देखना चाहिए कि उस वर्ष का लाभ पर्याप्त है या नहीं। लाभ की मात्रा पिछले वर्षों के लाभों की तुलना में कम है या ज्यादा, तथा वह लाभ उसी तरह की व्यावसायिक संस्थाओं की तुलना में कैसा है? साथ ही कम्पनी को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अगले वर्षों में लाभ की इस राशि के कम व अधिक होने की क्या सम्भावनाएँ है।

व्यापार -चक्र की अवस्था –

यदि किसी संस्था में कारोबार कभी मन्द तथा कभी तेज हो जाता है तो यहाँ पर स्थिर लाभांश देने तथा संस्था की वित्त्ाीय स्थिति को सुदृढ़ रखने के लिए यह आवश्यक है कि अधिक लाभ के वर्षों में लाभ का अधिकांश भाग मन्दी के समय का सामना करने के लिए संचित ;त्मजंपदद्ध कर लिया जावे।

अतिरिक्त पूँजी की आवश्यकता –

यदि संस्था अपना कारोबार वर्ष के दौरान बढ़ाने या अपनी पुरानी सम्पित्त्ायों को नयी तथा आधुनिक सम्पित्त्ायों में बदलने की योजना रखती है तो उसके लिए उसे अतिरिक्त पूँजी की आवश्यकता पड़ेगी, ऐसी स्थिति में संस्था उस वर्ष सम्पूर्ण लाभ व्यवसाय में ही प्रतिधारित कर सकती है या कम दर लाभांश वितरित कर सकती है।

कोषों की तरलता – 

लाभांश प्राय: नकदी के रूप में दिया जाता है और यह तभी सम्भव है जब कम्पनी के पास लाभांश की घोषणा के समय पर्याप्त नकद शेष उपलब्ध हों । यदि लाभांश का भुगतान बैकों आदि से ऋण लेकर करना पड़ता है तो यह वित्त्ाीय दृष्टिकोण से अवांछनीय होगा, क्योंकि ऐसा करने पर कम्पनी की वित्त्ाीय स्थिति नाजुक होने की सम्भावना रहती है।

अंशधारियों के विचार एवं आवश्यकताएँ – 

अंशधारी कम्पनी के स्वामी होते हैं। वे अंश क्रय करते समय लाभांश आदि के बारे में कुछ विचार व आशाएँ बना लेते हैं। कम्पनी इन विचारों व आशाओं को नहीं भुला सकती, वरना उसे पूँजी बाजार से नई पूँजी एकत्रित करने में कठिनाई हो सकती है। इस सम्बन्ध में प्रबन्ध को यह देखना चाहिए कि वेसी ही अन्य कम्पनियाँ अपने अंशधारियों को कितना लाभांश दे रही है। तेजी या वृद्धि के समय अंशधारी अधिक लाभांश प्राप्त करने की आशा करते हैं।

वैधानिक व्यवस्थाएँ तथा समझौते – 

कम्पनी के प्रबन्धकों को वैधानिक (कम्पनी अधिनियम, पार्षद सीमानियमों तथा अन्तर्नियमों) व्यवस्थाओं को धन में रखकर ही लाभांश सम्बन्धी निर्णय लेना चाहिए। कम्पनी अधिनियम, 1956 की धारा 205 में इस बात की विशेष व्यवस्था की गई है कि लाभांश का भुगतान पूँजी में से न किया जाए। प्रबन्धकों द्वारा लाभांश की घोषणा करने के कम्पनी के अन्तर्नियमों में भी विस्तृत व्यवस्था होती है। अत: प्रबन्धकों को इन नियमों का पालन करना चाहिए। यदि कम्पनी ने अपने अंशधारियों से लाभांश के बारे में कोई समझौता किया है तो उसे भी पूरा करना चाहिए। उदाहरणर्थ, पूर्वाधिकारी अंशों पर लाभांश की दर निश्चित होती है और इन पर लाभांश समता अंशों के लाभांश से पहले दिया जाता है।

पुरानी लाभांश नीतियाँ –

लाभांश की घोषणा करते सम कम्पनी के प्रबन्ध को बात का ध्यान रखना चाहिए कि पिछले वर्षों में से वे कितना लाभांश घोषित करते रहे हैं। यदि लाभांश की दरें एकदम बढ़ा दी जाती हैं तो कम्पनी के अंशों में सट्टा शुरू हो जाता है जिससे कम्पनी की वित्त्ाीय व आर्थिक स्थिति बिगड़ने का डर हो जाता है, अत: प्रबन्धकों को लाभांश दर को यथास्थिर रखने का ही प्रयत्न करना चाहिए।

सरकारी नियन्त्रण – 

लाभांश की घोषणा विभिन्न वैधानिक नियन्त्रणों को मद्दे नजर रखते हुए की जारी चाहिए। इस सम्बन्ध में कम्पनी के आन्तरिक नियमों के अतिरिक्त कम्पनी अधिनियम व आयकर अधिनियम को ध्यान में रखना आवश्यक है। कम्पनी अधिनियम की धारा 205 में यह व्यवस्था की गयी है कि लाभांश का भुगतान पूँजी में से नहीं किया जा सकता है। आयकर अधिनियम की धारा 104-109 के अन्तर्गत लाभांश वितरण के सम्बन्ध में प्रावधानों का वर्णन किया गया है। इन प्रावधानों की अवहेलना करनेवालों से दण्ड के रूप में अतिरिक्त कर वसूल किया जा सकता है। 1974 में भारत सरकार ने कम्पनियों द्वारा शुद्ध लाभ के एक-तिहाई से अधिक अथवा सामान्य अंश पर 12 प्रतिशत लाभांश से अधिक इनमें से जो भी कम हो लाभांश वितरित करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। अत: विद्यमान वैधानिक व्यवस्था के अनुरूप लाभांश नीति में परिवर्तन करना आवश्यक होता है।

कराधान नीति – 

कभी-कभी सरकार पूँजी निर्माण की गति को बढ़ाने के लिए आय संचित करनेवाली संस्थाओं को आयकर की सुविधा देती है। ऊँची दर पर लाभांश वितरित करने वाली संस्थाओं पर अतिरिक्त कर लगाकर लाभों के प्रतिधारण को प्रोत्साहित किया जा सकता है। ऐसी दशा में कर बचत की सुविधा पाने के उद्देश्य से लाभों का अधिकाधिक भाग संचित करने की नीति अपना ली जाती है।

स्वामित्व का ढाँचा- 

यदि कम्पनी की पूँजी कुछ ही व्यक्तियों के हाथ में हो तो वे इस बात के लिए सहमत हो सकते हैं कि कम्पनी के विकास के लिए पर्याप्त आन्तरिक साधन बनाये रखने हेतु कुछ वर्षों तक कठोर लाभांश नीति का पालन किया जाए, किन्तु यदि कम्पनी में अंशधारियों की संख्या बहुत अधिक है तथा वे विभिन्न विचार वाले हैं, तो ऐसी दशा में वे संस्था को उदार लाभांश नीति अपनाने के लिए बाध्य करते हैं।

ऋणों का भुगतान – 

पिछले वर्षों के लिये गये ऋणों के भुगतान के लिए संस्था के पास दो साधन होते हैं- (i) ऋणपत्र जारी करके व (ii) आय से व्यवस्था करके। यदि संस्था आये ऋणों का भुगतान करने की नीति अपनाती है तो ऐसी दशा में उसे कठोर लाभांश नीति का अनुसरण करना पड़ेगा।

आय में स्थायित्व – 

कम्पनी रूप से आय अर्जित करने वाली संस्थाएँ, आय में उच्चावचन होने वाली संस्थाओं की अपेक्षा आय का अधिक भाग लाभांश के रूप में वितरित करती हैं। अस्थायी रूप से आय प्राप्त करने वाली संस्थाएँ, यह निश्चित रूप से नहीं जानती हैं कि उन्हें भविष्य में कितनी आय प्राप्त होगी। भविष्य में आय कम होने पर लाभांश बनाये रखने के उद्देश्य से ये संस्थाएँ आय का अधिकांश हिस्सा संचित कोषों में जमा कर लेती हैं।

कम्पनी की आयु  – 

नयी कम्पनियाँ प्रारम्भ में इस स्थिति में नहीं होती हैं कि वे कुछ वर्षों तक उचित लाभांश अपने सदस्यों को दे सकें। शुरू में सभी संस्थाओं को विकास के लिए पूँजी पर्याप्त आवश्यकता पड़ती है जिसे वे सरलता से बाजार से प्राप्त नहीं कर सकतीं। अत: उन्हें अपने आन्तरिक साधनों पर निर्भर होना पड़ता है। इस कारण इन संस्थाओं को कठोर लाभांश नीति अपनानी पड़ती है। इसके विपरीत पुरानी संस्थाओं में उदार नीति अपनायी जाती है क्योंकि उन्हें अपेक्षाकृत कम पूँजी की आवश्यकता होती है और यदि होती भी है तो उसकी पूर्ति के लिए बाह्य स्रोतों से पूँजी जुटाने में उन्हें उतनी कठिनाई अनुभव नहीं होती जितनी कि एक नयी संस्था को होती है।

लोक मत – 

संस्थाओं की लाभांश नीति पर जनमत तथा सार्वजनिक प्रतिक्रियाओं का भी प्रभाव पड़ता है। प्राय: बहुत अधिक लाभांश वितरित करने वाली संस्थाओं की आलोचना सभी क्षे़त्रों में होने लगती है जिससे कर्मचारी अपने वेतनों में वृद्धि की माँग करते लगती हैं और उपभोक्ता माल की कीमतों में कमी चाहते हैं तथा संस्था के अधिकारी भी उस लाभ में से अधिक बोनस दिये जाने की माँग करते हैं।

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2 Comments

mahesh kumar

Apr 4, 2018, 5:09 am Reply

Nice

Unknown

Mar 3, 2019, 4:41 am Reply

Gud

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