मानव संसाधन लेखांकन क्या है ?

अनुक्रम
मानव संसाधन लेखांकन को एक ऐसी लेखांकन पद्धति के रूप में माना जा सकता है, जिसके प्रयोग से मानव संसाधनों को सम्पत्ति के रूप में मान्यता प्रदान की जाती हो और अन्य भौतिक साधनों की भांति जिनके मूल्य को माप कर लेखा पुस्तकों में दर्ज किया जाता हो। इसके माध्यम से मानव संसाधनों के सम्बन्ध में बहुमूल्य सूचनाओं का सृजन व प्रस्तुतीकरण किया जा सकता है। कुछ विद्वानों द्वारा अभिव्यक्त धारणाएं हैं :
  1. आर0एल0 बुडरफ के अनुसार- ‘‘मानव संसाधन लेखांकन एक संगठन के मानव संसाधनों में किये गये विनियोग को पहचानने व रिपोर्ट करने का प्रयास है। मूलत: यह एक सूचना प्रणाली है जो प्रबन्ध को व्यवसाय के मानव संसाधनों मे कालावधि में हो रहे परिवर्तनों को सूचित करती है।’’ 
  2. अमरीकन लेखाकन संघ समिति के अनुसार-’’मानव संसाधनों में सम्बन्ध में समंको की पहचान व मापन तथा हित रखने वाले पक्षों को इस सूचना के संवहन की प्रक्रिया ही मानव संसाधन लेखांकन है।’’ 
  3. फलेमहोल्ज का विचार है कि व्यक्तियों को संगठनात्मक संसाधन के रूप में लेखांकित करना चाहिए उनके अनुसार ‘‘मानव संसाधन लेखांकन संगठन के लिए व्यक्तियों की लागत व मूल्य का मापन है।’’ 

मानव संसाधन लेखांकन की मुख्य विशेषताएं 

मानव संसाधन लेखांकन की विभिन्न परिभाषाओं के निरूपण से यह निष्कर्ष निकलता है कि इस लेखांकन की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं :-
  1. इस लेखा विधि में मानव संसाधनो की पहचान की जाती है। मानव संसाधनों में संगठन में कार्यरत सभी प्रकार के व्यक्तियों को शामिल किया जाता है।
  2. मानव संसाधनों में किये गये विनियोग का अभिलेखन किया जाता है। 
  3. मानव संसाधनों की लागत व मूल्य का मापन किया जाता है। 
  4. मानव संसाधनों में हो रहे परिवर्तनों का भी रिकार्ड रखा जाता है।
  5. मानव संसाधनों के सम्बन्ध में उक्त ढंग से सृजित सूचना को वित्तीय विवरण के माध्यम से हित रखने वाले पक्षो को संवहित किया जाता है। 

मानव संसाधन लेखांकन के उद्देश्य 

यह पद्धति एक ऐसाी विचारधारा है जिसका उद्देश्य वित्तीय रूप में यह पता लगाना होता है कि-
  1. संस्था में दक्ष, रूचि रखने वाले व नौकरी के प्रति पूर्णत: समर्पित व्यक्तियों की मात्रा व मूल्य कितना है। 
  2.  संस्था में कार्यरत व्यक्तियों से मिलने वाला लाभ तथा उसकी लागत (अर्थात उन व्यक्तियो को भर्ती करने, आकर्षित करने व बनाये रखने में निहित लागत) से अधिक है या नहीं। 
  3. संस्था में कार्य को अभिप्रेरित व कार्य के प्रति समर्पित करने वाली विशेषताओं का सही मात्रा में मापन हो रहा या नहीं। इन्ही तीन उद्देश्यों की पूर्ति हेतु मानव संसाधन लेखांकन का आविर्भाव हुआ है और फलत: ये ही मानव संसाधन लेखांकन के तीन महत्वपूर्ण पहलू भी हैं। 

मानव संसाधन लेखांकन के लाभ (प्रयोग) या महत्व 

मानव संसाधन लेखांकन द्वारा सृजित सूचना से अनेक लाभ प्राप्त किये जा सकते है। मुख्यत: इस लेखांकन का प्रयोग या लाभ अग्रवत है :-
  1. मानवशक्ति के अल्पकालीन व दीर्घकालीन नियोजन, विकास व प्रयोग हेतु मानव संसाधन लेखांकन श्रेष्ठ, वैज्ञानिक व वास्तविक आधार प्रदान कर सकता है। 
  2. मानव संसाधनों का लागत लाभ विश्लेषण किया जा सकता है और इस विश्लेषण के प्रकाश में बोनस सुविधाओं, सेविवर्गीय क्षतिपूर्ति, पुरस्कार व दण्ड सम्बन्धी योजनाओं को लागू किया जा सकता है। इस प्रकार का विश्लेषण सेविवर्गीय मूल्यांकन, निष्पादन मूल्यांकन व प्रोन्नति की योजना में भी सहायक सिद्ध हो सकता है। 
  3. विनियोग पर प्रत्याय की अवधारणा को मानव सम्पदा पर लागू करके मानव संसाधनों के विकास में किये गये विनियोग पर नियन्त्रण औजार के रूप में मानव संसाधन लेखांकन का प्रयोग किया जा सकता है।
  4.  मानव लेखांकन पद्धति को लागू करने से विनियोग सम्बन्धी निर्णय अधिक वास्तविक व व्यावहारिक हो सकेंगे। 
  5. मानव संसाधन लेखांकन द्वारा सूचित सूचनाओं का महत्व बाह्य व्यक्तियों के लिए भी होगा। विशेषकर ऋण प्रदान करने वाली संस्थाओं जैसे वित्तीय संस्थाए व बैकर्स के लिए ये सूचनाएं इस मायने में महत्वपूर्ण होगी कि वे सरलतापूर्वक ऋण देने के सम्बन्ध में अपने निर्णय को तय कर सकेंगी। 
  6. अंश निर्गमन के समय भावी अंशधारियों, ऋणपत्र व बॉण्डस निर्गमन के समय वित्तीय संस्थाओं व सम्वर्द्धन, विविधीकरण, एकीकरण, आदि सम्बन्धी प्रस्तावों पर विचार करते समय विभिन्न सरकारी विभागों के लिए भी ये सुनिश्चित सूचनाएं महत्वपूर्ण हो सकती है। 

क्या मानव संसाधन सम्पत्ति है? 

अर्थशास्त्रियों का मत- मानव की दक्षता बुद्धि व ज्ञान पँूजी है या नहीं इस अवधारणा पर अर्थशास्त्रियों ने काफी चिन्तन व तर्क किये हैं। सत्रहवीं शताब्दी के मध्य में अर्थशास्त्री सर विलियम पेटी ने मानव संसाधन को मौद्रिक रूप में मूल्यांकित करने का प्रयत्न किया था और तब से इस अवधारणा को व्यापक स्तर पर अनेक अर्थशास्त्रियों ने प्रयुक्त किया है। व्यापक स्तर पर मानव को उत्पादन का साधन मात्र न मानकर पूंजी मानने का श्रेय पेटी के अतिरिक्त प्रख्यात व प्रतिष्ठित, नव प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों को जाता है। बीसवी शताब्दी के मध्य में कुछ अर्थशास्त्रियों को मानव पूँजी अर्थशास्त्री की श्रेणी में रखा गया। इनमें से थियोडोर डब्ल्यू शुल्ज प्रमुख है जिनका मत है, ‘‘मानव प्राणी को पूंजीगत वस्तु न मानने का कारण मानव छवि के विषय में भावनात्मक दृष्टि व उसके मापने में निहित जटिलता और अव्यावहारिकता ही है।’’,

लिस्टर सी. थरो के अनुसार, ‘‘मानव प्रणियों की उत्पादकता सम्बन्धी क्षमता के मापन के साधन के रूप में ही मानव पूँजी अवधारणा को आर्थिक विश्लेषण में लागू किया गया।’’ जो अर्थशास्त्री मानव पूँजी की अवधारणा का विरोध करते है उनका तर्क यह है कि व्यक्तिगत दक्षता व योग्यता को कभी भी पूँजी नही माना जा सकता क्योंकि उनके हस्तान्तरणीयता की कमी होती है और उपके मापन में कठिनार्इ होती है। लेकिन यह तर्क सैद्धान्तिक न होकर व्यावहारात्मक है।

लेखापालकों का मत- लेखापालकों ने भी प्रारम्भ में मानव संसाधन को पूंजी या सम्पत्ति नही माना ओर इसे कभी भी खाताबहियों व वित्तयी विवरणों में नही दिखाया। इसके लिए कर्इ कारण उत्तरदायी थे- (1) व्यक्तियों को सम्पत्ति के रूप में समझना व खातों में दर्शाना सरल नहीं है, परिभाषा के अनुसार सम्पत्ति वह है जिसे हस्तान्तरित किया जा सके और संस्था की समाप्ति पर जिनका कोर्इ मूल्य हो, परन्तु व्यक्तियों को बेचा नहीं जा सकता और न ही व्यवसाय की समाप्ति पर उनका कोर्इ मूल्य ही होता है, और जो सम्पत्ति नोटिस देकर संस्था को छोड़ दे उसे किसी भी मायने में सम्पत्ति नहीं कह सकते है। (2) प्रारम्भ से ही सम्पूर्ण लेखा पद्धति अंशधारियों, सरकार, बाह्य व्यक्तियों के प्रति ही सेवा अर्पण का कार्य करती रही है, आन्तरिक प्रबन्धक को सूचना प्रदान करने का नहीं। फलस्वरूप मानव संसाधन के उसी अंग का लेखा रखा जाता रहा है, जो उनके द्वारा अर्पित सेवा के बदले में किये गये भुगतान (वेतन व मजदूरी) से सम्बन्धित रहा हो। (3) मानव संसाधन के लागत व मूल्य की मापन सम्बन्धी कठिनाइयों के कारण भी इन्हें सम्पत्ति नहीं माना गया। परन्तु हाल ही में लेखापालकों के दृष्टिकोण में परिवर्तन हुआ है। वर्तमान काल में व्यावसायिक संस्थाओं द्वारा कर्मचारियों की भर्ती, प्रशिक्षण व उनके विकास पर बड़ी मात्रा में धन खर्च किया जा रहा है जिसके पीछे उद्देश्य यही है कि योग्य व कुशल व्यक्तियों से संस्था को भविष्य में सतत् रूप में लाभ मिलता रहेगा। अत: इन व्यक्तियों की भर्ती, प्रशिक्षण आदि पर किया गया व्यय विनियोग है न कि आयगत व्यय। चूंकि संस्था को एक सतत् चलने वाली इकार्इ माना गया है, अत: मानव संसाधनों के विकास पर किये गये खर्च से प्राप्त भावी लाभ के कारण इस विनियोग को सम्पत्ति माना जा सकता है। इस प्रकार वर्तमान में लेखांकन विशेषज्ञों द्वारा मानव संसाधन को सम्पत्ति की मान्यता प्रदान की गयी है।

मानव संसाधन का मूल्यांकन

मानव संसाधन को सम्पत्ति मानने के बाद दूसरी समस्या उसके सम्पत्ति के रूप में मूल्य-मापन की है इस सम्बन्ध में अब तक जो भी शोध कार्य हुए हैं उनके अनुसार मूल्य मापन की विधियाँ है-
  1. ऐतिहासिक लागत विधि (Historical Cost Method)
  2. पुनस्र्थापन लागत विधि (Replacement Cost Method)
  3. अवसर लागत विधि (Opportunity Cost Method)
  4. मॉडल्स के आधार पर (On the basis of models)

ऐतिहासिक लागत विधि

भौतिक सम्पत्तियों के मूल्यांकन ही यह विधि मानव संसाधनों के मूल्यांकन में भी प्रयोग की जा सकती है। इस विधि के अनुसार व्यक्तियों को भर्ती करने, चुनाव करने, कार्य पर लगाने, प्रशिक्षित करने व विकसित करने में जो कुछ भी खर्च किया जाता है उन्हें ही पूंजीकृत कर दिया जाता है। व्यक्तियों की सेवा काल की अवधि का अनुमान लगाकर पूंजीकृत मूल्य को उस सम्पूर्ण अवधि के दौरान समान किस्तों में अपलिखित किया जाता है। न अपलिखित किये गये मूल्य को सम्पत्ति के रूप में दर्शाया जाता है।

आलोचनात्मक समीक्षा- भौतिक सम्पत्तियों की भांि त मानव संसाधनों की सेवा काल का ठीक-ठीक पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता है। साथ ही मानव संसाधनों को प्रशिक्षित व विकसित इसलिए किया जाता है कि संस्था के लिए उनका मूल्य भावी वर्षों में बढ़ जाय। उक्त विधि में इस मूल्य सम्वर्द्धन को ध्यान में नही रखा जाता है। बल्कि दूसरी तरफ उनका मूल्य वर्ष प्रति वर्ष अपलेखन के कारण कम होता जाता है। इस विधि द्वारा मूल्यांकित रकम की सूचना विनियोजकों के लिए कोर्इ महत्व नही रखती हैं। प्रबन्ध के लिए भी ऐतिहासिक लागत की सूचना कोर्इ मायने नहीं रखती है। थियोडोर डब्ल्यू. शुल्ज ने इस विधि को अस्वीकार करते हुए लिखा है,

‘‘प्रत्येक प्रकार की मानव पूंजी का मूल्य उसके द्वारा प्रदत्त सेवाओं के मूल्य पर निर्भर करता है न कि उसके मूल्य लागत पर।’’

पुनस्र्थापन लागत विधि

इस विधि के अनुसार मानव संसाधनों का पुनस्र्थापन मूल्य (अर्थात विद्यमान मानव संसाधनों को प्रस्थापित करने की लागत) ज्ञात किया जाता है। इसको दो तरीकों से ज्ञात किया जा सकता है। प्रथम, एक विशेष पद पर कार्य करने वाले व्यक्ति के स्थान पर प्रतिस्थानापन्न व्यक्ति को, जो उस पद पर वही कार्य कर सकता है, लगाने पर होने वाली लागत को मूल्य माना जा सकता है। जैसे एक उत्पादन अध् ाीक्षक की पुनस्र्थापन लागत दूसरे उत्पादन अधीक्षक को नियुक्त करने में होने वाली लागत को माना जा सकता हैं। इसे पदीय पुनस्र्थापन लागत कहते है। इसमें पुराने पदाधिकारी की जगह नये पदाधिकारी की भर्ती, चुनाव, कार्य पर लगाना व विकास करने में होने वाले व्ययों को शामिल करते हैं। द्वितीय, किसी विशेष व्यक्ति को पुनस्र्थापित करने में होने वाली लागत को मूल्य माना जा सकता है। इस लागत को व्यक्तिगत पुनस्र्थापन लागत कहते हैं। यह एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से जो पहले वाले व्यक्ति के सभी पदों पर समान सेवा कर सकता हो, बदलने में होने वाले व्ययों को शामिल किया जाता है। व्यक्तिगत पुनस्र्थापन लागत की अवधारणा आर्थिक मूल्य की अवधारणा से मिलती-जुलती है। लागत को निर्धारित करते समय मानव संसाधनों को चालू मूल्य व कीमत स्तर में परिवर्तनों को भी ध्यान में रखा जाता है।

आलोचनात्मक समीक्षा- इस विधि की अच्छार्इ यह है कि वह व्यवसाय में कार्यरत कर्मचारियों का आर्थिक मूल्य ज्ञात करने में सहायता करती है। इसके द्वारा अनुमानित मूल्य वर्तमान मूल्य पर आधारित है, जो प्रबन्ध की निर्णयन प्रक्रिया में पर्याप्त सहायक होता है परन्तु व्यवहार में ऐसे व्यक्ति की खोज करना जो पहले से कार्य कर रहे व्यक्ति के समान ही योग्य हो, कठिन कार्य बन जाता है। इस तथ्य के कारण पुनस्र्थापन लागत अवास्तविक बन कर रह जाती है। यही नहीं पुनस्र्थापित लागत का अनुमान भिन्न-भिन्न व्यक्तियों द्वारा भिन्न-भिन्न लगाया जा सकता है।

अवसर लागत विधि

इसके कभी-कभी प्रतिस्पर्द्धात्मक बोली विधि भी कहते है। इस विधि का प्रयोग तभी किया जाता हैं जब कर्मचारियों की उपलब्धि सीमित हो। अर्थात् मानव सम्पदा का अर्थ सीमित कर्मचारियों से लगाया गया हो। एक सीमित कर्मचारी की सेवाओं को प्राप्त करने से लाभ में होने वाली वृद्धि को ज्ञात किया जाता है। सामान्य प्रत्याय की दर से लाभ में इस वृद्धि का पूँजीकरण कर लिया जाता है और इस पूँजीकृत मूल्य को संस्था की आधार पूँजी में जोड़ दिया जाता है एवं इस नयी पँूजी की रकम के आधार पर सामान्य दर से लाभ की गणना की जाती है। इस नयी पूँजी पर आकलित लाभ या मूल पूँजी पर अर्जित लाभ पर आधिक्य को पूँजीकृत कर लिया जाता हैं। आधिक्य लाभ के इसी पँूजीकृत मूल्य तक अधिकतम बोली लगायी जाती है। प्रतिस्पर्द्धात्मक बोली लगाकर अवसर लागत ज्ञात कर ली जाती है। जिन विभागों या विनियोग केन्द्र अधिकारियों द्वारा सीमित कर्मचारी की भर्ती करने की इच्छा को प्रकट किया जाता है वे ही प्रतिस्पर्द्धात्मक बोली लगाते हैं।

अवलोचनात्मक समीक्षा- इस विधि के पय्र ागे से मानव संसाधनों का पुन मूल्याकंन सम्भव होता है जो प्रबन्ध के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। इस सूचना से प्रबन्ध मानव संसाधनों का उचित ढंग से नियोजन व विकास कर सकता है। पुनस्र्थापन लागत की कमियों को यह विधि दूर करती है परन्तु इसका प्रयोग तभी किया जा सकता है जब संस्था में कार्यरत कर्मचारी सीमित हो। अन्य शब्दों में यह विधि उन कर्मचारियों को सम्पत्ति मानती ही नहीं जो सीमित न हो। सीमित व अन्य वर्ग विभेद के कारण कर्मचारियों के मनोबल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। यही नहीं उच्च प्रबन्ध की दशा में बोली लगाना सम्भव ही नहीं होता है। अत: उच्च प्रबन्ध के मूल्य मापन में इस विधि का प्रयोग असम्भव है। यही नहीं एक कर्मचारी को कार्य पर लगाने से लाभ में भावी वृद्धि का पता लगाना भी जटिल कार्य है।

मॉडल्स के आधार पर

बहुत से विद्वानों ने मानव संसाधनों के मूल्यांकन की समस्या को हल करने के प्रयास में कुछ माडल्स निर्मित किये हैं। इनमें से कुछ प्रमुख माडल्स का वर्णन नीचे किया गया है :-

लेव एवं श्वार्ज मॉडल्सं

यह मॉडल भावी आय के वर्तमान मूल्य पर आधारित है तथा बचे हुए सेवा काल से संस्था के लिए कर्मचारी (व्यक्ति) के आशंसित आर्थिक मूल्य को मान्यता प्रदान करता है। भावी आय का अनुमान लगाया जाता है और यह आय कर्मचारी के अवकाश ग्रहण की तिथि तक की अवधि के लिये होती है। इन आयों को एक उचित दर से हासिल करके वर्तमान मूल्य ज्ञात कर लिया जाता है। सामान्यत: यह दर संस्था के लिए पूंजी की लागत की दर के बराबर ही मानी जाती है। इस मॉडल का सूत्र इस प्रकार है।

              E(t)
V = ------------------
           (1 + r)t-x

यहा पर V = व्यक्ति का मानव पूंजी मूल्य
x = व्यक्ति की वर्तमान आयु
E(t) = अवकाश ग्रहण तक व्यक्ति की भावी वार्षिक अनुमानित आय
x = शासित दर
t = अवकाश ग्रहण की आयु

इस मॉडल की यह मान्यता है कि कर्मचारी संस्था में नौकरी करते हुए भविष्य में अपनी भूमिका को नहीं बदलेंगे। लेव एवं श्वार्ज ने सभी कर्मचारियों को समान व समरूप वर्गो में (जैसे, अकुशल, अर्द्धकुशल व कुशल) में बांट दिया है। विभिन्न आयु वर्ग वाले व्यक्तियो की औसत आय ज्ञात करके और सम्बन्धित वर्ग को ध्यान में रखते हुए मानव संसाधनों का वर्तमान मूल्य निर्धारित किया जाता है। भारत में भेल ने इसी मॉडल का प्रयोग किया है।

आलोचनात्मक समीक्षा- यह मॉडल आर्थिक मूल्य की अवधारणा को लकेर चला है और कर्मचारी के बचे हुए सेवाकाल के लिए ही मानव पूंजी मूल्य को ज्ञात किया जाता हैं परन्तु जब कर्मचारी अवकाश ग्रहण की तिथि से पहले ही संस्था को छोड़ देता है या उसकी मृत्यु हो जाती है तो इस मॉडल से ज्ञात किया गया मूल्य सही नहीं माना जा सकता हैं। यह मान्यता भी गलत है कि कर्मचारी अपनी भूमिका को नही बदलता है। कभी-कभी तो संस्था की भूमिका ही बदल जाती है ऐसी स्थिति में कर्मचारी के मूल्य में भी परिवर्तन सम्भव लगता है। इस मॉडल में इन सब तथ्यों को ध्यान में नहीं रखा गया है।

फ्लेमहोल्ज माडल - 

यह माडल लेव एवं श्वार्ज के मॉडल की कमियों को दूर करता है इस मॉडल में कर्मचारियों के सेवा स्तर (भूमिका) में होने वाले परिवर्तनों व अवकाश ग्रहण की निश्चित तिथि से पूर्व ही अवकाश लेने की सम्भावनाओं को ध्यान में रखते हुए भावी आय को हासिल करके मानव संसाधन का मूल्य ज्ञात किया जाता है। इस मॉडल के अनुसार एक कर्मचारी के मूल्य मापन में निम्न पग निहित होते है :-
  1. भविष्य में कर्मचारी संस्था में कितनी अवधि तक बना रहेगा- इसका अनुमान लगाया जाता है।
  2. भविष्य में कर्मचारी कौन सा पद ग्रहण कर सकेगा अर्थात उसकी भूमिका में क्या परिवर्तन होगा, इसका भी अनुमान लगाया जाता है। 
  3. कर्मचारी के पद से संस्था को क्या मूल्य प्राप्त होगा- इसका भी अनुमान लगाया जाता है। 
  4. अन्त में कर्मचारी को विभिन्न पदों पर प्राप्त भावी आय को हासिल करके कर्मचारी का मूल्य ज्ञात कर लिया जाता है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि कर्मचारी की कार्य प्रवृत्ति व मनोदशा तथा संगठनात्मक संरचना व प्रबन्ध विधि को ध्यान में रखना पड़ता है। 
आलोचनात्मक समीक्षा- यह मॉडल कर्मचारी के कैरियर में होने वाले परिवर्तनों व अवकाश तिथि से पूर्व नौकरी छोड़ने की सम्भावनाओं को ध्यान में रखता है जिसके कारण इसे लेव व श्वार्ज माडल से अधिक उपयुक्त माना जाता है, परन्तु कर्मचारी के विभिन्न पदों पर आसीन होने की सम्भावनाओं और विभिन्न पदों से होने वाली आय अंशदानों का अनुमान लगाना सरल कार्य नहीं है। साथ ही ऐसा अनुमान एक खर्चीला कार्य है। यह पता लगाना भी जटिल कार्य है कि कर्मचारी कितनी अवधि तक सेवा में बना रहेगा। इन सभी तथ्यों के कारण वैध समंको को प्राप्त करना कठिन हो जाता है।

जग्गी एवं लाऊ मॉडल 

यह मॉडल इस कमी को पूरा करता है कि प्रत्येक कर्मचारी के सम्बन्ध में कैरियर में परिवर्तन व पूर्वावकाश की सम्भावना ज्ञात करना जटिल कार्य है। अत: इस मॉडल में समूह का मूल्यांकन किया जाता हैं। संस्था के सभी कर्मचारियों को अलग-अलग समूहों में एकरूपता के आधार पर बांट दिया जाता है भले ही वे अलग-अलग विभागो में कार्य करते हों। समूह के अनुसार भावी आय का अनुमान लगाकर उसे ह्रासित कर लेते है और प्रत्येक समूह के ह्रासित मूल्य को जोड़कर समूचे मानव संसाधनों का मूल्य ज्ञात कर लिया जाता है। इस मॉडल की यह मान्यता है कि एक समय अवधि के दौरान कर्मचारियों के कैरियर में उतार-चढ़ाव कमोबेश स्थिर रहता है। आलोचनात्मक समीक्षा- यह मॉडल समहू को लेकर चलता है और इस प्रकार प्रत्येक कर्मचारी के मूल्य मापने हेतु बताये गये पूर्व के दो मॉडल्स की कमियों को दूर करता है। परन्तु कर्मचारियों को समूह में बांटना और उस समूह की भावी आय ज्ञात करना बहुत ही जटिल कार्य माना जाता है।

हरमैन्सन माडल 

यह मॉडल इस सामान्य विश्वास पर आधारित है कि कर्मचारी का वेतन व संस्था के लिए उस कर्मचारी का मूल्य इन दोनों में घनिष्ठ सम्बन्ध होता हैं। इस मॉडल में एक कर्मचारी के भावी वेतन का वर्तमान मूल्य ज्ञात किया जाता है। अगले कुछ वर्षों (सामान्यत: 5 वषोर्ं) के लिए वार्षिक मजदुरी या वेतन का अनुमान लगाया जाता है और उसे ह्रासित कर लेते हैं। इस प्रकार से आकलित वर्तमान मूल्य को जोड़कर सभी कर्मचारियों का मूल्य ज्ञात करते हैं जिसे क्षमता कारक या क्षमता अनुपात से गुणा कर देते हैं। क्षमता अनुपात की गणना भारांकित औसत के आधार पर ज्ञात की जाती है। भार प्रदान करते समय चालू वर्ष को अधिक और भूत वर्ष को कम भार दिया जाता है।

आलोचनात्मक समीक्षा - क्षमता कारक (अनुपात) के प्रयोग से मानव संसाधन के निष्पादन अन्तर को समायोजित कर देने के कारण मानव संसाधन का उचित मूल्य ज्ञात करने की सम्भावना बढ़ जाती है। वेतन और संस्था के लिए कर्मचारी का मूल्य- इन दोनों में प्रत्यक्ष सम्बन्ध होने की मान्यता भी सही प्रतीत नहीं होती है। भार देने की प्रक्रिया को भी दूषित ठहराया गया है। मॉडल में पाँच वर्ष की अवधि का चुनाव भी कृत्रिम प्रतीत होता है।

मानव संसाधन लेखांकन की बाधाएं 

 वर्तमान मे मानव संसाधन को सम्पत्ति के रूप में मानते हुए वित्तीय विवरणों में दर्शाया जाय परन्तु यह भी सत्य है कि अभी तक इसे पूर्णत: वैज्ञानिक रूप नहीं प्रदान किया गया है। इसमें अभी बहुत सी कमियां है और साथ ही बहुत सी बाधाएं भी हैं। कुछ बाधाएं हैं :-
  1. मानव संसाधन के मूल्य मापन हेतु कोर्इ निश्चित व पर्याप्त प्रमाप निर्धारित नहीं किया गया है। 
  2. श्रम संघों द्वारा भी इस लेखांकन का विरोध किये जाने का भय व्याप्त है। 
  3. कुछ लोग इस तथ्य का भी विरोध करते हैं कि मानव प्राणी सम्पत्ति है। इस विरोध का आधार भावनात्मक है। वे सोचते हैं कि ऐसा करने से मानव गुलाम बनकर रह जायेगा। 
  4. यह भी सुनिश्चित नहीं किया गया है कि मानव संसाधन को किस वर्ग की सम्पत्ति (स्थायी सम्पत्ति, चल सम्पत्ति या विनियोग या अमूर्त) माना जाय। 
  5. अन्य सम्पत्तियों की भाँति मानव सम्पदा को संस्था में ही बने रहने की दशा पूर्णत: अनिश्चित है क्योंकि कर्मचारीगण पूर्णत: संस्था को छोड़ने के लिए स्वतन्त्र होते हैं। 
  6. मानव संसाधन के मूल्य मापन में प्रयुक्त विभिन्न मॉडल में जिस भावी आय के अनुमान की बात की गयी है उसके सम्बन्ध में पूर्ण ज्ञान का अभाव है। इस अनिश्चयपूर्ण विश्व में भावी आय का अनुमान कभी भी सही नहीं हो सकता।

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