प्रदूषण क्या है ? प्रदूषण नियंत्रण के उपाय

प्रदूषण शब्द लैटिन भाषा के शब्द ‘‘Pollution‘‘ से लिया गया है जिसका अर्थ है दूषित करना या गन्दा बनाना। पर्यावरण में अवांछित तत्वों का प्रवेश प्रदूषण है। प्रदूषण ठोस, तरल और गैसीय तत्वों के रूप में होता है जो मानव और उनके पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।  

ई. पी. ओडम (1971) के अनुसार प्रदूषण वायु, जल और मिट्टी की भौतिक, रासायनिक और जैविक विशेषताओं में एक अवांछनीय परिवर्तन है जो मानव को विभिन्न तरीकों से प्रभावित करता है। 

प्रदूषण वायु, जल, भूमि अर्थात् पर्यावरण के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणों में होने वाला ऐसा परिवर्तन है जो मनुष्य एवं अन्य जीवों की जैविक परिस्थितियों, औद्योगिक एवं सांस्कृतिक क्रियाओं के लिये हानिकारक होता है।

प्रदूषण के प्रकार 

किसी भी प्रदूषक की उपस्थिति, जो एक तत्व या पदार्थ है जो पृथ्वी की सतह को दूषित कर सकता है, पर्यावरण में पर्यावरण प्रदूषण कहा जाता है। 
  1. वायु प्रदुषण 
  2. जल प्रदूषण 
  3. मृदा प्रदूषण 
  4. ध्वनि प्रदूषण

पर्यावरण का मानव जीवन पर प्रभाव

पर्यावरणीय प्रदूषण वायु, जल तथा भूमि प्रदूषण के रूप में हो सकता है। अवशिष्ट पदार्थ या कूड़ा जो घरों या उद्योगों से होता है वायु, जल तथा भूमि प्रदूषण का बड़ा स्रोत है। वैज्ञानिक इस तथ्य को भली-भांति जानते हैं कि किसी भी प्रकार का प्रदूषण शारीरिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होता है। अपितु कुछ शोध अध्ययनों ने इन प्रदूषणों के प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष मनोवैज्ञानिक प्रभावों को प्रदर्शित किया है। यह समझना चाहिए कि सामान्यतः किसी भी प्रकार का पर्यावरणीय प्रदूषण तंत्रिका-तंत्र को प्रभावित कर सकता है, क्योंकि विषैले द्रव्य/पदार्थ उस सीमा तक मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकते है। प्रदूषण के प्रभाव को एक अन्य स्वरूप प्रदूषण के प्रति उन सांवेगिक प्रतिक्रियाओं में दृष्टिगत होता है जो अस्वस्थता उत्पन्न करता है, जिसके परिणामस्वरूप कार्यकुशलता में कमी और कार्य में अभिरूचि कम हो जाती है तथा दुश्ंिचता का स्तर बढ़ जाता है। प्रायः लोग ऐसे स्थानों पर कार्य करना और रहना पसंद नहीं करते जहां कूड़ा फैला रहता हो यानिरंतर दुर्गंध व्याप्त हो। इसी प्रकार से वायु में धूल के कणों या अन्य निलंबित कणों के कारण दम घुटने का आभास तथा श्वास लेने में कठिनाई हो सकती है, जिससे वास्तव में श्वसन-तंत्र संबंधित विकार भी उत्पन्न हो सकते हैं। वे व्यक्ति अस्वस्थता का अनुभव करते हैं, अपने कार्य पर पूरा ध्यान नहीं दे पाते या प्रसन्न भावदशा में नहीं रह पाते।

वायु प्रदूषण का व्यक्ति के स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव पड़ता देखा गया है। कार्बन डाॅइआक्साइड, सल्फर डाइआक्साइड आदि की साद्रता के कारण कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं।

वायु के इस प्रकार के प्रदूषकों के कारण व्यक्ति में एक विशेष प्रकार के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं जिसे वायु प्रदूषक संलक्षण कहा जाता है। इस संलक्षण में व्यक्ति में थकान, सिर दर्द, चिड़चिड़ापन, विषाद आंखों में जलन तथा अन्य समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं।

वायु प्रदूषण का भी कार्य निष्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ता है। कई अध्ययनों में यह देखा गया है कि वायु प्रदूषण के कारण वाहन चलाने वाले व्यक्तियों की कार्य क्षमता में काफी कमी आती है। प्रदूषणकारी द्रव्यों की जल तथा मृदा (भूमि) में उपस्थिति शारीरिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। इनमें से कुछ रसायनों का खतरनाक मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी होता है। कुछ विशिष्ट रसायनों जैसे - सीसा की उपस्थिति मस्तिष्क के विकास को प्रभावित कर मानसिक मंदंन का कारण बन सकती है। इस प्रकार के विषैले द्रव्य मानव को विभिन्न प्रकार से प्रभावित कर सकते हैं।

सामान्यतः ऐसे पर्याप्त प्रमाण हैं जो यह प्रदर्शित करते हैं कि वायु, जल तथा मृदा में विषैले रसायनों के हानिकारक प्रभाव न केवल सामान्य मनोवैज्ञानिक प्रकार्यों पर पड़ते हैं बल्कि उनके कारण गंभीर मानसिक विकार भी उत्पन्न हो सकते हैं।

भीड़ वह प्रतिबल और बेचैनी है जिसका अनुभव किसी उच्चस्तरीय घनत्व वाले भूभाग में रहने पर होता है। इस प्रकार भीड़ एक आत्मनिष्ठ अनुभव है। यह अनुभव एक निषेधात्मक मनोभाव उत्पन्न करता है जो प्रतिबल उत्पन्न करता है और अप्रिय होता है। जब तक उच्चस्तरीय घनत्व वाले भूभाग में ऐसा अनुभव नहीं होता उसे भीड़ नहीं माना जा सकता। मेले, खेल देखने वालों की भीड़ अथवा बारात में भीड़ का अनुभव नहीं होता, किन्तु दुकान में, रेलगाडी के डिब्बे में अथवा छोटे कमरे में अनेक लोगों के साथ रहने से भीड़ का अनुभव होता है। उच्च घनत्व वाले भूभाग में भीड़ की अनुभूति के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति के लिए सामाजिक अतिभार हो, उसकी गतिविधियों के मुक्त संचालन में बाधा उत्पन्न हो, तथा व्यक्ति को अपने निजत्व को बनाए रखने में कठिनाई हो।

सामाजिक घनत्व के बढ़ जाने पर व्यक्ति को लगता है कि उसके निजत्व में बाधा उत्पन्न हो रही है और उसे अपनी आवश्यकतानुसार नियमित नहीं कर पा रहा है। यह अप्रिय और दुखद स्थिति होती है। उसको लगता है उसकी अस्मिता का ह्रास हो रहा है। बहुत दिनों तक ऐसी स्थिति के बने रहने पर व्यक्ति मानसिक रूप से रूग्ण भी हो सकता है। निजत्व के अतिक्रमण से व्यक्ति में रोष की उत्पत्ति होती है। व्यवहार पर भीड़ के प्रभाव का व्यापक रूप से अध्ययन किया गया तथा यह स्पष्ट हुआ कि भीड़ व्यवहार के अनेक आयामों को प्रभावित करती है। भीड़ का मनोवैज्ञानिक तथा दैहिक प्रभाव कई मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में देखा गया है। जैसे कि जनसंकुलन से हृदयगति तथा रक्तचाप में वृद्धि देखी गयी है, अन्तर्वैयक्तिक आकर्षण पर नकारात्मक प्रभाव देखा गया है, आक्रामकता में वृद्धि पाई गई है। सरल की अपेक्षा जटिल कार्यों पर जन संकुलन का नकारात्मक प्रभाव अधिक देखा गया है। इस प्रकार हम देखते है कि भीड़ के प्रभाव बहुधा नकारात्मक ही होते हैं।

प्रदूषण नियंत्रण के उपाय

प्रदूषण को नियंत्रित करने हेतु अग्रलिखित बिन्दु उल्लेखनीय है - 
  1. उद्योगों में कम प्रदूषणकारी प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जाना चाहिए। 
  2. चिमनियों में स्थिर विद्युत अवेक्षपण के प्रयोग द्वारा गैसों से प्रदूषण पदार्थों को पृथक किया जाना चाहिए। 
  3. कल कारखानों की चिमनियों की ऊँचाई  समुचित होनी चाहिए जिससे कि प्रदूषण गैसों से आसपास के स्थानों में कम से कम प्रदूषण हे। 
  4. नगर के आस-पास समुचित संख्या में पेड़-पौधे लगाने चाहिए जिससे वातावरण शुद्ध हो सके। 
  5. कल कारखाने नगरों से सुरक्षित दूरी पर होने चाहिए, जिससे शुद्ध वायु पर इसका असर न हो। 
  6. उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषकों के निस्तारण की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। 
  7. मल-मूत्र, कूड़ा-करकट के निस्तारण की उचित व्यवस्था होनी चाहिए। 
  8. मृत जीवों को जल में नही बहाना चाहिए। 
  9. जल को कीटाणुरहित बनाने के लिए रसायनों का उचित मात्रा में प्रयोग करना चाहिए। 
  10. कृषि के लिए न्यूनतम मात्रा में रसायनों का प्रयोग होना चाहिए। 
  11. सीजर की व्यवस्था शहरों, गांवों में भली भांति होनी चाहिए। 
  12. नियमित रूप से नगरपालिका द्वारा कूड़ें कचरे आदि का भली प्रकार से निस्तारण होना चाहिए।
  13. उद्योगों से निकलने वाले पदार्थो का निस्तारण ठीक प्रकार से होना चाहिए।
  14. प्रदूषित जल मिट्टी में एकत्रित नहीं करना चाहिए। 
  15. उद्योगों द्वारा उत्पन्न शोर कम करने के लिए विभिन्न तकनीकी व्यवस्थाओं का उपयोग किया जाना चाहिए।
  16. मोटर वाहनों में बहुध्वनि वाले हार्न बजाने पर प्रतिबंध लगाना चाहिए।
  17. उन उद्योगों में जहां शोर को सीमित करना असम्भव हो वहां श्रमिकों द्वारा कर्ण प्लग तथा कर्ण बन्दकों का प्रयोग अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए। 
  18. संयंत्र से निकलने वाले उच्च ताप के जल को फब्बारे के रूप में अधिक क्षेत्र में फैलने दिया जाय। 
  19. ताप सहन स्तर तक आ जाये तब ही उसे पुन: स्रोत में मिलने देना चाहिए।
  20. राख को अधिक क्षेत्र में बिखरने से रोकने के लिए कुछ कृत्रिम साधन अपनाने चाहिए। 
इस प्रकार उपरोक्त बिन्दुओं को अपनाकर प्रदूषण का नियंत्रण किया जा सकता है। 

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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