प्रदूषण नियंत्रण क्या है?

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प्रदूषण नियंत्रण 

हमारा जीवमण्डल एक विशाल एवं जटिल परिस्थितिकी तंत्र है जिसमें अनेक छोटे-छोटे परिस्थितिकी तंत्र पाये जाते हैं। परिस्थितिकी तंत्र में जीवों तथा पर्यावरण के बीच संतुलन रहता है। कुछ सीमा तक पर्यावरण में होने वाले परिवर्तनों को तुरंत स्थिर करने की क्षमता परिस्थितिकी तंत्र में होती है परन्तु जब कोर्इ विशेष अपनी सुख सुविधाओं के लिए पर्यावरण के किसी विशेष घटक का अधिक उपभोग कर उसे असंतुलित रूप में रूपान्तरित कर देता है। जिससे पूरा पर्यावरण प्रभावित होता है। इसको प्रदूषण कहा जाता है। एक मत के अनुसार, ‘‘प्रदूषण जीवों के चारों तरफ की वायु, जल तथा पृथ्वी के भौतिक, रसायनिक तथा जैविक लक्षणों में होने वाला ऐसा अवांछनीय परिवर्तन है, जो मानव जीवन पर, औद्योगिक प्रगति पर, आवास के हालात पर तथा सांस्कृतिक मूल्यों पर दूषित प्रभाव डाल रहा है। 
इस प्रकार प्रदूषण पर्यावरण को वर्वाद करना है जिससे सभी जीव जन्तु प्रभावित होते है प्रदूषण को नियंत्रित करने हेतु अग्रलिखित बिन्दु उल्लेखनीय है – 
  1. उद्योगों में कम प्रदूषणकारी प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जाना चाहिए। 
  2. चिमनियों में स्थिर विद्युत अवेक्षपण के प्रयोग द्वारा गैसों से प्रदूषण पदार्थो को पृथक किया जाना चाहिए। 
  3. कल कारखानों की चिमनियों की ऊँचार्इ समुचित होनी चाहिए जिससे कि प्रदूषण गैसों से आसपास के स्थानों में कम से कम प्रदूषण हे। 
  4. नगर के आस-पास समुचित संख्या में पेड़-पौधे लगाने चाहिए जिससे वातावरण शुद्ध हो सके। 
  5. कल कारखाने नगरों से सुरक्षित दूरी पर होने चाहिए, जिससे शुद्ध वायु पर इसका असर न हो। 
  6. उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषकों के निस्तारण की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। 
  7. मल-मूत्र, कूड़ा-करकट के निस्तारण की उचित व्यवस्था होनी चाहिए। 
  8. मृत जीवों को जल में नही बहाना चाहिए। 
  9. जल को कीटाणुरहित बनाने के लिए रसायनों का उचित मात्रा में प्रयोग करना चाहिए। 
  10. कृषि के लिए न्यूनतम मात्रा में रसायनों का प्रयोग होना चाहिए। 
  11. सीजर की व्यवस्था शहरों, गांवों में भली भांति होनी चाहिए। 
  12. नियमित रूप से नगरपालिका द्वारा कूड़ें कचरे आदि का भली प्रकार से निस्तारण होना चाहिए।
  13. उद्योगों से निकलने वाले पदार्थो का निस्तारण ठीक प्रकार से होना चाहिए।
  14. प्रदूषित जल मिट्टी में एकत्रित नहीं करना चाहिए। 
  15. उद्योगों द्वारा उत्पन्न शोर कम करने के लिए विभिन्न तकनीकी व्यवस्थाओं का उपयोग किया जाना चाहिए।
  16. मोटर वाहनों में बहुध्वनि वाले हार्न बजाने पर प्रतिबंध लगाना चाहिए।
  17. उन उद्योगों में जहां शोर को सीमित करना असम्भव हो वहां श्रमिकों द्वारा कर्ण प्लग तथा कर्ण बन्दकों का प्रयोग अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए। 
  18. सयंत्र से निकलने वाले उच्च ताप के जल को फब्बारे के रूप में अधिक क्षेत्र में फैलने दिया जाय। 
  19. ताप सहन स्तर तक आ जाये तब ही उसे पुन: स्रोत में मिलने देना चाहिए।
  20. राख को अधिक क्षेत्र में विखरने से रोकने के लिए कुछ कृत्रिम साधन अपनाने चाहिए। 

इस प्रकार उपरोक्त बिन्दुओं को अपनाकर प्रदूषण का नियंत्रण किया जा सकता है। 

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