प्रमाप लागत विधि क्या है?

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प्रमाप लागत लेखा-विधि का विधिवत् अध्ययन करने से पूर्व यह जान लेना आवश्यक है कि प्रमाप लागत से क्या आशय होता है। सामान्यत: प्रमाप लागत से तात्पर्य उन लागतों से होता है ,जो एक दी गयी परिस्थितियों में एक प्रदत्त उत्पादन की मात्रा पर सामान्य रुप में की जा सकती हों। ब्रउन एवं हावर्ड के अनुसार, ‘‘प्रमाप लागत एक पूर्व निर्धारित लागत है, जो यह निर्धारित करती है कि दी हुई परिस्थितियों में प्रत्येक उत्पाद या सेवा पर क्या लागत होनी चाहिए।’’
  1. आई.सी.एम.ए.आफ इंग्लैण्ड के अनुसार,’’प्रमाप लागत एक पूर्व-निर्धारित लागत है जिसकी गणना प्रबन्ध के कुशल संचालक के प्रमापों एवं सम्बद्व आवश्यक व्यय से की जाती है।’’
  2. जे.आर. बाटलीबॉय के अनुसार,’’प्रमाप लागत का आशय ऐसी पूर्व-निर्धारित लागतों से है जो उस समय की जाती हैं जबकि यंत्र,उत्पादन तकनीकी ,सामग्री एवं श्रम आदि से सम्बन्धित क्रियाएं अधिक कार्यक्षमता के साथ संगठित होती हैं और उन दी गई परिस्थितियों में प्रयोग की जाती हैं। जो स्थिर व व्यवहारिक होती है और बहुत आदर्शवादी तथा अप्राप्य नहीं होती हैं।
ऐतिहासिक लागत-विधि के अन्तरगत कोई ऐसा मापदण्ड नही है जिसके प्रयोग द्वारा यह जाना जा सके कि वर्तमान आदर्श है या नही, यदि नहीं तो आदर्श व वास्तविक में अन्तर क्या और क्यों है? प्रमाप लागत विधि के अन्तर्गत निर्मित प्रत्येक वस्तु की लागत के प्रत्येक तत्व-सामग्री, श्रम व अप्रत्यक्ष व्ययों के लक्ष्य, समय, उत्पादन की मात्रा तथा लागत-पूर्व निर्धारित कर दिये जाते हैं। जैसे-जैसे कार्य का निष्पादन होता है, वास्तविक लागतों की प्रमाप लागतों की तुलना की जाती है; दोनों के अन्तर को लागत विचरणांश कहते हैं, इन विचरणांशों का ‘कारण सहित’ विश्लेषण किया जाता है, ताकि उत्तरदायी व्यक्तियों को अक्षमता के विषय में सूचित किया जा सके और उचित कार्यवाही की जा सके।एक पूर्ण प्रमाप लागत विधि में निम्नलिखित विधियां निहित होती हैं ;
  1. कुल लागत के प्रत्येक तत्व के लिए प्रमाप निर्धारित करना (अर्थात् प्रमाप लागत का निर्धारण)। 
  2. कुल लागत के विभिन्न तत्वों के लिए प्रमाप लागत का अभिलेखन (अर्थात्प्रमाप लागत का प्रयोग)।
  3. साथ-ही-साथ वास्तविक लागतों का अभिलेखन (ऐतिहासिक लागत विधि)। 
  4. वास्तविक लागत व प्रमाप लागत की तुलना। 
  5. वास्तविक लागतों का प्रमाप लागतों से विचरणांश ज्ञात करना (विचरणांशों का मापन)। 
  6. विचरणांशों के लिये उत्तरदायी कारकों का पता लगाना (विचरणांशों का विश्लेंषण)। 
  7. प्रबन्ध को रिपोर्ट देना ताकि उचित कार्यवाही की जा सके। 
उक्त विवेचना से स्पष्ट हो रहा है कि प्रमाप लागत विधि नियन्त्रण की एक तकनीक है। इनके अन्तर्गत कार्यकुशलता और कार्यशीलता के सामान्य स्तरों के आधार पर प्रत्येक क्रिया के लागत-समंक पहले से ही निर्धारित कर दिये जाते हैं और वास्तविक निष्पादन पर हुई लागतों की पूर्व-निर्धारित प्रमापों से तुलना की जाती है और विचरणांश ज्ञात किये जाते हैं, तत्पश्चात् विचारणांश के कारणों का पता लगाकर प्रबन्ध को सूचित किया जाता है जिसके आधार पर प्रबन्ध आवश्यक सुधारात्मक कार्यवाही करके भविष्य में वास्तविक लागतों को प्रमाप लागतों के अनुकूल रखने का प्रयत्न करता है। ब्राउन एवं हावर्ड के अनुसार ‘‘प्रमाप लागत विधि लागत लेखांकन की तकनीकी है जिसमें संचालक की कुशलता निर्धारित करने के लिए प्रत्येक उत्पाद या सेवा के प्रमाप लागत की तुलना वास्तविक लागत से की जाती है, ताकि तुरन्त ही कोई सुधारात्मक कार्यवाही की जा सके।

‘इन्स्टीटयूटूट आफ कास्ट एण्ड मैनेजमैण्ट एकाउण्टेण्ट ऑफ इंग्लैण्ड के अनुसार,’’प्रमाप लागत विधि प्रमाप लागतों की तैयारी और प्रयोग,उनकी वास्तविक लागतों से तुलना और कारणों व प्रभावों के बिन्दुओं को दर्शाते हुए विचरणांशों का विश्लेषण है।’’

प्रमाप लागत का निर्धारण 

एक बार निर्णय कर लेने के बाद कि किस प्रकार के प्रमाप की गणना व प्रयोग किया जायगा ,उत्पादन स्तर के विषय में विचार करना आवश्यक होता है कि जिस अवधि के लिए प्रमाप निश्चित होने हैं, उस अवधि में उत्पादन-स्तर कितना प्राप्त किया जा सकता है। उत्पादन स्तर अपने आप में बिक्री की मात्रा व व्यवसाय में रखने योग्य स्कन्ध की मात्रा से निर्धारित होता है। उत्पादन -स्तर निर्धारित होने के बाद व्यवसाय में निर्माण, वितरण व प्रबन्ध के लिए आवश्यक उत्पादनों के साधनों यथा सामग्री,श्रम ,सेवा, आदि की मात्रा व गुण आकलित किये जा सकते हैं। इन सूचनाओं के आधार पर प्रमाप निर्धारित किये जा सकते हैं। यह भी ध्यान देने योग्य है कि उत्पादन स्तर का प्रभाव श्रम, सामग्री व सेवा प्रति इकाई लागत पर भी पड़ता है।

प्रमाप लागत के निर्धारण में प्रति इकाई प्रमाप लागत व प्रमाप लागत इकाई का निर्धारण भी शामिल होता है। इसका तात्पर्य यह है कि लागत इकाई के लिए तथा प्रत्येक प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष लागत के लिये प्रमाप निर्धारित करना होता है। प्रत्यक्ष लागत में सामग्री,श्रम और अन्य प्रत्यक्ष व्यय शामिल होते हैं। अप्रत्यक्ष लागत में लागत इकाईयों के निर्माण के लिये उत्तरदायी लागत केन्द्रों की लागतों को शामिल करते हैं। लागत इकाईयां ठोस,तरल ,उप-अंग, एकीकृत वस्तु और विभिन्न प्रकार की सेवाओं जैसे, यातायात ,विद्युत, पेशेवर सेवायें आदि का रुप ले सकती हैं। संक्षेप में, किसी कार्य या उत्पादन-स्तर की प्रमाप लागत निर्धारित करने के लिए यह आवश्यक होता है कि निष्पादन सामग्री-प्रयोग, उत्पादन मात्रा एवं लागत के विभिन्न तत्वों का प्रमाप निश्चित किया जाय। सामान्यत: लागत लेखापालक ही प्रमाप निश्चित करने के लिए उत्तरदायी होता है, जिसे काफी सर्तकता व बुद्विमता से कार्य करना पड़ता है, परन्तु उसे तकनीकी विशेषज्ञों जैसे समय व थकान-अध्ययन अभियन्ता, उत्पादन अभियन्ता, क्रेता व अन्य सेविवर्गीय व्यक्तियों से पूर्ण सहयोग अपेक्षा करनी चाहिये क्योंकि उनके सहयोग से ही प्रमाप का उचित निर्धारण सम्भव हो सकता है। निम्नलिखित प्रत्येक लागत तत्व के सम्बन्ध में प्रमाप लागत का निर्धारण करना पड़ता है:

प्रत्यक्ष सामग्री

किसी वस्तु या कार्य पर प्रत्यक्ष सामग्री-व्यय की रकम सामग्री की मात्रा व सामग्री मूल्य दर पर निर्भर करती है। अत: प्रत्यक्ष सामग्री की प्रमाप लागत निर्धारित करते समय कदम उठाये जाते है :
  1. प्रत्यके उत्पादन में प्रयुक्त सामग्री के सबं न्ध में प्रमाप ड्राइगं ,सूत्र ,गुण व विस्तार वर्णन निश्चित कर लिया जाता है, साथ ही आकार ,भार व अन्य माप के संदर्भ में प्रमाप मात्रा निर्धारित कर ली जाती है। इसके लिये भूतकाल का अभिलेख, पूर्व अनुभव व इंजीनियÇरग या रासायनिक वर्णन सहायक हो सकते हैं। यदि उत्पादन पहली बार किया जा रहा हो तो सामग्री की प्रमाप मात्रा का निर्धारण नमुनों की कुछ वस्तुओं का निर्माण करके या विशेषज्ञों से परामर्श करके या समान वस्तुओं के वर्तमान उत्पादकों के अनुभव के आधार पर किया जा सकता है।
  2. सामान्यत: प्रत्यके उत्पादन विधि में सामग्री का कुछ भाग नष्ट हो जाता है,जिस पर प्रबन्ध व कर्मचारियों का नियन्त्रण नहीं होता है। इसे समान्य क्षय कहते है। यदि ऐसा है तो गत अनुभव व वैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर प्रमाप के सामान्य क्षय का भी निर्धारण कर लेना चाहिए। 
  3. प्रत्यके उत्पाद में प्रयुक्त समस्त सामग्री का प्रमाप मूल्य दर निश्चित कर लेना चाहिए। मूल्य दर का प्रमाप निश्चित करते समय बाजार मूल्य, गत अवधि में मूल्य दर व भावी मूल्य परिवर्तनों की प्रवृति, आदि को ध्यान में रखना चाहिए। लागत लेखापालक द्वारा क्रेता अभिकर्ता के सहयोग से मूल्य दर निर्धारित होनी चाहिए और हाथ में स्कन्ध, मूल्य, उच्चावचन की सम्भावना एवं सामग्री के लिए प्रेरित आर्डर, आदि के सम्बन्ध में उचित समायोजन कर लेना चाहिए। उपर्युक्त ढंग से सामग्री की प्रमाप मात्रा व प्रमाप मूल्य दर निर्धारित कर लेने के बाद सामाग्री की प्रमाप लागत सरलतापूर्वक ज्ञात की जा सकती है। सामग्री की प्रमाप लागत सामग्री की प्रमाप मात्रा ग प्रमाप मूल्य दर के बराबर होती है- 

प्रत्यक्ष श्रम

श्रम की प्रमाप लागत मजदूरी की मात्रा व मजदूरी दर पर निर्भर करती है। अत: इसका निर्धारण करते समय दो प्रकार के प्रमाप निश्चित करने पड़ते हैं: (अ) मजदूरी की मात्रा का प्रमाप, (ब) मजदूरी दर का प्रमाप।
  1. मजदूरी की मात्रा से तात्पर्य उन श्रम घण्टों से होता है, जो प्रत्यके इकाई के निर्माण पर व्यय किया जाता है। सर्वप्रथम विभिन्न वस्तुओं के उत्पादन हेतु श्रम के विभिन्न वर्गों का निर्धारण कर लेना चाहिए और प्रत्येक वर्ग के मजदूरों की संख्या निश्चित कर लेनी चाहिए। तत्पश्चात् पूर्व अनुभव के आधार पर या आदर्श कार्यकुशलता के आधार पर या विशेष समय अध्ययन के आधार पर प्रत्येक मजदूर द्वारा किए जाने वाले कार्य की माप तथा प्रत्येक कार्य के लिए प्रमाप घण्टे निर्धारित कर लेने चाहिए। 
  2. मजदूरी दर का प्रमाप निश्चित करते समय उस मजदूरी दर का प्रयोग करना चाहिए जिस पर सामान्य प्रयत्न करने से श्रमिक उपलब्ध हो सकते हों। भूत काल का अनुभव, भावी परिवर्तन तथा आशंसित श्रम सन्नियम निर्णय एवं परिनिर्णय, आदि को भी ध्यान में रखना चाहिए। प्रत्येक वर्ष के मजदूर के लिए अलग-अलग प्रमाप मजदूरी दर निश्चित कर लेनी चाहिए। इकाई प्रमाप मजदूरी मात्रा व प्रमाप मजदूरी दर निश्चित करने के बाद प्रति इकाई प्रमाप लागत निश्चित की जा सकती है- 

अप्रत्यक्ष व्यय

 एक वस्तु के उत्पादन में किए जाने वाले अप्रत्यक्ष व्यय दो प्रकार के हो सकते हैं :
  1. परिवर्तनशील व्यय :- इस प्रकार के व्ययों की यह विशेषता होती है कि उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ ये खर्च योग में बढ़ते जाते हैं और प्रति इकाई समान रहते हैं, अत: परिवर्तनशील व्ययों को प्रति इकाई या प्रति घण्टों के अनुसार ज्ञात करना चाहिए। 
  2. स्थिर व्यय :- स्थिर व्ययों पर उत्पादन मात्रा के घटने- बढने का विशेष प्रभाव नही पड़ता। ये प्राय: अपरिवर्तित रहते है, परन्तु उत्पादन में वृद्वि होने पर प्रति इकाई कम होते जाते हैं और कमी होने पर बढ़ते जाते हैं। अत: इनके सम्बन्ध में पूर्वानुमान लगा लेना चाहिए कि ये व्यय पूरी अवधि के लिए कितने होगें और उस अवधि में उत्पादन मात्रा कितनी होगी और दोनों के आधार पर प्रति इकाई प्रमाप स्थिर व्यय निश्चित कर लिया जाता है। साधारणतया स्थिर व्यय के सम्बन्ध में प्रमाप लागत का निर्धारण श्रम लागत के कुछ निश्चित प्रतिशत के आधार पर किया जाता है। 
प्रमाप सामग्री लागत ,प्रमाप श्रम लागत व प्रमाप अप्रत्यक्ष व्यय(स्थिर एवं अस्थिर) का योग उत्पादन या कार्य का प्रमाप लागत माना जाता है। जब इसे प्रमाप विक्रय मूल्य में से घटा देते हैं, तो प्रति इकाई प्रमाप लाभ ज्ञात हो जाता है।

प्रमाप लागत विधि के उद्देश्य 

  1. प्रमाप लागत विधि नियन्त्रण का एक औजार है जिसकी सहायता से प्रभावपूर्ण नियन्त्रण सम्पादित कर कार्य क्षमता व उत्पादकता में वृद्वि की जा सकती है। 
  2. इस लागत विधि का दूसरा उद्देश्य ही वास्तविक और प्रमाप लागतों में अन्तर का निर्धारण कर विचरणों के कारणों का पता लगाया जाता है। कारणों की जानकारी के आधार पर विचरणों के लिए उत्तरदायी व्यक्ति/ केन्द्र का पता लगाया जा सकता हैं। 
  3. कभी-कभी बजटरी नियंत्रण के सहायक के रुप में प्रमाप लागत लेखा विधि को अपनाना भी उद्देश्य हो सकता है। इन दोनों के संगम से नियंत्रण व्यवस्था और अधिक प्रभावशाली बन जाती हैं। 
  4. प्रबन्ध को महत्व पूर्ण सूचना प्रदान करना भी लागत लेखा विधि का उद्देश्य होता है। इस विधि के माध्यम से प्रबन्धकों को वह सूचना दी जा सकती है जिसके फलस्वरुप उत्पादन कार्य पूर्व -निर्धारित योजना व प्रमाप के आधार पर संपादित नही हो सका। 
  5. प्रबन्ध में आगे देखने और भावी विचार करने की शक्ति का विकास करना भी प्रमाप लागत लेखाविधि का उद्देश्य होता हैं। 

प्रमाप लागत विधि के लाभ 

  1. प्रमाप लागत एक अमुक क्रिया के मापदण्ड होते हैं, जिससे वास्तविक लागत की तुलना की जा सकती है। वास्तविक लागत की गत वर्ष की वास्तविक लागत से भी तुलना की जा सकती है, परन्तु इस प्रकार की तुलना वैज्ञानिक और परिशुद्ध नहीें हो पाती है क्योंकि इस प्रक्रिया में अनेक ऐसे प्रश्न उठ पड़ते हैं जिनका सन्तोषजनक उत्तर व्यवहार में नहीं मिल पाता है। इसलिए प्रमाप लागत तुलनात्मक अध्ययन में न केवल सहायक बल्कि उचित मार्ग प्रदर्शक भी होते हैं। 
  2. साधारण लेखांकन से नैत्यक रूप में विचरणांश के विश्लेषण द्वारा किये गये खचोर्ं पर सतत् नियन्त्रण रखा जा सकता है। निष्पादन से पूर्व निर्धारित प्रमाप से थोड़ा सा विचलन होने पर उत्तरदायी व्यक्ति की खोज की जा सकती है और उन तथ्यो पर ध्यान केन्द्रित किया जा सकता है जो योजना के अनुसार नहीं किये जा रहे हों। इस प्रकार प्रबन्ध व्यवसाय की क्षमता सरलतापूर्वक बढ़ा सकता है।
  3. प्रमाप लागत विधि के अन्तर्गत विभिन्न सूचना हेतु जो विवरण तैयार किये जाते हैं वे अपेक्षाकृत संक्षिप्त एवं महत्वपूर्ण होते हैं। प्रबन्ध को सर्वाधिक महत्वपूर्ण सूचना प्राप्त हो जाती है। इस प्रकार प्रमाप लागत-विधि के प्रयोग से समय और श्रम की बचत हो सकती है 
  4. प्रबन्धकीय रिपोर्ट का निर्वचन भी अपेक्षाकृत सरल हो जाता है और इस रिपोर्ट के अध्ययन में समय की बचत हो जाती है। चूंकि रिपोर्ट में केवल महत्वपूर्ण सूचनाओं एवं तथ्यों को ही प्रदर्शित किया जाता है अत: प्रबन्ध तुरन्त ही महत्पूर्ण तथ्यों पर ध्यान दे सकता है। 
  5. यदि प्रमाप का सतत् रूप से अध्ययन किया जाय और उसमें सुधार लाया जाय तो नियंन्त्रण का कार्य सुगम हो जाता है। यही नहीं यदि प्रमाप लागत विधि के अध्ययन द्वारा प्राप्त फल के अनुसार तुरन्त कार्य किया जाय तो लागत में कमी भी लायी जा सकती है। इस प्रकार लागत नियन्त्रण और लागत में कमी- ये दोनों उद्देश्य प्रमाप लागत विधि द्वारा पूरे किये जा सकते हैं। 
  6. प्रमाप निर्धारित करने के लिए निर्माण, प्रशासन, विक्रय और वितरण आदि सभी क्रियाओं का विवरणात्मक अध्ययन करना पड़ता है। इस प्रकार के अध्ययन में लागत केन्द्र का स्थापन, अधिकार रेखा का स्पष्टीकरण और उत्तरदायित्व का निर्धारण शामिल होता है। अत: कुछ सीमा तक अक्षम एवं अपूर्ण क्रियाओं को प्रारम्भ में ही दूर किया जा सकता है। 
  7. उत्पादन कार्य प्रारम्भ होने से पूर्व ही निश्चितता के साथ उत्पादन एवं मूल्य सम्बन्धी नीति निर्धारित की जा सकती है। 
  8. प्रमाप लागत विधि के अन्तर्गत श्रमिकों की क्षमता का ज्ञान सरलातापूर्वक प्राप्त किया जा सकता है। इसके आधार पर श्रमिकों को बोनस व प्रेरणा भुगतान की योजना सरलता से बनायी जा सकती है। 

    प्रमाप लागत विधि की सीमाएं 

     प्रमाप लागत विधि हर समय और प्रत्येक स्थिति में लाभदायक यन्त्र के रूप में नहीं कर सकती है। अन्य विधियों की भांति इसकी भी कुछ सीमाएं होती हैं जिन्हें ध्यान में रखना आवश्यक होता है। कुछ सीमाएं हैं :-
    1. प्रमाप लागत विधि को लागू करना बहुत ही खर्चीला होता हैं। प्रमाप निर्धारित करना न केवल खर्चीला होता है बल्कि उच्च स्तर की योग्यता व बुद्धि की जरूरत पड़ती है जो प्रत्येक व्यावसायिक संस्था को सहज ही में उपलब्ध नहीं होती हैं। छोटे आकार की संस्थाओं में इस विधि को लागू करना अति कठिन होता है। 
    2. जिन परिस्थितियों में प्रमाप निर्धारित किये गये हों यदि उनमें परिवर्तन हो जाता है तो प्रमाप का पुनर्निरीक्षण आवश्यक हो जाता है। यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो प्रमाप जड़वत् माने जाते हैं और विचरणांश में प्रयुक्त होने लायक नहीं रह जाते है परन्तु पुनर्निरीक्षण का कार्य इतना पेचीदा व कठिन होता है कि बहुत सी संस्थाएं पुनर्निरीक्षण करती ही नहीं है। 
    3. प्रमाप लागत विधि मनोवैज्ञानिक विपरीत प्रभाव डाल सकती है। कर्मचारी वर्ग में हतोत्साह की भावना पैदा हो सकती है। ऐसा तभी होता है जब प्रमाप काफी उँचे रखे जाते हैं। 
    4. सभी प्रकार की औद्योगिक संस्थाओं के लिए यह विधि उचित नहीं मानी जाती है। 
    5. प्रमाप लागत विधि द्वारा ज्ञात कारकों को दूर करना ही उद्देश्य होना चाहिए। उत्तरदायी व्यक्ति को दण्डित करना इसका उद्देश्य नहीं होना चाहिए।

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