राजकोषीय नीति का अर्थ, उद्देश्य, महत्व एवं उपकरण

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राजकोषीय नीति के अभिप्राय, साधारणतया, सरकार की आय, व्यय तथा ऋण से सम्बन्धित नीतियों से लगाया जाता है। प्रो0 आर्थर स्मिथीज ने राजकोषीय नीति को परिभाषित करते हुए लिखा है कि- ‘‘राजकोषीय नीति वह नीति है जिसमें सरकार अपने व्यय तथा आगम के कार्यक्रम को राष्ट्रीय आय, उत्पादन तथा रोजगार पर वांछित प्रभाव डालने और अवांछित प्रभावों को रोकने के लिए प्रयुक्त करती है। इस सम्बन्ध में श्रीमती हिक्स (Mrs. Hicks) का कहना है कि ‘‘राजकोषीय नीति का सम्बन्ध उस पद्धति से है जिसमें लोक-वित्त के विभिन्न अंग अपने प्राथमिक कत्त्ाव्यों को पूरा करने के लिए सामूहिक रूप से आर्थिक नीति के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए प्रयोग में लाये जाते हैं।’’

उपर्युक्त परिभाषा के अनुसार, अर्थव्यवस्था में सर्वोच्च उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए राजकोषीय नीति व्यय, ऋण, कर, आय, हीनार्थ प्रबन्धन आदि की समुचित व्यवस्था बनाये रखती है, जैसे-आर्थिक विकास, कीमत में स्थिरता, रोजगार, करारोपण, सार्वजनिक आय-व्यय, सार्वजनिक ऋण आदि। इन सबकी व्यवस्था राजकोषीय नीति में की जाती है। राजकोषीय नीति के आधार पर सरकार करारोपण करती है। वह यह देखती है कि देश में लोगों की करदान क्षमता बढ़ रही है अथवा घट रही है। इन सब बातों का अनुमान लगाकर ही सरकार करों का निर्धारण करती है। व्यय नीति में भी वे निर्णय शामिल किये जाते हैं जिनका अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ता है। ऋण नीति का सम्बन्ध व्यक्तियों के ऋणों के माध्यम से क्रय शक्ति को प्राप्त करने से होता है। सरकारी ऋण-प्रबन्ध नीति का सम्बन्ध ब्याज चुकाने तथा ऋणों का भुगतान करने से होता है। राजकोषीय नीति आय, व्यय व ऋण के द्वारा सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति करती है। स्मरण रहे, राजकोषीय नीति और वित्त्ाीय नीति में अन्तर होता है। राजकोषीय नीति के अन्तर्गत मुख्य रूप से चार बातों को सम्मिलित किया जाता है:
  1. सरकार की करारोपण नीति (Taxation Policy), 
  2. सरकार की व्यय नीति (Expenditure Policy), 
  3. सरकार की ऋण नीति (Public Debt Policy), 
  4. सरकार की बजट नीति (Budgetary Policy), 

राजकोषीय नीति के उद्देश्य 

किसी भी देश की राजकोषीय नीति का मुख्य उद्देश्य सैद्धान्तिक रूप से, क्रियात्मक वित्त प्रबन्धन (Functional Finance Managemnat) तथा कार्यशील वित्त प्रबन्धन की व्यवस्था करना है। दूसरे शब्दों में आर्थिक विकास के लिए आवश्यक एवं पर्याप्त मात्रा में धन की व्यवस्था करना राजकोषीय नीति का मुख्य कार्य है। यद्यपि राजकोषीय नीति के उद्देश्य किसी राष्ट्र विकास के लिए उसकी परिस्थितियों, विकास सम्बन्धी आवश्यकताओं और विकास की अवस्था के आधार पर निर्धारित किये जाते है फिर भी सामान्य दृष्टि से अल्प-विकसित एवं विकासशील देशों की राजकोषीय नीति के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित कहे जा सकते हैं :

पूंजी निर्माण 

अल्प विकसित देशों में प्रति व्यक्ति वास्तविक आय के कम होने के कारण बचतें बहुत कम होती हैं जिसके फलस्वरूप विनियोग हेतु आवश्यक पूंजी का अभाव बना रहता है। निम्न आय, अल्प बचतें, कम विनियोग और निम्न उत्पादकता के कारण निध्र्मानता के दुष्चक्र (Vicious Circle of Poverty) जन्म लेने लगते है, जिनको तोड़ना राजकोषीय नीति का प्रमुख उद्देश्य माना जाता है। चूंकि इन देशों में आय के स्तर को देखते हुए, उपभोग की प्रवृित्त (Propensity to Consume) अधिक होती है इसलिए राजकोषीय नीति के अन्तर्गत करारोपण द्वारा चालू उपभोग को कम करके, बचत में वृद्धि करने के प्रयत्न किए जाते हैं, ताकि पूंजी निर्माण के लिए आवश्यक धनराशि प्राप्त हो सके। प्रो. रागनर नर्कसे का मत है कि-’’अल्प-विकसित देशों मे करारोपण नीति का उद्देश्य राष्ट्रीय आय में उसी अनुपात में वृद्धि करना है जो पूंजी निर्माण में लगाया जाता है।’’ यदि अल्प-विकसित देशों में अनावश्यक उपभोग पर करारोपण द्वारा वांछित रोक न लगायी जाए तो इसके कुछ घातक परिणाम हो सकते है, जैसे-
  1. देश में पूंजी निर्माण का कार्य या तो अवरुद्ध बना रहेगा अथवा अत्यन्त मन्द गति से होगा, 
  2. आर्थिक विकास के फलस्वरूप होने वाली आय वृद्धि पूर्णतया उपभोग कर ली जायेगी, 
  3. देश की मुद्रा स्फीतिक दशाएँ उत्पन्न होने लगेंगी। 

राष्ट्रीय आय में वृद्धि - 

पूंजी निर्माण के अलावा राजकोषीय नीति का दूसरा महत्वपूर्ण उद्देश्य राष्ट्रीय आय में वृद्धि करना है। यद्यपि राष्ट्रीय आय वृद्धि और राजकोषीय नीति का केाई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है तथा राजकोषीय नीति परोक्ष रूप से, राष्ट्रीय आय में वृद्धि के लिए सहायक सिद्ध हो सकती है। इस दृष्टि से राजकोषीय नीति के अन्तर्गत सदैव इस बात का प्रयत्न किया जाना चाहिए कि-
  1. करारापेण द्वारा प्राप्त बचतो का तत्काल विनियागे किया जाएगा 
  2. सावर्ज निक व्यय आरै सावर्ज निक ऋणों की अधिकांश मात्रा नव-निमार्ण व विकास कायोर्ं की ओर गतिशील की जाए, 
  3. देश में निजी उद्यमकर्ताओं को कर छूट द्वारा अथवा वित्त्ाीय सहायता प्रदान करके, विनियोग करने के लिए प्रेरित किया जाए। यह ठीक है कि अल्प-विकसित देशों में नव-प्रवर्तन और उद्यमियों का अभाव होता है। परन्तु प्रो. स्पैंगलर का मत है कि- यह नीति ‘‘ऐसे बहुत से साहसियों की कमी को पूरा कर सकती है।’’ यदि राजकोषीय नीति का निर्धारण उपर्युक्त उपायों की दृष्टि में रखकर किया जाए तो निश्चित है कि इसमें विनियोजन कार्य को प्रोत्साहन मिलेगा जिससे राष्ट्रीय आय में वृद्धि होगी। 

आय व धन वितरण की विषमताओं को कम करना - 

आय व धन के वितरण की समानता बनाए रखना आर्थिक विकास का केवल लक्ष्य ही नहीं वरन् एक पूर्व आवश्यकता भी है। अत: सरकार को चाहिए कि अपनी राजकोषीय नीति का निर्माण इस प्रकार से करे कि धन वितरण की विषमताएँ देश में कम से कम हो सकें। इस दृष्टि से राजकोषीय नीति के अन्तर्गत निम्न उपायों को समिलित किया जा सकता है:-
  1. धनी वर्ग पर प्रगतिशील कर (Progressvie Taxes) लगाए जाएँ जिससे कि सरकार को अतिरिक्त रूप से आय प्राप्त हो सके पर करों की मात्रा कम रखी जाए।
  2. निर्धन अथवा अल्प आय वर्ग कर करों की मात्रा कम रखी जाए। ;पपपद्ध विलासिता की वस्तुओं पर भारी मात्रा में कर लगाकर, उन पर किये जाने व्यय को विनियोगिक क्षेत्रों की ओर हस्तान्तरित किया जाए। 
  3. सरकार को अपना अधिकांश व्यय सामाजिक सेवाओं अथवा विशेष रूप से उन मदों पर करना चाहिए जिनसे निर्धनों को अधिक लाभ पहुंचता हो। 
  4. राजकोषीय नीति का ढाँचा इस प्रकार होना चाहिए कि अनुपार्जित आय पर यथाचित रोक लगायी जा सके और विकास के लिए आय (Economic Surplus) की उपलब्धि हो सके। 
अधिकांश प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों का मत था कि धन वितरण की विषमताएँ पूंजी निर्माण व आर्थिक विकास के लिए आवश्यक है। इसका कारण इन लोगों की दृष्टि में बचत सदैव धनी वर्ग द्वारा की जाती है। आज इस मान्यता के विपरीत प्रो. ड्यूनबरी के विचारों के आधार पर अब यह सिद्ध किया जा चुका है कि धन की असमानताओं की अपेक्षा, धन के समान वितरण होने पर, बचतों के प्राप्त होने की सम्भावना अधिक होती है। इसी प्रकार के कुछ अन्य लोगों द्वारा यह तर्क भी प्रस्तुत किया जाता है कि अल्प विकसित देशों में राजकोषीय नीति का उद्देश्य आर्थिक विषमताओं को कम करने के स्थान पर उत्पादन में वृद्धि करना होना चाहिए। यह धारणा भी निर्मूल व निराधार है। देश के आर्थिक विकास हेतु धन वितरण की विषमताओं का कम किया जाना अत्यावश्यक है।

मुद्रा स्फीतिक दशाओं पर नियंत्रण लगाना - 

अल्प-विकसित देशों में विकास की आवश्यकताओं को देखते हुए पूंजी का सर्वथा अभाव होता है। प्राय: देखने में आता है कि धन की इस कमी को सम्बन्धित सरकारें हीनार्थ प्रबन्ध् ान के अन्तर्गत नोट छाप कर पूरा करती है। जिससे मुद्रा स्फीतिक दशाएँ उत्पन्न होने लगती हैं। बढ़ती हुई कीमतें, न केवल समाज के लिए कष्टप्रद हैं बल्कि विकास की लागत में भी अनावश्यक वृद्धि कर देती हैं। इस दृष्टि से राजकोषीय नीति का महत्वपूर्ण कार्य ‘प्रभावपूर्ण माँग’ (Effective Demand) को कम करके मुद्रा प्रसार पर रोक लगाना है। मुद्रा प्रसारिक दबावों को नियन्त्रित करने के लिए आवश्यक है कि-
  1. जनता की अतिरिक्त क्रय शक्ति को करो अनिवार्य बचतों एवं सार्वजनिक ऋणों आदि को द्वारा कम किया जाए। 
  2. कुछ विशष प्रकार के मुद्रा स्फीति विरोधी कर (Anti Inflationary Taxes) जैसे अधिलाभ कर (Super Tax) उपहार कर, व्यय कर, विशेष उत्पादन कर तथा विलासिता की वस्तुओं पर कर आदि लगाए जाने चाहिए। 
  3. प्रत्यक्ष करो के अतिरिक्त तरल सम्पतियों कैश बैलेन्सेज व पूंजीगत सम्पतियों पर भी कर लगाये लाने चाहिए। 
  4. करारोपण नीति का आधार प्रगतिशील होना चाहिए। 
  5. कर नीति ऐसी होनी चाहिए कि एेि च्छक बचतो को प्रोत्साहित कर सके और अतिरिक्त क्रय शक्ति को नियन्त्रित कर सके। कुछ अर्थशास्त्रियों का मत है कि यदि राजकोषीय नीति द्वारा प्रभाव पूर्ण माँग को कम करके, मुद्रा प्रसार पर प्रतिबन्ध लगाने का प्रयत्न किया गया तो इससे उत्पादन व विनियोग की प्रेरणाएँ समाप्त हो जायेंगी । जिसके फलस्वरूप आर्थिक विकास का कार्य अवरुद्ध होने लगेगा। वास्तव में ऐसा सोचना भ्रमपूर्ण होगा क्योंकि प्रभावपूर्ण माँग को कम करने का अभिप्राय अनावश्यक उपभोग को कम करना है। 

रोजगार से सुअवसरों में वृद्धि करना - 

राजकोषीय नीति के विभिन्न उद्देश्यों में एक उद्देश्य अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार की स्थिति को बनाए रखना है। प्रो. लुइस का मत है कि देश में उपलब्ध जनशक्ति (Manpower) को पूर्ण रोजगार दिलायें, बिना आर्थिक विकास का लक्ष्य अधूरा है। यह काम सरकार का है कि वह अपनी मौद्रिक व रोजकोषीय नीति के अन्तर्गत एक ऐसा वातावरण तैयार करे कि जिसमें सभी लोगों को यथाशक्ति कार्य करने का सुअवसर उपलब्ध हो सके। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के अनुसार-’’मानवीय हितों को देखते हुए केन्द्रीय सरकार का यह प्रथम कर्तव्य है कि वह उन लोगों को, जो काम करने के योग्य तथा काम करने के इच्छुक है, उपयोगी ढंग की रोजगार दशाएँ उपलब्ध कराए।’’

राजकोषीय नीति का महत्व  

राजकोषीय नीति में समय-समय पर परिवर्तन होते आये हैं। प्राचीन काल में यह माना जाता था कि राजकोषीय नीति केवल संकट काल में ही सहायक हो सकती है। सामान्य परिस्थितियों में इसका कोई महत्व नहीं है। समय के बीतने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था का स्वरूप परिवर्तित होने लगा। मुद्रा का अविष्कार, औद्योगिकीकरण, आर्थिक प्रणालियों का जन्म, जनसंख्या की वृद्धि, व्यापार-चक्रों का आना, बेरोजगारी का बढ़ना, विकास व्यय व युद्ध व्ययें में वृद्धि, मंदीकाल आदि अनेक समस्याओं ने विश्व की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर दिया था। इन सब समस्याओं के समाधान के लिए यह आवश्यक हो गया था कि राज्य की आर्थिक क्रियाओं में वृद्धि की जाय। अब राज्य की आर्थिक क्रियाओं में निरन्तर वृद्धि होने लगी है। अत: इन समस्याओं के समाधान के लिए राजकोषीय नीति की आवश्यकता होने लगी।

1930 की विश्वव्यापी मन्दी को दूर करने की समस्या के लिए प्रो. कीन्स ने राजकोषीय नीति की सहायता लेकर इस बात को प्रामाणिकता के साथ सिद्ध कर दिया था कि बेरोजगारी और मंदी जैसी समस्याओं को हल किया जा सकता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था के संचालन में राजकोषीय नीति का महत्वपूर्ण स्थान है। वर्तमान समय में तो बिना इसके काम नहीं चल सकता है। कार्यात्मक वित्त के रूप में राजकोषीय नीति का महत्वपूर्ण स्थान है।

मन्दी काल में राजकोषीय नीति - 

मन्दी काल में राजकोषीय नीति का उद्देश्य उपभोग-प्रवृित्त में वृद्धि करने के उपाय करना तथा सार्वजनिक व्यय अथवा निवेशों में वृद्धि करना होगा, यदि सरकार द्वारा सार्वजनिक व्यय बढ़ा दिया गया, तो निजी उद्योगों तथा व्यापार-वाणिज्य में स्फूर्ति आ जायेगी, जब निजी विनियोग में विस्तार होता है, तो सरकारी व्यय में कमी कर दी जाती है जिससे आर्थिक क्रिया में कोई शिथिलता नहीं आती है। इस प्रकार रोजगार में वृद्धि होगी तथा आय बढ़ेगी तो उपभोग स्वत: ही बढ़ जायेगा।

मन्दी के समय कर की दरों में कमी करना लाभदायक होता है, परन्तु व्यावहारिक रूप से कर की दरों में कमी करना आसान काम नहीं है। अत: उचित यह है कि सरकार अपना व्यय बढ़ाये, परन्तु कर न बढ़ाये जायें। जब सरकार द्वारा किया गया व्यय करों से प्राप्त होने वाली आय से अधिक होता है, तो घाटे का बजट बनाया जाता है। घाटे की पूर्ति जनता से ऋण लेकर की जाती है। इससे निष्क्रिय नकद कोषों का उपयोग होता है और निजी खर्चों में कोई कमी नहीं आती है। यदि ऋण बैंको से लिया जाता है, तो अधिक साख का सृजन होता है। इसका भार किसी पर नहीं पड़ता है और अर्थव्यवस्था को लाभ होता है। सड़कों, रेलों, स्कूलों, नदी-घाटी योजनाओं आदि पर व्यय करके दीर्घकालीन लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं। घाटे की वित्त व्यवस्था मन्दी काल में रोजगार बढ़ाने का प्रभावपूर्ण तरीका है। ध्यान रहे कि हीनार्थ प्रबन्ध का उपयोग आवश्यकता से अधिक न हो।

मुद्रा स्फीति काल में राजकोषीय नीति  - 

स्फीति काल में मुद्रा का चलन अधिक होता है, परन्तु मुद्रा की क्रय-शक्ति में कमी हो जाती है। इस स्थिति को नियन्त्रित करने के लिए व्यय को नियन्त्रित करना आवश्यक है। यदि मुद्रा स्फीति युद्ध अथवा प्राकृतिक प्रकोपों अथवा आर्थिक विकास के कारण हो रही है, तो व्ययों में कमी करना कठिन हो जाता है। सरकारी व्ययों में कमी न होने से करों में वृद्धि करके मुद्रा स्फीति को रोका जा सकता है। करों का निर्धारण इस प्रकार से किया जाये कि लोगों की उपभोग प्रवृित्त्ा में कमी की जा सके। दूसरी ओर बचतों को प्रोत्साहित करने की योजना भी बनायी जानी चाहिए। लोगों के आय प्रवाह को रोका जाना चाहिए। सरकार को आकर्षक ब्याज-दरों की सहायता से लोगो की तरलता पसन्दी को कम करना चाहिए।

राजकोषीय नीति की सीमाएँ 

  1. करारापेण की प्रक्रिया में यकायक परिवर्तन करना आसान काम नही  होता है। करों में वृद्धि करने से जनआक्रोश भड़क सकता है और सरकार करों को कम नहीं करना चाहती है। 
  2. समयानसु ार सरकारी व्यया ें में परिवतर्न करना कठिन काम है क्याेिं क सावर्ज निक योजनाओं को जल्दी-जल्दी बदला नहीं जा सकता है। 
  3. सरकारी व्यय प्राय: निजी व्यय का ही स्थान ले पाता है, सार्वजनिक व्यय का जितना अधिक विस्तार होता जाता हैं, निजी व्यय कम होता जाता है। उदाहरण के लिए, यदि सरकार स्वयं उद्योग-धन्धों का संचालन करने लगे, तो निजी विनियोग कम हो जायेगा। अत: यह कहना कि सार्वजनिक व निजी व्यय में वृद्धि करके राजकोषीय नीति को प्रभावी किया जा सकता है, गलत होगा। 
  4. राजकोषीय नीति स्फीति की स्थिति को नियन्त्रित करने में सफल नहीं हो पाती है, मंदी-काल में भी राजकोषीय नीति द्वारा रोजगार बढ़ाने में अनेक व्यावहारिक कठिनाइयाँ सामने आती हैं। 
  5. राजकोषीय नीति पर राजनीतिक दबाव होता है, क्याेिं क राजस्व तथा व्यय से सम्बन्धित सभी परिवर्तनों के लिए संसद की स्वीकृत लेनी होती है। 
उपर्युक्त व्याख्या से स्पष्ट है कि राजकोषीय एवं मौद्रिक नीति के सम्मिलित प्रयासों से अर्थव्यवस्था सही दिशा दी जा सकती है।

राजकोषीय नीति के उपकरण

करारोपण अथवा सार्वजनिक आय

आर्थिक विकास का आधार कर नीति तथा सरकार की आय होती है। अत: करारोपण करदान क्षमता के आधार पर किया जाना उचित है। करारोपण इस प्रकार से किया जाय कि उसका बुरा प्रभाव काम करने की इच्छा व योग्यता पर न पड़े, साथ ही सरकार को आय भी प्राप्त हो सके।

सार्वजनिक व्यय

राजकोषीय नीति का यह महत्वपूर्ण उपकरण है, सार्वजनिक व्यय का उद्देश्य लोक कल्याण होना चाहिए। सार्वजनिक व्यय उत्पादक होना चाहिए जिससे आधारभूत ढाँचे को व्यवस्थित किया जा सके। सार्वजनिक व्यय इस प्रकार से किया जाय कि इसका बुरा प्रभाव काम करने की इच्छा व योग्यता पर नहीं पड़े। देश की आवश्यकता के अनुरूप ही सार्वजनिक व्यय होना चहिए। उदाहरण के लिए, शिक्षा, स्वास्थ्य, विद्युत, सिंचाई, यातायात, श्रम कल्याण, बीमा सुरक्षा, वृद्धावस्था पेंशन, बाल विकास आदि कार्यक्रमों पर अधिक ध्यान दिया जाना अर्थव्यवस्था के विकास में सहायक होगा। यदि सार्वजनिक व्यय गैर-विकास के कार्यक्रमों में किया जाता है, तो इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा।

सार्वजनिक ऋण नीति

राजकोषीय नीति के अन्तर्गत सार्वजनिक ऋणों का भी महत्वपूर्ण स्थान होता है। ये ऋण आन्तरिक एवं बाह्य दोनों प्रकार के होते है। एक विकासशील देश साधनों की कमी के कारण अपना समुचित विकास नहीं कर पाता है फलत: उसे ऋण लेकर अपनी अर्थव्यवस्था का संचालन करना होता है। यदि ऋणों का उपयोग सोच-समझ कर किया जाता है, तो इसका लाभ देश को मिलता है। अविवेकपूर्ण ऋण से मूलधन व ब्याज की अदायगी की समस्या पैदा हो जाती है।

बजटीय नीति 

राजकोषीय नीति का यह महत्वपूर्ण विभाग है, बजट वर्ष भर का लेखा-जोखा प्रस्तुत करता है। इसमें आय व व्यय का हिसाब होता है। बजट सरकार का मार्गदर्शक होता है। इसमें करों, शुल्कों तथा घाटे की पूर्ति की व्यवस्था तथा व्ययों का विवरण होता है। वर्तमान में बजटों का महत्व नहीं रह गया है। प्रत्येक सरकार जनहित में आय से अधिक व्यय करके समाज व देश में अपनी प्रसिद्धि व साख को बनाना चाहती है। अत: आज घाटे के बजटों का चलन है, परन्तु प्रत्येक सरकार लगातार असामान्य घाटे के बजट को नहीं बनाना चाहती है, क्योंकि एक सीमा के बाद घाटे का बजट देश की अर्थव्यवस्था को चौपट कर देता है।

भारतीय की राजकोषीय नीति 

भारत की राजकोषीय नीति के प्रमुख अंग वे हैं जिनकी चर्चा ऊपर की गयी है। आगे विस्तार से भारत के सन्दर्भ में इन अंगो की व्याख्या की गयी है। यहाँ राजकोषीय नीति का जो आधार स्तम्भ बजट है उसके बारे में जानकारी देना आवश्यक है।

बजट

देश के वित्त मन्त्री द्वारा साल भर का जो लेखा भारत की संसद में स्वीकृति के लिए रखा जाता है उसे बजट कहा जाता है। इसमें विशेष रूप से आय-व्यय का लेखा होता है जिसे हम वार्षिक आर्थिक विवरण भी कहते है। बजट के भाग (Parts of the Budget) - भारत सरकार के बजट को दो भागों में बाटा गया है- 1. राजस्व बजट तथा, 2. पूँजीगत बजट

राजस्व बजट 

राजस्व बजट में (i) राजस्व आय अथवा प्राप्तियों का तथा (ii) राजस्व व्यय का विवरण होता है।
  1. राजस्व आय (Revenue Receipts) - राजस्व आय अथवा राजस्व प्राप्तियों (Revenue Receipts) के अन्तर्गत उस आय को रखा जाता है जिसका सम्बन्ध उसी वित्त्ाीय वर्ष से होता है। इसे चालू खाता, नाम से भी जाना जाता है। इस खाते में आय के उन स्त्रोतों को शामिल किया जाता है जिनके बदले में कोई भुगतान नहीं करना होता है, जैसे करों द्वारा प्राप्त आय, सार्वजनिक उपक्रमों के द्वारा अर्जित लाभ सरकारी उधारों पर प्राप्त ब्याज तथा गैर-कर आय। राजस्व प्राप्तियों से सरकार की देयताओं में किसी प्रकार से वृद्धि नहीं होती है। राजस्व प्राप्तियों के दो भाग है, कर आगम व गैर-कर आगम।
  2. राजस्व व्यय (Revenue Expenditure) - राजस्व व्यय को दो भागों में बाँटा गया है-(अ) गैर-विकासात्मक व्यय।(ब) विकासात्मक व्यय।
    1. गैर-विकासात्मक व्यय - इसके अन्तर्गत प्रमुख व्यय हैं, जैसे-सरकारी सेवाओं पर होने वाला व्यय। उदाहरण के लिए-प्रतिरक्षा व्यय, प्रशासनिक सेवाओं पर व्यय, आर्थिक सेवाओं पर व्यय तथा सामाजिक तथा सामुदायिक सेवाओं पर व्यय, ब्याज अदायगी, अनुदान व सब्सिडी आदि पर व्यय।
    2. विकासात्मक व्यय - इसके अन्तर्गत प्रमुख व्यय है, जैस-े सामाजिक एवं सामुदायिक सेवाओं पर व्यय, सामान्य आर्थिक सेवाओं पर व्यय, कृषि, उद्योग, खनिज, उवर्रक सब्सिडी, विद्युत, सिचाई, लोक निर्माण, परिवहन तथा राज्यों का सांविधिक अनुदान आदि।

पूँजी बजट 

पूँजीगत बजट के दो भाग है- (i) पूँजीगत व्यय तथा (ii) पूँजीगत प्रार्प्तियाँ। नीचे दोनों की संक्षिप्त व्याख्या दी जा रही है-
  1. पूँजीगत व्यय (Capital Expenditure) - पूँजीगत व्यय तो चालू वर्ष में होते हैं, परन्तु इनका लाभ भविष्य में मिलता है। इसके अन्तर्गत प्रमुख प्रमुख रूप से- अस्पताल के भवनों का निर्माण, डाक्टर तथा नसों की नियुक्ति, दवाएँ, वेतन आदि आते हैं। 
  2. पूँजीगत प्रप्तियाँ - (Capital Receipts) - इसके अन्तर्गत आय के उन समस्त स्त्रोतों को रखा जाता है, जिनका हमें बदले में भुगतान करना आवश्यक होता है। लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि भुगतान उसी वित्त्ाीय वर्ष में न होकर आगामी किसी वित्त्ाीय वर्ष में किये जाते हैं। इसके अन्तर्गत, निबल घरेलू ऋण, निबल विदेशी ऋण, ऋण वापसी, लोक लेखा प्राप्तियाँ आदि आते हैं। 

भारत की राजकोषीय नीति के दोष 

  1. लोचता का अभाव - राजकोषीय नीति का लोचपूर्ण न होना इस बात के लिए कहा जाता है कि हमारे देश की कर प्रणाली को जितना लोचदार होना चाहिए था वह इतनी लोचदार नहीं है। बार-बार कर प्रणाली में सुधार के लिए अनेक समितियों का गठन भी किया गया, परन्तु इनसे भी बहुत बड़ा फायदा नहीं हुआ। भारत सरकार को करों से जितनी आय प्राप्त होनी चाहिए थी वह उसे प्राप्त नहीं हो सकी है। 
  2. अव्यावहारिक कर प्रणाली - भारत की कर प्रणाली परम्परागत है। इसमें परिवर्तन तो किये जाते रहे हैं, परन्तु अभी भी हम इसे वैज्ञानिक स्वरूप नहीं दे पाये हैं। 
  3. घाटे की वित्त व्यवस्था - देश के प्रत्येक बजट मे  घाटे की वित्त व्यवस्था को अपनाया जाता रहा है। इसमें नियन्त्रण का न लगाया जाना वित्त्ाीय कुप्रबन्ध का द्योतक है। लगातार घाटे के बजटों के बनाये जाने के कारण कीमतों में वृद्धि व मुद्रा प्रसार की समस्या बनी हुई है।
  4. बचतों का कम होना - भारत में आज की बचत दर जीडीपी की 23.4 प्रतिशत है जबकि सिंगापुर में 49.9 प्रतिशत, मलेशिया में 4.7 प्रतिशत, व चीन में 39 प्रतिशत है। बचतों के कम होने के कारण पूँजी के निर्माण में भी कमी होती है। हमारे देश की राजकोषीय नीति बचतों को प्रोत्साहित करने में सफल नहीं हो पायी है।
  5. प्रशासनिक व्ययों में वृद्धि - देश मे  प्रशासनिक व्यया ें में भारी वृद्धि होती आयी है। आन्तरिक एवं बाह्म सुरक्षा सम्बन्धी व्यय तो करने ही होते हैं, उन्हें रोका नहीं जा सकता हैं परन्तु प्रशासनिक व्ययों में कुछ व्यय ऐसे हैं जिन्हें हम अपव्यय कह सकते हैं। व्ययों को नियन्त्रित करने के अनेक प्रयत्न किये जाते रहे हैं, परन्तु अपव्ययों को रोका नहीं जा सका है। अनुत्पादक व्ययों का देश की अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है।
  6. विदेशी ऋणों में वृद्धि - सार्वजनिक व्ययों में लगातार वृद्धि और आन्तरिक साधनों में कमी के कारण देश को विदेशी ऋणों पर निर्भर रहना पड़ा है। आज भी देश, विदेशी ऋणों की देनदारी में बुरी तरह से फँस चुका है। प्रतिवर्ष बहुत बड़ी राशि ब्याज के भुगतान में व्यय करनी पड़ती है। अत: राजकोषीय नीति को इसमें भी सफलता नहीं मिली है। उपर्यक्त दोषों के कारण भारत की राजकोषीय नीति अपने उद्देश्यों में सफल नहीं हो पा रही है।

राजकोषीय नीति में सुधार के उपाय 

  1. काले धन के कारण देश में दाहे री अर्थव्यवस्था की लगातार वृद्धि हो रही है। इससे देश को भारी क्षति का सामना करना पड़ रहा है। अत: इसे रोकने के उपाय खोजे जायें। 
  2. प्रत्यक्ष करों की दर में वृद्धि की जाय, साथ ही परोक्ष करों का विस्तार किया जाय। 
  3. गैर-योजनागत व्ययों में कमी की जानी चाहिए। 
  4. सार्वजनिक उपक्रमों की व्यवस्था में सुधार लाया जाय। 
  5. विदेशी ऋणों पर निर्भरता को कम किया जाना चाहिए। 
  6. बढ़ते हुए राजस्व घाटे को कम किया जाय। 
  7. राजकोषीय घाटा उस वर्ष की अनुमानित जीडीपी के 2 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। 
  8. राजकोषीय नीति व मौद्रिक नीति में आपसी तालमले बैठाया जाय।

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