सफेद मूसली की खेती कैसे करें?

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सफेद मूसली को मानव मात्र के लिए प्रकृति द्वारा प्रदत्त अमूल्य उपहार कहा जाए तो शायद अतिश्योक्ति नहीं होगी। अनेकों आयुर्वेदिक एलोपैथिक तथा यूनानी दवाईयों के निर्माण हेतु प्रयुक्त होने वाली इस दिव्य जड़ी-बूटी की विश्वभर में वार्षिक उपलब्धता लगभग 5000 टन है जबकि इसकी माँग लगभग 35000 टन प्रतिवर्ष आँकी गई है। यह औषधीय पौधा प्राकृतिक रूप से हमारे देश के जंगलों में पाया जाता है, परन्तु अंधाधुंध तथा अपरिपक्व विदोहन के कारण अब यह पौधा लुप्त होने की कगार पर है, यही कारण है कि अब इसकी विधिवत् खेती करने की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित हुआ है। इसकी खेती करने की दिशा में किए गए प्रयोग न केवल अत्याधिक सफल रहे हैं, बल्कि व्यावसायिक रूप से इसकी खेती लाभकारी भी है।

सफेद मूसली एक कंदयुक्त पौधा होता है, जिसकी अधिकतम ऊँचाई डेढ़ फीट तक होती है तथा इसकी कंदिल जड़ें (जिन्हें कंद अथवा फिंगर्स कहा जाता है) जमीन में अधिकतम 10 इंच तक नीचे जाती है। भारतवर्ष के विभिन्न भागों में जंगलों में प्राकृतिक रूप में पाया जाने वाला यह पौधा क्लोरोफाइटम बोरिविलिएनम के नाम से जाना जाता है परंतु ‘‘इंडियन मेटीरिया मेडिका’’ में इसका नाम क्लोरोफाइटम अरुंडीनेशियम दर्शाया गया है। गुजराती भाषा सफेद मूसली का पौधा में यह पौधा धेली मूसली के नाम से, उत्तरप्रदेश में खैरुवा के नाम से, मराठी में सुफेद अथवा सुफेता मूसली के नाम से, मलयालम में शेदेवेली के नाम से, तमिल भाषा में तानिरवितांग के नाम से तथा अरबी भाषा में यह शकेक्वेले हिन्दी के नाम से जाना जाता है। उ0 प्र0 एवं मध्यप्रदेश के जंगलों में यह पौधा बरसात के समय अपने आप उग जाता है तथा आदिवासी लोग इसे उखाड़ कर सस्ती दरों पर बाजार में बेच देते हैं। बहुधा यह मूसली ठीक से तैयार नहीं हो पाती (मैच्योर नहीं हो पाती),

सफेद मूसली का पौधा

अत: इसके औषधीय गुणों में भी कमी रहती है। इसके फलस्वरूप बाजार में इसके उचित दाम नहीं मिल पाते तथा यह बाजार में 15 से 150 रुपये प्रति किग्रा0 की दर से बेच दी जाती है जबकि अच्छी गुणवत्ता वाली विधिवत सुखाई हुई मूसली की बाजार में 1500 रु0 प्रति कि.ग्रा. तथा इससे अधिक कीमत भी मिल जाती है।

सफेद मूसली की विभिन्न प्रजातियाँ /किस्में 

मूसली की विभिन्न प्रजातियाँ पाई जाती हैं जैसे-क्लोरोफाइटम बोरिविलिएनम, क्लोराफाइटम ट्यूबरोजम, क्लोरोफाइटम अरुन्डीनेशियम, क्लोरोफाइटम एटेनुएटम, क्लोरोफाइटम ब्रीविस्केपम आदि, परन्तु मध्यप्रदेश के जंगलों में अधिकांशत: उपलब्धता क्लोरोफाइटम बोरिविलिएनम तथा ट्यूबरोज़म की ही है। इन दोनों में मुख्य अंतर यह है कि ट्यूबरोज़म में क्राउन के साथ एक धागा जैसा लगा होता है तथा उसके उपरांत इसकी मोटाई बढ़ती है, जबकि बोरिविलिएनम में कंद के फिंगर की मोटाई ऊपर ज्यादा होती है या तो पूरी फिंगर की मोटाई एक जैसी रहती है अथवा यह नीचे की ओर घटती जाती है। चूँकि ट्यूबरोज़म के संदर्भ में छिलका उतारना कठिन होता है अत: यह खेती के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती अस्तु अधिकांशत: क्लोरोफाइटम बोरिविलिएनम की ही खेती की जाती है।

मूसली के औषधीय उपयोग

 विभिन्न दवाईयों के निर्माण हेतु सफेद मूसली (कार्बोहाइड्रेट - 42 प्रतिशत, प्रोटीन्स - 8 प्रतिशत, फाइबर - 4 प्रतिशत, सैपोनिन्स - 17 प्रतिशत) का उपयोग हमारे देश में बरसों से होता आ रहा है। मूलत: यह एक ऐसी जड़ी-बूटी मानी गई है जिसमें किसी भी प्रकार की तथा किसी भी कारण से आई शारीरिक शिथिलता को दूर करने की क्षमता पाई गई है। यही कारण है कि कोई भी आयुर्वेदिक टॉनिक (जैसे-च्यवनप्राश, शिलाजीत आदि) इसके बिना संपूर्ण नहीं माना जाता। नपुंसकता दूर करने, यौनशक्ति एवं बलवर्धन हेतु इसका उपयोग अधिक हो रहा है। यह इतनी पौष्टिक तथा बलवर्धक होती है कि इसे ‘‘दूसरे शिलाजीत’’ की संज्ञा दी गई है तथा इसे चीन/उत्तरी अमेरिका में पाये जाने वाले पौधे जिन्सेंग जिसका वनस्पतिक नाम ‘‘पेनेक्स’’ है,Phone ........................................ जैसा बलवर्धक माना गया है। विदेशों में इससे कैलॉग जैसे फ्लेक्स बनाए जाने पर भी कार्य चल रहा है जो नाश्ते के रूप में प्रयुक्त किए जा सकेंगें। इसके अतिरिक्त इससे माताओं का दूध बढ़ाने, प्रसवोपरान्त होने वाली बीमारियों तथा शिथिलता को दूर करने तथा मधुमेह आदि जैसे अनेकों रोगों के निवारण हेतु भी दवाईयाँ बनाई जाती हैं। इसी प्रकार ऐसी अनेकों आयुर्वेदिक, एलोपैथिक तथा यूनानी औषधियाँ हैं जो इस जड़ी-बूटी से बनाई जाती हैं तथा जिसके कारण यह एक उच्च मूल्य जड़ी-बूटी बन गई है तथा भारत के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भी इसकी प्रचुर माँग है। वर्तमान में सफेद मूसली का उपयोग करके प्रमुख उत्पाद एवं औषधियां जैसे- शिवोजाइम, सूर्याशक्ति कैप्सूल, सीमेन्टो टेबलेट, मेमोटोन सिरप, मूसली पाक, कामदेव चूर्ण, दिव्य रसायन चूर्ण, केसरी जीवन, जोश शक्ति आदि।

मूसली की खेती की आवश्यकता क्यों ? 

सफेद मूसली विभिन्न औषधियों के निर्माण हेतु प्रयुक्त होने वाली एक अमूल्य जड़ी-बूटी है जिसकी देशीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक माँग है। परन्तु जिस तेजी से यह माँग बढ़ रही है उसकी तुलना में इसके उत्पादन तथा आपूर्ति में बढ़ोत्तरी नहीं हो पाई है। अभी तक इसकी आपूर्ति का एक ही साधन था - जंगलों से इसकी प्राप्ति। परन्तु निरंतर तथा अंधाधुंध दोहन के कारण एक तो उपयुक्त गुणवत्ता वाली मूसली मिल पाना मुश्किल हो गया है, दूसरे इसकी आपूर्ति में भी निरंतर कमी आ रही है जबकि माँग निरंतर बढ़ रही है। एक अनुमान के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मूसली की कुल वार्षिक उपलब्धता 5000 टन है जबकि इसकी वार्षिक माँग 35000 टन है। इस बढ़ती हुई माँग की आपूर्ति तभी संभव है यदि इसकी विधिवत् खेती की जाए। हमारे देश के विभिन्न भागों में मूसली की विधिवत् खेती प्रारंभ हुई है वैज्ञानिक तरीके से मूसली की खेती किसी भी प्रकार की खेती की तुलना में कई गुना ज्यादा लाभकारी है तथा इसकी खेती से औसतन प्रति एकड़ 4 से 5 लाख रुपये तक का शुद्ध लाभ कमाया जा सकता है। इसकी खेती के लिए मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, बिहार, उड़ीसा, हरियाणा, दिल्ली आदि प्रदेशों की जलवायु काफी अनुकूल है।

मूसली की खेती कैसे करें ? 

मूसली मूलत: एक कंदरुपी पौधा है जो कि हमारे देश के जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगता है। स्वभाव से भी यह एक ‘‘हार्डी’’ पौधा है जिसकी विधिवत् खेती काफी सफल है। इसकी खेती से संबंधित किये गए सफल प्रयोगों के आधार पर इसकी खेती के लिए विकसित की गई बायोवेद कृषि तकनीक वर्तमान में काफी लाभदायक सिद्ध हुई है।

सफेद मूसली की खेती

खेती के लिए उपयुक्त भूमि

मूसली मूलत: एक कन्द है जिसकी बढ़ोत्तरी जमीन के अन्दर होती है अत: इसकी खेती के लिए प्रयुक्त की जाने वाली जमीन आर्द्र (नमी) होनी चाहिए। अच्छी जल निकासी वाली रेतीली दोमट मिट्टी जिसमें जीवाश्म की पर्याप्त मात्रा उपस्थित हो, इसकी खेती के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। भूमि ज्यादा गीली भी नहीं होनी चाहिए अन्यथा कन्द की फिंगर्स पतली रह जाएगीं जिससे इसका उत्पादन प्रभावित होगा।

फसल के लिए पानी की आवश्यकता 

मूसली की अच्छी फसल के लिए पानी की काफी आवश्यकता होती है। जून माह में लगाए जाने के कारण जून-जुलाई, अगस्त के महीनों में प्राकृतिक बरसात होने के कारण इन महीनों में कश्ित्राम रूप से सिंचाई करने की आवश्यकता नहीं होती, फिर भी यह ध्यान दिया जाना आवश्यक है कि जब तक फसल उखाड़ न ली जाए तब तक भूमि गीली रहनी चाहिए। अत: बरसात के उपरांत लगभग प्रत्येक 10 दिन के अंतराल पर खेत में पानी देना उपयुक्त होगा। पौधों के पत्ते सूखकर झड़ जाने के उपरांत भी जब तक कंद खेत में हो, हल्की-हल्की सिंचाई प्रत्येक दस दिन में करते रहना चाहिए जिससे भूमिगत कन्दों की विधिवत् बढ़ोत्तरी होती रहे। सिंचाई के लिए यदि खेत में ‘‘िस्प्रंकलर्स’’ लगे हो तो यह सर्वाधिक उपयुक्त होगा परन्तु ऐसा अनिवार्य नहीं है। सिंचाई का माध्यम तो कोई भी प्रयुक्त किया जा सकता है परन्तु सिंचाई नियमित रूप से होते रहना चाहिए। यद्यपि सिंचाई किया जाना आवश्यक है परन्तु खेत में पानी रुकना नहीं चाहिए अन्यथा इससे फसल का उत्पादन प्रभावित होगा। सिंचाई के लिए कुआं, ट्यूबवेल, नहर आदि जो भी संभव हो, माध्यम का उपयोग किया जा सकता है।

मूसली की खेती के प्रमुख लाभ 

अत्याधिक लाभकारी फसल - मात्र 6 से 8 माह में प्रति एकड़ चार से पांच लाख रुपये का शुद्ध लाभ देने वाली और कोई फसल नहीं है। इसकी किसी प्रकार की प्रोसैसिंग करने की आवश्यकता नहीं-कोई मशीन लगाने की जरूरत नहीं। सीधे उखाड़ कर, छील कर तथा सुखा कर बेच सकते हैं। बाजार की समस्या नहीं - व्यापक बाजार उपलब्ध है। मूसली की खेती के लिए बायोवेद कृषि तकनीक विकसित हो चुकी है। बायोवेद शोध संस्थान में मूसली की खेती के लिए प्रशिक्षण उपलब्ध है। अधिक लोगों को रोजगार उपलब्ध हो सकेगा। मौसम के परिवर्तन का फसल पर ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता। यदि प्रारंभिक स्तर पर किसान मंहगा बीज न ले सकें तो कम बीज लेकर इनका विकास स्वयं भी कर सकते है।

खेत की तैयारी

मूसली की फसल के लिए खेत की तैयारी करने के लिए सर्वप्रथम खेत में गहरा हल चला दिया जाता है। यदि खेत में ग्रीन मैन्यूर के लिए पहले से कोई अल्पावधि वाली फसल उगाई गई हो तो उसे काट कर खेत में डाल कर मिला दिया जाता है। तदुपरान्त इस खेत में गोबर की पकी हुई खाद 5 से 10 ट्राली प्रति एकड़ भुरक कर इसे खेत में मिला दिया जाता है। बायोनीमा 15 किग्रा0 एवं बायोधन 1/2 किग्रा0 प्रति एकड़ की दर से डालकर बीज बोना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर 32 किग्रा. यूरिया 24 किग्रा. डी.ए.पी. प्रति एकड़ डालना चाहिए।

वेड्स बनाना 

मूसली की अच्छी फसल के लिए खेत में बेड्स बनाये जाना आवश्यक होता है। इस संदर्भ में 1 से 1.5 फीट चौड़े सामान्य खेत से कम से कम 6 इंच से 1.5 फीट ऊँचे बेड्स बना दिये जाते है। इनके साथ-साथ पानी के उचित निकास हेतु नालियों की पर्याप्त व्यवस्था की जाती है तथा बेड्स के किनारों पर आने-जाने के लिए पर्याप्त जगह छोड़ा जाना आवश्यक होता है। यदि ज्यादा चौड़े बेड्स न बनाने हो तो आलू की तरह के सिंगल बैड्स भी बनाए जा सकते है। हालाँकि इसमें काफी ज्यादा जगह घिरेगी परन्तु मूसली उखाड़ते समय यह ज्यादा सुविधाजनक रहेगा।

मूसली की बिजाई हेतु प्रयुक्त होने वाला बीज अथवा प्लांटिंग मटेरियल 

मूसली की बिजाई इसके घनकंदों अथवा ट्यूबर्स अथवा फिंगर्स से की जाती है। इस संदर्भ में पूर्व की फसल से निकाले गये कंदों/फिंगर्स का उपयोग भी किया जा सकता है अथवा जंगलों से भी इस प्रकार के कंद एकत्रित किये अथवा करवाये जा सकते है। बीज के लिए ट्यूबर्स अथवा फिंगर्स का उपयोग करते हुए यह बात अवश्य ध्यान में रखनी चाहिए कि फिंगर्स के साथ पौधे के डिस्क अथवा क्राउन का कुछ भाग अवश्य साथ में लगा रहे अन्यथा पौधे के उगने में परेशानी आ सकती है। इसके साथ-साथ प्रयुक्त किये जाने वाले ट्यूबर अथवा फिंगर का छिलका भी क्षतिग्रस्त नहीं होना चाहिए। इस प्रकार मान लो एक पौधे में 20 फिंगर्स हैं तो उससे 20 बीज बन सकते हैं, परन्तु डिस्क अथवा क्राउन का कुछ भाग सभी के साथ लगा होना चाहिए। यदि कंद छोटे हो तो पूरे के पूरे पौधे का उपयोग भी बिजाई हेतु किया जा सकता है। ऐसा भी किया जा सकता है कि जब फसल उखाड़ी जाये तो पौधे के जो लम्बे-लम्बे अथवा पूर्ण विकसित फिंगर्स अथवा ट्यूबर्स हों उन्हें तो अलग करके तथा छील करके बिक्री के लिए भिजवा दिया जाये तथा जो फिंगर्स छोटे रह गये हों उन्हें बीज के रूप में प्रयुक्त कर लिया जाये। फिंगर्स तभी तक अलग-अलग किए जा सकते हैं जब तक पौधों में से पत्ते न निकलें अन्यथा इन्हें अलग-अलग करना फायदेमन्द नहीं रहेगा। प्राय: एक ट्यूबर (बीज) का वज़न 0.5 ग्राम से 20 ग्राम तक हो सकता है परन्तु अच्छी फसल की प्राप्ति हेतु ध्यान रखना चाहिए कि प्राय: ट्यूबर 5 ग्राम से 10 ग्राम तक के वजन का हो। अच्छी फसल की प्राप्ति के लिए अच्छी गुणवत्ता तथा प्रामाणिक बीज बायोवेद शोध फार्म या विश्वासपात्र शोध संस्थान अथवा सीमैप, लखनऊ से लेना (कम से कम प्रथम फसल के लिए) अत्यावश्यक होता है।

जंगलों से प्राप्त किये जाने वाले बीज 

मूसली एक उच्च मूल्य उत्पाद है इसलिए इसका बीज भी काफी मंहगा होता है। प्राय: बाजार में इसकी कीमत 300 रु0 से 600 रु0 प्रति कि0ग्रा0 तक ली जाती है। एक एकड़ में लगभग 4 से 6 क्विंटल बीज लगेगा अत: बीज की न्यूनतम लागत लगभग 1.5 लाख रु0 आएगी जिसको खरीदना प्रत्येक किसान के लिए संभव नहीं होगा। इस समस्या का एक हल यह हो सकता है कि पहले वर्ष में किसान जंगलों से मूसली एकत्रित कर लें। प्राय: बरसात के प्रारंभ होते ही मूसली के पौधे उगने लगते हैं जिन्हें बनवासी लोग जंगलों से उखाड़ कर बेचने के लिए बाजारों में लाते हैं। इस प्रकार उनसे ये पौधे खरीद करके इनकी खेतों में ट्रांसप्लांटिंग की जा सकती है। इस प्रकार से जंगल से उखाड़ी हुई मूसली काफी सस्ते दामों (प्राय: 25 रु0 से 100 रु0 प्रति किग्रा0 तक) प्राप्त हो जाती है। इस प्रकार की मूसली को सीधे (पूरे के पूरे पौधे को) खेत में लगा दिया जाता है। क्योंकि यह मूसली अपेक्षाकश्त काफी कमजोर होती है, अत: इसे पूर्णतया विकसित होने में समय लग सकता है। इस प्रकार की लगाई गई मूसली से प्राय: पहले साल फसल नहीं ली जाती अथवा इसकी कीमत काफी कम मिलती है। परन्तु अगले वर्ष में ये अच्छी तरह विकसित हो जाते है तथा अच्छा उत्पादन देने के काबिल हो जाते है। तीसरे वर्ष में तो ये बीज तथा उत्पादन दोनों के लिए तैयार हो जाते है। इस प्रकार जंगल से मूसली के पौधे प्राप्त करके मंहगें बीज की समस्या भी हल की जा सकती है। दूसरा हल यह है कि पहले वर्ष किसान कम मात्रा में मूसली की खेती करें। अपने यहाँ तैयार किये गये बीजों से मूसली की खेती को आगे बढ़ायें। यह सर्वोत्तम तरीका है।

क्या बीजो से भी मूसली की बिजाई की जा सकती है ? 

मूसली के पौधे जब लगभग 2 माह से अधिक अवधि के हो जाते हैं तो उन पर पहले फूल तथा बाद में छोटे-छोटे बीज आते हैं जो पकने पर काले रंग के (प्याज के बीजों जैसे) हो जाते हैं। ये बीज काफी छोटे होते है तथा इनका संग्रहण काफी मुश्किल होता है। प्राय: पौधों पर पोलीथीन की थैलियाँ बाँध कर इनका संग्रहण किया जाता है। यद्यपि बीजो से मूसली के पौधे तैयार करने की दिशा में भी शोध कार्य चल रहे हैं परन्तु अभी इस क्षेत्र में ज्यादा सफलता प्राप्त नहीं हो पाई है। बीजों से पौध तैयार करने में एक परेशानी यह भी देखी गई है कि इसमें पौधा तैयार होने में काफी समय (2 वर्ष तथा इससे अधिक भी) लग जाता है तथा पौधे पर्याप्त हष्ट-पुष्ट भी नहीं हो पाते। अत: अच्छी फसल की प्राप्ति हेतु तथा कम समयावधि की आवश्यकता को देखते हुए सीधे डिस्क अथवा क्राउन युक्त कंदों/फिंगर्स से बिजाई करना ही सर्वश्रेष्ठ पाया गया है।

(अ) प्लांटिंग मेटेरियल की मात्रा: मूसली की बिजाई हेतु 5 से 10 ग्राम वजन की क्राउन युक्त फिंगर्स सर्वाधिक उपयुक्त रहेंगी जिनका 6’’ × 6’’ की दूरी पर रोपण किया जाता है। एक एकड़ के क्षेत्र में अधिकतम 80, 000 बीज (क्राउनयुक्त फिंगर्स) लगेगें जिनमें से कुछ बीज 2 ग्राम के भी हो सकते हैं, कुछ 3 ग्राम के, कुछ 3.5 ग्राम के अथवा कुछ 10 ग्राम के। इस प्रकार एक एकड़ के क्षेत्र हेतु लगभग 4 से 6 क्विंटल प्लांटिंग मेटेरियल की आवश्यकता होगी।

(ब) बिजाई से पूर्व प्लाटिंग मेटेरियल का ट्रीटमेण्ट : लगाये जाने वाले पौधे रोगमुक्त रहें तथा इनके नीचे किसी प्रकार की बीमारी आदि न लगे इसके लिए प्लांटिंग मेटेरियल को लगाने से पूर्व 2 मिनट तक बाबस्टीन के घोल में अथवा एक घंटा गौमूत्र में डुबोकर रखा जाना चाहिए जिससे ये रोगमुक्त हो जाते है।

बिजाई की विधि 

खेत की तैयारी करने के उपरांत 3 से 3.5 फीट चौड़े, जमीन से 1-1) फीट ऊँचे बैड बना लिए जाते है। बरसात प्रारंम्भ होते ही (15 जून से 15 जुलाई के लगभग) इन बैड्स में लकड़ी की सहायता से (जोकि इस कार्य हेतु विशेष रुप से बनाई जा सकती है), कतार से कतार तथा पौधे से पौधा 6 × 6 इंच की दूरी रखते हुए छेद कर लिए जाते हैं। छेद करने के पूर्व यह देखना आवश्यक है कि हाल ही में बारिश हुई हो अथवा उसमें पानी दिया गया हो (जमीन गीली होनी चाहिए)। इस प्रकार एक बैड में छ: कतारें बन जाती है। फिर इस प्रत्येक छेद में हाथ से एक-एक डिस्क युक्त अथवा क्राउन युक्त फिंगर अथवा सम्पूर्ण पौधे का रोपण कर दिया जाता है। यदि फिंगर बहुत छोटी हो तो 2-2 फिंगर्स को मिलाकर भी रोपण किया जा सकता है परन्तु सभी फिंगर्स में क्राउन का कुछ भाग संलग्न रहना चाहिए। यदि बीज बड़ा हो (5 ग्राम से अधिक हो) तो 6 × 6 इंच वाली दूरी को बढ़ाया भी जा सकता है। रोपण करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि फिंगर जमीन में 1 इंच से ज्यादा गहरी न जाये। फिंगर जमीन में सीधी लगाई जानी चाहिए अर्थात् क्राउन वाला भाग ऊपर तथा फिंगर का अंतिम सिरा नीचे। रोपण के उपरान्त इस पर हाथ से ही मिट्टीडाल देनी चाहिए अथवा छेद ऊपर से बंद कर दिया जाना चाहिए। इस प्रक्रिया में प्राय: एक व्यक्ति लकड़ी से आगे-आगे छेद बनाता चलता है तथा दूसरा फिंगर्स का रोपण करता जाता है।

पौधों का उगना तथा बढ़ना 

बिजाई के कुछ दिनों के उपरांत ही पौधा उगने लगता है तथा इसमें पत्ते आने लगते है। इसी बीच फूल तथा बीज आते हैं तथा अक्टूबर-नवम्बर माह में पत्ते अपने आप सूखकर गिर जाते हैं और पौधे के कन्द जमीन के नीचे रह जाते है।

मूसली की फसल से होने वाले उत्पादन की मात्रा 

मूसली की फसल में होने वाले उत्पादन की मात्रा अनेकों कारकों पर आधारित होती है, जिनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण है इसका बीज ऐसा पाया गया है कि छोटे बीजों से (प्राय: 5 ग्राम से कम वजन वाले बीजों से) प्राय: 4-5 गुना बड़ा कन्द तैयार होता है, (अर्थात् इसमें लगने वाली सभी फिंगर्स को मिलाकर कंद का वजन प्रयुक्त किये गए बीज की तुलना में 4-5 गुना बड़ा होगा) जबकि इससे ज्यादा वजन वाले कन्दों प्राय: 3 गुना बड़ा कन्दों से प्राय: 3 गुना बड़ा कन्द तैयार होता है। 2 ग्राम से लेकर 270 ग्राम तक के कन्द पाये जाते है परन्तु एक अच्छी फसल से औसतन 20-25 ग्राम वज़न वाले कन्द प्राप्त होने है। इसी प्रकार एक पौधे में लगने वाले फिंगर्स की संख्या भी 2 से लेकर 65 तक देखी गई है परन्तु औसतन एक पौधे में 10 से 12 फिंगर्स होना पाया गया है। इस प्रकार ऐसा माना जाता है कि डाले गये बीज की तुलना में मूसली का 5 से 10 गुना ज्यादा उत्पादन होगा।

मूसली की फसल में होने वाली प्रमुख बीमारियाँ तथा प्राकृतिक आपदाऐ 

मूसली की फसल में प्राय: कोई विशेष बीमारी नहीं देखी गयी है अत: इसमें किसी प्रकार के कीटनाशकों का उपयोग करने की आवश्यकता नहीं होती। क्योंकि पौधे का कन्द भूमि में रहता है अत: इस फसल पर किन्हीं प्राकृतिक आपदाओं जैसे ओलावृष्टि आदि का प्रभाव भी नहीं हो पाता। फिर भी कोई रोग होने पर बायोपैकुनिल एवं बायोधन का पण्र्ाीय छिड़काव करना चाहिए। यदि पानी के उचित निकास की व्यवस्था न हो तथा पौधे की जड़ों के पास पानी ज्यादा दिन तक खड़ा रहे, तो पैदावार पर प्रभाव पड़ सकता है तथा कन्द पतले हो सकते है। कवक की बीमारी के कारण सड़ सकते हैं इसलिए ट्राइकोडरमा 2 से 3 कि.ग्रा. प्रति एकड़ अथवा बायोनीमा 15 कि.ग्राप्रति एकड़ का भू प्रयोग करना उचित होगा। वैसे यह पौधा किसी प्रकार की बीमारी अथवा प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव से लगभग मुक्त है।

पतली मूसली की फिंगर्स/टूयूबर्स का उत्पादन पर प्रभाव

मूसली की फसल का प्रमुख उत्पाद उसकी फिंगर्स ही है जिन्हें छीलकर तथा सुखाकर सूखी मूसली तैयार की जाती है, अत: ये फिंगर्स मोटी तथा अधिक से अधिक गूदायुक्त होनी चाहिए ताकि छीलने पर ज्यादा मात्रा में गूदायुक्त फिंगर्स प्राप्त हो सकें (फिंगर्स के पतले होने पर ज्यादा गूदा प्राप्त नहीं होगा) प्राय: भूमि के ज्यादा नर्म (पोला) होने पर फिंगर्स जमीन में ज्यादा गहरी चली जाती है तथा पतली रह जाती है। अत: खेत को तैयार करते समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि भूमि ज्यादा नर्म (पोली) न हो, दूसरे यदि खुदाई के उपरांत पौधे में ऐसी फिंगर्स निकलती हैं तो उन्हें उत्पादन के रूप में प्रयुक्त करने के बजाय प्लांटिंग मेटेरियल के रूप में प्रयुक्त कर लिया जाना चाहिए।

जमीन से पौधों/कन्दों को उखाड़ना 

पौधों के पत्ते सूख जाने पर (बिजाई से लगभग 90-95 दिन के उपरांत) ऐसा माना जाता है कि फसल तैयार हो गई है तथा कन्द निकाले जा सकते है, परन्तु ऐसा कदापि नहीं करना चाहिए। पत्तों के सूखकर गिर जाने के उपरांत भी एक-दो महीने तक के लिए कन्दों को जमीन में ही रहने दिया जाना चाहिए तथा पत्तों के सूख जाने के उपरांत प्रारंभ में (कच्चे) कन्दों का रंग सफेदी लिए हुए होता है जो कि धीरे-धीरे भूरा होने लगता है। जमीन में जब कन्द पूर्णतया पक जाते हैं तो इनका रंग गहरा भूरा हो जाता है। अत: जबकंदों का रंग गहरा-भूरा हो जाए तो कुदाली की सहायता से एक-एक करके कन्दों को निकाला जा सकता है। प्राय: कंद निकालने का कार्य मार्च-अप्रैल माह में किया जाता है। कंदों को निकालने का कार्य हाथ से ही (ट्रैक्टर आदि से नहीं) करना चाहिए जिससे सभी कन्द बिना क्राउन से अलग हुए निकाले जा सकें तथा जिन कन्दों का उपयोग बीज बनाने हेतु करना हो, वे बीज के रूप में प्रयुक्त किय जा सकें तथा जिनको तोड़कर, छीलकर तथा सुखाकर सूखी मूसली के रूप में बेचा जाना हो, उन्हें बिक्री हेतु प्रयुक्त किया जा सके।

कंदों को जमीन से उखाड़ने का उपयुक्त समय 

कई बार फसल तैयार हो जाने के उपरांत भी किसान को कन्दों को जमीन से उखाड़ना नहीं चाहिए तथा इन्हें जमीन में ही रहने देना चाहिए। ऐसा कई बार चाह कर भी किया जा सकता है अथवा मजबूरी वश भी हो सकता है (उदाहरणार्थ समय पर श्रमिक न मिलें अथवा किसान के पास समय न हो)। परन्तु इसमें कोई ज्यादा परेशानी की बात नहीं होती क्योंकि बरसात में ये कंद (जो उखाड़े नहीं गए थे) जमीन में पड़े-पड़े गल जायेगें तथा अगली बरसात में इनमें से अपने आप नये पौधे निकल आयेंगे। परन्तु इसमें कमी यह रहती है कि अगला पौधा (पिछले कंद की तुलना में जो जमीन में ही गल गया था) की तुलना में मात्रा 50 से 100 प्रतिशत तक ही बढ़ पाता है। उदाहरणार्थ यदि पहला कंद 10 ग्राम का था तो यह एक साल के उपरांत यह मात्रा 15 से 20 ग्राम तक ही हो पाएगा जबकि यदि इसे उखाड़ कर लगाया जाता है तो इसमें 3 से 4 गुना की बढ़ोत्तरी हो जाती। फिर भी यह तय है कि यदि कंद न भी उखाड़ा जाये तो उसमें कोई हानि नहीं होगी तथा इसमें प्रतिवर्ष अपने आप कुछ न कुछ वृद्धि होती रहेगी। ऐसी वृद्धि प्राय: सात साल तक देखी गई है तथा सात साल के बाद इन कंदों का बढ़ना रुक जाता है।

कंदो की धुलाई 

जमीन से कंद उखाड़ने पर उनके साथ मिट्टी आदि लगी रहती है अत: छीलने से पूर्व उन्हें धोया जाना आवश्यक होता है। इस संदर्भ में उखाड़े हुए कंदों की टोकरियों को पानी के बहाव के नीचे रखकर कंदों की धुलाई की जा सकती है। इसके उपरांत धुले हुए कंदोंकी छिलाई की प्रक्रिया प्रारंभ होती है।

मूसली के कंदों की छिलाई 

जिन कंदों का उपयोग बीज हेतु करना हो, उन्हें छोड़कर शेष मूसली को विपणन हेतु भिजवाने से पूर्व उसके कंदों/ट्यूबर्स/ंिफंगर्स की छिलाई करना अथवा उनका छिलका उतारना अत्यावश्यक होता है ताकि छिलका उतारने पर यह अच्छी तरह से सूख जाए तथा इसे बिक्री हेतु प्रस्तुत किया जा सके। यद्यपि यह कार्य अत्याधिक आसान है तथा अकुशल श्रमिक/बच्चे भी इसे कर सकते है परन्तु यह काफी अधिक श्रमसाध्य है तथा इसमें काफी समय लगता है, क्योंकि मूसली के प्रत्येक कंद/फिंगर को छीलना पड़ता है। वर्तमान में मूसली की छिलाई हेतु प्रचलित प्रमुख विधियाँ निम्नानुसार हैं-

(क) पत्थर से घिसाई : प्राय: परम्परागत रुप से जंगलों से एकत्रित की जाने वाली मूसली का छिलका उतारने हेतु मूसली को पत्थर से घिसा जाता है जिससे उसका छिलका उतर जाता है। परन्तु यह विधि ज्यादा उपयुक्त नहीं है, क्योंकि (1) पत्थर से घिसने पर मूसली में से कई बार छिलके के साथ काफी ज्यादा मात्रा में गूदा निकल जाता है जिससे अनावश्यक हानि होती है, (2) कई बार मूसली के कुछ एक स्थानों पर गूदा साथ ही रह जाता है जिससे उत्पाद की गुणवत्ता प्रभावित होती है, (3) इस प्रकार से छिली हुई मूसली की बाजार में माँग भी प्राय: कम रहती है।

(ख) मूसली को गीला करके उसका छिलका उतारना : प्राय: ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ जंगलों से मूसली एकत्रित की जाती है, कच्ची मूसली को जंगल से उखाड़ने के उपरान्त उनका ढेर लगा दिया जाता है तथा उन पर प्रतिदिन पानी का हल्का-हल्का छिड़काव किया जाता है। कुछ समय के उपरान्त यह मूसली या तो स्वयं ही छिलका छोड़ने लगती है या इसे आसानी से मसल कर छिलका निकाल दिया जाता है। यह विधि विशेष रूप से जंगलोंसे उखाड़ी हुई कच्ची मूसली का छिलका उतारने के लिए उपयोगी हो सकती है। परन्तु इस विधि से पूर्णतया पकी हुई मूसली से छिलका उतारने का सुझाव देना शायद उपयुक्त नहीं होगा।

(ग) चाकू से छिलाई : पत्थर पर घिसाई की बजाए चाकू से मूसली की छिलाई करना ज्यादा सुविधा जनक होता है। इसमें वेस्टेज भी कम होता है तथा इससे उत्पाद भी अच्छी गुणवत्ता का तैयार होता है। यह विधि काफी आसान भी है तथा कोई भी अकुशल मजदूर भी ऐसी छिलाई का कार्य कर सकता है। यहाँ तक कि बच्चे भी यह कार्य कर सकते है। इस प्रकार एक दिन में एक व्यक्ति लगभग 1 किलोग्राम से 5 किग्रा0 तक मूसली छील लेता है। नि:संदेह छिलाई का कार्य काफी श्रमसाध्य कार्य है परन्तु यह कार्य हाथ से ही किया जाता है तथा इसका अभी कोई विकल्प उपलब्ध नहीं हो पाया है। यद्यपि इस संदर्भ में किन्हीं रसायनों के प्रयोग पर शोध चल रहा है जिनमें मूसली को भिगोने पर इसका छिलका स्वत: ही निकल सके परन्तु ऐसा अभी व्यवहारिक नहीं हो सका है। इस प्रकार के रसायनों के उपयोग से मूसली के औषधीय गुण भी प्रभावित होना संभावित हैं अत: इस दिशा में अभी विशेष प्रगति नहीं हो पाई है तथा अच्छी गुणवत्ता की सूखी मूसली प्राप्त करने हेतु अभी तक हाथ से छिलाई करना ही सर्वश्रेष्ठ विधि मानी जा रही है। इसकी छिलाई हेतु मशीन बनाने की दिशा में भी कार्य चल रहा है परन्तु अभी तक इस संदर्भ में कोई सफलता नहीं मिल पाई है।

छिली हुई मूसली को सुखाना 

छीलने के उपरांत छिली हुई मूसली को सुखाया जाता है ताकि उसमें उपस्थित नमी पूर्णतया सूख जाए। ऐसा प्राय: छिली हुई मूसली को धूप में डालकर किया जाता है। प्राय: दो-तीन दिन तक खुली धूप में रखने से मूसली में उपस्थित नमी पूर्णतया सूख जाती है।

मूसली की पैकिंग 

सूखी हुई मूसली को विपणन हेतु प्रस्तुत करने से पूर्व उसकी विधिवत् पैकिंग की जाती है। यह पैकिंग प्राय: पॉलीथीन की थैलियों में की जाती है ताकि यह सुरक्षित रह सके तथा इस पर किसी प्रकार से नमी आदि का प्रभाव न पड़े।

जमीन से उखाड़ने से लेकर सुखाने तक में मूसली के वजन में कमी 

जमीन से उखाड़ने के उपरांत मूसली की छिलाई करने तथा उसे सुखाने की प्रक्रिया में मूसली के वजन में अंतर होना स्वभाविक है परन्तु सूखने के उपरान्त बचने की मात्रा मूसली के फिंगर्स की मोटाई (मांसलता) पर ज्यादा निर्भर करती है क्योंकि कुछ फिंगर्स ज्यादा मोटी होती है जबकि अन्य पतली होती है। यदि फिंगर्स ज्यादा मोटी होगी तो छिलाई के उपरांत अंतत: सूखने पर इनका वजन उन फिंगर्स की अपेक्षा अधिक रहेगा जो पतली फिंगर्स को छीलने तथा सुखाने के उपरांत प्राप्त होगी। वैसे इसे छीलने तथा सुखाने की प्रक्रिया में ताजी मूसली (खेत से उखाड़ी हुई मूसली) का लगभग 20 से 25 प्रतिशत तक सूखी मूसली के रूप में प्राप्त होता है।

आगामी फसल हेतु मूसली के बीज का संग्रहण कैसे किया जाए ?

मूसली के कंदों की खुदाई के उपरांत कंदों के साथ लगी हुई बड़ी फिंगर्स को तोड़कर, छीलकर तथा सुखाकर बिक्रय किया जा सकता है जबकि शेष बची हुई क्राउन सहित फिंगर्स, जो प्राय: आकार में छोटी होती है, का उपयोग बीज के रूप में किया जा सकता है। क्योंकि ये कंद मार्च-अप्रैल माह में निकाले जाते हैं तथा इन्हें मई-जून तक सुरक्षित रखा जाना आवश्यक होता है (क्योंकि इनकी बिजाई मई-जून में ही होगी) अत: तब तक के लिए इनका भण्डारण सावधानीपूर्ण करना आवश्यक होता है। इन कंदों को कोल्ड स्टोरेज में रखना भी ज्यादा उपयुक्त नहीं पाया गया है क्योंकि इससे पौधों का उगाव प्रभावित होता है। यद्यपि यदि बीजों के संग्रहण के लिए एक विशेष चैम्बर बनाया जा सके जिसमें 70 से 80 अंश तक आदर््रता स्थिर की जा सके तो यह सर्वश्रेष्ठ होगा परन्तु सभी किसानों के लिए ऐसा मँहगा चैम्बर बना पाना संभव नहीं हो पाता। अत: कम लागत में इस प्रकार की व्यवस्था स्थापित किये जाने की दिशा में शोध कार्य चल रहे है। वैसे इन कंदों को एक छाया वाले स्थान में एक गढ्डे में रखकर ऊपर से मिट्टी डालकर सुरक्षित रखे जाने हेतु प्रयोग किया जा सकता है।

सागौन, पापुलर अथवा पपीते के साथ अंर्तवर्तीय फसल के रूप में मूसली की खेती 

यद्यपि मूसली अपने आप में इतनी अधिक लाभकारी फसल है कि इसकी खेती मुख्य फसल के रूप में ही की जानी चाहिए परन्तु अंर्तवर्तीय फसल के रूप में भी इसकी खेती काफी सफलतापूर्वक की जा सकती है। अभी कई कृषकों द्वारा सागौन के बीचों-बीच मूसली की खेती करके प्रारंभिक वर्ष में ही (बिना कोई विशेष खर्च किये) लाभ कमाया जा सकता है। पपीते के साथ भी अंर्तवर्तीय फसल के रूप में मूसली की खेती की जा सकती है। इस संदर्भ में विशेषज्ञों का विचार है कि टीक के बीचों-बीच 1. 5 फीट के दायरे में मूसली के 11 पौधे रोपित कर दिये जायें तथा इन पर मिट्टी चढ़ा कर इन्हें 18 महीने तक पड़ा रहने दिया जाए (प्रथम वर्ष में न निकाला जाए)। यदि ड्रिप अथवा िस्प्रंकलर्स से इनकी सिंचाई व्यवस्था हो सके तो यह और भी ज्यादा लाभकारी होगा। ऐसी जगह में से घास आदि निकालने की भी आवश्यकता नहीं होगी। इस प्रकार 18 महीने के उपरांत बिना किसी अतिरिक्त खर्च के मूसली के पौधों में स्वत: ही 4 से 5 गुना बढ़ोत्तरी हो जाएगी। इस प्रकार टीक, नींबू, पपीता, पोपुलर आदि के साथ अंतवर्तीय फसल के रूप में मूसली की खेती करना व्यवसायिक रूप से काफी लाभकारी हो सकता है।

मूसली का उत्पादन तथा इसकी खेती से अनुमानित लाभ 

प्राय: एक एकड़ क्षेत्र में मूसली के लगभग 80,000 पौधे लगाए जाते है। यदि इनमें से 70,000 अच्छे पौधे भी अंत में बचते हैं जिनमें एक पौधे का औसतन वजन 30 ग्राम होता है तो किसान को लगभग 2100 किलोग्राम मूसली प्राप्त होगी जो कि छीलने तथा सूखने के उपरांत लगभग 4 क्विंटल रह जाएगी (सूखने पर मूसली का वजन 20 से 25 प्रतिशत रह जाता है)। इसके अतिरिक्त इसमें एक एकड़ की बिजाई हेतु प्लांटिंग मेटेरियल भी बच जाएगा। वैसे जो लोग मूसली की वास्तविक रूप से खेती कर रहे है वं प्रति एकड़ औसतन 3 से 5 क्विंटल सूखी मूसली की पैदावार होना बताते हैं जबकि विशेषज्ञों का विचार है कि यदि मूसली की फसल वैज्ञानिक ढंग से सही रूप से ली जाए तो इससे प्रति एकड़ 16 क्ंिवटल तक सूखी मूसली प्राप्त हो सकती है। यदि वर्तमान बाजार मूल्य (जो कि 1000 रुपये से 1700 रुपये प्रति किलोग्राम तक है), के अनुसार देखा जाए तो प्राप्त 4 क्ंिवटल सूखी मूसली से औसतन 5 लाख रुपये की प्राप्तियाँ होगी। मूसली को छीलने के उपरान्त इसकी गुणवत्ता के अनुसार ग्रेडिंग की जाती है जिसमें

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