अधीनस्थ न्यायालय किसे कहते हैं?

अधीनस्थ न्यायालय किसे कहते हैं?

उच्च न्यायालय के अंतर्गत एक प्रकार की क्रमबद्धता है। इसे संविधान में भी दर्शाया गया है जिन्हें हम अधीनस्थ न्यायालय कहते हैं। क्योंकि ये न्यायालय राज्य सरकार के कानूनों द्वारा बनाये गये है इसलिए इनका नाम एवं पद अलग-अलग राज्य में अलग-अलग है। लेकिन, इनके मूल ढाँचे में एकरूपता होती है।

राज्य जिलों में विभाजित होता है। प्रत्येक जिले में एक जिला न्यायालय होता है। इन जिला न्यायालयों के अधीन लघु न्यायालय होते हैं जैसे, अतिरिक्त जिला न्यायालय, उप-न्यायालय, मुन्सिफ मजिस्टेट्र न्यायालय, विशेष न्यायिक मजिस्ट्रटे , इत्यादि। सबसे निचले स्तर पर पंचायत न्यायालय होते हैं। जिला न्यायालय का प्रमुख कार्य है अधीनस्थ न्यायालयों की अपील को सुनना। हालांकि न्यायालय प्रारंभिक मामलों में स्वयं संज्ञान ले सकता है जैसे, भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, संरक्षक अधिनियम, तथा भूमि अधिग्रहण अधिनियम इत्यादि। संविधान अधीनस्थ न्यायालयों की स्वतंत्रता को भी सुनिश्चित करता है। 

जिला न्यायालयों के जजों की नियुक्ति राज्यपाल करता है उच्च न्यायालय की सलाह पर। ऐसे जज के पास सात वर्षों का वकालत का अनुभव होना चाहिए या फिर उसे उच्च किसी भारतीय न्यायालय में सेवा प्रदान करने का अनुभव होना चाहिए। जिला न्यायालय के अलावा अन्य न्यायालय में नियुक्ति के लिए राज्यपाल उच्च न्यायालय या राज्य लोक सेवा आयोग से सलाह लेता है। उच्च न्यायालय इन जिला न्यायालयों पर नियंत्रण रखता है विशेषकर पद-स्थापन, पदोन्नति, छुट्टियाँ प्रदान करना इन मामलों में या राज्य न्यायिक सेवाओं से संबंधित मामलों में उच्च न्यायालय नियंत्रण रखता है।

भारत के प्रत्येक जिले में उच्च न्यायालय के नीचे अधीनस्थ या निम्नस्तरीय न्यायालय है। अधीनस्थ न्यायालय तीन श्रेणियों के होते है। 
  1. दीवानी न्यायालय 
  2. फौजदारी न्यायालय 
  3. राजस्व न्यायालय 
इनमें क्रमश: दीवानी आपराधिक एवं राजस्व संबंधी मामलो की सुनवाई होती है।

दीवानी न्यायालय 

दीवानी न्यायालय माल संबंधी मुकदमों की सुनवाई करते है और उन पर अपना निर्णय देते है। दीवानी न्यायालयों की  श्रेणियाँ होती है।
  1. जिला न्यायाधीश- यह दीवानी विवादो का सबसे बडा न्यायालय है। यह प्रारंभिक व अपीलीय दोनो अभियोगो के मुकदमे सुनता है। 
  2. अतिरिक्त, संयुक्त जिला न्यायाधीश- ज़िला न्यायाधीश का सहायक होता है।
  3. दीवानी न्यायाधीश- 5000 से 20000 तक के मुकदमे सुनने का अधिकार है। 
  4. मुंसिफ मजिस्ट्रेट- 2000 से 5000 तक के मुकदमे सुनने का अधिकार है। 
  5. लघुवाद या खलीफा नयायालय- 3000 तीन हजार रूपये तक के मुक्दमें सुनता है। 
  6. न्याय पंचायत- ये दीवानी मुक्दमें सुनती है, इन्हे पाँच सौ रूपये तक के मुक्दमें सुनने का अधिकार है। 

फौजदारी न्यायालय 

फौजदारी न्यायालय मारपीट, चोरी- डकैती, लडाई झगडे, जालसाजी और कत्ल आदि से संबधित मुकदमों को सुनते है। फौजदारी न्यायालय की श्रेणियाँ  होती है।
  1. सत्र न्यायाधीश- जिला स्तर पर फौजदारी से संबंधित विवादों का सबसे बड़ा न्यायालय होता है।
  2. अतिरिक्त, संयुक्त या सहायक सत्र न्यायाधीश- सत्र न्यायाधीश की सहायता के लिये ये न्याायाधीश नियुक्त किये जाते है। इन्हे 12 वर्ष तक की सजा देने का अधिकार है।
  3. मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी- इनका कार्य फौजदारी से संबंधित मुकदमा सुनना तथा ये 7 वर्ष तक कारावास, 5000 रूपये का आर्थिक दंड दे सकते है। 
  4. दण्डाधिकारी प्रथम श्रेणी- ये 3 वर्ष का कारावास तथा 5000 रूपये तक का आर्थिक दंड दे सकते है। 
  5. दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी- इन्हे अपीलीय अधिकार प्राप्त नही होते। ये 1 वर्ष तक का कारावास तथा 1000 रूपये तक का आर्थिक दण्ड दे सकते है। 
  6. न्याय पंचायत- इन्हे 250 रूपये तक का जुर्माना करने का अधिकार होता है किन्तु कारावास का दण्ड देने का अधिकार नहीं होता है। 

राजस्व न्यायालय 

राजस्व न्यायालय मालगुजारी, भूमि, उत्तराधिकार से संबंधित मुकदमो को सुनते है। राजस्व न्यायालयो की श्रेणियाँ  होती है।
  1. राजस्व परिषद- राजस्व सबंधीं विवादों की सुनवाई का सबसे बडा न्यायालय होता है।
  2. आयुक्त- माल गुजारी से संबंधित कार्यो के लिये प्रत्येक राज्य को मण्डलो में बाटँ दिया जाता है। पत््रयेक मण्डल का सबसे बड़ा अधिकारी मण्डल आयुक्त होता है।
  3. जिलाधीश- मालगुजारी वसूल करने और शांति व्यवस्था बनाये रखने के लिये प्रत्येक जिले में एक जिलाधीश होता है। 
  4. अतिरिक्त जिलाधीश- जिलाधीश के कार्यों में सहायता देने के लिये इनकी नियुक्तियाँ की जाती है।
  5. परगनाधीश- परगनाधीश, जिलाधीश के अधीन होते है। 
  6. तहसीलदार- मालगुजारी वसूल करने के अतिरिक्त राजस्व संबध्ं ाी विवादों की प्रारंभिक सुनवाई करके निर्णय देना। तहसीलदार की सहायता के लिये नायब तहसीलदार होते है। नायब तहसीलदार के नीचे कानून गो तथा पटवारी या लेखापाल होते है जो तहसील के कार्यों में सहायता करते है। 

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