अपक्षय किसे कहते हैं?

By Bandey 2 comments
अनुक्रम
अपक्षय एक स्थानीय प्रक्रिया हैं, इसमें शैलो का विघटन और अपघटन मूल स्थान
पर ही होता है विघटन तापमान में परिवर्तन और पाले के प्रभाव से होता हैं। इस प्रक्रिया
में शैल टुकड़ों में बिखर जाते हैं अपघटन की प्रक्रिया में शैलों के अन्दर रासायनिक
परिवर्तन होते है शैलों में विभिन्न प्रकार के खनिज कण एक दूसरे से दृढ़ता के साथ जुडें
रहते हैं, लेकिन पानी के साथ मिलकर कुछ खनिज कण अलग हो जाते है कुछ खनिजों
का स्वरूप बदल जाता है प्रकृति में विघटन और अपघटन की प्रक्रियाएॅ साथ-साथ चलती
रहती है अपक्षय की क्रिया जीव जन्तुओं का बिल बनाना भी शामिल हैं। यह बात सदैव
याद रखना है कि अपक्षय किया में पदार्थ अपनें मूल स्थान पर ही पड़े रहते हैं।

अपक्षय के प्रकार

भौतिक अथवा यांत्रिक अपक्षय 

भौतिक अपक्षय में शैल बिना किसी रासायनिक परिवर्तन के छोटे
छोटें टुकडो में टूट जाती है।भौतिक अपक्षय विभिन्न क्षेत्रों में अलग अलग
ढंग से होती है इनके उदाहरण निम्न है।

  1. पिडं विच्छेदन –
    सभी जानते है गर्मी पाकर शैल फैलती है तथा ठंड पाकर सिकुडती
    है मरूस्थलीय प्रदेश में दिन में तापमान अधिक व रात में कम हो जाने के
    कारण शैलों में दरारे पड़ जाती है और जोड़ चौड़े हो जाते है और शैल
    छोटें छोटे टुकडों में टूट जाती है इस प्रक्रिया को पिंड विच्छेदन कहते हैं।
  2. अपशल्कन :-
    शैल समान्यत: ताप की कुचालक होती है अधिक गर्मी के कारण
    शैल की बाहरी पर्त फैलती है किन्तु भीतरी पर्त के बराबर फैलने व
    सिकुड़ने के फलस्वरूप उपरी पर्त प्याज के छिलकों की तरह उतरती चली
    जाती है इसे अपशल्कन की प्रक्रिया कहते है इसके उदाहरण हमें बिहार
    में सिंहभूम व जबलपुर के पास मदनमहल की पहाडियों के ड़ोलेराइट व
    ग्रेनाइट के गुबंद अपशल्कन के अच्छे उदाहरण हैं , 
  3. तुषारी अपक्षय :-
    ठंडे पर्वतीय प्रदेंशो मे शैलो की दरारों और जोडों में भरा जल बार
    बार जमता व पिघलता है इससे शैल टुकड़े टुकड़े हो जाती है ऐसा तुषारी अपक्षय
    तुषारी अपक्षय
    संधियों में जलभरना
    तापमान का O0C
    गिरना
    जल जमने से दरारों
    का चौड़ा होना
    इसलिए होता हैं। कि जब पानी बर्फ रूप में जम जाता है तो उसका आयतन
    दस प्रतिशत बढ़ जाता हैं, ठंडे प्रदेशो में इस प्रक्रिया के द्वारा शैल छोटे छाटे
    टुकडो और कणो में बिखर जाती है इसे तुषारी अपक्षय कहते हैं। 

रासायनिक अपक्षय – 

रासायनिक कियाओं द्वारा नयें यौगिकों के बनने या नए तत्वो के निर्माण के
कारण शैलों में होने वाले परिवर्तन को रासायनिक अपक्षय कहते है जल,
आक्सीजन और कार्बन डाइआक्साइड रासानिक अपक्षय के प्रमुख कारक है
रासायनिक अपक्षय उन स्थानों में अधिक मात्रा मे होते है जहाँ पर तापमान व
आदर््रता उच्च होती है, रासानिक अपक्षय में मुख्य रूप से चार प्रक्रियाएँ होती हैं।

  1. ऑक्सीकरण :-
    ऑक्सीकरण की किया में शैल वायुमंडल की आक्सीजन से किया
    करके आक्साइड बनाती है यह आक्सीकरण की किया लोह खनिज पर
    आसानी से देखी जा सकती है आदर््र वायु में विद्यमान आक्सीजन शैलों के
    लोह कणों को सबसे अधिक प्रभावित करती है। इससे लोहे के पीले या
    लाल आक्साइड बन जाते है इसे लोहे पर जंग लगना कहते है यह जंग
    भविष्य में शैलो को पूरी तरह से अपघटित कर देती है। 
  2. कार्बनीकरण :-
    जल में वाायुमंडल की कार्बन डाइआक्साइड की मात्रा घुली रहती
    है ऐसे जल के साथ चूनायुक्त चट्नों में रासायनिक क्रिया अधिक मात्रा में
    होती हैं क्योकि कार्बन डाइआक्साइड में चूना आसानी से घुल जाता है
    और पानी के साथ बह जाता है, यूगोस्लाविया के चूने के क्षेत्र में इसी
    क्रिया द्वारा चूनें की गुफाओं का निर्माण हुआ है। 
  3. जलयोजन :-
    इस क्रिया में शैलों के खनिजों में जल अवशेषित हो जाता है जल
    के अवशोषण से शैलों का आयतन बढ जाता है। तथा उनके कणों की
    आकृति बदल जाती है। उदाहरण के लिए जलयोजन के द्वारा फेलस्पार
    नाम के खनिज केओलिन मृदा में बदल जाते हैं। 
  4. घोलन :-
    इस क्रिया में कुछ खनिज जल में घुल जाते है और वे पानी में
    घुलकर बह जाते है जैसे सेंधा नमक और जिप्सम इसी प्रक्रिया द्वारा बहा
    लिया जाता है। 

जैविक अपक्षय 

यह अपक्षय जीव जन्तुओं और वनस्पत्ति द्वारा पूर्ण होता है।
  1. वनस्पत्ति :-
    पेड पौधों के द्वारा शैलो में भौतिक व रासायनिक दोनो प्रकार के
    अपक्षय होते है पेंड़ पौधों की जडे शैलों के बीच अन्दर तक प्रवेश कर
    उनके जड़ों तक पहुॅंच जाती है तथा वहॉं पर इन पौधों की जडे समय के
    साथ लम्बी व मोटी होती हैं। व शैलों को छोटे छोटे टुकडों मे तोड़ने
    लगती है। शैलों के जोडां़े में निस्तर दबाव बढने से वे टूटकर छोटे छोटे
    टुकडो में बिखर जाती हैं। 
  2. जीव जन्तु :-
    जीव जन्तु जैसे चूहें खरगोश केंचुआ दीमक चीटियां आदि भी शैलों
    को तोड़ते फोड़ते है। विघटित शैल आसानी से अपरदित हो जाती हैें। और
    पवनें इन्हे उड़ाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती हैं। जानवरों के
    खुरों से मििट्यॉ उखड़ जाती हैं इसे मृदा अपरदन मे तेजी आ जाती हैं
    केंचुए व दीमक का कार्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। विद्वानों के अनुमान
    के अनुसार एक एकड़ में करीब डेढ़ लाख केचुऐं हो सकते है ये कंचुऐं एक
    वर्ष में 10-15 टन शैलो को उपजाऊ मृदा मे बदलने की शक्ति रखते हैं। 
  3. मनुष्य :-
    मानव का विभिन्न प्रकार को शैलो के अपक्षय में बहुत बडा हाथ
    होता है सड़क कृषि व भवन निर्माण जैसी क्रियाओं में मानव के द्वारा काफी
    तोड़ फोड़ होता हैं मानव के द्वारा जो खनन की क्रियाये होती है उनके
    फलस्वरूप शैले कमजोर होकर ढीली पड जाती हैं और अन्त में टूट जाती हैं।

2 Comments

Unknown

Jul 7, 2019, 9:16 am Reply

Tnx

Unknown

Feb 2, 2019, 12:20 pm Reply

Apkshyan ki shakti btaiye

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