अपक्षय किसे कहते हैं?

अपक्षय किसे कहते हैं?

अपक्षय एक स्थानीय प्रक्रिया हैं, इसमें शैलो का विघटन और अपघटन मूल स्थान पर ही होता है विघटन तापमान में परिवर्तन और पाले के प्रभाव से होता हैं। इस प्रक्रिया में शैल टुकड़ों में बिखर जाते हैं अपघटन की प्रक्रिया में शैलों के अन्दर रासायनिक परिवर्तन होते है शैलों में विभिन्न प्रकार के खनिज कण एक दूसरे से दृढ़ता के साथ जुडें रहते हैं, लेकिन पानी के साथ मिलकर कुछ खनिज कण अलग हो जाते है कुछ खनिजों का स्वरूप बदल जाता है प्रकृति में विघटन और अपघटन की प्रक्रियाएं साथ-साथ चलती रहती है अपक्षय की क्रिया जीव जन्तुओं का बिल बनाना भी शामिल हैं। यह बात सदैव याद रखना है कि अपक्षय किया में पदार्थ अपनें मूल स्थान पर ही पड़े रहते हैं। 

अपक्षय के प्रकार

  1. भौतिक अपक्षय 
  2. रासायनिक अपक्षय 
  3. जैविक अपक्षय 

भौतिक अपक्षय 

भौतिक अपक्षय के कारण चट्टाने छोट-े छोटे टुकड़ो में टूट जाती हे जिनके लिये गुरूत्वाकर्षण बल, तापक्रम में परिवतर्न , शुष्क एवं आर्द्र परिस्थितियों का अदल-बदल कर आना जैसे कारक जिम्मेदार है। ये निम्न प्रकार से होता है।
  1. भार विहीनीकरण
  2. ;तापक्रम में परिवर्तन
  3. ;हिमकरण एवं तुषार वेजिंग
  4. ;लवण अपक्षय
  5. जैविक अपक्षय

रासायनिक अपक्षय - 

रसायनिक अपक्षय को एक उदाहरणों से समझा जा सकता है। नमक की एक डली को आर्द्र स्थान पर रखने से वह गल कर खत्म हो जाती है। लोहे को खुलें व आर्द्र स्थान पर रखने से उसमें जगं लग जाता है। और धीरे -धीरे नष्ट होकर मिट्टी में मिल जाता है। नमक का गलना एवं लोहे में जंग लगना रासायनिक क्रियायें हे यही प्रक्रिया चट्टानों के साथ होती हे तो इसे रसायनिक अपक्षय कहते है। रासानिक अपक्षय में मुख्य रूप से चार प्रक्रियाएँ होती हैं।
  1. विलयन :- चट्टानों में मौजूद कई प्रकार के खनिज जल में घुल जाते है जैसे नाइट्रटे सल्पफेट एवं पौटेशियम। इस तरह अध्कि वर्षा की जलवायु में ऐसे खनिजों से युक्त शैले अपक्षयित हो जाती है।
  2. काबोर्नेशन :- वर्षा के जल में घुली कार्बन डाइऑक्साइड से काबोनिक अम्ल का निर्माण होता है यह अम्ल चूना युक्त चट्टानों का घुला देता है।
  3. जलयोजन :-कुछ चट्टानें जैसे कैल्शियम सल्पफेट जल को सोख लेती है और फैल कर कमजोर हो जाती हे और बाद में टूट जाती है।
  4. आक्सीकरण :- लोहे पर जंग लगना आक्सीकरण का अच्छा उदाहरण है। चट्टानों के आक्सीजन गैस के सम्पर्क में आने से यह प्रक्रिया होती है। यह प्रक्रिया वायुमंडल एवं आक्सीजन युक्त जल के मिलने से होती है।

जैविक अपक्षय 

यह अपक्षय जीव जन्तुओं और वनस्पत्ति द्वारा पूर्ण होता है।
  1. वनस्पत्ति :- पेड पौधों के द्वारा शैलो में भौतिक व रासायनिक दोनो प्रकार के अपक्षय होते है पेंड़ पौधों की जडे शैलों के बीच अन्दर तक प्रवेश कर उनके जड़ों तक पहुॅंच जाती है तथा वहॉं पर इन पौधों की जडे समय के साथ लम्बी व मोटी होती हैं। व शैलों को छोटे छोटे टुकडों मे तोड़ने लगती है। शैलों के जोडां़े में निस्तर दबाव बढने से वे टूटकर छोटे छोटे टुकडो में बिखर जाती हैं। 
  2. जीव जन्तु :- जीव जन्तु जैसे चूहें खरगोश केंचुआ दीमक चीटियां आदि भी शैलों को तोड़ते फोड़ते है। विघटित शैल आसानी से अपरदित हो जाती हैें। और पवनें इन्हे उड़ाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती हैं। जानवरों के खुरों से मििट्यॉ उखड़ जाती हैं इसे मृदा अपरदन मे तेजी आ जाती हैं केंचुए व दीमक का कार्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। विद्वानों के अनुमान के अनुसार एक एकड़ में करीब डेढ़ लाख केचुऐं हो सकते है ये कंचुऐं एक वर्ष में 10-15 टन शैलो को उपजाऊ मृदा मे बदलने की शक्ति रखते हैं। 
  3. मनुष्य :- मानव का विभिन्न प्रकार को शैलो के अपक्षय में बहुत बडा हाथ होता है सड़क कृषि व भवन निर्माण जैसी क्रियाओं में मानव के द्वारा काफी तोड़ फोड़ होता हैं मानव के द्वारा जो खनन की क्रियाये होती है उनके फलस्वरूप शैले कमजोर होकर ढीली पड जाती हैं और अन्त में टूट जाती हैं।

अपक्षय प्रक्रिया का महत्व

चट्टाने छोटे टुकड़ो में बंटकर मृदा निर्माण में सहायक होती है। अपक्षय चट्टानों में मूल्यवान खनिजों जैसे लोहा, मैगंनीज, तांबा आदि के सकेंन्द्रण में सहायक हे क्योकिं अपक्षय के कारण अन्य पदार्थो का निक्षालन हो जाता है और वे स्थानान्तरित हो जाते है एवं खनित एक जगह इकट्ठे हो जाते है।

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