कोशिका किसे कहते हैं इसकी खोज किसने और कब की?

सभी जीवधारयिों का शरीर एक विशेष प्रकार के द्रव्य से बना होता है जिसे जीवद्रव्य (Protoplasm) कहा जाता है। जीवधारियों में यह जीवद्रव्य बहुत छोटी-छोटी इकाइयों में संगठित होता है। इन इकाइयों (Units) को कोशिकाएं कहा जाता है।

कोशिकाओं की तुलना किसी दीवार के निर्माण में प्रयोग की जाने वाली ईंटों से की जा सकती है जो दीवार के मूल खंड (Basic Structure) के रूप में कार्य करती हैं। कोशिकायें भी सजीवों की संरचना में दीवार की ईंटों अथवा तत्व के परमाणुओं की भांति कार्य करती हैं। कोशिकाओं में आकृति और आकार की दृष्टि से बहुत असमानता देखने को मिलती है। कुछ कोशिकायें इतनी छोटी होती हैं कि उन्हें नंगी आंखों से सूक्ष्मदर्शी की सहायता के बिना नहीं देखा जा सकता जबकि कुछ कोशिकायें इतनी बड़ी होती हैं कि उन्हें सरलतापूर्वक नंगी आंखों से देखा जा सकता है। विषाणु अथवा PPLO (Pleuro Pneumonia) जैसे जीव सबसे छोटी कोशिका का उदाहरण हैं और शतुरमुर्ग का अण्डा (Ostrich Egg) सबसे बड़ी कोशिका का उदाहरण है। एक कोषीय जीव जैसे क्लैमाइडोमोनास (Chlamydomonas) यीस्ट (Yeast) अमीबा, पैरामीशियम, युग्लीन! (Amoeba, Paramecium, Euglena) आदि के शरीरों में केवल एक ही कोशिका पाई जाती है। ये जीव अपने जीवन-सम्बन्धी सभी कार्यों जैसे - गति, प्रजनन, पोषण, उत्सर्जन आदि को एक ही कोशिका के माध्यम से पूरा करते हैं। बहुकोषी जीवों के शरीर में बहुत सी कोशिकायें होती हैं। इन कोशिकाओं में कार्यों का विभाजन होता है अर्थात् अलग-अलग कार्यों को करने के लिए अलग-अलग कोशिकायें होती हैं। कोशिका चाहे एककोषी जीव की हो अथवा बहुकोषी जीव की, उनकी आधारभूत संरचना समान होती है और वे सजीवों के जीवन जिससे वे जीवन सम्बन्धी विभिन्न क्रिया-कलापों को करते हैं का प्रतिनिधित्व करती हैं इसीलिए कोशिका को जीवन का सबसे छोटी संरचनात्मक एवं कार्यात्मक इकाई कहा जाता है।

कोशिका की खोज

कोशिका शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 1665 ई. में राॅबर्ट हुक नामक एक अंग्रेज वैज्ञानिक ने किया था सबसे छोटी कोशिका माइकोप्लाज्मा गैलोसेप्टिकम नामक जीवाणु की होती है । इसकी माप 0.1 माइक्रोमीटर तक पायी गई है । सबसे बडी कोशिका शुतुरमुर्ग का अण्डा है । इसकी माप 170X135 मिलीमीटर तक होती है । मानव शरीर में लगभग 5000 अरब कोशिकाएं होती है । कुछ प्राणी जैसे प्रोटोजोआ, बैक्टीरिया व कुछ शैवाल एक ही कोशिका के बने होते हैं जबकि कवक, पौधे और जंतु अनेक कोशिकाओं से मिलकर बने होते हैं। 

एन्टानॅ वानॅ ल्यूवेनहाके द्वारा सूक्ष्मदशीर् का आविष्कार कर लिए जाने के बाद, रॉबर्ट हुक ने सन् 1665 में कार्क के एक टकु डे को माइक्रोस्कोप से देखा और पाया कि यह छोंटे-छोटे उपखंडो से मिलकर बना था जिसे हिन्दी में कोशिका और अंग्रेजी में सेल कहा जाता हैं। 

1824 में आर.जे.एच. डुट्रोचेट ने सिद्ध किया कि सभी जीवधारियों के शरीर में कोशिकाएं होती हैं जो कि एक जैसी होती हैं। इस समय तक कोशिका की आंतरिक संरचना के विषय में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं थी। सन् 1933 में स्काटलैण्ड के वनस्पति शास्त्री राबर्ट ब्राऊन ने एक फूलदार पौधे की बाह्य त्वचा का अध्ययन करते समय कोशिका के अन्दर एक छोटी सी गोल संरचना देखी और उसे केन्द्रक का नाम दिया। सन् 1835 में फ्रांस के एफ. डुजारडिन ने अपने प्रयोगों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि कोशिका में एक जैली जैसा पदार्थ होता है। इस पदार्थ को उसने सार्कोड़ का नाम दिया। इसके पश्चात् सन् 1839 में जे.ई. पुरकिंजे तथा हुगो वाॅन माॅडल ने इस जैली जैसे द्रव्य को प्रोटोप्लास्म का नाम दिया। (Latin protoplasm - First formed matter) उनके अनुसार कोशिका की रचना में सर्वप्रथम इस जैली जैसे पदार्थ का निर्माण होता है इसलिये इसे प्रोटोप्लाज्म कहा जाता है।
कोशिका

कोशिका सिद्धांत 

सन् 1839 में जर्मनी के दो वैज्ञानिकों एम. जे. शीलडन तथा थियोडेर शवहान ने कोशिका सम्बन्धी अनुसंधानों के आधार पर कोशिका सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। कोशिका सिद्धान्त कोशिका की खोज के 50 वर्षों बाद प्रतिपादित हुआ और इससे कोशिका सम्बन्धी स्पष्ट धारणाओं के निर्माण एवं विकास में सहायता मिली। कोशिका क्या है? उसकी आंतरिक संरचना क्या है? और उसकी जीवधारियों के लिए क्या उपयोगिता है? आदि प्रश्नों से सम्बन्धित स्पष्ट धारणायें बनाने में सहायता मिली। कोशिका सिद्धान्त के मुख्य बिन्दु निम्नलिखित हैं-
  1. सभी सजीव पदार्थ-पौधे, जन्तु, एक कोषीय अथवा बहुकोषीय जीव आदि अनिवार्य रूप से कोशिकाओं से बने होते हैं।
  2. सभी कोशिकायें पहले से विद्यमान कोशिकाओं से ही बनती हैं
  3. जीवन के सभी क्रियाकलाप कोशिकाओं द्वारा ही सम्पन्न किये जाते हैं।
  4. सभी कोशिकाओं में आनुवंशिक पदार्थ होता है जिसका कोशिका विभाजन द्वारा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तान्तरण होता है।
  5. कोशिकाओं में संरचना तथा कार्यप्रणाली की दृष्टि से उचित संगठन और समन्वय पाया जाता है।

पादप एवं जन्तु कोशिका की संरचना

कोशिका से अभिप्राय जीवधारियों के शरीर की सबसे छोटी संरचनात्मक एवं कार्यपरक इकाई से है। पौधों एवं जन्तुओं की कोशिकाओं में पायी जाने वाली कुछ संरचनाओं में साम्य होता है और कुछ अंतर पाये जाते हैं। इनका वर्णन निम्नलिखित हैं-

A. पौधों तथा जन्तुओं की कोशिका में उपस्थित उभयनिष्ठ संरचनाएं

1.कोशिका झिल्ली अथवा प्लाज्मा झिल्ली: कोशिका के बाहर एक झिल्ली जैसा आवरण होता है इसे प्लाज्मा झिल्ली अथवा कोशिका झिल्ली कहते हैं। इसका निर्माण वसा तथा प्रोटीन अणुओं द्वारा होता है। यह झिल्ली कोशिका में उपस्थित जीव द्रव्य को बांधे रखती है। इस झिल्ली में से केवल कुछ पदार्थ आ जा सकते हैं इसीलिए इसे (Selectively Permeable) कहा जाता है। इसका मुख्य कार्य कोशिका में विभिन्न पदार्थों के आवागमन को नियन्त्रिात करना होता है।

2.कोशिका द्रव्य: यह कोशिका में उपस्थित गाढ़ा तरल पदार्थ होता है और मैट्रिक्स का निर्माण करता है। कोशिका द्रव्य देखने में पारदर्शक, झागदार तथा दानेदार होता है। एक जीवित कोशिका का जीवद्रव्य निरन्तर गतिशील रहता है। कोशिका द्रव्य में छोटे-छोटे कणों के अतिरिक्त खाद्य पदार्थ वैक्यूल एवं विभिन्न अंगक जैसे माइट्रोकोन्ड्रिया, रसधानी, केन्द्रक, गाल्जीकाॅय आदि तैरते रहते हैं।

3. केन्द्रक: जीवद्रव्य का केन्द्रीय घना भाग केन्द्रक कहलाता है यह कोशिका द्रव्य से घिरा होता है और इसकी आकृति छोटी तथा गोलाकार होती है। यह कोशिका के नियन्त्रण केन्द्र की तरह कार्य करता है। कोशिका विभाजन की क्रिया में कोशिका द्रव्य के विभाजन से पूर्व केन्द्रक का विभाजन होता है जिसे सूत्राी विभाजन कहते हैं। केन्द्रक की अनुपस्थिति में कोशिका एक अंधे कक्ष के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। लैंगिक प्रजनन में माता-पिता के गुण नवजात शिशु तक केन्द्रक द्वारा ही पहुंचाये जाते हैं। सामान्यतया एक केन्द्रक में निम्न अंगक उपस्थित होते हैं -
  1. केन्द्रक झिल्ली : यह झिल्ली केन्द्रक को चारों ओर से घेरती है और उसे कोशिका द्रव्य से अलग करके विशिष्ट रूप एवं आकार प्रदान करती है। केन्द्रक झिल्ली भी प्लाज्मा झिल्ली की तरह होती है अर्थात् यह केवल कुछ विशिष्ट पदार्थों को ही गुजरने देती है। केन्द्रक झिल्ली में कुछ छोटे-छोटे छेद होते हैं जिन्हें केन्द्रक छेद कहा जाता है। 
  2. केन्द्रक रस -केन्द्रक में जिलेटिन की तरह का एक पदार्थ होता है जिसे केन्द्रक रस कहा जाता है। यह केन्द्रक में मैट्रिक्स की भांति कार्य करता है और इसमें धागे अथवा बिन्दु जैसी बहुत सी संरचनाएं तैरती रहती हैं।
  3. केन्द्रिका - ये अधिक घनत्व वाले सूक्ष्म पदार्थ होते हैं जिनकी संख्या एक या एक से अधिक हो सकती है। 
  4. गुण सूत्र - केन्द्रक रस में तैरती हुई धागे जैसी संरचनाएं गुणसूत्र होती हैं। प्रत्येक जीवधारी की कोशिका में गुणसूत्रों की निश्चित संख्या होती है जैसे मनुष्य में 23 जोड़े गुणसूत्र होते हैं और फल वाली मक्खी में 4 जोड़े। इन गुणसूत्रों में जीन्स  होते हैं जो एक पीढ़ी के गुण दूसरी पीढ़ी में स्थानान्तरित करते हैं।  
4. माइट्रोकान्ड्रिया या सूत्र कणिका - ये देखने में छड़ की आकृति के होते हैं। इनका कार्य कोशिका में श्वसन क्रिया करके ऊर्जा का उत्पादन करना होता है जिससे कोशिका के सभी कार्य सुचारु रूप से हो सकें। ये ऊर्जा उत्पन्न करते हैं जिससे कोशिका की कार्य करने की शक्ति मिल सके इसीलिए इन्हें कोशिका का ऊर्जाघर अथवा पाॅवर हाऊस भी कहा जाता है।

5. रसधानी - इनकी आकृति बिन्दु अथवा छड़ जैसी होती है। इनमें रस के रूप में स्वच्छ तरल पदार्थ भरा रहता है। कोशिका की आयु बढ़ने के साथ-साथ इनके आकार में वृद्धि होती जाती है। पादप कोशिकाओं में रसधानियों का आकार एवं संख्या जन्तु कोशिका की अपेक्षा बड़ी होती है। 

6. गाल्जीकाय - ये केन्द्रक के निकट होती हैं और देखने में ऐसे लगती हैं जैसे वस्तु सी प्लेटों को एक दूसरे के ऊपर रख दिया गया हो। ये प्लेटें दोहरी झिल्ली की बनी होती हैं। पादप कोशिका में इन्हें गाल्जीकाय के स्थान पर डिक्टियोसोम के नाम से जाना जाता है। इनके कार्य एन्जाइमों का संचयन, स्त्रावण एवं पादप कोशिका में कोशिका विभाजन के समय कोशिकाओं के बीच कोशिका भित्ति का निर्माण करना आदि होता है। 

7 अंतद्रव्यी जलिका - ये भी केन्द्रक के पास होती हैं और केन्द्रक झिल्ली से कोशिका झिल्ली तक एक जाल  सा बनाती हैं। इनका मुख्य कार्य पदार्थों का संवहन, स्त्रावण एवं राइबोसोमस को आधार प्रदान करना है। ये भी दोहरी झिल्ली की बनी होती हैं। इनकी संख्या कोशिका में एक से अधिक हो सकती है।

8. राइबोसोमस - ये दानेदार दिखने वाली संरचनाएं होती हैं। ये मुख्यतः एंडोप्लास्मिक रेटीकुलम पर अथवा कोशिका द्रव्य में पायी जाती हैं। इनका मुख्य कार्य प्रोटीन संश्लेषण में सहायता करना है। 

9. तारककाय- पौधों में यह केवल थैलोफाइटा वर्ग में पाया जाता है परन्तु जन्तु कोशिका में यह सदा उपस्थित होता है। इसकी संख्या कोशिका में केवल एक होती है। इसका स्थान केन्द्रक के निकट होता है तथा आकृति गोल और रूप पारदर्शी होता है। इसका केन्द्रीय भाग काफी घना एवं गाढ़ा होता है जिसे तारक केन्द्र कहा जाता है। यह कोशिका विभाजन में मुख्य भूमिका निर्वाह करता है।

B. केवल पादप कोशिकाओं में उपस्थित संरचनाएँ

1. कोशिका भित्ती - बैक्टीरिया और पादप कोशिकाओं में सबसे बाहर का आवरण, जो कि प्लाज्मा झिल्ली के बाहर होता है उसे कोशिका भित्ति कहते हैं। बैक्टीरिया की कोशिका-भित्ति पेप्टिडोग्लाइकानॅ की बनी होती हैं। नीचे पादप कोशिका भित्ति की सरंचना व कार्य का वर्णन किया गया हैं।

कोशिका भित्ति की सरंचना - सभी पादप कोशिकाओं में पाइ जाने वाली सबसे बाहरी, निर्जीव परत हैं - 
  1. स्वयं कोशिका द्वारा स्रावित होते हैं। 
  2. पादपों में सेलुलोज की बनी होती हैं लेकिन इसमें अन्य रासायनिक पदार्थ भी मौजूद हो सकते हैं जैसे पेक्टिन व लिग्निन आदि। 
  3. कोशिका-भित्ति को बनाने वाले पदार्थ सभांग नहीं होते, बल्कि महीन रेशों अथवा तंतुओं के रूप में होते हैं जिन्हे सूक्ष्मतंतु [microfibrils], कहते हैं। 
2. प्लास्टिड (लवक) - लवक की आकृति गोल, अंडाकार या डिस्क जैसी होती है। केवल पादप कोशिकाओं में पये जाते हैं। ये रंगहीन अथवा रंगीन हो सकते हैं। इस तथ्य के आधार पर तीन प्रकार के प्लास्टिड हो सकते हैं। 
  1. अवर्णी लवक - ये रंगहीन, कण होते हैं और पौधे के ऐसे भागों में उपस्थित होते हैं जहाँ धूप नहीं पहुंचती जैसे-भूमिगत जड़, तना आदि। आलू, चुकन्दर, अदरक, कचालू आदि पौधों में ये लवक स्टार्च के रूप में भोजन के संग्रहण का कार्य करते हैं। पौधों के नवजात अंगों जैसे पत्तियों की कोपलों आदि की कोशिकाओं में भी ये लवक पाये जाते हैं। अवर्णी लवक समय और परिस्थिति के अनुसार हरित लवक एवं वर्णी लवक में परिवर्तित हो जाते हैं।
  2. हरित लवक - हरित लवकों में एक हरे रंग का वर्णक क्लोरोफिल होता है। क्लोरोफिल की उपस्थिति के कारण ये हरे रंग के होते हैं। यह वर्णक पौधों में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के लिए अनिवार्य होता है। प्रकाश-संश्लेषण प्रक्रिया द्वारा भोजन का निर्माण होता है और सूर्य की ऊर्जा एवं वायुमण्डल की कार्बन डाई आक्साइड का स्थिरीकरण होता है। सभी खाद्य पदार्थों, लकड़ी, रेशे, दवाइयाँ आदि पदार्थों का निर्माण इसी प्रक्रिया द्वारा होता है। इस प्रकार हरित लवक जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
  3. वर्णी लवक - ये लवक हरे रंग के अतिरिक्त अन्य रंगों के होते हैं। इनका रंग इनमें उपस्थित वर्णक के कारण होता है जैसे जामुनी रंग एन्थ्रासायनिन वर्णक की उपस्थिति के कारण होता है। विभिन्न वर्णी लवकों की उपस्थिति के कारण पौधों की पत्तियों, फूलों आदि के रंग सुन्दर व चमकीले होते हैं।
3. अन्य विशिष्ट पदार्थ- पौधों की कोशिकाओं में ठोस व द्रव रूप में कुछ ऐसे पदार्थ होते हैं जो विभिन्न पौधों में विशेष रूप से अपनी उपस्थिति, प्रदर्शित करते हैं। जैसे पौधे के भूमिगत अंगों की कोशिकाओं में उपस्थित स्टार्च, ऐल्यूटोन कण, इंसुलिन, वसा, तेल आदि। उत्सर्जनी तथा अपशिष्ट पदार्थ जैसे गोंद, राल, लेटैक्स, टेनिन तथा खनिज क्रिस्टल आदि।

पादप कोशिका तथा जंतु कोशिका में अंतर

पादप कोशिकाजंतु कोशिका 
1. कोशिका झिल्ली के चारों ओर 
सेलुलोज की बनी कोशिका भित्ति 
होती हैं।
1. कोई कोशिका भित्ति नहीं होती। 
2. रिक्तिकाए आम तारै पर बडे़
आकार की होती हैं।
2. रिक्तिकाए आमतौर पर नहीं होती यदि 
होती भी हैं तो सामान्यतया छोटे आकार 
की होती हैं। 
 3. प्लास्टिड़ मौजूद होते हैं।
3. प्लास्टिड नहीं होते हैं। 
4. गाल्जीबॉड़ी, डिक्टिआसोम  
[dictyosomes], नामक इकाइयों 
के रूप में होती हैं।
4. गाल्जीबॉड़ी सुिवकसित होती हैं।
5. सेंट्रिओंल नहीं होते।5.  मौजूद होते हैं।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

2 Comments

  1. Sir ki
    Nucleus ki khoj-रॉबर्ट ब्राउन ने की थी।

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  2. कोशिका की संरचना

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