भारत का भौतिक स्वरूप

अनुक्रम
प्राचीन काल से भारत सोने की चिड़िया व दूध की नदियों का देश कहा जाता था और अब वह दिन दूर नहीं जब कि वह पूर्ण विकसित होकर पुन: धन धान्य की स्थिति प्राप्त कर लेगा। वर्तमान में केवल भारत वर्ष तथा इंडिया शब्द संवैधानिक रूप से अधिकृत है। आकार की दृष्टि से भारत संसार का साँतवा बड़ा देश हैं। एवं जनसंख्या के दृष्टि से चीन के बाद दूसरा नम्बर हैं।

भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार

भारत पूर्णतया उत्तरी गोलार्ध में स्थित है। भारत की मुख्य भूमि 804’ से 3706’ एवं 680 7’ से 970 25’ पूर्वी देशांतर के बीच फैली हुई हैं।इस प्रकार भारत का अंक्षांशीय तथा देशांतरीय विस्तार लगभग 290 अंशों में हैं। अत: पूर्वांचल में यदि 6 बजे प्रात: सूर्योदय हेाता हैं तो सुदूर पश्चिम में सूर्योदय दो घंटे बाद होगा। इसका विस्तार उत्तर से दक्षिण तक 3214 किलोमीटर और पूर्व से पश्चिम तक 2933 किमी. और समुद्री तट रेखा अंडमान निकोबार द्वीप समूह तथा लक्ष्यद्वीप समूह के साथ 7517 कि.मी. हैं। कर्क रेखा भारत के लगभग मध्य भाग से गुजरती है। इसी प्रकार लगभग मध्य भाग से निकलने वाली 82030’ देशांतर रेखा का समय ही भारत का मानक समय निर्धारित किया गया र्है। यह रेखा उत्तर में मिर्जापुर एंव दक्षिण में चैन्नई के निकट से गुजरती हैं। उदाहरण- हमारे देश का स्थानीय समय ग्रीनविच के स्थानीय समय से 5.30 घंटा आगे हैं। यदि 00 मुख्य देशांतर रेखा में दोपहर के 12 बजे हैं। तब भारत में शाम को 5 बजकर 30 मिनिट होगा।

विश्व में भारत का स्थान

भारत को उपमहाद्वीप का स्तर प्रदान करने वाले भौगोलिक कारक  हैं:-
  1. सामाजिक गतिविधियां विश्व में अलग से दृष्टि गोचर होती हैं। 
  2. कई धर्म, जातियाँ, जनजातियाँ एवं संस्कृतियों को समेटकर रखी हैं। 
  3. भौतिक दषायें जलवायु, वनस्पतियां, धरातल, मिट्टी, खनिज एवं समस्त जीवों में विषमता मिलती हैं।
  4. कश्मीरी, बंगली, असमी, राजस्थानी, केरली एवं समस्त जनों का एक ही नारा हम सब भारतीय है। 
  5. भारत भूिम की विषालता, जनसंख्या, ऐतिहासिक, पृष्ठभूमि समस्त रितिरिवाज परम्पराये देखी जा सकती है। 

भारत का भौतिक स्वरूप (प्राकृतिक विभाग)

भारत का निर्माण विभिन्न भूगर्भीय कालों में हुआ हैं यहां सभी प्रकार की स्थलाकृतियां (पर्वत, पठार, मैदान, घाटी) एवं तट पाये जाते है। सामान्यत: भू आकृतिक दृष्टि से भारत को चार विभागों में बांटा जा सकता है। 
  1. उत्तर का विषाल पर्वतीय विभाग 
  2. उत्तरी भारत का विषाल मैदानी विभाग (भारतीय मरूस्थल सहित) 
  3. प्रायद्वीपीय पठार 
  4. समुद्रतटीय मैदान एवं द्वीप समूह 

उत्तरी भारत का विशाल पर्वतीय विभाग- 

भारत के उत्तरी भाग पर स्थित पर्वत की श्रृखलायें पश्चिम पूर्व दिषा में सिंधु से लेकर ब्रम्हपुत्र तक फैली हैं यह नवीन वलित पर्वत माला है। जो टेथिस सागर के स्थान पर आज मौजूद हैं। अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से इस विभाग को चार भागों में बांट सकते हैं। 

हिमाद्रि ( वृहत हिमालय)- 

इस भाग में हिमालय की सबसे ऊँची श्रेणियां हैं। इसकी चौड़ाई 150 किमी. तथा औसत 6100मी. हैं। विश्व की सर्वोच्च चोटी माउंट एवरेस्ट (8848 मीटर) पूर्वी नेपाल में स्थित हैं। कंचन जंगा 8598 मी. भारत की सबसे ऊँची चोटी हैं। हिमाद्रि के अंचल में, धौलगिरी, नंगा पर्वत, नंदादेवी, अन्नपूर्णा जैसे ऊँचे ऊँचे पर्वत विद्यमान हैं। इस भाग में प्रमुख दर्रे जोजिला, कारा कोरम, नाथुला आदि हैं।

लघुहिमालय (हिमांचल)- 

इस पर्वत माला का क्रम बहुत जटिल हैं। कई स्थानों पर पर्वतो के बीच गहरी घाटियाँ पायी जाती हैं। यह पर्वत श्रेणी 60 से 80 कि.मी. तक चौड़ी तथा 1000 से 4500 मीटर तक ऊँची हैं कश्मीार में इस श्रेणी को पीर पंजाल तथा हिमांचल प्रदेश में धौलाधर के स्थानीय नामों से जाना जाता हैं। हिमांचल पर्वत श्रेणी में ही कांगड़ा और कुल्लू भी प्रसिद्ध घाटिया हैं। यहां पर प्रमुख पर्यटन एवं स्मरणीय स्थल शिमला, नैनीताल, मंसूरी, अल्मोड़ा, रानीखेत, डलहोैजी और दाजिर् िलंग हैं जो स्वास्थ्य वर्धक एवं फिल्म शूटिंग के लिये प्रसिद्ध हैं।

शिवालिक (बाह्य हिमालय)- 

बाह्य हिमालय महान् हिमालय व मध्य हिमालय के दक्षिण में पंजाब के पोटवार बेसिन से प्रारम्भ होकर पूर्व में कोसी नदी तक फैली हुई है। इनकी ऊँचाई औसतन 1220मी. हैं। हिमालय एवं शिवालिक श्रेणियों के बीच फैली अनेक लम्बाकार घांटियां स्थित हैं, जिन्हें पश्चिम में दून कहते है।

तिब्बत हिमालय- 

यह श्रेणी हिमालय के उत्तरी भाग मे ंस्थित हैं। यह पूर्व और पश्चिम की ओर अपने किनारों पर 40 कि.मी. तथा मध्य में 225 किमी चौड़ी हैं। इसकी कुल लम्बाई 965 किमी हैं। यहां पर शीत कटिबंधाीय जलवायु अवस्थाओं के मिलने के कारण, वनस्पति का पूर्णत: अभाव पाया जाता हैं। इसे मुख्यत: दो शाखाओं में बाटा जाता हैं।
  1. जास्कर पर्वत श्रेणी- यह श्रेणी हिमालय की उत्तरी शााखा के रूप में उत्तर में लददाख श्रेणी एंव दक्षिण में महान हिमालय के बीच स्थित हैं। इसमें डास और जास्कर दो बड़ी नदियां हैं। सबसे ऊँची चोटी कामेत हैं। कुछ प्रसिद्ध दर्रे हैं- कींगरी-बींगरी, दर्मा, शलष् तथा नीति। 
  2. काराकोरम पर्वत श्रेणी- इस पर्वत श्रेणी को उच्च एशिया की रीढ़ कहा जाता है। काराकोरम के शिखर से दक्षिण की ओर निकलने वाली मुख्य पर्वत श्रेणियां हरमोश, सासिर व माशरबूम हैं। इनमें से हरमोश पहाड़ी लद्दाख व सासिर कैलााश श्रेणियों कीे जोड़ती हैं।उत्तरी श्रेणी की मुख्य पहाड़िया अगहिल पहाड़ी एवं कारकोरम जल विभाजक हैं। हिमालय की दो बहुत ऊँची चोटियां भी इसी श्रृंखला में के-2 (8611) मी. तथा माशबूम (7721) मी. पायी जाती हैं। 

उत्तरी भारत का विशाल मैदान

यह उत्तरी मैदान सिंधु गंगा, बम्हपुत्र तथा उनकी सहायक नदियों द्वारा लायी गई हैं। कांप मिट्टियों से बना उपजाऊ प्रदेश इस मैदान का क्षेत्ऱफल 7 लाख वर्ग किमी. से अधिक हैं। समुद्रतल से इसकी आसै त ऊचँ ाई लगभग 200मी. हैं। मैदान के अपेक्षाकृत ऊँचे भाग को ‘बॉगर’ कहते हैं। इस भाग में नदियाँ की बाढ़ का पानी कभी नहीं पहुँचता। इसके विपरीत ‘खादर’ मैदान का अपेक्षाकृत नीचा भाग हैं। जहां बाढ़ का पानी हर साल पहुंचता रहता है। पंजाब में खादर को ‘बेट’ कहते हैं। पंजाब हरियाणा और उत्तर प्रदेश मे शिवालिक पर्वत श्रेणी के साथ-साथ 10-15 किमी. चौड़ी मैदानी पट्टी को ‘भाबर’ कहते हैं। यह पट्टी कंकरीली बुलई मिट्टी से बनी हैं। ग्रीष्म ऋतु में छोटे छोटे नदी नाल े इस पट्टी में भूि मगत हो जाते हैं और इस पट्टी को पार करके इनका जल धरातल पर पुन: आ जाता हैं। यह जल भाबर के साथ साथ फैली 15-30 किमी. चौडी़ तराई नाम की पट्टी में जमा हो जाता हैं। इससे यहाँ दलदली क्षेत्र बन गया हैं। तराई का अधिकांश क्षेत्र कृषि योग्य बना लिया जाता है। उत्तरी विषाल मैदान को चार भागों में विभाजित किया गया हैं- 

पश्चिमी मैदान:- 

पश्चिमी मैदान में राजस्थान का मरूस्थल तथा अरावली पर्वत श्रेणी का पश्चिमी बांगर क्षेत्र सम्मिलित हैं। मरूस्थल का कुछ भाग चट्टानी तथा कुछ भाग रेतीला हैं। प्रचीन काल में यहा सरस्वती और दृशदवती नाम की सदानीरा नदियां बहती थी । उत्तरी मैदान के इस भाग में बीकानेर का उपजाऊ क्षेत्र भी हैं। पश्चिमी मैदान से लूनी नदी कच्छ के रन में जाकर विलीन हो जाती हैं। सांभर नाम की खारे पानी कह प्रसिद्ध झील इस क्षेत्र में हैं।

उत्तरी मध्य मैदान- 

पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में फैला हैं। इस मैदान का पंजाब और हरियाणा में फैला भाग सतलज, रावी, और व्यास नदियों के द्वारा लाई गई मिट्टी से बना हैं। यह भाग उपजाऊ हैं । इस मैदान का उत्तर प्रदेश में फैला भाग गंगा, यमुना, रामगंगा, गोमती , घाघरा, गंडक नदियों के द्वारा लाई मिट्टी से बना हैं। मैदान का यह भाग भी बहुत उपजाऊ हैं और भारतीय सभ्यता और संस्कृति का पालना रहा हैं।

पूर्वी मैदान- 

गंगा की मध्य और निचली घाटी में फैला हैं। इस मैदान का विस्तार बिहार और पश्चिम बंगाल के राज्यों में हैं। बिहार राज्य में गंगा नदी इस मैदान के बीच से होकर गुजरती हैं। पश्चिम बंगाल राज्य में जो मैदानी भाग हैं उसका विस्तार हिमालय के पाद प्रदेश से लेकर बंगाल की खाड़ी तक हैं। यहां यह मैदान कुछ अधिक चौड़ा हो गया हैं। इसका दक्षिणी भाग डेल्टा क्षेत्र हैं। इस डेल्टा क्षेत्र  में गंगा अनेक वितरिकाओं में बंट जाती हैं। यह मैदानी भाग बहुत ही उपजाऊ हैं।

ब्रम्हपुत्र का मैदान- 

भारतीय मैदान का उत्तर-पूर्वी भाग असम में विस्तृत हैं। यह मैदान ब्रम्हपुत्र और उसकी सहायक नदियों द्वारा बहाकर लाई गई मिट्टी से बना हैं। ब्रम्हपत्रु की डेल्टा में बना माजुली (1250 वर्ग किमी.) द्वीप संसार का सबसे बड़ा नदी द्वीप हैं।

प्रायद्वीपीय पठार (दक्षिण का पठार)  

यह प्राचीन चट्टानों से बना पठारी प्रदेश हैं। इस प्रदेश में अनेक प्रकार के पर्वत श्रृंखलायें और नदी घाटिया है। जो गोंडवाना लंडै स्थिर भाग का अंग हैं। इसका क्षेत्रफल लगभग 16 लाख वर्ग किमी. हैे। नर्मदा नदी ने इस पठार को दो भागों में बांट दिया हैं। 

मध्यवर्ती उच्चभूमि- 

नर्मदानदी के उत्तर तथा उत्तरी विशाल मैदान के दक्षिण में फैली हैं। इसके पश्चिमी भान मे अरावली पर्वत हैं। इसकी दिषा उत्तर पूर्वी हैं तथा अपरदन कारकों ने इसे घिसकर नीचा कर दिया हैं जो मानसुनी हवाओं को रोकने की क्षमता नहीं हैं। यह कुल 700 किमी. में फैला हैं। गुरू शिखर 1722 मीटर अरावली का सर्वोच्च शिखर है। मध्यवर्ती पठार में मालवा के पठार का बहुत महत्व है। जो विंध्याचल श्रेणी के उत्तर में फैला हैं। मालवा के पठार के पूर्वी भाग में बुंदेलखंड के पठार का नाम विख्यात हैं। बुंदेलखंड के पूर्व में बघेलखंड का पठार है तथा इस के पूर्व में छोटा नागपुर का पठार हैं। राजस्थान के उ.प. में लगभग 640 कि.मी. लम्बा और 160 कि.मी. चौड़ा रेतीला मरूस्थल है जहॉं बालूका स्तूप आदि पाये जाते हैं थार के मरूस्थल के द. पश्चिम सौराष्ट एवं काच्छ का रन स्थित हैं।

दक्कन का पठार- 

इसका विस्तार ताप्ती नदी के दक्षिण में दक्षिणी तट के निकट तक तथा पश्चिमी घाट पर्वत माला के बीच स्थित हैं। यह पठार अत्यंत प्राचीन कठोर, आग्नेय तथा रवेदार चट्टानों से निर्मित हैं। दक्षिण का पठार एक त्रिभुजाकार भूभाग हैं। उत्तर में सतपुड़ा की श्रृंखला हैं जबकि कैमूर की पहाँड़िया तथा मैकाल श्रंृखला इसके पूर्व में स्थित हैं। दक्षिण पठार के पूर्वी एवं पश्चिमी सिरे पर क्रमश: पूर्वी तथा पश्चिमी घाट हैं। पश्चिमी घाट, पश्चिमी तट के समानांतर स्थित हैं। वे सतत है तथा उन्हें केवल दर्रो के द्वारा ही पार किया जा सकता हैं। पश्चिमी घाट,पूर्वी घाट, की अपेक्षा ऊँचे हैं। पूर्वी घाट के 600मीटर की औसत की तुलना में पश्चिमी घाट की ऊँचाई से 900 से 1600 मीटर हैं। पूर्वी घाट का विस्तार महानदी घाटी से दक्षिण में नीलगिरी तक हैं। नदियों ने इनको काट लिया हैं। इस घाट में पर्वतीय वर्षा होती हैं। यह वर्षा घाट के पश्चिमी घाट के ढ़ाल पर आदर््र हवा के टकराकर ऊपर उठने के कारण होती हैं। पश्चिमी घाट की ऊचाई उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ती हैं। इस भाग के शिखर ऊँचें हैं जैसे अनाई मुड़ी 2695मी. तथा ढोंढ़ बेट्टा। 2633 मी. पूर्वी घाट का सबसे ऊंचा शिखर महेंदगिरी 1500 मी हैं। पूर्वी घाट के दक्षिण पश्चिम में शेवराय तथा जावेड़ी की पहाड़िया स्थित हैं। जिनमें ऊटी तथा कोड़ाईकनाल जैसे प्रसिद्ध पर्वतीय नगर स्थित हैं। प्रायद्वीपीय पठार की एक विशेषता यहा पायी जाने वाली काली मृदा हैं, जिसे ‘दक्कन ट्रेप’’ के नाम से जाना जाता है। इसकी उत्पत्ति ज्वालामुखी से हुई हैं। इसलिये इसके शैल आग्नेय हैं।

समुद्र तटीय मैदान- 

प्रायद्वीपीय पठार के पूर्व पश्चिम दोनो किनारो पर पतली तटीय पट्टी का विस्तार हैं। यह पश्चिम में अरब सागर से लेकर पूर्व में बंगाल की खाडी़ तक विस्तृत है। पश्चिमी तट, पश्चिमी घाट तथा अरब सागर के बीच स्थित एक संकीर्ण मैदान हैं। उत्तर में दमन से लेकर दक्षिण में गोवा तक लगभग 500किमी. का तटीय भाग कोंकण कहलाता हैं। यह कटा फटा हैं। गोवा से मंगलोर तक के तट को कन्नड़ तट कहते हैं। समुद्र तटीय मैदान के अंतगर्त दूसरा भाग पूर्वी तटीय मैदान, पूर्वी घाट और बंगाल की खाड़ी के मध्य उत्तर में स्वर्ण रेखा नदी के दक्षिण में कुमारी अंतरीप तक फैला हैं। तट के किनारे कहीं कही बालू के टीले व लैगून तथा झीलें पायी जाती हैं। इसके सम्पूर्ण भाग को कोरोमंडल तट कहते हैं। उत्तरी भाग को गोलकुंडा एवं दक्षिण भाग को कर्नाटक कहते हैं। 

द्वीप समूह - 

भारत में कुल 247 द्वीप हैं। इनमें सबसे अधिक बंगाल की खाड़ी में प्रवाल निर्मित हैं। बंगाल की खाड़ी मुख्यद्वीप गंगासागर, न्यूमरे, अंडमान निकोबार, श्रीहरि कोटा द्वीप समूह आदि हैं। भारत संघ का दक्षिण तक छोर वृहत निकोबार द्वीप हैं। इसे इंदिरा प्वाइंट कहते हैं। यह 60 30’ आक्षांश पर हैं। अरब सागर में हैनरे व कमै रे ऐलीफंटे, लक्ष्यद्वीप, मिनीकोटा एवं अमनद्वीप प्रमुख द्वीप हैं। 

अपवाह तंत्र (अपवाह प्रणाली) -

किसी भी भूभाग पर ढ़ाल के अनुरूप जल का बहना चाहे वह छोटी छोटी नाले, नदियों या सहायक नदियों विशाल नदियों के जाल के रूप में हो, जल प्रवाह प्रणाली कहलाती हैं। उत्तरी भारत के अपवाह तंत्र में हिमालय का बड़ा महत्व हैं। क्याकिं उत्तर भारत की नदियों का उद्गम हिमालय और उसके पार से हैं। ये नदियां दक्षिण भारत की नदियों से भिन्न हैं, क्योंकि ये तेज गति से अपनी घाटियों को गहरा कर रही है। अपरदन से पा्रप्त मिट्टी आदि को बहाकर ले जाती हैं। मैदानी भाग मे जल प्रवाह की गति मंद पड़ने पर मैदानों और समुद्रो में जमा कर देती हैं। हिमालय से निकलने वाली कछु नदिया  हिमालय से भी पहले विद्यमान थी। जैसे-जैसे हिमालय की पर्वत श्रेणियां ऊपर उठती हैं। ये नदियाँ अपनी घाटियों को गहरा काटती हैं। इसके परिणामस्वरूप इन नदियों ने हिमालय की श्रेणियों में बहुत गहरी घाटियां या महाखड्ड 5200 मीटर गहरा हैं। सतलुज और ब्रम्हपुत्र नदियों ने ऐसे ही महाखड्ड बनायें हैं। 

उत्तरी भारत के अपवाह तंत्र के तीन भाग हैं। सिन्धु, गंगा, तथा ब्रम्हपुत्र का अपवाह तंत्र। सिंधु झोलम व चिनाव रावी न्यास और सतलज सिंधु नदी तंत्र की प्रमुख नदियां हैं। गंगानदी तंत्र मेंं रामगंगा, घाघरा, गेामती, गंडक, कोसी , यमुना , सोन और दामोदर नदियों का प्रमुख स्थान हैं ब्रम्हपुत्र नदी तंत्र में दिबांग, लोहित, तिस्ता, ओैर घना प्रमुख नदियां हैं। दामोदर नदी को बंगाल का शोक कहते हैं। दक्षिणी भारत या प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र- इस तंत्र की नदियों का अध्ययन दो भागों में करते हैं- 
  1. अरब सागर से गिरने वाली नदियां- इनका नाम इस प्रकार हैं- लूनी, साबरमती, माही, नर्मदा एवं ताप्ती नदी। अमरकंटक से निकलने वाली नर्मदानदी 1057 मीटर की ऊँचाई से निकलकर जबलपुर के पास बंदर कुदनी नामक स्थान पर तंग गहरी एवं सीधी केनियान में बहती हैं। यहां पर संगमरमर शैलों को काटते हुये विश्वविख्यात धुँआधार जल प्रपात बनाती हैं। नर्मदानदी अरब सागर में एश्चुअरी (ज्वारनद) या एक ही धारा में बहती हुई प्रवेश करती हैं। 
  2. बंगाल की खाड़ी से गिरने वाली प्रायद्वीपीय तंत्र की नदियां- दामोदर, स्वर्ण रेखा, ब्राम्हणी, महानदी, गोदावरी, कृश्णा, एवं कावेरी नदियां हैं। 

नदियों से लाभ -

  1. उपजाऊ मैदान के कर्णधार हैं। 
  2. सिंचाई एवं जल विद्युत के स्त्रोत हैं। 
  3. परिवहन मत्स्य उद्योग एवं पीने के लिये तथा उद्योगों हेतु जल की प्राप्ति, 
  4. पर्यटन, सुरम्य, सेहत, श्र्द्धा के लिये नदियों ने अपनी गोद में नगरो को बसाया है व सभ्यता को जन्म दिया हैं।

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