जल के स्रोत, उपयोगिता, समस्यायें एवं संरक्षण के उपाय

अनुक्रम
जल प्रकृति का सबसे मूल्यवान उपहार है। यह आपूर्य और असमाप्त होने वाला संसाधन है; परन्तु यह संकटग्रस्त संसाधन भी है। पानी की मांग सतत् बढ़ रही है और जलापूर्ति निरंतर घट रही है। विश्व के संदर्भ में देखा जाए तो भारत के पास 4 प्रतिशत जल है, जबकि जनसंख्या 16 प्रतिशत है। इसका अर्थ यह हुआ कि विश्व के औसत की तुलना में हमारे यहाँ प्रति व्यक्ति के हिस्से में केवल चौथाई जल ही आता है। सिंचित क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का विश्व में पहला स्थान है। देश का आठवाँ हिस्सा बाढ़ग्रस्त है तथा छटा हिस्सा सूखा से त्रस्त है। इस सबके लिए मानसून की प्रकृति उत्तरदाई है। बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए खाद्यान्नों और अन्य कृषि उपजों की अधिक आवश्यकता है। यही कारण है कि फसलों के लिए सिंचाई के रूप में जल का उपयोग बढ़ता जा रहा है। नगरीकरण, औद्योगीकरण तथा आधुनिकीकरण के कारण नगरों में जल की मांग बहुत बढ़ी है। केवल इतना ही नहीं मल-जल की निरंतर बढ़ती निकासी और सभी प्रकार की गंदगी के निपटान के लिए जल की मांग और भी अधिक बढ़ रही है।

जल के स्रोत

जल के चार प्रमुख स्रोत हैं-
  1. पृष्ठीय जल 
  2. भूमिगत जल 
  3. वायुमंडलीय जल तथा 
  4. महासागरीय जल। 
हम अपने व्यावहारिक जीवन में प्रत्यक्षत: पृष्ठीय और भूमिगत जल का ही उपयोग करते हैं।

पृष्ठीय जल 

धरातल पर पृष्ठीय जल का मूल स्रोत वर्षण है। वर्षण का लगभग 20 प्रतिशत भाग वाष्पित होकर वायुमंडल में विलीन हो जाता है। जल का कुछ अंश भूमिगत हो जाता है। पृष्ठीय जल का एक बड़ा भाग धरातल पर नदियों-नालों, तालाबों, झीलों तथा पोखर-जोहड़ों में मिलता है। शेष जल बहकर सागर-महासागरों में जा मिलता है। भू-पृष्ठ पर पाये जाने वाले जल को पृष्ठीय या धरातलीय जल कहते हैं। कुल पृष्ठीय जल का लगभग दो-तिहाई भाग देश की तीनों बड़ी नदियों - सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्रा से होकर बहता है। आज भारत में निर्मित जलाशयों के जल भंडारण की क्षमता लगभग 174 अरब घन मीटर है। स्वतंत्राता के समय जलाशयों के भंडारण की क्षमता मात्रा 18 अरब घनमीटर थी। इस प्रकार जल भण्डारण की क्षमता लगभग दस गुनी बढ़ाई जा चुकी है।

गंगा द्रोणी में उपयोग के योग्य जल भंडारण की क्षमता सबसे अधिक है, परन्तु ब्रह्मपुत्रा नदी द्रोणी में वार्षिक प्रवाह सर्वाधिक होते हुए भी उपयोग योग्य जल भंडारण की क्षमता सबसे कम है। गोदावरी, कृष्णा, महानदी तथा सिंधु नदी द्रोणियों में भण्डारण क्षमता पर्याप्त है। उपयोग योग्य जल भंडारण की क्षमता को अनुपात की दृष्टि से देखा जाए तो तापी नदी द्रोणी का पहला स्थान बनता है। तापी नदी द्रोणी की भंडारण क्षमता 97 प्रतिशत है। देश की तीनों बड़ी नदियों सिंधु, गंगा तथा ब्रह्मपुत्रा में वार्षिक जल प्रवाह की मात्रा अधिक है। अत: इन नदियों के जल भंडारण की क्षमता को बढ़ाया जा सकता है।

भूमिगत जल 

वर्षा का जल रिस-रिस कर भूमिगत होता रहता है। जल रिसाव की प्रक्रिया पृष्ठीय जल से भी होती है। इन दोनों ही माध्यमों से भूमि के नीचे विशाल मात्रा में पानी इकट्ठा हो जाता है। इसे भूमिगत जल या भौम जल भी कहते हैं। केन्द्रीय भौम जल बोर्ड के अनुसार 1994-95 में भारत में आपूर्य भूमिगत जल क्षमता लगभग 431 अरब घन मीटर प्रतिवर्ष है। इसमें से लगभग 396 अरब घन मीटर जल उपयोग के लिए उपलब्ध है।

भूमिगत जल का वितरण सर्वत्रा समान नहीं है। भूमिगत जल की उपलब्धता वर्षा की मात्रा, वर्षा की प्रकृति, भूमि के स्वभाव तथा भूमि के ढाल पर निर्भर करती है। अधिक वर्षा वाले भागों में जहाँ भूमि समतल तथा सरंध्र मृदा वाली है वहाँ पानी आसानी से रिस जाता है। अत: इन क्षेत्रों में भूमिगत जल कम गहराई पर पर्याप्त मात्रा में मिलता है। राजस्थान जैसे क्षेत्रों में समतल भूभाग तथा सरंध्र बलुई मृदा होते हुए भी वर्षा की कमी के कारण जल अधिक गहराई पर कम मात्रा में मिलता है। देश के उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में यद्यपि अधिक वर्षा होती है, परन्तु भूमि के ढालू होने के कारण जल के प्रवेश के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं मिलती, फलत: इन भागों में भी भूमिगत जल अधिक गहराई में तथा कम मात्रा में मिलता है। गंगा-ब्रह्मपुत्रा के मैदानों तथा तटीय मैदानों में भौम-जल के विशाल भंडार हैं। प्रायद्वीपीय पठार, हिमालयी क्षेत्रों तथा मरुस्थलीय भागों में भूमिगत जल कम मात्रा में मिलता है।

भूमिगत जल क्षमता का उपयोग - 

जिन क्षेत्रों में वर्षा की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती वहाँ पर भूमिगत जल का उपयोग बड़े पैमाने पर किया जाता है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, तमिलनाडु, गुजरात तथा उत्तर प्रदेश में भूमिगत जल का उपयोग बड़े पैमाने पर किया जाता है; जबकि आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक तथा छत्तीसगढ़ ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ वर्षा की मात्रा कम होते हुए भी भूमिगत जल का उपयोग कम हो पाता है। भूमिगत जल के विकास की विशेष आवश्यकता है।

जल की उपयोगिता

पानी का विविध उपयोग है। इस के उपयोग की सूची लम्बी है। पीने के लिए तो पानी चाहिए ही। घरेलू कार्यों, सिंचाई, उद्योगों, जन स्वास्थ्य, स्वच्छता तथा मल-मूत्र की निकासी के लिए जल अपरिहार्य है। जल विद्युत के निर्माण तथा परमाणु संयंत्रों के शीतलन के लिए विशाल जल राशि निरंतर चाहिए। मत्स्य पालन, वानिकी और जल क्रीड़ाओं की कल्पना जल के बिना नहीं की जा सकती। पर्यटन को विकसित तथा बढ़ावा देने में पानी की विशेष भूमिका है। कृषि अर्थव्यवस्था का तो जल अभिन्न अंग है। इस प्रकार जल सभी प्रकार के विकास कार्य के लिए आवश्यक है। इसका उपयोग जीवन के हर क्षेत्र में आवश्यक है और उपयोग हर क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहा है। नगरों के बढ़ने के कारण नगरों में जल की मांग प्रतिदिन बढ़ रही है।

भारत कृषि प्रधान देश है। अत: सिंचाई के लिए विशाल जल-राशि की आवश्यकता होती है। वर्ष 2000 में सिंचाई के लिए 536 अरब घन मीटर जल का उपयोग किया गया। यह उपयोग की गई कुल जल राशि का 81 प्रतिशत है। शेष प्रतिशत जल का उपयोग घरेलू कार्यों, उद्योगों, ऊर्जा तथा अन्य कामों में होता है।

स्वतंत्रता के बाद सिंचित क्षेत्र में बहुत वृद्धि हुई है। 1999-2000 में कुल सिंचित क्षेत्र 8.47 करोड़ हेक्टेयर था। भारत में सिंचाई के लिए जल के उपयोग की अधिकतम क्षमता 11.35 करोड़ हेक्टेयर मीटर है। इस क्षमता का लगभग तीन चौथाई जल का ही उपयोग हो पाता है।

भारत में सिंचाई की मांग निरंतर बढ़ती जा रही है। सिंचाई की मांग बढ़ने के प्रमुख कारण हैं-
  1. वर्षा के वितरण में क्षेत्रीय और ऋतुवत असमानता,
  2. वर्षाकाल में भारी अन्तर और अनिश्चितता,
  3. वाणिज्यिक फसलों के लिए जल की बढ़ती मांग, 
  4. फसलों का बदलता प्रतिरूप।

जल संसाधन की समस्यायें - 

  1. वर्षा की कमी- भारत वर्श के पश्चिमी भाग खासकर थार के रेगिस्तान तथा वृष्टि छाया वाले प्रदेश में वर्षा की कमी के कारण जल की समस्या बनी रहती हैं। 
  2. शुद्ध पेय जल का अभाव- बढ़ती जनसंख्या एंव शहरीकरण के कारण आज हमारे लिये शुद्ध व मीठें पेयजल का अभाव हैं। ग्रामीण तालाबो में मछली पालन ने जल को हरा कर दिया हैं। 
  3. जल का दुरूपयोग- सिंचाई के जल का नदी में चले जाना, नलों का खुलारहना, भूमिगत जल प्राप्ति की होड़ आदि ने भविष्य को खतरे में डाल दिया हैं। 
  4. बाढ़ग्रस्त क्षेत्र- हमारे द्वारा पर्यावरण से छेड़छाड़ करने के परिणाम स्वरूप नदियों में बाढ़ आना स्वाभाविक हैं। 
  5. जल प्रदूषण- कारखानों का गंदा पानी, शहरों के नालियों का गंदा जल एवं अनेक प्रकार के कचरा से जल जल प्रदूषण बढ़ रहा हैं। 
  6. सूखाग्रस्त क्षेत्र- अनेक स्थानों पर वर्षा न होने पर आकाल पड़ जाते हैं। 

जल संरक्षण के उपाय 

जल नहीं तो जीवन नहीं। अत: जल का संरक्षण अति आवश्यक है। जल की कमी से आने वाली पीढ़ी संकट में पड़ सकती है। जल के संरक्षण में व्यक्ति, समाज और सरकार सभी की सहभागिता अनिवार्य है। जल के संरक्षण के लिए निम्न उपाय अपनाए जा सकते हैं।
  1. नदियों का जल व्यर्थ में बहकर सागरों में न जाए। इसके लिए नदियों पर बाँधों और जलाशयों का निर्माण करना चाहिए। 
  2. नदियों के जल को नगरों की गंदगी से हर कीमत पर बचाना चाहिए। 
  3. बाढ़ों की रोकथाम के लिए गंभीरता से हर संभव प्रयास करने चाहिए। 
  4. जल का सदुपयोग करना चाहिए। 
  5. जल संरक्षण के प्रति जन जागरण पैदा करना चाहिए। 
  6. जल संरक्षण और उसके कुशल प्रबंधन से सम्बन्धित सभी क्रिया-कलापों में लोगों को शामिल कर; उनसे सक्रिय सहयोग लेना चाहिए। 
  7. बागवानी, वाहनों की धुलाई, घर-आँगन और शौचालयों की सफाई में पेय जल का उपयोग नहीं करना चाहिए। 
  8. जलाशयों को प्रदूषण से बचाना चाहिए। 
  9. पानी की टूटी पाइप लाइनों की अविलम्ब मरम्मत करनी चाहिए। 
  10. जल की ‘हर बूंद’ कीमती है। यह भाव जनमानस तक पहुँचाना चाहिए। 
  11. वर्षा पोषित क्षेत्रों में ऐसी फसलों के उगाने पर रोक होनी चाहिए। जिन्हें अधिक पानी की आवश्यकता होती है। 
  12. वृक्षा रोपण पर बल देना चाहिए।

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