सांख्य दर्शन क्या है?

सांख्य दर्शन क्या है?

सांख्य दर्शन के रचयिता महर्षि कपिल ने इस दर्शन में लिखा है कि मूलत: दो अनादि तत्व है प्रकृति और पुरुष, पुरुष चेतन और प्रकृति अचतेन। प्रकृति आरै पुरुष के संयोग से ही सृष्टि का संचालन हो रहा है। यह दर्शन यह भी प्रतिपादित करता है कि पदार्थ का नाष नहीं होता, उसका केवल रूपान्तरण होता है। यह सिद्धान्त आधुनिक वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टीन के सापेक्षवाद व ऊर्जा सिद्धान्त से काफी मिलता है। इसमें ज्ञान से मुक्ति तथा ज्ञान के उपायरूप से वृत्तिनिरोध, आसन, धारणा, ध्यान, अभ्यास, वैराग्यादि का उल्लेख किया गया है।

भगवान् महामुनि कपिल द्वारा विरचित सांख्य-दर्शन सम्भवत: भारत का प्राचीनतम दर्शन है। श्रुति, स्मृति, रामायण, महाभारत आदि पुरातन कृतियों में सांख्य-योग के विचारों के अनेकों उदाहरण मिलते हैं। यथा-’’तत्कारण सांख्ययोगाधिगम्यम्’’ अथवा ‘‘नास्ति सांख्यसमं ज्ञान् नास्तियोगसमं बलम्’’ अथवा ‘‘शुद्धात्मतत्वविज्ञानं सांख्यमित्यभिधीयते’’ इसके अतिरिक्त भी कुछ अन्य उदाहरण हैं। जो इसकी प्राचीनता के परिचायक हैं तथा इस दर्शन के प्रचार और प्रसार के भी द्योतक हैं। 

सांख्य दर्शन के प्रर्वत्तक महर्षि कपिल माने जाते हैं। इनके सम्बन्ध में अनेक विवरण प्राचीन में प्राप्त होते हैं। कपिल को भगवान विष्णु का अवतार, कर्दम और देवहूति का पुत्र, कहीं उन्हें ब्रह्मा का मानस पुत्र, तो कहीं उन्हें अग्नि का अवतार बतलाया गया है। कहीं-कहीं पर इन्हें गौतम ऋषि का वंशज बतलाया गया है जिसके नाम पर कपिलवस्तु नगर की स्थापना हुई। यह कहना कठिन है कि कपिल एक हुए या अनेक, परन्तु इतना प्रामाणिक रूप से कहा जा सकता है कि मुनियों में सिद्ध ‘‘सिद्धानां कपिलो मुनि:’’ कपिल ही सांख्य दर्शन के प्रथम उपदेष्टा थे।

महर्षि कपिल का ‘तत्वसमास’ सांख्य दर्शन का मूलभूत ग्रन्थ है। यह ग्रन्थ अति संक्षिप्त तथा सरगर्भित है। इसका विशद विवेचन ‘सांख्य प्रवचन’ में मिलता है। महर्षि कपिल के शिष्यों में ‘पंचशिखाचार्य’ तथा ‘आसुरि’ का नाम प्रसिद्ध है। पंचशिखाचार्य के द्वारा ‘षष्टितन्त्र‘ नामक ग्रन्थ की रचना की गयी। परन्तु यह ग्रन्थ आजकल उपलब्ध नहीं। इसी प्रकार वार्षगण्य, जैगीषव्य तथा विन्ध्यवास आदि दर्शन के आचार्यों के मत का उल्लेख यत्र-तत्र मिलता है, परन्तु इनके मूल ग्रन्थों का पता नहीं। सांख्य-प्रणेता के बाद सांख्य दर्शन के इतिहास में सबसे प्रसिद्ध नाम है ईश्वर कृष्ण का। इनके ग्रन्थ का नाम ‘सांख्यकारिका’। यह सांख्यकारिका सांख्य दर्शन के वर्तमान ज्ञान की आधारशिला है। इस ग्रन्थ में 70-72 कारिकायें हैं। ये करिकायें संक्षिप्त तथा सरगर्भित होने के कारण अत्यन्त लोकप्रिय हैं। इनकी लोकप्रियता तो इन लिखी गई टीकाओं से पता चलता है। सांख्यकारिका पर माठर-वृित्त, गौड़पादभाश्य, जयमंगला; सांख्य तत्त्वकीमुदी तथा युक्तिदीपिका आदि कई प्राचीन टीकायें है। इनके अतिरिक्त ‘सांख्यतरूवसन्त’, सांख्यचन्द्रिका एवं तत्त्वप्रभा आदि अर्वाचीन टीकायें भी प्रसिद्ध हैं। सभी टीकाओं में तत्व कौमुदी तथा युक्ति दीपिका अधिक पठन-पाठन में हैं। 

इनके अतिरिक्त भी सांख्य दर्शन के कई महत्पवूर्ण ग्रन्थ हैं, जैसे अनिरुद्ध की सांख्यसूत्रवृति, महादेव का सांख्य सूत्र विस्तार, नागेश की लघुसंख्या सूत्रवृति, विज्ञानभिक्षु का सांख्यप्रवचनभाष्य तथा सांख्यसार आदि। संस्कृत के अतिरिक्त अंग्रेजी और हिन्दी में भी सांख्यदर्शन पर अनेक प्रमाणिक ग्रन्थ उपलब्ध हैं।

सांख्य दर्शन परिचय

सॉख्य दर्शन के प्रणेता कपिल है यहॉ पर सांख्य शब्द अथवा ज्ञान के अर्थ में लिया गया है सांख्य दर्शन में प्रकृति पुरुष सृष्टि क्रम बन्धनों व मोक्ष कार्य कारण सिद्धान्त का सविस्तार वर्णन किया गया है इसका संक्षेप में वर्णन इस प्रकार है।

प्रकृति

साख्य दर्शन में प्रकृति को त्रिगुण को इन तीन गुणों को सम्मिलित रूप से त्रिगुण की संज्ञा दी गयी सांख्य दर्शन में इन तीन गुणों कों सूक्ष्म तथा अतेन्द्रिय माना गया सत्व गुणो का कार्य सुख रजोगुण का कार्य लोभ बताया गया सत्व गुण स्वच्छता एवं ज्ञान का प्रतीक है यह गुण उध्र्वगमन करने वाला है। इसकी प्रबलता से पुरूष में सरलता प्रीति,श्रदा,सन्तोश एवं विवेक के सुखद भावो की उत्पत्ति होती है।

रजोगुण दुख अथवा अशान्ति का प्रतीक है इसकी प्रबलता से पुरूष में मान,मद,द्वेश,तथा क्रोध भाव उत्पन्न होते है।

तमोगुण दुख एवं अशान्ति का प्रतीक है यह गुण अधोगमन करने वाला है तथा इसकी प्रबलता से मॅुह की उत्पत्ति होती है इस मोह से पुरुष में निद्वा तन्द्वा प्रसाद,आलस्य,मुर्छा,अकर्मण्यता अर्थवा उदासीनता के भाव उत्पन्न होते है सॉख्य दर्शन के अनुसार ये तीन गुण एक दूसरे के विरोधी है सत्व गुण स्वच्छता एवं ज्ञान का प्रतीक है तो वही तमो गुण अज्ञानता एवं अंधकार का प्रतीक है रजो गुण दुख का प्रतीक है तो सत्व गुण सुख का प्रतीक है परन्तु आपस मे विरोधी होने के उपरान्त भी ये तीनों गुण प्रकृति में एक साथ पाये जाते है साख्य दर्शन में इसके लिए तेल बत्ती व दीपक तीनो विभिन्न तत्व होने के उपरान्त भी एक साथ मिलकर प्रकाश उत्पन्न करते है ठीक उसी प्रकार ये तीन गुण आपस मे मिलकर प्रकृति मे बने रहते है

पुरूष

सॉख्य दर्शन प्रकृति और पुरुष की स्वतन्त्र सत्ता पर प्रकाश डालता है प्रकृति जड एवं पुरुष चेतन है । यह प्रकृति सम्र्पूण जगत को उत्पन्न करने वाली है पुरुष चेतन्य है परम तत्व आत्मा तत्व है यह पुरुष समस्त ज्ञान एवं अनुभव को प्राप्त करता है प्रकृति एवं प्राकृतिक पदार्थ जड होने के कारण स्वयं अपना उपभोग नहीं कर सकते इनका उपभोग करने वाला यह पुरुष प्रकृति के पदार्थ इस पुरुष में सुख दुख की उत्पत्ति करते है जब इस पुरुष को ये पदार्थ प्राप्त होते है तब यह सुख का अनुभव करता है परन्तु जब ये पदार्थ दूर होते है तब यह पुरुष दुख की अनुभूति करता है। साख्य दर्शन उन आध्यात्मिक स्वभाव के ज्ञानी पुरुषों पर भी प्रकाश डालता है जो सदैव इन दुखों से परे रहकर मोक्ष की इच्छा करते है

सृष्टि क्रम

साख्य दर्शन में सृष्टि क्रम पर प्रकाश डाला गया है तथा प्रकृति से सवप्रथम महतत्व अथवा बुद्धि की उत्पत्ति, तत्पश्चात अहंकार की उत्पत्ति एवं सात्विक, राजनैतिक एवं तामसिक अहंकार के रूप में अहंकारो के तीन भेद करते हुए सात्विक अहंकार से मन की उत्पत्ति के क्रम को समझाया गया। इसी से ही ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियो की उत्पत्ति को तथा अहंकार के तामसिक भाग से पचंतन्मात्राओं एवं पचं महाभूतो की उत्पत्ति को समझाया गया है । इस प्रकार 24 तत्वों के साथ 25 वे तत्व के रूप में पुरुष तत्व को समझाया गया है। सांख्य दर्शन में वर्णित सृष्टि क्रम को इस प्रकार उल्लेखित किया जा सकता है

प्रकृत़ि+पुरूष 
 महत या बुद्वि
↓ 
 अहंकार 
--------------------------------
丨                                                丨
 (सात्विक)                                          (राजसिक) 
(तामसिक)                                                         
 - 5 ज्ञानेन्द्रिय                                          -5 महाभूत 
 - 5 कमेन्द्रिय                                          -5 तन्मात्रा 
 - 1 मन                                                                   

बंधन एवं मोक्ष

साख्य दर्शन के अनुसार अज्ञानता के कारण पुरुष बंधन में बध जाता है जबकि यह पुरुष ज्ञान के द्वारा मोक्ष को प्राप्त करता हे बंधक में बँधा हुआ पुरुष आध्यात्मिक, अधिभौतिक एवं आधिदैविक दुखों से ग्रस्त रहता है में और मेरे भाव से युक्त होकर पुरूष इस बंधक में फस जाता है परन्तु जब पुरुष का विवेक ज्ञान जाग्रत होता है ज्ञानरूपी प्रकाश जब उसका अज्ञानतारूपी अन्धकार समाप्त हो जाता है। इस अवस्था वह विशुद्ध चैतन्य (परमात्मा)का स्वरूप ग्रहण करने लगता है इसे ही मुक्ति एवं कैवल्य की संज्ञा दी गयी है

सांख्य दर्शन में योग का स्वरूप

योग का अर्थ परमतत्व (परमात्मा )को प्राप्त करना है इसलिए दर्शनों में भिन्न-भिन्न मार्गों का उल्लेख किया गया है सांख्य दर्शन में पुरुष का उद्देश्य इसी परमतत्व को प्राप्त करना कहा गया है तथा परमात्मा प्राप्ति की अवस्था को मोक्ष, मुक्ति, एवं कैवल्य की संज्ञा दी गयी है जिस प्रकार योग दर्शन में पंचक्लेशो का वर्णन किया गया है तथा अविद्या,अस्मिता,राग,द्वेश व अभिनिवेश नामक इन पॉच क्लेशों को मुक्ति के मार्ग में बाधक माना गया है ठीक उसी प्रकार अज्ञानता को सांख्य दर्शन में मुक्ति में बाधक माना गया तथा इसके विपरीत ज्ञान को सॉख्य दर्शन में मुक्ति का साधन माना गया अज्ञानता के कारण मनुष्य इस प्रकृति के साथ इस प्रकार जुड जाता है कि वह स्वयं में एवं प्रकृति में भेद ना कर पाना ही इसके बंधन का कारण है सांख्य दर्शन का मत है कि यद्यपि पुरुष नित्य मुक्त है अर्थात स्वतन्त्र है। परन्तु वह अज्ञानता के कारण स्वयं को अचेतन प्रकृति ये युक्त समझने लगता है इस कारण वह दु:खी होता है तथा भिन्न-भिन्न प्रकार की समस्याओं से घिरता है बन्धनों से युक्त होता है किन्तु आगे चलकर जब यह पुरूष ज्ञान प्राप्त करता हो तब वह अपने स्वरूप को पहचानने में सक्षम होता है और अनेक स्वरूप प्रकृति के स्वरूप भिन्न जानने में समर्थ होता है। तभी वह इस बंधन से मुक्त होता है यह में नहीं हूँ

अर्थात में अचेतन विषय नहीं हूँ में जड नहीं हूँ, में अन्त: करण नहीं हूँ यह मेरा नहीं है मैं अहंकार से रहित हूँ मैं अहंकार भी नहीं हूँ जब साधक साधना के माध्यम से इक ज्ञान की प्राप्ति करता है तब से उसकी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है तथा इसी के माध्यम सक वह कैवल्य की प्राप्ति करता है।

सांख्य दर्शन में ज्ञान के माध्यम से पुरुष का अपने स्वरूप को जानकर प्रकृति से पृथक हो जाना है कैवल्य कहा गया है जिसे महर्षि पतंजलि योग दर्शन में वर्णित करते है।

सांख्य दर्शन के सिद्धांत

कार्य कारण के सिद्धान्त

प्राय: सभी भारतीय दार्शनिक कारण-कार्य का सम्बन्ध अनिवार्य मानते हैं। तन्तु से ही पट की उत्पत्ति होती है, मृत्तिका से ही घट उत्पन्न होता है, अग्नि से ही दाह होता है, भोजन से ही तृप्ति होती है, अन्यथा नहीं। इस प्रकार कारण और कार्य का सम्बन्ध अन्वय-व्यतिरेक से है, अन्यथा नहीं। इस प्रकार कारण और कार्य का सम्बन्ध अन्वय-व्यतिरेक से सिद्ध माना गया है। कारण से कार्य तथा कारण के अभाव में कार्य का भी अभाव स्वीकार किया है। कोई भी घटना अकारण या अकस्मात् नहीं होती। इसी सिद्धान्त के आधार पर हम किसी कार्य का अवलोकन कर उसके कारण का अनुमान अवश्य ही करते हैं। सामान्यत: यही कार्यकारण का अविनाभाव या अनिवार्य सम्बन्ध कहलाता है। सत्कार्यवाद का विवेचन-

असदकारणादुपादानग्रहणात् सर्वसम्भवाभावत्।

शक्तस्य शक्यकरणात् कारणभावाच्च सत्कार्यम्।।

सांख्यकारिका-9

कारण से ही कार्य होता है, परन्तु कार्य के स्वरूप के सम्बन्ध में मतभेद है। प्रश्न यह है कि कार्य की उत्पत्ति आविर्भाव है या आरम्भ ? पूर्व विद्यमान वस्तु की उत्पत्ति होती है या अविद्यमान वस्तु की, सत् कारण से असत् कार्य उत्पन्न होता है या सत् कारण से सत् कार्य उत्पन्न होता है ? प्रथम पक्ष (असत्कार्यवाद) न्यायवैशेषिक का है और दूसरा पक्ष (सत्कार्यवाद) सांख्ययोग का है। असत्कार्यवादी उत्पत्ति के पूर्व कारण में कार्य की सत्ता नहीं मानते। अत: इनके अनुसार कार्योत्पित्त आरम्भ है, दोनों में भेद है। यदि कार्य कारण में उत्पत्ति के पूर्व विद्यमान रहता तो उत्पन्न होने का अर्थ क्या ? यदि पट तन्तु में ही उत्पत्ति के पूर्व विद्यमान हैं तो तन्तु में पट की उपलब्धि क्यों नहीं होती ? अर्थात् तन्तु में ही पट का प्रत्यक्ष होना चाहिए।

यदि तन्तु में पट, मृत्तिका में घट (कार्य) उत्पत्ति के पूर्व भी विद्यमान है तो निमित कारण या कारण-व्यापार की क्या आवश्यकता ? अर्थात् जुलाहा और कुम्हार का (वेमा और दण्ड व्यापार का) कोई प्रयोजन नहीं । यदि पट केवल तन्तु का रूपान्तर है, तन्तु अनभिव्यक्त तन्तु है तो अभिव्यक्ति या रूपान्तर ही नये कार्य का सूचक है, आरम्भ का द्योतक है, कार्य कारण में भेद का परिचायक है।

सांख्य दर्शन में असत् कार्यवाद का खण्डन तथा सत्कार्यवाद का मंडन किया गया है। सत्कार्यवाद की सिद्धि के लिए निम्नलिखित तर्क दिये जाते हैं।

(क) असत् कारणाम् – यदि कारण को असत् मानते हैं तो कार्य की उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि असत् से सत् की उत्पत्ति असम्भव है। बालू से तेल नहीं निकलता क्योंकि बालु के कणों में तेल का अभाव है। अत: अभाव (असत्) से भाव (सत्) की उत्पत्ति नहीं हो सकती। उत्पत्ति तो अभिव्यक्ति मात्र हैं। तिलों में तेल अनभिव्यक्ति अवस्था में है, धान में चावल, गोदोहन के पूर्व गाय के दुध आदि अनभिव्यक्त अवस्था में विद्यमान रहते हैं। असत् वस्तु की उप्पत्ति का उदाहरण नहीं मिलता । यदि कार्य असत् होता तो कारण-व्यापार की क्या अवश्यकता ? अत: जिस प्रकार कारण व्यापार के पश्चात् कार्य सत् है उसी प्रकार उसके पूर्वभी सत् नहीं है ।

(ख) उपादानग्रहणात् – किसी कार्य की उत्पत्ति के लिए उपादान-करण की आवश्यकता होती है । यदि कार्य असत् है तो उपादान करण की आवश्यकता क्या है ? मृत्तिका से घट बनता है। यदि घट (कार्य) असत् है तो मृत्तिका की आवश्यकता क्या ? अत: उपादान कारण के ग्रहण करने से कार्य की सत्ता सत् सिद्ध होती है। इससे कार्य की सत्ता सत् सिद्ध होती है। तात्पर्य यह है कि कार्य के साथ कारण का सम्बन्ध है। उत्पत्ति से पूर्व भी कार्य कारण से सम्बद्ध रहता है। असम्बद्ध वस्तुओं से उत्पत्ति नहीं देखी जाती । मृित्त्ाका से पटोत्पित्त्ा नहीं होती, क्योंकि दोनों असम्बद्ध है। अत: कार्य से सम्बद्ध होकर ही कारण कार्य का जनक होता है। यह सम्बन्ध कार्य को असत् मानने पर नहीं हो सकता।

(ग) सर्वसम्भवाभावत् – सभी कार्य सभी कारण से उत्पन्न नहीं होते। बालू से तेल नहीं निकलता। सुवर्ण से सुवर्ण के आभूषण से बनते हैं, चाँदी से नहीं। यदि कारण-असम्बद्ध कार्य की उत्पत्ति स्वीकार कर लिया जाय तो सभी कार्य सभी कारणों से उत्पन्न होने लगेगें तथा कारण-विशेष से कार्य-विशेष की उत्पत्ति असम्भव हो जायेगी।

(घ) शक्तस्य शक्यकरणात् – वही कारण उस कार्य को उत्पन्न कर सकता है जिसके लिए वह शक्त या समर्थ हो। बालू में तेल उप्पन्न करने की शक्ति नहीं, परन्तु तिल सामर्थ है। अत: तिल से तेल की उत्पत्ति होती है। दूसरे शब्दों में, शक्त कारण से ही शक्य कार्य की उत्पत्ति होती है। मृित्त्ाका से घट तथा तन्तु से पट बनता है, क्योंकि मृत्तिका घटोत्पत्ति में समर्थ है। इस क्षमता या सामथ्र्य का अनुमान हम कार्य को देखकर ही कर सकते हैं। अत: कार्य सत् है, क्योंकि सत् कार्य से ही शक्त करण का अनुवाद होता है।

(ड़) कारणभावाच्च- कारण और कार्य में अभेद सम्बन्ध है। कार्य केवल कारण का रूपान्तर है। कारण कार्य की अव्यक्तावस्था है तथा कार्य कारण की व्यक्तावस्था है। दोनों में केवल अवस्थाभेद है। कार्य उत्पत्ति के पूर्व भी सत् है क्योंकि वह कारण रूप ही है। दोनों में अभेद-सम्बन्ध है। तन्तु और पट में अभेद है, क्योंकि पट तन्तु को अवस्था-विशेष है। तन्तु और पट में उपादान-उपादेय भाव है। यह भाव दो अभिन्न पदार्थों में ही सम्भव है। दूसरी बात यह है कि तन्तु और पट में परस्पर संयोग विभाग का अभाव है। संयोग विभाग दो विभिन्न वस्तुओं में सम्भव है, अभिन्न वस्तुओं में नहीं। तीसरी बात यह है कि तन्तु और पट का परिणाम तुल्य है। दो विभिन्न वस्तुओं के परिणाम में भेद अवश्य होगा, परन्तु इन दोनों का परिणाम तुल्य है, क्योंकि इनमें अभेद है ।

एतद् विवरण से स्पष्ट है कि कार्य सत् है तथा वह अपनी उत्पत्ति पूर्व भी कारण में विद्यमान है। कारण-कार्य में भेद नहीं अभेद सम्बन्ध है। यही सत्यकार्यवाद का स्वरूप है। सत्यकार्यवाद भी दो प्रकार का है – परिणामवाद और विवर्त्तवाद। परिणामवाद के अनुसार रूपान्तर सत् है, यही सांख्य का मत है। सांख्य के अनुसार प्रकृति गुणों की साम्यावस्था है। प्रकृति का गुणों में रूपान्तर सत् है। दूसरे मत विवर्त्तवाद के अनुसार कारण का कार्य रूपान्तर विवर्त्त, आभासमात्र है। उदाहरणार्थ, रज्जु का सर्प में, शुक्ति का रजत में, ब्रह्म का जगत् में रूपान्तर केवल आभास है, विवर्त्त है। यह अद्वैत वेदान्त का मत है।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं। मैंने अपनी पुस्तकों के साथ बहुत समय बिताता हूँ। इससे https://www.scotbuzz.org और ब्लॉग की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

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