वेदों का महत्व

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वैदिक लोगों के आर्थिक और सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन हो रहे थे । पशु-चारण व्यवस्था धीरे-धीरे कृषि अर्थव्यवस्था द्वारा विस्थापित होती जा रही थी, जो नियमित खेती और शिल्प तथा व्यापार के विकास पर आधारित थी । जनजातियों का बटवारा हुआ और वस्तुत: हमें एक सम्पूर्ण वर्ण-व्यवस्था देखने को मिलती है । इस समय में राजतंत्रीय साम्राज्यों का भी उदय हुआ । आर्थिक उत्पादन की वृद्धि ने लोगों के एक वर्ग को इसका अवसर दिया कि वे अपना जीवन पूरी तरह शिक्षा और दार्शनिक चितंन में लगा है ।

इस समय बहुत से ग्रंथो की रचना हुई । लिखने की कला क्योकि बहुत बाद में विकसित हुई, अत: ज्यादातर आरंभिक साहित्य मौखिक रूप में रचा गया । ये ग्रन्थ विद्यार्थियों को कठंस्थ करवाये जाते थे  आरै इस तरह से अगली पीढियो तक चले जाते थे । हमें इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए की ज्यादातर आरंभिक साहित्य पद्य अर्थात् स्त्रोत या मंत्रों के रूप में रचा गया । इसी कारण से आरम्भिक ग्रन्थ चार वेद संहिता (स्त्रोतों का संग्रह) कहलाते है ।

जैविक साहित्य में मुख्यत: धार्मिक अनुष्ठानों और दर्शन की चर्चा है, किन्तु हमें यह महत्वपूर्ण सामाजिक संस्थानों जैसे वर्ण और आश्रम पद्धतियों के बारे में भी बताते है ।

वैदिक साहित्य

चार संहिताएँ यानी ऋग्वेद, सामवेद, यर्जुवेद और अथर्ववेद संहिताएँ वैदिक लोगों द्वारा रचित सबसे शुरू के ग्रन्थ है ।

इनमें से भी ऋग्वेद की रचना सबसे पहले हुई थी । ऋग्वेद दस अध्यायों या पुस्तकों में विभाजित है, जिन्हें मंडल कहते हैं । इन मंत्रों की रचना वैदिक ऋषियों ने एक लम्बे काल में की है । सम्भवत: दो से सात मंडलो की रचना एक, आठ, नौ और दस मण्डलों की तुलना में पहले हुई थी । ऋग्वेद के मंत्र आरम्भिक वैदिक लोगों की गायों, घाड़ों और भाजन जैसे भौतिक उपलब्धियों संबंधी दैनिक इच्छाओं की सरल अभिव्यक्ति थी । कभी-कभी उनमें युद्ध में विजय, वर्षा या सन्तान के लिए प्रार्थनाएं भी आती है । ये इन्द्र, अग्नि, वरूण और सूर्य जैसे ऋग्वैदिक देवताओं को सम्बोधित है । इस तरह हमें ऋग्वेद से आरम्भिक वैदिक लोगों के धार्मिक विश्वासों और सामाजिक तथा आर्थिक जीवन के बारे में पता चलता है । उदाहरणार्थ बहुत से बेटों के लिए प्रार्थना परिवार में पुरूष-शिशु की महत्ता का संकेत देती है ।

सामवेद की रचना उत्तर वैदिक काल में हुई थी । इसमें ऋग्वेद के उन हिस्सों का संकलन है, जो यज्ञ के दौरान गाये जाने के लिए रचे गये थे । क्योंकि सामवेद में सामान्यत: ऋग्वेद के मंत्रों का ही संकलन है, अत: इसका साहित्यिक और ऐतिहासिक महत्व व्यवहारत: शून्य है । सामवेद का महत्व इसकी लय या संगीतात्मकता में है, जिसे जादुई शक्ति से मुक्त माना जाता है।

यजुर्वेद हमारे तक दो रूपों में आया है- शुक्ल यजुर्वेद और कृष्ण यजुर्वेद । दोनों में अंतर यह है कि पहले में जहा  वजु (इसी के यजुर्वेद नाम निकला है) नामक मंत्र है, वहीं दूसरे में यज्ञ से सम्बन्धित अनुष्ठानों पर चर्चा संकलित है । अथर्वदे की रचना सबसे बाद में हुई थी । इसमें मुख्यत: उन प्राचीन जादुई मंत्र का संग्रह है, जिनकी रचना किसी बीमारी के इलाज से लेकर प्रेमपात्र के हृदय को जीतने तक की विभिन्न इच्छाओं की पूर्ति के लिए हुई थी । वैदिक लोगों ने इनमें से कुछ विचारों और विश्वासों को देशीय लोगों से ग्रहण किया होगा, जिनके निकट सांस्कृतिक सम्पर्क में वे आये थे ।

वैदिक साहित्य का अगला रूप ब्राम्हण ग्रन्थ है । ये गद्य में लिखे गये हैं और चार वेदों पर टिप्पणियों के रूप में है । कुछ ब्राम्हण ग्रन्थ है- ऐतरेय,कौष्टकी, जैमिनीय, शतपथ और तैत्तिरीय।

ब्राम्हण ग्रन्थों के निष्कर्षात्मक हिस्से या परिशिष्ट आरण्यक कहलाये । सम्भवत: उनकी विषय-वस्तु इतनी महत्वपूर्ण थी कि उनका संकलन और अध्ययन जंगलों में ही हो सकता था । इसमें मुख्यत: यज्ञ के अनुष्ठानों के रहस्यों से संबंधित विषयों पर चर्चा है । ये इन अनुष्ठानों की दार्शनिक व्याख्या करते हैं ।

धर्म और पुरूषार्थ की वैदिक संकल्पना

धर्म से हमारा तात्पर्य मुख्यत: पूजा-पाठ आदि से होता है । लेकिन वैदिक साहित्य में इसका प्रयोग अधिकतर कर्तव्य और नैतिक उत्तरदायित्व के अर्थ में हुआ है । यह उस कानून या नियमों की ओर भी संकेत करता है जो समाज में व्यक्ति के आचरण को नियंत्रित करते हैं । वह शब्द ‘‘धृ’’ धातु से बना है, जिसका अर्थ- संरक्षण, सुरक्षा और साथ रखना । इसलिए धर्म का अर्थ सामाजिक संगतता के प्रोत्साहन से समाज को एक बनाये रखना ।

आचरण के नियमों के अर्थ में धर्म अनेक प्रकार का हो सकता है, जैसे देश धर्म या देश के प्रति कर्तव्य और वर्ण धर्म (विभिन्न जातियों के सदस्यों) के लिए निर्धारित व्यवहार नियम । हालांकि विभिन्न परिस्थितियों तथा जीवन के क्षेत्रों के कारण भिन्न-भिन्न व्यवहार नियम निर्धारित किये गये है, लेकिन सत्य, अहिंसा और दया जैसे कुछ नीति-सिद्धान्तों का पालन भी सभी के लिए जरूरी था । इन्हें साधारण धर्म कहा जाता था ।

धर्म के स्त्रोत वेद, शिष्टाचार (धर्मनिष्ठ व्यक्तियों का व्यवहार) व्यवहार (किसी देश का समाज में मान्य परम्पराए और रीतिरिवाज) और आत्म-संतोष अर्थात आत्मा द्वारा अनुमोदित व्यवहार माने जाते है । प्राचीन ऋषियों के अनुसार अच्छे या बुरे कर्मो के निर्धारण में आत्मा की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है । वैदिक ऋषियों ने चार पुरूषार्थो का निर्धारत किया था, धर्म (सही व्यवहार), अर्थ (जीवन यापन के प्रयत्न), काम (सभी प्रकार की इच्छाएं) और मोक्ष (अन्तिम लक्ष्य मुक्ति) । इस प्रकार प्राचीन ऋषियों ने जीवन को बहुत क्रियात्मक बना दिया था और ऐसे मार्गो का अनुमोदन किया था जिसके अनुपालन से भौतिक संसार में रहते हुए भी व्यक्ति अन्तिम लक्ष्य-मुक्ति की आशा रख सकता था । उनके अनुसार, हालांकि समाज की रक्षा के लिए अर्थ और काम का अनुपालन अनिवार्य है, किन्तु ये हमेशा धर्म या औचित्य के अन्तर्गत रहने चाहिए ।

वर्ण एवं आश्रम पद्धतियां

व्यक्ति को चार पुरूषार्थो के अनुपालन में समर्थ बनाने के लिए ऋषियों ने मानव जीवन को चार आश्रम या चरणों में विभाजित किया है, जिनका उल्लेख पिछले पाठ में किया गया है । उन्होंने प्रत्येक आश्रम के लिए विस्तृत आचरण नियमों का भी निर्धारण किया है । चार आश्रम व्यक्ति के जीवन यात्रा के अन्तिम मोक्ष तक के चार चरण थे । वे जैसे एक सीढ़ी के चार चरण थे, जिन्हें पार करने से मोक्ष की प्राप्ति होती थी ।

पहला आश्रम, ब्रम्हचर्य के नाम से जाना जाता है, जिसमें व्यक्ति उपनयन संस्कार या जनेऊ के समारोह के बाद प्रवेश करता था । इस आश्रम के दौरान वह शिक्षा प्राप्त करता था और अपनी इच्छाओं तथा भावनाओं को अनुशासित करना सीखता था । उसे गुरू के साथ उसके आश्रम में रहना होता था और वह गुरू की आज्ञा का पालन व सेवा करता था । उसे अपने तथा गुरू के लिए भिक्षा मांगकर लानी होती थी तथा पानी लाने, आश्रम की सफाई करने जैसे काम भी करने होते थे । उसे सादे जीवन उच्च विचार की धारणा का व्यवहार करना होता था । एक राजकुमार को भी ये सब काम करने होते थे । इस प्रकार ब्रम्हचर्य आश्रम व्यक्ति को घर की जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार करता था ।

गृहस्थ आश्रम व्यक्ति के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण चरण था । इस चरण में वह धर्म के अनुसार अर्थ और काम का व्यवहार करता था । वह विवाह करने, संतानों की प्राप्ति, अपने परिवारपालन के लिए रोजी-रोटी कमाने तथा समाज के प्रति अपने कर्तव्यों के पालन के लिए निर्देशित किया जाता था ।

गृहस्थ के कर्तव्य पूरे करने के बाद वह वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करता था । इस चरण में उसे परिवार त्यागना होता था और जंगल में जाना होता था, जहां उसे सभी सांसारित व्यापारों और रूचियों से अलग होने का अभ्यास करना होता था । वह केवल फल और सब्जियॉं खा सकता था और हिरण की छाल तथा पेड की छाल से बने कपड़े पहन सकता था । उसे समाधि और संयम का अभ्यास करना होता था और यदि इस चरण में उसकी मृत्यु हो जाती थी,तो उसे मोक्ष प्राप्त हो जाता था, अन्यथा वह सन्यास आश्रम में प्रवेश करता था, जहां उसे पूर्ण वैराग्य का अभ्यास करना होता था । समाज के सारे बंधन तोड़कर उसे मोक्ष प्राप्ति के लिए वैरागी का जीवन व्यतीत करना होता था ।

जिस प्रकार आश्रम-धर्म व्यक्ति के सांसारिक जीवन के संदर्भ में कर्तव्य निर्धारित करता है, उसी प्रकार वर्ण-पद्धति उस समाज के संदर्भ में कर्तव्य निर्धारित करती है जिसमें व्यक्ति रहता है ।

ऋग्वैदिक समाज प्रथमत: पशुचरण समाज था । इसमें आर्यो और अनार्यो के बीच केवल एक वर्ग भेद था, दास और दस्यु । भेद का आधार मुख्यत: रंग और वर्ण होता था हालांकि तब आर्य जनजातियों में पुजारी, योद्धा, पशु-पालक और यहां तक कि कुछ शिल्पकार और किसान भी थे, लेकिन समाज में उनका दर्जा समान था और वे अपनी पसन्द का कोई भी व्यवसाय अपना सकते थे । दूसरे व्यवसाय के लोगों के साथ भोजन और विवाह करने के संबंध में कोई प्रतिबंध नहीं थे ।

लेकिन धीरे-धीरे जब आर्य उपजाऊ उत्तरी गंगा घाटी की ओर बढ़े तो उन्होंने खेती करना और स्थिर जीवन बिताना शुरू कर दिया । अब उन्होंने अपने परम्परागत धन्धों में विशेषज्ञता प्राप्त करनी शुरू कर दी और यहां तक कि वे विवाह भी केवल अपने व्यवसाय के लोगों के साथ ही करने लगे । भोजन और विवाह संबंधी ये प्रतिबंध और कड़े होने लगे जैसे-जैसे वैदिक लोग बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों के संपर्क में आने लगे । हालांकि स्थानीय लोगों को भी वैदिक समाज में स्वीकार किया गया, लेकिन शुद्र कहा गया । उन्हें समाज में सबसे निचला दर्जा दिया गया । उनसे निकट सम्पर्क बनाने के लिए उसके साथ विवाह और भोजन रोक दिये गये ।

उत्तर वैदिक काल में चार-वर्ण ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र व्यवसाय और जन्म के आधार पर स्पष्टत: विभेदित किये जाने लगे । इसके बाद इनका निर्धारण केवल जन्म के आधार पर होने लगा । समाज के सुचारू संचालन के लिए विभिन्न वर्ण के सदस्यों के लिए भिन्न कर्तव्य और काम निर्धारित किये गये ।

ब्राम्हणों का मुख्य काम था वेदो का अध्ययन, अध्यापन, यज्ञ करना और पुरोहिती काम करना । उन्हें धर्म का पालन भी करना होता था और अन्य लोगों से दान तथा दक्षिणा स्वीकार करनी होती थी । क्षत्रियों को अध्ययन और यज्ञ करना हेाता था, ब्राम्हणों और अन्य जरूरतमंदों को दान देना होता था और लोगों की रक्षा करनी होती थी । यज्ञ और दान करने के साथ-साथ वैश्यों का मुख्य काम वर्त का पालन करना था । वर्त का अर्थ है आर्थिक काम जैसे पशु-पालन, खेती, शिल्प और व्यापार । इस तरह वैश्य उत्पादकों के वर्ग के प्रतिनिधि थे । समाज का आर्थिक विकास और स्थिरता उनकी कड़ी मेहनत और कर्तव्य के प्रति समर्पण पर निर्भर थी । लेकिन क्योंकि उनके आर्थिक काम की प्रकृति काम की प्रकृति में शारीरिक श्रम शामिल था और वह उन्हें शूद्रों के निकट सम्पर्क में ले आया, अत: वैश्यों को भी ब्राम्हणों और क्षत्रियों की तुलना में निचला सामाजिक दर्जा मिलने लगा । आर्थिक कार्यो की बौद्धिक और प्रशासनिक प्रकृति के कारण ब्राम्हण और क्षत्रिय समाज में ऊचे दर्जा हथियाने लगे ।

इस प्रकार वैदिक काल में जन्मी वर्ण व्यवस्था तत्कालीन सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों का परिणाम थी । हालांकि बाद के समय में यह व्यवस्था विकृत होकर रूढ़ हो गई और इसने सामाजिक असमानता और अछूत जैसी बुराइयों को जन्म दिया, लेकिन आरम्भ में वर्ण व्यवस्था का लक्ष्य समाज में अन्तनिर्भरता, आपसी सहयोग और सामान्य भाई चारे को प्रोत्साहन देना था । समाज के विभिन्न सदस्यों के कर्तव्यों और कामों के स्पष्ट और पृथक निर्धारण से इसने सभी संभावित संघर्ष को दूर करने की चेष्टा की ।

वैदिक साहित्य में धर्म का अर्थ है आचरण के नियम, न कि मात्र पूजा-पाठ आदि । वैदिक ऋषियों ने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को चार पुरूषार्थो के रूप में निर्धारित किया । व्यक्ति के जीवन को चार आश्रमों में विभाजित किया गया- ब्रम्हचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास । व्यवसाय और जन्म के आधार पर चार वर्णो का बटवारा हुआ ।

वैदिक दर्शन की शाखाएं

ऋग्वैदिक लोगों का धर्म सरल था । इसमें मुख्यत: स्त्रोतों और यज्ञों के रूप में प्रार्थनाएं शामिल है. जो प्रकृति के विभिन्न चमत्कारों के प्रतिनिधि देवताओं को समर्पित की जाती थी । उत्तर वैदिक काल में ही खुद या आत्मा की सच्चाई प्रकृति और अंतरिक्ष के सिद्धांतो या अंतिम वास्तविकता के प्रतिनिधि ब्रम्हा के बारे में निश्चित विचार और दर्शन विकसित हुए । उपनिषदों में ब्रम्हा को सर्वव्यापी और सर्वज्ञ माना गया है । ब्रम्हा को सामान्य मनुष्य द्वारा नहीं समझा जा सकता । वैदिक दार्शनिकों के अनुसार ब्रम्हांड एक दृष्टिभ्रम या माया है, जो ब्रम्हा और वरूक्ति या आत्मा के बीच परदा बनकर आती है । जब तक व्यक्ति इस सत्य को जान नहीं लेता, उसे जन्म-मरण के चक्र में आते रहना पड़ता है । इसे आत्मा के पुनर्जन्म का सिद्धांत कहा जाता है ।

इस सिद्धांत से जुडा हुआ दूसरा विचार कर्म का है । ऐसी मान्यता है कि पिछले जन्म के कर्म अगले जन्म को नियंत्रित और निर्धारित करते है । इसलिए उसके लिए यह जरूरी है कि वह इस जन्म में अच्छे कर्म करें, जिससे कि अगले जन्म में उसकी दशा और सामाजिक दर्जा सुधरे । ज्ञान की उपलब्धि से व्यक्ति इस पुनर्जन्म के चक्र से छूटकर ब्रम्हा में जीन हो सकता है यानी वह मोक्ष प्राप्त कर सकता है ।

इन वैदिक दार्शनिक संकल्पनाओं ने आगे चलकर छ: विभिन्न दर्शनों को जन्म दिया, जो षट्दर्शन कहलाये । ये सभी वेदो की सत्ता को स्वीकारते है अत: पुरातनपंथी पद्धतियों के रूप में व्याख्यायित होते है । परन्तु इन सभी ने उपनिषदों के मूल सिद्धांतों का विभिन्न तरीकों से विकास का प्रयास किया और मोक्ष प्राप्ति के विभिन्न उपाय बताये । ये छ: शाखाएं दो-दो के तीन समूहों में विभाजित हैं, जो आपस में संबंधित और पूरक माने जाते है । ये हैं- न्याय और वैषविक, संख्या और योग, मीमांसा और वेदांत ।

वैदिक दार्शनिको की मान्यता थी कि जब तक व्यक्ति आत्मा का ज्ञान प्राप्त नहीं कर लेता । अंतिम वास्तविकता के प्रतिनिधि ब्रम्हा से अलग रहता है । मोक्ष प्राप्ति के लिए ज्ञान-प्राप्ति आवश्यक है । वैदिक दार्शनिक संकल्पनाओं से विभिन्न दार्शनिक शाखाओं का जन्म हुआ, जिसे षट्दर्शन कहा जाता है । परिशिष्ट है और विभिन्न अनुष्ठानों की दार्शनिक व्याख्या करते हैं । उपनिषदों अथवा वेदांत में दार्शनिक चर्चाएं है । यह उत्तरी दर्शन का स्त्रोत है ।

धर्म की वैदिक संकल्पना वे कानून का नियम है, जो समाज में व्यक्ति की क्रियाओं को नियंत्रित करते है । धर्म अनेक स्त्रोतों के आधार पर बनाया जाता है । अन्य महत्वपूर्ण संकल्पना चार पुरूषार्थो को थी जो है धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष । पुरूषार्थो के सफलतापूर्वक अनुपालन के लिए ऋषियों ने मानव जीवन का चार अवस्थाओं में विभाजित किया, आश्रम कहलाती है । ये थे- ब्रम्हचर्य, ग्रहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास ।

इसी बीच लोगों के व्यवसायों के आधार पर समाज भी विभाजित हो गया । चार वर्ग सामने आये, ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र में यह विभाजन बहुत रूढ़ और गैर लचीला हो गया। वैदिक दार्शनिक संकल्पनाओं ने षट्दर्शन केवल छ: शाखाओं को जन्म दिया । इन शाखाओं ने मोक्ष प्राप्ति के विभन्न मार्ग अनुमोदित की है ।

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