अथर्ववेद का अर्थ, स्वरूप, शाखाएं

अथर्ववेद का अर्थ

‘अथर्व’ शब्द का अर्थ है अकुटिलता तथा अंहिसा वृत्ति से मन की स्थिरता प्राप्त करने वाला व्यिक्ता। इस व्युत्पत्ति की पुष्टि में योग के प्रतिपादक अनेक प्रसंग स्वयं इस वेद में मिलते है। होता वेद आदि नामों की तुलना पर ब्रह्मकर्म के प्रतिपादक होने से अथर्ववेद ‘ब्रह्मवेद’ कहलाता है ब्रह्मवेद नाम का यही मुख्य कारण है। 

अथर्ववेद का स्वरूप

अथर्ववेद के स्वरूप की मीमांसा करने से पता चलता है कि यह दो धाराओं के मिश्रण का परिणतफल है। इनमें से एक है अथर्वधारा और दूसरी है अिष्रोधारा। अथर्व द्वारा दृष्ट मन्त्र शान्ति पुष्टि कर्म से सम्बद्ध है। इसका संकेत भागवत 3/24/24 में भी उपलब्ध होता है।

अथर्ववेद की शाखाएं

अथर्ववेदीय कौशिक सूत्र के दारिल भाष्य में इने त्रिविध संहिताओं के नाम तथा स्वरूप का परिचय दिया गया हैं इन संहिताओं के नाम है 
  1. आष्र्ाी संहिता 
  2. आचार्य संहिता
  3. विधि प्रयोग संहिता। 
इन तीनों संहिताओं में ऋषियों के द्वारा परम्परागत प्राप्त मन्त्रों के संकलन होने से इस संहिता कहा जाता है। अथर्ववेद का आजकल जो विभाजन काण्ड, सूक्त तथा मन्त्र रूप में प्रकाशित हुआ है इसी शौनकीय संहिता को ही ऋषि-संहिता कहते है। दूसरी संहिता का नाम आचार्य संहिता है जिसका विवरण दारिलभाष्य में इस प्रकार पाया जाता है। 

अथर्व में विज्ञान

अथर्ववेद के भीतर आयुर्वेद के सिद्धान्त तथा व्यवहार की अनेक महनीय जिज्ञास्या बातें भरी हुई हैं, जिनके अनुशीलन से आयुर्वेद की प्राचीनता, प्रामाणिकता तथा व्यापकता का पूरा परिचय हमें मिलता है। रोग, शारीरिक प्रतीकार तथा औषध के विषय में अनेक उपयोगी एवं वैज्ञानिक तथ्यों की उपलब्धि अथर्ववेद की आयुर्वेदिक विशिष्टता बतलाने के लिये पर्याप्त मानी जा सकती है। 

अनेक भौतिक विज्ञानों के तथ्य भी यहाँ यत्र-तत्र बिखरे मिलते हैं। उन्हें पहचानने तथा मूल्यांकन करने के लिए वेदज्ञ होने के अतिरिक्त विज्ञानवेत्ता होना भी नितान्त आवश्यक है। एक दो पदों या मन्त्रों में निगूढ़ वैज्ञानिक रहस्यों का उद्घाटन किया गया है। जिसे वैज्ञानिक की शिक्षित तथा अभ्यस्त दृष्टि ही देख सकती है। एक विशिष्ट उदाहरण ही इस विषय-संकेत के लिए पर्याप्त होगा। अथर्ववेद के पच्चम काण्ड के पच्चम सूक्त में लाक्षा (लाख) का वर्णन है, जो वैज्ञानिकों की दृष्टि में नितान्त प्रामाणिक तथ्यपूर्ण तथा उपादेय है। आजकल राँची (बिहाार) में भारत सरकार की ओर से ‘लाख’ के उत्पादन तथा व्यावहारिक उपयोग के विषय में एक अन्वेषण-संस्था कार्य कर रही है। उसकी नवीन वैज्ञानिक खोजों के साथ इस सूक्त में उल्लिखित तथ्यों की तुलना करने पर किसी भी निष्पक्ष वैज्ञानिक को आश्चर्य हुए बिना नहीं रह सकता। आधुनिक विज्ञान के द्वारा समर्पित और पुष्ट की गई सूक्त-निर्दिष्ट बातें संक्षेप में ये हैं-
  1. लाह (लाख, लाक्षा) किसी वृक्ष का निस्यन्द नहीं है, प्रत्युत उसे उत्पन्न करने का श्रेय कीट-विशेष को (मुख्यतया स्त्री-कीट को) हैं। वह कीट यहाँ ‘शिलाची’ नाम से व्यवहृत किया गया है। उसका पेट लाल रष् का होता है और इसी से वह स्त्री (कीट) संखिया खाने वाली मानी गयी हैं यह कीट अश्र्वस्य, न्यग्रोध, घव, खदिर आदि वृक्षों पर विशेषत: रह कर लाक्षा को प्रस्तुत करता है 4/5/5। 
  2. स्त्री कीट के बड़े होने पर अण्डा देने से पहिले उसका शरीर क्षीण हो जाता है और उसके कोष में पीलापन विशेषत: आ जाता है। इसीलिए यह कीट यहाँ ‘हरिण्यवर्णा’ तथा ‘सूर्यवर्णा’ कही गई है (5/5/6)। इसके शरीर के ऊपर रोंये अधिक होते है। इसीलिए यह ‘लोमश वक्षणा’ कही गई हैं लाह की उत्पत्ति विशेष रूप से वर्षा काल की अँधेरी रातों में होती है और इसी लिए इस सूक्त में रात्रि माता तथा आकाश पिता बतलाया है (1/5/1)। 
  3. कीड़े दो प्रकार के होते हैं-(क) सरा = रेंगनेवाले; (ख) पतत्रिणी = पंखयुक्त, उड़ने वाले (पुरुष कीट)। शरा नामक (स्त्री) कीड़े वृक्षों तथा पौधों पर रेंगते हं ै और इससे वे ‘स्परणी’ कहलाते हैं।

Bandey

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