चिंता क्या है? इसके कारण एवं लक्षणों का विस्तृत वर्णन

चिंता वस्तुत: एक दु:खद भावनात्मक स्थिति होती है। जिसके कारण व्यक्ति एक प्रकार के अनजाने भय से ग्रस्त रहता है, बेचैन एवं अप्रसन्न रहता है। चिंता वस्तुत: व्यक्ति को भविष्य में आने या होने वाली किसी भयावह समस्या के प्रति चेतावनी देने वाला संकेत होता है। हममें से प्रत्येक व्यक्ति अपनी दिन-प्रतिदिन की जिन्दगी में अलग-अलग ढंग से चिंता का अनुभव करता है। 

कुछ लोग छोटी सी समस्या को भी अत्यधिक तनावपूर्ण ढंग से लेते हैं और अत्यधिक चिंताग्रस्त हो जाते है। जबकि कुछ लोग जीवन की अत्यधिक कठिन परिस्थितियों को भी सहजता से लेते है और शान्त भाव से विवेकपूर्ण ढंग से समस्याओं का समाधान करते हैं। वस्तुत: चिंताग्रस्त होना किसी भी व्यक्ति के अपने दृष्टिकोण पर निर्भर करता है।

चिंता से न केवल हमारे दैनिक जीवन के क्रियाकलाप प्रभावित होते हैं, वरन् हमारे निष्पादन, बुद्धिमत्ता, सर्जनात्मकता इत्यादि भी नकारात्मक ढंग से प्रभावित होते है। यह कहा जा सकता है कि अत्यधिक चिंताग्रस्त होने के कारण व्यक्ति का व्यक्तित्व बुरी तरह प्रभावित हो पाता है तथा वह किसी भी कार्य को ठीक ढंग से करने में सक्षम नहीं हो पाता है।

चिंता की परिभाषा

चिंता को अनेक मनोवैज्ञानिकों ने अपने-अपने ढंग से परिभाषित किया है। जिसमें से कुछ प्रमुख निम्न है-

फ्रायड - ‘‘चिंता एक ऐसी भावनात्मक एवं दु:खद अवस्था होती है, जो व्यक्ति के अहं को आलंबित खतरा से सतर्क करता है, ताकि व्यक्ति वातावरण के साथ अनुकूली ढंग से व्यवहार कर सके।’’ 

आरफॅफ - ‘‘प्रसन्नता अनुभूति के प्रति संभावित खतरे के कारण उत्पन्न अति सजगता की स्थिति ही चिंता कहलाती है।’’ 

अमेरिकन साइकेट्रिक एसोशियेशन 2005, एवं बारलोप, 1988 - ‘‘चिंता एक ऐसी मनोदशा है, जिसकी पहचान चििन्ह्त नकारात्मक प्रभाव से, तनाव के शारीरिक लक्षणों लांभवित्य के प्रति भय से की जाती है।’’

बारलोव, 1998‘‘चिंता का अवसाद से भी घनिष्ठ संबंध है।’’ 

आर.अग्रवाल, 2001 - ‘‘चिंता एवं अवसाद दोनों ही तनाव के क्रमिक सांवेगिक प्रभाव है। अति गंभीर तनाव कालान्तर में चिंता में परिवर्तित हो जाता है तथा दीर्घ स्थायी चिंता अवसाद का रूप ले लेती है।’’  

चिंता के प्रकार

 प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक सिगमण्ड फ्रायड ने चिंता के निम्न तीन प्रमुख प्रकार बताये हैं-
  1. वास्तविक चिंता 
  2. तंत्रिकातापी चिंता 
  3. नैतिक चिंता 
स्पीलबर्ग, 1985 ने चिंता के निम्न दो प्रकार बताये हैं-
  1. शीलगुण चिंता 
  2. परिस्थितिगत चिंता 

चिंता के लक्षण

 चिंता के लक्षणों का विवेचन निम्न बिन्दुओं के अन्तर्गत किया जा सकता है-

1. चिंता के दैहिक लक्षण

  1. अत्यधिक शारीरिक थकान
  2. पूरे शरीर में माँसपेशीय तनाव
  3. अत्यधिक पसीना आना
  4. उच्च रक्तचाप
  5. हृदयगति एवं नाहीगति का बढ़ जाना
  6. पेट संबंधी समस्यायें
  7. सिर दर्द
  8. वजन कम होना
  9. हाथ-पैर का ठंडा हो जाना इत्यादि।

2. चिंता के सांवेगिक लक्षण

  1. बेचैन एवं तनावग्रस्त रहना।
  2. उदास एवं निराश
  3. हैरान-परेशान
  4. चिड़चिड़ापन

3. चिंता के संज्ञानात्मक लक्षण

  1. नकारात्मक सोच
  2. भविष्य के बारे में दुःखद कल्पनायें करना।

4. चिंता के व्यावहारात्मक लक्षण

  1. अन्तर्मुखी होना
  2. दूसरे लोगों से अपने आपको छुपाने का प्रयास करना।
  3. नकारात्मक सोच के कारण निर्णय लेने में कठिनाई।
इस प्रकार स्पष्ट है कि चिन्ता न केवल हमारे शरीर वरन् भावनाओं, विचार एवं व्यवहार सभी को अत्यधिक नकारात्मक ढंग से प्रभावित करती है।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं। मैंने अपनी पुस्तकों के साथ बहुत समय बिताता हूँ। इससे https://www.scotbuzz.org और ब्लॉग की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

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