मनोवैज्ञानिक परीक्षण के प्रकार

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क्या आप जानते हैं कि मनोवैज्ञानिक परीक्षण कितने प्रकार के होते हैं?  मनोवैज्ञानिक परीक्षण एक मानवीकृत यन्त्र होता है, जिसमें प्रश्नों अथवा चित्रों या अन्य माध्यमों के द्वारा मनुष्य की विभिन्न मानसिक योग्यताओं जैसे कि बुद्धि, समायोजन क्षमता, स्मृति, अभिवृत्ति, अभिरूचि इत्यादि का मात्रात्मक मापन किया जाता है। कहने का आशय यह है कि मनोवैज्ञानिक परीक्षण के द्वारा प्राणी के व्यक्तित्व के विभिन्न शीलगुणों का मापन होता है। इन्हीं शीलगुणों को मापने के लिये मनोवैज्ञानिकों ने अनेक विधियों का प्रतिपादन किया है, जिन्हें मनोवैज्ञानिक परीक्षण के विभिन्न प्रकार कहा गया। मनोवैज्ञानिक परीक्षण की विभिन्न विधियाँ हैं-
  1. प्रक्षेपी विधियाँ (अप्रत्यक्ष विधि) 
  2. वस्तुनिष्ठ विधियाँ (प्रत्यक्ष विधि) 
तो आइये, सबसे पहले हम चर्चा करते हैं- मनोवैज्ञानिक परीक्षण की प्रक्षेपी विधि क्या हैं? इस विधि द्वारा व्यक्ति की किन-किन योग्यताओं का मापन होता है? इस विधि के अन्तर्गत कौन-कौन से परीक्षण आते हैं तथा किस प्रकार इनको प्रयुक्त किया जाता हैं?

प्रक्षेपी विधियाँ

प्रक्षेपी विधि को ठीक प्रकार से समझने के लिये सबसे पहले प्रक्षेपण के अर्थ को जानना जरूरी है।

प्रक्षेपण शब्द का अर्थ- 

क्या आप जानते हैं कि प्रक्षेपण शबद का सर्वप्रथम प्रयोग किसने किया था? ‘‘सिगमण्ड फ्रायड’’ पहले ऐसे मनोवैज्ञानिक थे जिन्होंने सर्वप्रथम प्रक्षेपण शब्द का प्रयोग एक ‘‘मनोरचना’’ के रूप में किया था। फ्रायड का मत था कि प्रक्षेपण को व्यक्ति रक्षात्मक प्रथम (डिफेंस मैकेनिज्म) के रूप में प्रयुक्त करता है अर्थात्- प्रक्षेपण द्वारा व्यक्ति अपनी अनैतिक, अवांछित असामाजिक इच्छाओं को दूसरे व्यक्तियों पर आरोपित करके अपनी चिन्ता, द्वन्द्व एवं मानसिक संघर्षो का समाधान करता है।

फ्रायड के बाद एल.के. फ्रैंक ने प्रक्षेपण शब्द का प्रयोग और भी व्यापक अर्थ में किया। फ्रैंक के मतानुसार प्रक्षेपण द्वारा व्यक्ति न केवल अपनी अवांछित वरन् वांछित-अवांछित सभी प्रकार की इच्छाओं का आरोपण दूसरों पर करता है। ‘‘प्रक्षेपण प्रक्रिया के द्वारा व्यक्ति अपनी सभी वांछित या अवांछित इच्छाओं तथा प्रेरणाओं को दूसरों पर आरोपित करता है।’’

आजकल ‘‘प्रक्षेपण’’ शब्द का प्रयोग इसी व्यापक अर्थ में किया जाता है। तो अब आप समझ गये होंगे कि मनोविज्ञान में प्रक्षेपण शब्द का प्रयोग किस अर्थ में किया जाता है। प्रक्षेपण शब्द का अर्थ स्पष्अ हो जाने के बाद अब हम चर्चा करते हैं कि ‘‘प्रक्षेपण परीक्षण’’ क्या हैं?

प्रक्षेपी विधि का अर्थ एवं परिभाषा- 

मनोवैज्ञानिक परीक्षण के क्षेत्र में प्रक्षेपण विधि का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। यह परीक्षण की एक अप्रत्यक्ष विधि है। इसमें व्यक्ति या प्रयोच्य के समक्ष कुछ असंगठित तथा अस्पष्ट उद्दीपक उपस्थित किये जाते हैं अथवा ऐसी कोई परिस्थिति दी जाती है। जब प्रयोच्य के सामने ऐसे उद्दीपकों एवं परिस्थितियों को लाया जाता है तो, वह इनके प्रति कुछ-न-कुछ प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। इन परीक्षणों में व्यक्ति जो अनुक्रिया करता है, वह वस्तुत: उसके अचेतन मन में दबी इच्छायें, भावनायें एवं मानसिक संघर्ष होते हैं, जिनको वह दूसरे व्यक्तियों अथवा वस्तुओं पर आरोपित करता है। इस अप्रत्यक्ष विधि से व्यक्ति के व्यक्तित्व एवं उसकी योग्यताओं को समझने में मद्द मिलती है।

इस प्रकार से हम कह सकते है कि प्रक्षेपण विधि व्यक्तित्व शीलगुणों, मानसिक योग्यताओं के मापन की एक अप्रत्यक्ष या परीक्ष विधि है, जिसके एकांश या प्रश्न संगठित एवं स्पष्ट नहीं होते हैं। इन एकांशों के प्रति प्रतिक्रिया व्यक्त करके व्यक्ति अपनी योग्यताओं, शीलगुणों को परीक्ष रूप से अभिव्यक्त करता है। ‘‘प्रक्षेपण विधि’’ को भिन्न-भिन्न मनोवैज्ञानिकों ने अलग-अलग ढंग से स्पष्ट किया है। कुछ प्रमुख मनोवैज्ञानिकों की परिभाषायें निम्नानुसार हैं- ‘‘प्रक्षेपण वह विधि है जिसमें अपने समाज के प्रति व्यक्ति के प्रत्यक्षीकरण या उस समाज में उसके व्यवहार के विशिष्ट ढंगों को प्रकाशित करने के लिये अस्पष्ट, असंरचित, उद्दीपनों या परिस्थितियों का व्यवहार किया जाता है।’’

‘‘प्रक्षेपी विधि’’ पद का सर्वप्रथम प्रतिपादन लारेन्स फ्रैंक ने किया था।

प्रक्षेपी विधि का इतिहास- 

अब हम चर्चा करते हैं, प्रक्षेपी विधि के इतिहास पर। 1400 ए.डी में में लियोनार्डो द विन्सी ने कुछ ऐसे बच्चों का चयन किया, जिन्होंने कुछ अस्पष्ट प्रारूपों में विशिष्ट आकार तथा पैटर्न की खोज की। इस खोज से यह स्पष्ट हुआ कि उन बच्चों में रचनात्मकता का गुण विद्यमान था। इसके बाद सन् 1800 के उततरार्द्ध में बिने ने एक खेल जिसका नाम उन्होंने स्लोटो बताया। के माध्यम से बच्चों की निष्क्रिय कल्पना को मापने का प्रयत्न किया। स्लोटो खेल में बच्चों को कुछ स्याही के धब्बे देकर उनसे पूछा जाता था कि इन धब्बों में उन्हें क्या आकार या प्रारूप दिखाई देता है। इसके उपरान्त सन् 1879 में गाल्टन द्वारा एक परीक्षण का निर्माण किया गया। जिसका नाम था- ‘‘शब्द साहचर्य परीक्षण’’।

केन्ट तथा रोरोजानोफ्फ द्वारा परीक्षण कार्यो में गाल्टन द्वारा निर्मित परीक्षण का प्रयोग किया गया। सन् 1910 में युंग द्वारा नैदानिक मूल्यांकन के लिये इसी प्रकार के परीक्षण का प्रयोग किया गया। इविंग होंस ने बुद्धि मापने के लिये ‘‘वाक्यपूर्ति परीक्षण’’ का उपयोग किया। धीरे-धीरे इन अनौपचारिक प्रक्षेपीय प्रतिधियों ने औपचारिक प्रक्षेपी परीक्षणों को जन्म दिया। जो अपेक्षाकृत अधिक मानकीकृत थे और इनके माध्यम से पहले की तुलना में अधिक अच्छे ढंग से मानसिक योग्यताओं का मापन करना संभव हो सका।

प्रक्षेपी विधि की विशेषतायें- 

  1. अब आपके मन में जिज्ञासा उत्पन्न हो रही होगी कि इन प्रक्षेपी विधियों की प्रमुख विशेषतायें क्या होती हैं? लिण्डजे, 1961 के अनुसार प्रक्षेपी विधियों के स्वरूप का विवेचन निम्न बिन्दुओं के अन्तर्गत किया जा सकता हैं- प्रक्षेपी परीक्षण में ऐसे एकांश होते हैं, जिनके प्रति बहुत सारी अनुक्रियायें उत्पन्न हो पाती है। 
  2. प्रक्षेपी विधि द्वारा व्यक्तित्व के अनेक पहलुओं का मापन किया जाना संभव होता है। 
  3. प्रक्षेपी विधि व्यक्ति के अचेतन मन में छिपी हुयी इच्छाओं, प्रेरणाओं को उत्तेजित करती है। 
  4. प्रक्षेपी विधि में एकांशों के प्रति प्रयोज्यों द्वारा जो प्रतिक्रियायें व्यक्त की जाती है उनका अर्थ प्रयोज्य को मालूम नहीं होता है। 
  5. प्रक्षेपी विधि में व्यक् िके सामने असंगठित एवं अस्पस्ट परिस्थितियों एवं उद्दीपकों को उपस्थित किया जाता है। 
  6. इन विधियों के माध्यम से व्यक्तित्व की एक संगठित तथा सम्पूर्ण तस्वीर सामने आती है। 
  7. इन विधियों द्वारा अधिक मात्रा में जटिल मूल्यांकन तथ्य एवं आँकड़ें एकत्रित किये जाते हैं। 
  8. इन विधियों द्वारा व्यक्ति में स्वप्न चित्र उत्पन्न होते हैं। 
  9. इन विधियों में किसी भी अनुक्रिया को सही अथवा गलत नहीं माना जाता हैं। 

प्रक्षेपी विधि के प्रकार- 

मनोवैज्ञानिकों ने प्रक्षेपी विधि के अनेक प्रकार बताये हैं। इस वर्र्गीकरण का आधार है- परीक्षण में प्रयुक्त किये जाने वाले उद्दीपक, परीक्षण के निर्माण एवं क्रियान्वयन का तरीका, उद्दीपकों के प्रति व्यक्त की गई अनुक्रिया इत्यादि। इन विभिन्न वर्गीकरणों में लिण्डले द्वारा प्रक्षेपी विधियों का जो विभाजन किया गया, वह अधिक मान्य एवं लोकप्रिय है। इन्होंने प्रक्षेपी विधियों को अनुक्रियाओं की कार्यो के आधार पर निम्न पाँच भागों में वर्गीकृत किया-
  1. साहचर्य परीक्षण 
  2. संरचना परीक्षण 
  3. पूर्ति परीक्षण 
  4. चयन या क्रम परीक्षण 
  5. अभिव्यंजक परीक्षण 

साहचर्य परीक्षण- 

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस परीक्षण के अन्तर्गत प्रयोज्यों को जो उद्दीपक दिखलाये जाते है, ये अस्पष्ट होते हैं। इन अस्पष्ट उद्दीपकों को देखकर प्रयोज्य को यह बताना होता है कि उसमें उसे क्या चीज दिखाई दे रही है अथवा किस वस्तु व्यक्ति, परिस्थिति, घटना इत्यादि से वह उस उद्दीपक को साहचर्चित कर रहा है। इस श्रेणी में दो परीक्षण आते हैं-
  1. शब्द साहचर्य परीक्षण- क्या आप जानते हैं कि शब्द साहचर्य परीक्षण का प्रयोग किस प्रकार से किया जाता है? इस परीक्षण कुछ पहले से ही निश्चित उद्दीपक शब्द होते है। इन पूर्व निश्चित शब्द उद्दीपकों को एक-एक करके प्रयोज्य को सुनाया जाता है। इन सभी शब्दों को सुनने के बाद उस व्यक्ति या प्रयोज्य के मन में जो शब्द सर्वप्रथम आता है, उस शब्द को उसे प्रयोगकर्ता को बताना होता है। इस परीक्षण का उपयोग मुख्य रूप से सिगमण्ड फ्रायड और उनके शिष्य कार्ल युंग द्वारा किया गया। शब्द साहचर्य परीक्षण के माध्यम से युंग ने व्यक्ति की सांवेगिक समस्याओं का सफलतापूर्वक निदान किया। इस सफलता से प्रभावित होकर अमेरिका में केन्ट तथा रोजेन्फ द्वारा सन् 1910 में तथा रैपपोर्ट द्वारा सन् 1946 में दूसरे शब्द साहचर्य परीक्षण का निर्माण किया गया। इन परीक्षणों का प्रयोग साधारण मानसिक रोग से ग्रसित व्यक्तियों के व्यक्तित्व को मापने में मुख्य रूप से किया गया। 
  2. रोशार्क परीक्षण- प्रक्षेपण परीक्षणों में ‘‘रोशार्क परीक्षण’’ सर्वाधिक लोकप्रिय परीक्षण हे। इस परीक्षण का प्रतिपादन स्विट्जरलैण्ड के मनोश्चिकित्सक हरमान रोशार्क द्वारा सन् 1921 में किया गया था। 

संरचना परीक्षण - 

मनोवैज्ञानिक परीक्षण की प्रक्षेपी विधियों में दूसरी महत्वपूर्ण विधि ‘‘संरचना परीक्षण’’ है। संरचना परीक्षण में व्यक्ति को परीक्षण उद्दीपकों के आधार पर एक कहानी अथवा अन्य समान चीजों की संरचना करनी होती है।

क्या आज जानते हैं कि संरचना परीक्षणों में सर्वाधिक लोकप्रिय परीक्षण कोनजर है? ‘‘विषय आत्मबोध परीक्षण’’ जिसको TAT (Thematic Apperception Test) के नाम से जाना जाता है। सबसे अधिक प्रसिद्ध संरचना परीक्षण है। TAT का विस्तृत विवेचन निम्नानुसार है- TAT (The matic Apperception Test) - TAT का निर्माण मर्रे द्वारा सन् 1935 में हारवर्ड विश्वविद्यालय में किया गया था। इसके बाद सन् 1938 में मोर्गन के साथ मिलकर उन्होंने इस परीक्षण का संशोधन किया। TAT परीक्षण से संबंधित मुख्य बातें निम्नानुसार हैं- 
  1. TAT में उद्दीपक या परिस्थितियों रोशार्क परीक्षण की तुलना में अधिक स्पष्ट होती है। अत: यह रोशार्क परीक्षण् से थोड़ा भिन्न है। 
  2. इस परीक्षण में कुल 31 कार्ड होते है, जिनमें से 30 कार्ड पर चित्र बने होते हैं तथा एक कार्ड साद होता है।
  3. TAT परीक्षण का प्रयोग करते समय, जिस व्यक्ति के व्यक्तित्व का परीक्षण किया जाता है। उसकी आयु तथा यौन के अनुसार 31 में से 20 कार्ड को चुन लिया जाता है। 
  4. इन 20 कार्ड में 19 कार्ड पर चित्र होते हैं तथा एक कार्ड सादा होता है। 
  5. किसी एक व्यक्ति को 20 कार्ड से अधिक नहीं दिये जाते हैं। 
  6. प्रयोज्य को प्रत्येक कार्ड के चित्र को देखकर एक कहानी लिखने को कहा जाता है। इस कहानी में चित्र से संबंधित घटना के भूत, वर्तमान, एवं भविष्य तीनों कालों का वर्णन होता है। 
  7. टैट का क्रियान्वयन परीक्षणकर्ता दो सत्रों में करता है।
  8. प्रथम सत्र में 10 कार्ड और द्वितीय सत्र में भी 10 कार्ड देकर प्रयोज्य को उन कार्ड के आधार पर कहानी लिखने को कहा जाता है।
  9. 19 कार्ड देने के बाद सबसे अन्त में सादा कार्ड दिया जाता है और उस कार्ड पर अपने मन से किसी चित्र को मानकर उस आधार पर कहानी लिखने को कहा जाता है। 
  10. मर्रे का मत है कि TAT के इन दो सत्रों के बीच कम से कम 24 घंटे का अन्तर होना चाहिये। 
  11. जब प्रयोज्य कहानी लिखने का कार्य पूरी कर लेता है तो परीक्षणकर्ता एक साक्षात्कार लेता है। इस साक्षात्कार का उद्देश्य यह जानना होता है कि कहानी लिखने में व्यक्ति की कल्पना शक्ति का स्रोत क्या हैं? कार्ड पर अंकित चित्र अथवा चित्र के अतिरिक्त अन्य कोई घटना अथवा परिस्थिति। 
कहानी लेखन के उपरान्त परीक्षणकर्ता इन कहानियों का विश्लेषण करके उस व्यक्ति के व्यक्तित्व का आंकलन करता है। मर्रे के मतानुसार इस परीक्षण का विश्लेषण इन आधारों पर किया जाता है- 
  1. नायक - सर्वप्रथम परीक्षणकर्ता प्रत्येक कहानी में नायक या नायिका कौन है, इस बात का पता लगाता है। कहानी में जिस पात्र की मुख्य भूमिका होती है उसको नायक या नायिका कहते हैं। ये भी संभव है कि कभी-कभी एक ही कहानी में एक से अधिक नायक या नायिका हो। इस परीक्षण में ऐसा माना जाता है कि प्रयोज्य नायक अथवा नायिका के साथ आत्मीकरण (identification) स्थापित कर लेता है और अपनी महत्वपूर्ण आवश्यकताओं को अभिव्यक्त करता है। 
  2. आवश्यकता - नायक या नायिका का पता लगाने के बाद यह जानने की कोशिश की जाती है कि उस नायक या नायिका का प्रमुख आवश्यकतायें क्या-क्या हैं क्योंकि अप्रत्यक्ष रूप से नायक-नायिका के माध्यम से उस व्यक्ति की आवश्यकतायें अभिव्यक्त होती है, जिसमें व्यक्तित्व का मापन किया जा रहा है। मर्रे के अनुसार टैट द्वारा 28 प्रकार की आवश्यकताओं का मापन संभव है। कुछ प्रमुख आवश्यकतायें निम्न हैं- 
    1. उपलब्धि की आवश्यकता 
    2. प्रभुत्व की आवश्यकता 
    3. संबंधन की आवश्यकता 
  3. प्रेस - मर्रे के अनुसार प्रेस से यहाँ पर आशय वातावरण संबंधी बलों से है। इनके कारण कहानी के नायक या नायिका की आवश्यकतायें या तो पूरी हो जाती हैं अथवा पूरी होने से वंचित रह जाती है। मर्रे के अनुसार ऐसे वातावरण संबंधी बलों की संख्या 30 से भी ज्यादा है, जिनमें से कुछ प्रमुख निम्नानुसार हैं- 
    1. शारीरिक खतरा 
    2. आक्रमण या आक्रामकता- ये दो महत्वपूर्ण पे्रस हैं। 
  4. थीमा - पे्रस के निर्धारण के बाद टैअ के अगले चरण में थीमा का निर्धारण किया जाता है। थीमा से क्या आशय है? थीमा का तात्पर्य हैं- ‘‘नायक या नायिका की आवश्यकता तथा पे्रस (वातावरण संबंधी बल) में हुयी अन्त:क्रिया से उत्पन्न घटना। मर्रे के अनुसार थीमा द्वारा व्यक्तित्व में निरन्तरता का ज्ञान होता है। 
  5. परिणाम - TAT के अगले चरण में कहानी के परिणाम का पता लगाया जाता है अर्थात्- कहानी का समापन किस प्रकार से किया गया है, कहानी का निष्कर्ष किस प्रकार का है? निश्चित अथवा अनिश्चित। कहानी का परिणाम यदि निश्चित एवं स्पष्अ है तो इससे प्रयोज्य के व्यक्तित्व की परिपक्वता एवं वास्तविकता का ज्ञान होने की क्षमता का बोध होता है। आपकी जानकारी के लिये बता दें कि TAT का हिन्दी अनुकूलन कलकत्ता के प्रो, उमा चौधरी ने किया है। भारतीय संदर्भ में अधिकांशत: उसी का प्रयोग किया जा रहा है। TAT के अतिरिक्त भी कुछ अन्य संरचना परीक्षण है, जो हैं- 
    1. बाल आत्मबोधन परीक्षण CAT - इस परीक्षण का निर्माण सन् 1954 में बेल्लाक द्वारा किया गया।
      1. CAT द्वारा बच्चों के व्यक्तित्व का मापन किया जाता है। 
      2. CAT के कार्ड में सभी पात्र पशु हैं, मानव नहीं। 
      3. TAT के समान ही CAT में भी बच्चों के व्यक्तित्व का मापन प्रत्येक कार्ड के आधार पर लिखी गई कहानी का विश्लेषण करके किया जाता है।
    2. रोजेनविग तस्वीर-कुंठ अध्ययन - 
      1. इस परीक्षण का निर्माण प्रख्यात मनोवैज्ञानिक रोजेन विग द्वारा किया जाने के कारण उन्हीं के नाम इसका नाम ‘‘रोजेनविग तस्वीर-कुंठा गध्ययन’’ रखा गया है। 
      2. इस परीक्षण का निर्माण सन् 1949 में हुआ था। 
      3. इस परीक्षण में कुल 24 कार्टून होते हैं, जिसके अन्तर्गत एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से इस प्रकार का व्यवहार करते हुये दिखालाया गया है कि दूसरे व्यक्ति में उस पहले वाले व्यक्ति के व्यवहार के कारण निश्चित तौर पर कुंठा की भावना उत्पन्न हो। 
      4. इस परीक्षण में प्रयोज्य को प्रत्येक कार्टून को देखकर यह बताने के लिये कहा जाता है कि ऐसी परिस्थिति में कुंठित व्यक्ति किस प्रकार की प्रतिक्रिया व्यक्त करेगा। 
    3. रोबर्टस आत्मबोधन परीक्षण : बच्चों के लिये (RATC) - 
      1. RATC का निर्माण सन् 1982 में मैकअर्थर तथा रोबर्टस ने किया था। 
      2. इस परीक्षण में कुल 27 कार्ड होते हैं, जिनमें प्रत्येक कार्ड में कुछ बच्चे, अन्य बच्चों या कारकों के साथ अन्त:क्रिया करते हुये दिखाये जाते हैं। 
      3. प्रयोज्य को प्रत्येक कार्ड को देखकर यह बताना होता है कि उस कार्ड के पात्र क्या कर रहे हैं अथवा क्या करेंगे। तो उपर्युक्त विवेचन के आधार पर आप समझ गये होंगे कि संरचना परीक्षण क्या है और किस प्रकार से इनको क्रियान्वित किया जाता है। इसके बाद अब हम चर्चा करते हैं। प्रक्षेपी विधियों में दी अगली विधि ‘‘पूर्ति परीक्षण’’ के विषय में। 

पूर्ति परीक्षण - 

‘‘पूर्ति परीक्षण’’ का प्रक्षेपी विधियों में अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। पूर्ति परीक्षण से संबंधित मुख्य बातें हैं- 
  1. इस परीक्षण में प्रयोज्य को उद्दीपक अर्थात् वाक्य का एक हिस्सा दिखाया जाता है और भाग खाली होता है। इस खाली भाग की पूर्ति प्रयोज्य अपने अनुसार वाक्य बनाकर करता है।
  2. प्रयोज्य अधूरे वाक्य को जिस ढंग से पूरा करता है, परीक्षणकर्ता उस आधार पर उसके व्यक्तित्व का मापन करता है।
  3. सन् 1940 में रोहडे तथा हाइड्रोथ द्वारा तथा सन् 1950 में रौट्टर द्वारा पूर्ति परीक्षण का निर्माण किया गया। 
  4.  भारत में भी इस प्रकार के परीक्षणों का अनेक विद्वानों द्वारा निर्माण किया गया। जिनमें ‘‘विश्वनाथ मुखर्जी’’ का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वाक्यपूर्ति परीक्षण के एकांश के कतिपय उदाहरण नीचे दिये जा रहे हैं। जैसे कि- 
  5. मेरे माता-पिता मुझसे प्राय: .................................... 
  6. मेरी इच्छा है कि .......................................  
  7. मैं प्राय: सोचता रहता हूँ कि ....................................... इत्यादि। 

चयन या क्रम परीक्षण - 

प्रक्षेपी परीक्षणों की अन्य विधि चयन या क्रम परीक्षण है। इस प्रकार के परीक्षणों में प्रयोज्य को परीक्षण उद्दीपकों को एक विशिष्ट क्रम में सुव्यवस्थित करना होता है अथवा दिये गये परीक्षण उद्दीपकों में से कुछ उद्दीपकों को अपनी पसंद, इच्छा या अन्य किसी आधार पर चुनना होता है। परीक्षणकर्ता, प्रयोज्य द्वारा चुने गये उद्दीपकों या उन उद्दीपकों को प्रयोज्य द्वारा जिस क्रम में सुव्यवस्थित किया जाता है, के आधार पर उसके व्यक्तित्व के शीलगुणों का मापन करता है। 

उद्दीपकों को एक खास क्रम में सुव्यवस्थित करने तथा बहुत सारे उद्दीपकों में से प्रयोज्य द्वारा कुछ उद्दीपकों का चयन करने के कारण ही इस परीक्षण का नाम क्रम या चयन परीक्षण रखा गया है। इस श्रेणी में आने वाले कुछ प्रमुख परीक्षण हैं- 
  1. जोन्डी परीक्षण-  इस परीक्षण का निर्माण सन् 1947 में जोन्डी द्वारा किया गया था। 
    1. इसमें प्रयोज्य को अनेक फोटोग्राफ के छ: समूह एक-एक करके दिखलाये जाते हैं। 
    2. इन तस्वीरों में से प्रयोज्य को दो ऐसे तस्वीरें चुनने के लिये कहा जाता है, जिनको वह सबसे अधिक पसन्द करता है तथा दो तस्वींरें ऐसी चुननी होती हैं, जिन्हें वह सर्वाधिक नापसंद करता है। 
    3. प्रयोज्य द्वारा चयनित तस्वीरों के आधार पर परीक्षणकर्ता द्वारा उसके व्यक्तित्व के शीलगुणों का मापन किया जाता है। 
  2. काहन टेस्ट ऑफ सिम्बोल अरेन्जमेन्ट (1955)- पाठकों, जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है कि इसका निर्माण महान् मनोवैज्ञानिक काहन द्वारा सन् 1955 में किया गया था। 
    1. इस परीक्षण में प्रयोज्य को 16 प्लास्टिक से बनी हुयी वस्तुऐं दिखायी जाती है। जैसे कि- तारा, पशु, क्रास इत्यादि और इन्हें कई श्रेणियों में छाँटना होता है, जैसे घृणा, प्रेम, अच्छा, बुरा, जीवित मृत इत्यादि। 
    2. इसके बाद प्रयोज्य से पूछा जाता है कि उसने जिन-जिन 16 वस्तुओं को देखा है। उन वस्तुओं से वह किस व्यक्ति, वस्तु या घटना को साहचर्चित कर रहा है अथवा वह वस्तु उसे जिसके समान दिखाई दे रही है। 
    3. प्रयोज्य द्वारा जो अनुक्रिया व्यक्त की जाती है, उस आधार पर उसके व्यक्तित्व का मापन किया जाता है। 
  3. अभिव्यंजक परीक्षण- जैसा कि इस परीक्षण के नाम से ही आपको स्पष्ट हो रहा होगा कि यह एक ऐसा प्रक्षेपी परीक्षण है, जिसमें प्रयोज्य को स्वयं को अभिव्यक्त करने का मौका दिया जाता है। अब प्रश्न यह उठता है कि व्यक्ति स्वयं को इस परीक्षण में किस प्रकार से अभिव्यक्त करता है अर्थात् अभिव्यक्ति का आधार क्या होता है? इस परीक्षण में प्रयोज्य एक तस्वीर बनाता है। प्रयोज्य द्वारा जिस प्रकार की तस्वीर या चित्र बनाया जाता है, उस आधार पर उसके व्यक्तित्व के शीलगुणों के विषय में अनुमान लगाना संभव हो पाता है। अभिव्यंजक परीक्षणों की श्रेणी में आने वाले कुछ प्रमुख परीक्षण हैं-ं
    1. डा-ए-परसन परीक्षण (DAP Test) 
      1. इसका निर्माण मैकोवर ने किया था। 
      2. इस परीक्षण में प्रयोज्य को एक व्यक्ति का चित्र बनाने के लिये कहा जाता है। 
      3. इसके बाद कभी-कभी आवश्यकतानुसार विपरीत लिंग के व्यक्ति, माँ, आत्मन् या परिवार का चित्र बनाने के लिये भी कहा जाता है। 
      4. मै कोवर का मत है कि व्यक्ति जिस प्रकार से चित्र बनाता है, उसके आधार पर उसके अचेतन मन की अनेक प्रक्रियाओं के बारे में अनुमान लगाना संभव हो पाता है। 
    2. घर-पेड-व्यक्ति परीक्षण (H-T-P test)- 
      1. इस परीक्षण का निर्माण प्रसिद्ध विद्वान बक द्वारा सन् 1948 में किया गया था।
      2. इसमें व्यक्ति को एक पेड़ तथा एक व्यक्ति का चित्र बनाना होता है।
      3. इसके बाद इन चित्रों का विवेचन एक साक्षात्कार में करना होता है।
      4. व्यक्ति द्वारा जिस ढंग से चित्र का वर्णन किया जाता है, उसके आधार पर उसके व्यक्तित्व के शीलगुणों का विश्लेषण किया जाता है। 
    3. बद्ध वेण्डर-गेस्टाल्ट-परीक्षण- इस परीक्षण का निर्माण सन् 1938 में लिऊरेटा वेण्डर द्वारा किया गया था। 
      1. व्यक्ति के बौद्धिक हृास की मात्रा जानने के लिए इस परीक्षण का प्रयोग किया जाता है।
      2. इसमें 9 अत्यधिक साधारण चित्र होते हैं। 
      3. इन चित्रों को देखकर पहले व्यक्ति को उनकी नकल उतारने के लिये कहा जाता है।
      4. इसके बाद उसके सामने से चित्र हटा लिये जाते हैं और उसे अपनी स्मृति के आधार पर ही उस चित्र को बनाना होता है।
      5. चित्र बनाते समय प्रयोज्य द्वारा प्राय: अनेक गलतियाँ होती हैं। जिनमें से कुछ प्रमुख निम्न हैं, जैसे कि- समन्वय में कमी पुनरावृत्ति चित्र घूर्णन इत्यादि।
      6. वेण्डर का मत है कि चित्र को बनाते समय की गई गलतियों के आधार पर व्यक्ति के व्यक्तित्व का विश्लेषण किया जाता है। 

प्रक्षेपी विधि की सीमायें - 

 इस बात में कोई संदेह नहीं है कि मनोवैज्ञानिक परीक्षण के क्षेत्र में प्रक्षेपी विधियों का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। और खासकर व्यक्तित्व के मापन में, फिर भी कुछ विद्वानों ने कतिपय आधारों पर प्रक्षेपी विधियों की आलोचना की है। आइजेन्क ने निम्न आधारों पर प्रक्षेपण परीक्षण की आलोचना की है- 
  1. अर्थपूर्ण तथा परीक्षणीय सिद्धान्त का अभाव- आइजेन्क का कहना है कि प्रक्षेपी विधियों का कोई परीक्षणीय तथा अर्थपूर्ण सिद्धान्त नहीं है। अत: इनके द्वारा जो व्यक्तित्व का मापन किया जाता है, उससे व्यक्तित्व के बारे में कोइ्र ठोस निष्कर्ष नहीं निकलता है।
  2. आत्मनिष्ठ प्राप्तांक लेखन- प्रक्षेपण परीक्षण की आलोचना इस आधार पर भी की गई है कि इन परीक्षणों का प्राप्तांक लेखन एवं व्याख्या अत्यधिक आत्मनिष्ठ है, जिसके कारण तक ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का मापन यदि अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा किया जाता है तो उस व्यक्तित्व के बारे में उनके निष्कर्षो में भी भिन्नता पाई जाती है, जो किसी भी प्रकार से अर्थपूर्ण नहीं होता है।  
  3. उच्च वैधता का अभाव- आलोचकों का यह भी मत है कि प्रक्षेपी विधियों में पर्याप्त वैधता का अभाव पाया जाता है। 
  4. प्रक्षेपीय परीक्षण के सूचकों तथा शीलगुणों के बीच प्रत्याशित संबंध का वैज्ञानिक आधार नहीं- आइजेन्क ने प्रक्षेपण परीक्षण की आलोचना इस आधार पर भी की है कि प्रक्षेपीय परीक्षण के सूचकों तथा शीलगुणों के बीच प्रत्याशित संबंध का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। 
इस प्रकार अनेक आधारों पर प्रक्षेपी विधियों की आलोचना की गई है।

उपर्युक्त विवरण से आप जान चुके हैं कि प्रक्षेपी विधि क्या है? प्रक्षेपण क्या हैं? प्रक्षेपी विधि में कौन-कौन से प्रमुख परीक्षण आते हैं और उनके क्रियान्वयन का तरीका क्या है। यद्यपि विद्वानों ने अनेक तर्क देकर प्रक्षेपी विधि की आलोचनायें की है तथापि मनोचिकित्सा की दृष्टि से व्यक्तित्व मापन में प्रक्षेपी विधियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

वस्तुनिष्ठ विधियाँ

वस्तुनिष्ठ विधियों का अर्थ

वस्तुनिष्ठ विधि से तात्पर्य ऐसी विधि से है, जिसमें उद्दीपक के रूप में या तो एक शब्द होता है अथवा एक वाक्य होता है। इस उद्दीपक के प्रति अनुक्रिया व्यक्त करने के लिये व्यक्ति को दिये गये विभिन्न उत्तरों में से किसी एक को चुनना होता है। मनोचिकित्सकों ने नैदानिक उपयोग की दृष्टि से वस्तुनिष्ठ परीक्षणों के निर्माण तथा उनकी उपयोगिता एवं उत्कृष्टता को बनाये रखने के लिये कुछ मॉडलों का निर्माण किया और इन मॉडलों के आधार पर विभिन्न वस्तुनिष्ठ परीक्षणों का प्रतिपादन किया गया। अब आपके मन में यह प्रश्न उठ रहा होगा कि वे मॉडल कौन-कौन से हैं? तो आइये, आपके इसी प्रश्न का समाधान करते हुये चर्चा करते है इन मॉडल के बारे में।

वस्तुनिष्ठ विधि से संबंधित प्रमुख मॉडल या उपागम

मनोचिकित्सकों ने मुख्य रूप से चार मॉडलों का प्रतिपादन किया-
  1. प्रत्यक्ष मूल्य मॉडल या तार्किक अथवा युक्तिसंगत उपागम (Face volume model or logical or rational approach) 
  2. अनुभवजन्य मॉडल या उपागम (Empirical model or approach)  
  3. कारक-वैश्लेषिक मॉडल या उपागम Factor-analytic model or approach) 
  4. सैद्धान्तिक मॉडल या उपागम (Theouritical model or approach) 

प्रत्यक्ष मूल्य मॉडल - 

वस्तुनिष्ठ विधि के प्रथम मॉडल प्रत्यक्ष मूल्य मॉडल का विकास अमेरिका में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हुआ था। इस मॉडल को तार्किक या युक्तिसंगत उपागम के नाम से भी जाना जाता है। इस उपागम की प्रमुख विशेषत यह है कि इस पर आधारित परीक्षण के एकांशों का स्वरूप एकदम स्पष्ट एवं प्रत्यक्ष होता है। जिन्हें पढ़कर रोगी व्यक्ति भी एकांशों के उद्देश्य को भली-भाँति जान लेता है। प्रत्यक्ष मूल्य मॉडल पर आधारित परीक्षण के कुछ एकांशों के उदाहरण हैं-
  1. क्या आपको सिरदर्द की शिकायत रहती हैं? 
  2. क्या आप किसी पार्टी में जाने की बात से चिन्तित हो जाते हैं इत्यादि। इस मॉडल में यह पूर्वकल्पना की जाती है कि व्यक्ति पूरी ईमानदारी के साथ अनुक्रिया व्यक्त करेगा तथा इसके साथ ही यह भी माना जाता है कि व्यक्ति स्वयं के शीलगुणों एवं विशेषताओं से पूरी तरह परिचित है। 
इस मॉडल पर आधारित सर्वप्रथम व्यक्तित्व परीक्षण का निर्माण सन् 1917 में वुडवर्थ द्वारा किया गया। यह प्रथम समायोजन आविष्कारिका थी। जिसका नाम ‘‘वुडवर्थ पर्सनल डाटाशीट’’ रखा गया।

क्या आप जानते हैं कि इस आविष्कारिका का प्रयोजन क्या था? इसका उद्देश्य था, सांवेगिक रूप से क्षुब्ध व्यक्तियों की समायोजन करने की क्षमता को मापना और ऐसे व्यक्तियों को पहचानना।

यद्यपि प्रारंभ में इस उपागम पर आधारित अनेक परीक्षणों का निर्माण और उपयोग किया गया, किन्तु धीरे-धीरे सन् 1930 तक इस उपागम में अनेक खामियाँ नजर आने लगी। परिणामस्वरूप इस मॉडल का उपयोग नहीं के बराबर किया जाने लगा क्योंकि एकांशों की अत्यधिक स्पष्टता के कारण व्यक्ति प्राय: मनगढंत उत्तर देते थो। इस उपागम के विकल्प के रूप में अनुभवजन्य उपागम का विकास हुआ।

अनुभवजन्य मॉडल या उपागम - 

प्रत्यक्ष मूल्य मॉडल की कमियों को दूर करने के उद्देश्य से अनुभवजन्य मॉडल का विकास हुआ। इस मॉडल की खास बात यह है कि इस पर आधारित परीक्षणों में केवल उन्हीं एकांशों को रखा गया है जो सामान्य व्यक्तियों के समूह एवं विशिष्ट नैदानिक समूह के मध्य स्पष्ट रूप से अन्तर कर सके। इस मॉडल पर आधारित कुछ प्रमुख परीक्षणों के नाम हैं-
  1. माइनेसोटा मल्टीफेजिक व्यक्तित्व आविष्कारिका (MMPI) 
  2. कैलिफोर्निया व्यक्तित्व आविष्कारिका (CPI) 

कारक-वैश्लेषिक मॉडल - 

इस मॉडल की महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसके अन्तर्गत विभिन्न परीक्षणों से जो निष्कर्ष या परिणाम प्राप्त होते हैं, उन्हें परस्पर सहसंबंधित करते है। कारक-विश्लेषण पर आधारित होने के कारण ही इसे कारक वैश्लेषिक मॉडल कहा जाता है। इस उपागम पर आधारित परीक्षणों के विकास में कैटेल, आइजेन्क तथा गिलफोर्ड का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इनके द्वारा निर्मित व्यक्ति परीक्षणों को नैदानिक दृष्टि से अत्यधिक उपयोगी माना गया है। 

सैद्धान्तिक मॉडल या उपागम- 

 इस मॉडल पर आधारित परीक्षणों में मानव व्यक्तित्व के सिद्धान्तों को ध्यान में रखते हुये एकांशों का निर्माण किया जाता है। कहने का आशय यह है कि व्यक्तित्व के सिद्धान्तों को ध्यान में रखते हुये एकांशों का चयन किया जाता है। 

उदाहरण- जैसे कि व्यक्तित्व के किसी सिद्धान्त के अनुसार व्यक्तित्व तीन महत्वपूर्ण आयाम है- संवेग (Emotion), चिन्तन (Thoughts) और व्यवहार (Behaviour)। तो इस स्थिति में सैद्धान्तिक मॉडल पर आधारित जिस परीक्षण का निर्माण किया जायेगा, उसेके एकांश ऐसे होंगे, जिससे संवेग, विचार एवं व्यवहार व्यक्तित्व की तीनों विभओं का मापन हो सकें। 

आपकी जानकारी के लिये बता दें कि सैद्धान्तिक मॉडल पर आधारित परीक्षणों के एकांशों का स्वरूप भी प्रत्यक्ष मूल्य मॉडल के अनुसार बनने वाले परीक्षणों के एकांशों के समान ही स्पष्ट एवं प्रत्यक्ष होते हैं। इस मॉडल पर आधारित सर्वाधिक लोकप्रिय परीक्षण हैं- ‘‘एडवार्ड्स पर्सनल प्रेफरेन्स शेड्यूल’’ (Edwards personal preference schedule)। इसका निर्माण एड्वार्डस ने किया था। 

इस प्रकार उपरोक्त विवरण से आप समझ गये होंगे कि वस्तुनिष्ठ विधि क्या है तथा इसके प्रमुख उपागम या मॉडल कौन-कौन से है तथा इन उपागमों की प्रमुख विशेषतायें क्या हैं अर्थात्- ये किन-किन सिद्धान्तों पर आधारित हैं। 

प्रमुख वस्तुनिष्ठ विधियाँ- 

  1. माइनेसोटा मल्टीफेजिक पर्सनालिटी इन्वेंट्री-2 (MMPI-2) 
  2. कैलिफोर्निया साइकोलोजिकल आविष्कारिका 
  3. बेल समायोजन आविष्कारिका 
  4. कैटेल सोलह व्यक्तित्व-कारक प्रश्नावली 

माइनेसोटा मल्टीफेजिक पर्सनालिटी इन्वेंट्र-2 (MMPI-2)-

माइनेसोटा मल्टीफेजिक पर्सनालिटी इन्वेंट्र-2 (MMPI-2)- का प्रतिपादन मूल रूप से हाथावे एवं मैककिनले द्वारा सन् 1940में किया गया था। इसमें 550 एकांश थे और प्रत्येक एकांश के लिये निम्न तीन उत्तर थे।
  1. सत्य 
  2. असत्य 
  3. कहा नहीं जा सकता 
एम.एम.पी.आई. के मौलिक प्रारूप के दो प्रतिरूप उपलब्ध होते हैं- (1) वैयक्तिक कार्ड प्रतिरूप एवं (2) सामूहिक पुस्तिका प्रारूप। इसके मौलिक प्रारूप में नैदानिक नापनियों की संख्या दस तथा वैधता मापनियों की संख्या तीन है। 

एम.एम.पी.आई. का मूल उद्देश्य व्यक्तित्व के रोगात्मक शीलगुणों का मापन करना है। अत: इसकी 10 नैदानिक मापनियों 10 रोगात्मक शीलगुणों का मापन करती है और वैधता मापनियों पर हो। के प्राप्तांकों द्वारा व्यक्ति द्वारा जो अनुक्रिया व्यक्त की जाती है उसकी विश्वसनीयता एवं वैधता ज्ञात की जाती है। 

मौलिक MMPI में समय परिस्थिति एवं आवश्यकता के अनुसार अनेक संशोधन हुये। इन सभी में जो सर्वाधिक नवीनतम संशोधन है, उसे MMPI2 नाम दिया गया। क्या आप जानते है, यह संशोधन किनके द्वारा किया गया? इस संशोधन में वुचर, डाहस्ट्रोम, ग्राहम, टेलेमन तथा केमर द्वारा महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया गया। MMPI2 की मुख्य विशेषतायें निम्नानुसार हैं- 10 नैदानिक मापनी एवं तीन वैधता मापनी है।  इसमें कुल 567 एकांश है, जिनमें से प्रथम 370 एकांश मौलिक MMPI से ही लिये गये हैं और इनमें केवल सम्पादकीय परिवर्तन ही किये गये हैं। इन 370 एकांशों के माध्यम से 10 नैदानिक विभाओं का मापन किया जाता है और शेष 197 एकांशों द्वारा व्यक्तित्व के अन्य पक्षों का मापन किया जाता है। 197 एकांशों में से 107 सर्वथा नये है। एम.एम.पी.आई-2 की नैदानिक एवं वैधता मापनियों का वर्णन है- 

नैदानिक मापनी (Clinical scale) - 

  1. रोगभ्रम-  इस मापनी द्वारा व्यक्ति की उस प्रवृत्ति का मापन होता है, जिसमें वह शारीरिक स्वास्थ्य एवं शारीरिक कार्यो के प्रति आवश्यकता से अधिक चिंतित रहता है। इस मापनी में कुल 32 एकांश होते हैं। 
  2. विषाद- इस मापनी द्वारा भावनात्मक विकृतियों जैसे कि उदासी, अकेलापन, अभिपे्ररण एवं ऊर्जा में कमी, असमर्यता इत्यादि का मापन किया जाता है। इसमें 57 एकांश होते हैं। 
  3. रूपान्तर हिस्टीरिया- इसमें व्यक्ति की ऐसी स्नायुविकृत प्रवृत्ति का मापन किया जाता है, जिसके अन्तर्गत रोगी अपनी मानसिक चिन्ताओं एवं संघर्षो से निजात पाने के लिये कुछ शारीरिक लक्षण विकसित कर लेता है। इसमें 60 एकांश पाये जाते हैं। 
  4. मनोविकृत विचलन- इसमें व्यक्ति की सामाजिक एवं नैतिक नियमों का उल्लंघन करने की प्रवृत्ति तथा दण्ड मिलने पर भी उससे कुछ भी शिक्षा न ग्रहण करने की प्रवृत्ति का मापन होता है। इसमें 50 एकांश होते हैं। 
  5. पुरूषत्व - नारीत्व- इस मापनी द्वारा व्यक्ति के सीमांतीय यौन भूमिका करने की प्रवृत्ति का मापन किया जाता है। इसमें कुल 56 एकांश होते हैं। 
  6. स्थिर व्यामोह- इसके द्वारा व्यक्ति की बिना किसी कारण या तर्क के शंका-सन्देह करने की प्रवृत्ति एवं दंडात्मक एवं उत्कृष्टता से संबंधित भ्रान्ति का मापन किया जाता है। इसमें कुल 40 एकांश होते हैं। 
  7. मनोदौर्बल्यता- इसके द्वारा व्यक्ति में अतार्किक एवं असामान्य डर, मनोग्रस्ति, बाध्यता इत्यादि प्रवृत्तियों का मापन किया जाता है। इसमें 48 एकांश है। 
  8. मनोविदालिता- व्यक्ति में असामान्य चिन्तन या व्यवहार करने की प्रवृत्ति का मापन इस मापनी द्वारा किया जाता है।इस मापनी में कुल 78 एकांश हैं। 
  9. अल्पोन्माद-इस मापनी द्वारा व्यक्ति के विचारों में बिखराव, सांवेगिक उत्तेजना, अतिक्रिया इत्यादि का मापन होता है। इसमें कुल 46 एकांश हैं। 
  10. सामाजिक अन्र्मुखता- इस मापनी द्वारा व्यक्ति की अन्र्मुखी प्रवृत्ति जैसे- सामाजिक अवसरों या समारोहों में शामिल न होने की प्रवृत्ति, लज्जाशीलता, स्वयं में खोये रहने या अकेले रहने की प्रवृत्ति असुरक्षा इत्यादि का मापन होता है। इसमें 69 एकांश होते हैं। 

वैधता मापनी- 

 नैदानिक मापनी के बाद अब वैधता मापनी का विवेचन निम्नानुसार है-
  1. (Cannot say) -इस मापनी में वे एकांश आते हैं, जिनका उत्तर व्यक्ति नहीं दे पाता है। जब इस मापनी में एकांशों की संख्या अधिक हो जाती है तो इससे निम्न बातों का पता चलता है- 
    1. या तो व्यक्ति एकांशों को ठीक ढंग से नहीं समझ पा रहा है। 
    2. व्यक्ति परीक्षक के साथ सहयोग की प्रवृत्ति नहीं अपना रहा है अथवा 
    3. व्यक्ति ने रक्षात्मक मनोवृत्ति (Defensive attitude) अपना लिया है। 
  2. “Cannot say” वैधता मापनी के संबंध में मनोवैज्ञानिकों द्वारा कहा गया है कि- ‘‘इन तीन वैधता मापनियों के अतिरिक्त एक और वैधता मापनी है, जिसे? या से संकेतिक किया जाता है तथा इसमें उन एकांशों को रखते हैं। जिनका उत्तर व्यक्ति नहीं दे पाता है।’’ 
  3.  L (Lie) - इस मापनी में कुल 15 एकांश है। इसके द्वारा व्यक्ति की झूठ बोलने या अपने आपको गलत ढंग से प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति का मापन किया जाता है। 
  4.  F (Frequency or infrequency) - यदि प्रयोज्य द्वारा इस मापनी पर उच्च अंक प्राप्त किये गये हैं तो इससे उस व्यक्ति की निम्न प्रवृत्तियों का पता चलता है- 
    1. व्यक्ति ने एकांशों के प्रति अनुक्रिया व्यक्त करने में लापरवाही की है। या 
    2. अपने रोगात्मक लक्षणों को जान बूझकर अधिक बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है। 
    3. इसमें कुल 60 एकांश है। 
  5. K (Correction) - इस मापनी द्वारा व्यक्ति के अपनी समस्या के बारे में आवश्यकता से अधिक कहने अथवा अपनी परेशानी या समस्या के विषय में अत्यधिक सुरक्षात्मक दृष्टिकोण अपनाने की प्रवृत्ति का मापन किया जाता है। इसमें कुल 30 एकांश है। उपर्युक्त विशेषताओं के अतिरिक्त एम.एम.पी.आई-2 की कुछ अन्य विशेषतायें भी है, जो हैं- 
    1. MMPI-2.2 में एकांशों का समूहन करके कुल अन्तर्वस्तु मापनियाँ बनायी गयी हैं, जिनकी संख्या 15 है। इन मानियों द्वारा व्यक्तित्व के 15 ऐसे कारकों का मापन करना संभव हो पाया है, जिनका मापन 10 नैदानिक मापनियों द्वारा नहीं किया जाता है। इन कारकों में डर, दुश्चिन्ता, क्रोध, पारिवारिक समस्यायें इत्यादि प्रमुख है। 
    2.  MMPI-2 में 4 वर्धता मापनियों के अतिरिक्त दो और नयी वैधता मापनियों को शामिल किया गया है। इनका उपयोग उन चार वैधता मापनियों के साथ ही करना होता है। ये दो वैधता मापनियाँ हैं- 
      1. VRIN – The variable Response Inconsitency
      2. TRIN – The True Resonse Inconsistency
उपर्युक्त दोनों मापनियों के माध्यम से व्यक्ति के एकांशों के प्रति असंगत ढंग से प्रतिक्रिया व्यक्त करने की प्रवृत्ति का मापन होता है। इस प्रकार आप जान चुके है कि एम.एम.पी.आई.-2 परीक्षण क्या है? यद्यपि अनेक मनोवैज्ञानिकों ने कुछ आधारों पर इस परीक्षण की आलोचना की है। लेकिन फिर भी व्यक्तित्व के मापन में एम.एम.पी.आई का जो महत्व है उसे हम नकार नहीं सकते।

कैलिफोर्निया साइकोलॉजिकल आविष्कारिका- 

  1. इस परीक्षण का निर्माण सन् 1957 में हुआ और सन् 1987 में गफ ने इसमें कई संशोधन किये। 
  2. इस परीक्षण द्वारा व्यक्तित्व के सामान्य शीलगुणों को मापा जाता है। 
  3. इसमें कुल 462 एकांश है। जिनमें से आधे एकांश एम.एम.पी.-1 से ही लिये गये है। 
  4. इन एकांशों के प्रति व्यक्ति को सही-गलत के रूप में अनुक्रिया व्यक्त करनी होती है। 
  5. इस परीक्षण में भी तीन वैधता मापनियाँ है। 
  6. इस परीक्षण की वैधता एवं विश्वसनीयता अत्यधिक है।

बेल समायोजन आविष्कारिका- 

इस परीक्षण का उद्देश्य यह जानना होता है कि एक व्यक्ति को समायोजन करने में किन-किन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है अर्थात् उसकी समयोजान संबंधी परेशानियाँ क्या-क्या है?  जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है महान् मनोवैज्ञानिक बेल द्वारा इसका निर्माण किये जाने के कारण ही इसका नाम ‘‘बेल समायोजान आविष्कारिका है। इसका प्रतिपादन सन् 1934 में किया गया था।  इस परीक्षण के दो रूप या फार्म हैं-
  1. विद्याथ्र्ाी फार्म- इसमें कुल 140 एकांश होते हैं। ये एकांश चार क्षेत्रों - 1. घर 2. स्वास्थ्य  3. सामाजिक अवस्था 4. सांवेगिक अवस्था-से संबंधित समायोजन समस्याओं को जानने में समायक होते हैं। 
  2. व्यावसायिक फार्म-  इसमें कुल 160 एकांश होते हैं। 140 एकांश विद्याथ्र्ाी फार्म के तथा इनमें 20 एकांश और जोड़ दिये जाते हैं। इसमें कुल 5 क्षेत्र आते है।  इससे व्यस्कों की समायोजन क्षमता का मापन होता है। 

कैटेल सोलह व्यक्तित्व - कारक प्रश्नावली- 

यह परीक्षण वस्तुनिष्ठ विधि के ‘‘कारक वैश्लेषिक मॉडल’’ पर आधारित है। इसका निर्माण कैटेल द्वारा किया गया। इसके द्वारा ऐसे व्यक्तियों के 16 शीलगुणों का मापन किया जाता है, जिनकी आयु 17 साल से ज्यादा हो। इस परीक्षण के कई फार्म हैं। उपर्युक्त वस्तुनिष्ठ परीक्षणों के अतिरिक्त भी अनेक दूसरे वस्तुनिष्ठ परीक्षण है। जैसे कि-
  1.  Eysenck personality questionnaire (EPQ) 
  2. Personality research form (PRF)
  3. Basic personality inventory इत्यादि 

वस्तुनिष्ठ विधि के गुण एवं दोष- 

 गुण- 

  1. शीघ्रगामी माप- मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि वस्तुनिष्ठ विधियों का क्रियान्वयन करना अपेक्षाकृत अधिक सरल एवं सुविधाजनक है। इनके द्वारा एक साथ अर्थात् एक समय में ही अनेक व्यक्तियों के व्यक्तित्व का मापन आसानी से किया जा सकता है। 
  2. नैदानिक एवं सामान्य दोनों ही परिस्थितियों में प्रयोग- इन परीक्षणों का प्रयोग नैदानिक एवं सामान्य दोनों ही परिस्थितियों में समान रूप से किया जा सकता है। 

दोष- 

  1. उच्च वैधता का अभाव- आलोचकों का मत है कि वस्तुनिष्ठ विधियों में पर्याप्त वैधता का अभाव होता है। 
  2. एकांशों का अत्यधिक प्रत्यक्ष एवं स्पष्ट होना- वस्तुनिष्ठ विधियों में एकांश इतने अधिक स्पष्ट एवं प्रत्यक्ष होते हैं कि व्यक्ति को बहुत आसानी से पता चल जाता है कि उससे क्या पूछा जा रहा है। इसका परिणाम यह होता है कि वह पूरी ईमानदारी के साथ अनुक्रिया व्यक्त नहीं करता है। इन परीक्षणों में बहुत बार ऐसी संभावना होती है कि व्यक्ति एकांश का सही उत्तर न देकर अपने मन से उसका कोई दूसरा उत्तर दे दें। तो ऐसी स्थिति में परीक्षण के परिणामों की वैधता एवं विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाता है। 
  3. अनपढ़ छोटे बच्चों पर क्रियान्वयन संभव नहीं- वस्तुनिष्ठ परीक्षणों के एकांशों में भाषा का प्रयोग किया जाता है अर्थात् इनका स्वरूप शाब्दिक होता है। अत: इनका प्रयोग केवल उन्हीं व्यक्तियों पर किया जाता है। जो शिक्षित हो। अनपढ़, छोटे बच्चों जिनको भाषा की समझ नहीं है। उन पर इनका क्रियान्वयन नहीं किया जा सकता। अत: इन परीक्षणों की उपयोगिता यहाँ पर सीमित हो जाती है। 
  4. व्यक्तित्व का मापन अलग-अलग शीलगुणों द्वारा- आलोचकों के अनुसार वस्तुनिष्ठ विधियों में व्यक्तित्व का मापन अलग-अलग शीलगुणों के रूप में होता है। किन्तु इस प्रकार से व्यक्तित्व की ठीक-ठीक व्याख्या नहीं हो पाती है। ‘‘चूँकि व्यक्तित्व आविष्कारिका में व्यक्तित्व का मापन सम्पूर्ण रूप से नहीं होता है। अत: इस विधि को बहुत वैज्ञानिक नहीं माना जा सकता है।’’ 
उपरोक्त विवरण से आप समझ गये होंगे कि मनोवैज्ञानिक परीक्षण की वस्तुनिष्ठ विधियाँ क्या हैं? ये किस प्रकार से प्रक्षेपी विधियों से भिन्न हैं? प्रमुख वस्तुनिष्ठ परीक्षण कौन-कौन से हैं और किस प्रकार से इनका उपयोग किया जाता है। इत्यादि। 

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