श्रीमद्भगवद्गीता का महत्व

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गीता तात्पर्य -श्रीमदभगवदगीता विश्व के सबसे बडे महाकाव्य महाभारत के “भीश्मपर्व” का एक अंश है। भगवदगीता भगवान कृष्ण द्वारा कुरूक्षेत्र युध्द में दिया गया दिव्य उपदेश है जब अर्जुन मोहग्रस्त होकर किंकर्तव्यविमूढ़ कि स्थिति में पहुच चुके थे। इस प्रकार अर्जुन को केन्द्र में रखकर दिया गया यह भगवान का गीता अमृत रूपी वाणी से समन्वित उपदेश है। इस प्रकार श्रीमदभगवदगीता भगवान की साक्षात दिव्य वाणी होने से इसके श्लोकों को मंत्र का दर्जा प्राप्त है।-

 “सर्वोपनिशदो गावो दोग्धा गोपालनन्दन:। 
पार्थोवत्स: सुधीभोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत”।। 

अर्थात् यह गोपालनन्दन श्री कृष्ण के द्वारा अर्जुन को बछड़ा बनाकर उपनिशद रूपी गायों से दुहा गया अमृतमय दूध है जिसे सुधीजन पीते हैं। श्रीमदभगवदगीता संसार के अति महत्वपूर्ण ग्रन्थों में अपना विशेष स्थ्ज्ञान रखती है। श्रीकृष्ण भगवान स्वयं इसके वक्ता हैं और उनका कहना है ‘गीता मे हृदयं पार्थं’ अर्थात हे अर्जुन गीता मेरा हृदय है इस प्रकार गीता को ‘सर्वशास्त्रमयी’ कहा गया है क्योंकि सभी शास्त्रों में मंथन करके अमृतमयी गीता काउदय या प्रकटीकरण हुआ है। इसका दिव्य संदेश किसी जाति - विशेष सम्प्रदाय के लिये नही है बल्कि सम्पूर्ण मानव जाति के लिये है जो सर्वभौम है। विभिन्न मत मतान्तरों को यदि ध्यान न दिया जाय तो अधिकांश विद्वान इस मत पर सहमत हैं कि गीता में 18अध्याय है और 700 श्लोक है इसके संकलनकर्ता स्वयं वेदव्यास जी हैं वेद भगवान के नि:श्वास हैं किन्तु गीता भगवान की वाणी है नि:श्वास तो स्ववभाविक होते हैं, इसमें कोई अतिरिक्त श्रम नहीं करना पड़ता है। किन्तु गीता को भगवान ने योग में स्थित होकर अपने श्री मुख से कही है अतेव गीता को वेदों की अपेक्षा भी श्रोश्ठ कहा गया है। प्रसथानत्रयी के अन्तर्गत ब्रह्मसूत्र, गीता और उपनिशद आते हैं । इसमें गीता का महत्व और अधिक बढ़ जाता है कि गीता में ब्रह्मसूत्र और उपनिशद दोनों का ही तात्पर्य आ जाता है गीता एक परम रहस्यमय ग्रन्थ है इसमें सम्पूर्ण वेदों का सारसंग्रह किया गया है। स्वयं भगवान वेदव्यास ने कहा है कि -

गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यै:शास्त्रसंग्रहै:। 
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपदमाद्विनि:सृता।।(महा0 भीश्म0 43/1) 

अर्थात् गीता का ही भली प्रकार से श्रवण मनन, किर्तन, पठन- पाठन, और धारण करना चाहिये, अन्य शास्त्रों के संग्रह की क्या आवश्यकता है ? क्योंकि वह स्वयं पùनाभ भगवान के साक्षात् मुख-कमल से निकली हुई है। भगवान ने स्वयं गीता के विषय में कही है कि -मैं गीता के आश्रम में रहता हूँ, गीता मेरा श्रेष्ठ घर है। गीता के ज्ञान का सहारा लेकर ही मैं तीनों लोकों का पालन करता हूँ।

गीतााश्रयेSहं तिश्ठामि गीता मे चोत्तमं गृहम। 
गीताज्ञानमुपश्रित्य त्रील्लोकान्पालयाम्यहम।।(वराहपुराण) 

गीता की महिमा बतलाते हुये भगवान कहते हैं कि गीता गंगा से भी बढ़कर है शास्त्रों में गंगा स्नान का फल मुक्ति बताया गया है परन्तु गंगा में स्नान करने वाला स्वयं मुक्त तो हो सकता है किन्तु दूसरे को तारने की सामथ्र्य नही रखता है किन्तु गीता रूपी गंगा में गोता लगाने वाला स्वयं मुक्त तो होता ही है और दूसरे को तारने में भी सामथ्र्यवान होता है एक तरफ से उद्गम देखा जाय तो गंगा भगवान के श्री चरणों से निकली हुई है गंगा में जाकर जो स्नान करेगा गंगा उसी को मुक्त करती है किन्तु गीता धर धर में जाकर उन्हें मुक्ति का मार्ग दिखलाती है इन्ही सब कररणों से गीता को गंगा से भी बढ़कर भगवान बतलाते हैं-

गंगा गीता च सावित्री सीता सत्या पतिव्रता। 
ब्रह्मावलिबर्रविद्या त्रिसंध्यया मुक्तिगोहिनी।। 

गीता का महत्व बतलाते हुये कहा गया है कि गीता अर्धमात्रा, पिदानन्दस्वरूपिणी, भवरोगनाषिनी, भ्रान्ति का नाश करने वाली त्रिवेदमयी, परमानन्दस्वरूपिणी तत्वार्थ ज्ञान देने वाली है जो मनुष्य प्रतिदिन स्थिर चित्त से इन नामों का जप करता है , उसे इस लोक में नित्य ज्ञान की सिध्दि तथा जीवन का अन्त होने पर परमपद की प्राप्ति होती है सम्पूर्ण गीता का पाठ करनें में असमर्थ होने पर अध्दार्ंश का पाठ करना चाहिये उसे गोदान का पुन्य फल मिलता है इसमें सन्देह नही है तृतीयांश का पाठ करने से गंगा स्नान का फल मिलता है जो व्यक्ति गीता के दो अध्यायों का पाठ करता है वह इन्द्रलोक जाता है और वहाँ एक ब्रा के कल्प तक निवास करता है अन्तिम में गीतार्थ का पाठ या श्रवण करने से महापापी भी मुक्तिभागी हो जाता है। आगे गीता की महिमा बतलाते हुए कहा गया है कि-

गीता पुस्तक संयुक्त: प्राणास्त्याक्त्वा प्रयाति य: । 
बैकुण्ठ सम्वाप्नोति विष्णुना सह मोदते ।। 

अर्थात जो व्यक्ति गीता की पुस्तक लिए हुए, प्राणत्याग कर देता है वह बैकुण्ठ धाम जाकर विष्णु के साथ आनन्द भोग करता है। इस प्रकार गीतासार ईश्वर साक्षात्कार का दर्शन् है। जिसे भी ईश्वर दर्शन् की इच्छा होगी, उसे गीता से बढ़कर कोई ग्रन्थ नहीं मिलेगा-

‘‘गीताभाश्यं पुन: कृत्वा लभते मुक्ति मुत्तमाम’’ ।।(वाराहपुराण) 

गीताशास्त्र की एक अप्रतिम विशेषता है कि यह किसी वाद को लेकर नहीं चली है अर्थात् द्वैत, अद्वैत, विशिष्टताद्वैत, विशुद्धाद्वैत, अचिन्त्य भेदाभेद आदि किसी भी वाद को या किसी के सिद्धान्त को लेकर नहीं चली है। गीता का मुख्य उद्धेश्य है कि व्यक्ति किसी भी वाद मत सिद्धान्त को मानने वाला क्यों न हो उसका प्रत्येक परिस्थिति में कल्याण हो जाय। वह किसी भी परिस्थिति परमात्म प्राप्ति से वंचित न रह जाय। क्योंकि मनुष्य योनि ही एक ऐसी योनि है जिसमें जन्म केवल अपने कल्याण के लिए ही हुआ है। गीता की अद्वैतवादी टीकाओं भगवदगीता को वस्तुत: गीतोपनिशद के रूप में ही स्वीकार किया है और श्रुति प्रस्थान का स्थान दे दिया गया है। अधिकांश आचार्य मानते है कि गीता में जहां-जहां श्रीभगवानुवाच् है वह श्रुति है, स्मृति प्रस्थान तो वह है ही। पुन: इन दोनों प्रस्थानों से बढ़कर उसी ब्रह्मसूत्र का भी प्रकार्य कर दिया है। अधिकांश अद्वैतवादी सन्यासी का गीता का ही अध्ययन करते है, जो गृहस्थ अद्वैतवेदान्ती है, वे भी भागवत्पुराण, रामायण, राम चरित मानस, दुर्गासप्तषती आदि ग्रन्थों की अपेक्षा गीता का ही स्वाध्याय करते है। इसलिए कहा जाता है कि गीता ने अद्वैतवेदान्त के प्रचार-प्रसार में जितना योगदान दिया है उतना किसी अन्य ग्रन्थ ने नहीं दिया है। इस प्रकार गीता का माहात्म्य प्रतिपादित करते है। स्वयं भगवान कृष्ण ने कहा है-

‘‘जो कोई मेरे इस गीता रूप आज्ञा का पालन करेगा वह नि:संदेह मुक्त हो जायेगा।’’ (गीता 3/31)

यही नहीं भगवान यह भी कहते है कि जो इसका अध्ययन भी करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञान यज्ञ से पूजित होऊँगा। (गीता 18/70)

जब गीता का अध्ययन मात्र का माहात्म्य है तब जो मनुष्य इसके अनुसार अपना जीवन व्यतीत करता है और इसके आदर्श को जीवन में उतार कर चलता है, तब उसकी बात ही क्या? ऐसे भक्तों के लिए भगवान कहते है वह मुझे सबसे प्रिय होते है और ऐसे भक्तों के अधीन मैं स्वयं हो जाता हॅूं।

इस प्रकार गीता भगवान का प्रधान रहस्यमय आदेश है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के उपदेश का कितना ही अंश श्लोकों में, पद्यों में कहा था और कुछ गद्यों में, पद्यों का अंश ज्यों का त्यों वेद व्यास जी ने रख दिया किन्तु गद्यात्मक भाग को स्वयं श्लोकबद्ध कर लिया और इस सात सौ श्लोक और अठ्ठारह अध्याय वाली ग्रन्थ गीता को महाभारत के अन्दर मिला लिया, जो आज हमें इस अपने विशद् और मनोरम् कलेवर में प्राप्त होती है। इस प्रकार गीता शास्त्र ब्रह्म विद्या है। उसमें ब्रह्म विद्या के साध्य और साधन दोनों का वर्णन प्राप्त होता है जबकि और अन्य ग्रन्थों में या तो साध्य का या साधन का वर्णन होता है। इस दृष्टि से गीता सर्वशास्त्रमयी, सर्वधर्ममयी है। विश्व में गीता जैसा कोई ग्रन्थ नहीं है जिसमें सर्वधर्म का सार संग्रह हो, जिसमें ईश्वर और ईश्वर प्राप्ति दोनों के विधान किये गये है। इस दृष्टि से गीता के व्यवहारिक दर्शन् को भली भांति रेखांकित किया जा सकता है। इसमें कर्तव्य पालन पर बल दिया गया है, वर्णाश्रम व्यवस्था को ईश्वर प्राप्ति का केन्द्र बिन्दु माना गया है, जिससे परार्थवाद या परोपकार की प्रासंगिकता सिद्ध होती है। इस प्रकार गीतासार ईश्वर साक्षात्कार का दर्शन् है।

गीता का दार्शनिक तत्वविवेचन की दृष्टि से महत्व 

गीता की ज्ञान मीमांसा में ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता ये तीनों विषय महत्वपूर्ण है क्योंकि यही तीनों कर्म प्रवृत्ति हेतु है और इन तीनों के अभाव में कर्म सम्पन्न नहीं हो सकता है। जब मनुष्य को जीवन मुक्ति की अवस्था प्राप्ति होती है, तब यह त्रिपुटी एक हो जाती है तब मनुष्य में कर्म प्रवृत्ति का उदय नहीं होता है। इस प्रकार गीता का महत्व तत्त्व मीमांसीय दृष्टि से हो या ज्ञान मीमांसीय दृष्टि से या आचार मीमांसा की दृष्टि से देखा जाय तो तीनों ही दृष्टि से गीता का वर्ण्य विषय महत्वपूर्ण हो जाता है। गीता के महत्व के अन्तर्गत निम्नलिखित दार्शनिक तत्व सिद्धान्त मुख्य है उन मुख्य बिन्दुओं पर हम प्रकाश डालेगें- जो इस ईकाई की विषयवस्तु होगी। 1- त्रिविधयोग- एवं 2 निष्कामकर्मयोग। 3- स्थितप्रज्ञ 4-आत्मा 5-ब्रह्म या परमेश्वर 6-जीव 7- वर्ण, धर्म या स्वधर्म 8- दैवासुर-सम्पद 9- मोक्ष

त्रिविधयोग 

वास्तविक अर्थ में श्रीमद्भगवदगीता को ‘योगशास्त्र‘ की संज्ञा दी गई है इसके प्रत्येक अध्याय की पुश्पिका में ‘‘ब्रह्म विद्यायां योगशास्त्रे’’ ऐसा कहा गया है। अत: गीता का ‘योग’ सम्बन्धी विचार बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। ‘योग’ शब्द वस्तुत: सम्बन्धवाचक है अर्थात आत्मा का परमात्मा के साथ समन्वित सम्बन्ध को जो द्योतित करता है वह ‘योग’ है। ‘योग’ शब्द के अर्थ को तीन रूपों में देख सकते है-
  1. ‘युजिर् योगे’ घातु से बना ‘योग’ शब्द जिसका अर्थ है समरूप परमात्मा के साथ नित्य सम्बन्ध जैसे-’समत्वंयोगउच्यते’ (2/48) आदि। यही अर्थ गीता में मुख्यत: से आया है।
  2. ‘‘युज् समाधौ’’ धातु से योग शब्द निश्पन्न है जिसका अर्थ है- समाधि में स्थित चित्त की स्थिरिता ।
  3. ‘युज् संयमने’- धातु से बना ‘योग’ शब्द जिसका अर्थ है संयमन, सामथ्र्य और प्रभाव जैसे-’पष्य मे योगमैष्वरम् (9/5) आदि। गीता में जहां भी योग शब्द आया है उसमें तीनों अर्थों में से एक अर्थ की मुख्यता और शेष दो अर्थों की गौणता है। जैसे ‘युजिरयोगे’ वाले ‘योगशब्द’ में समता (सम्बन्ध) की मुख्यता है परमात्मा आने पर स्थिरता और सामथ्र्य भी स्वत: आ जाती है। 
पातंजल्ययोग दर्शन् में चित्त वृत्तियों के निरोध को ‘योग’ नाम से कहा गया है- ‘‘योगष्चित्तवृत्ति निरोध:’’ (1/12) और उस योग का परिणाम बताया है- ‘द्रष्टा की स्वरूप में स्थित हो जाना- ‘तदा दृश्टु: स्वरूपेSवस्थानम्’ (1/3) इस प्रकार पातंजल्ययोग दर्शन में जो ‘योग’ का परिणाम बतलाया गया है उसी को गीता में ‘योग’ के नाम से अभिहित किया गया है। ‘‘योगशब्दस्य गीतायामर्थस्तु त्रिविधो मत:। सामथ्र्ये चैव सम्बन्धे समाधौ हरिणा स्वयम्।।’’ आत्मा का परमात्मा के साथ नित्य सम्बन्ध स्थापित करने के लिये तीन योग मार्ग बतलाये गये है- जिन्हें 1- कर्मयोग, 2- ज्ञान योग और 3- भक्तियोग से जाना जाता है। इन्हीं तीन योगों की त्रिपुटी गीता है। यद्यपि ‘योग’ की प्राप्ति के लिये भगवान ने मुख्य रूप दो निष्ठाएं बतायी गयी हैं- कर्मयोग और सांख्य योग। जैसा कि गीता में वर्णित है-

लोकेSस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ। ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ।। (3/3) 

अर्थात असत् से सम्बन्ध विच्छेद करना ही कर्मयोग है और सत् के साथ योग होना सांख्य योग है परन्तु ये दोनों निष्ठाएं साधकों की अपनी है- भक्तियोग साधक की अपनी निष्ठा नहीं है अपितु यह भगवद् निष्ठा है। जो भक्त भगवान के लिए स्वयं को समर्पित कर दे उसे ‘भक्ति योग’ कहते है। इन तीनों योगों को सिद्ध करने के लिये या मनुष्य को अपना उद्धार करने के लिए ईश्वर से तीन शक्तियों प्राप्त है- 1- कर्म करने की शक्ति (कर्म),2- जानने की शक्ति (ज्ञान),3- मानने की शिक्ता (विश्वास) करने की शक्ति नि:स्वार्थ भाव से संसार की सेवा करने के लिए है जो ‘कर्म योग’ है। जानने की शक्ति से तात्पर्य है अपने स्वरूप को वास्तविक रूप में जानना और मानने की शक्ति से तात्पर्य है अपने को भगवान के लिए समर्पित कर देना भक्ति योग है। ये तीनों ही मार्ग परमात्मा प्राप्ति के स्वतंत्र साधन है और अन्य साधन इन तीनों के ही अन्तर्गत आ जाते है। इन तीनों का पृथक-पृथक वर्णन तो अन्य शास्त्रों में भी प्राप्त होता है किन्तु तीनों के समन्वय का गौरव गीता को ही प्राप्त है। इन तीनों योगों से कर्मों (पापों) का नाश सम्भव है- 

कर्मज्ञान भक्तियोगा: सर्वेSपि कर्मनाशका: । 
तस्मात् केनापि युक्त: स्यान्निष्कर्मा मनुजो भवेत्।। 

कर्मयोग- 

‘कर्मयोग’ वह योग है जिसमें कर्म की ही प्रधानता होती है। इसको मुख्य रूप से मानने वाले लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जी भी जो अपने ग्रन्थ ‘गीता रहस्य’ में गीता का मुख्य विषय कर्मयोग मानते है। ज्ञातव्य है कि सकाम और निष्काम के भेद से कर्म दो प्रकार के होते है। इनमें सकाम कर्म ही बंधन का कारण है जबकि निष्काम कर्म मोक्ष का कारण है। जो साधक केवल कर्तव्य कर्म यज्ञ की परम्परा को सुरक्षित रखने के लिए, लोक संग्रह के लिए सृष्टि चक्र की परम्परा चलाने के लिए ही कर्तव्य कर्म का पालन करता है, अर्थात कर्मों के लिए केवल दूसरों के लिए ही करता है अपने लिए नहीं वह सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है- 

‘‘यज्ञशिष्टाशिन: सन्तो मुच्यन्तेसर्वकिल्विशै:।’’ (3/13) 

ज्ञान योग- 

‘ज्ञान योग’ को गीता का मुख्य प्रतिपाद्य विषय मानने वाले सर्वप्रमुख विद्वान आचार्य शंकर है। इनके अनुसार संसार को असार मानना तथा आत्मा को परमात्मा के रूप में समझना ही ‘ज्ञानयोग’ है। ज्ञानी के लिए जो कुछ भी दृश्य पदार्थ है वह मृग तृष्णा या रज्जू में सर्प की प्रतीति की भांति मिथ्या है। क्योंकि आचार्य शंकर का प्रमुख सिद्वान्त है-

 ‘‘ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या जीवोब्रह्मैव नाSपर:’। 

अर्थात ब्रह्म ही सत्य है और जगत मिथ्या है। जीव तथा ब्रह्म एक ही है। सबकुछ ब्रह्म ही है। यह ब्रह्म एक, अद्वैत तथा शुद्ध ज्ञान स्वरूप है। ब्रह्म ही आत्मा है और आत्मा ही ब्रह्म है। यही एकत्व की प्रतीति ही ‘‘ज्ञानयोग’’ है। गीता में कहा गया है कि- 

‘‘सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि। 
ईक्षते योगमुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन:’’ ।। (गीता 6/29) 

अर्थात समाधि योग में अवस्थित पुरूष सर्वत्र ब्रह्म का दर्शन कर अविद्या से उत्पन्न शरीरादि की सीमा रहित आत्मा को सब प्राणियों में अवस्थित और सब प्राणियों को अभिन्न रूप में आत्मा में कल्पित देखते है। इसी विषय को और स्पष्ट करते हुये आगे कहा गया है कि- 

‘यो मां पष्यति सर्वत्र सर्व च मयि पश्यति। 
तस्याहं न प्रणष्यामि स च मे न प्रणष्यति’’।। (गीता 6/30) 

अर्थात जो पुरूष सम्पूर्ण भूतों में सबके आत्म रूप मुझ वासुदेव को ही व्यापक रूप से देखता है और सम्पूर्ण भूतों को मुझ वासुदेव के अन्तर्गत देखता है उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिए अदृश्य नहीं होता है। गीता में ज्ञानयोगी को समदष्र्ाी बताया गया है। ज्ञान रूपी सूर्य के उदय होने पर अज्ञान रूपी अन्धकार नष्ट हो जाता है। वैसी स्थिति ज्ञानयोगी की होती है। ज्ञानयोगी समस्त प्राणियों को समान भाव से देखता है- 

‘‘विद्या-विनय-सम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। 
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन:’’ ।। (गीता 5/18) 

अर्थात ज्ञानी लोग विद्या और विनय युक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी और कुत्ते तथा चाण्डाल में भी समदश्री ही होते है। तात्पर्य यह है कि ज्ञान योगी का विषयभाव सर्वथा नष्ट हो जाता है। उसकी दृष्टि में एक मात्र सच्चिदानन्द परमात्मा की सत्ता है। अत: उसकी दृष्टि सर्वत्र समभाव वाली हो जाती है तथा परमात्मा में ही सम्पूर्ण भूतों का विस्तार जब देखता है तभी उसी क्षण वह सच्चिदानन्द ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है- 

‘यदा भूत पृथग्भावमेक्स्थमनुपष्यति। 
तत् एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा’’।। (गीता 13/30) 

क्योंकि जैसे प्रज्वल्लित अग्नि ईधनों को जलाकर भस्म कर देती है वैसे ही ज्ञान रूपी अग्नि समस्त कर्मों का भस्म कर देती है- 

‘‘ यथैधांसि समिद्धोSग्रिर्भस्मसात् कुरूतेSर्जुन। 
ज्ञानाग्नि: सर्वकमाणि भस्मसात्कुरुते तथा’’ ।। (गीता 4/37) 

इसीलिए गीता में जोर देकर ज्ञान की महत्ता को प्रतिपादित किया गया है और कहा गया है कि इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला नि:संदेह कुछ भी नहीं है- ‘‘नहि ज्ञानेन सदृषं पवित्रमिह विद्यते’’ । इसी बात को उपनिशदों में भी कहा गया है कि ‘‘ज्ञानात् ऋते न मुक्ति:’’ अर्थात बिना ज्ञान के मुक्ति सम्भव नहीं है। गीता के 10/10 में कहा गया है कि जो भक्त सदा मेरी चिन्ता करते हुए श्रद्धा से मेरी अराधना करते है उन्हें मैं अपने सम्बन्ध का सम्यक ज्ञान प्रदान करता हू जिससे वो मुझकों प्राप्त कर सके- ‘‘ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते’’। आगे 4/33) जो पुरुश जितेन्द्रिय, साधन परायण और श्रद्धावान होते है वह ज्ञान को शीघ्र ही प्राप्त कर लेते है तथा ज्ञान प्राप्ति के बाद भगवत् प्राप्ति रूप परम आनन्द को प्राप्त हो जाता है- ‘‘श्रद्धावॉंल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:। ज्ञानं लब्ध्वा परा शांतिमचिरेणधि गच्छति’’।। (5/39) भक्तों में ज्ञानी भक्त को भगवान से श्रेष्ठ कहा है। (7/17) गीता के ज्ञानयोगी को ‘स्थितप्रज्ञ’ भी कहा गया है। क्योंकि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति केवल एक मात्र परमात्मा को ही सत्य मानता है और जागतिक पदार्थों को जो ब्रह्म से अतिरिक्त है, को मिथ्या मानता है। गीता की ज्ञानयोग की सबसे बड़ी विशेषता: यह है कि संसार का त्याग न करके संसार के प्रति आसक्ति कर त्याग करने की बात कहते है। 3- भक्ति योग:-भक्ति शब्द ‘भज्’ धातु से निष्पन्न है जो सेवा करने के अर्थ में प्रयुक्त होती है अपने उपस्य देव की श्रध्दापूर्वक सेवा करना ही ‘भक्ति’ है। जो संसार से विमुख होकर केवल भगवान की शरण में शरणागत हो जाता है , उसे भगवान सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर देते हैं। क्योंकि भगवान अर्जुन से कहते हैं कि तूँ सम्पूर्ण धर्मों का आश्रय छोड़कर एक मेरी शरण हो जा ,मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूगाँ । तू चिन्ता मत कर - 

सर्व धर्मान् परित्यज मामेकं शरणं ब्रज । 
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिश्यामि मा शुच:।। (गीता 18/66) 

भक्तियोग को सर्वश्रेष्ठ साधन मानने श्री रामानुजाचार्य ने गीता में भक्तियोग का प्रतिपादन किया है भक्ति का तात्पर्य ध्यान, भजन, कीर्तन, मनन, उपासना आदि से है । परमात्मा के अतिरिक्त किसी अन्य का भाव मन में न लाना ही अनन्य भाव कहा जाता है । यही अनन्यभाव ही भक्ति योग है - 

अनन्याष्चिन्तयतो मां ये जना: पर्युपासते । 
तेशां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ।।(गीता 9/22) 

अनन्य भक्ति को ही गीता में ‘अनन्यचित्त’ भी कहा गया है । इस अनन्यचित्त वाले व्यक्ति को ईश्वर की प्राप्ति दुर्लभ नही होती । जैसा की भगवान श्री कृष्ण कहते हैं - 

अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यष:। 
तस्यां सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन:।। (गीता 8/14) 

अर्थात् जो व्यक्ति मुझमें अनन्यचित्त होकर सदा ही निरन्तर मुझ पुरूषोत्तम को स्मरण करता है। उस योगी के लिए मैं सर्वथा सुलभ हूँ अर्थात् उसे मैं सहजता से प्राप्त हो जाता हूँ आगे 18/65 में भगवान कहते हैं कि- 

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरू। 
मामेवैश्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोSसि में।। (गीता 18/65) 

अर्थात्-तुम मुझमें हृदय अर्पण करो, मेरे भक्त हो जाओ, मेरी पूजा करो और मुझे नमस्कार करो, मै सत्य प्रतिज्ञा करके कहता हूँ, इससे मेरे प्रसाद लब्ध ज्ञान के द्वारा तुम मुझे ही पाओगे, क्योंकि तुम मेरे अति प्रिय हो इस प्रकार भक्ति द्वारा ही भक्त सभी सांसारिक अज्ञान जनित बन्धनों को तोडकर भगवान को प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार ईश्वर का सर्व श्रेष्ठ साधन भक्ति है ईश्वर के प्रति निष्काम भाव से अनन्य अनुराग को भक्ति कहा गया है। गीता मैं भगवान ने बारम्बार इस प्रकार आश्वासन दिये है- मेरे भक्त का कभी नाश नहीं होता है- 

‘‘न मैं भक्त: प्रणष्यति’’ (गीता 9/31) 

ज्ञान कर्म तथा भक्तियोग का समन्वय- समस्त शास्त्रों के मन्थन से अमृत मयी गीता का आविर्भाव हुआ है। इस लिये गीता को ‘सर्व शास्त्रमयी’ कहा गया है। इसमें सभी मतों, दृष्टियों, सिद्धान्तों और विचारों का जो युक्ति युक्त समन्वय देखने को मिलता है। वह अन्यत्र दुर्लभ है। ज्ञान, कर्म और भक्ति ये तीनों मोक्ष के ही साधन बताये गये हैं। इनमें से किसी एक का आश्रय लेकर साधक आसानी से अपने साध्यों (मोक्ष) को प्राप्त कर सकता है। जैसे वामदेव, शुकदेव, आदि ज्ञानियों ने ज्ञान रूपी साधन से ईश्वर रूपी साध्य को प्राप्त किया जनक आदि महा पुरूषों ने अपने निष्काम कर्म के द्वारा ईश्वर को प्राप्त किया तथा भक्त प्रह्लाद ने आदि ने भक्ति के द्वारा ईश्वर को प्राप्त किया अत: तीनों मार्ग समयक और उचित है। तीनों में से कोई किसी मार्ग को अपना सकता है। मार्ग भले ही अलग-अलग हैं लेकिन तीनों का मन्तव्य एक ही है- ईश्वर प्राप्ति। किसी भी मार्ग का किसी के साथ कोई विरोध नहीं है। इन तीनों का समन्वय गीता के 9/34 में करते हुये भगवान कहतें है- 

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरू। 
मामेवैश्यसि युक्त्वै वमात्मानं मत्पराणय।। (गीता 9/34) 

अर्थात् मुझमें मन लगाने वाला होओ, मेरा भक्त बनो- (भक्तियोग), मेरा पूजन कर, तथा मुझे प्रणाम कर (कर्मयोग) इस प्रकार आत्मा को मुझमें निश्चय करके (ज्ञानयोग) मेरे परायण होकर तुम मुझको ही प्राप्त होगा। अर्थात् कहने का तात्पर्य है कि भगवान के नामरूप, गुण आदि का श्रवण कीर्तन आदि भक्ति है, निष्काम भाव से यज्ञ आदि का अनुश्ठान करना निष्काम कर्म है और ईश्वर के विषय में यह जान लेना कि ईश्वर ही कर्ता, धर्ता विधाता है और एक मात्र यही सत्य है, सर्वव्यापी है, सर्वज्ञ है, परम पुरूष पुरूषोत्तम है, यही ज्ञान है, इस प्रकार गीता में तीनों मार्गों का समन्वित प्रतिपादन देखने को मिलता है। 

निष्काम कर्म योग 

कर्म योग वह है जिसमें कर्म की प्रधानता होती है। सकाम और निष्काम के भेद से कर्म दो प्रकार के होते है- सकाम कर्म बन्धन के हेतु होते है तो निष्काम कर्म मोक्ष के हेतु होते है। गीता को मुख्य प्रतिपाद्य विषय निष्काम कर्म है। यह वह कर्म है जिसमें कामनाओं का सर्वथा अभाव रहता है क्योंकि इसका उपदेश कर्म से पलायित अर्जुन को कर्मरत् करने के लिए उस समय दिया गया है। जब कुरूक्षेत्र में सगे सम्बन्धियों को देखकर अर्जुन मोह ग्रस्त हो जाते हैं और किं कर्तव्य विमूढ़ की अवस्था को प्राप्त हो जाते है। इस प्रकार अर्जुन युद्ध नहीं करने का निश्चय करते है। ऐसे समय में गीता का उपदेश श्री कृष्ण के द्वारा दिया गया है। कर्मयोगी कर्म फल के प्रति अनासक्त होता है क्योंकि आसक्त कर्म जीव को बन्धन में डालतें है जिससे मनुष्य विभिन्न योनियों में भटकता हुआ अधोगति को प्राप्त होता है निष्काम कर्म योगी अनासक्त भाव के कारण सुख, दु:ख, लाभ-हानि, जय-पराजय सबमें समभाव रहता है यथा- 

सुख-दु:खे समेकृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। 
ततो युद्धाय युज्यस्व नैव पापं वाप्स्यसि।। (गीता 2/38) 

अर्थात् अर्जुन को जय-पराजय, लाभ-हानि आदि से ऊपर उठकर क्षत्रिय धर्म रूपी स्वकर्तव्य पालन का उपदेश देते है। आसक्ति के कारण ही अर्जुन के मन भया रूढ़ वैराग्य उत्पन्न हुआ। ऎसा वैराग्य स्वभाविक न होकर बन्धन का हेतु बन रहें थ। इसी लिये श्री कृष्ण ने निष्काम कर्म करने का उपदेश दिया है। क्योंकि इस प्रकार के कर्मों का कोई शुभा-शुभ फल नहीं होता है। अत: व्यक्ति ऎसे कर्मों की माध्यम से जन्म और मृत्यु के चक्र को तोडकर सदा के लिये अपने को परमेश्वर में विलीन कर लेता है यही निष्काम कर्म ही ‘कर्मयोग’ है। गीता के द्वितीय अध्याय के 47 श्लोक में निष्काम कर्म की व्याख्या करते हुये भगवान श्री कृष्ण ने कहा है- 

कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेशु कदाचन। 
मा कर्म फलहेतुभ्रूमा ते संगोSस्त्वकर्मणि।। 

अर्थात ‘‘ तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलो में कभी नहीं इसलिये तुम कर्मों के फल का हेतु मत बन तथा कर्म न करने में भी तेरी आसक्ति न होवे’’ यहां निष्काम कर्म के बन्धन में एक स्वाभाविक प्रश्न मन में उठता है कि कोई भी मुर्ख व्यक्ति भी किसी प्रयोजन के बिना कार्य में प्रवृत्त नहीं होते है- ‘‘ प्रयोजनमनूदिष्य मन्दों•पि न प्रवर्तते’’ इस न्याय के अनुसार निष्काम कर्म तो असम्भव है। क्योंकि यदि कोई कामना ही नहीं होगी तो हम कर्म क्यों करे ? क्योंकि कर्तापन और आसक्ति, निष्काम कर्म के दो अंग बताये गये है इन दोनों का अभाव असम्भव है अत: निष्काम कर्म भी असम्भव है। इस समस्या का समाधान करते हुये स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने कहा है- 

प्रकृते क्रियमाणानि गुणै: कर्माणि सर्वश:। 
अहंकार विमूढ़ात्मा कर्ताSहमिति मन्यते।। (3/26) 

अर्थात् कर्तापन का अभाव तभी सम्भव है, जब व्यक्ति यह भलि-भांति समझ ले कि इसका कर्ता मैं नहीं हूँ कर्म तो प्रकृति की गुणों द्वारा किये जाते हैं। अत: जो ज्ञानी व्यक्ति है वह यह जानता है कि सभी कर्म प्रकृति जनित गुणो द्वारा ही किया जाता है अर्थात् समस्त मनुष्य प्रकृत जनित गुणों द्वारा परवष होकर कर्म करने के लिये बाध्य होता है- 

‘‘कार्यते ह्यवष: कर्म सर्व: प्रकृतिजैगुणै:’’ (गीता 3/5)। 

इसलिये जो ज्ञानी मनुष्य होता है वह यह जानता है कि जो कर्ता कर्म का अभिमान वह केवल अज्ञानता के कारण है। इस प्रकार निष्काम कर्म ही वास्तविक कर्म योग है। गीता में निष्काम कर्म का उद्देश्य दो रूपों में बताया गया है- (1) आत्मशुद्धि और (2) ईश्वर के प्रयोजन को पूरा करना। पहला कर्म केवल योगी करता है। अपने समूह के लिये जिसका वह अंग होता है लेकिन दूसरे के अनुसार ईश्वर के लिए कर्म किया जाता है। और जिसका फल ईश्वर को अर्पित किया जाता है। परस्पर एक दूसरे के प्रति कर्तव्य का बोध है। और दूसरे में लोक की सेवा वह ईश्वर के लिए करता है परन्तु ध्यान देने की बात यह है कि कर्म चाहे कर्तव्य के लिये किया जाय या ईश्वर सेवा के लिए वह सम्पूर्ण अर्थों में निष्काम नहीं कहा जा सकता है। गीता में भी निष्काम का अर्थ लक्ष्यविहीनता न होकर कर्म फल के प्रति आसक्ति से विरत होने में है। गीता अपने सामाजिक और आध्यात्मिक दोनों अर्थों में लक्ष्य विहीन न होकर निष्काम कर्म योग का अनुपालन करती है। इस लिये श्री कृष्ण अर्जुन को अपने दायित्व निर्वाह करने का तथा सामाजिक दायित्व के रूप में स्वधर्म पालन करने का तथा निष्काम कर्म योगी बनने का उपदेश देते हैं। निष्काम कर्मयोगी के विषय में गीता में कहा गया है कि जो कर्म योगी अपने स्वधर्म का पालन निष्काम या अनासक्त भाव से करता है वह सांसारिक भव बन्धन से मुक्त हो जाता हैं। इस प्रकार गीता के ‘ब्राह्मी’ स्थिति को प्राप्त हो जाता है। गीता के निष्काम कर्म का उपदेश कर्तव्य के लिये कर्तव्य करने जैसा है। (Duty for Duty) व्यक्ति की श्रेष्ठता फल प्राप्ति में नहीं है बल्कि फल त्याग में है, कर्म करने की क्ुशलता भी योग है- ‘योग: कर्मसु कौशलम्’ वर्ण व्यवस्था के किसी भी वर्ण का शूद्र व्यक्ति क्यों न हों यदि वह स्वधर्म का पालन कर्तव्य निश्ठ भाव से करता है तो वही स्थिति वह भी प्राप्त करेगा। जिस स्थिति को ब्राह्मण प्राप्त करता है। क्योंकि वर्ण व्यवस्था का निर्धारण व्यक्ति के गुण और कर्म के अनुसार ही है- ‘‘चार्तुवर्णयं मया सृश्टम गुण: कर्म विभागश:’’ इस प्रकार निष्काम रूप में कह सकते है कि गीता कर्मयोग नैशकम्र्य या कर्म निशेध नहीं है किन्तु कामना का त्याग है, अर्थात् कामना के त्याग से तात्पर्य कर्म फल के त्याग से है। गीता 18/2 में कहा गया है ‘‘काम्यानाम कर्मणा न्यासं सन्यासं कवयो विदु:’’ इस प्रकार निष्काम कर्म अकर्मण्यता की शिक्षा नहीं देता है अपितु कर्म फल के त्याग की शिक्षा देता है, तथा सिद्धि असिद्धि समस्त स्थितियों में कर्तापन के अभिमान से रहित समत्व बुद्धि को उत्पन्न करता है-

‘‘सिद्ध्यसिद्भ्यो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते’’। (गीता 2/48)

इस प्रकार कह सकते है कि निष्काम कर्म ईश्वरार्थ कर्म है और ईश्वरार्थ कर्म ही अनासक्त कर्म है। जो बन्धन का बाधक तथा मोक्ष का साधक है गीता में वर्णित है- 

‘‘ ब्रह्मण्यधाय कर्माणि संगं त्यक्त्वा करोतिय:। 
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा।।’’ (गीता 5/10) 

स्थित प्रज्ञ 

जिसकी प्रज्ञा या बुद्धि आत्मा या ईश्वर में प्रतिष्ठित है वह स्थिति प्रज्ञ’ है। भगवान कहते है कि जब निष्काम कर्म योगि की बुद्धि मोह या अज्ञान रूपी पाप को छोड देगी तब सुनने योग्य और सुने हुये विषयों तुम्हें वैराग्य प्राप्त होगा अर्थात् वे विषय तुम्हारे सामने निरर्थक प्रतीत होंगें। इसके पश्चात् तुम्हारी बुद्धि समाधि में स्थित हो जायेगी और इसके बाद भी समबुद्धि की योगावस्था को प्राप्त हो जाओगें। अर्थात् बुद्धि तत्व ज्ञान में प्रतिष्ठित हो जायेगी इस प्रकार जिसे कुछ भारतीय दर्शनों में ‘‘जीवनमुक्त’’ नाम से जाना जाता है। वही गीता में ‘‘स्थित प्रज्ञ’’ है। इस प्रकार स्थित प्रज्ञ गीता में समत्व योगी को या समाधि में पहुंचे साधक के लिए प्रयुक्त हुआ है। ‘‘स्थित प्रज्ञ’’ की अवस्था निष्काम कर्म योगी की चरमावस्था का समन्वित रूप होता है यह कर्म का अपितु कर्म फल का त्याग करता है। वह संसार का नहीं अपितु संसार के प्रति अपनी आसक्ति का त्याग कर देता है। ‘‘स्थित प्रज्ञ’’ प्राप्त व्यक्ति सब प्राणियों में ईश्वर को और ईश्वर में सब प्राणियों को देखता हुआ सर्वेष्वरवादि हो जाता है। िस्थ्त प्रज्ञ रूपी समाधि में पहुंचना ब्रह्म ज्ञानी के ही वश की बात है। 

‘स्थिर बुद्धि’ और स्थित प्रज्ञ दोनो को कुह लोभ भ्रम से एक मान बैठतें है किन्तु दोनों में सूक्ष्म अन्तर है गीता में भेद करते हुये स्पष्ट रूप से कहा गया है- कि स्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण तो नहीं करता है अर्थात् इन्द्रियों को उनके विषयों से विमुख कर लेता है। किन्तु उन विषयों से रागात्मक निवृत्ति नहीं मिल पाती है। जबकि स्थित प्रज्ञ व्यक्ति का राग परमात्मा का साक्षातकर करके निवृत्त हो जाता है- 

‘‘विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिन:। 
रसवर्जं रसोSप्यस्य परं दृश्टता निर्वतते।। (गीता 2/59)

इस प्रकार विषयों से इन्द्रियों का हटा लेना ही केवल स्थित प्रज्ञ का लक्षण नहीं हो सकता है। बल्कि रागात्मक विकारों से मुक्त होकर शुद्ध बुद्धि रूप आत्म प्रकाश में प्रतिष्ठित होना ही प्रज्ञा कहलाती है। ऎसी प्रज्ञा से युक्त व्यक्ति मन की अपनी चंचलता को वश में करके ‘स्थित प्रज्ञ’ हो जाता है। 

स्थित प्रज्ञ की अवस्था ध्यान जन्य समाधि की अवस्था से भिन्न है क्योंकि स्थित प्रज्ञ की अवस्था जग्रता अवस्था की सहज समाधि की अवस्था है। जबकि ध्यान जन्य समाधि की अवस्था में एकाग्रता की स्थिति सप्रयास प्राप्त की जाती है और इस अवस्था में मन की वृत्तियों में भी परिवर्तन होता रहता है जबकि स्थित प्रज्ञ की अवस्था जाग्रत अवस्था होते हुये भी ईश्वर ने समाधिस्थ होने के कारण स्थिर होती है गीता के द्वितीय अध्याय में अर्जुन के द्वारा ‘स्थित प्रज्ञ’ का लक्षण जानने की जिज्ञासा (उत्सुकता) बढ़ जाती है और वह भगवान से पूंछते है कि- 

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव। 
स्थितधी: किं प्रभाशेत किमासीत व्रजेत किम्।।

अर्थात् अर्जुन ने पूछा कि हे केशव समाधि युक्त स्थित प्रज्ञ व्यक्ति का क्या लक्षण है, स्थित बुद्धि होने पर वह किस प्रकार की बातें करता है, किस तरह रहता है, और किस तरह विचरण करता है ? इस प्रकार अर्जुन द्वारा स्थित प्रज्ञ का लक्षण पूछे जाने पर श्री कृष्ण ने स्थित प्रज्ञ की निम्नलिखित लक्षण बताये है- 
  1. स्थित प्रज्ञ सभी प्रकार की सात्विक, तामसिक और राजसिक कामनाओं वासनाओं पर विजय प्राप्त किये रहता है तथा आत्मा को वाह्य विषयों से हटाकर स्वरूपानन्द में संतुष्ट रहता है उसे स्थित प्रज्ञ कहते है। प्रजहाति यदा कामानं्सर्वान पार्थ मनोगतान्। आत्मन्येवात्मना तुष्ट: स्थित प्रज्ञस्यतदोच्यते।। अर्थात् जो सभी प्रकार के विषय-चिन्तन को छोड़कर सदा श्री भगवान में चित्त को लगाये रखते है उनको ही ईश्वर के दर्शन् प्राप्त होते है। 
  2. स्थित प्रज्ञ भक्त को काम-क्रोध आदि विकार ग्रस्त नहीं कर पाते हैं केवल नाम-मात्र के ही रह जातें हैं जैसे- जली हुई रस्सी में ऐंठन दिखता है, रस्सी का आकार तो है किन्तु फूंक देने से वह उड़ जाती है। इसी प्रकार ईश्वर को प्राप्त कर लेने से और उसमें समाधिस्थ होने से ज्ञान-विचार नहीं रह जाता है। ब्रह्म ज्ञान होने पर संसारसक्ति नहीं रह जाती है क्योंकि ईश्वर के समीप जितना अधिक पहुंच जायेगें उतनी ही अधिक शान्ति मिलेगी। 
  3. विभिन्न प्रकार के दु:खों में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता है, सुखों में भी जो आंकाक्षा रहित है तथा जो भय-क्रोध से रहित है, ऐसे व्यक्ति को ‘स्थित प्रज्ञ’ मुनि कहते है। (गीता 2/56)। अत: सुख-दु:ख, आसक्ति भय, क्रोध आदि के पीछे कामना या वासना ही है। वासना रहित होने से ‘स्थित प्रज्ञ’ की अवस्था प्राप्त होती है। 
  4. स्थित प्रज्ञ अनीह होने से राग, द्वेश और क्रोध से मुक्त होता है। 
  5. स्थित प्रज्ञ सभी विषयों से अनासक्त होकर ईश्वर में लीन होता है। 
  6. स्थित प्रज्ञ व्यक्ति का मुख्य लक्षण यह होता है कि वह अपनी इन्द्रियों को अपने वष में किये रहता है अर्थात् जितेन्द्रिय बन जाता है। जिस प्रकार कछुआ विविध अंगों को अपने अन्दर समेट लेता है उसी प्रकार जब यह जितेन्द्रिय योगी इन्द्रियों को विषयों से पूर्णतया अपने भीतर लौटा लेता है तब उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित मानी जाती है- 
यदा संहरते चायं कुर्मोंSगांनीव सर्वष:। 
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।। (गीता 2/58)

स्थित प्रज्ञ प्राप्त साधक इन्द्रियों को विषय भागों से हटा तो लेता है और शब्दादि विषय दूर हो जाते है किन्तु उसकी रस या आसक्ति रह जाती है स्थित प्रज्ञ का यह रस भी परमात्मा का साक्षात्कार करने से निवृत्त हो जाता है- (गीता 2/59) भगवान अर्जुन को समझाते हुये आगे कहते हैं कि कुन्ती पुत्र अर्जुन निश्चय ही बलवान इन्द्रियां यत्नषील विवेकी पुरूष के भी मन का बल पूर्वक हरण कर लेती है- ‘इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभमं मन:’ अन्तिम श्लोक जो स्थित प्रज्ञ से सम्बन्धित है उसमें भगवान कहते हैं कि मेरे एकान्त भक्त या आत्मनिश्ठ योगी को उन इन्द्रियों को संयत करके समाहित होकर अवस्थित रहना चाहिये क्योंकि जिसकी इन्द्रियां वश में उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित है। (गीता 2/61) स्थित प्रज्ञ व्यक्ति में सम्पूर्ण भोग विषय उसी प्रकार विकार उत्पन्न नहीं कर पाते जिस प्रकार चलायमान नदियां सागर में गिर कर भी सागर को चलायमान नहीं कर पाती हैं। स्थित प्रज्ञ पुरूष सभी कामानाओं को त्याग कर ममता रहित और अंहकार रहित, िस्त्रीहा रहित हुआ, वर्तता हुआ शान्ति को प्राप्त करता है। ‘स्थित प्रज्ञता:’ की स्थिति ब्रह्म को प्राप्त हुये पुरूष की स्थिति है। इस स्थिति को प्राप्त होकर पुन: मोहित नहीं होता है। और अन्तकाल में ब्रह्मलोक को प्राप्त हो जाता है। उदाहरण के रूप में- याज्ञवल्क्य, जनक, कबीर, नानक, तुलसी, शंकराचार्य, स्वामी रामकृष्ण परमहंश आदि स्थित प्रज्ञ कहे जाते है। 

स्थित प्रज्ञ प्राप्त सिद्ध पुरूषों का कोई स्वार्थ नहीं होता है उनका कार्य लोकसंग्रह या लोककल्याण के लिये होता है, ब्रह्म ज्ञान के बाद कोई ज्ञानतव्य, कोई पातव्य और कोई कर्तव्य से शेष नहीं रह जाता है। लोक कल्याण की कामना से कोई कर्म नहीं करता अपितु उसके द्वारा सम्पादित कार्यों से स्वत: लोक कल्याण होता है। 

गीता में आत्मतत्व

गीता में आत्मतत्व को मुख्य रूप से प्रतिपादित किया गया है। गीता में आत्मतत्व के लिये नित्य, अविनाशी, अज, अव्यय, सर्वगत, अचल, सनातन, अव्यक्त, अचिन्त्य और अविकार्य आदि पद प्रयुक्त हुये है। ‘नित्य’ उसे कहा जाता है जिसकी सत्ता त्रैकालिक हो। त्रिकाल से तात्पर्य भूत, वर्तमान और भविश्य से है। क्योंकि आत्मा के अतिरिक्त और कोई वस्तु ऎसी नहीं है जो तीनों कालों में नित्य रह सके अत: आत्मा ही नित्य सिद्ध होती है। ‘अविनाशी’ से तात्पर्य है जिसका विनाश न हो अर्थात् विनष्ट न हो। शरीर नश्वर है आत्मा नित्य है, शरीर नष्ट हो जाता है और पंच महाभूतों में विलीन हो जाता है किन्तु आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेष करती रहती है। जिस प्रकार कोई व्यक्ति पुराने जीर्ण वस्त्रों को उतारकर दूसरे नये वस्त्रों को पहन लेता उसी प्रकार आत्मा भी पुरानी शरीरों को छोडकर नये शरीर को धारण करती है- 

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय। 
नवानि गृह्णाति नरोSपराणि।। 
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा। 
न्यन्यानि संयाति नवानि देही।। (2/22)

‘आत्मा को सत् भी कहा गया है क्योंकि जो सत् उसी का भाव है और जो असत् है उसका भाव नहीं हो सकता है और जो सत् है उसका अभाव नहीं हो सकता- 

‘नासतो विद्यते भाव ना भावो विद्यते सत:’ (गीता 2/16) 

अर्थात् सत् वही हो सकता है जो त्रिकाला बाध हो अर्थात् भूत, वर्तमान और भविष्य में जो तीनों कालों में सदा सर्वदा नित्य एक रस और अपरिवर्तन शील रहे यह लक्षण शुद्ध आत्मतत्व या ब्रह्म का है। और वही ‘सत’ है। 

गीता में भगवान श्री कृष्ण ने आत्मा के स्वरूप के विषय में कहा है कि आत्मा सदैव एक रूप है। उसमे कभी विकार उत्पन्न नहीं होता है। इसलिये आत्मा को अविकारी कहा जाता है। आत्मा देह आदि उपाध्यों से युक्त होता है जो औपाधिक है वास्तविक नहीं। जीवात्मा पहले कुमारावस्था पुन: युवावस्था और फिर वृद्धावस्था को प्राप्त होता है। अर्थात् पहले स्थूल शरीर को प्राप्त करता है और पुन: सूक्ष्म शरीरों में प्रवेश करता है। विनाश तो शरीर का होता है आत्मा का नहीं जिस तरह जाग्रत, स्वप्न एवं सुशुप्ति तीनों अवस्थाओं में जीव हमेसा सत्य एवं नित्य रहता है। उसी तरह आत्मा की सत्यता एवं नित्यता है। अर्थात् उत्पत्ति एवं विनाश देह आदि का होता है, आत्मा का नहीं है।

‘‘देहिनोSस्मिन यथा देहे कौमारं यौवनं जरा। 
यथा देहान्तर प्राप्तिध्रीरस्तत्र न मुह्यति।। (2/13)

भगवान आत्मा का स्वरूप समझाते हुये कहते है कि यह दृष्टिगोचर होने वाला जगत अविद्या से उत्पन्न है यह जिस अत्यन्त सूक्ष्म, व्यापक, सद्रूप, ब्रह्म से व्याप्त है उसे सत् कहते हैं कोई भी इस नित्य आत्मा का विनाश करने में समर्थ नहीं होता। 

‘‘अविनाशी तु तद्विद्वि येन सर्वमिदं ततम्। 
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति।। (2/17)

आत्मा के अतिरिक्त जो कुछ भी दिखायी पड़ता है किसी की पृथक सत्ता नहीं है। ब्रह्म या आत्मा ही एक मात्र सत् है, सुख-दु:ख आदि अन्त: करण के धर्म है आत्मा के नहीं मन, बुद्धि, चित्त्, और अंहकार इन चार वृत्तियों की समष्टि अन्त:करण है। और इसी से सुख-दु:ख आदि का अनुभव होता है जो हम यह समझते है कि हम सुखी या दु:खी है इस भ्रम का कारण है ‘अज्ञान’ अर्थात् सत् और असत् वस्तुओं के ज्ञान का अभाव मैं चेतनमय, ज्ञान स्वरूप आनन्दमय आत्मा हूँ इस सत् तत्व को भूलकर जीव, शरीर, मन, बुद्धि, चित्त अहंकार आदि को अपना स्वरूप समझता है, फलस्वरूप उसे जीवन भर दु:ख ही भोगना पड़ता है। 

गीता के अनुसार यह आत्मा अविनाशी एवं अतुलनीय है जो व्यक्ति इसे अर्थात आत्मा को मारने वाला जानता है तथा जो व्यक्ति इसे मृत समझता है वे दोनो ही नहीं जानते है यह न मरता है और न ही मारा जाता है- 

‘‘य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्। 
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते।। (गीता 2/19)

आत्मा को गीता में शरीरी, देही, भी कहा गया है। और आगे भगवान अर्जुन को यह उपदेश देते हैं कि शरीरी नित्य है शरीर नाशवान है इसे जानकर स्वधर्म पालन के लिए हे अर्जुन ! तुम युद्ध करो, यथार्थ में किसी की मृत्यु नहीं होती है केवल अवस्थान्तर होकर सब कुछ आत्मा में लीन हो जाता है। आत्मा सर्वव्यापी है और परमसूक्ष्म है, इस कारण वह हत्या नहीं कर सकता और न हत् ही होता है- 

‘‘न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूय:। 
अजो नित्य: शाष्वतोSयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।। (2/20)

इसलिये हे अर्जुन! इस आत्मा को अविनाशी, नित्य, त्रिकाल में परिणाम शून्य, जन्मरहित, क्षयशून्य जानता है। हे पार्थ, वह व्यक्ति किस प्रकार किसका वध कराता है या किसका वध करता है ? इस प्रकार इस अग्रिम श्लोक में भगवान आत्मा का ही प्रकारान्तर से वर्णन करते हुये कहते हैं कि- 

‘‘नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:। 
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोशयति मारूत:।। (2/23)

अर्थात् इस आत्मा को नहीं काट सकते हैं अग्नि इस आत्मा को नहीं जला सकती तथा जल इसे गीला नहीं कर सकता वायु इस आत्मा को नहीं सुखा सकती है। इस प्रकार यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, निश्चल, और सनातन है- ‘‘नित्य: सर्वगत: स्थानुरचलोSयं सनातन:।’’ आत्मा के स्वरूप के विषय में और वर्णन किया गया है कि यह आत्मा वाणि से व्यक्त नहीं किया जा सकता, मन से इसका विचार नहीं किया जा सकता और यह आत्मा विकार रहित कहा जाता हैं। अत: इसे इस प्रकार का जानकर हे अर्जुन! तुम्हें शोक करना नहीं चाहिये और आगे भगवान कहते है कि हे अर्जुन यदि तुम यह मान भी लो कि यह आत्मा सदा उत्पन्न और मरणषील है तो भी तुमको इसके लिये शोक नहीं करना चाहिये क्योंकि जन्म लेने वाले की मृत्यु निष्चित है मृत व्यक्ति का पुर्नजन्म लेना निश्चित है। इस कारण ऎसे अवष्य समभावी विषय में तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये- 

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युधर्रुवं जन्म मृतस्य च। 
तस्मादपरिहार्येSर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ।। (गीता 2/27)

भगवान शरीरी या आत्मा के विषय में अर्जुन को साधारण दृष्टि से समझाते है कि हे अर्जुन सभी प्राणी जन्म के पूर्व अव्यक्त या अज्ञात थे, बीच में कुछ समय के लिये दिखाई पड़ रहें है और जो विनाश के बाद अज्ञात हो जायेंगे उनके लिए शोक करना अनुचित है जिन सगे सम्बन्धियों के लिए तुम चिन्ता कर रहें हो व जन्म के पूर्व तुम्हारे कौन थे और मृत्यु के बाद इनसें तुम्हारा क्या सम्बन्ध रहेंगा, उसे तुम नहीं जानते यह जो कुछ समय के लिए तुम्हारा इनके साथ परिचय हुआ है मानों रात भर के लिए धर्मशाला के यात्रियों के मिलन की तरह है। प्रात: काल होते ही सब लोग उस धर्मशाला को छोडकर अपने-अपने गन्तव्य स्थान को चले जायेंगें। अत: इस संसार में यह मेरा पुत्र है पत्नी है, पति है, ऎसा सम्बन्ध मानकर मोहित होकर शोक करना उचित नहीं है- 

‘‘ अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्त मध्यानि भारत। 
अव्यक्त निधनान्येव तत्र का परिदेवना।। (गीता 2/28)

भगवान आगे कहते है कि हे अर्जुन यह आत्मा सबके शरीर में सदा अवध्य है, इसलिये तुम्हें किसी भी प्राणी के निधन से शोक करना उचित नहीं। इसलिये हे अर्जुन अपने क्षत्रिय धर्म को देखकर अपने स्वधर्म से विचलित होना शोभा नहीं देता है, क्योंकि धर्म युद्ध के अतिरिक्त क्षत्रिय के लिये कुछ भी कल्याणकारी नहीं है। इसलिये अपने स्वधर्म का पालन करते हुयें तुम्हें युद्ध करना चाहिये क्योंकि यदि युद्ध नहीं करोगे तब आपकी अपकीर्ति पूरे विश्व में फैल जायेगी जो मृत्यु से भी बढ़कर दुख दायी होती है- और आगे समझातें हुये कहते है कि युद्ध करने से क्या लाभ है ? यदि युद्ध में मारा जायेगा तो स्वर्ग की प्राप्ति होगी और यदि युद्ध में जीत जायेगा तो पृथ्वी का राज्य भोगेगा। इसलिये हे अर्जुन युद्ध से विचलित न होकर युद्ध के लिये कृत निश्चय करके उठ खड़े होओ। सुख-दु:ख, लाभ-हानि, जय-पराजय को समान समझकर फिर तुम युद्ध के लिये सन्नद्ध हो जाओ इस प्रकार कर्तव्य कर्म करने से तुम्हें पाप स्पर्श नहीं करेगा। इस प्रकार भगवान ने गीता के द्वितीय अध्याय में आत्मा की अमरता से सम्बन्धित मुख्य उपदेश दिये है। इस प्रकार आत्मतत्व बड़ा ही गहन है और अत्यन्त मूढ़ विषय है जो व्यक्ति अज्ञानी है, मोह, माया से ग्रस्त है उसे आत्मतत्व समझ में नहीं आता है। 

ब्रह्म या परमेश्वर 

गीता की तत्व विवेचन में ब्रह्म या परमात्मा का महत्वपूर्ण एवं विषद् वर्णन किया गया है गीता ब्रह्म की सगुण निर्गुण दोनो रूपों को मानती है। और यह भी मानती है कि दोनों रूप एक ही अभिन्न तत्व के है ब्रह्म जगत की उत्पत्ति, स्थिति और लय का अभिन्न निमित्तोपादान कारण है, वह शूद्ध चैतन्य और अखण्ड आनन्द स्वरूप है। वह निर्विकल्प, निरूपाधि और विश्वातीत भी है। ब्रह्म अन्र्तयामी के रूप में सारी प्रकृति और समस्म प्राणियों में वास करता है। जिस प्रकार सूत में मणि पिरोई रहती है उसी प्रकार मणियों की तरह यह समस्त जगत मुझमें अनुस्यूत है। ब्रह्म या ईश्वर ही विश्वात्मा होते हुये भी वह विश्व में सीमित नहीं है, वह विश्वातीत भी है, अज्ञानी लोग भी मेरा अक्षय, सर्वश्रेष्ठ महानभाव अर्थात् स्वरूप न जानकर अव्यक्त, संसार से परे मुझे मनुष्य रूप में आविभ्र्ाूत समझते हैं। ब्रह्मनिर्विकार, निराकार, निर्गुण, निविशेष है। वह अपनी माया की सहायता से भी संसार के कल्याण के लिए लीलावष सविशेष गुणमय, साकाररूप धारण करते है और संसार में अवतीर्ण होते है। भगवान श्री कृष्ण ने गीता में वर्णन कहते हुये कहते है कि हे अर्जुन इस पूरे श्रृष्टि में मुझसे श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है। मैं जल में रस, चन्द्र सूर्य में ज्योति, समस्त वेदों में ओंकार स्वरूप, आकाश में शब्द और मनुष्यों में पुरूषाकार हूँ, जीव में जो शुद्ध चैतन्य प्रकाशित हो रहा है वही ब्रह्म रूप से इस समस्त वाह्य जगत में भी व्यापत है। अखण्डचिदानन्द स्वरूप परमतत्व को आत्मा या ब्रह्म कहते हैं। ब्रह्म या ईश्वर स्वत: शुद्ध चैतन्य एवं स्वयं प्रकाश है। गीता में श्री भगवान ने क्षर, अक्षर पुरूषोत्तम इन तीन प्रकार के पुरूषों का उल्लेख किया है। जहां सांख्य दर्शन पुरूष को एक मानता है। वही गीता में पुरूषनाना है। और उनके साथ प्रकृति नाना मानी गयी है जैसे- ‘क्षेत्रज्ञ्चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेशु भारत’’। तथापि वेदान्त के एकात्मवाद के समान गीता में भी एकात्मवाद समर्थित हुआ है जैसे- 

मन्त: परतरं नान्यत् कि्चिदस्ति धन्जय। 
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रं मणिगणा इवं ।। (गीता 7/7)

हे अर्जुन और जो कुछ समस्त प्राणियों का बीज कारण है, वह मै ही हूँ मेरे अतिरिक्त इस चराचर जगत में कोइ ऎसी वस्तु नहीं है जो मेरे बिना रह सके इस प्रकार सब कुछ ब्रह्म है- ‘‘सर्वखल्विदं ब्रह्म’’ यह श्रुति वाक्य समर्थित होता है जो वेदान्त दर्शन का मुख्य आधार स्तम्भ है। ब्रह्म ही समस्त भूतों और प्राणियों की स्थिति है तथा ब्रह्म में ही सब कुछ लय प्राप्त हो जाता हैं। अत: ब्रह्म को अलग कर देने से ब्रह्माण्ड की कोई यथार्थ सत्ता ही नहीं रह जायेगी। ब्रह्म आत्मा रूप से रहने के कारण ही सब प्राणी जीवित है। जैसे- कुम्हार घट का निमित्त कारण है और मिट्टी घट का उपदान कारण है। उसी प्रकार ब्रह्म भी निमित्त और उपदान कारण हैं। गीता के सातवें अध्याय के छठें श्लोक में भगवान कहतें है कि चेतन और अचेतन स्वरूप समस्त भूत इन दो प्रकार की प्रकृतियों से उत्पन्न इसे धारणा करों अथार्थ जानलो मै ही समस्त जगह की उत्पत्ति और प्रलय का कारण हूँ- 

एतद् योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय। 
अहं कृत्स्नस्य जगत: प्रभव: प्रलयस्तथा।।

योग दर्शन कहता है कि- ‘‘क्लेश कर्म विपाकाष यैर परामृश्ट: पुरूषविशेष ईश्वर:’’ अर्थात् क्लेश, कर्म विपाक और आशय ये चारो जीव मात्र में सतत् वर्तमान रहते है। इनके ही द्वारा पुरूष भोक्तृत्व रूप को प्राप्त होता है। ये चारो जिसमें नहीं होते है। अथवा जिसे स्पर्श नहीं कर पाते वहीं ईश्वर है। जीव के साथ ईश्वर का इतना ही भेद है जीव के कर्म होते है। अतएव उस कर्म के संस्कार भी होते है। ईश्वर का कोई कर्म नहीं होता है। अतएव उनका कोई संस्कार नहीं होता है इस कारण ईश्वर स्वभावत: चिरमुक्त है। ईश्वर को ‘‘पुरूषविशेष’’ भी कहा गया है। इसका कारण यह है कि पुरूष तीन प्रकार के होते हैं- 1- क्षर पुरूष 2- अक्षर पुरूष और पुरूषोत्तम है। पुरूषोत्तम ही ईश्वर है वह अन्य दो पुरूषों से विशेष या विलक्षण है- 

उत्तम: पुरूषस्त्वन्य: परमात्मेत्युदाहृत:। 
यो लोकत्रय भाविष्य तिभत्र्यव्यय ईश्वर:।। (गीता 15/17)

अर्थात् उन क्षर और अक्षर से भिन्न एक उत्तम पुरूष है जिन्हें ‘परमात्मा’ कहते हैं। जो अक्षर ब्रह्म सर्वज्ञ, नारायण तीनों लोकों में अपनी शक्ति से प्रविष्ट होकर उनका पालन करते हैं। भगवान आगे कहते है कि क्योंकि मैं क्षर से परे और अक्षर से भी अतीत तथा श्रेष्ठतम हूँ। इस कारण लोक व्यवहार या पुराण आदि में और वेदों में मैं पुरूषोत्तम नाम से प्रख्यात हूँ- 

यस्मात्क्षमतीतोSहमक्षरादपि चोत्तम:। 
अतोSस्मि लोके वेदे च प्रथित: पुरूषोत्तम:।। (गीता 15/18)

गीता परमेश्वर की दो प्रकृतियों का वर्णन करती है। (1) अपरा (2) परा। ‘अपरा’ प्रकृति को ‘क्षेत्र और ‘क्षर’ ‘पुरूष’ भी कहा गया है इसे जड़ प्रकृति भी कहते हैं क्योंकि इसके अन्तर्गत समस्त भौतिक पदार्थ विद्यमान हैं। ‘परा प्रकृति’ के अन्तर्गत चेतन जीव आते है। इसका अन्य नाम क्षेत्रयज्ञ और ‘अक्षर’ पुरूष भी है। ‘क्षर: सर्वाणि भूतानि कूटस्थो•क्षर उच्यते।’ (15/16)। इस प्रकार संसार में दो प्रकार के पुरूष है। 1- विनाशषील 2- अविनाशी। उनमें जीव-जगत विनाशषील है और कूटस्थआत्मा अविनाशी कहलाता है। जीव चैतन्य रूप होने से उत्कृश्ट या पराप्रकृति या विभूति है। जीव ‘कूटस्थ’ और ‘अक्षर’ है। भगवान जीव को अपना अंश कहते है- 

‘ममैवांषो जीव लोके जीवभूत: सनातन:।’ (गीता 15/7) क्षर पुरूष (जड़ प्रकृति) और अक्षर पुरूष (जीव) इन दोनों के ऊपर उत्तम पुरूष या पुरूषोत्तम है- (गीता 15/17) यह पुरूषोत्तम ही परमतत्व है जो जड़ प्रकृति और चेतन जीव दोनों से ऊपर की कोटि का है और यह इन दोनों की ‘आत्मा’ भी है। और यह दोनों में अन्तर्यामी रूप में रहकर दोनों का नियमन करता है फिर भी इसे विश्वतीत पुरूषोत्तम कहा गया है। इस प्रकार गीता भी सगुण ईश्वर और निगुर्ण ब्रह्म का अत्यधिक सुन्दर समन्वय दृष्टिगोचर होता है जिसका वर्णन श्रुतियों एवं वेदों में भी किया गया है। सगुण ब्रह्म ही सोपाधिक और सविकल्पक होकर ईश्वर बन जाता है। ईश्वर ही समस्त विश्व के कर्ता-धर्ता, नियन्ता और आराध्य है और पर ब्रह्म निर्गुण, निर्विषेश, निर्विकल्पक, निरूपाधिक, निश्प्रप´्च, अनिर्वचनीय और अपरोक्षानु-भूतिगम्य है। निर्गुण ब्रह्म का केवल निशेध मुख ‘‘नेतिनेति’’ से ही वर्णन सम्भव है। तैत्तरीय उपनिशद में कहा गया है- ‘यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत प्रयन्त्याभिसं विषन्ति ...................... तद् ब्रह्म’’- अर्थात् ‘‘ब्रह्म वह है जिससे इस जगत के समस्त पदार्थ उत्पन्न होते है। जिसमें स्थित और जीवित रहते है और जिसमे ंपुन: विलीन हो जाते है। निर्गुण ब्रह्म ही गीता दर्शन के अुसार कभी-कभी अपने आपको माया शक्ति द्वारा सीमित करके अवतार ग्रहण करता है। यही ईश्वर का सगुण स्वरूप होता है इस सम्बन्ध में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि- 

यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत्। 
अभ्युत्थानम धर्मस्य तदात्मानम सृजाम्यहम।। (गीता 4/7) 

इस प्रकार सगुण ब्रह्म की उपाषना पर गीता में विशेष बल दिया गया है किन्तु इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि निर्गुण ब्रह्म की उपासना को महत्वहीन समझा गया है। पूर्ण विश्वास और श्रद्धा से की गयी किसी भी तरह उपासना ईश्वर प्राप्ति का यथोचित मार्ग है। इस प्रकार गीता में ब्रह्म का ज्ञान करना ही परम साध्य तत्व माना गया है। ईश्वर प्राप्ति के लिए त्रिविध मार्ग निर्दिष्ट किये गये है। जो ज्ञान कर्म और भक्तियोग नाम से जाने जाते है। गीता वर्णित विश्व रूप दर्शन का एक मात्र लक्ष्य ईश्वर साक्षात्कार है। गीता में ईश्वर जीव माया प्रकृति विश्व उत्पत्ति, विनाश, आत्मा तथा जरा-मरण आदि समस्त लौकिक तथा पारलौकिक दृष्टियों से वैज्ञानिक तथा मनो वैज्ञानिक रूप से सम्यक विवेचन किया गया है। यही कारण है कि भगवदगीता आज समस्त विश्व की प्रदर्षिका के रूप में प्रतिदिन आगे बढ़ रही हैं। और इसकी कीर्ति दिग-दिगान्तर तक व्याप्त है। गीता का अमर संदेश आज के अशान्त जगत में विक्षुब्ध मानव समाज को परम शान्ति प्रदान करने वाला है। 

जीव 

गीता में भगवान कहते हैं कि यह जीव जो है यह मेरा ही अंश है- 

ममैवांषो जीवलोके जीवभूत: सनातन:। 
मन:शष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्शति।। (गीता 15/7) 

अर्थात् मुझ परमेश्वर का ही अनादि एक अंश संसार में जीव बनकर प्रकृति अवस्थित होंकर मन के साथ पांच इन्द्रियों को आकर्षित करता है। परमेश्वर की दो प्रकृतियां है अपरा प्रकृति और परा प्रकृति । ‘अपरा प्रकृति’ जहां जड़ है इसमें सभी भौतिक पदार्थ विद्यमान होते है वहीं परा प्रकृति चेतन जीव है। इस चेतन जीव को ‘अक्षर’ और ‘क्षेत्रज्ञ पुरूष भी कहते है ‘जीव’ ईश्वर का सूक्ष्म शरीर है तो जगत स्थूल शरीर है। ईश्वर जीवों के और जगत की आत्मा है। इस सृष्टि से मेर सनतान अंश जीव रूप में प्रकृति में विद्यमान मन सहित छ: इन्द्रियों को आकृश्ट करता है। जब जीव शरीर रूप को धारण करता है और पुन: उसका त्याग करता है तब जैसे वायु, अपने स्थल से गन्धों को साथ लिये चलता है यह जीव भी उसी प्रकार इन्द्रियों के वषीभूत हो जाता है। समस्त ज्ञानेन्द्रियों तथा मन के योग से जीव विषयों का सेवन करता है। प्रत्येक अवस्था में स्थित इस जीव आत्मा को ज्ञानी लोग ही पहचान सकते हैं। मलिन अन्त:करण युक्त अज्ञानी के लिए जानना असम्भव है। यथा 

प्रकाशत्येक: कृत्स्नं लोकमिमं रवि:। 
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत।। (गीता 13/35)

इस श्लोक का तात्पर्य है कि जिस प्रकार एक ही सूर्य समस्त पृथ्वी को प्रकाशित करता है उसी प्रकार आत्मा भी जीव के सम्पर्ण शरीर प्रकाशित करती है। भगवान ने गीता में जीव की मुख्य रूप से तीन गतियों का वर्णन किया है। 1- ऊध्र्वगति 2- अधोगति 3-मध्यगति। जो मनुष्य सत्व गुण में स्थित रहने वाला है उसको ऊध्र्वगति प्राप्त होती है। (गीता 14/14, 18) तमोगुण की तात्कालिक वृत्ति के बढ़ने पर मरने वाला और तमोगुण में स्थित रहने वाला मनुष्य अधोगति में जाता है- (14/15, 18) रजोगुण के तात्कालिक वृत्ति के बढ़ने पर मरने वाला और रजोगुण में स्थित रहने वाला मनुष्य अधोगति को प्राप्त होता है- ‘‘जीवात्मा’’ किस भाव से सत्वादि गुणो से युक्त होकर शरीर में अवस्थित रहता है विषयों का भोग करता है या किस भाव से शरीर छोडकर चला जाता है उसे अज्ञानी लोग नहीं देख सकते हैं क्योंकि उनका मन विषयों के आकर्शण से बर्हिमुख रहता है किन्तु इसके विपरीत ज्ञानियों का मन अन्र्तमुख रहता है। इसी कारण ज्ञानी लोग ही आत्मा का दर्शन कर पातें हैं भगवान जीवात्मा का वर्णन करते हुये कहते है कि इस संसार में दो प्रकार पुरूष है- विनाशषील और अविनाशी उनमें जीव, जगत विनाशषील है और इससे अलग कूटस्थात्मा अविनाशी है- ‘क्षर: सर्वाणि भूतानि कूटस्थो अक्षर: उच्यते’। (गीता 15/16) वेदान्त दर्शन में जीव का वर्णन कुछ इस प्रकार किया गया है- शंकर के अनुसार अनादि अविद्या के कारण आत्मा अनेक रूपों प्रतिभासित होने लगती है। इसी को अद्वैत वेदान्त में ‘जीव’ कहते है। जीव अपने ईश्वर से भिन्न कर्ता है या भोक्ता समझने लगता है। जबकि जीव और ब्रह्म में कोई तात्विक भेद नहीं है- ‘जीवो ब्रह्मैव नापर:’ पर व्यवहारिक दृष्टि से जीव और ईश्वर अलग है क्योंकि जीव माया का कार्य है। माया के कारण ही जीव अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं जान पाता है किन्तु गीता में भगवान जीव को अपना एक अंश स्वीकार करते है। 

मोक्ष 

पुरूषार्थ सिध्दान्त में मनुष्य की सभी ईच्छाओं ,आवश्यकताओं और उद्देश्यों को चार वर्गो में विभक्त किया गया है -धर्म, अर्थ काम, मोक्ष,मनुष्य जीवन का अन्तिम लक्ष्य ‘मोक्ष’ है। मोक्ष प्राप्ति के लिये गीता कभी नही कहती है कि संसार त्याग करने से मोक्षप्राप्ति सम्भव नही है मोक्ष से तात्पर्य है ‘आवागमन के बन्धन से मुक्ति पाना’। गीता में यह अन्तिम निश्कर्ष के रूप में वर्णित है ,कि ईश्वर के प्रतिपूर्ण समर्पण की भावना ही परमपद प्रदान कर सकती है । गीता में कहा गया है- 

‘तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत । 
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।

अर्थात् “हे भारत ! तू सब प्रकार से उस परमात्मा की ही शरण में ही जा । उस परमात्मा का कृपा से ही तुम्हें परम शान्ति तथा सनातन परन धन प्राप्त होगा “ । गीता के अन्तिम अध्याय का नाम ही ‘मोक्षयोग’ है भगवान ने कहा है त्रिविधत्याग और सन्यास मुख्य है । काम्यकर्म का त्याग ही सन्यास है और सारे कर्मो के फल मात्र का त्याग ही यथार्थ त्याग है जो कर्मफल त्यागी है वही यथार्थ सन्यासी है । देहधरीजीव देह में वर्तमान रहते सभी कर्मो का त्याग नहीं कर सकता है क्योंकि श्वास प्रश्वास की स्वाभाविक वृत्ति भी कर्म है पूजा अर्चना भगवान का स्मरण मनन भी कर्म है स्वधर्म भी कर्म है इस कारण गीता कर्मत्याग का उपदेश नहीं देती है कर्मफल त्याग करके स्वधर्म का अनुश्ठान ही भगवान का स्पष्ट निर्देष है ।भगवान कहते हैं कि जो अनन्य भाव से मेरी उपासना करते है और जो इसप्रकार नित्य मुझमे ही रत् रहते है उनके योगक्षेम का भर मैं स्वयं उठाता हूँ कहा भी गया है - 

अनन्याश्चिन्तयतो मां ये जना: प्र्युपासते । 
तेशां नित्यभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ।।(गीता 9/22)

इस प्रकार इस श्लोक में कहा गया है कि अपना आत्मसर्पण ईश्वर के सामने पूरी तरह से कर दो इस प्रकार मोक्ष, आत्मज्ञान के परमपुरूष के स्वरूप की अनुभूति है। ईश्वर या परमपुरूष नित्य शुद्ध चैतन्य एवं अखण्ड आनन्द स्वरूप है। आत्मा ज्ञान स्वरूप है और मोक्ष आत्मा का स्वरूप ज्ञान है। अविद्या के कारण ही जीव अहंकार और ममकार युक्त होकर स्वयं को शुभ-अशुभ कर्मों का कर्ता, भोक्ता मान बैठता है और जन्म मरण चक्र में संसरण करता रहता है। यही उसका ‘बन्धन’ है जब आत्मज्ञान द्वारा अविद्या निवृत्ति हो जाती है तो जीव नित्य, शुद्ध, ब्रह्म भाव को प्राप्त कर लेता है। यह उसकी बन्धन से मुक्ति है। किन्तु वास्तव में जीव का न तो बन्धन होता है और न ही मोक्ष होता है। केवल अविद्या ही आती और जाती है। इसलिये बन्धन और मोक्ष परमार्थत: मिथ्या है। केवल व्यवहारिक सत्यता है। परमात्मा पूर्ण आत्मसम्र्पण चाहता है। और उसके बदले में हमें आत्मा की वह शक्ति प्रदान करता है जो प्रत्येक स्थिति को बदल देती है- 

सर्व धर्मान: परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज। 
अहमं त्वां सर्व पापेभ्यो मोक्षयिश्यामि मा शुच:।।(गीता 18/66)

अर्थात् सब व्यक्तियों को छोडकर तुम केवल मेरी शरण में आ जा, तू दु:खी मत हो मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूंगा इस प्रकार सर्वज्ञ, समदश्री क्षेत्रज्ञ ही इन्द्रियों को देखता है जैसे- सूर्य रष्मि द्वारा हमको स्पर्श करता है, इन्द्रिय शक्ति भी उसी प्रकार विषयों को स्पर्श करती है। मन के द्वारा इन्द्रियां रष्मियां सम्यक नियमित होने पर दीप में जैसे ज्वाला प्रकाशित होती है आत्मा भी उसी प्रकार देह घट में प्रकाशित होता है। पाप कर्म का क्षय होने पर जीव को ज्ञान उत्पन्न होता है- 

यथादर्शतल प्रख्ये पष्यत्यात्मान मात्मनि। 
इन्द्रियाणिन्द्रियार्थाष्च महाभूतादि प´च च।। 
मनो बुद्धिमहंकामव्यक्तं पुरूषं तथा। 
प्रसंख्यान परावाप्तौ विमुक्तो बन्धनैर्भवेत् ।। 

अर्थात् जैसे दर्पण में अपने रूप का दर्शन किया जाता है उसी प्रकार जीव निर्मल बुद्धि में इन्द्रियां, इन्द्रियों के विषय, पंचमहाभूत, मन, बुद्धि, अहंकार प्रकृति तथा पुरूष को भी देखता है। तब प्रसंख्यानम या विवेक ज्ञान द्वारा देहन्द्रियादि से आत्मा का पार्थक्य निश्चय कर देह आदि बन्धन से विमूक्त होकर परमार्थ को प्राप्त होता है। जीव को जब यह ज्ञान हो जाता है कि मैं परमज्योति स्वरूप ब्रह्म हूँ’ इस प्रकार की उपलब्धि प्राप्त करके मुक्त हो जाता है। चतुर्विष तत्व से पृथक होकर पंचविष रूप में जो प्रसिद्ध पुरूष है वह विवेक विचार द्वारा प्रकृति से पृथक होकर केवल लाभ प्राप्त करता है। और शडविंश तत्व स्वरूप जो ब्रह्म है उसका साक्षात्कार करता है। गीता में वर्णित विश्वरूप दर्शन का एक मात्र लक्ष्य ईश्वर साक्षात्कार ही है। चाहे कर्मयोगी हो या ज्ञानयोगी अथवा भक्तियोगी सभी उस परश्रद्धेय की दृष्टि में एक हैं और मोक्ष प्राप्ति के योग हैं इस प्रकार भगवान ने यमं, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा, और समाधि से अष्टांग योग विमूक्त के उपाय कहे गये हैं।

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