व्यसन का अर्थ, प्रकार, लक्षण एवं कारण

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व्यसन का अर्थ

व्यसन एक द्रव्य सम्बन्धी विकृति है, जिसमें व्यक्ति अत्यधिक मात्रा में विभिन्न प्रकार के रसायन द्रव्यों का सेवन करता है और इन द्रव्यों पर इतनी अधिक निर्भरता बढ़ जाती है कि इनके दुष्प्रभावों से परिचत होते हुए भी वह इनको लेने के लिये विवश हो जाता है, क्योंकि न लेने पर उसके शरीर और मन को अनेक प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। द्रव्य सम्बन्धी रोगों को स्पष्ट करने के लिये निम्न दो प्रकार के शब्दों का विवेचन किया गया है -

द्रव्य दुरूपयोग - 

औषध उपयोग की यह स्थिति यद्यपि ज्यादा गंभीर नहीं होती है। किन्तु फिर भी द्रव्यों के सेवन के कारण व्यक्ति के अपने पारिवारिक व्यावसायिक एवं अन्य दायित्वों को पूरा करने में अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। द्रव्य-दुरूपयोग की स्थिति में व्यक्ति अत्यधिक खतरनाक स्थितियों जैसे वाहन चलाना इत्यादि में भी उस द्रव्य का दुरूपयोग करता है, जिससे उसके जान जाने या दुर्घटना घटित होने की सम्भावना बनी रहती है।

द्रव्य निर्भरता - 

यदि व्यक्ति लम्बे समय तक इन द्रव्यों का दुरूपयोग करता है तो उसमें द्रव्य निर्भरता की प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाती है, जो उस व्यक्ति के लिये गंभीर और खतरनाक है। द्रव्य निर्भरता को मनोवैज्ञानिकों ने दो प्रकार से स्पष्ट किया है -

  1. मनोवैज्ञानिक निर्भरता - मनोवैज्ञानिक निर्भरता में व्यक्ति के मन में हमेशा उस औषध या द्रव्य को किसी भी प्रकार से प्रेाप्त करने की योजना चलती रहती है तथा उसके सारे प्रयास एवं क्रियाकलाप उस दव्य को प्राप्त करने के लिये होते हैं। परिणामस्वरूप वह अपने कर्तव्यों का निर्वाह ठीक ढंग से नहीं कर पाता है। यह जानते हुए भी कि ये औषण उसके शरीर में अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न करेंगे फिर भी वह उन पदार्थो को पाने के लिये ही प्रयत्न करता है और इसके कारण उसकी संगति भी उन लोगों के साथ हो जाती है जो इन सब कार्यो में सलंग्न रहते हैं।
  2. दैहिक निर्भरता - औषधों के सेवन की मनोवैज्ञानिक निर्भरता दैहिक निर्भरता को जन्म देती है। दैहिक निर्भरता का अर्थ है कि अब उस व्यक्ति के शरीर को उन द्रव्यों पर ही निर्भर रहने की आदत बन जाना और औषध या द्रव्य ग्रहण न करने पर शरीर में बैचेनी, घबराहट उत्पन्न हो जाना और कर्इ बार तो स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि व्यक्ति की मृत्यु तक हो जाती है।
इस प्रकार संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि जब व्यक्ति अत्यधिक लम्बे समय तक तथा अत्यधिक मात्रा में बार-बार औषधों का सेवन करता है तो उसमें सहनशीलता एवं प्रत्याहार संलक्षण विकसित हो जाते हैं जिसे व्यसन कहा जाता है। आपके मन में प्रश्न उठ रहा होगा कि यह सहनशीलता और प्रत्याहार सलंक्षण क्या है? तो आइये, सबसे पहले चर्चा करते हैं सहनशीलता के बारे में -

सहनशीलता - 

सहनशीलता से आशय एक दैहिक या शारीरिक प्रक्रिया से है, जिसमें व्यक्ति द्रव्य को लेने का इतना आदी हो चुका होता है कि इच्छित प्रभाव उत्पन्न करने के लिये उसे उस द्रव्य का अत्यधिक मात्रा में सेवन करना पड़ता है और यह मात्रा पहले की तुलना में कई गुना ज्यादा होती है।

प्रत्याहार संलक्षण - 

प्रत्याहर संलक्षण की स्थिति में व्यक्ति जब व्यसनी औषध का उपयोग नहीं करता है तो उसके शरीर एवं मन में अनेक प्रकार की विकृतियां उत्पन्न होने लगती हैं। उसका मन अत्यधिक अशांत, बैचेन होने लगता है। किसी भी कार्य में मन नहीं लगता। व्यक्ति एक प्रकार से मानसिक रूप से असंतुलित हो जाता है तथा इसके साथ ही शरीर में भी दर्द, पीड़ा, कंपन, बैचेन उत्पन्न होने लगती हैं और कई बार तो मृत्यु तक हो जाती है। 

व्यसन के प्रकार 

  1. मद्यपान सम्बन्धी विकृति 
  2. नाइकोटिन एवं सिगरेट धूम्रपान सम्बद्ध विकृति 
  3. उत्तेजक सम्बद्ध विकृति 
  4. स्वापक सम्बद्ध विकृति 
  5. भ्रमात्मक सम्बद्ध विकृति 
  6. केन्नाविस सम्बद्ध विकृति 
  7. शमक - निद्राजनक तथा प्रशांतक सम्बद्ध विकृति 

व्यसन के कारण

मनोवैज्ञानिकों ने व्यसन के कारणों का विवेचन निम्न विचारधाराओं के आधार पर किया है -

जननिक एवं जैविक विचारधारा - 

इस मत के अनुसार व्यसन के मुख्य रूप से दो कारण माने गये हैं -
  1. वंशानुगतता - मनोवैज्ञानिकों ने अनेक प्रकार के प्रयोगात्मक अध्ययनों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि यदि किसी व्यक्ति के माता-पिता या उसके परिवार या पीढ़ी में किसी व्यक्ति को व्यन की आदत है या थी, तो उस व्यक्ति में भी व्यसन से ग्रसित होने की संभावना अपेक्षाकृत अधिक होती है। 
  2. जीन्स - जीन्स को भी व्यसन के प्रमुख कारणों में से एक माना गया है। मनोवैज्ञानिकों ने अपने प्रयोग के आधार पर अनेक ऐसे जीन्स खोज निकाले हैं, जो व्यसन को उत्पन्न करने के लिये जिम्मेदार हैं। 

मनोगति की विचारधारा - 

इस विचारधारा के अनुसार अगर बचपन में किसी बच्चे को समुचित देखभाल, माता-पिता तथा परिवार के अन्य सदस्यों का पर्याप्त प्यार एवं स्नेह न मिला हो या उसके शारीरिक, मानसिक या भावनात्मक पोषण में यदि किसी प्रकार की कमी रह जाती है अर्थात उसका बाल्यावस्था में समुचित विकास नहीं हुआ होता है तो उसमें उन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये दूसरों पर निर्भर रहने की प्रवृत्ति विकसित हो जाती है और दूसरों पर निर्भरता का यह रूप यदि औषध या द्रव्यों पर निर्भरता के रूप में होता है तो फिर वह ‘‘व्यसन’’ को जन्म देता है। 

व्यवहारपरक विचारधारा - 

इस मत के प्रमुख समर्थक विद्वान हैं - क्लाक, सेचिटी, स्टीली, जोसेफ्स इत्यादि। इस मत के अनुसार व्यसनी द्रव्य व्यक्तियों में कुछ समय के लिये अत्यधिक प्रसन्नता, उत्साह, स्फूर्ति एवं आनन्द को उत्पन्न कर देते हैं जिससे व्यक्ति स्वयं को तनावमुक्त एवं हल्का तरोताजा महसूस करता है। औषधों यह प्रभाव व्यक्ति को इन द्रव्यों को लेने के लिये प्रेरित करता है। इन द्रव्यों का प्रयोग अधिकतर तनावपूर्ण स्थिति में किया जाता है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति तनावमुक्त और खुश रहना चाहता है किन्तु औषध लेने वाला यह नहीं जानता कि कुछ पल के सुख के लिये वह अपनी जिन्दगी को दांव पर लगा रहा है और ये व्यसनी द्रव्य अन्तत: उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व के लिये एक प्रकार का जहर है। 

सामाजिक-सांस्कृतिक विचारधारा - 

इस मत के अनुसार जिन परिवारों या समाज का महौल तनाव को पैदा करने वाला होता है, एक तो उनमें व्यसन की विकृति अधिक पायी जाती है और दूसरी ओर उन परिवारों में जिनमें ऐसे व्यसनी औषधों का सेवन करना मूल्यवान समझा जाता है तथा इस प्रवृत्ति को आदर के साथ देखा जाता है। तो स्पष्ट है कि व्यसन के जैविक, मनोगतिक, व्यावहारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक इत्यादि अनेक कारण हैं। 

व्यसन के लक्षण 

  1. सहनशीलता-व्यसन में व्यक्ति पहले की तुलना में अत्यधिक मात्रा में व्यसनी द्रव्य का सेवन करता है या पहले से ही यदि वह वह अत्यधिक द्रव्य लेता है, तो उसका प्रभाव पहले की तुलना में कम होने लगता है। 
  2. प्रत्याहार संलक्षण -व्यसन में जब व्यक्ति लागतार खाये जाने वाले द्रव्य को लेना बन्द कर देता है तो उसे मानसिक रूप से बैचेनी, अशान्ति तथा शारीरिक रूप से अत्यधिक पीड़ा, तनाव, कंपन होने लगता है और कर्इ बार तो व्यक्ति की मृत्यु भी होती है। यदि व्यसनी को वह द्रव्य विशेष नहीं मिल पाता है तो उसकी पूर्ति के लिये वह अन्य औषध का सेवन भी करने लग सकता है। 
  3. द्रव्य का अत्यधिक उपयोग - व्यसन में व्यक्ति उस द्रव्य का अत्यधिक सेवन करता है या एक विशेष अवधि तक उसका उपयोग न करके लम्बे समय तक करता है। 
  4. शारीरिक एवं मानसिक समस्यायें उत्पन्न होने पर भी औषध सेवन जारी रखना - ऐसे व्यसनी लोग द्रव्य के सेवन से विभिन्न प्रकार की समस्यायें उत्पन्न होने पर भी उसका सेवन करना जारी रखते हैं। 
  5. दायित्वों का निर्वाह न कर पाना - व्यसन का एक प्रमुख लक्षण यह भी है क ऐसे व्यक्ति अपने परिवार के सदस्यों के साथ कम समय गुजारते हैं। अपने सामाजिक दायरे को भी सीमित कर लेते हैं। इनकी संगति उन लोगों के साथ ही रहती है जो व्यसन से ग्रस्त होते हैं और इनका अधिकांश समय इन्हीं के साथ व्यतीत होता है। 
  6. दैहिक खतरे से अनावृत्त रहना - व्यसन व्यक्ति को इतना अधिक मदहोश कर देता है कि वह अपने शरीर के प्रति संभावित खतरे से भी असावधान रहने लगता है और मदहोशी की स्थिति में ही तेज रफ्तार के साथ वाहन चलाता है या कोर्इ खतरनाक मशीन चलाता है।

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