बिस्मार्क का जीवन परिचय, नीति, मूल्यांकन एवं पतन

बिस्मार्क का जन्म 1 अप्रैल 1815 को उस समय हुआ था जबकि नेपोलियन के एल्बा से भाग आने के कारण यूरोप में पुनः युद्ध छिड़ गया था। जन्म से ही बिस्मार्क फ्राँस विरोधी था। 16 वर्ष की आयु में उसे शिक्षा मिली थी । वह 1832 ई. में विश्वविद्यालय शिक्षा के लिए गाॅटिन्जन तथा वर्लिन के विश्वविद्यालयों में गया। एक छात्र के रूप में उसने विशेष योग्यता का परिचय नहीं दिया था। एक वर्ष सैनिक सेवा के बाद लोक सेवा के न्याय विभाग में नौकरी प्रारंभ की। 1839 में अपनी मां की मृत्यु के कारण नौकरी छोड़कर स्टेट की देखभाल के लिए चला गया।

बिस्मार्क ने 1847 ई. में राजनीति में प्रवेश किया। इस वर्ष उसको प्रशा की राजकीय संसद का सदस्य चुन लिया गया। कुलीन सामन्त परिवार में जन्म लेने के कारण ही प्रजातंत्र, क्रान्ति तथा उदार संविधान का विरोधी था। वह राजतन्त्र का कट्टर समर्थक तथा उदारवादी विचारधारा का कट्टर विरोधी था। वह कहा करता था ‘‘मैं इस युग की उस भावुकता से डरता हूँ जिसमें प्रत्येक दीवाने विद्रोही को सच्चा देश भक्त समझा जाता है। वह संविधान को घृणा की दृष्टि से देखता था तथा उसे मात्र रद्दी का टुकड़ा मानता था। इसीलिए जब फ्रैंकफर्ट की संसद के निमंत्रण पर जर्मन सम्राट बनने का प्रस्ताव प्रशा के राजा ने ठुकरा दिया तो उसे अत्यधिक प्रसन्नता हुई थी। वह जर्मनी के भाग्य का निर्णय जनता द्वारा नहीं बल्कि राजाओं द्वारा किया जाना पसन्द करता था।

1851 ई. में प्रशा के सम्राट द्वारा उसको फ्रैंकफर्ट की सभा में प्रशा का प्रतिनिधि नियुक्त कर दिया गया जहाँ उसने आठ वर्षाें तक प्रशा का प्रतिनिधित्व किया। इन आठ वर्षों में उसने कूटनीति का पाठ सीखा। यही रहकर वह जान पाया कि जर्मनी के एकीकरण की सबसे बड़ी बाधा आस्ट्रिया के रूप में है। अपने आठ वर्षों के अनुभवों के आधार पर वह इस निष्कर्ष पर पहँुचा कि आस्ट्रिया को पराजित किये बिना प्रशा के नेतृत्व में जर्मनी का एकीकरण सम्भव नहीं है।

1859 ई. में बिस्मार्क को सेण्ट पीटर्सवर्ग में प्रशा का राजदूत बनाकर भेजा गया जहाँ उसने अपनी कार्य कुशलता का परिचय दिया तथा रूस के जार अलेक्जेण्डर द्वितीय की व्यक्तिगत मित्रता प्राप्त की। मार्च 1862 ई. में उसको फ्रांस का राजदूत बनाकर, पेरिस भेज दिया गया। फ्रान्स में उसे नेपोलियन तृतीय एवं उसके मंत्रियों से मिलने एवं उनकी नीतियों को समझने का अवसर मिला। जिनका उपयोग उसने फ्रांस के विरूद्ध ही किया।

बिस्मार्क की गृह नीति

1. नवीन संविधान का निर्माण 

जर्मनी के एकीकरण के पश्चात जर्मन साम्राज्य के लिए एक संविधान का निर्माण किया गया। इस संविधान को संघात्मक संविधान की संज्ञा प्रदान की जा सकती है। यह 25 छोटे-बड़े राज्यों तथा इम्पीरियल प्रदेश आल्सास व लॉरेन का सम्मिलित संघ राज्य था।

2. साम्राज्य

साम्राज्य का प्रमुख सदैव के लिए प्रशा का सम्राट होगा। वह इस संघ का अध्यक्ष रहेगा। शासन की समस्त सत्ता राज्यों की समष्टि में निहित थी जो उसका पय्र ागे विधान-सभा के द्वितीय सदन (साम्राज्य-परिषद्) में अपने प्रतिनिधियों द्वारा करते थे। उसके अधिकार निम्न श्रेणियों में विभक्त किये जाते हैं- 
  1. साम्राज्य का प्रतिनिधि-वह विदेशी राज्यों तथा संघ में सम्मिलित राज्यों के साम्राज्य का प्रतिनिधि था।
  2.  साम्राज्य परिषद-राजा को एक समिति की सलाह से कार्य करना था जिसे साम्राज्य-परिषद् कहते हैं। इस समिति की सहायता से विदेशी संबंधों की स्थापना करना, राजदूतों का स्वागत करने, उसकी नियुक्त करने, युद्ध तथा संधि करने के अधिकार प्राप्त थे। परन्तु उसको आक्रमणात्मक युद्धों के लिये साम्राज्य-परिषद् की अनुमति अवश्य प्राप्त करनी होती है। 
  3. व्यवस्थापिका-संबंधी अधिकार-उसको विधान-सभा के अधिवेशन आमंत्रित करने, उसको स्थापित करने तथा साम्राज्य-परिषद् की अनुमति से प्रथम भवन को भंग करने का अधिकार प्राप्त था।
  4. कार्यपालिका संबंधी अधिकार-उसको विधान के अनुसार कार्य न करने वाले राज्य को दण्ड देने तथा साम्राज्य की विधियों की घोषणा करने तथा उसको कार्यान्वित करने का अधिकार था।

3. चांसलर 

इस संविधान में जर्मन साम्राज्य के लिये एक चांसलर की व्यवस्था थी। वह केवल सम्राट के प्रति उत्तरदायी था, न कि जर्मन साम्राज्य की व्यवस्थापिका सभा के। इस प्रकार उसकी नियुक्ति का अधिकार तथा पदच्युत करने का अधिकार जर्मन साम्राज्य के सम्राट में ही निहित था। उसकी सहायता के लिए सचिव थे। वह साम्राज्य-परिषद् का सभापति होता था। जर्मन साम्राज्य के चांसलर पद को बिस्मार्क ने लगभग 20 वर्षों तक सुशोभित किया।

4. व्यवस्थापिका सभा 

व्यवस्थापिका के दो सदन थे जिनमें से प्रथम सदन रीचस्टेग और द्वितीय सदन बन्डरेस्ट कहलाते थे- (1) रीचस्टेग - प्रथम सदन के सदस्यों का निर्वाचन जनता करती थी। इसकी संख्या 397 थी। जनसंख्या के आधार पर प्रत्येक राज्य की जनता निश्चित सदस्यों का निर्वाचन करती थी। इनका निर्वाचन पांच वर्ष के लिये 25 वर्ष या इससे अधिक आयु वाले पुरूष करते थे। इसका मुख्य कार्य कार्यकारिणी को सलाह देना तथा उसके कार्यो की समालोचना करना था। सम्राट को इस सभा के भंग करने का अधिकार था। उसको थलसेना, नौसेना, व्यापार, आयात-निर्यात, कर, रेलवे, डाक-तार, दीवानी तथा फौजदारी विधियां, आदि बनाने का अधिकार था, किन्तु उसके पास अंतिम अधिकार नहीं था। उसके द्वारा निर्मित विधियां उस समय तक मान्य नहीं की जाती थीं जिस समय तक दूसरी सभा बन्डरेस्ट उसको स्वीकार नहीं करती थी। 

5. केन्द्रीय शक्ति को प्रधान बनाना 

बिस्मार्क ने निम्न उपायों द्वारा केन्द्रीय शासन की शक्ति को प्रधानता स्थापित की- 
  1. इम्पीरियल संस्थाओं की स्थापना - बिस्मार्क ने जमर्न -साम्राज्य में सम्मिलित समस्त राज्यों की पृथक संस्थाओं का अंत करके उनके स्थान पर इम्पीरियल संस्थाओं का निर्माण करना आरंभ किया। 
  2. समान विधियों को कार्यान्वित करना - जर्मनी के विभिन्न राज्यों में विभिन्न प्रकार की विधियां कार्यान्वित थीं। बिस्मार्क ने समस्त जर्मन साम्राज्य के लियेएक फौजदारी विधि का निर्माण किया।
  3. राष्ट्रीय न्यायालयों की स्थापना - बिस्मार्क ने सम्पूर्ण जमर्न साम्राज्य के लिये राष्ट्रीय न्यायालयों की स्थापना की। 
  4. समान मुद्रा-पद्धति की स्थापना - बिस्मार्क ने 1873 ई. में एक विधि द्वारा समस्त जमर्न साम्राज्य में एक समान मुद्रा पद्धति को लागू किया। उसने मार्क का प्रचलन किया। नए मार्क के सिक्के पर जर्मन सम्राट विलियम प्रथम की तस्वीर अंकित की गई। 
  5. इम्पीरियल बैंक की स्थापना - 1876 ई. में उसने एक इम्पीरियल बैंक की स्थापना की और साम्राज्य के अंतर्गत बैंकों का उसने संबंध स्थापित किया। 
  6. रेल, तार और टेलीफोन पर केन्द्रीय सरकार का नियंत्रण - रेल, तार और टेलीफोन केन्द्रीय सरकार के अंतर्गत कर दिए।

6. चर्च के प्रति बिस्मार्क की नीति (कुल्चुरकैम्फ) 

जर्मनी में रोमन कैथोलिक धर्म बड़ा प्रबल था और राज्य की ओर से उसको पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त थी। प्रशा की जनता अधिकतर प्राटे ेस्टेंट थी और अन्य राज्यों की अधिकांश जनता रामे न कैथाेिलक धर्म की अनुयायी थी। वे बिस्मार्क की जर्मनी एकीकरण की नीति के विरोधी थे, क्योंकि उनको यह भय था कि यदि जर्मनी का एकीकरण सफल हो गया तो वे प्रोटेस्टेटांे के नियंत्रण में आ जायेगें और उनकी धार्मिक स्वतंत्रता का अंत हो जायगे ा। इसके विपरीत बिस्मार्क भी इनका दमन करना चाहता था, क्योंकि वे जर्मन साम्राज्य के प्रति भक्ति न रखकर पोप के प्रति भक्ति तथा श्रद्धा रखते थे। 

1870 ई. में रोम के पोप ने चर्च के मामलों में सरकार के हस्तक्षेप का विरोध किया था। उसने पादरियों को यह आदेश दिया कि समस्त विद्यालयों में धर्म की शिक्षा दी जाए। इसके आदेशानुसार रोमन कैथाेि लक पादरियों ने सरकार से यह मांग की। बिस्मार्क इस बात को सहन नहीं कर सका, क्योंकि इस प्रकार की शिक्षा देने का अर्थ होगा जर्मन राष्ट्रीयता तथा एकता का विनाश जिसकी प्राप्ति बिस्मार्क ने अकथनीय प्रयत्न द्वारा की थी और जो उसकी नीति का एक भाग था तथा उसको विशेष प्रिय था। यह संघर्ष कई वर्षों तक चलता रहा। इस संघर्ष को कुल्चुरकैम्फ अर्थात् ‘संस्कृति का युद्ध’ भी कहते हैं।

पापे के 1870 ई. के आदेश का विरोध केवल प्रोटेस्टेटांे ने ही नहीं किया वरन् कुछ याग्े य तथा समझदार रोमन कैथोलिक ने भी किया। 1871 ई. के निर्वाचन में 63 रोमन कैथोलिकों का निर्वाचन जर्मन-साम्राज्य की व्यवस्थापिका सभा के प्रथम सदन रीचस्टेग के लिये हुआ, जिन्होंने बिस्मार्क की नीति की कटु आलोचना की। उन्होंने स्पष्ट रूप से घोषणा की कि पोप का आधिपत्य पुन: स्थापित किया जाना चाहिये जिस प्रकार वह मध्य युग में था। इस परिस्थिति के उत्पन्न होने पर बिस्मार्क बड़ा चिंतित हुआ। वह इस समस्या को धार्मिक समस्या न समझकर राजनीतिक समस्या समझता था। अत: उसने रोमन कैथोलिकों का दमन करने का निश्चय किया।

एक ओर तो सरकार की ओर से कठोर दमनकारी विधियां पास की गई और दूसरी ओर कैथोलिकों का आंदोलन तीव्र होता चला गया। पोप ने समस्त अधिनियमों को अवैध घोषित किया और पादरियों को उनका उल्लंघन करने का आदेश दिया। जितना दमन किया गया उतना ही आन्दोलन ने उग्र रूप धारण किया। 1877 के निर्वाचन में 92 कैथोलिक लोक सभा के सदस्य निर्वाचित हुए। इनका दल सबसे अधिक संख्या में था। अत: कुछ गैर-कैथोलिकों ने भी सरकार की दमन नीति की आलोचना करना आरंभ किया।

बिस्मार्क एक उच्च कोटि का राजनीतिज्ञ था। परिस्थितियों से वह समझ गया कि कैथोलिकों का दमन करना सरल कार्य नहीं है। इसके साथ-साथ साम्यवादी विचारधारा का प्रवाह तेजी से हो रहा था जिसका सामना बिस्मार्क को करना था और वह दोनों का एक साथ सामना करने में अवश्य असफल हो जाता। वास्तव में वह साम्यवाद के दमन करने में कैथोलिकों की सहायता प्राप्त करना चाहता था जिसके कारण उसने कैथोलिकों के संघर्ष का अंत करने का निश्चय किया और 1878 ई. में वह पापे से संधि करने में सफल हुआ। किन्तु बिस्मार्क को कैनोसा जाना पड़ा और समझौता करना पड़ा। इतिहास कारों ने इसे बिस्मार्क की पराजय कहा है।

बिस्मार्क की विदेश नीति

बिस्मार्क की गणना उस महान् राजनीतिज्ञों तथा कूटनीतिज्ञों में की जाती है जिन्होंने अपने युग को अपने विचारों तथा कार्यों द्वारा प्रभावित किया, उसका राजनीतिक प्रभाव उसकी विदेश नीति से स्पष्ट होता है। 1871 से पूर्व उसकी राजनीति का मुख्य उद्देश्य यूरोप में जर्मन राज्य का एकीकरण प्रशा के नेतृत्व में करना था और इस उद्देश्य की पूर्ति उसने दो महान युद्धों द्वारा प्राप्त की। किन्तु 1871 ई. के उपरांत उसका उद्देश्य जर्मन शक्ति को स्थायित्व रूप देना तथा यूरोप में शान्ति की स्थापना करना था। 1871 ई. से 1890 ई. तक, वह जर्मन साम्राज्य के चान्सलर के पद पर आसीन था, तब उसने यूरोपीय राजनीति को बड़ा प्रभावित किया।

बिस्मार्क की विदेश नीति के उद्देश्य

1. यूरोप में शांति की स्थापना - बिस्मार्क की हार्दिक इच्छा यह थी कि यूरोप में किसी प्रकार से शांति भंग न हो। यह सत्य है कि जर्मन साम्राज्य का निर्माण बिस्मार्क ने सैनिकवाद के आधार पर किया तथा उसने अपने रक्त और लोहे की नीति के अनुसार किया था, किन्तु उसने सैनिकवाद को अपने उद्देश्य की पूर्ति का केवल साधन बनाया न कि साध्य : उसका लक्ष्य फ्रांस और ऑस्ट्रिया को परास्त कर पूर्ण हो चुका था और अब वह जर्मनी की स्थिति से पूर्णतया संतुष्ट था। अब वह जर्मनी का दृढ़ संगठन करना चाहता था जिसके लिये शांति की स्थापना अनिवार्य थी।

2. फ्रांस को अकेला रखना - बिस्मार्क जानता था कि फ्रांस अपनी पराजय का बदला जर्मनी से अवश्य लेने का प्रयास करेगा, क्योंकि फ्रांस को आल्सेस और लोरेन के प्रदेश विशेष प्रिय थे, जिन पर जर्मनी ने अधिकार कर लिया था। फ्रांस उनको लेने के लिए अवश्य प्रयत्न करेगा, किन्तु वह अकेला जर्मनी से युद्ध नहीं कर सकेगा और युद्ध उसी समय संभव होगा जब वह यूरोप के अन्य देशों में से किसी को अपना मित्र बनाये। अत: बिस्मार्क की नीति यह रही कि फ्रांस का कोई भी यूरोपीय देश मित्र नहीं बन सके।

3. यथा-स्थिति की स्थापना - बिस्मार्क का उद्देश्य था कि यूरोप में यथा-स्थिति की स्थापना की जाये। इसका अभिप्राय है कि समस्त राज्यों की जो सीमायें 1871 ई. में थी वे ही निश्चित रहै।। उनमें किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया जाये। अन्यथा की स्थिति में युद्ध की संभावना हो सकती थी।

बिस्मार्क की विदेश नीति का क्रियान्वयन

उपरोक्त उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए बिस्मार्क ने 20 वर्ष तक अकथनीय प्रयत्न किया, यद्यपि इनकी प्राप्ति के लिये उसको विशेष आपत्तियों तथा कठिनाईयों का सामना करना पड़ा, किन्तु अपनी सैनिक शक्ति और कूटनीति के आधार पर बिना युद्ध किये वह उनकी प्राप्ति में सफल हुआ। बिस्मार्क भली-भांति समझता था कि यूरोप की शांति अल्सास और लोरेन तथा बालकन के प्रश्न पर भंग हो सकती है। इसी कारण उसने अपने शासन-काल में ऐसा प्रयत्न किया कि इन दोनों प्रश्नों पर शांति भंग न हो अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिये उसने कार्य किये -

1. तीन सम्राटों का संघ - अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिये सर्वप्रथम बिस्मार्क ने ‘‘तीन सम्राटों के संघ’’ का निर्माण करने का निश्चय किया। बिस्मार्क ने राजतंत्र की दुहाई देकर आस्ट्रिया और रूस के सम्राटों को अपने पक्ष में किया, क्योंकि उसको यह भय था कि जर्मनी द्वारा पराजित दोनों राज्य आस्ट्रिया और फ्रांस सम्मिलित होकर जर्मनी के विरूद्ध युद्ध की घोषणा न कर दे। 

1870 ई. में बर्लिन में आस्ट्रिया के सम्राट, रूस के जार और जमर्न सम्राट के मध्य तीन सम्राटों के संघ का निर्माण हुआ। यह एक निश्चित संधि नहीं थी, क्योंकि इसके द्वारा किसी प्रकार का उत्तरदायित्व नहीं था। यह केवल एक समझौता मात्र था। 

इसमें निम्न समस्याओं पर विचार विमर्श हुआ -
  1. प्रादेशिक व्यवस्था को स्थाई रखना
  2. बालकन समस्या
  3. क्रांतिकारी समाजवाद का दमन इनके संबंध में निश्चित किया गया कि इनमें से जो विवाद समय-समय पर उत्पन्न होंगे, उनका समाधान तीनों के पारस्परिक सहयोग द्वारा निकाला जावेगा।
2. तीन सम्राटों के संघ का अन्त - 1876 ई. तक तीन सम्राटों का संघ स्थायी रहा, किन्तु इसके उपरांत ऐसी परिस्थिति का उदय हुआ जिसके कारण यह समाप्त हो गया। वह इस प्रकार है -

3. बर्लिन सम्मेलन - इंगलैंड जर्मनी, रूस और आस्ट्रिया के प्रतिनिधियों ने इस सम्मेलन में भाग लिया। जर्मनी ने आस्ट्रिया का पक्ष लिया और रूस के हितों की अवहेलना की। जर्मनी के इस व्यवहार से रूस को बड़ी ठेस पहंचु ी और रूस का जार जर्मनी से असंतुष्ट हो गया। अत: जर्मनी से रूस की मित्रता समाप्ति हो गई। अप्रैल 1879 ई. में रूस के जार ने जर्मन सम्राट विलियम प्रथम को स्पष्ट चते ावनी दी कि परु ाने मित्र की अवहेलना करने का परिणाम युद्ध भी हो सकता है। इस प्रकार रूस और जर्मनी के संबंध खराब हो गये। तीन सम्राटों के संघ का अंत हो गया।

4. द्विगुट का निर्माण - उक्त परिस्थिति उत्पन्न होने पर जर्मनी की स्थिति बड़ी संकटमय हो गई, क्योंकि अब उसके यूरोप में दो शत्रु हो गये और उस पर दो ओर के आक्रमण होने की संभावना हो गई। उसको किसी एक शक्ति से गुटबंधन करना अनिवार्य हो गया। वह इंगलैंड और इटली को इस कार्य के लिये उपयुक्त नहीं समझता था, क्योंकि उसको यह विश्वास नहीं था कि उनके साथ मैत्री स्थायी रूप धारण कर सकेगी। अत: उसका ध्यान आस्ट्रिया की ओर आकर्षित हुआ। इस समय आस्ट्रिया का विदेश मंत्री ऐन्ड्रीस था जो बड़ा ही योग्य और समझदार था। जब आस्ट्रिया से जर्मनी ने संधि की वार्ता चलायी तो एन्े ड्रीस ने परिस्थिति का लाभ उठाकर तुरन्त सहमति प्रदान कर दी। अत: दोनों देशों में 7 अक्टूबर 1879 ई. में एक रक्षात्मक संधि सम्पन्न हुई जिसके अनुसार निश्चय हुआ कि (1) यदि जर्मनी या आस्ट्रिया में से किसी पर रूस आक्रमण करे तो दोनों एक दूसरे को अपनी सम्पूर्ण सैनिक सहायता प्रदान करेगें और दोनों सम्मिलित रूप से रूस से संधि करेगें। (2) यदि जर्मनी या आस्ट्रिया में से किसी पर कोई अन्य शक्ति उदाहरणार्थ फ्रांस आक्रमण करता है तो दूसरा मित्र तटस्थता की नीति अपनाएगा, परन्तु यदि इस शत्रु को रूस की सहायता प्राप्त हुई तो दोनों मित्र अपनी पूरी शक्ति से साथ मिलकर युद्ध करेगें और सम्मिलित रूप से ही संधि होगी।

5. तीन सम्राटों के संघ की पुन: स्थापना - यद्यपि बिस्मार्क ने आस्ट्रिया के साथ संधि कर ली थी, किन्तु वह रूस से भी संधि करना चाहता था। वह उसको अप्रसन्न नहीं करना चाहता था। रूस भी फ्रांस की ओर आकर्षित नहीं हुआ। अब बिस्मार्क ने 1881 ई. में रूस से तीन सम्राटों के संघ की पुन: स्थापना करने का प्रस्ताव किया जिसका रूस ने स्वागत किया। अत: 1881 ई. तीन सम्राटों के मध्य तीन वर्ष के लिये एक समझातै ा हुआ कि यदि तीनों में से किसी को एक चतुर्थ शक्ति से युद्ध करना होगा तो शेष मित्र तथस्थ रहै।गे और युद्ध को सीमित करने का प्रयास करेगेंं इस प्रकार जर्मनी ने आस्ट्रिया और रूस दोनों को अपनी ओर मिला लिया और अपनी अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति पूर्ववत् दृढ़ स्थापित की।

6. त्रिदलीय गुट की स्थापना - 1881 ई. में फ्रांस और इटली के संबधं कटु हो गये थे। अत: अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने तथा अपनी गणना यूरोप के बड़े राष्ट्रों में करवाने के उद्देश्य से इटली जर्मनी की और आकर्षित हुआ। 20 मई 1882 ई. को इटली ने जर्मनी और आस्ट्रिया से संधि की जिसके फलस्वरूप द्विगुट ने त्रिगुट का रूप धारण किया। इटली ने यह स्वीकार कर लिया कि वह आस्ट्रिया के विरूद्ध किसी प्रकार का प्रचार नहीं करेगा। इस संधि में यह निश्चय हुआ - 
  1. यदि फ्रांस इटली पर आक्रमण करेगा तो जर्मनी और आस्ट्रिया इटली की सहायता करेंगे 
  2. इटली ने भी इसी प्रकार का आश्वासन दिया। 
  3. यदि दोनों देशों पर कोई भी दो देश आक्रमण करेगें तो तीनों मिलकर उसका सामना करेंगे संधि की शर्तें पूर्णतया गुप्त रखी गर्इं और य सन्धि 5 वर्षों के लिए की गई।
7. आस्ट्रिया और रूमानिया की संधि - 1883 ई. में आस्ट्रिया और रूमानिया के मध्य एक संधि हुई जिसमें यह निश्चय हुआ कि रूस के विरूद्ध दोनों देश एक दूसरे की सहायता करेगेंं बिस्मार्क ने इस गुप्त संधि को मान्यता प्रदान की और बाद में इटली ने भी इस संधि को स्वीकार किया।

8. संधियों का महत्व - इस प्रकार इन संधियों के द्वारा- (1) जर्मन प्रतिष्ठा की स्थापना हुई और बिस्मार्क का मान बहुत बढ़ गया। वह मध्य यूरोप का भाग्य-निर्णायक बन गया और यूरोप की शक्ति उसके हाथ में रही। (2) फ्रांस यूरोपीय राजनीति में पूर्णतया अकेला बना रहा। (3) शक्ति संतुलन की समाप्ति - इसके द्वारा यूरोप का शक्ति संतुलन समाप्त हो गया। (4) रूस और फ्रांस का गठबंधन - इन्हीं सन्धियों के फलस्वरूप बाद में रूस और फ्रांस का गठबंधन हुआ जिसने त्रिगुट का विरोध करना आरंभ किया। (5) प्रथम विश्वयुद्ध युद्ध - इनके ही कारण प्रथम विश्व युद्ध आरंभ हुआ। ये समस्त संधियाँ बिस्मार्क की कूटनीति का परिणाम थीं।

9. रूस के साथ पुनराश्वासन संधि - 1887 ई. में बिस्मार्क का ध्यान पनु : रूस की और आकर्षित हुआ, जो जर्मनी की बालकन संबधीं नीति तथा आस्ट्रिया के प्रति जर्मन नीति के कारण बिस्मार्क से असंतुष्ट था। 1881 ई. में बिस्मार्क के प्रयत्न से पुन: तीन सम्राटों की संधि हुई थी। 1884 ई. में इस संधि को पुन: मान्यता प्रदान की गई, किन्तु 1884 तथा 1885 ई. में बालकन समस्या के कारण आस्ट्रिया और रूस के पारस्परिक संबंध खराब होने आरंभ हो गये और जर्मनी में भय उत्पन्न हो गया कि कहीं रूस फ्रांस से मैत्री स्थापित नहीं कर ले। 

अत: 18 जुलाई 1887 ई. में दोनों देशों के मध्य पुनराश्वासन संधि हुई। यह संधि पूर्णतया गुप्त रखी गई। इस संधि के द्वारा निम्न बातें निश्चित हुई- 
  1. एक पर अन्य यूरोपीय राष्ट्र द्वारा आक्रमण होने की दशा में दूसरे ने तटस्थ नीति का पालन करने का आश्वासन दिया।
  2. जर्मनी ने दोनों बलगारियों में रूस के प्रभाव को स्वीकार किया और यह वचन दिया कि वह राजकुमार अलेकजेन्डर को राज्यसिंहासन पर आसीन नहीं होने देने के लिये प्रयत्न करेगा। 
  3. 1881 ई. की संधि के अनुसार कुस्तुन्तुनिया के जल-संयोजक का सामाजिक कार्यवाहियों के लिये राके ने की नीति का भविष्य में भी पालन किया जाये।
10. संधि की समीक्षा - यह संधि बिस्मार्क की कूटनीति का उज्जवल उदाहरण है। इस संधि द्वारा बिस्मार्क ने रूस को यह आश्वासन दिया कि वह आस्ट्रिया के आक्रमण के विरूद्ध तटस्थता की नीति का पालन करेगा जबकि आस्ट्रिया और जर्मनी के संबंध में दोनों देशों की संधि में यह निश्चय हुआ था कि वह रूस के आक्रमण के विरूद्ध आस्ट्रिया की सहायता करेगा। इस संधि के संबंध में बिस्मार्क ने व्यक्त किया कि उसने इस संधि द्वारा आस्ट्रिया की सहायता की, क्योंकि इससे रूस की महत्वाकांक्षाओं पर नियंत्रण की स्थापना हुई। जर्मनी से निराश होकर रूस को स्वाभाविक रूस से फ्रांस की ओर आकर्षित होना चाहिये था, किन्तु जर्मनी ने उसको ऐसा नहीं करने दिया। उसने अपनी कूटनीतिज्ञता के बल पर 1890 ई. में रूस और जर्मनी में पुनराश्वासन संधि की पुनरावृत्ति की।

बिस्मार्क की आर्थिक नीति

बिस्मार्क ने जर्मनी की आर्थिक दशा को उन्नत करने का विशेष प्रयत्न किया जिसके कारण राज्य की आय में वृद्धि हुई और सरकार दृढ़ तथा सुसंगठित सेना रखने में सफल हुई। उसने मुक्त व्यापार की नीति के स्थान पर संरक्षण की नीति को अपनाया। मुक्त व्यापार की नीति इंगलैंड में पर्याप्त सफलता प्राप्त कर चुकी थी। बिस्मार्क स्वयं भी पहले इसी नीति का अनुयायी था। किन्तु कुछ विशेष कारण्ज्ञों के उत्पन्न होने पर उसने संरक्षण नीति को जर्मन के लिये अधिक श्रेयस्कर तथा हितकर समझा। उसके प्रमुख कारण थे-
  1.  कृषि की शोचनीय अवस्था
  2. आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करना 
    उपरोक्त उद्देश्यों कर प्राप्ति हेतु बिस्मार्क ने करों में वृद्धि करने के लिए एक प्रस्ताव प्रस्तावित किया। जिस पर कई माह तक पर्याप्त वाद-विवाद चलता रहा, किन्तु जुलाई 1876 ई. में प्रस्ताव ने अधिनियम का रूप धारण किया और उसको शीघ्र ही कार्यान्वित किया गया।

    1. बिस्मार्क और समाजवाद - 1878 ई. के उपरांत बिस्मार्क का ध्यान समाजवादियों की ओर आकर्षित हुआ जो व्यावसायिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप मजदूरों को अपनी और आकर्षित कर अपना दृढ़ संगठन कर रहे थ।े जर्मनी में समाजवाद का जन्मदाता कार्ल माक्र्स था, किन्तु जर्मनी में आधुनिक समाजवाद तथा धार्मिक आन्दोलन का नेता फर्डिनेन्ड लासाल था। कार्ल माक्र्स और लासाल में सिद्धांत के प्रति पर्याप्त विभिन्नतायें विद्यमान थीं जिसके कारण आरंभ में जर्मनी में समाजवाद को विशेष सफलता प्राप्त नहीं हुई, किन्तु 1875 ई. में दोनों में पारस्परिक समझातै ा होने के फलस्वरूप समाजवाद को बड़ा पा्र त्े साहन प्राप्त हुआ। उन्होंने सामाजिक प्रजातान्त्रिक दल की स्थापना की। 

    1878 ई. से पूर्व ही बिस्मार्क उनके सिद्धांत तथा नीति का कट्टर विरोधी था? क्योंकि वे उन सिद्धांतो का प्रतिपादन करते थे जो उसके अपने सिद्धांत से पूर्णतया विरूद्ध थे। वे प्रजातंत्र के समर्थक और सैनिकवाद के विरोधी थे, परन्तु बिस्मार्क प्रजातंत्र का शत्रु और सैनिकवाद का पुजारी था, अत: दोनों में संघर्ष होना अनिवार्य था।

    2. बिस्मार्क के समाजवाद के अन्त करने के उपाय - बिस्मार्क ने समाजवाद का जर्मनी से अंत करने के लिये दो उपाय किये (क) समाजवादियों का कठारे तापूर्वक दमन तथा (ख) श्रमिकों की दशा को उन्नत करना। किन्तु समाजवादियों का दमन कोई आसान कार्य नहीं था इसीलिए इस दिशा में बिस्मार्क को आंशिक सफलता ही प्राप्त हो सकी।

    बिस्मार्क का मूल्यांकन एवं पतन 

    बिस्मार्क के चरित्र में विरोधी प्रवृत्तियों का मिश्रण था किन्तु अपने आत्मविश्वास और निर्भीकता के कारण वह जिस पथ पर चलने लगता था उससे पीछे हटना नहीं जानता था। बिस्मार्क अपने कार्यों में किसी का भी हस्तक्षेप सहन नहीं करता था। सम्राट विलियम प्रथम के जीवित रहते उसमें अहंकार की भावना और भी बढ़ गई क्योंकि वह उसकी दलील के आगे झुक जाता था। उसके द्वारा की गई सन्धियाँ और समझौते कुछ ऐसे जादूगरी के कमाल थे कि सम्भवतः कुछ समय पश्चात वह स्वयं भी उन्हें सफलतापूर्वक चलाने में असमर्थ होता।

    जर्मनी की राजनीति में बिस्मार्क ने जिस स्थान को प्राप्त कर लिया था वह शायद ही कोई दूसरा व्यक्ति सरलता से भविष्य में भी प्राप्त कर सकेगा। बिस्मार्क की नीतियों की सफलता के लिये बहुत से तत्व जिम्मेदार थे जिनमें सम्राट विलियम प्रथम का सहयोग भी बहुत महत्व का था। 

    1 मार्च 1888 को उसकी मृत्यु के पश्चात् फ्रैड्रिक तृतीय सिंहासन पर बैठा परंतु वह उसी वर्ष 15 जून को कैंसर से पीडि़त होने के कारण दिवंगत हुआ। उसके पश्चात् 16 जून को फ्रैड्रिक का पुत्र द्वितीय विलियम के नाम से सिंहासन पर बैठा। वह केवल 39 वर्ष का था और उसमे कार्य करने की यथेष्ट क्षमता थी। वह केवल एक नाममात्र का शासक बना रहने के लिये तैयार नहीं था। अतः प्रारंभ से ही बिस्मार्क के साथ मतभेद उत्पन्न होने लगे। विलियम द्वितीय टर्की में जर्मन प्रभाव को बढ़ाना चाहता था और इस प्रकार वह रूस के साथ मित्रता बनाये रखने के विशेष पक्ष में नहीं थ। किन्तु जहाँ तक आस्ट्रिया, इटली, इंग्लैण्ड के साथ सहयोग का संबंध था दोनों के विचारों में कोई अंतर नहीं था। अतः इस प्रकार विदेश नीति के क्षेत्र में दोनों के मध्य समझौता बना रहा किन्तु गृहनीति के क्षेत्र में दोनेां में एक दूसरे की विचारधारा से सहमति होना संभव नहीं था। 

    सम्राट विलियम द्वितीय ने समाजवादियों के विरूद्व बिस्मार्क द्वारा बनाये गये सभी कानूनों को रद्द कर दिया था जिससे बिस्मार्क बहुत रूष्ट हुआ। बिस्मार्क यह भी नहीं चाहता था कि किसी भी मंत्री से राजा सीधा संपर्क स्थापित करें। उसका कहना था कि ’’मैं घुटने टेक कर सेवा नहीं कर सकता’’ परिणामतः 20 मार्च 1890 को उसे त्यागपत्र देना पड़ा। उसे आशा थी कि सम्राट उसे फिर एक दिन वापिस बुलायेगा, परंतु ऐसा समय कभी नहीं आया और 30 जुलाई 1898 को उसकी मृत्यु हो गई। 

    Bandey

    मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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