चार्टिस्ट आंदोलन क्या था ? इसके कारणों का वर्णन

चार्टिस्ट आंदोलन ग्रेट ब्रिटेन के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है। रानी विक्टोरिया के शासन के प्रारंभिक वर्षों में वहाँ एक श्रमिक-आंदोलन हुआ, जिसे चार्टिस्ट आंदोलन का नाम दिया गया। यह आर्थिक कठिनाइयों पर आधारित एक राजनीतिक-आंदोलन था, जिसका अंतिम लक्ष्य समाज में परिवर्तन लाना था। देश में होने वाली औद्योगिक-क्रांति ने देश के सामाजिक और आर्थिक ढाँचे में बड़ा परिवर्तन प्रस्तुत किया। इसने मध्यम-वर्ग की स्थिति को तो ठीक कर दिया, परन्तु इसके कारण मजदूर-वर्ग की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया। आर्थिक क्षेत्र में इसके कारण मजदूर वर्ग की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया। आर्थिक क्षेत्र में धनी और निर्धनों के बीच की खाई गहरी ही बनी रही। यही नहीं वरन् वह और गहरी होती गयी। 

1832 में सुधार कानून भी पारित किया गया, लेकिन इसका लाभ केवल उच्च मध्यम वर्ग के व्यक्तियों को ही प्राप्त हो सका। इससे श्रमिकों के बीच बहुत व्यापक असंतोष की भावना फैलने लगी। श्रमिकों ने ही इस सुधार के लिए आन्दोलन किया था। इस विधेयक को पारित करवाने में भी उनका ही अधिक योगदान रहा था। किन्तु उनको इस अधिनियम में विशेष लाभ नहीं हुआ। ‘स्वाभाविक रूप से उनमें असंतोष की भावना फैलती गयी और इसके प्रति वे अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने लगे। उत्तरी इंग्लैंड के औद्योगिक केन्द्रों में लोग भूख से पीडि़त थे। अपने प्रति सरकार की उदासीनता के कारण वे विद्रोह करने के लिए बाध्य हो उठे थे। सरकारी प्रयत्नों के प्रति अनेक लोगों का विश्वास उठता चला जा रहा था। इस व्यवस्था में वे परिवर्तन लाना चाहते थे। इन सब कारणों का परिणाम यह निकला कि इंग्लैंड में विभिन्न सामाजिक एवं राजनैतिक आंदोलन का सूत्रपात होने लगा।’ 

1838 में श्रमिकों ने अपनी माँगों का एक प्रपत्र तैयार किया था। उसी को आधार बनाकर एक चार्टर तैयार किया गया। इसको लोक-प्रपत्र कहा जाने लगा और इसी नाम से यह अधिक लोकप्रिय हो गया। चार्टर के समर्थकों को ही चार्टिस्ट कहा जाने लगा। बहुत अधिक संख्या में श्रमिकों ने इसका समर्थन किया। इनके दो प्रमुख नेता थे, इनमे ंसे एक फीयर्स ओकेनर जो आयरिश था। इसने उत्तरी भाग के चार्टिस्टों का नेतृत्व किया। उसका पत्र ‘नार्दन स्टार’ इस आन्दोलन का प्रमुख पक्ष था। इसका दूसरा प्रमुख नेता था लंदन निवासी विलियम लाॅवेट जिसने लंदन के चार्टिस्टों का नेतृत्व किया। 1836 में लंदन में एक श्रमिक संघ की स्थापना की गई। विलियम लाॅवेट इस संघ का एक प्रमुख सदस्य था और बहुत सक्रियता से इसके कामों में सहयोग देता था।

1832 ई. के सुधार ने मध्यम वर्ग को तो राजनीतिक अधिकार प्रदान किये थे, परंतु मजदूर वर्ग को इससे कोई लाभ नहीं हुआ था। मजदूरों के बीच बेकारी और भुखमरी फैल रही थी और अन्य परिस्थितियाँ उनके बीच असंतोष को उत्पन्न कर रही थीं। इससे वहाँ अनेक मज़दूर -आंदोलनों का जन्म हुआ। इन्हें में से एक महत्वपूर्ण आंदोलन-चार्टिस्ट आंदोलन था। 

चार्टिस्ट आंदोलन एवं उसका दमन

राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन फरवरी, 1839 में लंदन में किया गया । इस आन्देालन के पूर्व इस सम्मेलन में विलियम लाॅवेट और ओ-काॅनर दोनों दलों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। दोनों दलों के सदस्य इस प्रश्न पर एकमत थे कि संसद के पास आवेदन-पत्र भेजा जाय। यदि संसद ने इस आवेदन-पत्र को अस्वीकार कर दिया तो ऐसी परिस्थिति में क्या करना होगा। इस संबंध में दोनों दलों के समर्थकों के बीच स्पष्ट रूप में मतभेद था। लाॅवेट और उसके सहयोगी समर्थक समस्या का समाधान शांतिपूर्ण ढंग से करना चाहते थे। पर ओ-काॅनर एवं उसके समर्थकों का शांतिपूर्ण नीति पर विश्वास नहीं था। वे हिंसात्मक विद्रोह करना चाहते थे। इस मतभेद को दूर करने के लिए वाद-विवाद हुए। अन्त में यह निश्चित किया गया कि यदि संसद आवेदन को अस्वीकार कर देगी, तो उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए विद्रोह को माध्यम बनाया जायेगा। विद्रोह तभी किया जायेगा जब संसद आवेदन पत्र को स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर देगी।
इस निर्णय के बाद सम्मेलन को समाप्त कर विद्रोह की तैयारियाँ आरम्भ कर दी गईं। 

ओ-काॅनर ने अपनी पत्रिका (नाॅदर्न स्टार) में एक लेख प्रकाशित किया जिसमें सरकार को धमकी दी गयी कि यदि आवेदन-पत्र स्वीकार नहीं किया गया तो बल-प्रयोग एवं रक्तपात के माध्यम का सहारा लिया जायेगा। लंदन डेमोक्रेट नामक एक अन्य समाचार पत्र में विद्रोहियों को प्रशिक्षण देने के सम्बन्ध में लेख प्रकाशित किया गया। मोर्चाबन्दी करने के तरीकों को छोटी-छोटीे पुस्तकों में प्रकाशित किया गया तथा उनको वितरित किया गया। नये किस्म के भालों को निर्माण किया गया और पुरानी बन्दूकें साफ की गयीं। इन सब तैयारियों को देखकर भी सरकार शान्त ही रही और उसने विद्रोह को कुचलने की तैयारी शुरू कर दी। सेना को भी तैयार रहने की आज्ञा दे दी गई। सौभाग्य से कुछ बुद्धिमान चार्टिस्टों ने इसमें हस्तक्षेप किया और विद्रोहियों की इन तैयारियों को स्थगित करवा दिया।

विद्रोह एवं उसका दमन

मई, 1839 में पुनः ‘राष्ट्रीय सम्मेलन’ का आयोजन बरमिंघम में किया गया। इस सम्मेलन में ओ-काॅनर के हिंसावादी सदस्यों की प्रधानता हो गई। इस सम्मेलन में अनेक क्रांतिकारी प्रस्ताव पारित किये गये। इनमें से मुख्य निम्नांकित थे-(1) राष्ट्रीय स्तर पर हड़ताल करना (2) बैंकों में जितना भी स्वर्ण जमा था सबको निकालना, (3) विद्रोहियों को अस्त्र-शस्त्रों से सुशोभित करना। 

इस हिंसावादी दल का यह विचार था कि जिस समय सरकार को आवेदन-पत्र दिया जायेगा, उस समय सरकार को हिंसात्मक खबरों से आतंकित कर दिया जायेगा। इस विचार से विद्रोहियों के पास जितनी बन्दूकें थी सबको तैयार कर लिया गया। ‘‘दरिद्र नियम’’ के तीन कमिश्नरों को ‘तीन निर्दयी’ कहा गया और इस आशय के पर्चे वितरित किये गये। कुछ स्थानों पर वास्तविक रूप में मोर्चाबन्दी की गयी। कुछ नगरों में विद्रोह का सूत्रपात भी हो गया। विद्रोही केवल अपना ही जोश दिखा रहे थे, उनको पता नहीं था कि सरकार ने विद्रोहियों को दबाने की पूर्ण तैयारी कर ली थी। सरकार ने बरमिंघम में होने वाली एक विशाल सभा पर आक्रमण करवा दिया। परिणामस्वरूप अनेक विद्रोहियों को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तार व्यक्तियों में विलियम लाॅवेट भी था। नगर में शांति रखने के लिए नगर का प्रशासन सेना को दे दिया गया।

प्रथम आवेदन-पत्र 

1839 ई..इस आवेदन-पत्र में 12 लाख 50 हजार व्यक्तियों ने हस्ताक्षर किये। उनके द्वारा हस्ताक्षर किया हुआ प्रथम आवेदन-पत्र बरमिंघम के एटवुड द्वारा जुलाई, 1839 में पार्लियामेंट के समक्ष प्रस्तुत कराया गया, किन्तु पार्लियामेंट ने उसको अस्वीकार कर दिया। इसका प्रभाव चार्टिस्टों पर प्रतिकूल पड़ा। वे अपने को असहाय समझने लगे। उनकी सारी तैयारियाँ जो विद्रोह करने के लिए की गयी थीं बेकार हो गयीं। उत्तरी इंग्लैड में विद्रोह नहीं हुआ, किन्तु दक्षिणी वेल्स में विद्रोह की ज्वाला आखिर भड़क ही उठी। वहाँ लगभग 3 हजार चार्टिस्टों ने अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित होकर न्यूपोर्ट पर धावा बोल दिया। वे अपने नेता विन्सेंट को कारागार से मुक्त करना चाहते थे। सरकार ने इन विद्रोहियों को दबाने के लिए सेना भेजी। विद्रोही भाग खड़े हुए। वे सैनिक आतंक से इतना भयभीत हो गये कि भविष्य में उन्होंने विद्रोह करने का नाम ही नहीं लिया।

आन्दोलन का अंत

विद्रोहियों में उत्साह-हीनता आने से इसका लाभ सरकार ने उठाया। सेना ने चार्टिस्टों दबाया। जहाँ-जहाँ पर चार्टिस्टों की भीड़ पायी जाती, उस भीड़ को सेना तितर-बितर कर देती थी। विद्रोहियों के अस्त्र-शस्त्र की तलाशी ली गई और उन्हें जप्त कर लिया गया। चार्टिस्टों के मुख्य नेताओं को गिरफ्तार कर कारावास में डाल दिया गया। विलियम लाॅवेट और ओ-काॅनर को भी गिरफ्तार कर लिया गया और एक साल के लिए कारावास में डाल दिया
गया। इस तरह यह स्पष्ट होता है कि सरकार ने बहुत ही कम समय में चार्टिस्टों के विद्रोह को पूर्ण रूप से कुचल डाला। इससे बचे हुए विद्रोहियों को घोर निराशा हुई। उनमें आपस में मतभेद भी हो गये। विद्रोहियों ने अनुभव किया कि वे सरकार से लोहा लेने में समर्थ नहीं है। मतभेदों के चलते उन्होंने अपने को पुर्नसंगठित करने का प्रयास भी नहीं किया। इसका स्पष्ट परिणाम यह हुआ कि अगस्त 1839 तक चार्टिस्टों और उनके सम्मेलन का समापन हो गया।

आन्दोलन का पुनः आरम्भ

यद्यपि सरकार ने सेना का सहयोग लेकर चार्टिस्ट आन्दोलन का अन्त कर दिया था, किन्तु इस आन्दोलन के पीछे जो भावना निहित थी, उसका अन्त नहीं हो पाया था। श्रमिक वर्ग अभी भी सैकड़ों हजारों की संख्या में इस भावना की प्रेरणा में रहा था। इस भावना से प्रेरित होकर उन लोगों ने 1840 में ‘‘राष्ट्रीय चार्टिस्ट संघ’’ स्थापना की। इस संघ का मुख्य कार्य आंदोलन की भावना को जीवित रखना था। एक वर्ष के बाद विलियम लाॅवेट और ओ- काॅनर कारावास से मुक्त हो गये। अब उन लोगों ने संकल्प किया कि वे आन्दोलन की भावना को अधिक-से-अधिक सुदृढ़ बनायेंगे। अतः वे चार्टिस्टों को पुनः संगठित करने के प्रयास में संलग्न हो गये। अपने पूर्व अनुभव को आधार बनाकर इस बार उन्होंने शक्ति-बल प्रयोग की भावना को त्याग दिया और शांतिपूर्ण विधियों को अपनाने का निश्चय किया। इस प्रकार चार्टिज्म पुनर्जीवित हो गया। इस बार इसका स्वरूप पूर्व के चार्टिज्म के स्वरूप से भिन्न था। इसके स्वरूप के बारे में कारलाइल ने अपना विचार व्यक्त किया है, ‘‘चार्टिस्ट आन्दोलन गम्भीर, गहरा और अति व्यापक है, इसकी बातें तो कुछ समय पूर्व आरम्भ हुई थीं और न वर्तमान या भविष्य में समाप्त होंगी, वरन सदैव चलती रहेंगी।’’ इस तरह इस आंदोलन का स्वरूप बहुत व्यापक हो गया। इसने श्रमिकों के अन्तःकरण को प्रभावित किया।

द्वितीय आवेदन-पत्र

सन् 1842 का वर्ष श्रमिकों के लिए अति संकटपूर्ण था। अतः चार्टिस्ट आन्दोलन को रूप धारण करने में समय नहीं लगा। पूर्व के समान इस बार भी उन लोगों ने अपनी 6 माँगों पर बल दिया और इसको लिखकर दूसरा आवेदन-पत्र तैयार किया। इस बार इसका स्वरूप मुख्य रूप से राजनैतिक नहीं बल्कि सामाजिक था। इस आवेदन-पत्र पर 30 लाख व्यक्तियों ने हस्ताक्षर किये। इस आवेदन-पत्र को भी प्रथम आवेदन पत्र के समान संसद के समक्ष प्रस्तुत किया गया, और संसद ने पुनः इसको अस्वीकार कर दिया। इसका स्वाभाविक परिणाम निकला कि विभिन्न स्थानों पर दंगे-फसाद हो गये। चार्टिस्टों ने राष्ट्रीय हड़ताल की घोषणा की। लंकाशायर और यार्कशायर में पूर्ण हड़ताल की गई। इस हड़ताल में किसी प्रकार का बल प्रयोग नहीं किया गया। शांतिपूर्ण विधियों के आधार पर हड़ताल की गयी, जो इस आन्दोलन की प्रमुख विशेषता थी। उनके शांतिपूर्ण कार्यों के विपरीत सरकार ने दमनपूर्ण नीति का पालन किया और शांतिप्रिय विद्रोहियों को दबाया गया। अनेक चार्टिस्टों को जेल में बंद कर दिया गया और अनेकों को निर्वासित किया गया। इस तरह 1842 तक चार्टिस्ट आन्दोलन करीब-करीब समाप्त हो गया।

अन्तिम चरण

1842 की घटना का लोगों पर प्रभाव पड़ा और वे समझने लगे कि चाटिस्ट आन्दोलन का अन्त हो गया। किन्तु बुझते हुए दीपक की अन्तिम लौ के समान आन्दोलन की अन्तिम ज्वाला 1848 में फिर जगमगा उठी। और उसे प्रज्वलित किया उस वर्ष फ्रांस में होने वाली क्रांति की सफलता ने। फ्रांसीसी क्रांतिकारियों की सफलता से प्रभावित होकर चार्टिस्टों ने पुनः एक बार स्वयं को संगठित किया। अनेक स्थानों पर विशाल सभाओं का आयोजन किया गया और विशाल जुलूस भी निकाले गये। राष्ट्रीय सम्मेलन के सदस्यों को एक बार पुनः निर्वाचित किया गया और उन लोगों ने मिलकर तृतीय आवेदन-पत्र तैयार किया। इन सभी कामों का ओ-काॅनर ने नेतृत्व किया। यह निश्चित किया गया कि इंग्लैंड में गणतंत्र की स्थापना की जाय जिसका नेतृत्व ओ-काॅनर द्वारा किया जायेगा। गणतंत्र राज्य की स्थापना की इच्छा से बहुत अधिक संख्या में अस्त्र-शस्त्र भी जुटाए गये। यह भी निश्चित किया गया कि 10 अप्रेल 1848 को तृतीय आवेदन-पत्र संसद के समक्ष पेश किया जायेगा।

तृतृतीय आवेदन पत्र

10 अप्रैल को तृतीय आवेदन-पत्र को पार्लियामेंट में ले जाने के लिए लोग ‘केनिंगटन काॅमन’ नामक स्थान पर एकत्रित हुए। ऐसी आशा थी कि कम-में-कम 5 लाख व्यक्ति एकत्र होंगे। लेकिन केवल कुछ सहस्र व्यक्ति ही एकत्रित हो पाये। सरकार की ओर से भी इसके लिए पूरी तैयारी कर ली गयी थी। प्रधान सेनापति वेलिंगटन भी एक लाख सात हजार सैनिकों के साथ विद्रोहियों का सामना करने के लिए तैयार था। उनसे कहा गया कि वे सभा कर सकते हैं, किन्तु अपना जुलूस वे संसद में नहीं ले जा सकते थे। अतः सभा की गई भाषण भी दिये गये, किन्तु सैनिकों की उपस्थिति के कारण लोगों में भय व्याप्त हो गया और वे हतोत्साहित हो गए। सभा समाप्त होने पर आॅ-काॅनर हताश हो गया और अपने कुछ सहयोगियों के साथ वह संसद की ओर जाने लगा। उसके पीछे तीन गाडि़यों पर लदा हुआ आवेदन पत्र जिस पर कहा जाता है कि लगभग 55 लाख व्यक्तियों ने हस्ताक्षर किये थे, चला। रास्ते में वर्षा होने लगी और ओ-काॅनर के साथीगण इधर-उधर भाग गये। अन्त में, थोड़े से साथियों और आवेदन-पत्र के साथ ओ-काॅनर ‘काॅमन्स-सभा’ में पहुँचा।

आन्दोलन का अन्त

काॅमन्स सभा में आवेदन पत्र की जाँच की गई। उसमें अनेक जाली हस्ताक्षर निकले। इन हस्ताक्षरों में महारानी विक्टोरिया और ड्यूक आॅफ वेलिंगटन के हस्ताक्षर भी निकले। अनेक हस्ताक्षर ऐसे थे जो बार-बार दोहराये गये थे। कुछ ऐसे लोगों के हस्ताक्षर थे जो वस्तुतः इंग्लैंड में थे ही नहीं। इस प्रकार ‘आवेदन-पत्र’, चार्टिस्ट आन्दोलन और उसका नेता ओ-काॅनर ‘कामन्स सभा’ के सदस्यों के मजाक के विषय बन गये। ऐसी स्थिति में उनका दमन करने की कोई आवश्यकता नहीं रह गयी और चार्टिस्ट आन्दोलन अपनी मौत स्वयं मर गया। इस सम्बन्ध में रेम्जेम्योर ने लिखा है - ‘‘चार्टिज्म 1842 से मर रहा था। इस अन्तिम घटना ने उसकी धीमी लपट को सदैव के लिए बुझा दिया।’’

चार्टिस्ट आंदोलन के कारण

1. चार्टिस्ट आंदोलन के सामाजिक कारण 

इंग्लैण्ड की औद्योगिक क्रान्ति ब्रिटेन की सामाजिक व्यवस्था को परिवर्तित कर दिया। इसके कारण मध्यम वर्ग सम्पन्न होता गया जब कि मजदूर-वर्ग निर्धन। फलत: अमीर और गरीब की सामाजिक स्थिति में अंतर बढ़ता गया। इससे सामाजिक एकता नष्ट होती गयी। यह स्थिति देश के अंदर दो राष्ट्र होने जैसे अनुभव का आभास कराती थी, जिसमें विभिन्न वर्गों में आपस में कोई सहानुभूति न थी।

2. चार्टिस्ट आंदोलन के आर्थिक कारण

औद्योगिक-क्रान्ति के कारण देश में आर्थिक असमानताएँ भी बढ़ती गयी। देश में बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना और विकास के कारण संपित्त में वृद्धि तो हो रही थी, पर इसका लाभ कुछ लोगों को ही मिल रहा था। धन का समान वितरण न होने के कारण मध्यम-वर्ग ओर उद्योगपति ही धनी होता गया, जबकि मजदूरों को उनका उचित हिस्सा नहीं मिल पा रहा था। इस प्रकार औद्योगीकरण का दुष्परिणाम मजदूर-वर्ग को भुगतना पड़ रहा था।

3. चार्टिस्ट आंदोलन के राजनीतिक कारण 

देश की राजनीति में भी मजदूरों का कोई महत्व न था। सन् 1832 ई. का सुधार अधिनियम उनकी स्थिति में सुधार लाने में असफल सिद्ध हुआ। ऐसी स्थिति में देश के मजदूरों ने राजनीतिक-अधिकार प्राप्त करना आवश्यक समझा। वे यह मानते थे कि इसके बिना उनकी सामाजिक ओर आर्थिक स्थिति में सुधार लाना संभव न होगा, इसीलिए उन्होंने अपने आंदोलनों द्वारा अनेक मांगें रखी। वे यह भी मानते थे कि संसद में जाने के बाद ही वे अपने अधिकारों को प्राप्त करने में समर्थ हो सकेंगे । इसी कारण चार्टिस्ट आंदोलन ने राजनीतिक-आंदोलन का रूप ले लिया था। राजनीतिक-अधिकार प्राप्त करने के बाद ही वे आर्थिक और सामाजिक परिवर्तनों के लिए कोशिश करना चाहते थे। इस प्रकार इस आंदोलन के अनेक कारण थे। विलियम जॉनेट और फर्गुस ओकानेर इस आंदोलन के प्रमुख नेता थे।

चार्टिस्ट आंदोलन की प्रगति

14 जून सन् 1839 ई. को चार्टिस्टों ने अपनी माँगों से संबंधित प्रथम आवेदन पत्र संसद के समक्ष पेश किया, जिस पर लाखों लोगों के हस्ताक्षर थे। इसपर संसद ने उस पर विचार करने से इंकार कर दिए। अपना प्रार्थना पत्र अस्वीकार किए जाने के कारण चार्टिस्टों ने जो आंदोलन प्रारंभ किया, उसका नेतृत्व ओकानेर, ऐटबुड और ओब्रायन के हाथों में आ गया। मन्मथशायर में एक भयंकर विद्रोह किया गया। जब विद्रोहियों ने अपने नेता हेनरी विन्सेटं को छुड़ाने न्यूपाटेर् की जेल पर आक्रमण किया तब सैनिकों को सुरक्षा की दृष्टि से गोली चलानी पड़ी। इससे तीस लोग मारे गये और अनेक घायल हुए। इस घटना को ‘न्यूपोर्ट के युद्ध’ का नाम दिया गया। इस घटना के बाद चार्टिस्टों के अनेक नेता कैद कर लिए गए और कुछ को निर्वाचित कर दिया गया। इसके बावजूद चार्टिस्टों का आंदोलन जारी रहा, लेकिन इसके पश्चात उन्होंने शक्ति-प्रदर्शन का मार्ग छोड़ दिया।

1841 ई. में चार्टिस्टों ने अपना दूसरा आवेदन पत्र प्रस्तुत किया, पर संसद ने उस पर भी विचार नहीं किया। 1848 ई. में जब फ्रासं में तीसरी क्रान्ति हइुर् तब उससे प्रोत्साहित होकर चार्टिस्टों ने पुन: आंदोलन छेड़ दिया। उन्होंने इस बार 50 लाख लोगों के हस्ताक्षर पूर्ण तीसरी आवेदन पत्र संसद के समक्ष प्रस्तुत करने का निश्चय किया। उसे उन्होंने एक बड़े जुलूस के साथ संसद तक ले जाने का निश्चय किया, पर उन्हें एसे ा करने से राके दिया गया। संसद ने इस आवदेन पत्र पर विचार करने करने के लिए एक समिति की नियुक्ति की। जाँच से यह ज्ञात हुआ कि उनमें से अनेक हस्ताक्षर जाली थे। उस समय वे चॉर्टिस्टों का महत्व घट गया और लोग उनका मजाक उड़ाने लगे। धीरे-धीरे नैतिक हृास हो गया। इस प्रकार एक अच्छे उद्देश्य के बावजूद यह आंदोलन असफल रहा।

चार्टिस्ट आंदोलन के असफलता के कारण

चार्टिस्ट आंदोलन की असफलता के प्रमुख कारण थे-
  1. चार्टिस्ट आंदोलन से संबंधित लोग आपस में विभाजित थे। उनमें से कुछ लोग हिंसक तरीके अपनाना चाहते थे, जबकि कुछ लोग शांतिपूर्ण ढंग से आंदोलन चलाना चाहते थे। इस मतभेद के कारण उनकी शक्ति कम हुई। 
  2. उनके साधन और तरीके अपर्याप्त और अनुचित थे। उन्होंने जिस प्रकार से विद्रोह किया और जाली हस्ताक्षर से युक्त आवेदन-पत्र तैयार किया, इससे वे जन-सहानुभूति से वंचित हो गए। अभीष्ट जन-समर्थन के अभाव में उनका आंदोलन कुछ समय के पश्चात महत्वहीन हो गया। 
  3. ब्रिटिश-सरकार ने अपनी ओर से एसे ा कानून पारित किया, जिससे देश के मजदूरों की स्थिति में सुधार आया। फैक्ट्री और श्रम कानूनों के निर्माण से चार्टिस्ट आन्दोलन को शक्ति और उपयाेगता में कमी आयी। 
  4. कृशि, व्यापार की उन्नति और अनाज कानून के समाप्त हो जाने से देश की आर्थिक स्थिति में पूर्व की अपेक्षा सुधार हुआ तथा वस्तुओं के मूल्यों में कमी आयी। इन उपायों के कारण आंदोलन के समर्थकों की संख्या कम होती गयी। 
  5. योग्य नेतृत्व के अभाव के कारण भी यह आन्दोलन सफल न हो सका। चार्टिस्टों ने सभी मजदूरों को संगठित नहीं किया था। इस कारण उन्हें संपूर्ण मजदूरों का सहयोग प्राप्त नहीं हो सका। उनके लक्ष्य स्पष्ट और निर्धारित नहीं थे।
  6. हिंसा, दंगों और हड़ताल के कारण चार्टिस्टों ने जन-समर्थन खो दिया, क्यों वहां की जनता शान्तिपूर्ण तरीके से ही परिवर्तन लाने में विश्वास करती थी। झूठे हस्ताक्षर के कारण भी उनकी असलियत सामने आ गयी थी, इसलिए उनका आंदोलन हंसी-मजाक से समाप्त हो गया। 
  7. उक्त कारणों के परिणामस्वरूप यद्यपि चार्टिस्ट आंदोलन असफल रहा, परंतु उसका अपना महत्व हैं। आंदोलन के असफल होने के बावजूद उसके उद्देश्य जीवित रहे। इस संदर्भ में कार्यालय ने लिखा है, ‘‘ उसके सिद्धांत मौलिक और व्यापक थे। उनमें ऐसी बातें न थीं, जो कल ही आरंभ हुई हों और आज या कल समाप्त गो जाए’ ‘। इसी कारण उनकी सभी मांगे धीरे-धीरे स्वीकार कर ली गयीं। गुप्त मतदान, व्यस्क मताधिकार, संसद के सदस्यों को वेतन देने आदि बातें स्वीकार कर ली गयीं। 
  8. यह पहला श्रमिक-आंदोलन था, जिसकी ओर देश की जनता और सरकार का ध्यान आकृष्ट हुआ। इसने देश में भावी सुधारों के लिए मार्ग प्रशस्त किया। इस प्रकार असफल होने के बावजूद यह आंदोलन काफी उपयोगी और महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ। 
  9. 19वीं सदी का साहित्य भी इस आंदोलन से प्रभावित हुआ तभी तो कार्यालय जैसे विद्वान ने इससे संबंधित साहित्य की रचना की।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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