गुट निरपेक्ष आंदोलन क्या है?

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प्रथम विश्व युद्ध में हुई जन-धन की हानि के कारण दुनिया के देश शांति व्यवस्था स्थापित करने के लिए चिंतित थे। अमेरिका के राष्ट्रपति वुडरो विल्सन के सहयोग से 1920 में राष्ट्रसंघ नामक अन्र्तराष्ट्रीय संस्था की स्थापना की गई। शांति व्यवस्था बनाये रखने के लिए कुछ शर्ते भी रखी गई। परन्तु कुछ स्वाथ्री देशों में राष्ट्रीयता की भावना न होने के कारण यह संस्था असफल हो गई और शांति स्थापित न हो सकी। 1939 ई. तक पुन: ऐसी स्थिति बन चुकी थी कि द्वितीय विश्व युद्ध जैसी आशंका उत्पन्न हो गई। हुआ यही कि 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारंभ हो गया और दुनिया के कई देशों ने अपने आपको इस युद्ध में झौंक दिया। 1945 में युद्ध समाप्त होने पर पुन: दुनिया के देश शान्ति स्थापित करने के लिए आतुर हो गये। 1945 में राष्ट्रसंघ जैसी पुन: एक संयुक्त राष्ट्रसंघ नामक अन्र्तराष्ट्रीय संस्था का निर्माण किया गया। इस समय तक दुनिया दो गुटों में बंट चुकी थी प्रथम गुट का नेतृत्व अमेरिका कर रहा था जो पूंजीवादी व्यवस्था का समर्थक था। सोवियत रूस दूसरे गुट का नेतृत्व कर रहा था जो साम्यवादी समर्थक था। अमेरिका ने नाटो तथा सीटो (दक्षिण पूर्वी एशियाई संगठन) का निर्माण जहां रूस ने साम्यवाद के प्रसार को रोकने के लिए किया वहीं रूस को भी वारसा पैक्ट (जिसमें जर्मनी, पोलेण्ड, हंगरी, चेकोस्लावाकिया, रूमानिया, बलगेरिया आदि देश शामिल थे) का संगठन अमेरिका की पूंजीवादी व्यवस्था को रोकने के लिए किया । इन गुटों में दुनिया के अधिकतर विकसित देश थे। भारत एक विकासशील देश था। तथा विकासशील होने के कारण भारत के समक्ष यह समस्या उत्पन्न हो गई थी कि वह किसी एक गुट में शामिल हो या दोनों गुटों से अलग रहे, इस समय दोनों गुटों के मध्य शीतयुद्ध की स्थिति बनी हुई थी। शीतयुद्ध अस्त्र-शस्त्र की लड़ाई न होकर वैमनस्य, कटुता, तनाब, एवं मनोमालिन्य का संघर्ष था। भारत दोनों गुटों की राजनीति से अलग अपना अस्तित्व चाहता था। भारत ने युगोस्लाविया, मिश्र आदि देशों के प्रतिनिधियों से मिलकर इस समस्या पर विचार विमर्श किया। भारत से जवाहर लाल नेहरू, यूगोस्लाविया से मार्शल टीटो तथा मिश्र के राष्ट्रपति नासिर ने दोनों गुटों से अलग रहने की नीति का क्रियानवयन कर गुटनिरपेक्ष आंदोलन का सूत्रपात किया।

गुटनिरपेक्षता या असंलग्नता का उदय

1945 में द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने के पश्चात् विश्व दो गुटों में बंट गया था। एक गुट अमेरिका तथा दूसरा गुट सोवियत रूस का था। इस स्थिति में भारत या तो किसी एक गुट में शामिल हो सकता था, या दोनों गुटों से अलग रह सकता था। भारत के पास इस समय दो ही रास्ते थे। यहाँ इसका मतलब यह नही कि भारत तीसरा गुट बनाने की तैयारी में था। हुआ यही कि भारत ने दोनों गुटों से अलग रहकर अपनी एक नीति अपनाई, और यह तीसरा ही गुट बन गया जो निर्गुट या गुटनिरपेक्ष कहलाया। इस समय तक एशिया तथा अफ्रीका के देश स्वतंत्र अस्तित्व के रूप में उभरने लगे थे। उनका गुटबंदी में विश्वास नही था और वे अपने आपको किसी देश के साथ संबंध नहीं चाहते थे। यह अफ्रो-एशियाई देश तीसरी शक्ति के रूप में उभरे। एशिया और अफ्रीका देशों के नव जागरण के काल में यह गुटनिरपेक्षता की नीति प्रमुख विशेषता थी। उनका विश्वास था कि अन्र्तराष्ट्रीय सहयोग में यह तृतीय शक्ति एक सहायक सिद्ध होगी।

संयुक्त राष्ट्रसंघ की बैठक में गुटनिरपेक्ष शब्द का प्रयोग किया गया। 1953-54 में जब संयुक्त राष्ट्रसंघ में भारत की तटस्थता की हंसी उडाई जा रही थी तब श्री कृष्ण मेनन के मुख से अचानक यह शब्द निकल पड़ा। इस प्रकार भारत की स्वंतंत्रता के उपरांत इस शब्द को बार-बार दुहराया गया तथा इस नीति का पालन शुरू हो गया। भारत में जवाहर लाल नेहरू, मिश्र के राष्ट्रपति नासिर, तथा युगोस्लाविया के मार्शल टीटो ने इस नीति की धारणा को काफी मजबूत किया। अंतत: यह नीति पूर्ण रूप से सितम्बर 1961 ई. में यूगोस्लाविया की राजधानी वेलग्रेड की ‘नान अलाइंड कांफ्रेस’ मे मान्य हो गई।

गुटनिरपेक्षता का अर्थ एवं परिभाषा

डॉ. कृष्णा कुदेशिया ने अपनी पुस्तक ‘ विश्व राजनीति में भारत ‘ में गुटनिरपेक्षता का उल्लेख करते हुए लिखा है कि ‘‘गुटनिरपेक्षता का अर्थ तटस्थता नही है क्योंकि भारत ने अपने आपको संकुचित सीमाओं में बांधकर नही रखा है और न न्यायपूर्ण परिस्थिति में किसी गुट विशेष का समर्थन करने से बचता है। उसकी यह गुटनिरपेक्षता की नीति उपदेशात्मक नकारात्मक तटस्थता एवं अप्रगतिशील नीति नही है इसका अर्थ यह है कि जो सकारात्मक है अर्थात सही और न्यायसंगत है उसकी सहायता और समर्थन करना तथा जो अनीतिपूर्ण है उसकी आलोचना और निंदा करना है।’’

जॉर्ज श्वार्जनवर्गर के मतानुसार गुटनिरपेक्षता को छ: धारणाओं से भिन्न रखा जा सकता है-
  1. अलगाववाद: ऐसी नीतियों का समर्थन करना जिनसे राष्ट्र विश्व राजनीति में कम से कम भाग ले तथा बिल्कुल अलग रहे। 
  2. अप्रतिबद्धता: किन्हीं दो अन्य शक्तियों से समान संबंध रखते हुए उनमें से किसी एक के साथ पूरी तरह से प्रतिबद्ध न होना। 
  3. तटस्थता: यह वह कानूनी एंव राजनीतिक स्थिति है जो युद्ध के दौरान दोनों राष्ट्रों में से किसी के भी साथ युद्ध में संलग्न होने की अनुमति नही देती। 
  4. एक पक्षवाद इसका तात्पर्य है कि प्रत्येक देश नि:शस्त्रीकरण आदि नीतियों को अपनाना चाहिए। साथ ही यह ध्यान रखना चाहिए। कि अन्य देश भी ऐसा करते है या नहीं। 
  5. असंलग्नता: विभिन्न परस्पर विरोधी विचारधाराओं के बीच हो रहे संघर्षो से उत्पन्न खतरों से बचने के लिए तथा अलग रहने के लिए यह नीति अपनाई जाती है। 
  6. तटस्थीकरण देश हमेशा के लिए तटस्थ है अपनी तटस्थीकृत स्थिति को कभी नही छोड सकता। गुटनिरपेक्षता इन सभी छ: धारणाओं से भिन्न है वस्तुत: यह मैत्री संधियों अथवा गुटों से बाहर रहने की नीति है।
‘‘यदि स्वतंत्रता का हनन होगा तथा न्याय की हत्या होगी, आक्रमण होगा वहांँ हम न तो तटस्थ है और न रहेंगें।’’ - जवाहर लाल नेहरू
‘‘यह स्वतंत्र विदेश नीति एवं तटस्थता एक ही बात नही है। अगर कभी कही भी युद्ध होता है तो इस नीति की आवश्यकता होगी कि वह स्वतंत्रता एवं शांति के लिए सहयोग दे। स्वतंत्र विदेश नीति का मतलब यह है कि भारत पहले से अपने आपको किसी भी गुट के साथ समझौते द्वारा संबंद्ध नही करना चाहता और न ही किसी भी दशा में अपनी स्वतंत्रता खोना चाहता है।’’ - अप्पादोराई इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि गुटनिरपेक्षता शांति तथा स्वतंत्रता की नीति है। इसके द्वारा युद्ध रोके जा सकते है। युद्ध की स्थिति में भारत इस नीति का उपयोग शांति स्थापना के लिए करता है।

गुटनिरपेक्षता को दूसरे शब्दों में परिभाषित करते हुए कहा जा सकता है कि गुटनिरपेक्ष वे देश माने जा सकते है जो सैनिक गुटों के सदस्य न हो, युद्ध का समर्थन न करने वाले, स्वाधीनता के समर्थक, स्वतंत्र विदेश नीति आदि का पालन करते हों।

गुटनिरपेक्ष नीति अपनाने के कारण

गुटनिरपेक्षता राष्ट्र हितों के अनुरूप

भारत यह नही चाहता था कि वह किसी गुट में शामिल होकर दूसरे गुट को अपना शत्रु बना ले। समस्त देश उससे मैत्री की कामना करते है तो वह सभी देशों से मैत्री का कामना करता है। साथ ही इस समय किसी गुट में शामिल होना भारत के राष्ट्रीय हितों के अनुकूल नहीं था।

विश्व शान्ति की इच्छा

भारत की स्वतंत्रता के समय दुनिया दो गुटों में बट चुकी थी। दूसरे विश्व युद्ध को समाप्त हुए कुछ ही समय (2वर्ष) हुए थे अमेरिका तथा सोवियत रूस में तनाव की स्थिति बनी हुई थी। शीत-युद्ध प्रारंभ हो गया था। भारत इस तनाव में नही पडना चाहता था । वह समान रूप से दोनों गुटों से मित्रता का वातावरण बनाना चाहता था।

विदेशी सहायता की आवश्यकता

स्वतंत्रता के समय भारत पिछड़ा हुआ देश था। अंग्रेजी राज्य के शोषण के कारण भारत को आर्थिक पुर्ननिर्माण की भारी आवश्यकता थी। भारत की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए पंचवष्रीय योजनाएं बनानी पड़ी। इन योजनाओं को चलाने के लिए भारत को अधिक धन की आवश्यकता थी, विदेशी सहायता के बिना इनको चलाना असंभव था। हालाकि भारत की स्थिति सुधरती चली गई और आंतरिक साधन जुटा लिए गये।

भारत की भौगोलिक स्थिति

गुटनिरपेक्षता को अपनाने के लिए वाध्य करती है। भारत पश्चिमी गुट के साथ सैनिक गुटबंदी नही कर सकता क्योंकि पश्चिम विरोधी दो प्रमुख शक्ति शाली साम्यवादी देशों की सीमायें भारत की सीमाओं के पास है एक तरफ चीन तथा दूसरी और सोवियत रूस, अगर भारत ने पश्चिमी खेमे में शामिल होकर रूस की सहानुभूति खो दी तो यह निश्चित रूप से अहितकर होगा।

घटनाओं का निष्पक्ष तथा स्वतंत्र मूल्ल्यांकन

भारत किसी भी गुट का पिछलग्गू बनकर नही रहना चाहता था। और न ही स्वतंत्र निर्णय की शक्ति को खोना चाहता था। हमारी प्राचीन परम्परानुसार हम बड़ी साम्राज्य वाली शक्तियों का विरोध करते है। और शोषित देशों का साथ देना तथा उनकी स्वतंत्रता की मांगो का समर्थन करना तथा निष्पक्ष रूप से अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में निर्णय लेना हमारे आदर्श है।

अन्र्तराष्ट्रीय क्षेत्र में स्वतंत्र व्यक्तित्व का विकास हो मान

सम्मान बड़े यह भारत की इच्छा रही है। अन्र्तराष्ट्रीय क्षेत्र में गतिरोधों को दूर करने, गुटों के मतभेदों को बढ़ाने की बजाय उनकों दूर करने का भरसक प्रयत्न करना तथा विश्व-शान्ति की वृद्धि में योगदान आदि कार्य भारत ने प्रमुख रूप से किये।

गुट निरपेक्षता को प्रोत्साहित करने वाले कारक

स्वतंत्र विदेश नीति का संचालन

आज अधिकतर राष्ट्र गुटनिरपेक्षता की नीति को अपनाने के लिए बाध्य है। क्योंकि राष्ट्र अपने आपको स्वतंत्र शक्ति के रूप में देखना चाहते है। आज कोई भी राष्ट्र किसी बड़ी शक्ति के उपग्रह के समान स्थिति में नही है। और न ही किसी राष्ट्र की अंगुलियों पर नाचने को बाध्य है। आज हर राष्ट्र में स्वतंत्र विदेश नीति का संचालन करने की ललक बनी हुई है।

सैनिक गुटों से पृथक रहना

द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने के पश्चात् विश्व दो गुटों में बंट चुका था। दोनों गुटों ने अपने-अपने सैनिक गुटों को माध्यम बनाया। अमेरिका तथा रूस दोनों से अलग अस्तित्व बनाये रखने के लिए गुटनिरपेक्ष एक तृतीय शक्ति के रूप में उभरा। 1945-50 की अवधि में अत्याधिक अफ्रो-एशियाई देश स्वतंत्र हुए थे ये देश आर्थिक स्थिति से कमजोर थे जो संभलने के लिए समय चाहते थे। और वे इस चक्रव्यूह में नहीं फंसना चाहते थे। वे गुटनिरपेक्षता की नीति पर चलकर विश्व-राजनीति में अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाना चाहते थे।

शीत युद्ध 

1945 के बाद दुनिया के दोनों गुटों में (अमेरिका और सोवियत रूस) में मतभेद की स्थिति बन गयी। यह स्थिति तीव्र तनाव, वैमनस्य, और मनमुटाव के कारण इतनी गम्भीर हो गई कि वे एक-दूसरे पर कटु बाग्वाणों की वर्षा करने लगे। यह लड़ाई कोई अस्त्र-शस्त्र तथा बारूद, गोलों से लड़ी जाने वाली लड़ाई नही थी, बल्कि यह अखबारों (कागज) से लड़ी जाने वाली लड़ाई थी, अखबारों में एक दूसरे देश की आलोचना, वैमनस्यता से पूर्ण बातें अखबारों में दिन-प्रतिदिन पढ़ने को मिलती थी, इससे एक दूसरे देश के प्रति कटुता की भावना बढ़ती जाती थी। जो शीत-युद्ध कहलाया। इस समय स्वतंत्र हुए राष्ट्रों ने किसी का समर्थन न करते हुए पृथक रहने का निर्णय किया। शीत युद्ध से अलग राष्ट्रों की जो नीति थी वह असंलग्नता की नीति थी अर्थात गुटनिरपेक्षता की नीति।

आर्थिक कारक

अधिकांश देश इस समय जो गुटनिरपेक्षता की नीति पालन कर रहे थे वे ज्यादातर गरीब देश थे। उनके पास पूंजी तथा तकनीकी कौशल की कमी थी। इससे इन देशों के मध्य पूंजी प्राप्त करने के लिए कोई रास्ता नहीं था। अगर एक गुट में जाकर मिल जाए तथा पूंजी प्राप्त हो जाए तो दूसरी तरफ स्वतंत्रता छिन जाने का डर था। चूंकि अधिकांश राष्ट्र अपना अलग स्वतंत्र अस्तित्व चाहते थे। इसलिए उन्होनें गुटनिरपेक्षता की राह चुनी।

मनोवैज्ञानिक विवशता

नवोदित राष्ट्रों के गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाने के पीछे उनका कारण भावात्मक एवं मनोवैज्ञानिक विवशता थी। उन्होनें महसूस किया था कि विशिष्ट प्रश्न या स्थिति के संदर्भ में अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करना पड़े या कार्यवाही करनी पड़ जाए तो अच्छी तरह से प्रमाणित कर सकते है।

गुटनिरपेक्षता की उपलब्धियाँ

गुटनिरपेक्ष आन्दोलन का प्रथम शिखर सम्मेलन वेलग्रेड में 1961 ई. में हुआ था। जिसमें 25 राष्ट्रों ने भाग लिया। 1998 में डरबन में आयोजित 12 वें शिखर सम्मेलन में 115 देशों ने भाग लिया था। इस प्रकार गुटनिरपेक्ष आन्दोलन में सदस्यों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। अब यह आन्दोलन अन्तरराष्ट्रीय आन्दोलन बन चुका है एवं कार्य क्षेत्र में भी बढ़ोत्री हुई है। गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की उपलब्धियाँ इस प्रकार है।

नि:शस्त्रीकरण 

अस्त्र-शस्त्र को नियंत्रित करने की नीति तथा नि:शस्त्रीकरण हथियारों के प्रयोग पर रोक लगाने की नीति अधिकांश देशों ने अपनाई परंतु उन्हें एकदम सफलता तो हाथ नहीं लगी परन्तु उन देशों को यह नहीं भूलने दिया कि विश्व-शान्ति को बढ़ावा देने के लिए अस्त्र-शस्त्र बढ़ाने की वे लगाम दौड़ कितनी खतरनाक है। गुटनिरपेक्षता की नीति को अपनाने वाले भारत को इस बात पर संतोष हुआ कि उसने अप्रैल 1954 में जिन न्युक्लीय शस्त्रों के परीक्षण पर प्रतिबंध लगाने का जो प्रस्ताव रखा था 1963 में वह आंशिक रूप से संधि के माध्यम से फलीभूत हुए। ‘‘आन्दोलन से शान्ति का मार्ग प्रशस्त हुआ ही है साथ ही मानव प्रतिष्ठा और समानता का निर्माण भी हुआ है।’’

गुटनिरपेक्षता को दोनों गुटों द्वारा मान्यता

 गुटनिरपेक्षता को प्रारंभ में कठिनाई से जूझना पड़ा, कि देशों को कैसे समझाया जाए कि गुटनिरपेक्षता क्या है अन्र्तराष्ट्रीय स्तर पर इसे कैसे मान्यता दिलाई जाए दोनों गुट पश्चिमी एवं पूर्वी गुट यह समझते थे कि गुटनिरपेक्षता कुछ हद तक ठीक है। दोनों गुटों का गुटनिरपेक्षता पर विश्वास भी कम था परन्तु यह बात भी सच है कि कुछ गुटनिरपेक्ष राष्ट्र कहीं न कहीं तथा किसी न किसी प्रकार से अप्रत्यक्ष रूप से किसी गुट में सम्मिलित है। उनका मानना था कि गुटनिरपेक्षता एक दिखावा है और दो गुटों के अलावा तीसरा रास्ता नही है।

धीरे-धीरे दोनों गुटों के दृष्टिकोण में परिवर्तन आया और गुटनिरपेक्षता को मान्यता मिलना शुरू हो गई। 1956 ई. में सोवियत संघ में कम्यूनिष्ट पार्टी की 20 वीं कांग्रेस ने पहली बार यह स्वीकार किया कि गुटनिरपेक्ष देश सचमुच स्वतंत्र है और यह भी अनुभव किया कि विश्व की समस्याओं के बारे में सोवियत संघ तथा गुटनिरपेक्ष देशों के समान विचार है। वहीं दूसरी ओर पश्चिमी गुट ने भी गुटनिरपेक्ष नीति को मान्यता दी और गुटनिरपेक्ष देशों में गुटबद्ध देशों के मन का भ्रम अलग करने के लिए इस नीति के प्रति सद्भावना और सम्मान का वातावरण पैदा करने में जो प्रयास किये और सफलता प्राप्त की वह वास्तव में सराहनीय कार्य है।

संयुक्त राष्ट्रसंघ के स्वरूप को रूपांतरित करना

 गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों ने गुटनिरपेक्षता की नीति द्वारा संयुक्त राष्ट्रसंघ को कुछ दृष्टियों से हमेशा-हमेशा के लिए रूपांतरित करने में सहायता दी है। संयुक्त राष्ट्रसंघ ने एक तो संख्या के आधार पर तथा दूसरे शीत युद्ध में अपनी तटस्थ दृष्टि के कारण छोटे राष्ट्रों के मध्य शांति स्थापित करने के लिए ऐसे संगठन बनाने में सहायता दी जिसमें छोटे राष्ट्र बड़े राष्ट्रों पर नियंत्रण रख सके। उन्होनें संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा के महत्व को बड़ा दिया, जिसमें सभी सदस्यों का बराबर प्रतिनिधित्व होता है तथा सुरक्षा परिषद का महत्व कम कर दिया। उसकी मूल संकल्पना विश्व संगठन के सबसे महत्वपूर्ण अंग के रूप में की गई।

उन्मुक्त वातावरण का निर्मार्ण

नव स्वतंत्र राष्ट्रों को महान शक्तिशाली राष्ट्र शक्तियों के चंगुल से बचाने के लिए तथा स्वतंत्र वातावरण का अस्तित्व बनाए रखने के लिए गुटनिरपेक्षता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गुटबंदी की विश्व राजनीति ने दमघोटु राष्ट्र समाज में गुटनिरपेक्षता की नीति एक शुद्ध हवा का झोंका लेकर आयी। यह ताजी हवा थी खुले समाज के गुणों की, मुक्त एवं खुली चर्चा के वरदान की, तीव्र मतभेद और रोष के समय खुले रास्ते रखने के महत्व की शीतयुद्ध के कारण जो अनुदारताएॅ और विकृतियाँ पैदा हो गई थी गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों ने उन्हें दूर करने का अथक प्रयास किया। और विश्व समाज एक खुला समाज बन गया।

शीत युद्ध को शस्त्र युद्ध के रूप में बदलने से रोकना

गुटनिरपेक्ष देशों ने दोनों गुटों (अमेरिका तथा सोवियत रूस) के मध्य तालमेल बिठाने के लिए तथा दोनों के मतभेदों को दूर करने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शीत युद्ध की स्थिति बनी हुई थी। स्थिति कुछ ऐसी ही बनती जा रही थी कि तृतीय विश्व युद्ध भी हो सकता था। परन्तु गुटनिरपेक्ष देशों ने दोनों गुटों में सद्भावना का भाव पैदा कर शीत-युद्ध को अस्त्र-शस्त्र के युद्ध से बचा लिया।

विकासशील राष्ट्रो के बीच आर्थिक सहयोग की बुनियाद

विकासशील राष्ट्रों के मध्य आर्थिक सहयोग की बुनियाद रखने में गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों को सफलता मिली। 20 अगस्त 1976 के कोलम्बो शिखर सम्मेलन में आर्थिक घोषणा पत्र स्वीकार किया गया जिसका मुख्य आधार यह था कि गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों के बीच अधिकाधिक आर्थिक सहयोग हो इस सम्मेलन में तकनीकी, व्यापार, मुद्रा प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन आदि पर महत्व दिया गया।

राष्ट्रीय प्रकृति के अनुरूप विकास के प्रतिमान

दोनों गुटों द्वारा गुटनिरपेक्ष देशों पर थोपे जाने वाले आदर्शो का विरोध किया साथ ही अपनी राष्ट्रीय प्रकृति के अनुसार विकास के अपने राष्ट्रीय सांचो और पद्धतियों का अविष्कार किया। इस तरह भारत ने अपने समाज के समाजवादी ढांचे का अविष्कार किया।

विश्व राजनीति में संघर्षों को टालना

गुटनिरपेक्षता के कारण कुछ विकट संघर्ष टल गए। तृतीय विश्व युद्ध की आशंका समाप्त हो गई, साथ ही अन्य संकटों का समाधान भी हो गया। न्युक्लीय अस्त्रों का दशक भी इस खतरनाक संकट से बच गया इस प्रकार गुटनिरपेक्षता ने अन्र्तराष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। दोनों गुटों की जो योजनाएं थी उनको धीरे-धीरे नष्ट कर विश्व के अन्य देशों को भी दो गुटों में शामिल करने से रोक दिया। विकासशील देशों ने विकसित देशों को शांति, सहयोग, सद्भावना पूर्ण जीवन बिताने का सबक सिखाया। गतिरोध घोर अंधविश्वास और दोनों गुटों का सम्पर्क टूट जाने की स्थितियों में गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों ने न केवल संयम से काम लेने की सलाह दी बल्कि युद्ध विराम के अवसरों पर अपने सद्प्रयत्न मध्यस्थता और शान्ति सेनाए भी जैसे कोरिया, स्वेज, सेनाएं प्रस्तुत कर दी।

इस प्रकार गुटनिरपेक्ष आन्दोलन ने विश्व-शान्ति, आर्थिक सहयोग, शीतयुद्ध के समय शान्ति बनाए रखने, नि:शस्त्रीकरण, आदि में महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त की और सफलता भी मिली।

गुटनिरपेक्षता की सदस्यता शर्ते

जून 1961 में काहिरा में 21 राष्ट्रों की बैठक में गुटनिपेक्षता की सदस्यता के संबंध में पाँच मानदण्ड निर्धारित किये गये। आपसी परस्पर विरोधी मत व्यक्त किये जाने के बाद मानदण्डों में काफी समझौता करना पड़ा। 1961 ई. के वेलग्रेड सम्मेलन का निमंत्रण भेजने के लिए उन देशों की एक समीति बनाई जिन्होंने काहिरा की बैठक में भाग लिया था और इसका काम उन्हीं पर सौंप दिया। ये मानदण्ड (शर्ते) निम्न लिखित थी -
  1. किसी भी गुटनिरपेक्ष देश के लिए स्वाधीन नीति का अनुसरण करना आवश्यक नहीं है इस नीति के पक्ष में जितना कर सके उतना ही ठीक हैं। 
  2. निरन्तर राष्ट्रीय स्वाधीनता के लिए आन्दोलनों का समर्थन प्रदान करना चाहिए। किस हद तक और किस रूप में यह निश्चित नहीं है। 
  3. यह मानदण्ड सैनिक गुटबन्धनों की सदस्यता से सम्बन्धित है। अर्थात् गुटनिरपेक्ष बनने के लिए उस देश को सैनिक गुटों का सदस्य नहीं होना चाहिए। 
  4. यदि किसी द्विपक्षीय संधि समझौता है तो यह बात ध्यान में रखनी होगी कि वह जानबूझकर बड़ी शक्ति के संदर्भ में नहीं होनी चाहिए यह चौथा एवं पांचवा मानदण्ड था।
इन सब मानदण्डों से निष्कर्ष निकलता है कि गुटनिरपेक्षता की सदस्यता वही देश ग्रहण कर सकते है जो अमेरिकी तथा सोवियत रूस गुट का सदस्य नही हो। डॉ. वेदप्रताप लिखते है ‘‘इस आन्दोलन के समक्ष सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसके पास अपने नाम की कोई व्यवस्थित परिभाषा नहीं है। आज गुटनिरपेक्ष आन्दोलन को लगभग 45-50 साल हो चुके है, परन्तु आज तक कोई सर्वमान्य परिभाषा नही है। जब परिभाषा की बात आती है, तो इतिहासकार नेहरू, नासिर, मार्शल टीटो के भाषणों को ही उद्धत करते रहते है। कोई भी राष्ट्र इसकी परिभाषा नही दे पा रहा है।

कुछ राष्ट्र तो इसकी परिभाषा को पर्दे के पीछे रखना चाहते है क्योंकि उन्हें इसकी सदस्यता ग्रहण करने के लिए कोई समस्या उत्पन्न न हो इसमें वे राष्ट्र भी शामिल हो जाए जिन्होंने अपनी जमीन पर सैनिक अड्डे बनाने के लिए जगह दी, इसमें वे राष्ट्र भी शामिल हो जाए जिन्होने दोनों गुटों में से किसी के साथ समझौता कर रखा हो, इसमें वे राष्ट्र भी आ जाए जो अस्त्र-शस्त्र की दौड़ में लगे है, इसमें वे राष्ट्र भी आ जाए जिन्होंने अपनी आर्थिक, राजनैतिक स्वाधीनता को शक्ति राष्ट्रों को गिरवी रख दिया है। यही कारण है कि आज तक परिभाषा को स्पष्ट स्वरूप नहीं दिया गया। अतंत: गुटनिरपेक्ष आन्दोलन परिभाषा विहीन बनकर चरित्रहीन की व्यूहरचना में फंस कर रह गया है।

गुटनिरपेक्ष आन्दोलन शिखर सम्मेलन

गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के शिखर सम्मेलन प्रत्येक 3 वर्ष बाद किये जाते है इसकी लोकप्रियता को बढ़ाना इसका प्रमुख उद्देश्य है। इन सम्मेलनों में राष्ट्रों के राष्ट्राध्यक्ष तथा शासनाध्यक्ष भाग लेते है। इसका निर्णय सर्वसम्मति से लिया जाता हैं इसमें चार प्रकार के सदस्य शामिल होते है, पूर्ण सदस्य, पर्यवेक्षक सदस्य, पर्यवेक्षक गैर-राज्य सदस्य और अतिथि इन सम्मेलनों से प्रमुख लाभ है - गुटनिरपेक्षता की लोकप्रियता में वृद्धि होती है। अन्र्तराष्ट्रीय मामलों पर गुटनिरपेक्ष देशों की प्रतिक्रिया स्पष्ट रूप से अभिव्यत हो जाती है। गुटनिरपेक्ष देशों में आपस में राजनीतिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक सहयोग की भावना का विकास होता है। अन्र्तराष्ट्रीय मंच पर गुटनिरपेक्ष देशों की एक आवाज को बल मिलता है। अन्र्तराष्ट्रीय समस्याओं पर गंभीर रूप से विचार विमर्श करने हेतु तथा उनके समाधान के लिए महत्वपूर्ण सुझाव गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों द्वारा विभिन्न शिखर सम्मेलनों में दिये गए जिसमें इन सुझावों का अन्र्तराष्ट्रीय राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ा । सम्मेलनों का प्रारंभ बेलग्रेड सम्मेलन 1961 ई. से हुआ।

प्रथम शिखर सम्मेलन (1961 ई.)

1961 ई. में चेकोस्लाविया की राजधानी वेलग्रेड में प्रथम शिखर सम्मेलन राष्ट्रपति मार्शल टीटो के सुझावों से आमंत्रित किया गया। इस सम्मेलन में किन देशों को आमंत्रित किया जाए तथा किन देशों को नहीं यह एक बड़ी विडम्बना थी। देशों को आमंत्रित करने के लिए पांच सूत्रीय शर्ते थी - (i) जो देश शांतिपूर्ण-सह अस्तित्व के आधार पर स्वतंत्र विदेश नीति का अनुसरण करता हो। (ii) स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए चल रहे आन्दोलनों का सर्मथन करने वाले देश (iii) ऐसे देश जो सैनिक गुटों के सदस्य न हो (iv) ऐसे देश जिन्होंने किसी महाशक्ति के साथ संधि न की हो (v) ऐसे देश जिनकी भूमि पर सैनिक अड्डे न हो।

इस आधार पर बेलग्रेड सम्मेलन में 28 देशों को आमंत्रित किया गया जिनमें से 3 देशों ने अपने पर्यवेक्षक तथा 25 देशों ने अपने प्रतिनिधि भेजकर सम्मेलन में भाग लिया। 3 पर्यवेक्षक भेजने वाले देशों में इक्वेडोर, बोलीविया तथा ब्राजील थे। जिन देशों को बेलग्रेड सम्मेलन के लिए आमंत्रित किया गया था वे इस पांच सूत्रीय फार्मूले पर खरे उतरे थे। यह सम्मेलन 1 से 6 सितम्बर तक चला। सम्मेलन में प्रमुख रूप से निम्नलिखित विषयों पर विचार किया गया :-
  1. इस सम्मेलन में दुनिया का ध्यान ऐसी समस्याओं की ओर खींचा गया जिनसे विश्वयुद्ध संभव था वे जिनमें बर्लिन की समस्या, संयुक्त राष्ट्र में साम्यवादी चीन की सदस्यता का प्रश्न तथा कांगों की समस्या। 
  2. प्रत्येक देश को अपनी इच्छानुसार शासन का स्वरूप निर्धारण करने और संचार करने की स्वतंत्रता हो।
  3. विश्व शान्ति स्थापित करने के लिए साम्राज्यवाद को हानिकारक सिद्ध किया जाए। 
  4. बिना किसी भेदभाव के किसी भी देश की प्रभुसत्ता का सम्मान किया जाना चाहिए साथ ही किसी भी देश के आंतरिक मामलों के संबंध में हस्तक्षेप की नीति का समर्थन करना चाहिए। 
  5. सम्मेलन में यह भी कहा गया कि शान्ति व्यवस्था बनाए रखने के लिए विकासशील देश आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक पिछड़ेपन से मुक्ति दिलाकर उनकी सामाजिक व्यवस्था को उन्नत बनाया जाना चाहिए। 
  6. इस सम्मेलन में दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद नीति की आलोचना की गई। 
  7. शान्तिपूर्ण सह अस्तित्व के सिद्धान्त में आस्था व्यक्त की गई। इस सम्मेलन से शीत-युद्ध को कम किया जा सका और अन्र्तराष्ट्रीय राजनीति पर इसका बड़ा ही हितकारी प्रभाव पड़ा। इसके कारण 1963 में अणु परीक्षण निषेध संधि सफलता पूर्वक की गई।

द्वितीय शिखर सम्मेलन 1964

द्वितीय शिखर सम्मेलन 5 अक्टूबर से 11 अक्टूबर तक 1964 ई. में काहिरा में किया गया। जिसमें 48 देशों के प्रतिनिधि शामिल थे तथा 11 पर्यवेक्षक देश थे। इस सम्मेलन का उद्देश्य गुटनिरपेक्षता के क्षेत्र को विस्तृत करना था। तथा उसके माध्यम से तनाव को कम करना था। काहिरा सम्मेलन में प्रतिनिधि राष्ट्रों के बीच मतभेद की स्थिति उत्पन्न हो गई और ऐसा लगने लगा कि सम्मेलन विफल हो जायेगा। इस सम्मेलन में आर्थिक सहयोग की बात कही गई। इस सम्मेलन में निम्नलिखित बिन्दुओं पर चर्चा की गई।
  1. शांतिपूर्ण वार्ता के माध्यम से अन्र्तराष्ट्रीय विवादों का निपटारा किया जाए। 
  2. परमाणु परीक्षण पर रोक लगाई जाए साथ ही नि:शस्त्रीकरण की नीति अपनाई जाए। 
  3. दक्षिण रोडेशिया की अल्पमत गोरी सरकार को मान्यता नही दी जानी चाहिए। 
  4. उपनिवेशवाद का अंत किया जाय। कम्बोडिया तथा वियतनाम में विदेशी हस्तक्षेप का अंत हो 
  5. चीन को संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य बनाया जाए।
  6. सभी राष्ट्रों से आºवान किया गया कि दक्षिण अफ्रीका से कूटनीतिक सम्बन्ध विच्छेद कर ले। साथ ही दक्षिण अफ्रीका की रंग भेद की नीति की कड़ी आलोचना की गई। काहिरा सम्मेलन को शान्तिपूर्ण वार्ता द्वारा विवादों का निपटारा, उपनिवेशवाद का अंत, रंगभेद की नीति के विरोध आदि के लिए महत्वूपर्ण है।

तृतीय शिखर सम्मेलन, (1970 ई.)

सिम्बर 1970 में जाम्बिया की राजधानी लुसाका में तृतीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में 65 राज्यों ने भाग लिया जिनमें 53 पूर्ण सदस्य तथा 12 प्रेक्षक देश थे। इस सम्मेलन में पश्चिमी एशिया के बारे में एक निश्चित मत प्रकट किया गया। पश्चिमी एशिया के बारे में रखे गये प्रस्ताव में केवल अरबों के पक्ष का सर्मथन ही नही अपितु हमलावर इजराइल की आवश्यकता पड़ने पर बायकाट करने तथा नाकेबंदी तक करने की बात कही गर्इं अमरीकी फौजों तथा अन्य फौजों को वियतनाम से हटाने की सिफारिस की गई। दक्षिण अफ्रीका से उपनिवेश के सन्दर्भ में बात की गई और दक्षिण अफ्रीका से अनुरोध किया गया कि वह अपने ऊपर से हवाई जहाज जाने दे। सन् 1970 के दशक के लिए गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों के बीच एक योजना स्वीकार की गई इस सम्मेलन में यह सुझाव आया था कि गुटनिरपेक्ष देशों का एक स्थायी संगठन बनाया जाए जिसका एक सचिवालय भी हो। इस सुझाव को नामंजूर कर दिया गया। क्योंकि गुट निरपेक्ष देश गुटबंदी के खिलाफ थे और इस प्रकार संगठित होने का अर्थ होता है - तृतीय विश्व गुट का गठन।

चतुर्थ शिखर सम्मेलन 1973

गुटनिरपेक्ष देशों का चतुर्थ सम्मेलन 1973 में अल्जीरिया की राजधानी अल्जीयर्स में 9-10 सितम्बर में हुआ इस सम्मेलन में 75 देशों के पूर्ण सदस्य और 9 देशों ने पर्यवेक्षक के रूप में भाग लिया। निर्गुट देशों में व्याप्त मत भेदों का खुला प्रदर्शन हुआ साथ ही अभूतपूर्व आत्मविश्वास और एकता का दर्शन भी हुआ। इस सम्मेलन में निम्नलिखित बिन्दुओं पर विचार किया गया।
  1. महाशक्तियेां के बीच तनाव-शैथिल्य का स्वागत किया गया। 
  2. गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों को अपनी असंलग्नता की परिभाषा बदल कर अन्र्तराष्ट्रीय स्थिति के संदर्भ में करने पर जोर दिया गया। 
  3. निर्गुट देशों के बीच आर्थिक, व्यापारिक और तकनीकी तालमेल होना चाहिए। 
  4. जातीय विद्वेश, उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद के उन्मूलन पर जोर दिया जाए। 
  5. आर्थिक दृष्टि से यह निश्चित किया गया कि गुटनिरपेक्ष देशों को अपने आर्थिक साधनों का पूर्ण उपयोग करने का अधिकार है। 
  6. इस सम्मेलन के अपने घोषणा पत्र में यह कहा गया कि राजनीतिक और आर्थिक नीतियों के गठन में विकासशील देशों की आवाज सुनी जाए तथा निर्गुट राष्ट्र सम्मलित रूप से विकसित देशों पर दबाव डालें।

पंचम शिखर सम्मेलन (1976 ई.)

गुटनिरपेक्ष देशों का पांचवा शिखर सम्मेलन 16 से 20 अगस्त 1976 ई. में कोलम्बों में हुआ। इस सम्मेलन में कुल 116 देशों ने भाग लिया जिनमें 86 देश पूर्ण सदस्य, 13 पर्यवेक्षक गैर-राज्य तथा 7 ने अतिथि सदस्य के रूप में भाग लिया। पुर्तगाल, रूमानिया, पाकिस्तान, टर्की और ईरान, फिलिपीन्स आदि प्रमुख थे जो सदस्यता ग्रहण करने के इच्छुक थे। इस सम्मेलन में नयी अन्र्तराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था विकसित करने का आग्रह किया गया, तथा एक आर्थिक घोषणा-पत्र प्रस्तुत किया गया जिसमें निम्नलिखित बातों पर चर्चा की गई।

(अ) अन्र्तराष्ट्रीय व्यापार को इस तरह पुर्नगठित किया जाए कि विकासशील देशों को बेहतर शर्तो पर व्यापार का मौका मिले और उनको अपने निर्यात का उचित मूल्य प्राप्त हो।
  1. अन्र्तराष्ट्रीय विभाजन के आधार पर उत्पादन को नये सिरे से पुर्नगठित किया जाए। 
  2. मुद्रा संबंधी सुधारों में विकासशील देशों की राय को वही आदर मिलना चाहिए जो विकसित राष्ट्रों को मिलता है साथ ही मुद्रा प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन होना चाहिए। 
  3. अनाज उत्पादन बढ़ाने हेतु प्रबल साधन तथा तकनीकी का प्रयोग किया जाए। 
  4. विकासशील देशों को यथेष्ट मात्रा में नियमित रूप से आर्थिक साधन हस्तान्तरित किये जाए और उनकी स्वाधीनता का सम्मान किया जाए।
इस सम्मेलन की राजनीतिक घोषणा में निम्न लिखित बातें कही गयी थी :-
  1. समता के आधार पर नयी राजनीतिक व्यवस्था बनायी जाए और ‘प्रभाव क्षेत्र‘ जैसे सिद्धान्तों को शांति विरोधी बताया गया। 
  2. सम्मेलन में मुक्त आन्दोलनों का समर्थन किया गया साथ ही पश्चिमी एशिया, साइप्रस, फिलीस्तीन समस्या, दोनों कोरियाओं (उत्तरी कोरिया, दक्षिणी कोरिया) का एकीकरण आदि की समस्याओं पर विचार किया गया। 
  3. सम्मेलन में हिन्द महासागर में विदेशी अड्डों के प्रश्न को भी उठाया गया और इसे तनाव मुक्त क्षेत्र बनाने की आवश्यकता पर बल दिया गया।

षष्टम् शिखर सम्मेलन - 1979

छठा शिखर सम्मेलन हवाना (क्यूवा) में 3 सितम्बर 1979 में क्यूबा के राष्ट्रपति डॉ. फिदेल कास्त्रों ने अमरीकी विरोधी भाषण के साथ प्रारंभ किया। लगभग इसमें 95 देशों ने भाग लिया। यह प्रथम सम्मेलन था जिसमें भारतीय प्रधानमंत्री का स्थान रिक्त रहा।

इस सम्मेलन में विचित्र भाषण डॉ फिदेल द्वारा दिया गया जो अन्र्तविरोधी से भरा हुआ था। उन्होंने कहा हमारा देश मार्क्सवादी सिद्धान्तों में विश्वास करता है पर कभी भी अपने विचार और नीतियां गुटनिरपेक्ष देशों पर थोपने का प्रयत्न नही करेगा। उन्होंने फूट डालने और शासन करने वाली नीतियों से दूर रहने की सलाह दी। उन्होंने इस बात पर प्रसन्ता व्यक्त की कि पाकिस्तान भी गुटनिरपेक्ष देशों की लाइन में आ गया।
हवाना सम्मेलन के घोषणा-पत्र में निम्नलिखित बिन्दुओं पर विचार किया गया। ‘ निर्गुट राष्ट्रों से अपनी स्वतन्त्र विदेश नीति एवं एकता के लिए एकजुट रहने को कहा। ‘ तेल निर्यातक देशों से अपील की गई की वे दक्षिण अफ्रीका को तेल निर्यात न करें। ‘ सभी गुटनिरपेक्ष देशों से अपील की गई की वे दक्षिण अफ्रीका के अश्वेत छापामार युद्ध का समर्थन करें ‘ मिश्र को निलंबित करने के लिए कई घंटो बहस चली साथ ही मिश्र और इजराइल के बीच हुए कैम्प डेविड समझौते की निंदा की गई। ‘ नस्लवाद, उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद, विदेशी प्रभुत्व, विदेशी कब्जे और हस्तक्षेप एवं चौधराहट के विरूद्ध संघर्ष से स्वाभाविक सम्बन्ध है। इस सम्मेलन में विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था को लेकर भी विचार विमर्श हुआ। विशेषकर तेल निर्यात करने वाले विकासशील देशों की ऊर्जा सम्बन्धी समस्याओं पर बहुत गंम्भीरता पूर्वक विचार हुआ।

सातवां शिखर सम्मेलन - (1983 ई.)

क्यूवा के राष्ट्रपति डॉ. फिदेल कास्त्रों द्वारा 31 अगस्त 1982 को सातवें शिखर सम्मेलन की अनुमति प्राप्त हो गयी । राष्टाध्यक्षों को सूचित किया गया कि ईरान तथा ईराक युद्ध के कारण ईराक में सम्मेलन स्थिगित करना पड़ा। गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलनों का सातवां शिखर सम्मेलन भारत की राजधानी नई दिल्ली में 6 से 12 मार्च 1983 में किया गया। इस सम्मेलन ने अन्य छ: सम्मेलनों से अलग अपने नये कीर्तिमान स्थापित किये। इस समय विश्व राजनीति का जो माहौल बना हुआ था वह 1959-60 के माहौल से कम खतरनाक नहीं था। गम्भीर चुनौतियाँ, तनाव, अविश्वास, और संघर्ष का जहर घोलने वाली इन सभी समस्याओं का सूत्रपात हवाना, अल्जीयर्म कोलम्बो, आदि सम्मेलन के समय से दिखना प्रारंभ हो गया था।

हवाना सम्मेलन 1979 में सम्पन्न हुआ तीन माह बाद सोवियत फौजें अफगानिस्तान में घुस आई इससे पाकिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान आदि के सम्बन्ध बिगड़ गए और विश्व राजनीति में फिर एक बार विश्वयुद्ध जैसी स्थिति बन गई। दोनों महाशक्तियों के बीच चल रही शस्त्राअस्त्र परीसीमन की वार्ता असफल हो गई, पश्चिमी राष्ट्रों ने सोवियत संघ पर अनेक आर्थिक और राजनैतिक प्रतिबंध लगाने की कोशिश की और खाड़ी देशों, हिन्दमहासागर तथा पाकिस्तान आदि में अपनी सैनिक उपस्थिति बढ़ाना शुरू कर दिया।

गुटनिरपेक्ष आन्दोलन में फूट का प्रमुख कारण था अफगानिस्तान का मामला, जहाँ एक ओर वियतनाम, सीरिया, यमन, इथोपिया आदि देशों ने रूसी कार्यवाही का दमन किया वहीं दूसरी ओर सिंगापुर, जायरे, मोरक्को, पाक आदि देशों ने इसका विरोध किया। तथा भारत जैसे राष्ट्र ने सोवियत संघ की भत्र्सना करने के वजाय यह माना कि अफगानिस्तान से सोवियत सेना की वापसी तथा बाहरी हस्तक्षेप की समाप्ति एक साथ होनी चाहिए। इस प्रकार सप्तम सम्मेलन बहुत ही नाजुक परिस्थितियों में हुआ था।

सम्मेलन का प्रारभिक स्वरूप

गुटनिरपेक्ष देशों का यह सातवां शिखर सम्मेलन राष्ट्राध्यक्षों तथा शासनाध्यक्षों की उपस्थ्ति में श्रीमती इन्दिरागांधी की अपील के साथ प्रारंभ हुआ। श्रीमती इन्दिरा गांधी ने कहा कि विश्व की महाशक्तियां आणविक हथियारों के इस्तेमाल की धमकी न दे वे अपने स्वार्थ की चिंता छोड़कर मानवता की भलाई के कार्य करें। सम्मेलन में 101 सदस्य देशों में से 93 देशों ने इसमें भाग लिया जिनमें 68 राष्ट्राध्यक्ष 26 प्रधानमंत्री तथा उपराष्ट्रपति शामिल थे। डॉ फिदेल कास्त्रो ने श्रीमती इन्दिरा गांधी के हाथों में अध्यक्ष पद की कमान सौपी, तथा महासचिव नटवरसिंह को चुना गया। यह सम्मेलन पांच दिन तक चलना था परन्तु ईरान-ईराक युद्ध के कारण यह दो दिन तक चला। राष्ट्राध्यक्षों ने अपने-अपने भाषण दिये परन्तु पाक राष्ट्रपति का भाषण उल्लेखनीय रहा उसमें श्रीमती इन्दिरा गांधी को मुबारकबाद दी गई और पांच सूत्रीय कार्यक्रम भी पेश किया। सातवें शिखर सम्मेलन के प्रमुख बिन्दुओं पर चर्चा की गई -
  1. विश्वशक्तियों से परमाणु हथियार प्रयोग न करने की अपील की गई। 
  2. अन्र्तराष्ट्रीय मुद्रा एवं वित्तीय प्रणाली के व्यापक पुनर्गठन की आवश्यकता पर भी बल दिया गया। 
  3. दक्षिण अफ्रीका के अश्वेत लोगों के शोषण उनके प्रति असमानता के व्यवहार व उनके अधिकारों के हनन की भत्र्सना करते हुए उनके संघर्ष में गुटनिरपेक्ष आन्दोलन द्वारा पूरा सहयोग दिये जाने की बात कही गई।
  4. यूरोप में बढ़ती हथियारों की होड तनाव व विभिन्न गुटों के बीच टकराव की नीति पर चिंता व्यक्त की गई।
  5. आर्थिक घोषणा-पत्र में विकसित राष्ट्रों द्वारा विकासशील राष्ट्रों पर लगाये गये व्यापारिक प्रतिबंध को समाप्त करने के लिए तथा संरक्षणावादी रवैया अपनाने को कहा गया। 
  6. सम्मेलन में खाद्य, ऊर्जा एवं परमाणु शक्ति के बारे में भी विचार किया गया और इनका हल ढ़ूढ़ना नितांत आवश्यक था। 

अन्य विवादस्पद मुद्द्दे 

  1. सम्मेलन में कम्पूचिया के भाग न लेने का विवाद प्रमुख था इस प्रश्न पर सदस्य देश एकमत नहीं है। कुछ देश राजकुमार सिंहनुक को आमंत्रित करने के पक्ष में थे तो कुछ हेंग सैमरिन की सरकार को आमंत्रित करने के, तो कुछ उसका स्थान खाली छोड़ने के पछ में थे। हवाना सम्मेलन की तरह भारत जैसी स्थिति बनी हुई थी अतत: उसका स्थान खाली छोड़ दिया गया।
  2. ईरान-ईराक के युद्ध के बारे में सम्मेलन की अवधि बढ़ाये जाने का कोई ठोस हल नहीं निकाला जा सका। 
  3. आठवें शिखर सम्मेलन कहां बुलाया जाए ईराक चाहता था कि बगदाद में बुलाया जाए ईरान, चाहता था कि, लीबिया में यह सम्मेलन बुलाया जाए इस आदि विरोध के कारण इसका कोई हल नहीं निकाला जा सका।

सातवे शिखर सम्मेलन की समीक्षा

सही मायनों में देखा जाए तो यह गुटनिरपेक्ष आन्दोलन केवल एक मंच हैं और उसके होने वाले सम्मेलन एक क्लब की तरह है। इसके द्वारा निकाले गये ज्यादातर घोषण पत्र बिल्कुल अर्थहीन है। ‘‘यहां जैसा चाहे वैसा व्यवहार करों ‘‘ की कहावत सिद्ध हो जाती है। सातवे गुटनिरपेक्ष सम्मेलन की आर्थिक घोषणा में गरीब देशों की खाद्ध की कमी को दूर करने पर बल दिया गया, कृषि में सहायता आदि की बात कही गयी, पर सवाल इस बात का है कि क्या मात्र घोषणा करने या विकसित राष्ट्रों से अपील करने से ये समस्यायें हल हो जाती है विकसित राष्ट्र तो अपने स्वार्थ के लिए विकासशील देशों का इस्तेमाल करते आए है और करते रहेगें।

साथ ही इस सम्मेलन में कई सवालों पर चर्चा की गई, जैसे हैंग सैमरिन सरकार को प्रजातांत्रिक रूप से परिवर्तित करना, दक्षिण अफ्रीका द्वारा नामीविया का शोषण कम करने आदि महत्वपूर्ण, सवालों पर सम्मेलन में जो कुछ भी हुआ वह नया नहीं था। ऐसे मुद्दों पर बहस आदि के सिवाय कुछ भी नहीं किया जा सकता।

सातवे शिखर सम्मेलन की उपलब्धियां

यह बात तो मानना ही पड़ेगी कि इस शिखर सम्मेलन ने गुटनिरपेक्ष आन्दोलन को एक नई शक्ति और दिशा दी है। कुछ लोगों का मानना है कि यह सम्मेलन एक तरह के शिविर के रूप में सामने आया। जो एक तरह से नये सघर्ष की शुरूआत का मार्ग दिखाता है। इस सम्मेलन में नये शिरे से सदस्य राष्ट्रों की एकता का बोध कराया गया। सशस्त्र संघर्ष की निरर्थकता का अहसास और मतभेदों को शान्तिपूर्ण तरीके से हल करने की उपयुक्तता अधिक अर्थपूर्ण लगी। अन्र्तराष्ट्रीय व्यवस्था पर औद्योगिक देशों से बातचीत चलाने के प्रस्ताव का एक परिणाम यह हुआ कि सदस्य देशों ने विकास कार्यक्रमों में सहयोग की आवश्यकता का महत्व समझा। उन्हें यह भी लगा कि वे अपने संसाधनों और क्षमताओं का विकास कार्यक्रमों में उपयोग अपने प्रयत्न से कर सकते है। इस सम्मेलन का दृष्टिकोण ज्यादातर समस्याओं को हल न करके उन्हें टाल देने का था।

आठवां गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन - 1986 ई.

1 से 7 सितम्बर 1986 ई. में जिम्बाब्वे की राजधानी हरारे में आठवां शिखर सम्मेलन सम्पन्न हुआ। जिम्बाब्बे के प्रधानमंत्री रार्बट मुगावे को अध्यक्ष चुना गया। इस सम्मेलन में 101 देशों ने भाग लिया। यूनान, आस्ट्रेलिया, मंगोलिया आदि देशों को पर्यवेक्षक का विशेष दर्जा दिया गया। हरारे सम्मेलन में निम्नलिखित बिन्दुओं पर चर्चा की गई -
  1. दक्षिण अफ्रीका की रंग भेद की नीति के विरूद्ध कुछ उपाय अपनाये जाए जिससे वह यह नीति समाप्त करने के लिए बाध्य हो। जिनमें अफ्रीका को प्रोद्योगिकी के हस्तांतरण पर प्रतिबंध, निर्यात की समाप्ति, तेल की बिक्री पर रोक, तथा हवाई संपर्क आदि भी शामिल हो। 
  2. सम्मेलन में तय किया गया कि एक कोष स्थापित किया जाए। 
  3. इस कोष से दक्षिण अफ्रीका पर आर्थिक निर्भरता को कम करने के लिए सहायता की जाए। 
  4. इस सम्मेलन में नामीबिया की आजादी सुनिश्चित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा का एक विशेष अधिवेशन बुलाये जाने की मांग की । 
  5. साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद की कड़ी आलोचना की गई। निर्गुट राष्ट्र तथा विकासशील देश एक दूसरे का आर्थिक सहयोग बढ़ाने के लिए तत्पर हो गये यह इस सम्मेलन की एक महान उपलब्धि थी। साथ ही एक आयोग गठित करने का निर्णय लिया गया, यह आयोग दोनों गुटनिरपेक्ष तथा विकासशील देशों में ही सहयोग बढ़ाने का कार्य करेगा, साथ ही निरक्षरता का उन्मूलन, निर्धनता, भुखमरी तथा अन्य आर्थिक समस्याओं के निराकरण के उपाय तथा सुझाव देगा।

गुटनिरपेक्षता के समक्ष चुनौतियाँ

गुटनिरपेक्षता की प्रभावशीलता दिन-प्रतिदिन बड़ती जा रही हैं प्रारंभ में बेलग्रेड सम्मेलन में 25 सदस्य राष्ट्र थे परन्तु आठवें शिखर सम्मेलन तक इनकी सदस्य संख्या बढ़कर 101 हो गई। आज गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के सदस्य राष्ट्रसंघ के दो तिहाई सदस्य है और यह 4 महाद्वीपों के देशों का प्रतिनिधित्व करता है। एशिया, अफ्रीका, यूरोप और लेटिन अमेरिका आदि को आज भी अनेक चुनौतियों से गुजरना पड़ रहा है। वे चुनौतियां है -
  1. आर्थिक पिछड़ा़पन :- गुटनिरपेक्ष राष्ट्र आर्थिक दृंिष्ट से पिछड़े हुए है आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए इन राष्ट्रों को अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए बड़े-बड़े राष्ट्रों पर निर्भर रहना पड़ता है। और ये महाशक्तियां छोटे राष्ट्रों को लालच देकर इनका शोषण करती है और अपने गुटों में सम्मलित करने का लालच देती है। 
  2. सैनिक दबाव :- विश्व-शक्तियां गुटनिरपेक्ष देशों पर दबाव डालती है। वे अपने प्रभाव क्षेत्र को बढ़ाने के लिए गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों को सैनिक गुटों के माध्यम से घेरने का कार्य करती है और उन्हें अपने गुटों में मिला लेती है। 
  3. गुटनिरपेक्ष देशों में अस्थिरता :- महाशक्तियां गुप्तचरों के माध्यम से इन राष्ट्रों में अस्थिरता लाने का प्रयास करती है। अमेरिका सरकार ने क्यूबा राष्ट्र में सी.आई.ए. के माध्यम से फिदेल सरकार को गिराने की बार-बार कोशिश की चिली के राष्ट्रपति एलेण्डे की हत्या का मामला भी सी.आई.ए. के हाथ था।
  4. गुटनिरपेक्ष विरोधी राष्टा्रों की संख्या में वृद्धि :- गुट निरपेक्षता के समक्ष यह भी एक समस्या उत्पन्न हो रही है कि एक तरफ कुछ देश गुट निरपेक्ष है वही दूसरी ओर अपने सैनिक गुट बनाने में तथा दोनों गुटों में से किसी न किसी गुट का समर्थन करने में लगे हुए है। इससे स्पष्ट होता है कि गुटनिरपेक्ष विरोधी तत्व मौजूद है। 
  5. नैतिकता - यह आन्दोलन एक नैतिक आन्दोलन है न कि शस्त्रों द्वारा शांति स्थापित करने का आन्दोलन। गुटनिरपेक्ष आन्दोलन एक अपील जैसा लगता है यह आक्रमण प्रतिरोध नहीं कर सकता। गुटनिरपेक्ष देशो में केवल 57 देशों ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 14 जनवरी 1980 के उस प्रस्ताव में मतदान किया जिसमें अफगानिस्तान से सोवियत सेनाओं की वापसी की मांग की गयी थी 9 गुटनिरपेक्ष देशों ने प्रस्ताव का विरोध किया और 24 ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। 
  6. पारस्परिक वैमनस्य - गुटनिरपेक्ष देशों में आपसी वैमनस्य की भावना बड़ती जा रही है। इसका प्रमुख कारण है कि संगठित न होना। उदाहरण के लिए भारत और बाग्लादेश एक और तो गुटनिरपेक्ष देश है परन्तु कोलंबो में गंगा जल के बटवारे को लेकर दोनों ने यह साबित कर दिया कि उनमें आपसी वैमनस्य की भावना तथा तनाव उत्पन्न हो रहे है। इस प्रकार हम कह सकते है कि गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के समक्ष अनेक चुनौतियां है ।

गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की आलोचना

  1. अवसरवादिता की नीति - पश्चिमी आलोचकों ने इसे अवसरवादी तथा काम निकालने वाली नीति कहा है। गुटनिरपेक्ष देश दोहरी कसौटी का प्रयोग करते है वे साम्यवादी और गैर साम्यवादी गुटों से अधिक से अधिक लाभ प्राप्त करने का और जिसका पलड़ा भारी हो उसकी ओर मिल जाने का रास्ता बना लेते है। 
  2. अव्यवहारिकता - आलोचक इस नीति को सिद्धान्त में जितना उपयुक्त मानते है। व्यवहार में उतनी ही भिन्न है। इसमें सैद्धान्तिक गुण कितने भी क्यों न हो व्यवहारिक न होने से यह असफल हो जाती है। अत: कहा जाता है कि जहां सिद्धान्त के धरातल पर इस नीति ने स्वाधीनता प्राप्त की है वही व्यवहार के धरातल पर नीति ने उसको निभाया नहीं है। 
  3. बाह्य्य निर्भरता - गुटनिरपेक्ष देशों की एक विफलता यह बतायी जाती है कि वे बाहरी आर्थिक और रक्षा सहायता पर बेहद निर्भर है। ये राष्ट्र दोनों गुटों से सहायता प्राप्त करने की स्थिति में थे । इसलिए उन्होंने इतनी भारी आर्थिक और रक्षा सहायता लेने का रास्ता निकाल लिया कि वे आज सहज सामान्य कार्य-निर्वाह के लिए भी इस सहायता पर आश्रित हो गये है। 
  4. संकुचित नीति - गुटनिरपेक्ष नीति का दायरा बहुत ही सीमित है। यह नीति गुटों के आसपास घूमती है। गुटों से बाहर क्रियाशील होने की कल्पना इस अवधारणा में है ही नहीं। महाशक्ति गुटों की राजनीति पर प्रतिक्रिया करते रहना ही इस नीति का मुख्य लक्ष्य बन जाता है या तो गुटों के आपसी झगड़ों में पंच बनने की कोशिश करना या दोनों से अलग रहते हुए एक के केवल इतने समीप जाने का प्रयत्न करना कि दूसरा बुरा न माने यदि दूसरे के बुरा मानने का डर हो तो पहले से नापतौल कर दूर हटना या बारी-बारी से पास जाना यही गुटनिरपेक्षता की शैली रही है। 
  5. दिशा हीन आन्दोलन - आलोचकों का कहना है कि गुटनिरपेक्ष आन्दोलन में सद्भावना पूर्ण वातावरण पैदा कर पाना तो दूर की बात है यह अपने आप में विखरता जा रहा है। 1979 के हवाना आन्दोलन से स्पष्ट हो गया था कि यह आंदोलन तीन खेमों में बंट गया था। एक में क्यूबा, अफगानिस्तान, वियतनाम, इथोपिया, यमन जैसे रूस परस्त देश हैं तो दूसरे खेमें में सोमालिया, सिंगापुर, जायरे, फिलीपीन्स, मोरक्को, मिश्र आदि अमरीकी परस्त देश हैं। तीसरे खेमें में भारत, यूगोस्लाविया और श्रीलंका जैसे देश हैं। इस बात से साबित होता है कि आन्दोलन की अपनी कोई दिशा नहीं रह गई है। 
  6. बुनियादी एकता का अभाव : आलोचकों का मत है कि गुट निरपेक्ष राष्ट्रों में बुनियादी एकता नहीं पायी जाती और वे एक-दूसरे की सहायता करने की भी कोई ठोस योजना नहीं बना सके हैं। गुट निरपेक्ष देश एक दूसरे का शोषण करने में बाज नहीं आते। अपनी जीवन पद्धतियों की रक्षा के लिये गुटनिरपेक्ष देश कोई संयुक्त रणनीति नहीं बना पाये हैं। 
  7. राजनीतिक नीति : आलोचक इसे ऊध्र्वमूल नीति कहते हैं। ऐसी नीति जिसकी जड़े ऊपर हैं नीचे नहीं। राष्ट्रहित उसके केन्द्र में नहीं है उसमें राष्ट्रहित हो जाए यह अलग बात है। उसमें नेतागिरी की भावना है। इसकी नेतागिरी दुनिया के मंचों पर चमकनी चाहिये। 
  8. असुरक्षित नीति : आलोचकों का मानना है कि हम गुटनिरपेक्षता को सुरक्षित नीति मानते हैं। यदि वे विशाल रक्षा व्यवस्था की बात करते हैं तो उनकी गुटनिरपेक्षता सुरक्षित नहीं रह जायेगी, और यदि वे बाहर किसी देश या गुट से सहायता मांगते हैं तो उनकी यह सुरक्षा व्यवस्था शुद्ध नहीं होगी। 1962 के चीन आक्रमण ने भारत के लोगों को यह आभास करा दिया है कि वर्तमान राष्ट्र समाज में जो सर्वथा आदर्श नहीं है।कोई भी चीज किसी देश की सुरक्षा को प्रमाण नहीं हो सकती। 
  9. मूल्य रहित नीति : गुटनिरपेक्षता कोई विचारधारा तथा सिद्धांत नहीं है। आलोचकों का ऐसा मानना है गुटनिरपेक्ष देशों में एक ओर जहां लोकतंत्रात्मक देश है वहीं दूसरी ओर राजतंत्रात्मक देश भी है। कम्यूनिष्ट तथा सैनिक गुटों वाले देश भी इसमें रहे हैं आज कई राष्ट्रों में आपसी तनाव ने युद्ध का स्वरूप धारण कर लिया है। नेहरू के नेतृत्व में गुटनिरपेक्षता पर जो नैतिक मूल्य आरोपित करने की कोशिश भारत ने की थी वह एक मृदमरीचिका के अलावा कुछ नहीं थी। इस तथाकथित मूल्यों पंचशील, निरस्त्रीकरण, आदि का गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों ने समय-समय पर उल्लंघन करके यह सिद्ध किया कि गुटनिरपेक्षता एक साधारण नीति मात्र है।

गुटनिरपेक्ष आंदोलन की स्थापना के प्रति विश्व के राष्ट्रों का दृष्टिकोण

गुटनिरपेक्ष आन्दोलन पर अमेरिका का दृष्टिकोण

‘‘मैं निर्गुट आन्दोलन का प्रशंसक नहीं हूं क्योंकि यह सही मायने में निर्गुट आन्दोलन नहीं है।’’ अन्र्तराष्ट्रीय स्तर पर उसे जितनी परेशानियां सोवियत संघ या चीन से नहीं हुई उतनी उसे अपने ही निर्गुट राष्ट्रों से हुई है। इसमें अधिकांश देश समाजवादी तथा विकासशील देश हैं जो अमेरिका के खिलाफ एकजुट हैं। अधिकांश निर्गुट राष्ट्र 80 प्रतिशत मसलों पर अमेरिका के खिलाफ मतदान करते हैं।इस आन्दोलन को व्यवस्थित तथा सही मायने में निर्गुट बनाने में अभी बहुत समय लग जायेगा।

गुटनिरपेक्ष आन्दोलन एवं सोवियत संघ

रूस सदा तृतीय विश्व के देशों का समर्थक रहा है। कास्त्रों जो 1979 में गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के अध्यक्ष थे उन्होंने एक अवधारणा में तो यह तक कह दिया कि ‘‘सोवियत रूस की गुटनिरपेक्ष आन्दोलन से स्वाभाविक सम्बद्धता है’’ अत: इस आन्दोलन को साम्राज्यवादी पश्चिमी गुट तथा साम्राज्य विरोधी सोवियत गुट के समान दूरी के बनावटीपन से मुक्त होकर सोवियत रूस की आन्दोलन के साथ स्वाभाविक सम्बद्धता को स्वीकार करना चाहिये।

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