हिटलर का परिचय एवं नीति

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अनुक्रम
एडोल्फ हिटलर का जन्म 20 अप्रैल, 1889 में आस्ट्रिया के एक गांव के सामान्य परिवार में हुआ
था। उसके पिता चुंगी-विभाग में एक साधारण कर्मचारी थे। निर्धनता के कारण हिटलर विधिवत् रूप में
उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर सका। उसके पिता की यह आकांक्षा थी कि उसका पुत्र किसी सरकारी सेवा
में स्थान ग्रहण करे किन्तु हिटलर को प्रारंभ से ही कला से विशेष लगाव था। इसलिए 18 वर्ष की आयु
में ही वह चित्रकला और स्थापत्य-कला का ज्ञान प्राप्त करने के लिए वियना चला गया था। यहीं पर
उसने यहूदियों से घृणा करना सीखा। उसने यहूदियों के साहित्य और उनके नित्यप्रति के जीवन का
अध्ययन किया तथा इस बात से सहमत हो गया कि यहूदी व्यक्तिवाद, राष्ट्रवाद और जातिवाद के
घातक शत्रु थे। उसकी मान्यता थी कि यहूदी साम्यवाद के साथ षड्यंत्र करके मानवता को समाप्त
करना चाहते थे। हिटलर गणतंत्र का घोर शत्रु था और जर्मन जाति की सर्वोच्चता में उसे पूर्ण विश्वास
था। 1912 ई. में वह म्यूि नख चला गया और वहां घरों को रंगने का कार्य करने लगा। जब प्रथम
विश्वयुद्ध हुआ तब हिटलर बवेरिया की सेना में भर्ती हो गया और उसने मध्य-शक्तियों की ओर से युद्ध
में सक्रिय भाग लिया। जर्मन सरकार ने उसकी बहादुरी के लिए उसे लौह-क्रास से सम्मानित किया।
उसकी धारणा थी कि युद्ध में जर्मनी की पराजय का कारण उसकी सैनिक शक्ति की कमजोरी नहीं है
अपितु वह उसके नेताओं के विश्वासघात का प्रतिफल है।

नाजी दल का गठन

अपने कार्यक्रम को लागू करने के लिए हिटलर ने अपने दल का गठन किया। वह एक राष्ट्रीय
समाजवादी था। ‘नेशनल सोशलिस्ट’ दल का लघु रूप जर्मनीााषा में नाजी होता है, इसलिए हिटलर
के इस दल को इतिहास में नाजी दल कहा जाता था। नाजी दल की योजना को हिटलर ने तैयार
किया था और उसने उसका संदेश जर्मन जनता को दिया था। प्रारंभ से ही जर्मनी में यहूि दयों का
विरोध करने की परम्परा थी। हिटलर ने इस विचारधारा को नाजी दल के प्रचार का एक साधन बना
लिया था। उसने ‘स्वास्तिक’ को अपनी पार्टी का चिन्ह बनाया। धीरे-धीरे यह प्रतीक चिन्ह जर्मनी में
अत्यंत लोकप्रिय हो गया और बाजारों एवं सार्वजनिक स्थानों पर दिखायी देने लगा।

1921 ई. के अंत में हिटलर को बंदीगृह से मुक्त कर दिया गया। इसके बाद उसने
1925-1929 तक अपना सारा समय दल के प्रचार और संगठन में देना प्रारंभ कर दिया। वह विदेशों के
साथ जर्मनी के मधुर संबंध बनाने में भी सफल रहा। उसने विदेशों से ऋण आदि सुविधाए भी प्राप्त
की। इससे उसके दल को अत्यधिक सफलता प्राप्त हुई। 1929 ई. की जर्मनी में आर्थिक मदं ी के समय
उसे अपने दल के विकास के लिए स्वर्णिम अवसर प्राप्त हुआ। उसके दल की सदस्य-संख्या में भी
तीव्रगति से वृद्धि हुई। 1932 ई. में नाजी दल की सदस्य-संख्या 70 लाख थी। देश के विभिन्न भागों में
उसके दल की शाखाएं थीं। उसका कार्यक्रम अत्यंत आकर्षक था और जनता उससे अत्यधिक प्रभावित
थी। नवयुवकों का समर्थन प्राप्त करने के लिए हिटलर ने ‘हिटलर यूथ सोसाइटी’ की स्थापना की और
इस प्रकार निम्न-मध्यम वर्ग का भी उसे पूर्ण समर्थन प्राप्त हुआ। इस प्रकार हिटलर ने अत्यंत
सफलतापूर्वक नाजी दल का गठन किया।

हिटलर की सफलतायें

हिटलर हर प्रकार से सत्ता को हस्तगत करना चाहता था। उसका दल जर्मनी में दिन-प्रतिदिन
शक्तिशाली होता जा रहा था। उस समय रीशटैग की सदस्य-संख्या 576 थी। सितम्बर 1930 ई. में
इस भवन के होने वाले चुनाव में हिटलर के नाजी दल को केवल बारह सीटें प्राप्त हुई। परन्तु इस
चुनाव के बाद इस दल को विशेष प्रसिद्धि प्राप्त हुई और बाद के चुनाव में यह दल 107 सीटें प्राप्त
करने में सफल रहा। 1932 ई. में राष्ट्रपति के पद के लिए चुनाव हुआ। हिटलर स्वयं भी इस पद का
एक अभ्यथीर् था, किन्तु हिण्डेनबगर् के मुकाबले में वह कुछेक मतों से पराजित हो गया। इसी वर्ष
पार्लियामेंट के लिए आम चुनाव भी हुए जिसमें नाजी दल को 230 सीटें प्राप्त हुई। परिणामत: नाजी
दल पार्लियामेण्ट का सबसे बड़ा दल बन गया। संविधान में यह प्रावधान था कि सबसे बड़े दल के नेता
को चान्सलर के पद पर नियुक्त किया जायेगा। इसके अनुसार राष्ट्रपति ने हिटलर को चान्सलर के
रूप में कार्य करने व अपना मंि त्रमण्डल बनाने के लिए निमंत्रित किया। जनवरी 1933 ई. में हिटलर ने
चान्सलर के पद को स्वीकार कर लिया और नेशनलिस्ट दल के सहयोग से अपने मंत्रिमण्डल का गठन
किया। इस प्रकार हिटलर वीमर गणतंत्र की शक्ति पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने में सफल रहा।

जर्मनी में नाजीवाद के उदय के कारण

वार्साय की संधि

वार्साय की संधि जर्मनी के लिए अत्यंत कठोर व अपमानजनक थी। जर्मनी के देशभक्त इस पर
हस्ताक्षर नहीं करना चाहते थ,े परन्तु मित्रराष्ट्रों के अनावश्यक दबाव के कारण उनहै। एसे ा करने के लिए
बाध्य होना पड़ा था। इसलिए जर्मन इस संधि से अपमानजनक संधि पर हस्ताक्षर करके जनतंत्रात्मक
सरकार ने बहुत बड़ी गलती की है। उसने जर्मनी के लोगों को गणतंत्रवादियों द्वारा की गयी गलती को
सुधारने का आश्वासन दिया। उसने संधि की उस धारा का भी घोर विरोध किया जिसके अंतर्गत जर्मनी
को युद्ध के लिए उत्तरदायी ठहराया गया था तथा उस पर क्षतिपूर्ति के लिए एक भारी धनराशि लाद
दी गयी थी। जब हिटलर ने इस संधि के प्रतिरोध के प्रश्न को उठाया तब जनता ने उसे अपना पूर्ण
सहयोग व समर्थन प्रदान किया। इससे हिटलर की शक्ति में वृद्धि हुई तथा उसके दल की उन्नति का
मार्ग प्रशस्त हुआ।

आर्थिक संकट

सन् 1929-1933 के बीच जर्मनी का आर्थिक संकट भी हिटलर तथा उसकी नाजी पार्टी के
उदय का एक महत्वपूर्ण कारण था। इसके कारण जर्मनी की अर्थव्यवस्था अत्यंत शोचनीय हो गयी थी।
देश के प्रत्येक वर्ग के व्यक्ति को इस संकट का सामना करना पड़ा जिससे किसानों व गांवों में रहने
वाले अन्य लागे ों के सम्मुख अनेक समस्याएं उठ खड़ी हुई। हिटलर ने किसानों को ऋणों से मुक्ति
दिलाने का आश्वासन दिया। साथ ही उसने छोटे दुकानदारों को यह विश्वास दिलाया कि बड़े
कारखानों का राष्ट्रीयकरण किया जायेगा। इस प्रकार उसने श्रमिकों, किसानों व छोटे दुकानदारों व
निम्न मध्यम श्रेणी के लागे ों का समर्थन प्राप्त किया। पजूं ीपति साम्यवाद से भयभीत हो गये थे, इसलिए
उन्होंने भी हिलटर को अपना समर्थन प्राप्त किया। उसने बरे ाजे गारों के लिए रोजगार की व्यवस्था का
आश्वासन दिया। उसने आर्थिक मंदी पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए अनेक सफल प्रयास किये।

साम्यवाद का उदय

1932 के द्वितीय चुनाव में साम्यवादी 100 सीटों को प्राप्त करने में सफल रहै। साम्यवादियों के
बढ़ते हुए प्रभाव को कम करने के लिए नाजी दल के नेताओं ने नियोजित तरीके से उनके विरूद्ध प्रचार
करना प्रारंभ कर दिया। उन्होंने जनता को बताया कि साम्यवादियों का उद्देश्य देश की प्रशासनिक
व्यवस्था पर नियंत्रण स्थापित करना था और फिर उसे रूस को सौंप देना था। उन्होंने यह भी प्रचार
किया कि साम्यवादी दल के नेता रूसी सरकार के निर्देश पर कार्य कर रहे थे। चूंकि साम्यवादी
पूंजीवाद के घोर विरोधी थे, इसलिए जर्मनी के पूंजीपति नाजी दल का समर्थन करते थे। पूंजीपति वर्ग
ने नाजी दल को आर्थिक सहायता देकर उसकी उन्नति का मार्ग प्रशस्त किया।

वायमर गणतंत्र के प्रति जन-असंतोष

1930 ई. के चुनाव में लगभग 24 दलों ने भाग लिया। राजनीतिक दलों की अधिकता के कारण
गणतंत्रात्मक सरकार ठीक प्रकार से कार्य नहीं कर सकी। संसद में अनुशासन नाम की चीज नहीं रह
गयी थी और व्यर्थ के वाद-विवाद में सरकार का पर्याप्त समय नष्ट हो जाता था। संसद में व्याप्त
अनुशासनहीनता और भ्रष्टाचार को देखते हुए जनता को बिस्मार्क के प्रभुत्व-काल का स्मरण हो जाता
था। धीरे-धीरे वे बिस्मार्क के समान सशक्त और कुशल प्रशासक की आवश्यकता अनुभव करने लगे,
जो इस प्रकार की अव्यवस्था पर नियंत्रण स्थापित कर सके। हिटलर जर्मनी की इन आशाओं को मूर्त
रूप प्रदान कर सकता था। जर्मन जनता के असंतोष और निराशा का दूसरा कारण यह था कि वीमर
गणतंत्र के नेताओं ने वार्साय की अपमानजनक संधि पर हस्ताक्षर किये थे और सरकार जनता की
आवश्यकताओं को पूर्ण नहीं कर पा रही थी, जबकि हिटलर बार-बार उन्हें आश्वासन प्रदान कर रहा
था और वह उनकी प्रत्येक माग को पूर्ण करेगा। इसलिए अधिकांश जनता ने उसका सहयोग व समर्थन
करना प्रारंभ कर दिया था।

हिटलर की यहूदी-विरोधी नीति

जर्मनी में यहूदी अल्प-संख्या में निवास करते थे किन्तु वे अत्यंत धनवान और खुशहाल थे। वे
अत्यतं शिक्षित थे। उनका प्रेस और कारखानों पर पूर्ण नियंत्रण था। उनमें से अधिकाश्ं ा उच्च पदों पर
नियुक्त थे। यहूदियों की सम्पन्न आर्थिक दशा के कारण जर्मन उनसे घृणा करते थे।
हिटलर ने जर्मन जनता की यहूदी-विरोधी भावनाओं का पूरा लाभ उठाया। उसने यह प्रचार
किया कि यहूदी जर्मन राष्ट्र के शत्रु थे और उनके कारण ही प्रथम महायुद्ध में जर्मनी की पराजय हुई
थी। उसने जर्मन जनता को यह आश्वासन प्रदान किया कि सत्ता ग्रहण करने के बाद वह यहूदियों को
देश से निष्कासित कर देगा। हिटलर की यहूदी- विरोधी नीति के कारण उसे जन-सहयोग प्राप्त हुआ।
वह उसके तथा नाजी दल के उदय में अत्यतं सहायक सिद्ध हुआ।

हिटलर की गृह-नीति

30 जनवरी, 1933 में हिटलर वीमर गणतंत्र का चान्सलर नियुक्त हुआ। वह अपने इस पद से
संतुष्ट नहीं था और शासन की समस्त शक्ति को अपने हाथ में केन्द्रित करना चाहता था, परन्तु
राष्ट्रपति उससे सहमत नहीं हुआ और वह शासन की बागडोर को अपने हाथों में नहीं ले सका।
इसलिए उसने पार्लियामेण्ट को भंग करके नये चुनाव कराये जाने का आदेश दिया जो 5 मार्च, 1933
को हुए। 2 अगस्त, 1934 को राष्ट्रपति हिण्डेनबगर् की मृत्यु के बाद हिटलर ने राष्ट्रपति की शक्तियों को
भी चान्सलर की शक्तियों के साथ संयोजित कर दिया। इस प्रकार वह जर्मनी का वास्तविक तानाशाह
बन गया।

शक्ति ग्रहण करने के बाद हिटलर ने अपनी उच्च महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए अनेक प्रयास
किये। गृह-क्षेत्र में उसने अपने विरोधियों पर अनेक प्रतिबंध लगाये, जनसाधारण को अनेक सुविधाएं
प्रदान कीं और जर्मनी के आर्थिक, शैक्षिक, सामाजिक औद्योगिक एवं धार्मिक विकास के लिए अनेक
महत्वपूर्ण कदम उठाये। गृह-क्षेत्र में उसकी उपलब्धियां निम्न प्रकार थीं :

सशक्त एकतंत्रात्मक सरकार की स्थापना- हिटलर को गणतंत्र में कोई विश्वास नहीं था उसका
उद्देश्य जर्मनी में एकतंत्र की स्थापना करना था। उसकी मान्यता थी कि कोई भी देश प्रजातंत्रात्मक
सरकार के अंतर्गत संगठित और शक्तिशाली नहीं हो सकता। देश के चहुँमुखी विकास और उन्नति के
लिए वहां एक व्यक्ति और एक दल का शासन होना चाहिए। जब पार्लियामेण्ट ने उसे चार वर्ष के लिए
राज्य की समस्त शक्तियां प्रदान कर दीं, तब उसने सर्वप्रथम अपने समस्त विरोधियों को जड़ से उखाड़
फेंकने का प्रयास किया। हिटलर के आदेश पर उसके समस्त विरोधियों को गोली मार दी गयी। इतना
ही नहीं उसने नाजी दल के कुछ संदेहपूर्ण चरित्र के लागे ों को भी मौत के घाट उतार दिया। हिटलर
ने राष्ट्रीय एकता की स्थापना के लिए इस साहसिक कदम को उठाया था। वास्तव में वह एक ऐसी
सशक्त एकतंत्रवादी सरकार की स्थापना करना चाहता था जिसके अंतर्गत उसका कोई विरोधी न हो।

विरोधी तत्वों का उन्मूलन

हिटलर जर्मनी में अपने विरोधियों को समूल नष्ट करना चाहता था। जून 1934 ई. के अंतिम
शनिवार को हिटलर ने अपने समस्त विरोधियों को कत्ल करने का आदेश दिया। इस दिन को इतिहास
में ‘खूनी शनिवार’ के नाम से जाना जाता है। नाजी दल के अतिरिक्त उसने सभी राजनीतिक दलों पर
प्रतिबंध लगा दिया था उसने विरोधी दल के लागे ों के नागरिक अधिकारों को छीन लिया। हिटलर अपने
विरोध में कोई भाषण, वाद-विवाद अथवा सार्वजनिक आरोप को सहन करने के लिए तैयार नहीं था,
इसलिए उसने संसदीय वाद-विवाद, भाषण और प्रेस आदि पर प्रतिबंध लगा दिया था। नाजी दल के
अंदर भी हिटलर के कुछ विरोधी विद्यमान थे जो उसके अन्तरंग मित्र तथा नाजी दल के सक्रिय सदस्य
थे। हिटलर उनका विरोध सहन करने के लिए तैयार नहीं था, इसलिए उसने उनके वध का आदेश
दिया। अपने विरोधियों का देश में सफाया करने के लिए उसने यह महत्वपूर्ण व जोखिमपूर्ण कदम
उठाया था।

यहूदियों के प्रति नीति

हिटलर रक्त की शुद्धता पर विशेष बल देता था। वह आर्यो को संसार की सर्वाधिक शुद्ध और
सर्वोच्च जाति समझता था। वह अनार्यों से अत्यंत समझा जाता था जिसके कारण हिटलर उनसे घृणा
करता था और जर्मनी के विनाश के लिए उत्तरदायी मानता था। उसकी मान्यता थी कि माक्र्सवादियों
के साथ गठबंधन करके यहूदी मानवता को समाप्त करना चाहते थे।

यद्यपि जर्मनी में यहूि दयों की संख्या अत्यतं कम थी, किन्तु वे पढ़-े लिखे, सम्भ्रान्त और
सुसंस्कृत थे। देश के व्यापार और उद्योग-धंधों पर उनका एकाधिकार था। राज्य के बड़े और महत्वपूर्ण
पदों पर केवल यहूदियों को ही नियुक्त किया जाता था। इसके कारण नाजी दल के सदस्य उनसे घृणा
करते थे। जर्मनी की यहूदियों के प्रति परम्परागत घृणा की भावना का लाभ उठाते हुए हिटलर ने प्रचार
किया कि प्रथम महायुद्ध में जर्मनी की पराजय के लिए यहूदी पूरी तरह से उत्तरदायी थे। यद्यपि
यहूदियों ने युद्ध के दौरान राष्ट्र की अनेक महत्वपूर्ण सेवाएँ की थीं किन्तु नाजी दल के लागे उन्हें तथा
उनकी सेवाओं को कोई महत्व नहीं देते थे। जब हिटलर शक्ति में आया तो उसने यहूदियों को कुचलने
के अनेक प्रयास किये तथा यहदू ी विरोधी अनेक नियम बनाय।े इन नियमों के अनुसार यहूि दयों को
मतदान के अधिकार एवं जर्मन नागरिकता से वंचित कर दिया गया था। अब वे कोई व्यक्तिगत
धंधा नहीं कर सकते थे। उन्हें सरकारी सेवाओं से भी वंचित कर दिया गया था। उन्हें अपनी समस्त
सम्पत्ति का पूर्ण विवरण सरकार को देना पड़ता था। उनके बच्चों को जर्मनी के किसी स्कूल में शिक्षा
प्राप्त करने का अधिकार नहीं था। वे मार्गों की मुख्य सड़कों में नहीं चल सकते थे। इस प्रकार हिटलर
ने यहूदियों के आर्थिक एवं सांस्कृतिक बहिष्कार के लिए अनेक दमनात्मक कदम उठाये थे।

धार्मिक नीति

जर्मनी में निवास करने वाला रोमन कैथोलिक पादरी वर्ग हिटलर का विरोधी था। उन्होंने 1931
ई. में यह घोषणा की थी कि नाजी दल के सिद्धातं कैथाेि लकों के विरूद्ध थे, इसलिए उन्हें नाजी दल
की सदस्यता स्वीकार नहीं करनी चाहिए। दूसरी ओर नाजी दल के सदस्य कैथोलिकों को विदेशी
समझते थे क्योंकि वे केवल अपने धर्म-प्रमुख रोम के पोप के निर्देशों पर कार्य करते थे। इसलिए
हिटलर उनसे घृणा करता था और उन्हें कुचल देना चाहता था। उसने अपने प्रभुत्वकाल में कुछ ऐसे
नियम बनाये थे जिनके अनुसार रोमन कैथोलिकों को नागरिकता के अधिकार से वंचित कर दिया गया
था। उनके द्वारा स्थापित स्कूलों को हमेशा के लिए बंद कर दिया गया था और उन्हें देश की राजनीति
में भाग लेने का भी अधिकार नहीं था।

आर्थिक नीति

हिटलर तथा नाजी पार्टी के आदेशों के अनुसार मनुष्य की तुलना में राज्य को अधिक महत्व
प्रदान किया गया था। हिटलर की मान्यता थी कि ‘मनुष्य कुछ भी नहीं है जबकि राज्य सब कुछ है।’
यह नाजी दल का मूल सिद्धांत था। उस समय जर्मनी के सर्वसाधारण की आर्थिक दशा अत्यंत दयनीय
थी। बरे ाजे गारी और कृषि व उद्योगो की पिछड़ी हुई स्थिति हिटलर के सम्मुख प्रमुख समस्याएं थी।ं
उसने जनता को उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार करने का आश्वासन दिया था अत: उसने इस दिशा में
निम्नलिखित महत्वपूर्ण कार्य किये :

बेरोजगारी की समस्या

जब हिटलर सत्तारूढ़ हुआ, लगभग 6 करोड़ व्यक्ति बेरोजगार थे। हिटलर ने उन्हें रोजगारर
प्रदान करने के अनेक प्रयास किये। उनमें से कुछ निम्न प्रकार थे :

  1. स्त्रियों का कारखानो, मिलों व दफ्तरों में कार्य करना वर्जित घोषित किया गया। हिटलर नहीं चाहता
    था कि महिलाए  पुरूष्ज्ञों के समान कार्य करे। उसके अनुसार जर्मनी की महिलाओं का प्रमुख स्थान घर
    था अत: उनके कार्यक्षेत्र को घर की सीमाओं के अंदर सीमित कर दिया गया। 
  2. यहूदियों को सरकारी सेवाओं से मुक्त कर दिया गया तथा रिक्त स्थानों पर बेरोजगारों व्यक्तियों को
    नियुक्त किया गया। 
  3. कार्यशील व्यक्तियों को अधिक से अधिक एक सप्ताह में 40 घण्टे कार्य करना पड़ता था। 
  4. जर्मनी में स्वयंसवे क दल का गठन किया गया था। जो लागे इस दल के अंतर्गत कार्य करना चाहते
    थे उन्हें नाममात्र का वते न दिया जाता था, परन्तु उनके लिए भोजन व आवास की मुफ्त व्यवस्था की
    जाती थी। 
  5. उत्पादन के मुख्य केन्द्रों पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण था। देश को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने
    के लिए अनेक नवीन कारखानों की स्थापना की गयी थी। देश के निर्यात को प्रोत्साहन प्रदान किया
    गया था, जबकि आयात को निरूत्साहित करने के लिए माल पर भारी कर लगाया गया था। 
  6. अनेक नयी इमारतों व किलों के निर्माण-कार्य को प्रारंभ किया गया था। युद्धपोत और जहाजों का
    निर्माण किया गया। इससे बेरोजगारी की समस्या बहुत सीमा तक हल हो गयी तथा इन बेरोजगार
    लागे ों की सहानुभूति हिटलर व उसके दल को प्राप्त हुई।

शिक्षा-पद्धति में परिवर्तन

हिटलर भली-भांि त जानता था कि शिक्षा प्रचार और विज्ञापन का प्रमुख साधन था। चंूि क उसे
प्रचार और विज्ञापन में अत्यधिक विश्वास था इसलिए उसने शिक्षा-पद्धति और प्रचार के साधनों पर
अपना पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लिया था। उसने गोबिल्स को अपना प्रचार-मंत्री नियुक्त किया। स्वतंत्र
रूप से प्रकाशित होने वाले समाचार-पत्रों पर उसने प्िर तबंध लगा दिया। जर्मनी के प्रत्येक नागरिक के
लिए यह अनिवार्य घोषित किया गया कि वह हिटलर यूथ सोसाइटी की सदस्यता ग्रहण करे। सरकारी
सेवाओं में नियुक्ति हेतु इनकी सदस्यता प्रारंभिक योग्यता स्वीकार की जाती थी। अध्यापकों की नियुक्ति
का कार्य हिटलर स्वयं करता था। स्कूलों व कॉलेजों के पाठ्यक्रमों में अनेक परिवर्तन किये गये थे।

सैनिक संगठन

हिटलर ने राष्ट्रीयता के आधार पर अपनी सैनिक शक्ति का गठन किया। उसकी यह मान्यता
थी कि नेपाेि लयन प्रथम की यूरोप में पराजय का एकमात्र कारण यह था कि उसकी सेना में
भिन्न-भिन्न राष्ट्रों के सैनिक थे। इसलिए उसने कवे ल जमर्न लोगों को ही सने ा में स्थान दिया। विशाल
सेना के गठन के लिए उसने जनसंख्या की वृद्धि पर विशेष बल दिया।

हिटलर की विदेशी नीति

हिटलर ने अपनी विदेशी नीति के संदर्भ विस्तृत विवेचना अपनी पुस्तक ‘मेरा संघर्ष’ में की है।
हिटलर ने अपना नारा ‘वार्साय की संधि का नाश हो’ दिया था, स्पष्ट है कि हिटलर वार्साय की संधि
की संपूर्ण व्यवस्था को कुचलना चाहता था। वहा जर्मनी को एकासत्तात्मक राष्ट्र बनाना चाहता था। वह
चाहता था कि जर्मनी विश्व की महान शक्ति बने। इसका मानना था कि जर्मनी की धुरी शक्ति बनाने के
कार्य के पीछे ईश्वरीय प्रेरणा है। और इस कार्य को वही कर सकता है।

नि:शस्रीकरण सम्मेलन तथा राष्ट्र संघ को छोड़ना

1932 ई. में जेनेवा में राष्ट्र सघ ने निशस्रीकरण सम्मेलन का आयोजन किया। इसमें 10 राष्ट्रों
के 200 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस सम्मेलन में हिटलर ने प्रस्ताव रखा कि अन्य देश्ज्ञों
की तहर उसे भी शस्रीकरण का समान अधिकार दिया जाय अथवा सभी राष्ट्रों को जर्मनी के समान ही
समान रूप से ‘‘नि:शस्रीकरण का पालन करना चाहिए। फ्रांस ने इस प्रस्ताव का विरोध किया। अत:
हिटलर ने 14 अक्टूबर, 1933 ई. को नि:शस्रीकरण सम्मेलन एवं राष्ट्र संघ से अलग होने का नोटिस दे
दिया।नवम्बर 1933 में हुए जनमत संग्रह ने भी हिटलर के राष्ट्र संघ को छाडे ने का समर्थन किया।’’

पोलैण्ड-जर्मन समझौता (23 जनवरी, 1934 ई.)

पोलैण्ड और जर्मनी के पारस्परिक संबधं कुछ अच्छे नहीं थे किंतु दोनों की परिस्थितियों ने दोनों
को समझौते के लिए प्रेरित किया। पोलैण्ड की स्थिति रूस एवं जर्मनी के मध्य थी। यदि रूस व जर्मनी
में संघर्ष होता तो पोलैण्ड बीच में होने से पिस सकता था। दूसरा पोलैण्ड का मित्र फ्रांस उससे काफी
दूर था। अत: पोलैण्ड अपनी सुरक्षा के लिए कुछ परेशान था। इधर जर्मनी पोलैण्ड से समझौता कर
यूरोप में राष्ट्रों को दिखाना चाहता था कि वह शांति का समर्थक है। यदि पोलैण्ड से मित्रता हो जाये
तो वह अन्य शत्रुओं को सामना आसानी से कर सकता था। अत: हिटलर ने 23 जनवरी, 1934 ई. को पोलैण्ड के साथ 10 वर्ष के लिए अनाक्रमण समझौता किया। इस समझौते की शर्तें इस प्रकार थी-

  1. जर्मनी ने यह आश्वासन दिया कि वह 10 वर्ष तक अपनी पूर्वी सीमाओं में परिवर्तन की बात
    न उठायेगा जिसमें पोलिश गलियारा भी था।
  2. दोनों देश एक दूसरे पर आक्रमण नहीं करेगेंं 

चार शक्तियों का समझौता (1933 ई.) 

अपने को शांति का दूत दर्शाने वाले हिटलर ने मुसोलिनी के प्रस्ताव पर 1933 ई. में इंग्लैण्ड,
फ्रांस व इटली के साथ शांति समझौता किया।

सार की प्राप्ति

सार का क्षेत्र जो कि वार्साय की संधि के अनुसार 15 वर्षों के लिए राष्ट्र संघ के संरक्षण में था,
जनपद संग्रह के पश्चात् जर्मनी को दिया गया। मतदान में कुल 500000 मत पड़ े जिसमें वे 90 प्रतिशत
जर्मनी के पक्ष में थे। एक मार्च 1935 को यह क्षेत्र जर्मनी को दे दिया गया। इस घटना के विषय में
अत: उसने वार्साय की संधि पर आक्रमण शुरू कर दिया, जिसका पहला प्रहार सैन्यीकरण पर था।

जर्मनी में अनिवार्य सैनिक सेवा लागू करना

 वार्साय संधि की धाराओं को ताडे ़ते हुए हिटलर ने 16 मार्च, 1935 को जर्मनी में अनिवार्य सैन्य
सेवा की घोषणा की। 16 मार्च, 1935 को उसने घोषणा की कि जर्मनी अब अपने को वार्साय की सैन्य
धाराओं से मुक्त मानता है। जर्मनी की शांतिकालीन सैनिक संख्या 550000 होगी और जर्मनी में अनिवार्य
सैनिक सेवा लागू की जायेगी।

इंग्लैण्ड-जर्मन नौसेना समझौता (जून 1935)

हिटलर ने बड़ी सूझ-बूझ से इंग्लैण्ड से नौसेना संबंधी समझौता जून 1935 को किया। इसके अनुसार –

  1. जर्मनी को इंग्लैण्ड की अपेक्ष 35 प्रतिशत नौसेना रखने का अधिकार प्राप्त हो गया। 
  2. जर्मनी अपने पड़ोसियों के बराबर वायुसेना रख सकेगा। इस प्रकार इस समझौते से वार्साय की संधि टूट गई और जर्मनी को बल मिला। स्ट्रेसा सम्मेलन बेकार सिद्ध हुआ। 

राइन क्षेत्र का सैन्यीकरण (7 मार्च, 1936) 

वार्साय की संधि के अनुसार राइन का क्षेत्र विसैन्यीकृत घोषित कर दिया गया था। हिटलर इस
क्षेत्र में सेनाएँ भेजना चाहता था। 1935 ई. में इटली ने एबीसीनिया पर आक्रमण किया तो फ्रांस और
इंग्लैण्ड ने इटली के विरोध में आर्थिक प्रतिबंध लगा दिये किंतु जर्मनी ने इटली की सहायता कर
मुसोलिनी की मित्रता प्राप्त कर ली।
7 मार्च, 1936 ई. को हिटलर ने राइन क्षेत्र में अपनी सेनाएँ भेज दीं और राइनलैण्ड पर
अधिकार कर लिया। हिटलर के इस कार्य के दूरगामी परिणाम निकले। प्रथम तो फ्रांस की कमजोरी
प्रदशिर्त हो गई। फ्रांस के मित्रों ने उसका साथ छोड़ दिया। उदाहरण के लिए बेि ल्जयम तटस्थ हो
गया। द्वितीय, राष्ट्र सघ्ं ा एवं वार्साय और लाके ार्नों संधियों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया।

रोम-बर्लिन-टोक्यो धुरी की स्थापना

अबीसीनिया पर किये गये मुसोलिनी के आक्रमण की हिटलर द्वारा सराहना ही नहीं की गई
बल्कि हिटलन ने इटली को आर्थिक सहायता भी प्रदान की थी। उसके इस कार्य ने मुसोलिनी को
हिटलर के नजदीक ला दिया। 21 अक्टूबर, 1936 ई. को दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने एक समझातै ा
किया। इसके अनुसार –

  1. जर्मनी ने स्वीकार किया कि अबीसीनिया पर इटली अधिकार न्यायोचित है। 
  2. इटली ने स्वीकार किया कि जर्मनी आस्ट्रिया पर अधिकार कर सकता है।

आस्ट्रिया पर अधिकार

सत्ता संभालते ही हिटलर का एक मुख्य उद्देश्य आस्ट्रिया पर अधिकार करना रहा था। 1934 ईमें
हिटलर के द्वारा आस्ट्रिया को हड़पने का प्रयत्न किया गया किंतु इटली के द्वारा बे्रनर दर्रे पर सेना
भेज दिये जाने के कारण हिटलर को अपने अभियान में सफलता न मिली। मुसोलिनी के इस तरह आड़ े
आने से हिटलर समझ गया कि अपने इस अभियान की सफलता के लिए इटली की मित्रता आवश्यकीय
है। इसी कारण उसनेइटली द्वारा अबीसीनिया को हड़पने को स्वागत किया। रोम-बर्लिन-टोक्यो धुरी ने
दोनों की मित्रता गाढ़ी कर दी। 13 मार्च, 1938 को हिटलर की फौजे आस्ट्रिया में घुस गई और
आस्ट्रिया को जर्मन साम्राज्य का एक प्रांत निर्विरोध घोषित कर दिया गया। डॉ. बुस्निमा ने इस विषय में
कहा था, ‘‘हमे जबरदस्ती के आगे समर्पण करना पड़ रहा है ईश्वर ही आस्ट्रिया की रक्षा कर सकता
है। इस प्रकार आस्ट्रिया को जर्मनी में मिलाने से हिटलर ब्रेनर दर्रे से इटली, यूगोस्लाविया एवं हंगरी के
साथ संबंध स्थापित बेरोक-टोक कर सका। इसीलिए हिटलर ने कहा था कि जर्मनी विजय की घड़ी से
गुजर रहा है।

चैकोस्लोवाकिया को हस्तगत करना

आस्ट्रिया पर विजय प्राप्त कर लेने से हिटलर चैकोस्लोवाकिया को आसानी से हस्गत कर
सकता था। अवसर का लाभ उठाकर हिटलर ने चैकोस्लोवाकिया में रनहे वाले जर्मनों को विद्रोह के
लिए भड़काया। स्वेडटन जर्मन संघ पूर्ण स्वराज्य की माँग करने लगा। इधर हिटलर स्वेडटन जर्मन संघ
की मदद करने लगा। चैकोस्लोवाकिया और जर्मनी के बीच युद्ध का वातावरण पैदा हो गया। परंतु
इंग्लैण्ड ने हस्तक्षेप करके एक समझौता कराया जो कि म्यूनिख समझौता कहलाता है। इसके अनुसार
1. स्युडेटन्लैण्ड पर जर्मनी का अधिकार हो गया।
2. इंग्लैण्ड व फ्रांस ने चैकोस्लोवाकिया की नई सीमाओं की रक्षा का आश्वासन दिया।
3. हिटलर ने वचन दिया कि स्रूुडेंटनलैण्ड यूरोप में उसका अंतिम सीमा विस्तार है।

रूस से समझौता

हिटलर ने यूरापीय परिस्थितियों का अवलोकन कर अगस्त 1939 को रूस से अनाक्रमण
समझौता किया जिसके अनुसार –

  1. दोनों एक दूसरे के मित्र रहेंगे। 
  2. पोलैण्ड को जर्मनी एवं रूस में बाँटा जायगे ा। 
  3. रूस जर्मनी को युद्ध, सामग्री एवं खाद्य सामग्री देगा।

पोलैण्ड पर आक्रमण

हिटलर की माँग से स्पष्ट था कि वह पोलैण्ड को भी हड़पना चाहता है, क्योंकि डांर्जिंग पर
अधिकार करके वह आसानी से पूर्वी पोलैण्ड जर्मनी और समुद्र का सीधा संबंध स्थापित कर सकता था।
उसने 1934 ई. का समझौता रद्द करने की घोषणा की। जर्मनी को रूस के साथ की गई संधि ने साहस
प्रदान कर ही दिया था। अत: हिटलर ने पोलिस सरकार पर यह आरोप लगाया कि पोल जर्मनी के
साथ अत्याचारपूर्ण व्यवहार करते है, एक सितम्बर, 1939 को पोलैण्ड पर आक्रमण करके द्वितीय विश्व
युद्ध को जन्म दे डाला।

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