क्रीमिया का युद्ध के कारण एवं परिणाम

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क्रीमिया युद्ध के कारण

नेपोलियन की महत्वाकांक्षा- 

1848 ई. में नेपालेयन तृतीय ने फ्रासं के गणतंत्र का अंत करके अपने को सम्राट बना लिया। उसका विश्वास था कि वह अपनी शक्तिशाली विदेश नीति का अनुसरण करके किसी महान युद्ध में विजयी हो सकता था। इसका अवसर उसने पूर्वी समस्या में देखा जिसके संबंध में रूस और इंग्लैण्ड में प्रतिद्विन्द्वता थी। अत: उसने किसी-न-किसी बहाने से पूर्वी समस्या को लेकर युद्ध करना चाहा।

नेपोलियन एवं निकोलस का द्वेष- 

रूस का सम्राट् जारनिकोलस प्रथम, फ्रांस के नेपोलियन तृतीय को ‘मेरे प्रिय मित्र‘ कर कर संबाेि धत किया रखता था। दाने ों सम्राटों के इस पारस्परिक द्वेश ने पूर्वी समस्या को जटिल बनाने का और अंत में उसके समाधान के लिए युद्ध को आवश्यक कर दिया। 

निकोलस की स्वार्थपूर्ण योजना- 

बहुत समय पूर्व से ही निकोलस की दृष्टि टर्की साम्राज्य पर लगी हुई थी। उसे पूर्ण विश्वास था कि क्रमश: पतन की ओर अग्रसर होने वाला यह साम्राज्य किसी-न-किसी दिन अवश्य समाप्त हो जायेगा। अत: वह चाहता था कि ऐसा होने के पूर्व ही उसके भाग्य का निर्णय कर लिया जाये। तुर्की के संबंध में इस प्रकार के विचार को व्यक्त करने के बाद निकोलस ने उसको विभाजित करने की योजना प्रस्तुत की। निकोलस की योजना इंग्लैण्ड भेजी गई। किन्तु अंग्रेज मंत्री उस योजना से सहमत नहीं हुए। निकोलस ने इस निर्णय से क्रुध होकर युद्ध की तैयारियाँ प्रारंभ कर दीं। 

तुर्की की निर्बलता-  

तुर्की का विशाल साम्राज्य उत्तम प्रशासन के अभाव में निरंतर निर्बल होता चला जा रहा था। उसकी इस निर्बलता का लाभ उठाकर सर्बिया, यूनान, मिस्र आदि अधीनस्थ देश विद्रोह करके स्वतंत्रता प्राप्त कर चुके थे। यदि वे तुर्की की निर्बलता का लाभ उठा सकते थे, तो अन्य देश भी अपने को लाभांि वत कर सकते थे। इन देशांे में मुख्य था रूस, जो बहुत समय से तुकीर् पर अपना आधिपत्य स्थापित करके अपने साम्राज्य का विस्तार करना चाहता था। अत: वह किसी-न-किसी बहाने से युद्ध प्रारंभ करके अपनी इच्छा को पूर्ण करने के लिए लालायित था।

पवित्र स्थानों के लिए झगड़े- 

पवित्र स्थानों से अभिप्राय था बेथलेहम का गिरजा, जो ईसा मसीह के जन्म लेने के स्थान पर बना हुआ था। इस गिरजे को यूनानी पादरियों और रोमन कैथाेि लकों दाने ों के द्वारा पय्र ागे किया जाता था। 1740 ई. की एक संधि के अनुसार फ्रांस को रोमन कैथोलिकों का संरक्षण प्राप्त हो गया था। अत: फ्रासं के प्रभाव के कारण गिरजे के मुख्य द्वार की चाबी उनको मिल गयी थी। यूनानी पादरियों को एक छोटे द्वार की चाबी दे दी गई, जिससे वे गिरजा का एक बगल का द्वार खाले कर उसमें प्रवेश कर सकते थे। फ्रांस की क्रांति से लाभ उठाकर यूनानियों ने बगल के छोटे दरवाजे कीे चाबी रोमन कैथोलिकों को दे दी और मुख्य द्वार की चाबी स्वयं ले ली। जब नेपोलियन तृतीय फ्रांस का सम्राट बना, तब उसने पोप और रोमन कैथोलिकों को प्रसé करने के लिए अपने पक्ष में करने का विचार किया। इस उद्देश्य से उसने 1850 ई. में पवित्र स्थानों पर अपने संरक्षण की माँग की; जिससे कि रोमन कैथोलिकों की गिरजे के मुख्य द्वार की चाबी फिर मिल जाय। जार निकोलस ने यूनानी पादरियों का समर्थक होने के कारण इस माँग का विरोध किया। साथ ही, उसने यह भी माँग की कि पवित्र स्थानों पर उसका संरक्षण स्वीकार किया जाय। फ्रासं की माँग का इंग्लैण्ड, स्पेन, आस्ट्रिया और अन्य रोमन कैथाेि लक देशांे ने विरोध किया। अत: तुकीर् के सुल्तान ने फ्रांस की माँग स्वीकार कर ली। इससे क्रुध होकर निकोलस ने तुर्की के विरूद्ध युद्ध प्रारंभ करके क्रीमिया के युद्ध का सूत्रपात किया। 

रूस के संरक्षण की अस्वीति- 

पवित्र स्थानों का संरक्षण नहीं मिलने के कारण निकोलस ने तुर्की से एक अन्य माँग की कि उसे तुर्की के सब यूनानी ईसाइयों का संरक्षक माना जाये। किन्तु तुर्की के सुल्तान पर अंग्रेजी राजदूत स्टे्रटफोर्ड का इतना अधिक प्रभाव था कि उसने निकोलस की माँग अस्वीकार कर दी। निकोलस की क्रोधाग्नि को पूर्ण रूप से प्रज्जवलित करने के लिये यह काफी था और यही क्रीमिया के युद्ध का तात्कालिक कारण बना।

रूस का मॉलडेविया व वैलेसिया पर अधिकार- 

इतिहासकार मोबट ने लिखा है कि रूस के जार ने युद्ध की सब तैयारियाँ पहले ही कर ली थीं। सुल्तान द्वारा यूनानी ईसाइयों पर अपना संरक्षण अस्वीकार किये जाने पर उसने जुलाई, 1853 ईमें अपनी सेनाओं को भेजकर तुर्की के दो प्रदेशांे मॉलडेविया और वैलेि सया पर अधिकार कर लिया।

तुर्की द्वारा मॉलडेविया व बैलेसिया की माँग- 

4 अक्टूबर, 1853 ई. को तुर्की के सुल्तान ने रूस से अपने दाने ों प्रदेशांे मॉलडेविया और वैलेसिया को खाली करने की माँग थी। रूस द्वारा इस माँग के अस्वीकार किये जाने पर तुर्की ने 23 अक्टूर, 1853 को उसके विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।

युद्ध की प्रमुख घटनायें

क्रीमिया के युद्ध की घटनाओं को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है -1. 1853 से 1854 ई. तक, जब युद्ध में केवल रूस और तुर्की थे। 2. 1854 ई. से 1856 ई. तक, जब युद्ध में अन्य देश भी सम्मिलित हो गये।

प्रथम भाग (1853 से 1854 ई. तक) 

23 अक्टूबर, 1853 से 28 मार्च, 1854 ई. तक केवल तुर्की और रूस में युद्ध हुआ। युद्ध की घोषणा करने के बाद तुर्की ने डेन्यूब नदी के तट पर स्थित रूसी सेनाओं पर आक्रमण कर दिया। 30 नवम्बर, 1853 ई. को तुर्की का एक जहाजी बेड़ा बातूम की ओर जा रहा था तब रूस के एक जहाजी बडे ने उससे युद्ध करके उसके सब मनुष्यों का पूर्ण विनाश कर दिया।

अन्य देशों का युद्ध में प्रवेश

सिनोप में तुर्की बेड़े के विनाश के समय इंग्लैण्ड और फ्रांस का सम्मिलित बेड़ा कुस्तुनतुनिया में था। रूस द्वारा तुर्की बेड़े का विनाश फ्रासं ओर इंग्लैण्ड को युद्ध की चनु ातै ी जान पड़ी। इन दोनों देशों में सिनीप में की गई तुर्कियों की सामूि हक हत्या से बड़ा राष्े ा फैला। अत: दाने ों देशांे के सम्मिलित बडे को काला सागर में प्रवेश करने की आज्ञा दी गई। आस्ट्रिया ने उनको सभी प्रकार की सहायता देने का आश्वासन दिया। फलस्वरूप फ्रांस और इंग्लैण्ड ने 27 फरवरी, 1854 ई. को रूस से मॉलडेबिया और वैलेसिया खाली करने के लिए कहा। रूस द्वारा इस माँग को अस्वीकार किये जाने पर 27 और 28 मार्च; 1854 को इन देशांे ने रूस के विरूद्ध घाेि “ात कर दिया।

द्वितीय भाग (1854-1856 ई. तक)

अपने विरूद्ध यूरोप के शक्तिशाली देशों को युद्ध के लिये तैयार देखकर रूस ने मॉलडेविया और बैलेसिया के प्रदेशों को खाली कर दिया। इस प्रकार युद्ध और उसकी घोषणा का उद्देश्य पूर्ण हो गया, पर फिर भी युद्ध हुआ। ब्रिटिश सेना, लार्ड रेगलन और फ्रांसीसी सेना, मार्शल सन्े ट एरेनॉड की अधीनता में 14 सितम्बर, 1854 की क्रीमिया पहुँची दोनों देशों की सम्मिलित सेनाओं ने ‘आल्मा के युद्ध’ में रूसी सेना को परास्त किया। इसके बाद बेलाक्लावा में रूस के विरूद्ध युद्ध हुआ। शीत ऋतु होने के बाद कारण मित्र राष्ट्रों के सैनिकों को अकथनीय कष्ट झेलने पड़े। उनमें 9 हजार शीत के कारण और 13 हजार विभिé रोगों से मर गये। अंतत: मित्र राष्ट्रों ने रूस पर विजय प्राप्त की। उनकी इस विजय ने रूस को बिल्कुल नि:शक्त कर दिया। अत: उसने 20 मार्च, 1856 ई. को ‘पेरिस की संधि’ स्वीकार कर ली।

पेरिस की संधि

1856 की पेरिस की संधि की प्रमुख धारायें निम्नांकित थीं -
  1. रूस और तुर्की द्वारा एक दूसरे के जीते गये प्रदेशों को वापिस कर दिया जाय। 
  2. रूस के सेबस्टोपोल के दुर्ग को पुन: निर्माण करने की आज्ञान दी जाय। 
  3. डारडेनेल्स में तुर्की के अलावा और किसी देश के युद्ध पोतों को प्रवेश करने की आज्ञा न दी जाय। इसके विपरीत, सब राष्ट्रों के व्यापारिक जहाजों को उसमें प्रवेश करने का अधिकार दिया जाय। 
  4. रूस और तुर्की को काला सागर में जहाजी बेड़ा रखने की आज्ञा न दी जाय। 
  5. मॉलडेविया, वैलेसिया और सर्बिया को तुर्की के सुल्तान के नाम मात्र के संरक्षण में पूर्ण रूप से स्वतंत्र कर दिया जाय। 
  6. डेन्यबू नदी में सभी देशों के जहाजों की चलने की अनुमति दी जाय। 
  7. तुर्की और आस्ट्रिया को का सदस्य बनाया जाय। 
  8. फ्रांस और इंग्लैण्ड द्वारा भविष्य में नार्वे और स्वीडन की रूस के आक्रमण से रक्षा की जाय। 
  9. रूस को तुर्क के यूनानी ईसाइयों पर किसी प्रकार का संरक्षण न दिया जाय। 
  10. तुर्की के सुल्तान द्वारा अपनी ईसाई प्रजा की दशा में सुधार किया जाय।

युद्ध के परिणाम

फ्रांस एवं इंग्लैण्ड की भिन्नता 

इस युद्ध का एक महत्वपूर्ण परिणाम यह निकला कि इंग्लैण्ड और फ्रांस में मित्रता स्थापित हो गयी। नेपोलियन तृतीय महत्वकांक्षी होने के कारण युद्ध की खोज कर रहा था और इंग्लैण्ड नेपोलियन बाने ापार्ट के समय जसै ा युद्ध नहीं चाहता था। अत: दाने ों देशांे में मित्रता हो जाने से स्पष्ट रूप से नेपोलियन तृतीय की महत्वाकाक्षा पर अंकुश लग गया और यूरोप उस शक्तिशाली सम्राट के युद्धों द्वारा किये जाने वाले विनाश से बच गया।

नेपोलियन तृतीय जानता था कि इंग्लैण्ड और तुर्की को एक साथ ही अपना शत्रु बना लेना उसके लिये हितकर नहीं होगा। अत: वह इंग्लैण्ड की मित्रता का अत्यधिक इच्छुक था। पामस्र्टन भी समझता था कि फ्रांस से मित्रता करके रूस की साम्राज्य प्रसार की इच्छा को रोका जा सकता था। इन परिस्थितियों के कारण फ्रांस और इंग्लैण्ड-दोनों ने एक-दूसरे की ओर मित्रता का हाथ बढ़ाया और वे मैत्री के अटूट संबंध में आबद्ध हुए।

सैनिक संगठन की कमियाँ 

क्रीमिया के युद्ध ने ब्रिटिश सेना के संबंध में दो तथ्यों को स्पष्ट किया। प्रथम तथ्य यह था कि उसके सैनिक वीर, साहसी एवं कर्त्तव्य पराण थे। दूसरी यह कि उसके सेनापति पूर्णरूप से अयोग्य थे, उनमें सैनिक संगठन और संचालन की क्षमता नहीं थी और वे सैनिकों के लिये भोजन तथा औषधि का प्रबंध नहीं कर सकते थे। ऐसा न कर सकने के कारण अंग्रेज सैनिक भूख और बीमारी से मर गये। इन मरने वाले याग्ेय सैनिकों के स्थान पर इंग्लैण्ड से भेजे जाने वाले अनुभवहीन सैनिक, ‘रेडान के युद्ध’ में विजय प्राप्त नहीं कर सके, जिससे इंग्लैण्ड के सैनिक सम्मान को बहुत ठेस पहुँची और जो यश उसने ऐल्मा और इंकरमेन की विजयों द्वारा प्राप्त किया था, नष्ट हो गया।

सेना सुधार 

क्रीमिया के युद्ध की अव्यवस्था ने इंग्लैण्ड के सभी नागरिकों और प्रशसं कों का ध्यान सेना सुधार की ओर आकषिर्त किया। वाटरलू के युद्ध के बाद उन्होने अपनी सेना को पूर्णत: विस्मतृ कर दिया था और उनका प्रयास केवल यह था कि सेना पर कम व्यय किया जाये। सेना के प्रति अपनी उदासीनता का परिणाम उन्होंने क्रीमिया युद्ध में देखा। उन्होंने देखा कि वैलिंगटन की जिस सेना ने नेपोलियन महान को परास्त किया था, उसमें पहले जैसी याग्े यता नहीं थी। अत: देश के काने े-काने े से सेनापतियों की आलाचे ना की गई तथा सैनिक सुधार की माँग की गई।

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