न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया

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न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया एक स्वस्थ एवं निश्पक्ष न्यायपालिका का सबसे महत्वपूर्ण कार्य होता है। जितने श्रेष्ठ व्यक्ति इस प्रक्रिया द्वारा चुने जायेगे उतना ही न्यायपालिका का स्तर बेहतर होगा। संविधान निर्माण के समय से ही इस विषय पर व्यापक विचार-विमर्श हुआ, जो अभी भी जारी है। न्यायाधीशों की निश्पक्षता न सिर्फ न्यायपालिका पर प्रभाव डालती है। बल्कि यह संविधान का निर्वचन कर कार्यपालिका एवं विधायिका पर ही व्यापक असर रखती है। क्योंकि न्यायिक अधिकारी की नियुक्ति उसके सम्पूर्ण सेवा काल के लिए होती है अत: वह कार्यपालिका एवं विधायिक के सदस्यों से ज्यादा समय तक सरकार का अंग रहता है।

साथ ही न्यायपालिका व्यक्तियों के मूल अधिकारों का भी निर्वचन करती है। अत: यह सामान्य व्यक्ति के अधिकारों की प्रहरी है। यदि न्यायपालिका को हम एक किला माने तो न्यायिक अधिकारी उस द्वारपाल की भांति हैं जिनका सजग ईमानदार और कर्त्तव्यनिष्ठ होना आवश्यक है ताकि किले की सुरक्षा बनी रहें।

नियुक्ति प्रक्रिया की पृष्ठभूमि

प्रसिद्ध विधिशास्त्री मोन्टेस्क्यू ने सरकार का विभाजन तीन अंगों में किया गया है कार्यपालिका, विधायिका एवं न्यायापालिका। सरकार का तृतीय अंग अर्थात न्यायापालिका का प्रमुख कार्य विधि का निर्वचन करना तथा उसे लागू करना और राज्यों व उसके नागरिकों के मध्य उत्पन्न विवादों का निपटारा करना है। न्यायपालिका का कार्य है कि वह देश में विधि का शासन बनाये रखे तथा सुनिश्चित करें कि शासन संविधान के अनुरूप संचालित हैं।

एक स्वतन्त्र और निश्पक्ष न्यायापालिका ही नागरिकों के अधिकारों की संरक्षिका हो सकती है तथा बिना भय तथा पक्षपात के सबको समान न्याय प्रदान कर सकती है। इसके लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि उच्चतम न्यायालय अपने कत्र्तव्यों के पालन के लिए पूर्ण रूप से स्वतन्त्र और सभी प्रकार के राजनीतिक दबाबों से मुक्त हो। जब भारत का संविधान तैयार किया जा रहा था तो संविधान निर्माताओं के समक्ष दो प्रकार की न्यायपालिकाओं के उदाहरण उपस्थित थें
  1. ब्रिटेन में न्यायाधीशों की नियुक्ति क्राऊन द्वारा होती थी। इसका तात्पर्य यह था कि कार्यपालिका पर कोई निर्बन्धन नहीं था। उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति लार्ड चांसलर की सलाह पर की जाती थी इसके अलावा कोर्ट ऑफ अपील, हाउस ऑफ लार्ड्स और किंग्स बेंच में नियुक्तियां एटार्नी जनरल की सलाह पर प्रधानमंत्री द्वारा की जाती थी। अत: ब्रिटेन में उच्च न्यायिक पदों पर नियुक्ति करने की शक्ति पूर्णतया कार्यपालिका में निहित थी। 
  2. अमेरिका में में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति सीनेट की सहमति प्राप्त हो जाने पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती थी। राष्ट्रपति विशेशत: एटार्नी जनरल द्वारा सुझाए गये व्यक्तियों के न्यायाधीश के पद के लिए नामित करता था। ऐसे व्यक्ति मुख्यत: राजनीतिक, शैक्षिक या विधिक पृष्टभूमि से संबन्धित होते थे तथा सीनेट सहमति देकर उन नामित व्यक्तियों की नियुक्ति की पुष्टि करती थी, किन्तु राष्ट्रपति द्वारा नामित कुछ व्यक्ति सीनेट द्वारा पुष्टि प्राप्त करने में असफल रहे। 1930 में न्यायाधीश जॉन पार्कर को सीनेट ने अनुमोदित नहीं किया। इसके अलावा 1968 में न्यायाधीश फोर्ट जो कि राष्ट्रपति निक्सन के निकट मित्र एवं विधिक सलाहकार थे, को भी मु0 न्यायाधीश के पद पर नियुक्त हेतु अनुमोदन प्राप्त नहीं हो पाया।

भारतीय संविधान में न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया

भारतीय संविधान निर्माताओं ने ब्रिटेन व अमेरिका की न्यायापालिका के संबन्ध में अनेक कठिनाइयां पायी। अत: उन्होंने भारतीय न्यायपालिका हेतु एक मध्यम मार्ग अपनाया। ब्रिटेन में न्यायपालिका के संदर्भ में कार्यपालिका को अनन्य शक्ति प्राप्त थी जबकि अमेरिकी न्यायिक प्रणाली में राजनीतिक हस्तक्षेप था।

जब भारतीय संविधान का निर्माण किया जा रहा था तो राष्ट्रमण्डल देशों जैसे कनाडा, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड व यू0के0 में न्यायाधीशों की नियुक्ति कार्यपालिका द्वारा की जाती थी। अत: उन सभी देशों से अनुभव प्राप्त करने के पश्चात भारतीय संविधान निर्माताओं ने भारतीय न्यायपालिका के संबन्ध में एक मध्यम मार्ग अपनाया। उन्होंने ऐसी रीति अपनायी जो कि न तो कार्यपालिका को पूर्ण शक्ति प्रदान करती थी और न ही संसद को न्यायाधीशों की नियुकित को प्रभावित करने की अनुमति देती थी।

संविधान निर्मात्री सभा में न्यायपालिका के संबध में विचार विमर्श की प्रक्रिया के दौरान उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति के सम्बन्ध में संशोधन लाया गया। जिस पर डा0 अम्बेडकर ने अत्यन्त महत्वपूर्ण शब्द कहे जो निम्न प्रकार है :-

भारत में न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधि पत्र द्वारा करता है। राष्ट्रपति को इस मामले में कोई वैवेकीय शक्ति प्राप्त नहीं है। अनुच्छेद 124 (2) के अनुसार राष्ट्रपति न्यायाधीशों की नियुक्ति उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के ऐसे न्यायाधीशों से परामर्श करने के पश्चात, जिसे वह इस प्रयोजन के लिए आवश्यक समझे, ही करेगा। तथा अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति सर्वदा मुख्य न्यायाधीशों के परामर्श से ही करेगा।

न्यायाधीशों को नियुक्त करने की राष्ट्रपति की शक्ति एक औपचारिक शक्ति है। क्योंकि वह उस मामले में मंत्रि मंडल की सलाह से कार्य करता है। (अनुच्छेद 124 (2) के अनुसार राष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामलें में भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करने के लिए बाध्य है। जहां तक मुख्य न्यायमूर्ति की नियुक्ति का प्रश्न है ;अनुच्छेद 124 के अन्र्तगत राष्ट्रपति को संविधान द्वारा विहित अर्हता रखने वाले किसी भी व्यक्ति को मुख्य न्यायमूर्ति नियुक्त करने की शक्ति प्राप्त है तथा वह इस मामलें में किसी से परामर्श हेतु बाध्य नहीं है। भारत में न्यायाधीशों की नियुक्ति के इतिहास को निम्न चरणों के अन्तर्गत अध्ययन किया जा सकता है:-

प्रथम चरण (1950 से 1981)

उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठतम सदस्य को मुख्य न्यायमूर्ति तथा अन्य न्यायाधीशों को मुख्य न्यायाधीश के परामर्श पर नियुक्ति प्रदान करने की प्रक्रिया अपनायी जाती रही। तथा धीरे-धीरे यह प्रक्रिया एक परंपरा के रूप में परिवर्तित हो गयी। केवल न्यायमूर्ति जफ इमाम एक मात्र अपवाद थे जो कि अपनी मानसिक वं शारीरिक अस्वस्थता के कारण वरिष्ठ होने के बावजूद मुख्य न्यायमूर्ति नहीं चुने गये। तथा बाद में उन्होने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।

1973 में इस मामलें पर एक महत्वपूर्ण विवाद खड़ा हुआ। जब 25 अप्रैल 1973 को केशवनन्द भारती के मामलें में दिये गये निर्णय के कुछ घंटो के पश्चात ही सरकार ने आप्रत्याशित ढंग से 22 वर्षो की उपर्युक्त परम्परा को तोड़ दिया। सरकार ने वरिष्ठतम की उपेक्षा करके न्यायमूर्ति श्री अजित नाथ राय को भारत का मुख्य न्यायमूर्ति नियुक्त किया।

सरकार ने न्यायालय के तीन वरिष्ठतम न्यायाधीशों श्री जे0एम0 शेलट, श्री के0एस0 हेगड़े तथा श्री एस0एन0, ग्रोवर की वरिष्ठता की उपेक्षा करके श्री एस. एन. राय को मुख्य न्यायमूर्ति नियुक्त किया। श्री राय के शपथ ग्रहण करने के आधे घंटे के पश्चात तीनों न्यायाधीशों ने अपने पदों से त्याग पत्र दे दिया। सरकार के इस रवैये की बड़ी तीव्र आलोचना की गयी। उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ता संघ ने इस कदम की आलोचना करते हुए कहा कि यह नियुक्ति विशुद्ध राजनैतिक आधार पर की गयी थी और इसका योग्यता और वरिष्ठता से कोई संबध नहीं था।

सरकार की ओर से इस कदम के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये गये सरकार का यह कथन था कि अनुच्छेद 124 में राष्ट्रपति को प्रधान न्यायाधीश की नियुक्ति के संबध में पूर्ण वैवेकीय शक्ति प्रदान की गयी है। अत: किसी भी न्यायाधीश को, जिसे वह उचित समझता हो, मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर सकता है। चाहें वह वरिष्ठ हो या कनिष्ठ। यह तर्क बहुत कमजोर था क्योंकि 1973 तक सरकार द्वारा वरिष्ठतम क्रम के अनुसार ही वरिष्ठतम न्यायाधीश को मुख्य न्यायामूर्ति चयनित किया जाता रहा है। सरकार ने यह भी तर्क दिया कि सरकार ने प्रधान न्यायाधीश की नियुक्ति में विधि आयोग की संस्तुतियों को लागू किया था।

विधि आयोग, 1956 ने यह सिफारिश की थी कि मुख्य न्यायमूर्ति की नियुक्ति केवल वरिष्ठतमता के आधार पर ही नहीं की जानी चाहिए बल्कि उसमें गुण उपयुक्तता एवं प्रशासनिक सक्षमता की भी समीक्षा की जानी चाहिए। सरकार का यह तर्क भी बहुत लचर था। क्योंकि विधि आयोग की रिपोर्ट 1956 में आयी थी तथा सरकार ने 17 वर्षो तक उस रिपोर्ट को लागू नहीं किया और फिर एकाएक उस रिपोर्ट को लागू करने के बहाने 3 वरिष्ठतम न्यायाधीशों की उपेक्षा की। वास्तव में तीनों न्यायाधीशों की उपेक्षा इसलिए नहीं की गयी कि वे योग्यता नहीं रखते थे बल्कि उपेक्षा का मुख्य कारण उनके द्वारा सरकार के विरूद्ध निर्णय किया जाना था।

सरकार की ओर से यह तर्क भी दिया गया कि मुख्य न्यायाधीशों के पद पर जिस व्यक्ति की नियुक्ति की जाये उसका कार्यकाल अधिक दिनों का होना चाहिए। इससे मुख्य न्यायाधीश को न्यायालय को एक निश्चित दिशा देने का अवसर प्राप्त होगा। किन्तु यहां भी सरकार असफल रही क्योंकि त्यागपत्र देने वाले तीनों न्यायाधीशों में से श्री ग्रोवर का कार्यकाल श्री ए.एन. राय से एक माह बाद समाप्त होने वाला था।

लखनापल वनाम ए.एन. राय (1975) के मामले में मुख्य न्यायाधीश ए.एन. राय की नियुक्ति का दिल्ली उच्च न्यायालय में (अनुच्छेद 126) के अधीन अधिकार पृच्छा की रिट याचिका द्वारा निम्नलिखित आधारों पर चुनौती दी गयी।
  1. कार्यपालिका का यह कृत्य दुर्भावना युक्त है। 
  2. यह नियुक्ति अनुच्छेद 124(2) में समाहित वरिष्ठता के नियम के विरूद्ध है। 
  3. इस नियुक्ति में अनुच्छेद 124(2) में वर्णित आवश्यक परामर्श प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है।
उच्च न्यायालय ने याचिका को अस्वीकार करते हुए कहा कि नियुक्ति करने वाले प्राधिकारी का आशय अधिकार पृच्छा रिट याचिका के संदर्भ में विसंगत है। 1976 में सरकार ने पुन: न्यायमूर्ति एम0एन0 बेग को न्यायमूर्ति एच0आर0 खन्ना पर वरीयता देते हुए मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया। जिसके फलस्वरूप न्यायमूर्ति खन्ना ने त्याग पत्र दे दिया। ऐसा न्यायमूर्ति खन्ना द्वारा बन्दी प्रत्याक्षीकरण मामलें ;ए0डी0एम0 जबलपुर वनाम शिवकान्त शुक्ला,) में दिये गये विसम्मति निर्णय के कारण हुआ। जिसमें उन्होने आपातकाल के दौरान जीवन के अधिकार का समर्थन किया था जिसे सरकार ने अपने विरूद्ध माना।

भारत संघ वनाम साकल चन्द्र सेठ (1977) सु0को0 क के मामलें में उच्चतम न्यायालय के समक्ष ‘ परामर्श’ शब्द प्रथम के बार विचार हेतु आया। यह मामला अनुच्छेद 222 (1) में प्रयुक्त ‘परामर्श’ शब्द के अर्थ एवं विस्तार से सम्बन्धित था। न्यायमूर्ति चन्द्रचूड़ ने निर्णय देते हुए कहा कि ‘परामर्श’ शब्द से तात्पर्य दो या अधिक व्यक्तियों के ऐसे सम्मिलन से है जो उन्हे किसी एक विषय पर सहीं एवं सन्तोषजनक हल प्रदान करने के लिए सक्षम बनाता है। इस निर्णय मे उन्होने यह अभिनिर्धारित किया कि परामर्श का तात्पर्य सहमति नहीं है बल्कि पूर्ण एवं प्रभावी परामर्श है। पुन: एस0पी0 गुप्ता वनाम भारत संघ (1982) सु0को0 के मामलें में मार्च 1981 में भारत सरकार के विधि मंत्री द्वारा राज्यों के मुख्य मुंत्रियों और उच्चतम न्यायालय को भेजे गये एक परिपत्र की, (जिसके द्वारा न्यायाधीशों को एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानान्तरण व प्रस्तावित नियुक्ति के संबध में) अपनी सहमति देने को कहा गया था, वैधता को चुनौती दी गयी थी। परिपत्र की विधि मान्यता के अलावा इस मामलें में न्यायपालिका की स्वतंत्रता एवं न्यायाधीशों की नियुक्तियों में प्रधान न्यायाधीश के परामर्श की प्राथमिकता भी प्रश्नगत थी।

उच्चतम न्यायालय ने साकल चन्द्र सेठ के मामले में दिये निर्णय का अनुसरण करते हुए स्पष्ट किया कि परामर्श से तात्पर्य सहमति से नहीं बल्कि पूर्ण एवं प्रभावी परामर्श से है। अर्थात परामर्श हेतु संबधित न्यायाधीश के समक्ष संपूर्ण तथ्य रखे जाने चाहिए। जिसके आधार पर किसी व्यक्ति को न्यायाधीश नियुक्त करने के लिए वह राष्ट्रपति को अपनी सिफारिश भेजेगा। बहुमत के निर्णय के अनुसार न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामलें में कार्यपालिका को पूर्ण शक्ति प्राप्त है। सरकार द्वारा किया गया कृृत्य केवल इस आधार पर प्रश्नागत किया जा सकेगा कि वह दुर्भाग्यनापूर्ण है। इस मामलें में विसम्मत निर्णय विसम्मत निर्णय के अनुसार प्रधान न्यायाधीश के परामर्श को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

द्वितीय चरण (1982 से 1998)

सुभाश शर्मा वनाम भारत संघ (1991) सु0को0 के मामले में उच्चतम न्यायालय की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने यह मत अभिव्यक्त किया कि संविधान के अनुसार उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामलें में प्रधान न्यायाधीश के पद का अत्यधिक महत्व है। न्यायालय ने नियुक्ति के सम्बन्ध में बड़ी पीठ द्वारा विचार किये जाने का सुझाव दिया।

एस0सी0 एडवोकेट आन रिकार्ड एसोशियसन बनाम भारत संघ (1993) सु0को0 के मामलें में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश ने एक लोक हित वाद के द्वारा उच्चतम न्यायालिका में रिक्त पदों पर नियुक्ति के संदर्भ में प्रश्न उठाया था। इसके अलावा यह मामला उच्चतम न्यायालय व उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति के सम्बन्ध में अनेक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है। इस याचिका पर 9 न्यायाधीशों की पीठ द्वारा विचार किया गया। तथा बहुमत का निर्णय न्यायमूर्ति जे0एस0 वर्मा द्वारा सुनाया गया। इस पीठ ने 7:2 के बहुमत से यह अभिनिर्धारित किया कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामलें उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति न्यायाधिपति के मत को सर्वोच्य महत्व देना चाहिए। जो वह अपने सहयोगियों से परामर्श करके व्यक्त करता है। उच्चतम न्यायालय व उच्च न्यायालय के किसी भी न्यायाधीश की नियुक्ति तब तक नहीं की जा सकती है जब तक कि वह उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश के मत के अनुरूप न हों। न्यायालय ने इस मामलें में उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबध में निम्नलिखित दिशा निर्देश दिये हैं :-
  1. उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबन्ध में प्रस्ताव का प्रारंभ मुख्य न्यामूर्ति द्वारा किया जाना चाहिए। 
  2. राष्ट्रपति किसी भी व्यक्ति की नियुक्ति उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में तब तक नहीं करेगा जब तक कि प्रधान न्यायाधीशए उच्चतम न्यायालय के दो वरिष्ठ न्यायाधीशों से परामर्श करके अपनी सिफारिश राष्ट्रपति को न भेजे। 
  3. प्रधान न्यायाधीश की दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों से परामर्श प्रक्रिया लिखित में होनी चाहिए। 
  4. भारत के मुख्य न्यायाधीश के पद पर नियुक्ति उच्चतम न्यायालय के किसी वरिष्ठ न्यायाधीश की ही होनी चाहिए, जो कि उस पद को ग्रहण करने के लिए उपर्युक्त हो। 
  5. केवल अपवादात्मक परिस्थितियों में ही ऐसा हो सकता है कि प्रधान न्यायाधीश तथा दो वरिष्ठ न्यायाधीशों द्वारा सिफारिश किये गये नामों पर विचार ही न किया जाये।

तृतीय चरण (1999 से अब तक)

इन री प्रेसिडेन्सियल रिफरेन्स नं0-1 (1993) के मामलें में यह परामर्श दिया गया कि उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति में मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश जो अन्य न्यायाधीशों से परामर्श करने के पश्चात दी जाये, सरकार को भेजी जायेगी। इस निर्णय के पश्चात यह आरोप लगाया जाने लगा कि मुख्य न्यायाधीश अपनी सिफारिशों से मनमानें ढंग से अन्य न्यायाधीशों के परामर्श के बिना भेज रहे हैं ।

यह प्रश्न तब और गम्भीर रूप में आया जब पिछले मुख्य न्यायाधीश श्री एम0एम0 पुंछी ने परामर्श प्रक्रिया का पालन किए बिना मनमाने ढंग से नियुक्ति की सिफारिश राष्ट्रपति को भेजी थी । अत: राष्ट्रपति महोदय ने परामर्श प्रक्रिया को स्पष्ट करने के लिए अनुच्छेद 143 के आधीन सलाह देने हेतु इस मामलें को पुन: उच्चतम न्यायालय को सौंप दिया। इस मामलें में 9 सदस्यीय संविधान पीठ का निर्णय सुनाते हुए न्यायाधीश श्री एस0 पी0 भरूचा ने परामर्श प्रक्रिया को निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट किया :-
  1. उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामलें में मुख्य न्यायाधीश को उच्चतम न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायमूर्तियों के समूह से परामर्श करके ही राष्ट्रपति को अपनी सिफारिश भेजना चाहिए। अत: नियुक्ति के लिए सिफारिश हेतु समूह मुख्य न्यायाधीश व उच्चतम न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायामूर्तियों से मिलकर निर्मित होना चाहिए। 
  2. न्यायाधीशों के समूह को अपना परामर्श आम राय से देना चाहिए। तथा परामर्श प्रक्रिया में सम्मिलित प्रत्येक न्यायाधीश की सिफारिश चाहे वह सम्मत हो या विसम्मत, लिखित रूप में होना चाहिए। 
  3. यदि परामर्श प्रक्रिया में सम्मिलित न्यायाधीशों के समूह में बहुमत किसी व्यक्ति के विरूद्व हो तो उस व्यक्ति की न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति नही की जायेगी। 
  4. उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति केवल इसी आधार पर प्रश्नगत की जा सकेगी कि 1993 में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय का उचित रूप से अनुपालन नहीं हुआ है।

तीनों चरणों की समीक्षा

1982 में प्रथम न्यायाधीश नियुक्ति मामलें के समय न्यायाधीशों की नियुक्ति की शक्ति कार्यपालिका में निहित थी। जबकि न्यायाधीशों की नियुक्ति संबन्धी दूसरे मामलें में नियुक्त करने की शक्ति न्यायपालिका के हाथों में पहुंच गयीं इस संबन्ध में तीसरे मामलें में इसके क्षेत्र का और अधिक विस्तार हुआ तथा नियुक्ति मुख्य न्यायाधीश तथा उच्चतम न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों के समूह की सिफारिश पर की जाने लगी। इस प्रकार वर्तमान में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया अधिक लोक तान्त्रिक पारदश्र्ाी और निश्पक्ष होगी। तथा इसके दुरूपयोग किये जाने की संभावना कम है।

राष्ट्रीय न्यायिक समिति की आवश्यकता

उच्चतम न्यायालय के 9 सदस्यीय संविधान पीठ के निर्णय के पश्चात उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया अधिक लोक तान्त्रिक पारदश्र्ाी एवं निश्पक्ष हो गयी है। मुख्य न्यायाधीश के पद हेतु वरिष्ठता का नियम तथा अन्य न्ययाधीशों की नियुक्ति के लिए प्रधान न्यायाधीश समेत 4 वरिष्ठ न्यायाधीशों के समूह द्वारा परामर्श प्रक्रिया के अनुसरण होने से इस मामलें में कार्यपालिका का हस्तक्षेप अब पूर्णत: समाप्त हो गया है।

न्यायाधीशों की नियुक्ति संबन्धी वर्तमान प्रक्रिया राजनैतिक हस्तक्षेप एवं दबाब से पूर्णत: मुक्त है। तथा प्रक्रिया पर न्यायापालिका का प्रभावी नियंन्त्रण है किन्तु जैसा कि विधिक सूक्ति में कहा गया है कि ‘‘शक्ति से भ्रष्टाचार आता है, और परम शक्ति से पूर्ण भ्रष्टाचार आता है।’’ अत: न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबन्ध में न्यायापालिका पर कुछ नियंत्रण भी अवश्य होना चाहिए।

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