शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 की विशेषताएं

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संयुक्त राष्ट्र संध ने शिक्षा के अधिकार को ‘मानवाधिकार’ की मान्यता प्रदान की है। शिक्षा के अधिकार को मानवाविधार के सार्वभौमिक घोशणापत्र (Universal Declaration of Human Rights) के अनुच्छेद 26 में, आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों पर अन्तराष्ट्रीय प्रसंविदा की धारा 14 में स्थान दिया गया। संयुक्त राष्ट्र संघ के यूनेस्को एवं अन्य अंग शिक्षा के अधिकार हेतु अन्तर्राष्ट्रीय विधिक प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए कार्य करते हैं।

प्रत्येक राष्ट्र की सरकार अपने प्रत्येक नागरिक को नि:शुल्क एवं अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा प्रदान करने हेतु अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों तथा देश के बच्चों के प्रति अपने दायित्व निर्वहन के प्रयास के क्रम में केन्द्र सरकार ने बच्चों की मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 का विनियमन किया है जिसे 26 अगस्त, 2009 को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई थ्र्ाी। अधिनियम के प्रावधान 1 अप्रैल, 2009 से लागू हो गये हैं। शिक्षा का अधिकार अधिनियम पारित करने से पूर्व इस अधिनियम हेतु संविधान में समुचित प्रावधान करने के उद्देश्य से 86वाँ संविधान संशोधन अधिनियम भी पारित किया गया था।

शिक्षा का अधिकार एक मूलभूत मानव अधिकार है। किसी भी लोकतान्त्रिक प्रणाली की सरकारी सफलता वहाँ के सभी नागरिकों के शिक्षित होने पर निर्भर करती है। एक शिक्षित नागरिक स्वयं को विकसित करता है और साथ अपने देश को भी विकास की ओर आगे बढ़ाने में योगदान करता है। शिक्षा ही एक व्यक्ति को मानव की गरिमा प्रदान करती है। हमारे देश में यह कहा गया है कि एक अशिक्षित व्यक्ति पशु के समान है। इस प्रकार हम देखते हैं कि शिक्षा का महत्व सर्वविदित है। किन्तु हमारे संविधान निर्माताओं ने सभी बालकों को शिक्षा देने का कर्तव्य संविधान में राज्य के नीति निदेशक तत्व के रूप में भाग IV में रखा था।

अनु0 45 के अधीन राज्य का 14 वर्ष की आयु के सभी बालकों को नि: शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा देने का कर्तव्य था। यह माना गया था कि जनता द्वारा चुनी हुई सरकारें संविधान के इस निदेश को ईमानदारी से क्रियान्वित करेंगी। नीति निदेशकों को मूल अधिकारों से कम महत्व नहीं दिया गया है। डॉ0 अम्बेडकर ने यह कहा था कि निदेशक तत्व एक पवित्र घोशणा मात्र नहीं है बल्कि एक संविधानिक दायित्व है और उन्हे लागू न करने पर सरकारों को जनता के समक्ष जबाव देना पड़ेगा और कोई भी सरकार इसकी उपेक्षा नहीं कर सकती है। अनु0 45 में विहित स्पष्ट रूप से वर्णित नीति निदेशक तत्व के बावजूद भी सरकारों ने इस ओर कोई सार्थक कदम नहीं उठाया और संविधान लागू होने के दिन से 60 वर्ष बीत जाने के पश्चात् भी भारत के 40 प्रतिशत बालक आज शिक्षा से वंचित है। संविधान निर्माताओं के शायद यह मत था कि राज्य की वित्तीय स्थिति को देखते हुए इसे मूल अधिकार बनाना उचित होगा। उनकी यह आशा राजनीतिज्ञों ने विफल कर दिया।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 की विशेषताएं

  1. भारत के 6 से 14 वर्ष आयु वर्ग के बीच आने वाले सभी बच्चों को मुफ्त तथा अनिवार्य शिक्षा। 
  2. कक्षा 1 से कक्षा 8 तक की शिक्षा ‘प्राथमिक शिक्षा’ के रूप में परिभाशित।
  3.  प्राथमिक शिक्षा खत्म होने से पहले किसी भी बच्चे को रोका नहीं जाएगा, निकाला नहीं जाएगा या बोर्ड परीक्षा पास करने की जरूरत नहीं होगी। 
  4. ऐसा बच्चा जिसकी उम्र 6 साल से ऊपर है, जो किसी स्कूल में दाखिल नहीं है अथवा है भी, तो अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी नहीं कर पाया/पायी है; तब उसे उसकी उम्र के लायक उचित कक्षा में प्रवेश दिया जाएगा, बशर्ते कि सीधे से दाखिला लेने वाले बच्चों के समकक्ष आने के लिए उसे प्रस्तावित समय सीमा के भीतर विशेष ट्रेनिंग दी जानी होगी, जो प्रस्तावित हो। प्राथमिक शिक्षा हेतु दाखिला लेने वाला/वाली बच्चा/बच्ची को 14 साल की उम्र के बाद भी प्राथमिक शिक्षा के पूरा होने तक मुफ्त शिक्षा प्रदान की जाएगी।
  5. प्रवेश के लिए उम्र का साक्ष्य प्राथमिक शिक्षा हेतु प्रवेश के लिए बच्चे की उम्र का निर्धारण उसके जन्म प्रमाणपत्र, मृत्यु तथा विवाह पंजीकरण कानून, 1856 या ऐसे ही अन्य कागजात के आधार पर किया जाएगा जो उसे जारी किया गया हो। उम्र प्रमाण नहीं होने की स्थिति में किसी भी बच्चे को दाखिला लेने से वंचित नहीं किया जा सकता। 
  6. प्राथमिक शिक्षा पूरा करने वाले छात्र को एक प्रमाणपत्र दिया जाएगा; 
  7. एक निश्चित शिक्षक-छात्र अनुपात की सिफारिश; 
  8. जम्मू-कश्मीर को छोड़कर समूचे देश में लागू होगा; 
  9. आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों के लिए सभी निजी स्कूलों के कक्षा 1 में दाखिला लेने के लिए 25 फीसदी का आरक्षण; 
  10. शिक्षा की गुणवत्ता में अनिवार्य सुधार; 
  11. स्कूल शिक्षक को पाँच वर्षों के भीतर समुचित व्यावसायिक डिग्री प्राप्त कर लेना होगा, अन्यथा उनकी नौकरी चली जाएगी; 
  12. स्कूल का बुनियादी ढाँचा (जहाँ यह एक समस्या है) 3 वर्शों के भीतर सुधारा जाए अन्यथा उसकी मान्यता रद्द कर दी जाएगी। 
  13. वित्तीय बोझ राज्य सरकार तथा केन्द्र सरकार के बीच (55:45 के अनपात में) साझा किया जाएगा।

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