उपनिवेशवाद क्या है? उपनिवेश की स्थापना के कारण

उपनिवेशवाद क्या है

1453 ई. में तुर्कों द्वारा कुस्तुनतुनिया पर अधिकार कर लेने के पश्चात् स्थल मार्ग से यूरोप का एशियायी देशों के साथ व्यापार बंद हो गया। अत: अपने व्यापार को निर्बाध रूप से चलाने हेतु नये समुद्री मार्गों की खोज प्रारंभ हुई। कुतुबनुमा, गतिमापक यंत्र, वेध यंत्रों की सहायता से कोलम्बस, मैगलन एवं वास्काेि डगामा आदि साहसी नाविकों ने नवीन समुद्री मार्गों के साथ-साथ कुछ नवीन देशों अमेरिका आदि को खोज निकाला। 

इन भौगोलिक खोजो के फलस्वरूप यूरोपीय व्यापार में अभतू पूर्व वृद्धि हुई। धन की बहुलता एवं स्वतंत्र राज्यों के उदय ने उद्योगो को बढ़ावा दिया। कई नवीन उद्योग स्थापित हुए। स्पेन को अमेरिका रूपी एक ऐसी धन की कुंजी मिली कि वह समृद्धि के चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया। ईसाई धर्म प्रचारक भी धर्म प्रचार हेतु नये खोजो हुए देशों में जाने लगे ।

इस प्रकार अपने व्यापारिक हितों को साधने एवं धर्म प्रचार आदि के लिए यूरोपीय देश उपनिवेशों की स्थापना की ओर अग्रसर हुए और इस प्रकार यूरोप में उपनिवेश का आरंभ हुआ।

उपनिवेश का अर्थ

किसी समृद्ध एवं शक्तिशाली राष्ट्र द्वारा अपने विभिन्न हितों को साधने के लिए किसी निर्बल किंतु प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण राष्ट्र के विभिन्न संसाधनों का शक्ति के बल पर उपभोग करना। उपनिवेशवाद में उपनिवेश की जनता एक विदेशी राष्ट्र द्वारा शासित होती है, उसे शासन में काइे राजनीतिक अधिकार नहीं होता। आर्गन्सकी के अनुसार, ‘‘वे सभी क्षेत्र उपनिवेशों के तहत आते हैं जो विदेशी सत्ता द्वारा शासित हैं एवं जिनके निवासियों को पूरे राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं हैं।’’ वस्तुत: हम किसी शक्तिशाली राष्ट्र द्वारा निहित स्वार्थवश किसी निर्बल राष्ट्र के शोषण को उपनिवेशवाद कह सकते हैं।

उपनिवेश की स्थापना के कारण

व्यापारिक क्रांति में भौगोलिक खोजों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन भौगोलिक खोजों के साथ ही उपनिवेशवाद का आरंभ हुआ। स्पेन , पुर्तगाल, डच, फ्रांस एवं इंग्लैण्ड आदि यूरोपीय देशों ने सुदूर देशों में उपनिवेश स्थापित किये। यूरोप में उपनिवेशवाद के आरंभ के कारण थे -

1. ट्रिपल G नीति - भौगोलिक खोजो के फलस्वरूप कोलम्बस द्वारा अमेरिकी की खोज ने यूरोपीय देशों में स्वर्ण जैसी बहुमूल्य धातु के संग्रह की प्रतिस्पर्द्धा आरंभ की। स्वर्ण संग्रह की प्रतिस्पर्धा की स्थिति यह थी कि समस्त यूरोप में ‘अधिक स्वर्ण, अधिक समृद्धि, अधिक कीर्ति’ का नारा बुलंद हुआ। अब समस्त यूरोपीय राष्ट्रों का प्रमुख ध्यान सोना, कीर्ति एवं ईश्वर अर्थात् Gold, Glory and God पर केन्द्रित हो गया। उपनिवेशों की स्थापना से यूरोपय देशों को सोना भी मिला, कीर्ति भी फैली एवं धर्म का प्रचार भी हुआ। अत: ट्रिपल G नीति नि:संदेह उपनिवेशों की स्थापना का एक कारण अवश्य थी।

2. कच्चे माल की प्राप्ति - व्यापारिक समृद्धि के फलस्वरूप यूरोपीय देशों में कई उद्योगो की स्थापना हुई। यूरोप में इन उद्योगो के लिए आवश्यक कच्चे माल की कमी थी। अत: यूरोपीय देशों ने कच्चे माल की प्राप्ति हेतु प्राकृतिक संसाधनों एवं अफ्रीकी एवं एशियायी देशों में उपनिवेशों की स्थापना की।

3. निर्मित माल की खपत - उद्योगों की स्थापना एवं कच्चे माल की उपलब्धता से औद्योगिक उत्पादन तीव्र गति से बढ़ा। चूँकि इस समय सभी यूरोपीय देश आर्थिक संरक्षण की नीति पर चल रहे थे। अत: इस निर्मित माल को खपाने के लिए भी उपनिवेशों की स्थापना की गयी।

4. जनसंख्या में वृद्धि - यूरोप के विभिन्न देशों में औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप नगरों की जनसंख्या में अत्याधिक वृद्धि हुई। कालांतर में अतिशेष जनसंख्या को बसाने के लिए भी उपनिवेशों की स्थापना को बल मिला।

5. प्रतिकूल जलवायु - यूरोपवासियों को व्यापारिक प्रगति एवं नवीन देशों से संपर्क के फलस्वरूप कइर् नवीन वस्तुओं का ज्ञान हुआ, आलू, तंबाकू, भुट्टा आदि का ज्ञान उन्हें पूर्वी देशों के साथ संपर्क से ही हुआ। गर्म मसाले, चीनी, कॉफी, चावल आदि के भी अब वे आदी हो गये थे। प्रतिकूल जलवायु के कारण ये सभी वस्तुएँ यूरोपीय देशों में उगाना संभव न था। अत: यूरोपीय विशेषज्ञ अंग्रेज चाहते थे कि उन्हें एसे प्रदेश प्राप्त हो जायें जहाँ इनकी खेती की जा सके। अत: अनुकूल जलवायु वाले स्थानों में उपनिवेश स्थापना की विचारधारा को बल मिला।

6. समृद्धि की लालसा - भौगोलिक खोजों के परिणामस्वरूप प्रारंभिक उपनिवेश पुर्तगाल एवं स्पेन ने स्थापित किये। इससे उनकी समृद्धि में वृद्धि हुई। अत: इनकी समृद्धि को देखते हुए समृद्धि की लालसा में अन्य यूरोपीय देश भी उपनिवेश स्थापित करते हुए अग्रसर हुए।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

2 Comments

  1. Mask use

    Some of the delay resulted from global health agencies taking time to unequivocally recommend the universal use of masks, despite the experiential wisdom of East and South East Asian countries in using masks to combat earlier respiratory virus epidemics. Would the world have been in a better place today if the World Health Organization’s call in March was “Mask! Mask! Mask!’? Perhaps, the clarion call for testing reflected the understanding at that time. We are better informed now. Yet, many in the U.S. remain impervious to evidence and advice on masks.
    The U.S. also paid little heed to social distancing. The fractious political environment bred contempt for public health advice and positioned opposition to masks and physical distancing as a libertarian assertion of personal freedom.
    The fact that ‘Super Spreader’ events promote rapid dissemination of infection from a few infected persons to many others is well known from past epidemics of respiratory viruses. This is akin to the Pareto principle, propounded by the Italian-Swiss economist Vilfredo Pareto that roughly 80% of the effects in many events come from 20% of the causes. We now know that 5-20% of the infected persons are responsible for spreading the virus to 80% of others who are infected. Since this happens mostly in crowded ‘Super Spreader’ events (where people congregate or travel together), testing is either not always possible or does not pick up the virus in asymptomatic persons.
    Yet, indoor crowding can form virus clouds from such persons in confined spaces, endangering many others. Here too, universal masking offers the best protection. If only we could roll the clock back and recommend universal masking in January or February 2020. If only the President of the United States had regularly worn a mask and told others to do so too

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