भारत के उपराष्ट्रपति का निर्वाचन, योग्यताएं, कार्य, महाभियोग

भारतीय संविधान के अनुसार भारत के लिए एक उपराष्ट्रपति की भी व्यवस्था की गई है। भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा, संविधान का अनुच्छेद (63) इसकी व्यवस्था करता है। यद्यपि भार की शासन व्यवस्था में इसका बहुत महत्व नहीं है लेकिन उपराष्ट्रपति का पद भारत में एक सम्मानित और गरिमापूर्ण पद है। उपराष्ट्रपति के पद की संकल्पना को संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से ली गई। हालांकि वहां की शासन व्यवस्था भारतीय शासन व्यवस्था से नितान्त भिन्न है। भारतीय राजनीतिक व्यवस्था ने कुछ परिवर्तनों के साथ उपराष्ट्रपति के पद को अपनाया है। संविधान निर्माता संभवतया उपराष्ट्रपति के पद को  इसलिए शासन व्यवस्था में स्थापित करना चाहते थे क्योंकि यह सर्वमान्य तथ्य है कि उपराष्ट्रपति भी कार्यपालिका का ही भाग है।

कार्यपालिका की शक्ति राष्ट्रपति में निहित मानी गयी है तथा कई बार ऐसे अवसर आ सकते हैं जबकि राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में उपराष्ट्रपति इसके समस्त कार्यभार का वहन कर सके।

भारत के उपराष्ट्रपति का निर्वाचन

उपराष्ट्रपति का निर्वाचन अनुच्छेद 66 के अनुसार राष्ट्रपति के समान ही उपराष्ट्रपति का निर्वाचन भी अप्रत्क्ष होगा और आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होगा। उपराष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों से भिन्न कर बनने वाले निर्वाचकगण के सदस्यों से निर्वाचित होगा, इसके निर्वाचन में राज्य विधान मण्डल के सदस्य भाग नहीं लेंगे। 

धारा 9 के अन्तर्गत चुनाव बैलेट पेपर द्वारा होगा परन्तु यह प्रत्यक्ष नहीं होगा। 

धारा 10-11 तथा 12 के अन्तर्गत व राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति चुनाव नियमावली 1974 के भाग.प्ट में वोटों की गणना तथा चुनाव की घोषणा का वर्णन किया गया है। नियम 31 के अनुसार निम्न आधारों पर बैलेट पेपर को रद्द किया जा सकता है- यदि वरीयता क्रम 1 चिन्हित नहीं किया गया है,  यदि वरीयता क्रम 1 एक से अधिक अभ्यर्थियों के नाम के सामने चिन्हित किया गया है और यह इतना भ्रमित है कि उसकी उचित पहचान न हो सके। 

उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों के सदस्यों से मिलकर बनने वाले निर्वाचकगण के सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होगा और ऐसे निर्वाचन में मतदान गुप्त होगा। इस संविधान के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, उपराष्ट्रपति के निर्वाचन से सम्बन्धित या संसक्त किसी विशय का विनियमन करने की शक्ति संसद को दी गई है। (अनुच्छेद 71) उपराष्ट्रपति के निर्वचन से उत्पन्न या संसक्त सभी शंकाओं और विवादों की जाँच और विनिश्चय उच्चतम न्यायालय द्वारा किया जाएगा और उसका विनिश्चय अन्तिम होगा (अनुच्छेद 71(1))। 

यदि उच्चतम न्यायालय द्वारा किसी व्यक्ति के उपराष्ट्रपति के रूप में निर्वाचन को शून्य घोषित कर दिया जाता है तो उसके द्वारा यथास्थिति, उपराष्ट्रपति के पद की शक्तियों के प्रयोग और कर्त्तव्यों के पालन में उच्चतम न्यायालय के विनिश्चय की तारीख को या उससे पहले किए गए कार्य उस घोषणा के कारण अविधिमान्य नहीं होंगे। उपराष्ट्रपति के रूप में किसी व्यक्ति के निर्वाचन को उसे निर्वाचित करने वाले निर्वाचकगण के सदस्यों में किसी भी कारण से विद्यमान किसी रिक्ति के आधार पर प्रश्नागत पर प्रश्नगत नहीं किया जाएगा।

भारत के उपराष्ट्रपति के निर्वाचन के लिए योग्यताएं

कोई व्यक्ति उपराष्ट्रपति निर्वाचित होने का पात्र तभी होगा जब वह-
  1. भारत का नागरिक है; 
  2. पैंतीस वर्ष की आयु पूरी कर चुका, और
  3. राज्य सभा का सदस्य निर्वाचित होने के लिये अर्हित
प्रत्येक उपराष्ट्रपति अपना पद ग्रहण करने से पहले राष्ट्रपति अथवा उसके द्वारा इस निमित नियुक्त किसी व्यक्ति के समक्ष विहित किए गए प्रारूप में शपथ ग्रहण करेगा। कोई व्यक्ति जो भारत सरकार के या किसी राज्य की सरकार के अधीन अथवा उक्त सरकारों में से किसी के नियंत्रण में किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी के अधीन कोई लाभ का पद धारण करता है, उपराष्ट्रपति निर्वाचित होने का पात्र नहीं होगा। परन्तु उपराष्ट्रपति के निर्वाचन के प्रयोजनार्थ कोई व्यक्ति केवल इस कारण कोई लाभ का पद धारण करने वाला नहीं समझा जाएगा कि वह संघ का राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति या किसी राज्य का राज्यपाल है अथवा संघ या किसी राज्य का मंत्री है।

राज्य सभा के सभापति के रूप में उपराष्ट्रपति को ऐसे वेतन और भत्तों का जो संसद, विधि द्वारा, नियत करे और जब तक इस निमित इस प्रकार उपबन्ध नहीं किया जाता है तब तक ऐसे वेतन और भत्तों का, जो दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं, संदाय किया जाएगा। वह उपराष्ट्रपति के रूप में कोई वेतन नहीं पाता है। जब वह राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है, तो उसको राष्ट्रपति की सभी शक्तियाँ और उन्मुक्तियाँ प्राप्त होती हैं और वह ऐसी उपलब्धियों और भत्तों का हकदार होता है जैसा कि दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट है या जैसा सांसद द्वारा विधि द्वारा अवधारित किया जाए।

इसका कारण यह है कि जिस किसी अवधि के दौरान उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के रूप मं कार्य करता है या राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन करता है उस अवधि के दौरान वह राज्य सभा के सभापति के कर्त्तव्यों का पालन नहीं करेगा और राज्य सभा के सभापति को संदेय वेतन या भत्ते का हकदार नहीं होगा।

भारत के उपराष्ट्रपति का कार्यकाल

राष्ट्रपति की तरह उपराष्ट्रपति की भी पदाविधि पांच वर्ष की है। इस सम्बन्ध में अनुच्छेद 67 में उपबन्ध इस प्रकार किया गया है। 

उपराष्ट्रपति अपने पद ग्रहण की तारीख से पाँच वर्ष की अवधि तक पद धारण करेगा। परन्तु -
  1. उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति को सम्बोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा, 
  2. उपराष्ट्रपति, राज्यसभा के ऐसे संकल्प द्वारा अपने पद से हटाया जा सकेगा। जिसे राज्य सभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत ने पारित किया है और जिससे लोक सभा सहमत है, किन्तु इस खण्ड के प्रयोजन के लिए कोई संकल्प तब तक प्रस्तावित नहीं किया जाएगा जब तक कि उस संकल्प को प्रस्तावित करने के आशय की कम से कम चौदह दिन की सूचना न दे दी गई हो, 
  3. उपराष्ट्रपति, अपने पद की अवधि समाप्त हो जाने पर भी तब तक पद धारण करता रहेगा जब तक उसका उत्तराधिकारी अपना पद धारण नहीं कर लेता है। 
इस सम्बन्ध में ध्यान देने की बात यह है कि उपराष्ट्रपति पर महाभियोग चलाने का कोई उपबन्ध नहीं किया गया है। उपराष्ट्रपति को हटाने की प्रक्रिया राष्ट्रपति को हटाने की प्रक्रिया से बहुत सरल है। राष्ट्रपति महाभियोग द्वारा हटाया जा सकता है, किन्तु ऐसी कोई औपचारिक प्रक्रिया उपराष्ट्रपति को हटाने के लिए आवश्यक नहीं है और दोनों सदनों का संकल्प ही उसको हटाने के लिए पर्याप्त है। 

राष्ट्रपति को केवल संविधान का अतिक्रमण करने के आधार पर हटाया जा सकता है जब कि उपराष्ट्रपति को किसी भी आधार पर हटाया जा सकता है। राष्ट्रपति के विरूद्ध लगाए गए आरोप का अन्वेशण किया जाना अपेक्षित है लेकिन उपराष्ट्रपति के बारे में लगाए गए आरोपों के अन्वेशण की अपेक्षा नहीं की गई है। उपराष्ट्रपति की पदावधि की समाप्ति से हुई रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन, पदावधि की समाप्ति से पहले ही पूर्ण कर लिया जाएगा।उपराष्ट्रपति की मृत्यु, पद त्याग या पद से हटाए जाने या अन्य कारण से हुई उसके पद में रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन, रिक्ति होने के पश्चात् यथाशीघ्र किया जाएगा और रिक्ति को भरने में लिए निर्वाचित व्यक्ति, अनुच्छेद 67 के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, अपने पद-ग्रहण की तारीख से पाँच वर्ष की पूरी अवधि तक पद धारण करने का हकदार होगा।

भारत के उपराष्ट्रपति के कार्य

संविधान में उपराष्ट्रपति के निम्नलिखित कार्य का वर्णन मिलता है- 

1. उपराष्ट्रपति अपने सम्पूर्ण कार्यकाल के दौरान राज्यसभा के पदेन् सभापतित्व के रूप में अपने कार्यों का निर्वहन करता है। इसके राज्यसभा के सभापति के रूप में कार्य लगभग वही होते है जो लोकसभा के अध्यक्ष के होते हैं। उपराष्ट्रपति राज्यसभा में अनुशासन बनाये रखने का काम करता है तथा जो सदस्य आज्ञा को भंग करता है वह उसे सदन से बाहर निकलवा सकता है। उसकी आज्ञा के बिना कोई सदस्य सदन के सम्मुख भाषण नहीं दे सकता है। वह सदन मे विधेयकों पर विचार व्यक्त करने के लिए सदस्यों को आमंत्रित करता है तथा वाद-विवाद के पश्चात उस पर मतदान करवाता है तथा मतदान के परिणाम की घोषणा करता है कि विधेयक पारित हो गया है या नहीं। जब किसी विधेयक पर मत बराबर-बराबर पड़ते हैं तब वह निर्णायक के रूप में अपना मत देता है। वह यह भी निश्चित करता है कि कौन-कौन से प्रश्न सदन में पूछने योग्य है और कौन से नहीं। वह किसी भी व्यक्ति को सदन में असंसदीय भाषा प्रयोग करने से मना कर सकता है। जब विधेयक राज्य सभा में पारित होते हैं तो उन विधेयकों पर उसके हस्ताक्षर आवश्यक है। वह सदन के सदस्यों के विशेषाधिकारों की रक्षा करता है।

2. संविधान के अनुच्छेद 65 (1) के उपबन्ध यह सुनिश्चित करते हैं कि यदि राष्ट्रपति की मृत्यु हो जाए, उसे महाभियागे द्वारा पदच्युत कर दिया जाए, वह बीमार हो जाए, वह त्यागपत्र दे दे या किसी अन्य कारण से देश में  अनुपस्थित हो, तो उसके स्थान पर उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करेगा। ऐसी आपातकालीन परिस्थितियां भी आ सकती है कि राष्ट्रपति का अपहरण हो जाए या उच्चतम न्यायालय उसे अयोग्य घोषित कर दिया हो तब भी उपराष्ट्रपति उसके स्थान कार्य का संचालन करेगा। राष्ट्रपति की अस्वस्थता या विदेश यात्रा के अवसरों पर भी उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के कार्यभार का वहन करता है। 

जब उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के रूप में कार्य करेगा, तब उसे वे समस्त शक्तियां और उन्मुक्तिया  प्राप्त होती है जो राष्ट्रपति को प्राप्त होती है। इस अवधि में वह राज्य सभा के सभापति के रूप में कार्य नहीं करता है और न ही इस हैसियत से वेतन प्राप्त करता है। कार्यवाहक के रूप में उपराष्ट्रपति 6 माह से अधिक कार्य नहीं कर सकता है।

उपराष्ट्रपति एक यह भी है कि जब कभी उसे राष्ट्रपति का त्यागपत्र प्राप्त हो उसकी सूचना व तत्काल लोकसभा अध्यक्ष को प्रेषित करे। वह विदेशों के साथ मैत्री संबंध बनाने व प्रगाढ़ करने के लिए राजकीय यात्रा पर जाए। वह सद्भावना यात्रा पर भी जा सकता है। वह देश की अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक व शैक्षणिक संस्थाओं से संबंध रखता है।

उपराष्ट्रपति पर महाभियोग

उपराष्ट्रपति की पदावधि 5 वर्ष की होती है परन्तु इस अवधि से पूर्व ही यदि इसका पद रिक्त होता है तो उसके निम्न तरीके होंगे- 1. वह अपने पद को स्वयं राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए त्याग सकता है। 2. उसे राज्य सभा के ऐसे प्रस्ताव द्वारा जो सदन के सभी सदस्यों के बहुमत से पारित हो तथा जिसे लोकसभा ने साधारण बहुमत ने पारित किया हो, हटाया जा सकता है, किन्तु ऐसे प्रस्ताव को पारित करने से 14 दिन पूर्व नोटिस दिया जाना आवश्यक है। उपराष्ट्रपति को अपने पद से सामान्य तरीके से हटाया जा सकता है, उसे हटाने के लिए किसी प्रकार के महाभियागे की आवश्यकता नहीं पड़ती है। उपराष्ट्रपति को हटाने के लिए लोकसभा का साधारण बहुमत ही पर्याप्त होता है तथा आरोपों की जांच भी नहीं की जाती है। प्रस्ताव पहले राज्य सभा में ही प्रस्तुत किया जाता है राष्ट्रपति को केवल संविधान के उल्लंघन की स्थिति में ही हटाया जा सकता है जबकि उपराष्ट्रपति को केवल संविधान के उल्लंघन की स्थिति में ही हटाया जा सकता है जब कभी उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति पद को कार्यवाहक की भांति ग्रहण करता है तब उसे महाभियागे द्वारा हटाया जा सकता है।

उपराष्ट्रपति की स्थिति

भारत में पदानुक्रमणिका में उपराष्ट्रपति का पद दूसरे पायदान पर आता है। इसकी अपनी शान और शौकत तथा प्रतिष्ठा है। संविधान के अनुसार उपराष्ट्रपति को कोई औपचारिक कार्यपालिका संबंधी कार्य नहीं  सौंपे गए है लेकिन उसे मंि त्रपरिषद के समस्त कार्य-कलापों की सूचना दी जाती है। यह पद राजनीतिक दलबन्दी से ऊपर है। कार्यपालिका निर्बाध रूप से बिना किसी संवैधानिक गतिरोध के कार्य करती रहे इसलिए यह पद हमारी शासन व्यवस्था के लिए आवश्यक व महत्वपूर्ण है।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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