पिट्स इंडिया एक्ट (1784 ई.)

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अगस्त, 1784 ई. में पिट का इण्डिया एक्ट पास हुआ। इसने भतू पूर्व अधिनियमों के दोषो को दूर करने का प्रयास किया। इसकी भाषा संयमित थी। इसमें कंपनी के प्रदेशांे को शभारत में ब्रिटिश अधिकृत क्षेत्रश कहा गया था।

मुख्य उपबंध

गृह सरकार के संबंध में उपबंध- 

भारतीय मामलों की देखरेख के लिए नियंत्रण मंडली की स्थापना की गयी। इसके 6 सदस्य थे। राज्य सचिव तथा वित्तमंत्री पदेन सदस्य तथा चार प्रिवी परिषद के मनोनीत सदस्य थे। तीन सदस्यों की उपस्थिति गणपूर्ति के लिए आवश्यक थी। कमिश्नर अवैतनिक होते थे जो अन्य किसी पद पर भी रह सकते थे। कंपनी के कर्मचारियों की नियुक्ति का अधिकार नियंत्रण मडं ल को नहीं दिया गया था। बाडेर् को भारतीय प्रशासन के संबंध में निरीक्षण, निर्देशन तथा नियंत्रण के अधिकार दिये गये।

भारत में केन्द्रीय सरकार से संबंधित उपबंध- 

गवर्नर जनरल की कौंसिल सदस्य संख्या को चार से घटाकर तीन कर दी गयी। एक सदस्य का समर्थन प्राप्त होने पर भी गवर्नर जनरल की इच्छा के अनुकूल निर्णय हो सकता था। अब केवल कंपनी के स्थायी कर्मचारी ही कौंसिल के सदस्य हो सकते थे। सपरिषद गवर्नर जनरल को विभिé प्रांतीय शासनों पर अधीक्षण, निर्देशन तथा नियंत्रण का पूर्ण अधिकार दिया गया। युद्ध, शांि त राजस्व, सैन्य शक्ति, देशी रियासतों से लेन-देन आदि सभी विषय इसके क्षेत्राधिकार के अंतर्गत आ गये।

प्रांतीय सरकारों से संबंधित उपबंध- 

प्रांतीय गवर्नरों की कौसिलों की सदस्य संख्या भी चार से घटाकर तीन कर दी गयी। इनमें से एक प्रांत का कमाण्डर इन चीफ भी था। केवल कंपनी के स्थायी कर्मचारी ही कौंसिल के सदस्य हो सकते थे। युद्ध, शांति या देशी रियासतों से आदान-प्रदान के बारे में अन्य प्रांतीय सरकारों को बंगाल सरकार के अधीन रखा गया था। बंगाल सरकार, उसकी आज्ञाओं की अवहले ना करने पर अधीनस्थ सरकार के पार्षदों को बर्खास्त कर सकती थी।

सामान्य उपबंध- 

कंपनी के कर्मचारियों के विरूद्ध अभियागे ां े की जाँच के लिए इंग्लैण्ड में एक न्यायालय का संगठन किया गया। इसमें 4 लार्डसभा के और 6 लाके सभा के सदस्य होगं ।े भारत में उपनिवेश के विस्तार को राष्ट्र की प्रतिष्ठा और नीति के विरूद्ध बतलाया गया। लेकिन यह शपवित्र इच्छाश सिद्ध हुई क्याेिं क ब्रिटिश उपनिवेश का विस्तार होता ही गया। कंपनी के कर्मचारियों को देशी रियासतों से अधिक संबंध स्थापित करने में रोक लगा दी गई।

अधिनियम का संवैधानिक महत्व

पिट्स इंडिया एक्ट भारतीय संविधानिक विकास के इतिहास में एक महत्वपूर्ण कदम था। यह 1858 ई. तक भारतीय संविधान का आधार रहा। इसने ईस्ट इंडिया कंपनी पर ब्रिटिश संसद के नियंत्रण लिए एक स्थायी माध्यम की रचना की। इसके लिए एक नियंत्रण मंडल की स्थापना की गयी जिस पर कंपनी के प्रशासन का पूर्ण उत्तरदायित्व सौंपा गया। इलबर्ट के शब्दों में, पिट ने शशकंपनी को ब्रिटिश सरकार को प्रतिनिधिक संस्था के प्रत्यक्ष तथा स्थायी नियंत्रण में रखने के सिद्धांतशश को अपनाया। श्रीराम शर्मा के विचारानुसार शशपिट्स इंडिया एक्ट ने इंग्लैण्ड में भारतीय मामलों के निर्देशन के मौलिक सिद्धांत ही बदल दिया, कंपनी मंडल शक्तिहीन हो गया तथा संचालक मंडल ब्रिटिश सरकार के अधीन हो गया।

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