भाषा की उत्पत्ति एवं विशेषताएं

अनुक्रम

भाषा की उत्पत्ति के सिद्धांत

भाषा वैज्ञानिकों ने भाषा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विभिन्न मतों का उल्लेख किया है। जिनमें प्रमुख इस प्रकार हैं - 

1. दिव्य उत्पत्ति का सिद्धांत

भाषा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में यह सबसे प्राचीन सिद्धांत है। इस सिद्धांत को मानने वाले भाषा को ईश्वर की देन मानते है। इस प्रकार न तो वे भाषा को परम्परागत मानते है और न मनुष्यों द्वारा अर्जित। इन विद्वानों के अनुसार भाषा की शक्ति मनुष्य अपने जन्म के साथ लाया है और इसे सीखने का उसे प्रयत्न करना नही पड़ा है। इस सिद्धांत को मानने वाले विभिन्न धर्म ग्रन्थों का उदाहरण अपने सिद्धांत के समर्थन में देते है। हिन्दू धर्म मानने वाले वेदों को, इस्लाम धर्मावलम्बी कुरान शरीफ को, ईसाई बाइबिल को। वे भाषा को मनुष्यों की गति न मानकर ईष्वर निर्मित मानते है और इन ग्रन्थों में प्रयुक्त भाषाओं को संसार की विभिन्न भाषाओं की आदि भाषायें मानते है। इसी प्रकार बौद्व अपने धर्मग्रन्थों की भाषा पाली को मूल भाषा मानते है।

2. धातु सिद्धांत-  

भाषा की उत्पत्ति सम्बन्धी दूसरा प्रमुख सिद्धांत धातु सिद्धांत है। सर्वप्रथम प्लेटो ने इस ओर संकेत किया था। परन्तु इसकी स्पष्ट विवेचना करने का श्रेय जर्मन विद्वान प्रो0 हेस को है। इस सिद्धांत के अनुसार विभिन्न वस्तुओं की ध्वन्यात्मक अभिव्यक्ति प्रारम्भ में धातुओं से होती थी। इनकी संख्या आरम्भ में बहुत बडी थी परन्तु धीरे धीरे लुप्त होकर कुछ सौ ही धातुऐं रही। प्रो. हेस का कथन है कि इन्ही से भाषा की उत्पत्ति हुई है।

3. संकेत सिद्धांत-  

यह सिद्धांत अधिक लोकप्रिय नही हुआ क्योकि इसका आधार काल्पनिक है और यह कल्पना भी आधार रहित है। इस सिद्धांत के अनुसार सर्वप्रथम मनुष्य बन्दर आदि जानवरों की भॉति अपनी इच्छाओं की अभिव्यक्ति भावबोधक ध्वनियों के अनुकरण पर शब्द बनायें होगें। तत्पष्चात उसने अपने संकेतों के अंगो के द्वारा उन ध्वनियों का अनुकरण किया होगा। इस स्थिति में स्थूल पदार्थो की अभिव्यक्ति के लिए शब्द बने होगे। संकेत सिद्धांत भाषा के विकास के लिए इस स्थिति को महत्वपूर्ण मानता है। उदाहरण के लिए पत्ते के गिरने से जो ध्वनि होती है। उसी आधार पर “पत्ता” शब्द बन गया।

4. अनुकरण सिद्धांत

भाषा उत्पत्ति के इस सिद्धांत के अनुसार भाषा की उत्पत्ति अनुकरण के आधार पर हुई है। इस सिद्धांत के मानने वाले विद्वानों का तर्क है कि मनुष्य ने पहले अपने आसपास के जीवों और पदार्थो की ध्वनियों का अनुकरण किया होगा। और फिर उसी आधार पर शब्दों का निर्माण किया होगा। उदाहरण के लिए काऊॅं-काऊॅं ध्वनि निकालने वाले पक्षी का नाम इसी ध्वनि के आधार पर संस्कृत में काक, हिन्दी में कौआ तथा अंगेजी में crow पडा। इसी प्रकार बिल्ली की “म्याऊॅ” ध्वनि के आधार पर चीनी भाषा में बिल्ली को “मियाऊ” कहा जाने लगा। इस प्रकार यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया गया है कि भाषा की उत्पत्ति अनुकरण सिद्वान्त पर हुई है।

5. अनुसरण सिद्धांत

यह सिद्धांत भी अनुकरण सिद्धांत से मिलता है। इस सिद्धांत के मानने वालों का भी यही तर्क है कि मनुष्यों ने अपने आस-पास की वस्तुओं की ध्वनियों के आधार पर शब्दों का निर्माण किया है। इन दोनों सिद्धान्तों में अन्तर इतना है कि जहॉ अनुकरण सिद्धांत में चेतन जीवों की अनुकरण की बात थी, वहीं इस सिद्धांत में निर्जीव वस्तुओं के अनुकरण की बात है। उदाहरण के लिए नदी की कल-कल ध्वनि के आधार पर उसका नाम कल्लोलिनी पड गया। इस प्रकार हवा से हिलते दरवाजे की ध्वनि के आधार पर लड़खड़ाना,बड़बड़ाना जैसे शब्द बने। अंगे्रजी के Murmur, Thunder जैसे शब्द भी इसी अनुसरण सिद्धांत के आधार पर बनें।

6. श्रम परिहरण सिद्धांत-

मनुष्य सामाजिक प्राणी है और परिश्रम करना उसकी स्वाभाविक विषेषता है। श्रम करते समय जब थकने लगता है तब उस थकान को दूर करने के लिए कुछ ध्वनियों का उच्चारण करता है। न्वायर (Noire) नामक विद्वान ने इन्ही ध्वनियों को भाषा उत्पत्ति का आधार मान लिया है। उसके अनुसार कार्य करते समय जब मनुष्य थकता है तब उसकी सांसे तेज हो जाती है। सॉसों की इस तीव्र गति के आने जाने के परिणामस्वरूप मनुष्य के वाग्यंत्र की स्वर -तन्त्रियॉ कम्पित होने लगती है और अनेक अनुकूल ध्वनियॉं निकलने लगती है फलस्वरूप मनुष्य के श्रम से उत्पन्न थकान बहुत कुछ दूर हो जाती है। इसी प्रकार ठेला खींचने वाले मजदूर हइया ध्वनि का उच्चारण करते है। इस सिद्धांत के मानने वाले इन्ही ध्वनियों के आधार पर भाषा की उत्पत्ति मानते है।

7. मनोभावसूचक सिद्धांत

भाषा उत्पत्ति का यह सिद्धांत मनुष्य की विभिन्न भावनाओं की सूचक ध्वनियों पर आधारित है। प्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक मैक्समूलर ने इसे पूह-पूह सिद्धांत कहा है। इस सिद्धांत के अनुसार मनुष्य विचारशील होने के साथ साथ भावनाप्रधान प्राणी भी है। उसके मन में दुःख, हर्ष, आश्चर्य आदि अनेक भाव उठते है। वह भावों को विभिन्न ध्वनियों के उच्चारण के द्वारा प्रकट करता है जैसे प्रसन्न होने पर अहा । दुखी: होने पर आह । आश्चर्य में पडने पर अरे । जैसी ध्वनियों का उच्चारण करता है ।, इन्ही ध्वनियों के आधार पर यह सिद्धांत भाषा की उत्पत्ति मानता है।

भाषा की विशेषताएं

जब हम भाषा का संदर्भ मानवीय भाषा से लेते हैं । तो यह जानना आवश्यक हो जाता है कि मानवीय भाषा की मूलभूत विशेषताएं या अभिलक्षण कौन-कौन से हैं । ये अभिलक्षण ही मानवीय भाषा को अन्य भाषिक संदर्भों से पृथक करते हैं । हॉकिट ने भाषा के सात अभिलक्षणों का वर्णन किया है । अन्य विद्वानों ने भी अभिलक्षणों का उल्लेख करते हुए आठ या नौ तक संख्या मानी है । मूल रूप से 9 अभिलक्षणों की चर्चा की जाती है -
  1. यादृच्छिकता-  ‘यादृच्छिकता़’ का अर्थ है -माना हुआ । यहां मानने का अर्थ व्यक्ति द्वारा नहीं वरन् एक विशेष समूह द्वारा मानना है । एक विशेष समुदाय किसी भाव या वस्तु के लिए जो शब्द बना लेता है उसका उस भाव से कोई संबंध नहीं होता । यह समाज की इच्छानुसार माना हुआ संबंध है इसलिए उसी वस्तु के लिए भाषा में दूसरा शब्द प्रयुक्त होता है ।भाषा में यह यादृच्छिकता शब्द और व्याकरण दोनों रूपों में मिलती है । अत: यादृच्छिकता भाषा का महत्वपूर्ण अभिलक्षण है । 
  2. सृजनात्मकता-  मानवीय भाषा की मूलभूत विशेषता उसकी सृजनात्मकता है। अन्य जीवों में बोलने की प्रक्रिया में परिवर्तन नहीं होता पर मनुष्य शब्दों और वाक्य-विन्यास की सीमित प्रक्रिया से नित्य नए नए प्रयोग करता रहता है ।सीमित शब्दों को ही भिन्न भिन्न ढंग से प्रयुक्त कर वह अपने भावों को अभिव्यक्त करता है । यह भाषा की सृजनात्मकता के कारण ही संभव हो सका है । सृजनात्मकता को ही उत्पादकता भी कहा जाता है । 
  3. अनुकरणग्राहता-  मानवेतर प्राणियों की भाषा जन्मजात होती है ।तथा वे उसमें अभिवृद्धि या परिवर्तन नहीं कर सकतें ंिकंतु मानवीय -भाषा जन्मजात नहीं होती । मनुष्य भाषा को समाज में अनुकरण से धीरे धीरे सीखता है ।अनुकरण ग्राह्य होने के कारण ही मनुष्य एक से अधिक भाषाओं को भी सीख लेता है ।यदि भाषा अनुकरण ग्राह्य न होती तो मनुष्य जन्मजात भाषा तक ही सीमित रहता । 
  4. परिवर्तनशीलता- मानव भाषा परिवर्तनशील होती है । वही शब्द दूसरे युग तक आते आते नया रूप ले लेता है ।पुरानी भाषा में इतने परिवर्तन हो जाते हैं। कि नई भाषा का उदय हो जाता है ।संस्कृत से हिन्दी तक की विकास यात्रा भाषा की परिवर्तनशीलता का उदाहरण है । 
  5. विविक्तता-  मानव भाषा विच्छेद है । उसकी संरचना कई घटकों से होती है ।ध्वनि से शब्द और शब्द से वाक्य विच्छेद घटक होते है। इस प्रकार अनेक इकाइयों का योग होने के कारण मानव भाषा को विविक्त कहा जाता है । 
  6. द्वैतता-  भाषा में किसी वाक्य में दो स्तर होते हैं । प्रथम स्तर पर सार्थक इकाई होती है ।और दूसरे स्तर पर निरर्थक ।कोई भी वाक्य इन दो स्तरों के योग से बनता है ।अत: इसे द्वैतता कहा जाता है । भाषा में प्रयुक्त सार्थक इकाइयों को रूपिम और निरर्थक इकाइयों को स्वनिम कहा जाता है ।स्वनिम निरर्थक इकाइयां होने पर भी सार्थक इकाइयों का निर्माण करती हैं ।इसके साथ ही ये निरर्थक इकाइयांॅ अर्थ भेदक भी होती हैं ।जैसे क+अ+र+अ में चार स्वनिम है जो निरर्थक इकाइयां हैं पर कर रूपिम सार्थक इकाई हैं । इसे ही ख+अ+र+अ कर दे तो खर रूपिम बनेगा किंतु ‘कर’ और ‘खर’ में अर्थ भेदक इकाई रूपिम नहीं स्वनिम क और ख है। इस प्रकार रूपिम अगर अर्थद्योतक इकाई है तो स्वनिम अर्थ भेदक । इन दो स्तरों से भाषा की रचना होने के कारण भाषा को द्वैत कहा गया है । 
  7. भूमिकाओं का पारस्परिक परिवर्तन- भाषा में दो पक्ष होते हैं - वक्ता और श्रोता। वार्ता के समय दोनों पक्ष अपनी भूमिका को परिवर्तित करते रहते हैं। वक्ता श्रोता और श्रोता वक्ता होते रहते हैं। इसे ही भूमिकाओं का पारस्परिक परिवर्तन कहते है । 
  8. अंतरणता- मानव भाषा भविष्य एवं अतीत की सूचना भी दे सकती है ।तथा दूरस्थ देश का भी । इस प्रकार अंतरण की विशेषता केवल मानव भाषा में है । 
  9. असहजवृत्तिकता-  मानवेतर भाषा प्राणी की सहजवृत्ति आहार निद्रा भय, मैथुन से ही संबंद्ध होती है और इसके लिए वे कुछ ध्वनियों का उच्चारण करते हैं । किंतु मानव भाषा सहजवृत्ति नहीं होती है ।वह सहजात वृत्तियों से संबंधित नही होती । भाषा के ये अभिलक्षण मानवीय भाषा को अन्य ध्वनियों या मानवेत्तर प्राणियों से अलग करने में समर्थ हैं ।

भाषा के विविध रूप

भाषा के स्वरूप पर विचार करने पर यह बात स्पष्ट हो जाती है कि भाषा के अनेक प्रकार होते है । मुख्यत: इतिहास ,क्षेत्र, प्रयोग, निर्माण, मानकता और मिश्रण के आधारों पर भाषा के बहुत से रूप होते हैं ।उदाहरण के लिए इतिहास के आधार पर अनेक भाषाओं की जन्मदात्री मूलभाषा जैसे संस्कृत ग्रीक आदि को प्राचीन भाषा; पाली ,प्राकृत को मध्यकालीन भाषा तथा हिंदी, मराठी, बंगला को आधुनिक भाषा से इंगित किया जाता है । क्षेत्र के आधार पर भाषा का सबसे छोटा रूप बोली होती है । इनमें से प्रमुख भाषा रूप हैं -

1. मूलभाषा -

‘‘मूलभाषा’’भाषा का वह प्राथमिक स्वरूप है जो स्वयं किसी से प्रसूत नहीं होता अपितु वह दूसरों को ही प्रसूत करता है ।भाषा की उत्पत्ति अत्यंत प्राचीन काल में उन स्थानों पर हुई होगी जहां अनेक लोग एक साथ रहते रहे होंगे । ऐसे स्थानो में से किसी एक स्थान की भाषा की निर्मिति की पहली प्रक्रिया मूलभाषा कहलाती है ।जिसने कालांतर में ऐतिहासिक एवं भौगोलिक कारणों से अनेक भाषाओं ,बोलियों तथा उपबोलियों को जन्म दिया होगा ।

2. क्षेत्रीय बोलिया -

जब हम एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं तो हमें भाषा का परिवर्तन समझ में आने लगता है । यह परिवर्तन जैेसे जैसे दूरियां बढती हैं स्पष्ट समझ में आने लगता है ।भाषा के ऐसे सीमित एवं क्षेत्र विशेष के रूप को बोली कहा जाता है । जो ध्वनि,रूप ,वाक्य अर्थ, शब्द तथा मुहावरे आदि की दृष्टि से भिन्न हो सकती है ।इस प्रकार जब एक भाषा के अंतर्गत कई अलग अलग रूप विकसित हो जाते हैं तो उन्हें बोली कहते हैं । ये बोलियां बुंदेली, बघेली, भोजपुरी, मालवी आदि हैं । 

3. व्यक्ति बोली -

भौगोलिक दृष्टि तथा सामाजिक इकाई के आधार पर भाषा व्यवहार का लघुतम रूप व्यक्ति बोली है । किसी भाषा समाज में आने वाला व्यक्ति अपने कुछ विशिष्टताओं के कारण भाषिक विभेद को प्रदर्शित करता है । यद्यपि यह विभेद ऐसा नहीं होता कि अपने समाज के अन्य व्यक्तियों के द्वारा समझा न जा सके । मनुष्य में भाषा सीखने की प्राकृतिक क्षमता है । किंतु सीखने का कार्य, किसी भाषा समाज में ही हो सकता है । जिस समाज में वह जन्म लेता है जहां पलता है । वहां की भाषा वह सीख लेता है ।वह केवल छोटे से समूह में प्रचलित बोली की ही नहीं, बल्कि व्यापक धरातल पर प्रयुक्त मानक भाषा तथा आवश्यकतानुसार अन्य भाषाओं का प्रयोग करता है ।

4. अपभाषा या विकृत भाषा -

अंग्रेजी के स्लैग का हिंदी रूपांतरण है । किसी भाषा समाज में एक निश्चित शिष्टाचार से च्युत भाषा संरचना को शिष्ट भाषा कहते हैं। इसका प्रचलन विशेष श्रेणी या सम वगोर्ं में होता है । अपभाषा में अशुद्धता तथा अश्लीलता का समावेश हो जाता है ।इसके प्रयोक्ता प्राय: शब्द निर्माण या वाक्य निर्माण में व्याकरण के नियमों को ओझल कर देते हैं ।अपभाषा में सामान्य संकेतिक अर्थ का अपकर्ष दिखाई देता है। वैसे अपभाषा के कुछ प्रयोग अपनी सशक्त व्यंजना के कारण शिष्ट भाषा में स्वीकृत हो जाते हैं । मक्खन लगाना, चमचागिरी आदि इसी तरह के प्रयोग हैं । गाली - गलोैच को भी अपभाषा का उदाहरण माना जा सकता है ।1960-70 के बीच कविता के कुछ ऐसे आंदोलन चले जिनमें अपभाषा का खुलकर व्यवहार किया गया । हिंदी के कुछ उपन्यासों तथा कहानियों में भी अपभाषा का प्रयोग दृष्टिगोचर होता है ।

5. व्यवसायिक भाषा -

व्यवसायिक वर्गों के आधार पर भाषा की अनेक श्रेणियां बन जाती है । किसान, बढ़ई, डांॅक्टर, वकील, पंडित, मौलवी,दुकानदार आदि की भाषा में व्यवसायिक शब्दावलियों के समावेश के कारण अंतर हो जाता है । इस व्यवसायिक शव्दावली की स्थिति बहुत कुछ पारिभाषिक होती है ।कुछ व्यवसायों में बहुप्रचलित शब्दावली के स्थान पर विशिष्ट अर्थसूचक नयी शब्दावली गढ़ ली जाती है । इसकी स्थिति बहुत कुछ सांकेतिक भाषा जैसी होती है । कभी कभी यह अपभाषा की कोटि में पहुॅंच जाती है । कहारों की भाषा (वधू की डोली ढोते समय ) इसी तरह की होती है । बैल के व्यवसायी आपस में एक भाषा बोलते हैं । जिसे ग्राहक बिल्कुल नही समझ पाता है । मौलवी साहव जब हिंदी बोलते हैं तो उनका झुकाव प्राय: अरबी- फारसी, निष्ठ भाषा की ओर रहता है और पंडित जी की हिंदी- संस्कृत की ओर झुकी रहती है ।

6. कूट भाषा -

इसे अंग्रेजी में कोड लेंग्वेज कहते हैं । कूट भाषा का प्रयोग पांडित्य प्रदर्शन, मनोरंजन,तथा गोपन के लिए होता है । सेना में कूट भाषा का प्रयोग गोपन के लिए होता है । इसमें शब्दों को सर्वप्रचलित अर्थ के स्थान पर नये अर्थो से जोड़कर प्रयुक्त किया जाता है इनका अर्थ वही व्यक्ति समझ पाता है जिसे पहले से बता दिया होता है । सूर ने साहित्यिक चमत्कार दिखाने के लिए कूट के पदों की रचना की है ।जिनका अर्थ साहित्य-शास्त्रियों द्वारा ही प्रस्फुटित किया जा सकता है ।

7. कृत्रिम भाषा -

यह निर्मित भाषा है संसार में अनेक भाषाएं हैं । एक भाषा-भाषी दूसरे भाषा-भाषी को बिना पूर्व शिक्षा के समझ नहीं पाता । भाषा भेद के कारण जीवन के विविध क्षेत्र जैसे - व्यवसाय, राजनीति, भ्रमण, शिक्षा आदि में बड़ी कठिनाई पैदा हो जाती है । इस समस्या के निवारण के लिए ‘ऐसपेरन्तो’नामक कृत्रिम भाषा बनाई गई । यूरोप में कुछ लोग इस भाषा केा सीखते भी हैं । इस भाषा के निर्माण में जो उद्देश्य था वह निश्चित ही महत्वपूर्ण था । किंतु जनाधार के अभाव में यह भाषा उस उद्देश्य को पूरा करने में समर्थ नहीं हो सकी । कृत्रिम भाषा में सामान्य बातचीत ही हो सकती गंभीर चिंतन या साहित्य लेखन नहीं हो सकता । भाषा एक तरह से मानव के संस्कार का अभिन्न हिस्सा है, इसलिए उसकी सृजनशीलता भी मातृभाषा में ही घटित होती है । अपनी मातृभाषा के उच्चारणात्मक संस्कार के साथ यदि ऐसपेरन्तो का उच्चारण करेगा तो उसमें भी परिवर्तन ला देगा । इस तरह पुन: भाषा की एकता खंडित हो जायेगी ।

8. मिश्रित भाषा -

दो भाषाओं के मिश्रण से इसका निर्माण होता है । इससे सामान्य कार्य -व्यवसाय आदि किये जाते हैं । चीन में अंग्रेजी शब्दों को चीनी उच्चारण तथा व्याकरण के अनुसार ढालकर पीजिन का निर्माण किया गया है । दक्षिण अफ्रीका में डच + अंग्रेजी+ बांटू से मिश्रित भाषा का निर्माण हुआ है । कभी-कभी दो भाषाओं का मिश्रण इतना सबल तथा आवश्यक हो जाता है कि एक समुदाय अपनी मातृभाषा को छोड़ देता है जमेका, त्रिनीनाद, मारीषॅस,विभिन्न समुदायों के मिलन से संकर भाषाऐं बन गयी हैं ।इन भाषाओं को अंग्रेजी मे क्रियोल (संकर) कहा जाता है । इंडोनेशिया की शिशूल विश्व की सर्वाधिक संकर भाषा मानी गयी । उर्दू को भी संकर भाषा कहा जा सकता है ।

9. मानक भाषा -

भाषा का आदर्श रुप उसे माना जाता है जिसमें एक बड़े समुदाय के लोग विचार विनिमय करते हैं। अर्थात् इस भाषा का प्रयोग शिक्षा, शासन और साहित्य रचना के लिए होता है। अंग्रेजी, रूसी, फ्रांसीसी और हिन्दी इसी प्रकार की भाषाएं है। यह व्याकरणबद्ध होती है। ;

Comments