जल प्रदूषण के कारण, प्रकार और इसके स्रोत

जल प्रदूषण

आप जानते होंगे कि पृथ्वी का 70 प्रतिशत भाग पानी है और केवल 2.5 प्रतिशत ही ताजा पानी है, यानी उपयोग करने योग्य। जल मानव जाति और पर्यावरण के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। जैसे-जैसे पृथ्वी की आबादी बढ़ रही है, इस ग्रह के जल संसाधनों पर लोगों का दबाव बढ़ रहा हैं। 

आइए अब हम जल प्रदूषण को समझते हैं। जल प्रदूषण तब होता है जब प्रदूषकों (रसायन या रासायनिक कण जो पानी दूषित करते हैं) को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जल निकायों में बिना पर्याप्त उपचार के विसर्जित कर दिया जाता है। अतः, सरल भाषा में हम कह सकते हैं कि यदि पानी की गुणवत्ता खराब है और वह मानव या अन्य जीवित प्राणियों के लिए असुरक्षित या हानिकारक है, जल प्रदूषण कहा जाता है।

जल प्रदूषण के प्रकार और इसके स्रोत 

जल प्रदूषण के तीन मुख्य प्रकार हैंः भूजल प्रदूषण, भूतल जल प्रदूषण और समुद्री जल प्रदूषण।

भूजल प्रदूषण और इसके स्रोत 

पानी की बढ़ती मांग के कारण समय बीतने के साथ भूजल का उपयोग बढ़ रहा है। शहरी केंद्रों में मानव सघनता ने इन जल स्रोतों पर एक बड़ा दबाव बनाया है। भूजल प्रदूषण हानिकारक मानव गतिविधियों के कारण हो रहा है जैसे खतरनाक अपशिष्ट निस्तारण प्रणाली, दोषपूर्ण कृषि प्रथाओं और उर्वरक के अनुचित उपयोग भूजल प्रदूषण का कारण है । 

प्रदूषक जो भूजल की गुणवत्ता को प्रभावित करता है उसमें रोगजनकों, नाइट्रोजन, क्लोराइड, सल्फेट, भंग कार्बनिक कार्बन, भारी धातु, हलोजनयुक्त सॉल्वैंट्स, ईंधन और स्नेहक, आदि शामिल हैं जो विभिन्न स्रोतों से उत्पन्न होते हैं। प्रदूषक के स्रोतों में भूमिगत भंडारण टैंक, सेप्टिक टैंक, लैंडफिल साइट, बड़ी औद्योगिक सुविधाएं, उर्वरक अनुप्रयोग, फैल, कीटनाशक अनुप्रयोग, खतरनाक अपशिष्ट साइटें, सतह के अशुद्धियां, खारे पानी की घुसपैठ, सीवर लाइन, उथले इंजेक्शन कुएं, खनन और खान जल निकासी, अपशिष्ट ढेर, आदि सभी ऐसे स्रोत हैं जो प्रदूषक पैदा करते हैं जो भूजल की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। 

भंडारण टैंक, सेप्टिक टैंक और लैंडफिल साइट इन सभी प्रदूषकों में प्रमुख हैं। 

सतही जल प्रदूषण और इसके स्रोत 

सतही जल प्रदूषण में प्रमुख जल स्रोतों का प्रदूषण शामिल है। इसमें महासागरीय और भूमि की सतह दोनों शामिल है और दोनों प्रदूषण के लिए आपस में जुड़े हुए हैं क्योंकि अधिकांश प्रदूषकों को नदी द्वारा महासागरों में ले जाया जाता है। नदी, झील, तालाब आदि सभी मानवजनित गतिविधियों के कारण प्रदूषित हैं। मानव विभिन्न तरीकों से प्रदूषित पानी का निर्वहन करता है। निर्माण गतिविधियों,निर्माण बांधों और जलाशयों, मनोरंजक कार्यों, औद्योगिक उपयोगों, सिंचाई, सीवरों आदि से भारी मात्रा में प्रदूषक पैदा होते हैं जो पानी के इन सभी स्रोतों को प्रदूषित करने के लिए पर्याप्त है। 

सतही जल निकाय जैसे नदी, झील, तालाब इत्यादि मुख्य रूप से मानवजनित गतिविधियों के कारण प्रदूषित होते हैं। पानी बिना पूर्ण या आंशिक उपचार के सीधे नदियों में जा रहा है। कीटनाशक, शाकनाशी और रसायन, मल या पशु सम्बंधित कार्य से उत्पन्न बैक्टीरिया, खाद्य प्रसंस्करण अपशिष्ट जैसे रोगाणु, औद्योगिक अपशिष्टों से निकली भारी धातुएं और रासायनिक अपशिष्ट जैसे सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रेट और फॉस्फेट सहित उर्वरक और तूफानी जल अपवाह का गन्दा जल आदि भूमि क्षेत्रों पर सतही जल के प्रमुख प्रदूषक हैं। 

समुद्री जल प्रदूषण और इसके स्रोत 

महासागरों में मालवाहक जहाजों के विशाल परिवहन, तेल का फैलना और तेल खनन, सैन्य प्रथाएं और हथियारों के परीक्षण आदि के कारण महासागर का पानी प्रदूषित है। ये मानवजनित गतिविधियाँ महासागरों में प्रदूषण पैदा कर रही हैं। ज्वालामुखी विस्फोट जैसी प्राकृतिक गतिविधियांए महासागरों में भारी मात्रा में कचरे का निर्वहन पानी की रासायनिक और पारिस्थितिक स्थिति को बदल देता हैं। समुद्र के पानी की रासायनिक और जैविक संरचना को प्रभावित करने वाले प्रदूषक निम्नलिखित हैंः पारा, आर्सेनिक, क्रोमियम, सेलेनियम आदि। ये धातुएं हैं जो समुद्र के 8 पानी को ख़राब करती हैं। 

जल प्रदूषण के कारण

जल प्रदूषण के प्रमुख कारण इस प्रकार है -

1. औद्योगिक अपशिष्ट: उद्योगों का अशोधित कचरा और घरेलू सीवर जल स्रोतों में डाल दिया जाता है जो उन्हें उपयोग के लिए अनुपयुक्त बनाता है और जलीय जीवों के लिए भी हानि उत्पन्न करता है। जल प्रदूषण का एक कारण घरेलू कूड़ा कचरा जल में बहा दिया देना है एवं घरेलू तथा सार्वजनिक शौचालयों से निकला मल-मूत्र जब नदी नालों तथा तालाबों में मिल जाता है तो जल प्रदूषण का कारण बनता है।

2. मानव स्वच्छता गतिविधियाँ : नहाना, कपड़े धोना, आदि जल स्रोतों को दूषित कर देता है क्योंकि सफाई कार्य के लिए प्रयुक्त साबुन में हानिकारक रसायन होते हैं।

3. रासायनिक उर्वरक-किसानों द्वारा प्रयुक्त कीटनाशक और उर्वरक जल स्रोतों में बहा दिए जाते हैं और जलीय पौधों और जीव के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। यह अवसर मिलने पर खाद्य श्रृंखला के माध्यम से मानव शरीर में पहुँच सकता है।

4. अन्य कारण- जल प्रदूषण के अन्य कारणों में मृत जले ,अधजले शवों को बहाना,अस्थि विसर्जन करना नदी नालों में साबुन लगाकर नहाना एवं कपड़े धोना ,नदियों के किनारे मल-मूत्र का त्याग करना तथा धार्मिक अन्धविश्वास आदि शामिल हैं।

    जल प्रदूषण के प्रभाव

    1. जहरीले रसायनों वाले औद्योगिक अपशिष्ट जल निकायों में छोड़ दिए जाते हैं, और इसे पीने और अन्य गतिविधियों के लिए अनुपयुक्त बना देता है।
    2. सजीव जीवों एवं मनुष्य पर हानिकारक प्रभाव डालते हैं, जिसके कारण मृत्यु हो जाती है या फिर किडनी, यकृत, फेफड़ों, मस्तिष्क एवं प्रजनन तंत्र पर कम घातक रोग जनित प्रभाव देते हैं।
    3. स्त्रावों के प्रदूषण द्वारा जल में आक्सीजन की कमी हो जाती है, जिसके कारण जलीय जीवजात एवं जलीय प्राणी मर जाते हैं। 
    4. औद्योगिक कूडे़ कचरे में विषैले रासायनिक एवं सूक्ष्म धातुयी कण पाये जाते हैं जिनसे यकृत, आमाशायिक एवं मस्तिष्क संबंधी अनेक रोग तथा कैंसर रोग उत्पन्न होते हैं। 
    5. औद्योगिक बहि:स्त्रावों की जल में उपस्थिति के कारण मछलियों, पशु, मवेशी, जलीय जीव जन्तु एवं मनुष्य की मृत्यु हो जाती है। प्राणियों के अण्डे, लार्वल एवं अन्य अवस्थाएँ नष्ट हो जाती है। 
    6. घरेलू बाहित मल, मल आदि से फास्फेट्स एवं नाइटे्रट्स (Nitrates) की मात्रा में अधिकता जल में हो जाती है और उर्वरकों, पेस्टिसाइड्स, कीटनाशी रसायन के अतिरिक्त, नाइटे्रट्स, फास्फेट्स आदि खेतों, तालाबों, जलाशयों, नदियों के जल में पहुँचकर नील हरित शैवाल (Blue green algae) की संख्या अधिक हो जाती है, इसके कारण जल में ऑक्सीजन की मात्रा में कमी हो जाती है। इसके कारण नदियों एवं अन्य जलीय जीवजात, प्राणी मर जाते है। 
    7. रेडियाधर्मी प्रदूषण द्वारा जलीय वनस्पति एवं प्राणियों और अप्रत्यक्ष रूप से मनुष्य के रोग उत्पन्न हो जाता है।
    8. साइनाइड्स (Cynides) अमोनिया एवं फीनोल जैसे विषाक्त पदार्थों द्वारा खाद्य श्रृंखला एवं परभक्षी प्रभावित होते हैं।

    जल प्रदूषण नियंत्रण के उपाय

    1. जल प्रदूषण रोकने के लिए लोगों के बीच जागरूकता फैलानी चाहिए।
    2. घरेलू कूडे़ कचरे का युक्त वैज्ञानिक परिष्कृत साधनों द्वारा निकास करना चाहिए। 
    3. विशिष्ट विषों, विषाक्त पदार्थों को नि:स्पन्दन (Filtration) अवसादन एवं रासायनिक क्रियाओं द्वारा निकाल कर बहि:स्त्रावों को नदी एवं अन्य जल स्रोतों में मिलाना चाहिए।
    4. कुओं, तालाबों एवं अन्य जल स्रोत के साधनों में कपडे़ धोने, अन्दर घुसकर पानी लेने, पशुओं के नहलाने तथा मनुष्य के नहाने, बर्तनों को साफ करने पर प्रतिबंध लगाना चाहिए तथा नियम का कठोरता से पालन होना चाहिए। 
    5. कुओं, तालाबों एवं अन्य जल स्रोतों से प्राप्त जल का जीवाणुनाशन/विसंक्रमण (Sterilization) करना चाहिए 
    6. कृषि, खेतों, बगीचों में कीटनाशक, जीवनाशक एवं अन्य रासायनिक पदार्थों, उर्वरकों को कम से कम उपयोग करने के लिए उत्साहित करना चाहिए, जिससे कि यह पदार्थ जल स्रोतों में नहीं मिल सकें और जल को कम प्रदूषित करें। 
    7. तालाबों एवं अन्य जल स्रोतों की नियमित जाँच/परीक्षण, सफाई, सुरक्षा करना आवश्यक है। 
    8. शासन द्वारा निर्धारित जल प्रदूषण नियंत्रण कानूनों को कठोरता से पालन करना एवं करवाना चाहिए।

    Bandey

    मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं। मैंने अपनी पुस्तकों के साथ बहुत समय बिताता हूँ। इससे https://www.scotbuzz.org और ब्लॉग की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

    2 Comments

    Previous Post Next Post