लोकतंत्र का अर्थ, परिभाषा, प्रकार, सिद्धांत, गुण एवं दोष

लोकतंत्र का अर्थ - लोकतंत्र अंग्रेजी शब्द “डेमोक्रेसी” का हिन्दी पर्याय है। डेमोक्रेसी शब्द मूल रूप से ग्रीक भाषा के डेमोक्रेशिया (demokratisa) से लिया गया है, जो दो शब्दों डेमॉस (demos)”जनता” और क्रेटस (kratos)”शासन” से मिलकर बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है “जनता का शासन”। शुरू-शुरू में लोकतंत्र शब्द का प्रयोग प्राचीन यूनान में अनेक लोगों के शासन के रूप में किया गया था न कि आज जैसे सकारात्मक रूप में। इस प्रकार तब सत्ता की शक्ति किसी एक व्यक्ति के हाथों में न रहकर कई व्यक्तियों में समाहित होती थी।  अरस्तु ने छ: प्रकार की शासन पद्धतियों का वर्णन किया था-
  1. राजतंत्र, 
  2. निरंकुशतंत्र, 
  3. कुलीनतंत्र, 
  4. वर्गतंत्र, 
  5. लोकतंत्र और
  6. भीड़तंत्र । 

लोकतंत्र की परिभाषा

डायसी ने लोकतंत्र की परिभाषा करते हुए लिखा है कि “लोकतंत्र शासन का वह प्रकार है, जिसमें प्रभुत्व शक्ति समष्टि रूप में जनता के हाथ में रहती है, जिसमें जनता शासन सम्बन्धी मामले पर अपना अन्तिम नियंत्रण रखती है तथा यह निर्धारित करती है कि राज्य में किस प्रकार का शासन-सूत्र स्थापित किया जाए। राज्य के प्रकार के रूप में लोकतंत्र शासन की ही एक विधि नहीं है, अपितु वह सरकार की नियुक्ति करने, उस पर नियंत्रण रखने तथा इसे अपदस्थ करने की विधि भी है।”

अब्राहम लिंकन की लोकतंत्र की परिभाषा को लें तो “लोकतंत्र शासन वह शासन है जिसमें शासन जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा हो।” इन परिभाषाओं को अस्वीकार करते हुए कुछ विचारक लोकतंत्र को शासन तक ही सीमित न रखकर इसे व्यापक अर्थ में देखने की बात कहते हैं।

गिडिंग्स -“प्रजातंत्र केवल सरकार का ही रूप नहीं है वरन राज्य और समाज का रूप अथवा इन तीनों का मिश्रण भी है।” मैक्सी ने इसे और भी व्यापक अर्थ में लेते हुए लिखा है कि “बीसवीं सदी में प्रजातंत्र से तात्पर्य एक राजनीतिक नियम, शासन की विधि व समाज के ढांचे से ही नहीं है, वरन यह जीवन के उस मार्ग की खोज है जिसमें मनुष्यों की स्वतंत्र और ऐच्छिक बुद्धि के आधार पर उनमें अनुरूपता और एकीकरण लाया जा सके।” डा0 बेनीप्रसाद ने तो लोकतंत्र को जीवन का एक ढंग माना है।

ब्राइस ने लोकतंत्र की परिभाषा - सरकार का वह रूप कहा है जिसमें योग्यता प्राप्त नागरिकों को बहुमत की इच्छा के अनुसार शासन करना होता है। इनका मानना है कि योग्यता प्राप्त व्यक्तियों की संख्या कम-से-कम तीन चौथाई अवश्य होनी चाहिए, जिससे सामान्य नागरिकों का भौतिक बल उसकी मतदान शक्ति के बराबर बना रहे। लोकतान्त्रिक व्यवस्था जनता की वह इच्छाशक्ति है, जिसमें शासक की नियुक्ति, राज्य में निवास करने वाली जनता के बहुमत की सहमति के आधार पर होती है जो जनता के कल्याण को ध्यान में रखते हुए शासन का संचालन करता है।  

माइकल मूर के अनुसार लोकतंत्र की परिभाषा - एक देखा जाने वाला खेल नहीं हैं, यह एक सहभागिता वाली घटना है। यदि हम इसमें भाग नहीं लेते हैं, तो लोकतंत्र का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। इसी प्रकार सारटोरी ने लोकतांत्रिक युग को प्रजातांत्रिक भ्रांति का युग कहा है क्योंकि लोकतंत्र राजनीतिक सिद्वान्तों की सबसे भ्रमपूर्ण धारणा है। लोकतंत्र केवल सरकार को चुनने अथवा शासन प्रणाली का एक तरीका, ही नहीं बल्कि इसे एक तरह का समाज तथा जीने का तरीका एक आदर्श अथवा एक उद्देश्य के रूप में परिभाषित किया गया है। आधुनिक युग में लोकतंत्र न केवल प्रशासनिक पक्ष, बल्कि सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक आदि सभी पक्षों का वर्णन करता है। यह व्यक्तियों की समानता, सुरक्षा व स्वतन्त्रता पर बल देता है।

लोकतंत्र के प्रकार 

लोकतंत्र के कितने प्रकार होते हैं लोकतंत्र को निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है: -
  1. प्रत्यक्ष लोकतंत्र 
  2. अप्रत्यक्ष लोकतंत्र
1. प्रत्यक्ष लोकतंत्र - प्रत्यक्ष लोकतंत्र वह है जिसमें राज्य की इच्छा या संकल्प जनसभा में लोगों या लोगों के लिए कार्य करने वाले चयनित प्रतिनिधियों के माध्यम से प्रत्यक्ष या तत्क्षण व्यक्त किया जाता है।” प्रत्यक्ष लोकतंत्र में जनता सार्वजनिक हित के मुद्दों पर प्रत्यक्ष रूप से अपना मत व्यक्त करती है। यह केवल छोटे राज्यों में ही संभव हो सकता है जहाँ जनता अपने मत व्यक्त करने के लिए एक स्थान पर एकत्रित हो सकती है। यह पद्धति प्राचीन ग्रीक शहरों में अपनाई जाती थी और वर्तमान समय में यह स्विटजरलैंड के केवल चार प्रांतों में प्रयोग में है। 

2. अप्रत्यक्ष लोकतंत्र - अप्रत्यक्ष या प्रतिनिधि लोकतंत्र वह है जिसमें सभी लोग अथवा उनमें से कुछ लोग स्वयं द्वारा सामयिक रूप से चयनित प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन का संचालन करते हैं। अप्रत्यक्ष लोकतंत्र में राज्य की इच्छा जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से व्यक्त नहीं की जाती है बल्कि उनके द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के माध्यम से जिन्हें उन्होंने विचार करने और निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करते हैं। वास्तव में, विस्तृत और जटिल समाज में जहाँ लोगों की संख्या बहुत अधिक होती है और राज्य का क्षेत्रफल भी विस्तृत होता है वहाँ प्रत्यक्ष लोकतंत्र संभव नहीं हो सकता है। वर्तमान समय में अप्रत्यक्ष लोकतंत्र सर्वाधिक लोकप्रिय है और सभी लोकतांत्रिक देशों में प्रचलित है। भारत का लोकतंत्र भी इसके उदाहरणों में से एक है। 

लोकतंत्र के गुण

संक्षेप में, इस शासन व्यवस्था के गुण नीचे दिए माने जा सकते हैं-
  1. शासक जन-कल्याण के प्रति सजग, अनुक्रियाशील तथा जागरूक रहते हैं। 
  2. जन शिक्षण का श्रेष्ठतम माध्यम है। 
  3. सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक सुधार के लिए समुचित वातावरण की व्यवस्था होती है।
  4. उच्च कोटि का राष्ट्रीय चरित्र विकसित करने में सहायक है।
  5. स्वावलम्बन व व्यक्तिगत उत्तरदायित्व की भावना का विकास करता है। 
  6. देशभक्ति का स्रोत है।
  7. क्रान्ति से सुरक्षा प्रदान करता है। 
  8. शासन कार्यो में जन-सहभागिता की व्यवस्था करता है। 
  9. व्यक्ति की गरिमा का सम्मान तथा समानता का आदर्श प्रस्तुत करता है।
लोकतंत्र प्रणाली के उपरोक्त गुण यह स्पष्ट करते हैं कि इस व्यवस्था में कोई भी व्यक्ति यह शिकायत नहीं कर सकता कि उसे अपनी बात कहने का अवसर नहीं मिला है। क्योंकि लोकतान्त्रिक व्यवस्था का पहला काम यही है वह जनता को अपनी बात कहने के अधिकाधिक अवसर दे तथा जनता की जिज्ञासा का समाधान करें। 

लोकतंत्र के दोष

लॉर्ड ब्राइस ने इसके लोकतंत्र के दोष बतलाए हैं-
  1. शासन-व्यवस्था या विधान को विकृत करने में धन-बल का प्रयोग। 
  2. राजनीति को कमाई का पेशा बनाने की ओर झुकाव। 
  3. शासन-व्यवस्था में अनावश्यक व्यय। 
  4. समानता के सिद्धान्त का अपव्यय और प्रशासकीय पटुता या योग्यता के उचित मूल्य का न आंका जाना। 
  5. दलबन्दी या दल संगठन पर अत्यधिक बल।
  6. विधान सभाओं के सदस्यों तथा राजनीतिक अधिकारियों द्वारा कानून पास कराते समय वोटों को दृष्टि में रखना और समुचित व्यवस्था के भंग को सहन करना।
लोकतंत्र की सैद्धान्तिक व्यवस्था को व्यावहारिक रूप देने में आने वाली कठिनाईयों के कारण ही प्लेटो और अरस्तू ने इस प्रणाली को शासन का विकृत रूप बतलाया था। कोई भी विचार सैद्धान्तिक श्रेष्ठता के कारण ही व्यवहार में श्रेष्ठतर नहीं रह जाता है। लोकतंत्र की अव्यावहारिकता के कारण ही आलोचक यह कहते हैं कि लोकतंत्र के सिद्धान्त अत्यधिक आदर्शवादी और कल्पनावादी हैं। व्यवहार में लोकतंत्र शासन कार्य का भार सम्पूर्ण जनता पर आधारित करके ‘निर्धनतम, अनभिज्ञतम तथा अयोग्यतम लोगों का शासन’ हो जाता है, क्योंकि आम जनता शासन की पेचीदगियों से अनभिज्ञ ही नहीं होती है वरन शासन करने के योग्य भी नहीं होती है। 

लोकतंत्र व्यवस्था की यही सबसे बड़ी विडम्बना है कि इसमें योग्यतम व्यक्ति-अभिजन वर्ग, जो शासन शक्ति के क्रियान्वयन में सक्रिय होते हैं, अयोग्यतम व्यक्ति-जनसाधारण, द्वारा नियंत्रित किये जाते हैं। अगर वह नियंत्रण व्यवहार में प्रभावी हो जाता है तो लोकतंत्र सही अर्थो में भीड़तंत्र बन जाता है। 

अत: दोष लोकतंत्र व्यवस्था में नहीं, इस व्यवस्था को क्रियान्वित करने में सम्मिलित शासनकर्ताओं और शासितों में होते हैं। वस्तुत: व्यवहार में लोकतंत्र में यह दोष इसलिए आ जाते हैं कि उसे व्यवहार में लाने वाले लोग अपने को उस स्तर का नहीं रख पाते हैं, जिस स्तर की लोकतंत्र की सफलता के लिए आवश्यकता होती है। परन्तु लोकतंत्र के आलोचकों को एक बात तो माननी ही होगी कि इस प्रणाली के इन दोषों के बावजूद यह प्रणाली अन्य सभी प्रणालियों से श्रेष्ठतर है। यही कारण है कि दुनिया के अनेक राज्यों में लोकतंत्र व्यवस्था को कुछ महत्त्वाकांक्षी राजनेताओं द्वारा उखाड़ फेंकने के बाद भी इसकी स्थापना के फिर प्रयत्न होते रहे हैं। अनेक समाजों में नागरिकता क्रान्ति तक का सहारा लेकर पुन: लोकतान्त्रिक शासन स्थापित करते रहे हैं। 

लोकतंत्र के आलोचक इस बात से भी इनकार नहीं कर सकते कि सभी दोषों के होने पर भी शायद लोकतान्त्रिक व्यवस्था ही मानव की गरिमा, उसके व्यक्तित्व के सम्मान और शासन कार्य में उसकी सहभागिता सम्भव बनाने का श्रेष्ठतम साधन है। यह केवल शासन का ही रूप नहीं, यह जीवन का ढंग है। इसमें व्यक्ति की सम्पूर्णता का आशय निहित है। यह व्यक्ति जीवन के विभिन्न पहलुओं को अलग-अलग करके नहीं, सम्मिलित रूप से विकसित होने का अवसर प्रदान करने वाली व्यवस्था है। लोकतंत्र की श्रेष्ठता का संकेत मिल के इस निष्कर्ष से मिलता है जिसमें उसने कहा है कि ‘लोकतंत्र के विरोध में दी जाने वाली युक्तियों में जो कुछ सुधार प्रतीत हुआ, उसको पूरा महत्व देते हुए भी मैंने सहर्ष उसके पक्ष में ही निश्चय किया।’

लोकतंत्र के सिद्धांत

भारतीय लोकतंत्र में चार मूलभूत सिद्धांतों : स्वतंत्रता, समानता, बंधुता और न्याय को प्रतिष्ठापित किया गया है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में कहा गया है: इन आधारभूत सिद्धांतों के अतिरिक्त, जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि लोकतंत्र में आत्मसम्मान की भावना, सहयोग और उत्तरदायित्व की भावना आदि विचार भी समाहित हैं।

1. स्वतंत्रता - जब कोई स्वतंत्रता की बात करता है तो उसका आशय विचार, क्रिया, अभिव्यक्ति और गतिविधि की स्वतंत्रता से होता है। यह एक स्वतंत्र वातावरण है जिसमें व्यक्ति अपनी अंतर्निहित शक्तियों को पहचानने और स्वयं को अभिव्यक्त करने के लिए प्रोत्साहित होता है। लचीले और स्वतंत्र वातावरण में ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का अधिकतम विकास संभव है। लोकतंत्र में व्यक्तियों को बाहरी शक्तियों और अवांछित दबावों से मुक्त रहना चाहिए ताकि उनका अंतर्मन उनके व्यवहार और चरित्र का समुचित आकलन कर सकेगा।

2. समानता - मानव की मौलिक विशेषताओं और गुणों की दृष्टि से सभी व्यक्ति जन्म से ही समान हैं। लेकिन दूसरी तरफ प्रत्येक व्यक्ति अपनी बुद्धि, अभिरुचि, शारीरिक क्षमताओं आदि के रूप में विशिष्ट हैं। इस प्रकार समानता व्यक्ति के सम्बन्ध में अनुभवजन्य सामान्यीकरण नहीं है बल्कि एक नैतिक आदेश है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य के अधिकतम विकास और सुधार के लिए समान अवसर प्राप्त करने का अधिकार है। व्यक्तिगत भिन्नता के बावजूद प्रत्येक व्यक्ति को जीवन जीने, सीखने और अपने उद्देश्य प्राप्ति के लिए प्रयास करने के लिए समान अवसर प्राप्त करने का अधिकार है।

3. भ्रातृत्व - आस्था और जीवन शैली की भिन्नता होते हुए भी राष्ट्र में एक-दूसरे का सम्मान और सहयोग करते हुए साथ-साथ रहने की व्यापक विचारधारा ही भ्रातृत्व है। भ्रातृत्व की भावना लोकतंत्र का मुख्य आधार है। जब तक व्यक्ति यह अनुभव नहीं करेंगे कि वे सभी समान मानवता से सम्बन्धित हैं, वे दूसरों के प्रति सहानुभूति और सहयोग का अनुभव नहीं कर सकते जोकि लोकतंत्र की मुख्य विशेषता है। अत: व्यक्ति के जीवन और विकास के क्षेत्र में जाति, रंग, धर्म, भाषा, क्षेत्र, जन्म और लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। प्रेम, स्नेह, सहयोग, सहानुभूति, समझ आदि भ्रातृत्व के स्वाभाविक सिद्धान्त हैं जो लोकतंत्र की सफलता के लिए अति आवश्यक हैं।

4.न्याय - उपर्युक्त मूल्यों के परिणामस्वरूप यह स्वाभाविक है कि व्यक्ति को न्याय का अधिकार है। किसी भी व्यक्ति को किसी अवसर से वंचित नहीं रखा जा सकता है और न ही उन्हें जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में लाभ प्राप्त करने हेतु प्रयास करने से रोका जा सकता है। अनुचित अथवा अवैध आधारों पर व्यक्तियों में भेद नहीं किया जा सकता। यदि किसी के साथ धर्म, जाति, सम्प्रदाय अथवा लिंग के आधार पर भेदभाव किया जाता है तो वह इस अन्याय के विरुद्ध न्यायालय में आवाज उठा सकता है और अपने लिए न्याय की माँग कर सकता है।

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