परामर्श का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं एवं सिद्धांत

परामर्श का अर्थ

‘परामर्श’ शब्द अंग्रेजी के ‘counselling’ शब्द का हिन्दी रुपान्तर है,जो लैटिन के ‘Consilium’ से बना है जिसका शब्दिक अर्थ है सलाह लेना या परामर्श लेना। अत: परामर्श एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें परामर्श प्रार्थी अपने से अधिक अनुभवी, योग्य व प्रशिक्षित व्यक्ति के पास जाकर पूछताछ, विचार-विमर्श, तर्क-वितर्क तथा विचारों का विनिमय करता है। इस प्रक्रिया के उपरान्त प्रार्थी समस्या समाधान योग्य होता है, उसका अधिकतम विकास होता है और वह अपना निर्णय स्वयं ले सकने योग्य हो जाता है।

परामर्श की परिभाषा

  1. ए0जे0जोन्स के अनुसार -’’परामर्श एक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से एक छात्र व्यवहारों के सीखने अथवा परिवर्तन करने और विशिष्ट लक्ष्यों को स्थापित करने में व्यावसायिक रुप से प्रशिक्षित व्यक्ति के साथ कार्य करता है जिससे वह इन लक्ष्यों को प्राप्त करनें की दिशा में अधिकार रख सके।’’
  2. रुथ स्ट्रांग के अनुसार - ‘‘परामर्श प्रक्रिया समस्या समाधान का सम्मिलित प्रयास है।’’
  3. रॉबिन्सन के अनुसार- परामर्श शब्द दो व्यक्तियों के सम्पर्क की उन सभी स्थितियों का समावेश करता है जिनमें एक व्यक्ति को उसके स्वयं के एवं पर्यावरण के बीच अपेक्षाकृत प्रभावी समायोजन प्राप्त करने सहायता की जाती है।
  4. बरनार्ड तथा फुलमर के अनुसार - परामर्श को उस अन्तर-वैयक्तिक सम्बन्ध के रूप में देखा जा सकता है जिसमे वैयक्तिक तथा सामूहिक परामर्श के साथ-साथ वह कार्य भी सम्मिलित है जो अध्यापकों एवं अभिभावकों से संम्बंधित है और जो विशेष रूप से मानव सम्बन्धों के भावात्मक पक्षों को स्पष्ट करता है। 
  5. कार्ल रोजर्स के अनुसार- परामर्श एक निश्चित रूप से निर्मित स्वीकृत सम्बन्ध है जो उपबोध्य को अपने को उस सीमा तक समझने में सहायता करता है जिसमें वह अपने ज्ञान के प्रकाश में विद्यात्मक कार्य में अग्रसर हो सकें।
उपयुक्त विद्वानों की परिभाषाओं के आधार पर परामर्श का अर्थ है स्पष्ट होता है कि परामर्श द्वारा दो व्यक्तियों के सम्मिलित प्रयास से विचार-विमर्श, तर्क-वितर्क, मित्रतापूर्ण विचार-विनिमय द्वारा समस्याग्रस्त व्यक्ति को समस्या समाधान योग्य बनाया जाता है।

परामर्श के तत्व

आर्बकल ने परामर्श की परिभाषाओं के आधार पर निष्कर्ष निकाले कि परामर्श के तीन तत्व मुख्य हैं।
  1. परामर्श प्रक्रिया में दो व्यक्ति संलग्न रहते हैं। 
  2. परामर्श प्रक्रिया का उद्देश्य छात्र को अपनी समस्याएँ स्वतंत्र रुप से हल करने योग्य बनाना है। 
  3. परामर्श एक प्रशिक्षित व्यक्ति का व्यावसायिक कार्य है।
इसी प्रकार विलियम कोटल ने परामर्श के तीन के स्थान पर पाँच तत्व बताये है
  1. दो व्यक्तियों में पारस्परिक सम्बन्ध आवश्यक है। 
  2. परामर्शदाता तथा परामर्श प्रार्थी के मध्य विचार-विमर्श के अनेक साधन हो सकते हैं। 
  3. प्रत्येक परामर्शदाता अपना काम पूर्ण ज्ञान से करता है। 
  4. परामर्श प्रार्थी की भावनाओं के अनुसार परामर्श का स्वरूप परिवर्तित होता है 
  5. प्रत्येक परामर्श साक्षात्कार निर्मित होता है।

परामर्श की विशेषताएं

  1. परामर्श एक व्यक्तिगत प्रक्रिया है सामूहिक नहीं। 
  2. परामर्श प्रक्रिया में केवल दो व्यक्तियों का सम्पर्क होता है। यदि दो व्यक्तियों से अधिक के मध्य विचार-विमर्श होता है तो वह परामर्श नहीं है। 
  3. परामर्श निर्देशन की एक विधि है। अत: यह एक निर्देशीय प्रक्रिया है। 
  4. परामर्श में परामर्शदाता अपनी निर्णय या विचार, परामर्श प्रार्थी पर लादता नहीं है। 
  5. परामर्श प्रक्रिया, परामर्श प्रार्थी केन्द्रित होती है जिसमें पारस्परिक विचार-विमर्श, वार्तालाप, तर्क-वितर्क द्वारा प्राथ्री को इस योग्य बनाया जाता है कि वह अपने स्वयं के लिये निर्णय लेने में समर्थ हो सके।
  6. परामर्श प्रक्रिया व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाती है एवं उसमें आत्मविश्वास उत्पन्न करती है।

परामर्श के सिद्धांत

परामर्श एक निर्धारित रूप से संरचित स्वीकृत सम्बन्ध है जो परामर्श प्रार्थी को पर्याप्त मात्रा में स्वयं के समझने में सहायता देता है जिससे वह अपने नवीन ज्ञान के परिप्रेक्ष्य में ठोस कदम उठा सके। सिद्धांत की व्याख्या प्राय: किन्हीं दृष्टिगोचर व्यापार या घटनाओं के अन्तर्निहित नियमों अथवा दिखायी देने वाले सम्बन्धों के प्रतिपादनों के रूप में की जाती है जिनका एक निश्चित सीमा के अन्दर परीक्षण सम्भव है परामर्श के क्षेत्र में सैद्धान्तिक ज्ञान का विशद भण्डार है। परामर्शकर्ता के लिए इन सैद्धान्तिक आधारों का परिचय आवश्यक है। परामर्श के सिद्धान्तों को चार वगोर्ं में बॉटा जा सकता है-
  1. प्रभाववर्ती सिद्धांत
  2. व्यवहारवादी सिद्धांत
  3. बोधात्मक सिद्धांत
  4. व्यवस्थावादी प्रारूप सिद्धांत

1. प्रभाववर्ती सिद्धांत-

यह सिद्धांत मूलत: अस्तिववादी-मानववादी दर्शन की परम्परा से उत्पन्न हुआ है। इसमें उपबोध्य या परामर्शप्राथ्री को प्रभावपूर्ण ढंग से समझने पर विशेष बल दिया जाता है। यह उपागम, उपबोध्य को एक व्यक्ति के रूप में समझने पर, उसके बारे में जानने की अपेक्षा अधिक महत्व देता है। इसमें परामर्शदाता बाह्य वस्तुनिष्ठ परीक्षण की परिधि को लॉघकर उपबोध्य के आन्तरिक संसार में प्रवेश करने का प्रयत्न करता है। परामर्शदाता व्यक्ति से व्यक्ति के साक्षात्कार का वातावरण निर्मित करता है। उपबोध्य को एक व्यक्ति के रूप में समझने पर उसके बारे में जानने की अपेक्षा अधिक महत्व दिया जाता है। इस प्रकार उपागम के अन्तर्गत परामर्शदाजा बाह वस्तुनिष्ठ परीक्षण की परिधि लॉघकर, उपबोध्य के आन्तरिक वैषयिक संसार में प्रवेश का प्रयत्न करता है। मानवीय अन्त:क्रिया ही प्रभाववर्ती परामर्शदाता के लिए ध्यान का केन्द्र है। जिन्हें संक्षेप में निम्न रूप से व्यक्त किया जा सकता है।
  1. अनुभव की विलक्षणता-उपबोध्य का अनुभव विलक्षण होता है। यह बात अधिक महत्वपूर्ण है कि परामर्शप्राथ्री कैसा अनुभव करता है? उसकी वैषयिक वास्तविकता भी अधिक महत्वपूर्ण है।
  2. समग्रता-व्यक्ति को समग्र रूप से उसके वर्तमान अनुभवों के सन्दर्भों में ही जाना जा सकता है। 
  3. सीमाबद्धता- यद्यपि जैवकीय तथा पर्यावरण जनित कारक किन्ही विशिष्ट रूपों में व्यक्ति को सीमाबद्ध कर सकते हैं फिर भी व्यक्ति में विकसित होने व अस्तित्व निर्माण की क्षमताएॅ सीमित होती है।
  4. आत्म परिभाषा- मनुष्यता सदैव ही आत्म परिभाषा की प्रक्रिया में संलग्न रहती है। इसे किसी पदार्थ या तत्व के रूप में सदैव के लिये परिभाषित नहीं किया जा सकता है।

2. व्यवहारवादी उपागम -

व्यवहारवादी उपागम उपबोध्य के अवलोकनीय व्यवहारों पर बल देते है। दूसरे शब्दों में व्यवहारवादी उपबोध्य के अनुभवों की अपेक्षा उसके व्यवहारों को जानने व समझने में अधिक रूचि रखते है।

व्यवहारवादी समस्याग्रस्त व्यक्ति के लक्षणों पर अधिक ध्यान देते है। ये समस्याएं अधिकांशत: उपबोध्य द्वारा अपने व्यवहार करने के ढंग या असफल व्यवहार के कारण होती है। इस प्रकार व्यवहारवादी परामर्शदाता मुख्यत: क्रिया पर बल देते है। उनके अनुसार व्यक्ति अपने वातावरण के साथ प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप व्यवहारों को जन्म देता है। व्यक्ति जब उत्तरदायी रूप से व्यवहार करने में समर्थ नहीं हो पाते तो वे चिन्तित रहते हैं और बहुधा अनुपयुक्त व्यवहार करते करते है। इसके कारण उनमें आत्म पराजय का भाव जाग्रत होता है।

3. बोधात्मक सिद्धांत-

बोधात्मक सिद्धांत में यह स्वीकार किया जाता है कि संज्ञान या बोध व्यक्ति के संवेगों व व्यवहारों के सबसे प्रबल निर्धारक हैं। व्यक्ति जो सोचता है उसी के अनुसार अनुभव व व्यवहार करता है। बोधाध्मक सिद्धांत के अन्तर्गत कार्य सम्पादन विश्लेषण अत्यधिक प्रचलित विधा है। इसमें व्यवहार की समझ इस मान्यता पर निर्भर करती है कि सभी व्यक्ति अपने पर विश्वास करना सीख सकते हैं, अपने लिये चिन्तन या विचार कर सकते हैं, अपने निर्णय ले सकते हैं तथा अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने में समर्थ है। परामर्शदाता इसके अन्तर्गत परमर्श प्रार्थी को जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने व विकसित करने की क्षमता दृढ़ करने का सम्बल दान करता है।

4. व्यवस्थावादी विभिन्न-दर्शनग्राही प्रारूप उपागम-

व्यवस्थावादी उपागम की प्रमुख विशेषता परामर्श का विभिन्न चरणें में संयोजित होना है।
  1. प्रथम अवस्था- समस्या अन्वेषण 
  2. द्वितीय अवस्था- द्विआयामी समस्या परिभाषा 
  3. तृतीय अवस्था- विकल्पों का अभिज्ञज्ञन करना 
  4. चतुर्थ अवस्था- आयोजना
  5. पंचम अवस्था- क्रिया प्रतिबद्धता 
  6. शष्ठ अवस्था- मूल्यांकन एवं फीडबैक

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