पर्यावरण का अर्थ, प्रकार एवं हानिकारक तत्व

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पर्यावरण शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है परि+आवरण इसमें परि का अर्थ होता है चारों तरफ से’ एवं आवरण का अर्थ है ‘ढके हुए’। अंग्रेजी में पर्यावरण को Environment कहते हैं इस शब्द की उत्पकि 'Envirnerl' से हुई और इसका अर्थ है-Neighbonrhood अर्थात आस-पड़ोस। पर्यावरण का शाब्दिक अर्थ है हमारे आस-पास जो कुछ भी उपस्थित है जैसे जल-थल, वायु तथा समस्त प्राकृतिक दशाऐं, पर्वत, मैदान व अन्य जीवजन्तु, घर, मोहल्ला, गाँव, शहर, विद्यालय महाविद्यालय, पुस्तकालय आदि जो हमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। ‘‘डगलस व रोमन हॉलेण्ड के अनुसार ‘‘पर्यावरण उन सभी बाहरी शक्तियों व प्रभावों का वर्णन करता है जो प्राणी जगत के जीवन स्वभाव व्यवहार विकास एवं परिपक्वता को प्रभावित करता है।’’

पर्यावरण के अवयव

सौरमंडल का पृथ्वी ही एक ऐसा ग्रह है जिस पर कि मानव जीवन वनस्पति जीवन और पशु जीवन विकसित हो सका। पृथ्वी पर मानव सभ्यता और संस्कृति की प्रगति हुई। पृथ्वी को भूमण्डल भी कहते है इसके चार मण्डल  है:-

स्थल मण्डल-

पृथ्वी के सबसे ऊपर की ओर ठोस परत पाई जाती है यह अनेक प्रकार की चट्टानों मिट्टी तथा ठोस पदार्थो से मिलकर बनी होती है। इसे ही स्थल मंडल कहते है। स्थलमंडल में भूमि भाग व समुद्री तल दोनों की आते हैं। स्थल मंडल सम्पूर्ण पृथ्वी का केवल 3/10 भाग है शेष 7/10 भाग समुद्र ने ले लिया है।

जल मण्डल- 

 पृथ्वी के स्थल मण्डल के नीचे के भागों में स्थित जल से भरे हुए भाग को जल मण्डल कहते हैं जैसे झील, सागर व महासागर आदि। 97.3% महासागरों और सागरों में है। शेष 2.7% हिमनदो और बर्फ के पहाड़ों, मीठे जल की झीलों नदियों और भूमिगत जल के रूप में पाया जाता है।

वायुमण्डल- 

भूमण्डल का तीसरा मण्डल वायुमण्डल है। स्थल मण्डल व जल मण्डल के चारों और गैस जैसे पदार्थो का एक आवरण है। इसमें नाईट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बनडाइआक्साइड व अन्य गैसें, मिट्टी के कण, पानी की भाप एवं अन्य अनेक पदार्थ, मिले हुए हैं। इन सभी पदार्थो के मिश्रण से बने आवरण को वायुमण्डल कहते है। वायुमण्डल पृथ्वी की रक्षा करने वाला रोधी आवरण है। यह सूर्य के गहन प्रकाश व ताप को नरम करता है। इसकी ओजोन (O3) परत सूर्य से आने वाली अत्याधिक हानिकारक पराबैंगनी किरणों केा सोख लेती है। इस प्रकार यह जीवों की विनाश होने से रक्षा करती है।

जैव मण्डल- 

जैव मण्डल का विशिष्ट लक्षण यह है कि वह जीवन को आधार प्रदान करती है। यह एक विकासात्मक प्रणाली है। इसमें अनेक प्रकार के जैविक व अजैविक घटकों का संतुलन बहुत पहले से क्रियाशील रहा है। जीवन की इस निरन्तरता के मूल में अन्योन्याश्रित सम्बन्धों का एक सुघटित तंत्र काम करता है। वायु जल मनुष्य, जीव जन्तु, वनस्पति, लवक मिट्टी एवं जीवाणु ये सभी जीवन चरण प्रणाली में अदृश्य रूप से एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और यह व्यवस्था पर्यावरण कहलाती है। सौर ऊर्जा सूर्य से प्राप्त होती है। ये जैवमण्डल को सजीव बनाए रखती है। जैव मण्डल को मिलने वाली कुल ऊर्जा का 99.98% भाग इसी से प्राप्त होता है।

पर्यावरण के प्रकार

विभिन्न पर्यावरणविद ने पर्यावरण के विभिन्न-विभिन्न प्रकार दिए। वैसे मुख्य रूप से पर्यावरण तीन रूपों में पाया जाता है:-

भौतिक पर्यावरण या प्राकृतिक पर्यावरण :-

इसके अंतर्गत वायु, जल व खाद्य पदार्थ भूमि, ध्वनि, उष्मा प्रकाश, नदी, पर्वत, खनिज पदार्थ, विकिरण आदि पदार्थ शामिल हैं। मनुष्य इनसे लगातार सम्पर्क में रहता है इसलिए ये मनुष्य के स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव डालते हैं।

जैविक पर्यावरण :- 

जैविक पर्यावरण बहुत बड़ा अवयव है जो कि मनुष्य के इर्द-गिर्द रहता है। यहाँ तक कि एक मनुष्य के लिए दूसरा मनुष्य भी पर्यावरण का एक भाग है। जीवजन्तु व वनस्पति इस घटक के प्रमुख सहयोगी है। जैविक पर्यावरण को दो भागों में बाँटा गया है।
  1. पौधों का वातावरण 
  2. जीवों का वातावरण 

जानवरों का वातावरण:- मनो-सामाजिक पर्यावरण:-

मनो-सामाजिक मनुष्य के सामाजिक संबंधों से प्रगट होता है। इसके अंतर्गत सामाजिक आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्रों में मनुष्य के व्यक्तिगत के विकास का अध्ययन करते हैं। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है उसे परिवार में माता-पिता, भाई-बहन, पत्नि तथा समाज में पड़ौसियों के साथ संबंध बना कर रहना पड़ता है। उसे समुदाय प्रदेश एवं राष्ट्र से भी सम्बन्ध बना कर रहना पड़ता है। मनुष्य सामाजिक व सांस्कृतिक पर्यावरण का उत्पाद है जिसके द्वारा मनुष्य का आकार तैयार होता है। रहन-सहन, खान-पान, पहनावा-औढ़ावा, बोल-चाल या भाषा शैली व सामाजिक मान्यताएँ मानव व्यक्तिगत का ढ़ाँचा बनाती है।

पर्यावरण के हानिकारक तत्व

हानिकारक गैसें- 

जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती जा रही है वैसे-वैसे मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वन काटकर औद्योगिक धंधों का विस्तार करता जा रहा है। कल-कारखानों से जहरीली गैंसों का उत्सर्जन होता है जिससे हमारे सम्पूर्ण विश्व का पर्यावरण प्रदूषित होता जा रहा है। प्रदूषण से विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ फैलती जा रही हैं। नाक, साँस लेने में परेशानी, पीलिया होना, सिरदर्द, दृष्टिदोष, क्षयरोग व कैंसर आदि रोग जहरीली गैसों के कारण होते है। नियंत्रण मनुष्य के हानिकारक गैसों से बचने के निम्न लिखित उपाय है:-
  1. परम्परागत र्इंधन स्त्रोतों को छोड़ कर नवीन र्इंधन प्रणाली एल.पी.जी. गैस प्रणाली को अपनाना चाहिए।
  2. उद्योग एवं कारखानों के क्षेत्र में हरे वृक्ष एवं विभिन्न प्रकार के पौधे लगाकर प्रदूषण को कम किया जा सकता है। 

जल प्रदूषण:- 

जल प्रदूषण का प्रभाव विश्व के समस्त देशों को प्रभावित करता है। समुद्री प्रदूषण को खनिज तेलों को ले जाने वाले जहाजों के दुर्घटनाग्रस्त होने व नदियों के प्रदूषित जल का समुद्र में मिलना आदि बढ़ावा देते हैं। समुद्री जल के प्रदूषण से जीव-जन्तु व मनुष्य के जीवन पर दुष्प्रभाव पड़ते हैं और संक्रामक रोग हो जाते हैं। प्रदूषण को रोकने का भरसक प्रयास करना चाहिए। विश्व पर्यावरण सम्मेलन में समुद्र में होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए राज्यों को ऐसे प्रयास करने चाहिए जिससे मनुष्य व समुद्री जीव-जन्तुओं के स्वास्थ्य को हानि न हो।

रेगिस्तानीकरण:- 

पृथ्वी पर यदि मरूस्थल क्षेत्र बढ़ जाता है तो मनुष्य के लिए गम्भीर समस्या खड़ी हो जाती है। इसके मुख्य कारण पृथ्वी में पानी की कमी वन क्षेत्रों का मनुष्य द्वारा किया गया विनाश, संरक्षण प्रदान करने वाली पहाड़ियों की निर्जनता तथा जनसंख्या में वृद्धि होना। मरूस्थल का ताप 00C हो जाता है जिससे मनुष्य के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे बचने के लिए सबसे पहले वनों की कटाई रोकनी पड़ेगी।

विकरणीय प्रदूषण:- 

विकरणीय प्रदूषण मानवीय स्वास्थ्य एवं उसके विकास के लिए हानिकारक होता है। इसका प्रभाव मानव शरीर के आंतरिक व बाहरी भागों पर पड़ता है। इसलिए रेडियोधर्मी विकिरण से बचना चाहिए। ग्.त्ंले किरणों के उपयोग को विशेष परिस्थिति में स्वीकार करना चाहिए तथा इनके अधिक प्रयोग से बचना चाहिए।

पर्यावरण की आवश्यकता

प्रकृति का क्षेत्र अधिक विस्तृत तथा रहस्यमय है जो कि पर्यावरण के साथ जुड़ा हुआ है। मनुष्य विकसित तथा सामाजिक प्राणी है इसलिए वह प्राकृतिक घटनाओं का ज्ञान व उसके कारण ढँूढ़ता है। खेत, बगीचे, नदी, झरने आदि व जन्तु आदि पर्यावरण को सुन्दर व स्वच्छ बनाते हैं। प्रकृति की गोद में बालक जाकर प्राकृतिक दृश्यों का बोध करता है और आँखों से देखकर हाथों से स्पर्श कर उन्हें समझ लेता है। यूनिसेफ ने प्राथमिक स्तर पर एक योजना पर्यावरणीय शिक्षा विद्यालयों में शुरू कर दी है। इसके द्वारा विद्यार्थियों को शिक्षण दिया जाता है। जिससे वे पर्यावरण के प्रति जागरूक भी हो जाते है।

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