सूचना का अर्थ, परिभाषा एवं प्रकार

अनुक्रम
सूचना एक मानवीय विचार है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी होने के कारण मानवीय गतिविधियों से सीधा जुड़ा रहता है। समाज में जब किसी चीज की आवश्यकता होती है, तो उस पर शोध होती है, नई परिकल्पनायें जन्म लेती हैं, नये विचार मानव-मस्तिष्क में आते हैं। पाच ज्ञानेन्द्रियों के जरिये ग्रहण की गई संवेदनाओं को तभी तान्त्रिकाओं के जरिये मस्तिष्क में ले जाया जाता है। मस्तिष्क कम्प्यूटर के सीपीयू की तरह उनका संसाधन करके एक विचार का रूप देता है। इस से नये तथ्य उत्पन्न होते हैं। इन्हें ही सूचनाओं के नाम से जाना जाता है। कहा जा सकता है कि जब जानने वाले तथा जानकार के बीच कोई अन्त:क्रिया होती है तो सूचना उत्पन्न होती है। इस प्रकार जब मनुष्य विचार या अन्त:क्रियायें करता है तो उसके मस्तिष्क में अनेक सूचनायें एकत्र हो जाती हैं। इसी सूचना या ज्ञान को विभिन्न प्रकार से प्रकट किया जा सकता है जैसे मौखिक, संकेतों द्वारा, प्रलेखीय स्वरूपों द्वारा आदि। कोई भी अच्छी सूचना जब तक प्रभावी नहीं कही जा सकती, जब तक उचित संचार माध्यमों द्वारा प्राप्तकर्ता तक न पहुचे। सूचना को परिभाषित करना अति कठिन कार्य है। वैसे सम्कालीन घटनायें सूचना हैं। तथ्य आकड़े, डाटा आदि को सूचना माना जाता है। संरचनात्मक सूचना ज्ञान है। प्रज्ञा, विवेक, बुद्दि का सम्बन्ध ज्ञान से है। सूचना, ज्ञप्ति व इतला को अंग्रेजी में information कहा जाता है। Information शब्द Latin भाषा के infomare से बना है जिसका मतलब है जानकारी उपलब्ध कराना। अवगत कराने, बतलाने व जताने के लिए कही गई बात सूचना है।

सूचना की परिभाषा

विभिन्न संचार विशेषज्ञों व सूचना शास्त्रियों ने सूचना को इस प्रकार परिभाषित करने का प्रयास किया है -
  1. रोवली व टानर के अनुसार, ‘‘सूचना वह आकडे़ हैं जो व्यक्तियों के मध्य से प्रेषित हो सके तथा प्रत्येक व्यक्त उसका प्रयोग कर सके।’’
  2. J.H. Sherra के अनुसार, ‘‘सूचना का उपयोग जिस रूप में जीव विज्ञान व ग्रन्थावली में करते हैं, उसे तथ्य कहते हैं। यह एक उत्तेजना है, जिसे हम अपनी ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा प्रस्तुत करते हैं। यह एक प्रकार का तथ्य हो सकता है अथवा तथ्यों का सम्पूर्ण समूह हो सकता है तथापि (यह इकाइ होता है), यह विचारधारा की एक ईकाई होता है।’’
  3. बर्नर के अनुसार, बाह्य जगत के साथ जो विनियम होता है तथा जब हम इसके साथ सामंजस्य स्थापित करते हैं और अप ने सामंजस्य के जिस पर अनुभव करते हैं, उसकी विषय वस्तु के नाम को सूचना कहते हैं। सक्रियता एवं प्रभावशाली ढंग से जीवन का अभिप्रायही सूचना के साथ जीना है।
  4. जे बेकर के शब्दों में, ‘‘किसी विषय से सम्बन्धित तथ्यों को सूचना कहते हैं।’’
  5. हॉफ मैन के विचारों में, ‘‘सूचना वक्तव्यों, तथ्यों तथा आकृतियों का संकलन होता है।’’
  6. बेल के अनुसार, ‘‘सूचना समचारों, तथ्यों, आकडों, प्रतिवेदनों, अधिनियमों कर सहिताओं, न्यायिक निर्णयों, प्रस्तावों और इसी तरह की अन्य चीजों से सम्बन्धित होती हैं।’’
  7. मैकल्प व मैक्स फील्ड ने सूचना को ज्ञान से भिन्न मानते हुये प रिभाषित किया है। इनके अनुसार (1) सूचना खण्डश: अंश एवं विशिष्ट है, जबकि ज्ञान संरचनात्मक, सुसंगत तथा सार्वभौमिक है। सूचना सम्य बद्व अल्प कालीन सम्भवत: यहा तक कि क्षणभंगुर प्रवाह है, जबकि ज्ञान एक वृहद भण्डार है जो कि प्रवाह का परिणाम है अर्थात् सूचना अतिरिक्त सूचना को जोड़कर ज्ञान भण्डार को प्रभावित, पुन: संगठित किसी भी प्रकार से प्रभावित कर सकते हैं।
इस प्रकार सूचना सामान्यत: तथ्य , ज्ञान आकड़े, विवेक आदि की समनार्थी है। व्यापक अर्थ में सूचना से हमारा अभिप्राय ऐसे ज्ञान से है, जो किसी विशेष तथ्य , विषय अथवा घटना से सम्बन्धित हो और वह सम्प्रेषणीय हो। उपरोक्त परिभाषाओं के अवलोकन से यह अर्थ निकलता है कि सूचना एक प्रकार का मानवीय चि न्तन है। मानव एक चिन्तनशील प्राणी है। चिन्तनशील प्राणी होने के नाते इसके दिमाग में भिन्न-भिन्न तरह के विचार पनपते रहते हैं। इसी चिन्तन को सूचना कहा जाता है।

इतिहास इस बात का गवाह है कि जब-जब समाज में किसी वस्तु की जरूरत खटकती है तो इसके लिये अनुसंधान किया जाता है। इस अनुसन्धान से विचार मानव मस्तिष्क में आते हैं। नये-नये तथ्य पैदा होते हैं। इन्हीं को हम सूचना का नाम देते हैं। सूचना वह है जो मानव जैसे चिन्तशील प्राणी को सोचने के लिए मजबूर कर देती है तथा वह एक-दूसरे से विचार व भावनाओं को साझा करने के बारे में विचार करता है। सूचना विचारों की प्रवाहमय धारा है जिसका आदि है परन्तु अन्त नहीं।

सूचना के प्रकार

अलग-अलग ढंग से जनम लेने वाली सूचनाओं मुख्यतया छ: भागों में विभाजित किया है। सूचना के छ: भाग हैं -
  1. प्रत्ययात्मक सूचना : इसके अन्तर्गत किसी सम्स्या के अस्थिर क्षेत्रों से उत्पन्न होने वाले विचार, सिद्वान्त व प रिकल्प नायें इत्यादि आती हैं। 
  2. अनुभव सिद्व सूचना : इसके अन्तर्गत प्रयोगशाला जनित साहित्यिक खोज अथवा शोध हेतु स्वय के अनुभवों द्वारा प्राप्त आकड़ें आते हैं। 
  3. कार्यविधिक सूचना : इस प्रकार की सूचना के अन्तर्गत उस विधि को सम्मिलित किया जाता है। जिसके द्वारा शोधकर्ता को और अधिक प्रभावी ढंग से कार्य करने योग्य बनाया जा सके। इस प्रकार की सूचना के अन्तर्गत आकडे़ प्राप्त किये जाते हैं, व्यवहृत किये जाते हैं तथा परीक्षण किये जाते हैं। 
  4. प्रेरक सूचना : मनुष्य हमेशा से ही प्रेरणाशील रहा है। इसके लिये उसे दोतल प्रभावित करते हैं। एक वह स्वय तथा दूसरा वहा का वातावरण, वातावरण द्वारा मिलने वाली सूचना अधिक प्रभावी होती है तथा यह सूचना सीधी पहुचती है। इस प्रकार की सूचना को प्रेरक सूचना कहा जाता है। 
  5. नीति सम्बन्धी सूचना : इसके अन्तर्गत निर्णय निर्धारण प्रक्रिया से सम्बन्धित सूचना आती है। इसके अन्तर्गत संयुक्त गतिविधियों की परिभाषायें, उद्देश्य , जिम्मेदारियों का निर्धारण, कार्यों का विकेन्द्रीकरण आदि को स म्मिलित किया जा सकता है।
  6. दिशा सूचक सूचना : बिना सहयोग के सामूहिक गतिविधिया प्रभावी तरीके से अग्रसर नहीं हो सकती हैं तथा यह दिशासूचक सूचना ही है जिसके द्वारा ही सहयोग तथा सम्न्वय प्राप्त किया जा सकता है। सूचना सामाजिक गुणों के आधार पर व्युत्पन्न होती है। ज्ञान की जिस प्रकार की शाखा होती है वैसी ही सूचना बन जाती है। सूचना कैसी भी हो, कितनी भी महत्त्वपूर्ण हो, वह तब तक प्रभावी नहीं होती है, जब तक कि वह उसके चाहने वाले तक न प हुच जाये। यह तभी सम्भव है जब सूचना का संचार उचित तरीके से हो।

सूचना का स्वरूप

आज एक और परिवर्तन सूचनाओं के सन्दर्भ में जो हुआ है वह यह कि आज तेजी से सूचनाओं का स्वरूप भी बदला है। यथ्द ग्रामीण क्षेत्र के सन्दर्भ में हम देखें तो यह स्वरूप अत्य न्त बदला हुआ दिखाई देगा। ग्रामीण क्षेत्रें में जहा एक तरपफ सूचनाओं का स्वरूप बदला है वहीं दूसरी ओर उनमें विभिन्नतायें भी बहुत ज्यादा दिखाई दे रही हैं। सूचना के स्वरूप को परिभाषाबद्व करने के लिये अनेक सिद्वान्त प्रतिपादित किये हैं, जिनका उल्लेख क्रमबद्व किया जा रहा है।
  1. सूचना का गणितीय सिद्वान्त : सम्प्रेषण यान्त्रिकी, कम्प्यूटर एवं टेलीग्रापफी के क्षेत्र में कार्यरत शैनान एवं वीवर सूचना की मात्रा सन्देश के रूप में प्रेषित करने हेतु उसे निश्चित करना चाहते थे। यह सिद्वान्त इनके प्रारम्भिक शोध पर आधारित है जिसका लक्ष्य सूचना के तात्पर्य के रूप में इसे एक औपचारिक एवं संख्यात्मक परिभाषा प्रदान करना था। उनके अनुसार सूचना की मात्रा किसी सन्देश में कोई क्या कहता है उस पर आधारित होती है जो उप लब्ध शब्दावली के आकार पर निर्भर करता है।
  2. शब्दार्थ सूचना सिद्वान्त : इस सिद्वान्त के परिप्रेक्ष में शैनान के ‘थोड़ा’ (Bit) की अवधारणा उपयुक्त सिद्व नहीं होती। सूचना को किसी वस्तु के एक प्रवाह की संज्ञा नहीं दी जा सकती। पफेयर थार्न के अनुसार - जहा सूचना एक ऐसी वस्तु है जिसे निचोड़कर इस प्रकार निकाला जा सकता है जिस प्रकार किसी वस्तु से जल निकाला जा सकता है। सूचना वास्तव में प्राप्तकर्ता से प्रभावित होती है। शैनान के नमूने में यह मान लिया जाता है कि पूर्व ज्ञान की स्थिति किसी देश में सूचना की मात्रा को कम कर देती है।
  3. सूचना का निर्णायक मूल्य : प्राविधिक स्तर पर सूचना की परिभाषा ‘‘थोड़ा-सा’’ (Bits) के सन्दर्भ में की जा सकती है। इसी प्रकार सम्प्रेषित प्रतीक अभीष्ट तात्पर्य को कितनी मात्रा और किस ढंग से उपयुक्त सूचना की अभिव्यक्त में सफल होते हैं, इसे शब्दार्थ समस्या के परिपे्रक्ष में सोचा जा सकता है। इसके विकल्प में एक उपयोगी नमूने को हाइटमोर एवं योविट्स ने विकसित किया है जिसे सामान्यीकृत सूचना विधि की संज्ञा दी गई है। इसके अनुसार सूचना निर्णय लेने की दृष्टि से एक मूल्यवान एवं मार्गदर्शक विवरण तथा तथ्य होता है। सूचना किसी अनिश्चित अवस्था के निदान ढूंढने में सहायक सिद्ध होती है जिसकी अपेक्षा निर्णायक मण्डल किसी भी सूचना प्रणाली से करते हैं। इस प्रकार सामान्यीकृत सूचना व्यवस्था बौद्विक दृष्टि से स्वच्छ होता है।

सूचना का प्रसार

डॉö हरिमोहन सूचना और संचार को मिलते-जुलते पद मानते हैं। बिना सूचना के संचार की कल्पना नहीं की जा सकती और बिना संचार के सूचना भी अधूरी है। 15 शुरू -शुरू में ज्ञान को ‘शक्ति’ का दर्जा हासि ल था। ज्ञानी-ध्यानी आदमी का बड़ा सम्मान होता था। परन्तु अब समाज में मान-मर्यादा व प्रतिष्ठा के प हलू बदल गये हैं। अब ज्ञान पीछे रह गया है तथा ‘सूचना’ आगे आ गई है। इस लिये आज ‘सूचना’ ही शक्ति बन गई है। किसी व्यक्त की शक्ति उसकी सूचना तक पहुँच से आंकी जाती है। जिसके पास सूचनाओं का जखीरा है वह व्यक्त उतना ही प्रभावशाली है। सूचना सम्प्रेषण से आदमी जितना दूर है वह उतना ही पिछ़डा रहता है। सूचनायें हमें परम्परागत माध्यमों, परम्परागत साधनों तथा इलैक्ट्रोनिक व प्रिन्ट माध्यमों से मिलती है।

सूचनायें गली, मौहल्ले, बगड़, गाव, कस्बे व शहर की हो सकती है। हमें सिर्फ नई सूचना से मतलब है। नई सूचना ही हमें उद्वेलित करती है हम सदैव तत्पर रहते हैं कि दूसरों से ताजी सूचना हमें मिलें। सूचना पत्र-पत्रिका, रेडियो, टेलीविजन, एसएमएस, ब्लॉग, फेसबुक व ट्विटर के जरिये मिलती हैं। जैसी सूचना मिलती है वह ठीक वैसी ही दूसरों तक भेज दी गई है तो विश्वसनीयता की परिधि में आती है। इसी वास्तविकता से सूचना की विश्वसनीयता बढ़ती है। सूचनायें मनुष्य के लिये हथियार तभी बनती हैं जबकि आवश्यकतानुसार संयथ्मत तरीके से प्रयोग हो सके। परम्परागत संचार माध्यमों से लेकर पत्र, टेलीपफोन, सेलपफोन, ब्लूटूथ, रेडियो, दूरदर्शन, कम्प्यूटर, इन्टरनेट, ब्लॉग, फेसबुक, पेजर, ट्विटर, सीडी व डीवीडी आदि न जाने कितने माध्यम हैं जो सूचना प्रसार का काम करते हैं।

सूचना के अभिगम

वरसिंग तथा नेवेलिंग ने सूचना के छ: अभिगम बताये हैं-
  1. संरचनात्मक अभिगम : इस अभिगम के अन्तर्गत सूचना विश्व की संरचना के अन्तर्गत होती है। भौतिक वस्तुओं के मध्य स्थाई सम्बन्धों के रूप में देखा गया है। 
  2. ज्ञान अभिगम : इस अभिगम में ज्ञान को अभिलिखित किया जाता है जो संसार की संरचना के प्रत्यक्ष बोध के आधार पर निर्मित ज्ञान का अभिलेखन करता है। 
  3. सन्देश अभिगम : संचार के गणितीयथ्सद्वान्त से इस अभिगम को काम में लाया जाता है। जिसमे सूचना को तेजी से ले जाने वाले भौतिक प्रतीकों के रूप में अभिलेखित किया जाता है। 
  4. अर्थ अभिगम: इस अभिगम में एक स न्देश की अर्थपूर्ण विषय वस्तु को संचार के रूप में स्वीकार किया जाता है। 
  5. प्रभाव अभिगम : यह अभिगम कहता है कि सूचना केवल प्रक्रिया के विशेष प्रभाव से घटित होती है या मिलती है। 
  6. प्रक्रिया अभिगम : इस अभिगम के अनुसार सूचना एक प्रक्रिया के रूप में देखी जाती है जिसमें समस्या तथा महत्त्वपूर्ण आकड़ें मानव मस्तिष्क में साथ-साथ आते हैं तो प्रक्रिया स्वरूप सूचना उत्पन्न होती है। 
उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि न तो कोई सूचना का रंग होता है न कोई भौतिक स्वरूप । यह एक ऐसा स्वाभाविक गुण है जिसे मस्तिष्क में रखा जा सकता है। सूचना एक सामाजिक प्रक्रिया है, जरूरत के अनुसार इसका स्वरूप भी बदलता रहता है।

सूचनाओं की विशेषतायें

सूचना की विशेषताओं को मुख्य रूप से दो भागों में बाटा जा सकता है -
  1. स्वाभाविक विशेषतायें
  2. पाठक निर्भर विशेषताये
1. स्वाभाविक विशेषताओं के अन्तर्गत इन विशेषताओं को सम्मिलित किया जा सकता है-
  1. यह सारपूर्ण तथा उद्देश्य पूर्ण होती है।
  2. यह एक समुचित ढाचे में होती हैं तथा विश्लेषित की जा सकती है।
  3. यह सास्कृत, निष्कर्षित तथा सारांशित होती हैं।
  4. यह स्मरण करने, अन्य टुकड़ों को एक-दूसरे से सम्बन्धित करने या प्रसार करने वाली हो सकती हैं। यह अभिलेखित व अनूदित की जा सकती है।
  5. इनकी प्रतिनियुक्ति की जा सकती हैं।
2. पाठक निर्भर विशेषताओं की श्रेणी में इन को रखा जा सकता है-
  1. यह मूल्यांकन योग्य व व्याख्यात्मक हो सकती है।
  2. इसका गलत उपयोग भी किया जा सकता है।

सूचना के गुण

  1. सूचना का हम उपयोग करते चले जायें, यह खत्म नहीं होगी। 
  2. इसमें बहुत सारे लोगों की साझेदारी हो सकती है तथा यह एक साथ किसी को भी नुकसान पहुचाये बिना प्रयोग में लाई जा सकती है।
  3. यह लोकतान्त्रिक संसाधन है जिसका उपयोग हर वर्ग किसी भी सम्य कर सकता है।
अत: सूचनायें सारपूर्ण, सास्कृत, सारांशित होती है जिनका मूल्यांकन व व्याख्या सम्भव है। इसके उपयोग करने से यह खत्म नहीं होगी। यह समूह या समाज द्वारा साझी भी प्रयोग में लाई जा सकती हैं। ग्रहण करने के सामथ्र्यानुसार सूचना का उपयोग किया जा सकता है। विकासके इस युग में सूचना का महत्त्व उसके गुणों के कारण ही है जो प्रमाणिक स्त्रोत के रूप में स्थापि त है।

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