आहार का अर्थ, परिभाषा, महत्व एवं आवश्यकता

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आहार का अर्थ

आहार का अर्थ है भीतर लेना। मुँह से खाना, पीना, नाक से श्वांस लेना, त्वचा से वायु का- धूप का ग्रहण करना, आदि को भी आहार के अन्तर्गत ही समझना चाहिए। जन्म के पहले माँ के रक्त द्वारा बालक को पोषण होता है, जन्म के बाद माँ का स्तन-पान ही उसका आहार है। प्रत्येक व्यक्ति को स्वस्थ रहने के लिए यह आवश्यक है कि वह सन्तुलित आहार लें। आहार क्या है इसको
  1. ‘‘आहार विज्ञान कला एवं विज्ञान का वह समन्वयात्मक रूप है जिसके द्वारा व्यक्ति विशेष या व्यक्तियों के समूह को पोषण तथा व्यवस्था के सिद्धान्तों के अनुसार विभिन्न आर्थिक तथा शारीरिक स्थितियों के अनुरूप दिया जाता है। आहार को कला व विज्ञान इसलिए कहा जाता है कि आहार विज्ञान न केवल यह बताता है कि कौन-कौन से पोषक तत्व किस प्रकार लेने चाहिए या उसके क्या परिणाम हो सकते हैं। बल्कि यह भी बताता है कि उचित स्वास्थ्य के लिए कौन-कौन से पोषक तत्व कितनी मात्रा में लिये जायें। 
  2. आहार को व्यक्ति के भोजन की खुराक भी कहा जाता है अर्थात् ‘‘व्यक्ति भूख लगने पर एक बार में जितना ग्रहण करता है, वह भोजन की मात्रा उस व्यक्ति का आहार (DIET) कहलाती है। 
  3. आहार वह ठोस अथवा तरल पदार्थ है जो जीवित रहने, स्वास्थ्य को बनाये रखने, सामाजिक एवं पारिवारिक सम्बन्धों की एकता हेतु संवेगात्मक तृप्ति, सुरक्षा, प्रेम आदि हेतु आवश्यक होता है। व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक और सामाजिक क्षमता के संतुलन के लिए आहार अत्यन्त आवश्यक है।
उपनिषदों में कहा गया है कि- आहार शुद्धौ, सत्व शुद्धि: सत्व शुद्धौ ध््रुवा स्मृति: अर्थात् आहार शुद्ध होने से अंत:करण शुद्ध होता है और अंत:करण शुद्ध होने पर विवेक बुद्धि ठीक काम करती है।

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने लिखा है कि ‘‘आहार का जीवन की गतिविधियों से गहरा संबंध है। जिस व्यक्ति का जैसा भोजन होगा उसका आचरण भी तदनुकूल होगा।’’ आहार शब्द का प्रयोजन या नाम सुनते ही हमारे सामने अनगिनत तस्वीरें उभरकर आती हैं। आम तौर पर आहार का सम्बन्ध पारिवारिक और अन्य सामूहिक भोजन से जुड़ा है। इस प्रकार आहार जीवन के प्रत्येक पहलू से घनिष्ठ रूप से गुँथा है। आहार ही जीवनदाता है।

शरीर को स्वस्थ रखने के लिये उचित भोजन का उचित मात्रा में होना बहुत आवश्यक है अर्थात् अच्छे स्वास्थ्य का सीधा सम्बन्ध हमारे खान-पान से जुड़ा है। लेकिन यह जानना आवश्यक है कि स्वस्थ रहने के लिये क्या और कितनी मात्रा में खाना चाहिए?

भोजन क्या है? अगर इस तथ्य पर ध्यान दिया जाय तो भोजन शब्द का संबंध शरीर को पौष्टिकता प्रदान करने वाले पदार्थ में है। भोजन में वे सभी ठोस, अर्द्ध तरल और तरल पदार्थ शामिल हैं जो शरीर को पौष्टिकता प्रदान करते हैं। भोजन हमारे शरीर की मूलभूत आवश्यकता है। भोजन में कुछ ऐसे रासायनिक पदार्थ होते हैं जो हमारे शरीर के लिए महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। भोजन से मिलने वाले इन रासायनिक पदार्थों को पोषक तत्व कहते हैं।यदि ये पोषक तत्व हमारे भोजन में उचित मात्रा में विद्यमान नहीं हो तो इसका परिणाम अस्वस्थता या मृत्यु तक भी हो सकती है। भोजन में पोषक तत्वों के अलावा, कुछ अन्य रासायनिक पदार्थ होते हैं, जो कि अपोषक तत्व कहते हैं। जैसे कि भोजन को उसकी विशेष गंध देने वाले पदार्थ, भोजन में पाए जाने वाले प्राकृतिक रंग इत्यादि। इस प्रकार भोजन पोषक तत्वों और अपोषक तत्वों का जटिल मिश्रण है।

आहार अथवा भोजन क्यों लिया जाता है?

सर्वप्रथम तो स्वाभाविक रूप से जब भूख लगती है, उसकी निवृत्ति के लिए और शरीर का पोषण करने तथा शक्ति प्राप्त के लिए आहार लिया जाता है। शारीरिक स्वास्थ्य के अलावा मानसिक स्वास्थ्य भी आहार पर निर्भर है। शारीरिक स्वास्थ्य का मूल आधार है- संतुलित भोजन। शारीरिक क्रिया संचालन के लिए जो तत्व अपेक्षित है उन सबका हमारे भोजन में होना आवश्यक है और यही संतुलित भोजन है। प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, खनिज, विटामिन, क्षार तथा लौह आदि उचित मात्रा में लेने से शरीर स्वस्थ और क्रिया करने में सक्षम रहता है। उचित मात्रा में जल सेवन भी अति आवश्यक है।

आहार की परिभाषा-

  1. ‘‘शब्द स्तोम’’ ग्रन्थ के अनुसार-देहधारी प्रतिक्षण अपने परिश्रम से शारीरिक उपादानों का हृास करता है और उसकी पूर्ति के लिए जिस द्रव्य की आवश्यकता पड़ती है उसी का नाम ‘‘आहार’’ है। 
  2. हैरी बेंजामिन के अनुसार- आहार उन उपादानों को पूरा करता है जो शरीर की वृद्धि, निर्माण तथा शारीरिक अवयवों के उपयुक्त संचालन के लिए आवश्यक हैं। यह सम्पूर्ण मानव शरीर के कार्यों को साम्यावस्था में रखता है जिससे शरीर रूपी यंत्र अपनी शक्तिपर्यन्त कार्य करता है। अंग्रेजी में इसे ‘फूड’ कहते हैं।
  3. आचार्य चरक के अनुसार- द्रव्य (आहार द्रव्य) पंचभौतिक हैं। पृथ्वी तल पर सूर्य के ताप तथा जलवायु की सहायता से प्रकृति के उत्पन्न किये हुए शरीरोपयोगी द्रव्य ही आहार हैं।
  4. आयुर्वेद के प्रणेता भगवान धन्वन्तरी के अनुसार- ‘‘प्राणियों के बल, वीर्य और ओज का मूल आहार है’’- वह छ: रसों के आधीन है और रस पुन: द्रव्यों के आधीन होते हैं; दोषों का क्षय, दोषों की वृद्धि तथा दोषों की समता, द्रव्यों के रस-गुण-विपाक और वीर्य के कारण हुआ करती है। ब्रह्मादि लोक की भी स्थिति, उत्पत्ति और विनाश का कारण आहार ही है। आहार से ही शरीर की वृद्धि, बल, आरोग्य, वीर्य और इन्द्रियों की प्रसन्नता उत्पन्न होती है और आहार ही की विषमता से रोग उत्पन्न हुआ करते हैं। जिसमें भोज्य, पेय, लेध्य और भक्ष्य ऐसे चार प्रकार हैं; जो नाना द्रव्यों से बने हुए हैं, जिसमें खाद्य के नाना प्रकार होते हैं और जिनके सेवन से शरीर में बहुविध शक्ति उत्पन्न होती है।
  5. महर्षि सुश्रुत के अनुसार- समस्त जीव मात्र का मूल आहार है। भगवान आत्रेय के अनुसार- ‘‘अन्नं वै प्राणिनां प्राणा:।’’ इष्ट वर्ण गन्धरसस्पर्शयुक्त विधि विहित अन्न पान को प्राणधारियों का ‘प्राण’ कहा है। क्योंकि यह प्रत्यक्ष है कि उक्त गुण सम्पन्न र्इंधन (भोजन) से ही अन्तराग्नि-कायाग्नि की स्थिति है। उक्त गुण सम्पन्न र्इंधन (भोजन) से ही हमारी इन्द्रियाँ प्रसन्न रहती हैं। शरीर धातु पुष्ट होता है, बल बढ़ता है और सत्व उर्जित होता है।
  6. बाइबिल कहती है- ‘‘और खुदा ने कहा, देखो मैंने हर एक बीजधारी वनस्पति को, जो सारी धरती पर व्याप्त है और हर एक पेड़ को जिसमें बीज उपजाने वाला फल है, तुम्हें दिया वही तुम्हारी खुराक होगी। 
  7. उपनिषद् के अनुसार- अन्नादध्मेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। अन्नेव जातानि जीवन्ति। अन्नं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। (तैत्तिरीयोपनिषद 3/2) अन्न से ही सभी प्राणी जन्म लेते हैं। अन्न से ही सभी जीते हैं और अन्त में अन्न में ही समा जाते हैं। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने- अश्नत: और आहार ये दो शब्द कहे हैं। आहार वह वस्तु है जिसे ग्रहण करने से मन-प्राण और शरीर चल पाते हैं।

आहार का महत्व-

‘‘मनुष्य अपनी थाली पर ही बनता या बिगड़ता है’’ यह कहावत सर्वत्र प्रसिद्ध है। ‘‘अन्नो वै प्राणिनां प्राण:’’ कोई भी प्राणी आहार के बिना जीवित नहीं रह सकता।

रोगों का मूल कारण कुत्सित आहार-

यदि मनुष्य के प्रत्येक रोग के मूल कारण को देखा जाए तो चलेगा कि मानव का कुत्सित भ्रमपूर्ण भोजन (आहार) ही उसका उत्पादक है। जो पोषक होता है वही अयथावत प्रयोग से दूषण का कार्य करता है। शरीर जिन-जिन उपादानों को मांगता है यदि उसे उपयुक्त मात्रा में उपयुक्त समय पर न दिया जाय तो वह ठीक-ठीक कार्य न कर सकेगा। और पोषण के अभाव में वह दुर्बल तथा नाना तरह की आधि-व्याधि से परिपूर्ण हो जायेगा। व्याधि शरीर के लिए काष्ठगत घुन के समान है जो अन्दर उसे निस्सार बना देते हैं, निरूपयोगी कर देते हैं। मानव शरीर एक ऐसा कारखाना है जो स्वयमेव सुव्यवस्थित हो जाता है, स्वयमेव नियमबद्धता को प्राप्त करता है और स्वयमेव सुधार करता है, स्वयमेव विकसित होता है। जो शक्ति उसे सृजती है वही उसकी रक्षा भी करती है। आवश्यकता है केवल उसे उपयुक्त र्इंधन (आहार) पहुँचाते रहने की।

मानव वंश की उत्पत्ति में आहार का महत्व- 

पुरातन समय में भयंकर से भयंकर कष्ट उठाकर भी विभिन्न देशों में पर्यटन, कृषि, पशुपालन, वाणिज्य आदि अपने तथा अपने आश्रितों के भूख शमन करने के लिए किये जाते थे। आधुनिक युग में भी इस पेट के लिए इसी प्रकार के अनेक स्थानान्तर करने पड़े हैं और पड़ रहे हैं। ‘‘वाजो न: सप्त प्रदिश शस्त्रो वो परावत:। वाजो नो विजुर्देवैर्धनसाताविहावतु।।’’ -यजुर्वेद 18.32 अर्थात् हमारे अन्न ज्ञान ऐश्वर्य पराक्रम आदि चारों लोकों और सातों दिशाओं में अभिवृद्धि को प्राप्त हों। समस्त दिव्य शक्तियाँ हमारे धन-धान्य की रक्षा करें। आहार मानव के विकास की आधारशिला है। संसार में विभिन्न प्रकार की सभ्यताओं का विकास उत्तम आहार की उपलब्धि हेतु एक स्थान से दूसरे स्थान के भ्रमण एवं सर्वेक्षण के परिणामस्वरूप हुआ है। यहाँ तक कि प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक में युद्ध और महायुद्ध भी अधिक सम्पन्नता तथा उत्तम आहार की प्राप्ति हेतु ही हुए हैं। मानव को इस उपलब्धि के लिए प्रकृति से भी निरंतर संघर्ष करना पड़ा। क्योंकि अनियंत्रित प्राकृतिक नियम उसकी भौतिक आकांक्षाओं के पूरा होने में बाधा उपस्थित करते हैं। आयुर्वेदीय साहित्य में शरीर एवं व्याधि दोनों को आहार सम्भव माना गया है-‘‘आहारसम्भवं वस्तु रोगाश्याहारसम्भवा:’’ -च.सू.28/45 आर्यशास्त्र में अन्यान्य यज्ञों की तरह भोजन व्यापार को भी एक नित्यया कहा गया है। इस नित्ययज्ञ के यज्ञेश्वर भगवान वैश्वानर कहे गए हैं, यथा-अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रिता:। प्राणापानसमायुक्त: पचाम्यन्नं चतुविर्धम्।। -गीता 15/14 श्री भगवान वैश्वानर (जठराग्नि) रूप से प्रत्येक प्राणी में बैठकर प्राण और अपान वायु की सहकारिता से चव्र्य, चोष्य, लेह्य तथा पेय- इन चार प्रकार के भोज्य अन्नों को भक्षण करते हैं। अन्तत: आर्य भोजन से केवल उदरपूर्ति ही नहीं होती। अपितु श्री भगवान की पूजा भी होती है।

मानसिक स्वास्थ्य अन्न पर निर्भर- 

छान्दोग्योपनिषद् में कहा गया है-‘‘आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धि: सत्त्वशुद्धौ धु्रवा स्मृति: स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्ष:।’’ अर्थात् आहार के पाचन में तीन भागों में विभक्त हो जाता है- स्थूल असार अंश से मल बनता है, मध्यम अंश से मांस बनता है और सूक्ष्म अंश से मन की पुष्टि होती है। मन अन्नमय ही है। आहारशुद्धि से सत्त्वशुद्धि (मनशुद्धि), सत्त्वशुद्धि से ध्रुवा स्मृति और स्मृतिशुद्धि से सभी ग्रन्थियों का मोचन होता है। अत: सिद्ध हुआ कि अन्न से ही मन बनता है। भारतीय दर्शन में ठीक ही कहा गया है- ‘‘अन्नो वै मन:’’।
इस प्रकार हम देखते हैं कि शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य सभी अन्न पर निर्भर करते हैं। यह एक सर्वाधिक आवश्यक एवं महत्वपूर्ण तत्त्व है जीवन के लिए।

आहार की आवश्यकता

शरीर की सुरक्षा, उसे गतिशील रखने और उसे पोषण प्रदान करने के लिए आहार की आवश्यकता होती है। आहार शरीर के समुचित विकास, स्वास्थ्य एवं सुख का हेतु है। अत: आहार की समुचित संतुलित मात्रा ही लाभदायक है। आहार से शरीर का पोषण होता है तथा बल, वर्ण, आयु, ओजस और तेजस की प्राप्ति होती है।

आचार्य श्रीराम शर्मा कहते हैं-‘‘आहार का मुख्य उद्देश्य शरीर की क्षीणता अथवा घिसाई की पूर्ति करना और उसकी वृद्धि करना भी है। आहार से हमारे शरीर में ताप की उत्पत्ति भी होती है जो हमारे जीवन का लक्षण है।’’

‘शरीर माद्यं खलु धर्म साधनम्’

धर्म का प्रथम साधन है, शरीर का निरोग रहना। चरक संहिता में कहा गया है कि धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष- इस पुरूषार्थ चतुष्टय की प्राप्ति का मूल कारण शरीर का आरोग्य रहना है। शास्त्रकारों ने स्वास्थ्य की रक्षा के प्रयोजन को निर्दिष्ट करते हुए कहा है-

‘‘सर्वमन्यत् परित्यज्य शरीरमनुपालयेत्।
तदभावे हि भावनां सर्वाभाव: शरीरिणाम्।।’’

अर्थात् अन्यान्य कामों को छोड़कर सर्वप्रथम शरीर की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि शरीर का अभाव होने पर सब कुछ का अभाव हो जाता है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि आहार का प्रमुख कार्य जीवनी शक्ति प्रदान करना, शरीर का विकास, पोषण तथा उसकी रक्षा करना है। शरीर को बल, ऊर्जा आदि भोजन द्वारा प्राप्त होता है। भोजन मन का निर्माण भी करता है तभी तो कहा गया है

‘‘जैसा खाये अन्न वैसा बने मन’’

युक्तिव्यपाश्रय चिकित्सा में औषध और आहार की ही योजना की जाती है। अन्न को प्राणियों का प्राण कहा गया है-

‘‘प्राणा: प्राणभृतामन्नमन्नम्’’

आहार से बल, वर्ण तथा ओजस् की प्राप्ति होती है। इस प्रकार आहार स्वस्थ तथा रोगी दोनों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है। बिना समुचित आहार के स्वस्थ व्यक्ति स्वस्थ नहीं रह सकता और बिना उचित पथ्य-व्यवस्था के रोगी में चिकित्सा कर्म सफल नहीं हो सकता।

पोषण-

शरीर का पोषण अन्न ग्रहण करने से होता है। खाद्य वस्तुओं को ग्रहण करने के बाद शरीर में पाचन तन्त्र द्वारा की गयी विभिन्न प्रक्रियाओं द्वारा उनके पोषक अंश शरीर सात्म्य पदार्थ में परिवर्तित किये जाते हैं, जिससे रस, रक्त एवं मांस आदि शारीरिक तत्वों का वर्धन होता है। शरीर सात्म्य पदार्थों को शरीर में जमा किया जाता है। और अन्नादि के जो त्याज्य पदार्थ होते हैं, वे मलरूप में शरीर के बाहर फेंक दिये जाते हैं; जैसे- मल, मूत्र, पसीना, उच्छ्वास आदि। इससे शरीर की क्रिया सुचारू रूप से चलती है।

स्वास्थ्य-

स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त आहार आवश्यक है। शरीर और आहार - ये दोनों पांचभौतिक है। आहार के माध्यम से ही शरीर के अवयवों की सम्पुष्टि होती है। पथ्याहार ही शारीरिक विकास का कारण बनता है, जबकि अपथ्याहार व्याधि का कारण बनता है। दोष धातु-मल एवं स्त्रोतस् ही शरीर के मूल हैं। पथ्य विशेष रूप से शरीर के दोष एवं धातुओं को सम्पुष्ट करता हुआ उन्हें सम बनाये रखता है। अपथ्य की इसकी विपरीत स्थिति होती है।

शरीर का र्इंधन- 

प्राणधारी के शरीर के अन्दर संहार (केटाबोलिक प्रोसेस) और सृृजन (एनाबोलिक प्रोसेस) चलती रहती है। इन्हें सम्मिलित रूप में मेटाबोलिक प्रोसेस कहा जाता है। इस व्यवस्था को अक्षुण्ण रखने के लिए हम सदा उपयुक्त र्इंधन (आहार) देते रहते हैं। जब र्इंधन की कमी होती है तो उसकी प्रतीति हमें निम्न तीन संवेदनाओं द्वारा होती है- प्यास, क्षुधा और श्वांस। हमारा आहार भी मुख्यत: उक्त तीन प्रकार के होते हैं। मेटाबोलिक प्रोसेस को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए तीन प्रकार के वस्तुओं की आवश्यकता होती है। यथा कुछ ठोस पदार्थों की, कुछ द्रव पदार्थों की और कुछ वायवीय पदार्थों की। अत: जब हमारे शरीर के अन्दर द्रव पदार्थ की कमी होती है, उसे प्यास कहते हैं। जब ठोस पदार्थ की कमी की संवेदना होती है तो उसे हम क्षुधा नाम देते हैं। इसी प्रकार वायवीय की संवदना को श्वांस कहते हैं।

शरीरोष्मा को बनाये रखने के लिए- 

जिस प्रकार किसी मशीन को चालू रखने के लिए उसमें ताप उत्पन्न करने के लिए ईधन देना पड़ता है; उसी प्रकार मानव शरीर रूपी मशीन को भी चालू रखने के लिए ताप या शक्ति की आवश्यकता पड़ती है। और शरीर के ताप को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए ईधन (आहार) की आवश्यकता पड़ती है। र्इंधन के अभाव से ताप का क्रमश: अभाव होने लगता है और ताप के अभाव में मशीनवत शरीर अकर्मण्य हो जाता है। र्इंधन के अभाव में शरीरोष्मा (कायाग्नि) अपने को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए शरीरोपादान का क्रमश: विनाश होने लगता है। इस प्रकार शरीरोपादान के समाप्त हो जाने पर शरीरोष्मा का क्रमश: लय होने लगता है। ताप के लय होने से जीवन का भी लय हो जाता है क्योंकि ताप ही जीवन है। इसी से वेदों में अग्नि का नाम ‘तनूनपात्’ अर्थात् ‘‘तनून् न पातयति’’ ऐसा आया है। अत: शारीरिक ताप को बनाये रखने के लिए तथा आवश्यक धातु निर्माण के लिए उपयुक्त आहार का होना परम आवश्यक है।

धातु निर्माण के लिए आवश्यक-

धातु निर्माण अर्थात् टिसू बिल्डिंग आहार के प्रोटीनांश से होता है।

शक्ति निर्माण के लिए आवश्यक- 

शक्ति निर्माण भोजन के उस अंश से होता है जिसे कार्बोहाइड्रेट तथा फैट कहते हैं। जल भोजन का तरल मिश्रण बना देता है जो परिपचन, परिशोषण, धातु निर्माण तथा मल-नि:सारण के लिए आवश्यक है। लवण पाचन तथा धातु निर्माण में सहायक है। उक्त सारी क्रियाओं का नियामक विटामिन है।

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