दिनचर्या क्या है दैनिक जीवन में दिनचर्या का क्या महत्व है ?

दिनचर्या शब्द दिन चर्या दो शब्दों से मिलकर बना है। दिन का अर्थ है दिवस तथा चर्या का अर्थ है। चरण अथवा आचरण से हैं। अर्थात् प्रतिदिन की चर्या को दिनचर्या कहते हैं। दिनचर्या एक आदर्श समय सारणी है जो प्रकृति की क्रमबद्धता को अपनाती है, तथा उसी का अनुसरण करने का निर्देश देती है। 

दिनचर्या की परिभाषा 

दिनचर्या नित्य कर्मो की एक क्रमबद्ध श्रृंखला है। जिसका हर एक अंग अत्यन्त महत्वपूर्ण है और क्रमवार किया जाता है। दिनचर्या के अनेक बिन्दु नितिशास्त्र एवं धर्मशास्त्र के ग्रन्थों से लिए जाते हैं। परन्तु मुख्यत: आयुर्वेदोक्त हैं। आयुर्वेद के ग्रन्थों व नीतिशास्त्रों में दिनचर्या को इस प्रकार परिभाषित किया गया है।

‘‘प्रतिदिनं कर्त्तव्या चर्या दिनचर्या’’ (इन्दू)
 
अर्थात् प्रतिदिन करने योग्य चर्या को दिनचर्या कहा जाता है।
 
‘‘दिनेदिने चर्या दिनस्य वा चर्या दिनचर्या। (चरणचर्या)

अर्थात् प्रतिदिन की चर्या को दिनचर्या कहते है।
 
उभयलोकहितंमाहारचेष्टितं प्रतिदिने यत्कर्त्तव्ये।। (अरूण दत्त)

अर्थात् इहलोक तथा परलोक में हितकर आहार एवं चेष्टा को दिनचर्या में रखा जाता है। दिनचर्या का मुख्य रूप से प्रतिपादन आयुर्वेद के ग्रन्थों में स्वास्थ्य रक्षण हेतु किया गया है। दिनचर्या को प्रधान विशय मानकर उसी के आधार पर अध्यायों का नामकरण किया है। आचार्य सुश्रुत ने दिनचर्या का वर्णन अनागत बाधा प्रतिशेध अध्याय में किया गया है।

‘‘अनागत ईशदागत:, नञ् अत्र ईशदेर्थे: अबाधा दुखं
व्याधिरित्यर्थ: य तस्य प्रतितेधश्चिकित्सतम्। (सु0 डल्हण टीका)

अर्थात् नहीं आए हुए और सम्भावित दुखों और रोगों को रोकने के लिए जो चिकित्सा विधि है। वह दिनचर्या है।

दिनचर्या का महत्व

आयुर्वेद शब्द का अर्थ होता है जीवन का विज्ञान। साधारण शब्दों में जीवन जीने की कला ही आयुर्वेद है। क्योंकि यह विज्ञान जीवन जीने के लिए आवश्यक सभी प्रकार के ज्ञान की प्राप्ति कराता है। तथा साथ ही साथ रोगों तथा उनकी चिकित्सा का निराकरण भी कराता है। इस प्रकार आयुर्वेद एक इस प्रकार की चिकित्सा प्रणाली है, जो स्वास्थ्य और रोग दोनों के लिए क्रमश: ज्ञान प्रदान करता है। 

आयुर्वेद का मुख्य उद्देश्य स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य का रक्षण करना तथा रोगी व्यक्ति के विकारों का प्रशमन करना है। जैसा कि कहा गया है -

‘‘दोष धातु मल मूलं हि शरीरम्।’’ (सु0 सू0 15/3) 

अर्थात् शरीर में दोष, धातु, मल की स्थिति पर ही स्वास्थ्य का बनना और बिगड़ना निर्भर करता है। शरीर में दोषों का दूषित होना हमारे आहार - विहार पर निर्भर करता है।

दोष मनुष्य के गलत आहार - विहार के कारण दूषित होते है, जब ये दूषित होते है तो धातुओं को दूषित करते है। इस प्रकार किसी एक दोष की वृद्धि या क्षय की स्थिति उत्पन्न होती है। जिससे रोग उत्पन्न होते है। इन दोषों की साम्यावस्था बनाये रखने के लिए आयुर्वेद में दिनचर्या और रात्रिचर्या तथा ऋतुचर्या के अनुसार आहार - विहार का वर्णन किया गया है। जिसे आयुर्वेद में स्वस्थवृत्त कहा गया है।

दिनचर्या दिन में सेवन करने योग्य आहार - विहार का क्रम है। दिनचर्या के पालनीय नियमों को अपनाने से उसके अनुसार आचरण करने से स्वास्थ्य की रक्षा होती है, और रोगों के आक्रमण से भी बचा जा सकता है। अत: रोगों से रक्षा तथा पूर्ण स्वास्थ्य की प्राप्ति हेतु ही दिनचर्या की आवश्यकता है। दिनचर्या का महत्व इस प्रकार से है - दिनचर्या का आचरण अनागत दुखों एवं रोगों से रक्षा करना है। 

आयुर्वेद के आचार्यो ने जिन अध्यायों में दिनचर्या का वर्णन किया है, उन्हीं अध्यायों में रात्रीचर्या का वर्णन किया है। अर्थात् रात्रीचर्या को भी उन्होंने दिनचर्या के अन्तर्गत माना है और दिनचर्या को प्रधान विषय मानकार उसी के आधार पर अध्यायों का नामकरण किया है। आचार्य सुश्रुत ने दिनचर्या का वर्णन अनागत बाधा प्रतिशेध अध्याय में किया है -
‘‘अनागत ईशदागत: नञ् अत्र ईशदर्थे: अबाधा दुखं
व्याधित्यर्थ: तस्य प्रतिशेधश्चकित्सितम्।।’’ (सु डल्हण टीका) 

अर्थात् नहीं आए हुए और सम्भावित दुखों और रोगों को रोकने की चिकित्सा विधि। इस प्रकार सभी आर्श संहिताओं के आधार पर दिनचर्या के प्रमुख लाभ आचार्यो द्वारा कहे गये है। जो कि दिनचर्या के महत्व का वर्णन करते है -
  1. दिनचर्या का पालन करने से इहलोक तथा परलोक में हितकारी है। क्योंकि दिनचर्या का पालन करने वाला व्यक्ति स्वस्थ रहता है, और समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व को पूर्ण कर अपने परम् लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।
  2. दिनचर्या के पालन से सम्भावित रोगों को होने से पूर्व ही रोका जा सकता है। क्योंकि दिनचर्या के पालनीय नियमों से जीवनी शक्ति प्रबल रहती है। अत: रोग होने की संभावना कम हो जाती है।
  3. दिनचर्या के नियमित पालन से शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, पारिवारिक स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। क्योंकि रोग का प्रभाव केवल व्यक्तिगत नहीं होता है। रोग का प्रभाव सामाजिक व पारिवारिक स्थितियों पर पड़ता है। अत: दिनचर्या के पालन से स्वस्थ समाज का निर्माण होता है तथा शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक, पारिवारिक समग्र स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।
  4. दिनचर्या के पालनीय नियमों में नित्य कर्मों की एक क्रमबद्ध श्रृंखला है। जिसका हर एक अंग महत्वपूर्ण है। जिसके पालन से मन, शरीर, इन्द्रियों पर नियंत्रण स्थापित होता है। जिससे कि व्यक्तित्व परिष्कृत होता है।
  5. आयुर्वेद में स्वस्थ वृत्त के अन्तर्गत दिनचर्या का वर्णन किया गया है। दिनचर्या के पालनीय नियमों से प्राचीन परम्परा हमारे ऋषि - मुनियों द्वारा बनायी गयी परम्परा का संरक्षण होता है। मानवीय मूल्यों का संरक्षण होता है। इन नियमों का पालन कर हमारी वर्षों पुरानी संस्कृति का संरक्षण होता है।

दिनचर्या के पालनीय नियम 

प्रातः काल जागरण

एक स्वस्थ व्यक्ति को प्रातःकाल सूर्य निकलने से पहले उठना चाहिये और अपनी मंगल-कामना तथा आरोग्य रक्षा के लिए सर्वशक्तिमान परमात्मा का स्मरण करना चाहिये। जागते ही पालथी मारकर बैठ जाएँ। ठण्डक हो तो वस्त्र ओढ़े रहें। दोनों हाथ गोदी में रखें, सर्वप्रथम लम्बी सांस लें-नील वर्ण प्रकाश का ध्यान करें, नाक से ही सांस छोड़े, दूसरी श्वास में पीले प्रकाश का ध्यान करते हुये पूर्ववत् क्रिया दोहराये, तीसरी बार फिर रक्त वर्ण का ध्यान करते हुए गहरी श्वास लें, धीरे-धीरे नाक से ही श्वास छोड़ दें। 

मल त्याग

प्रातः काल सूर्याेदय के पूर्व मल त्याग करना दीर्घायु प्रदान करता है। शौच में बैठने की भारतीय विधि ही सर्वाेत्तम है। दाहिने पैर पर जोर देकर बैठने से शौच खुलकर आता है। यदि मल त्याग के समय दाँतों को भींचकर बैठा जाय तो दन्त रोग नहीं होते। मल विसर्जन का जो लोग ध्यान नहीं रखते उनके शरीर में विकार संग्रह होकर रोग उत्पन्न होने लगते हैं। प्रतिदिन प्रत्येक व्यक्ति को दिन में दो बार शौच अवश्य जाना चाहिए, प्रातः आत्मबोध साधना के बाद तथा सायंकाल। 

बहुत से लोग तंबाकू पीकर, बहुत से चाय पीकर और बहुत से कुछ खा-पीकर मल त्याग करते हैं, यह बुरी आदत है। यदि बस्ती छोटी हो, मल-त्याग को बाहर दूर मैदान में जाएं। यदि पाखानों में जाना है, तो वे अति शुद्ध होने चाहिए।

दाँतों की सफाई

दाँतों की सफाई प्रातः एवं सायं सोने से पूर्व करनी चाहिए। इसके लिए दातुन, मंजन, टूथपेस्ट आदि को व्यवहार में लाते हैं। पूर्वकाल में टूथब्रश या टूथपेस्ट नहीं थे जैसा वर्तमान में है, अधिकांश दातुन का व्यवहार करते थे और आजकल भी यह काफी प्रचलित है। दातुन १२ अंगुल लम्बी, कनिष्ठिका अंगुली के आगे के भाग के समान मोटी, सीधी, बिना गाँठ की, स्वस्थ डाल की ताजी होनी चाहिये और ऐसी होनी चाहिये जिसकी अच्छी प्रकार की कूँची बन सके। 

दातुन लेने के लिये तिक्त रस वाले वृक्षों में नीम श्रेष्ठ है, कषाय रस वाले वृक्षों में खदिर श्रेष्ठ है, मधुर रस वाले वृक्षों में महुआ तथा कटु रस वाले वृक्षो में करञ्ज श्रेष्ठ है। आजकल खैर वृक्ष सब स्थानों पर सुलभ नहीं है अतः कषाय रस युक्त वृक्षों में बबूल (कीकर) को श्रेष्ठ मानते हुए उसकी दातुन व्यवहार में लाते हैं। 

डा० डेविड बरनेस का कहना है कि यदि नियमित रूप से नीम की दातुन की जाती रहे तो मुख गुहा में कैंसर रोग नहीं होता, यह सिद्ध है। दातुन के अगले भाग को कुचलकर कूँची बना लेनी चाहिये। फिर उस कूँची से धीरे- धीरे मसूड़ों को हानि न पहुँचाते हुए दिन में दो बार अर्थात् पहली बार प्रातः दांत साफ करते समय पहिले नीचे के दांत साफ करने चाहिए, फिर ऊपर के साफ करने चाहिए। 

मुख-नेत्र धोना 

बहुधा यह समझा जाता है कि यह साधारण सा काम है, परन्तु आपको सावधान रहना चाहिए कि मुख-नेत्र धोने के लिए शुद्ध और यथासंभव ऐसा जल लेना चहिए जो उबाल कर ठंडा किया गया हो। कच्चे तालाब, नदी आदि का जल बहुधा बहुत से रोग-जन्तुओं से परिपूर्ण रहता है और ये जन्तु मुख और दाँतों की जड़ में जमकर बैठ जाते हैं। इनसे भयानक रोग होते हैं। मुख धोने में नेत्रों का धोना भी अत्यन्त सावधानी से होना चाहिए, वरना नेत्रों का सारा सौंदर्य ही नष्ट हो जायगा, क्योंकि रात्रि में बहुत-सा मैल नेत्रों में जमकर सूख जाता है। 

दांत और जीभ को भी अच्छी तरह साफ़ करना चाहिए और जमा हुआ कफ़ निकाल डालना चहिए। इसके बाद अच्छी तरह कुल्ला करना चाहिए। शीतोदक (शीतल जल)से अपने मुख तथा नेत्रों का प्रक्षालन करना चाहिये। ऐसा करने से पीलिका, मुख शोष, पिडिका, व्यंग एवं रक्तपित्तकृत रोग शीघ्र दूर हो जाते हैं। क्षीरी वृक्ष, लोध्र अथवा आमलक क्वाथ से मुख का प्रक्षालन करना चाहिये। इसी प्रकार कोष्ण जल से मुख नेत्र का प्रक्षालन करने से कफ़वात एवं मुखदोष का नाश होता है। 

मालिश 

व्यक्ति को चाहिये कि ऋतु के अनुसार अर्थात् शीतकाल में कुछ उष्ण गुणयुक्त तथा उष्णकाल में शीत गुण युक्त सुगन्धित वात नाशक तैलों से शरीर पर अभ्यंग करें। सरसों का तेल, सुगन्धित तेल, पुष्पवासित और अन्य सुगन्धित द्रव्यों से युक्त तैल कभी वर्जित नहीं होता। तेलों में तिल तैल या सरसों के तेल से मालिश करना अच्छा रहता है। 

1. तैल मर्दन की विधि - सबसे पूर्व तैल नाभि में लगाना चाहिए, उसके बाद हाथों, पैरों के नाखूनों में, पैरों के तलवों का मालिश करने के बाद दोनों पैरों की पिण्डलियों, जंघाओं, फिर दोनों भुजाओं, पीठ, गर्दन, पेट, बाद में सीने की मालिस करनी चाहिए। पैरों, भुजाओं, पीठ की मालिश नीचे से ऊपर की ओर, पेट और छाती की मालिश हृदय से ऊपर की ओर करनी चाहिए। गर्दन की मालिश ऊपर से नीचे की ओर करने से लाभ होता है। 

ग्रीष्म काल में शीतल छाया में तथा शीतकाल में धूप उपलब्ध हो सके तो धूप में ही करनी चाहिए। शीतकाल में मालिश करते समय तेज शीतल वायु का ध्यान रखे, ऐसी स्थिति में कमरे के अन्दर ही मालिश करनी चाहिए। कानों में तेल डालने से वायु के रोग नहीं होते। पैर के तलवों की मालिश करने से नेत्र ज्योति बढ़ती है। प्रतिदिन न हो सके तो अवकाश के दिन अवश्य ही मालिश करनी चाहिए। वैसे मालिश करने में अधिक समय नहीं लगता, नहाने से पहले मालिश करके, क्षौर कर्म के पश्चात् स्नान किया जा सकता है। ज्वर कास आदि रुग्णावस्था में मालिश नहीं करनी चाहिए तथा भोजन के कम से कम तीन घण्टे बाद मालिश करनी चाहिए। 

प्रतिदिन तेल की मालिश करने से वायु विकार, बुढापा, थकावट नहीं होती है। दृष्टि की स्वच्छता, आयु की वृद्धि, निद्रा, सुन्दर त्वचा, शरीर दृढ़ हो जाता है। सिर, कान तथा पैरों में विशेष मालिस करनी चाहिए। स्पर्शन कर्म में वायु प्रधान है, वह स्पर्श का गुण त्वचा में आश्रित है और मालिश त्वचा के लिए अति हितकारी होती है। नित्य मालिश करने से मनुष्य कोमल स्पर्श, पुष्ट अंग वाला और बुढापे में उसके लक्षणों की कमी होकर शरीर सुन्दर हो जाता है। तैल मालिश से आयु बढ़ती है, शरीर की कान्ति बढ़ती है। तेल का महत्त्व घृत से कम नहीं है। तैल में घृत से साठ गुणा शक्ति है, अन्तर केवल इतना है घृत खाने पर गुणकारी है तथा तेल मालिश करने पर। तैल वातनाशक है, अतः तेल मालिश से शरीर में वातजन्य रोग नहीं होते हैं एवं अन्य कोई विकार भी सरलता से नहीं होते हैं। 

अभ्यंग से शरीर दृढ़, सुन्दर हो जाता है और वर्ण में निखार आ जाता है। धातुयें पुष्ट हो जाती हैं। वृद्धावस्था में भी आयु के लक्षण पूर्णरूप से प्रकट नहीं होते है एवं कफ की वृद्धि नहीं होती है। अभ्यंग करते रहने से जलने पर उसकी पीड़ा, शस्त्र आदि से क्षत होने पर उसकी रुजा, अस्थि के भंग होने पर उसकी व्यथा हल्की हो जाती है। क्लम (आलस्य) तथा श्रम (थकावट) दूर हो जाते हैं। 

नवीन ज्वर से पीडि़त तथा अजीर्ण वाले व्यक्ति को अभ्यंग नहीं करना चाहिए अन्यथा व्याधि कष्टसाध्य और यदि कष्टसाध्य है तो असाध्य हो जाती है।विरेचन, वमन अथवा निरूहवस्ति व स्नेहवस्ति से जिसने शरीर की शुद्धि की हो उसे भी अभ्यंग नहीं करना चाहिये। ऐसा करने से अग्निमांद्य आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं।स्निग्ध, मधुर, गुरु, नव अन्न, माँस, मद्य आदि पदार्थों का अधिक सेवन संतर्पण कहलाता है। संतर्पणज़न्य व्याधियों से पीडि़त तथा कफजन्य रोगों से पीडि़त व्यक्ति को अभ्यंग नहीं करना चाहिये। 

शिर की मालिश - सिर पर तैल की मालिश करने से शिरोरोग नष्ट हो जाते हैं। बाल मुलायम, चिकने, काले तथा घने हो जाते हैं, वे झड़ते नहीं हैं। खालित्य (गंजापन), पालित्य (असमय केशों का श्वेत हो जाना) नहीं होता है। नींद सुखपूर्वक आती है। शिर की तृप्ति होती है। मस्तिष्क की शून्यता नष्ट हो जाती है। त्वचा सुन्दर और इन्द्रियाँ संतृप्त होती हैं। सिर पर मालिश के लिए मुलहठी, क्षीरविदारी, देवदारु, लघु पंचमूल (शलिपर्णी, पृश्निपर्णी, छोटी कटेली, बड़ी कटेली तथा गोखरू) को समान भाग लेकर तैल सिद्ध कर उस तेल की या अन्य किसी सिद्ध तैल की मालिश करनी चाहिए। 

कान में तैल डालना - कानों में नित्य तेल डालने से कान में वातजन्य रोग नहीं होते हैं। 

पैरों में तैल मालिश - पैरों में तैल मालिश से पैरों का खुदरापन, जकड़ाहट (स्तब्धता), रुक्षता, थकावट, शून्यता (सुप्ति) आदि शान्त हो जाते हैं तथा कोमलता, बल और स्थिरता, आती है। पैरों में वातजन्य रोग नहीं होते हैं और ऐसे रोग हैं तो शान्त हो जाते हैं यथा गृध्रसी, सिरास्नायु संकोच आदि हैं तो शान्त हो जाते हैं। बिवाई (पादस्फुटन) नहीं होता है। नेत्रों में प्रसन्नता की वृद्धि होती है। निद्रा सुखपूर्वक आती है। पादाभ्यंग सदा हितकर होता है। 

व्यायाम

‘शरीर का वह अभीष्ट कर्म जो शरीर में स्थिरता एवं बल वृद्धि करता है, शारीरिक व्यायाम कहलाता है। जीवन रक्षा के लिए जिस प्रकार भोजन आवश्यक है, उसी प्रकार व्यायाम को हम स्वास्थ्य संजीवनी कह सकते हैं। चाभी के बिना घड़ी नहीं चलती, इसी प्रकार व्यायाम के बिना शरीर भी नहीं चलता। 

1. व्यायाम से लाभ - व्यायाम से शरीर में हल्कापन, कार्य करने की शक्ति, स्थिरता तथा कष्ट सहने की शक्ति बढ़ती है। शरीर के विकारों का नाश एवं जठराग्रि की वृद्धि होती है। भाव प्रकाश के अनुसार- व्यायाम के द्वारा शरीर सुदृढ़ होकर कोई रोग उत्पन्न नहीं होने देता। शरीर में रोगों से लड़ने की प्रतिरोधी क्षमता बढ़ जाती है। आहार में किया गया विरुद्ध अन्न (अच्छी प्रकार न पचने वाला) अन्न भी शीघ्र पच जाता है। मोटापा दूर करने के लिए व्यायाम के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है। व्यायाम करने वाले को बुढ़ापा जल्दी नहीं आता। शरीर की मांस पेशियाँ दृढ़ एवं सुडौल हो जाती हैं। नाडि़यों को नवजीवन प्राप्त होता है। फेफ़ड़े सुदृढ़ होते हैं, रक्त की शुद्धि होती है तथा दीर्घायु को प्राप्त करता है। व्यायाम सदैव खुली हवा में करना चाहिए। 

पैदल चलना

 यद्यपि बहुत अधिक पैदल चलना वर्ण, कफ, स्थूलता और सुकुमारता को नष्ट करता है परन्तु व्यायाम करने में अशक्त व्यक्तियों को नियमित रूप से परिभ्रमण के लिए जाना चाहिए। जिस परिभ्रमण से शरीर को कष्ट न हो वह आयु, बल, मेधा और अग्नि को दीप्त कर इंद्रियों को चैतन्य रखता है। 

प्रातः भ्रमण करते समय गर्दन सीधी, रीढ़ की हड्डी सीधी, सीना तना हुआ, दोनों हाथ पूरी तरह हिलते रहने चाहिए। ग्रीष्म और वर्षा के ऋतु में शरीर पर कम से कम वस्त्र होने चाहिए। मुँह बन्द, नाक से ही सांस लेनी चाहिए। टहलते समय सदैव गहरे-गहरे श्वास लेवें। किसी मित्र आदि दूसरे व्यक्ति के साथ टहलते वक्त बातचीत नहीं करनी चाहिए। तेज गति से टहलना, मन्द गति से दौड़ना चाहिए। इससे गहरे श्वास स्वतः चलने लगते हैं। टहलते समय स्वास्थ्य बनाने की भावना होनी चाहिए।  

स्नान

प्रतिदिन स्नान करना वैदिक दिनचर्या का एक आवश्यक अंग माना गया है। स्नान करने से शरीर शुद्ध हो जाता है, रोम कूप खुल जाते हैं। शरीर का आलस्य तथा निद्रा रोग दूर होकर चित्त शान्त होता है। मन में प्रसन्नता, उपासना, ध्यान आदि में मन लगता है तथा स्वाध्याय के प्रति रुचि हो जाती है। प्रतिदिन स्नान करने से बल, बुद्धि तथा स्वास्थ्य का सम्वर्द्धन होता है। शरीर में स्वच्छता और स्फ़ूर्ति बनी रहती है। 

अधिक गरम पानी से स्नान नहीं करना चाहिए, सिर पर गरम पानी नहीं डालना चाहिए। इससे नेत्र ज्योति की हानि होती है। ठंडे जल से स्नान करने रक्तपित्त रोग शान्त होता है। सिर पर बिना पड़े गर्म जल से स्नान करना, बलकारक एवं वातकफ़ को नाश करने वाला है। ठंडा पानी सिर पर डालकर स्नान करना चाहिए, इससे नेत्र-ज्योति बढ़ती है। ठंढे जल से स्नान करने से आरोग्यता एवं बल प्राप्त होता है। 

स्नान से पूर्व कफ़नाशक द्रव्यों से बनाया हुआ उबटन शरीर पर मलना चाहिए। इससे आवश्यकता से अधिक शरीर में संचित मेद शरीर में ही लीन हो जाता है। उबटन मलने से अंग स्थिर होते हैं, त्वचा कोमल और निर्मल होती है, रोमकूपों के मुख खुल जाते हैं। घर्षण से मेद और कफ पिघल जाते हैं और शरीर में लीन हो जाते हैं। उबटन वातनाशक (सुश्रुतानुसार), कफ़नाशक (वाग्भट के अनुसार) होता है। 

यह दो प्रकार से बनाया जाता है- (१) कफनाशक द्रव्यों यथा अरहर की छाल, आम की छाल, नीम के पत्ते, लोध्र वृक्ष की छाल और अनार की छाल को कूटकर छानकर बारीक चूर्ण बनाकर जल अथवा दूध में मिलाकर शरीर पर उबटन की तरह मलते हैं। यह बिना चिकनाई का औंषधचूर्ण है। इसे उद्घर्षण कहते हैं। उद्घर्षण से प्रसन्नता, सौभाग्य, शरीर की शुद्धि और लघुता आदि की प्राप्ति होती है और कण्डू एवं वात का नाश होता है। 

(२) यदि उबटन के द्रव्यों में स्नेह मिलाते हैं तो उसे उत्सादन कहते हैं; यथा हिन्दुओं में शादी से पूर्व जौ का आटा, हल्दी, तेल और जल के मिश्रण से उबटन की तरह मलते हैं। इससे शरीर कान्तियुक्त हो जाता है और त्वक् रोग नष्ट होते हैं। मुख की कान्ति - (१) क्षीरवृक्षों के क्वाथ (२) क्षीरवृक्षों के क्वाथ में दूध मिलाकर (३) लोध्र का क्वाथ अथवा (४) आँवले का क्वाथ, इसमें से किसी एक से मुख और नेत्र प्रतिदिन धोने से मुख की नीलिमा, मुखशोष, पिड़का, व्यंग्य तथा रक्तपित्तजन्य विकार नष्ट हो जाते हैं। मुख सुन्दर दिखाई देने लगता है। नेत्रों की ज्योति बनी रहती है। उपरोक्त द्रव्यों के अभाव में शीतल जल का व्यवहार किया जा सकता है।

स्नान विधि - सर्वप्रथम जल सिर पर डालना जाहिर, सिर पर जल डालने के लिए सिर नीचा करके दो-तीन लोटे जल डालना चाहिए। ऐसा करने से मस्तिष्क की गर्मी पैरों से निकल जाती है। जो लोग पहले पैर धोते हैं, उनकी गर्मी मस्तिष्क में चली जाती है। इससे मस्तिष्क में नाना प्रकार की व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं। सिर को भिगोकर पश्चात् अन्य अंगों को भिगोना चाहिए। गीले खद्दर आदि मोटे वस्त्र की सहायता से शरीर को खूब रगड़ना चाहिए। पसीना आदि दुर्गन्ध को मिटाने के लिए साबुन लगाकर, पुनः अच्छी तरह पानी डालकर शरीर को अच्छी तरह रगड़ना चाहिए। इससे रोम कूप खुल जाते हैं। साबुन के स्थान पर बेसन, हल्दी, सरसों तैल का उबटन लगाकर भी शरीर की अच्छी सफाई हो जाती है। स्नान करने के पश्चात् फिर अंगों से मैल नहीं उतारना चाहिये। बालों को भी नहीं झटकना चाहिये। तौलिए से शरीर को भलीभांति सुखाकर धुले हुए वस्त्र धारण कर लेने चाहिये। स्नान से पूर्व जो वस्त्र त्वचा से लगे पहने हुए होते हैं, उन्हें स्नान करने के पश्चात् नहीं पहिनना चाहिये। सार्वजनिक स्थानों पर वस्त्रविहीन होकर स्नान नहीं करना चाहिए। 

सामान्य शीतल जल में स्नान करना स्फ़ूर्तिदायक है, तंत्रिका तन्त्र को इससे बल की प्राप्ति होती है। रक्तसंवहन तथा चयापचय क्रिया बढ़ती है। त्वचा की तान बनी रहती है तथा वाह्य तापमान के परिवर्तनों का दुष्प्रभाव शरीर पर नहीं पड़ता है। स्नान निषेध - ज्वर, अतिसार, कान के रोग, वायु रोग, अफारा, अजीर्ण तथा भोजन के बाद स्नान नहीं करना चाहिए। अर्दित, नेत्र रोग, मुख रोग तथा जुकाम में स्नान नहीं करना चाहिए। 

वस्त्र धारण 

दिनचर्या क्रम में विधिवत् स्नान करने के बाद, निर्मल वस्त्रों का धारण करने से, शरीर में सुंदरता एवं यश और आयु की वृद्धि होती है। शरीर की अशोभा दूर होती है तथा मन में हर्ष उत्पन्न होता है और समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। सोने, बाहर निकलने तथा देवपूजन के वस्त्र भिन्न-भिन्न होना चाहिए। इसी प्रकार ऋतुओं के अनुसार भी वस्त्र धारण कर सके तो स्वास्थ्य के लिए सर्वाेत्तम है। 

शीतकाल में मनुष्यों को वायु और कफ हरने वाले रेशमी, ऊनी, लाल तथा कई रंगों वाला कपड़ा पहनना चाहिए। कषाय वस्त्र मेधा के लिए हितकारी, शीतल, पित्तनाशक होता है। अतः यह ग्रीष्म काल में पहनना चाहिए। सफेद वस्त्र सुखदीय, शीत और धूप को रोकने वाला, न अधिक उष्ण न अधिक शीतल होता है। इसे वर्षा ऋतु में धारण करना चाहिए। किसी दूसरे का धारण किया हुआ, पुराना, मैला, अत्यन्त लाल कपड़ा नहीं पहनना चाहिए। कपड़ा, जूता किसी दूसरे का धारण किया हुआ प्रयोग नहीं करना चाहिए। 

केश प्रसाधन 

स्नान के पश्चात् केश प्रसाधनी (कंघा, कंघी अथवा ब्रुश) से बालों को संवार लेना चाहिये। ऐसा करने से धूल, जूँ तथा मैल दूर हो जाता है। इससे केश तथा शरीर सुन्दर लगता है। केशप्रसाधनी (कंघा अथवा कंघी) प्रत्येक व्यक्ति की पृथक-पृथक होनी चाहिए। 

अंजन कर्म

शलाका या अंगुली से नेत्र में औषध लगाने को अंजन कहते हैं । नेत्र प्रक्षालन तथा अंजन प्रयोग से मनुष्य बिना कष्ट के सुखपूर्वक सूक्ष्म वस्तुओं को दृढ़तापूर्वक देखता है। स्रोतोंजन, नेत्रदाह, कण्डू तथा नेत्रमल को दूर करता है। इससे दृष्टिक्लेद तथा पीड़ा समाप्त हो जाती है, आँखों की दृष्टि बढती है तथा नेत्र में हवा एवं सूर्य की उष्मा को सहने की क्षमता आ जाती है, नेत्र रोग भी उत्पन्न नहीं होते। 

भोजन - 

अन्न मार्ग से जो कुछ शरीर के अंदर जाता है उसे आहार कहते हैं। आहार शरीर का धारक है। प्रत्येक मनुष्य का भोजन देश, काल, आयु, प्रकृति, कार्य के अनुसार भिन्न-भिन्न होता है। स्वास्थ्य तभी ठीक रह सकता है, जबकी यथोचित मात्रा में देश, काल, प्रकृति, कार्य के अनुसार भोजन मिले। उचित मात्रा में भोजन न मिलने से शरीर रोगी हो जाता है; क्योंकि आन्तरिक अंगों पर दुष्प्रभाव पड़ता है। 

स्नान करने के पश्चात् अथवा हाथ पैरों को धोकर और मुख को अच्छी तरह साफ कर, स्वच्छ वस्त्रों को धारण कर, सुगन्धित पदार्थ लगाकर, अपने मतानुसार वन्दना, जप आदि कर प्रसन्नतापूर्वक ऊँचे आसन पर बैठकर शरीर को सम रखते हुए अर्थात् बिना झुके हुए भोजन करना चाहिए। भोजन के पश्चात् हाथों को साफ कर दाँतों में लगे अन्न के अंश को शलाका से हटाकर जल से मुख की शुद्धि कर लेनी चाहिये। 

भोजन के सामान्य नियम - भोजन जहाँ तक हो सके एकान्त में करना चाहिए। साथ में यदि कोई हो तो साथ-साथ भोजन करें। २. भोजन करते समय मौन रहना चाहिए। भोजन करते समय बातें करने से कई बार श्वास नली में अन्न कण चले जाने से खांसी आने लगती है। ३. भोजन करते समय यह भावना करनी चाहिए, कि जो हम ग्रहण कर रहे हैं, उससे सत्कर्म, सद्विचार, सद्भावनाएँ उत्पन्न हों, हमारे शरीर को आरोग्यता प्रदान करे। ४. भोजन करने से पूर्व हाथों की अच्छी तरह सफाई करें, यदि सम्भव हो सके तो पैरों को भी धोकर भोजन करना चाहिए। ५. भोजन करते समय ढीले वस्त्र होने चाहिए, ऐसे वस्त्र जो पेट आदि को कसे हों, उतार देना चाहिए। ६. भोजन करने के उपरान्त तत्काल मूत्र त्याग करना चाहिए, इससे मूत्रवह संस्थान के रोग नहीं होते। ७. भोजन करने के बाद दाँतों में फँसे हुए अन्न आदि के कणों को नीम की काड़ी, चाँदी, ताँबा (की बनी दाँत साफ करने की काड़ी मिलती है), उससे साफ करके अच्छी तरह कुल्ला करना चाहिए। 

धूम्रपान 

प्राचीन भारत में सुगन्धित पदार्थों की वर्ति बनाकर पीते थे और उसे धूम्रपान कहते थे। आयुर्वेदीय संहिता ग्रन्थों में धूम्रपान का जो वर्णन किया गया है, उसका सम्बन्ध बीड़ी, सिगरेट अथवा हुक्के में तम्बाकू पीने से नहीं है। धूम्रपान हेतु विभिन्न औषध का प्रयोग - हरेणुका, प्रियड्गु, पृथ्वीका, केशर, ह्वीबेर, चंदन, ध्यामक, मधुक, जटामांसी, गुग्गल, न्यग्रोध, उदुम्बर, अश्वत्थ, प्लक्ष, लोध्र, त्वच, सर्जरस, मुस्त, शैलेय, कमल, उत्पल, श्रीवेष्टक, शल्लकी आदि औषधों से बने शास्त्रीय धूम से धूमपान किया जाता है। 

धूम्रपान से लाभ - इस प्रकार धूम्र सेवन से- (१) मनुष्य की इंद्रियाँ, वाणी और मन प्रसन्न होता है। (२) शिर का भारीपन, शिररूशूल, पीनस, अर्धावभेदक, कान और नेत्र का शूल, कास, हिक्का, श्वास, गलग्रह, दन्तशूल, कान, नाक और नेत्र से दूषित स्राव का निकलना, नाक से दुर्गन्धयुक्त स्राव (पूति घ्राण), मुख की दुर्गन्ध,अरोचकता, हनुग्रह, मन्याग्रह आदि शान्त होते हैं। (३) कण्डू, कृमिरोग, मुख का पीला पड़ जाना, मुख से कफ का स्राव होना, केशों का झड़ना, छींक अधिक आना, अधिक तन्द्रा और निद्रा आना, आलस्य का रहना, बुद्धि का व्यामोह होना, स्वरभेद, गलशुण्डी, उपजिह्विका, खालित्य, केशों का वर्ण परिवर्तित होना आदि रोग शान्त होते हैं। 

धूम्रपान के आरोग्य - (१) १८ वर्ष से कम आयु तथा ८० वर्ष से अधिक आयु के व्यक्ति (२) विरेचन के पश्चात् (३) वस्ति लेने के पश्चात् (४) रक्त पित्त तथा विष से पीडि़त व्यक्ति के लिए (५) रात्रि जागरण के पश्चात् (६) शिर का आघात होने पर (७) मधु-दूध-दही-मद्य एवं यवागू खाने के पश्चात् (८) विषैला जल पीने के पश्चात् (९) मछली खाने के पश्चात् (१०) पाण्डु-प्रमेह-आध्मान-ऊध्र्ववात-तिमिर रोगी (११) अति उष्ण और रूक्ष शरीर वाले (१२) क्रोध से सन्तृप्त व्यक्ति (१३) मद व पित्त विकार वाले व्यक्ति 

सुगन्धित द्रव्य, माला, रत्नादि धारण करना

रत्न, आभूषण पहिनने तथा स्नान के पश्चात् सुगन्धित इत्र, चन्दन आदि लगाने एवं सुगन्धित पुष्पों की माला धारण करने से शरीर में वृष्यता, सौभाग्य, मंगल, सुन्दरता और आयु में वृद्धि होती है। शरीर सुन्दर लगता है। मन में प्रसन्नता होती है तथा ओज में वृद्धि होती है। अच्छी लम्बी नाभि से नीचे तक लटकती हुई माला धारण करनी चाहिए। कमल और गुलाब के लाल पुष्पों के अतिरिक्त अन्य लाल पुष्पों की माला धारण नहीं करनी चाहिए। 

चन्दन-केशर-कस्तूरी-लेपन, सुगंधद्रव्य जलाकर धूप में वस्त्रों को बसाना तथा पुष्प-माला, गुलदस्तों अथवा इत्र-फ़ुलेल और सेंट आदि से वस्त्र, शरीर और घर को सुवासित रखना उत्तम है। ये सब कार्य ऋतु के अनुकूल होना चाहिए। देशी इत्रों में गर्मी में गुलाब, वर्षा में खस और शीत में हिना उत्तम है। 

पैरों में जूते आदि धारण करना

पैरों में जूते आदि पहिनने से नेत्रों के दृष्टि-बल में वृद्धि होती है। ये पैरों की त्वचा के लिए हितकर होते है। पैरों की काँटे आदि तथा रोगों से रक्षा होती है। बल, पराक्रम तथा सुख प्राप्त होता है। 

जीविकोपार्जन

प्रातः काल नित्य कर्माे से निवृत्त होकर, भोजन के पश्चात्, जीविका उपार्जन हेतु छाता, पादुका धारण कर बाहर जाने के विधान के साथ ही आयुर्वेद सामाजिक स्वास्थ्य के पहलू को ध्यान रखते हुये यह भी निर्देश देता है कि मनुष्य को जीविका के लिये उन्हीं उपायों का प्रयोग करना चाहिये, जो नीति विरूद्ध न हो। शान्तिपूर्वक जीवन निर्वाह हेतु आवश्यक हिताहित एवं सुख-दुःख का ध्यान रखते हुये ऐसी किसी वृत्ति से जीविकोपार्जन करना चाहिये जो शारीरिक, मानसिक, नैतिक, तार्किक, वाचिक या आर्थिक रूप से दूसरों का अहित न करे। 

रात्रि भोजन

रात्रि के प्रथम प्रहर में ही भोजन कर लेना चाहिए तथा भोजन दिन की अपेक्षा कुछ कम खाना चाहिए। देर से पचने वाले गरिष्ठ पदार्थों को नहीं खावें। भोजन करने व सोने के समय में न्यूनतम दो-तीन घण्टे का अन्तर होना चाहिए। तत्काल भोजन करके सो जाने से पानी पीने का अवसर नहीं मिलता। भोजन करने के बाद, सोने से पूर्व एक-एक घण्टे के अन्तर से कम से कम दो या तीन बार जल लेना चाहिए। इससे भोजन पचने में भी सहायता मिलती है, रात्रि में अपच होने की सम्भावना नहीं रहती, निद्रा अच्छी आती है तथा प्रातः शौच भी साफ हो जाता है। सोने से पूर्व उष्ण पेय चाय, काफी आदि पीने से निद्रा अच्छी नहीं आती। अच्छी नींद न आने से प्रातः उठने पर शरीर में थकावट रहती है, स्नान तथा व्यायाम आदि करने का मन नहीं होता। 

रात्रि में सोने से पूर्व दाँतों की सफाई करना आवश्यक है। अधिकांश व्यक्ति दुग्ध पीकर सो जाते हैं। ऐसे लोगों के जल्दी ही दाँतों में कीड़े आदि लग जाते, खराब हो जाते हैं। प्रतिदिन जैसे शरीर को स्नान द्वारा सफाई की जाती है, और कपड़ों की धुलाई साबुन तथा पानी से होती है, उसी प्रकार नेत्रों की सफ़ाई के लिए प्रतिदिन रात्रि को सोने से पहले नेत्रों में अंजन करने का विधान है। 

रात्रि शयन

शयन स्थान पवित्र, स्वच्छ तथा हवादार होना चाहिए। पलंग घुटनों तक ऊंचा होना चाहिए। सिराहना न बहुत ऊंचा और न बहुत नींचा, ठीक प्रकार का होना चाहिए। पलंग की बिस्तर की लंबाई चैड़ाई ऐसी होनी चाहिए कि जिस पर बिना कष्ट भली-भाँति सोया जा सके। सोते समय सिर पूर्व या दक्षिण दिशा की तरफ़ रखना चाहिए। परन्तु यह ध्यान रहना चाहिए कि पैर पूज्य जनों की तरफ़ करके न सोना पड़े। यदि ऐसा है तो फि़र सिर किसी भी दिशा में रखा जा सकता है। 

रात्रि में सोने से पूर्व वस्त्रों की स्वच्छता पर विशेष ध्यान देना चाहिए। जो वस्त्र हम सारे दिन पहिने रहें, उसे पहन कर सोना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। सोने से पहले वस्त्रों को बदल लेना चाहिए तथा सोते समय किसी अंग पर कोई दबाव नहीं पड़ना चाहिए। इसलिए वस्त्र ढ़ीले पहनने चाहिए। इसी प्रकार बिस्तर भी स्वच्छ हो, जहाँ तक हो सके अपना बिस्तर अलग रखना चाहिए। किसी दूसरे के बिस्तर का उपयोग किसी विशेष परिस्थिति में ही करें। हर व्यक्ति के लिए चारपाई या तखत अलग होना चाहिए। सोने वाला कमरा हवादार होना चाहिए। खिड़कियाँ बन्द करके सोना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। कई बार सर्दियों में लोग कोयले की अंगीठी आदि कमरे को गरम करने के लिये रख लेते हैं। ऐसा करने से कार्बन-डाई-आॅक्साइड और कार्बन मोनोआक्साइड की मात्रा बढ़ जाती है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इस स्थिति में लोग सोते के सोते रह जाते हैं। अतः सोने से पहले शुद्ध वायु के आवागमन का ध्यान रखना चाहिए। 

Bandey

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