हृदय की संरचना, कार्य, कोष्टक एवं कपाट

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हृदय की संरचना

हृदय गुलाबी रंग का शंक्वाकार अन्दर से खोखला मांसल अंग होता है। यह शरीर के वक्ष भाग के वक्ष भाग में फेफडो के बीच स्थित होता है। हृदय ये ही रूधिर वाहिनियॉ रक्त को पूरे शरीर में ले जाती है। तथा फिर इसी से वापस लेकर आती है।
सामान्यत: मनुष्य शरीर में रक्त की मात्रा 5 -6 लीटर होती है। एक अन्य मत के अनुसार मनुष्य के शारीरिक भाग का 20वॉ भाग रक्त होता है। रक्त पूरे शरीर में दौडता रहता है। परिसंचरण तत्रं में मुख्य रूप से हृदयए फेफडेए धमनी व शिरा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हमारा हृदय एक पम्पिंग मशीन की तरह कार्य करता है जो अनवरत अशु़द्ध रक्त को फेफडो में शुद्ध करने तथा फिर शुद्ध रक्त को पूरे शरीर में भेजता है। अब हम जाने की हृदय की संरचना किस प्रकार की है अर्थात् हृदय भित्ति का निर्माण किस प्रकार से होता है ?
निम्न तीन परतों से मिलकर बनी है।
(1) पेरिकार्डियम
(2) मायोकार्डियम
(3) एण्डोकार्डियम

पेरिकार्डियम – 

पेरिकार्डियम दो कोषो से मिलकर बना है। बाहरी कोष तन्तुमय ऊतकों से निर्मित होता है तथा आन्तरिक रूप से सीरमी कला की दोहरी परत की निरन्तरता में पाया जाता है। बाहरी तन्तुमय को ऊपर की ओर हृदय की बडी रक्त व लिशओं के टुनिका एड्वेन्टिशिया केद साथ निरन्तरता में होता है तथा नाचे की ओर

डायाक्राम में लगा हुआ होता है। सीरमी कला की बाहरी परत जिसे’’ पार्शिवक पेरिफार्शियम कहा जाता है। यह तन्तुमय कोष को आस्तरित करने का कार्य करती है। अन्तरोगी पेरिकार्डिम या एपिकािर्र्डयम (आन्तरिक पंख ) हृदय पेशी से चिपटी हुयी होती है तथा पार्शिवक पेरिकार्डियम की निरन्तरता मे होती है।

मायोकार्डियम – 

मायोकार्डियम एक विशिष्ट प्रकार की हृदयपेशी से निर्मित होती है। यह पेशी केवल हृदय में ही पायी जाती है। इसमें दो तन्तु पाये जाते है। वे अनेच्छिक वर्ग के होते है। मायोकार्डियम की मोटाई सब जगह एक जैसी नही होती है। शिखर भाग (apure)पर यह सर्वाधिक मोटी तथा आधार की ओर पतली होती है जबकि बाये निलय में अपेक्षाकृत मोटी होती है क्योंकि बॅाये निलय का कार्यभार अघिक होता है। मायोकार्डियम आलिन्दों में बहुत ही पतली होती है।

एण्डोकार्डियम –

हृदय भित्ति की सबसे भीतरी परत एण्डाकार्डियम इसका निर्माण चपटी कला कोशिकाओं से होता है। इस परत से हृदय के चारों कक्ष एवं कपाट आच्छदित रहते है।

हृदय के कोष्टक

हृदय की संरचना को जानने के बाद अब आप सोच रहे होंगे की हृदय के कोष्टक अथवा कक्ष (chambers ) से आशय से है ? कितने है इत्यादि विभिन्न प्रश्न आपके मन में उठ रहे होंगे। तो आइए इन्ही प्रश्नो के सामाधान के लिए चर्चा हैं हृदय के कक्षो के बारें में।

हृदय वस्तुत: दायें एवं बायें भागों मे बॅटा हुआ होता है। यह विभाजनपरक पेशी पर (septum)के द्वारा होता है। ये दायें एवं बॉये भाग दोनों एक दूसरे से पूरी तरह अलग होते है। हृदय के दायें भाग का संबंध अशुद्ध से तथा बायें भाग का संमंध शुद्ध रक्त के लेन-देन से होता है दायॉ एवं बायॉ भाग फिर से अनुप्रस्थ पर से विभक्त होता है। जिससे एक ऊपर का एवं नीचे का भाग बनता है।
इस प्रकार हृदय का समस्त आन्तरिक भाग चार कक्षो में विभाजित हो जाता है।

  1. दायॉ आलिन्दय या राइट एट्रियम-दायी ओर ऊपरी, कक्ष 
  2. दायॉ निलय या राइट वेल्टिफल -दायी ओर का निचला कक्ष 
  3. बायॉ आलिन्द – लेफ्ट एट्रियम – बॉयी ओर का ऊपरी कक्ष। 
  4. बायॉ निलय या लेफ्ट वेन्टिकल – बॉयी ओर का नीचे कक्ष। 

बायीं ओर के दोनो कक्ष अर्थात बायॉ आलिन्द एवं बायीं निलय एक छिद्र द्वारा आपस मे सम्बद्ध होते है। ठीक इसी प्रकार की व्यवस्था बॉयी तरफ होती है अर्थात् दायॉ आलिन्द एवं दायॉ निचल भी यह एक छिद्र द्वारा आपस मे सम्बद्ध रहते है। इन छिद्रो पर वाल्व पाये जाते है। ये वातव इस प्रकार से लगे हुये होते है कि रक्त मात्र आलिन्द मे से निलय में तो जा सकता है किन्तु वापस लौट कर नही आ सकता। रक्त को लाने एवं ले जाने वाली रक्त नलिकायें भी अपने से संबन्धित कोष्टक (कक्ष) में ही खुलती है।

दायॉ आलिन्द या दायॉ एट्रियम – 

हृदय के इय भाग मे सम्पूर्ण शरीर का ऑक्सीजन रहित अशुद्ध रक्त आकर इकट्ठा होता है। उध्र्वमहाशिरा शरीर के ऊपरी हिस्से से तथा निम्न महाशिरा निचले हिस्से से अशुद्ध रक्त को दॉयें आलिन्द में पहुॅचाने का कार्य करती है।

इस कक्ष की शिलिया एवं पतली होती है क्योंकि इसे रक्त को पम्प करने का काम ज्यादा नही करना होता है। इस कक्ष का मुख्य कार्य केवल खून को गृहण करने का है।

दायॉ निलय या दायॉ वेन्ट्रिकल –

हृदय का दूसरा कक्ष है – दायॉ निलय। दाये आलिन्द मे अशुद्ध रक्त के पहुॅचने बाद यह एट्रियॉ वेन्ट्रिकल छिद्र से होते हुए दायें वेन्ट्रिकल में आता है और वहॉ से फुफ्कुसीय धमनियों के द्वारा फेफड़ो में शुद्ध होने के लिए चला जाता है।

नोट – फुफ्कुसीय धमनी के अलावा अन्य सभी धमनियो मे शुद्ध रक्त ही प्रभावित होता है।
दायें निलय की शिरियॉ दॅाये एट्रियम की तुलना मे अधिक मोटी होती है क्योंकि इसे रक्त को पम्प करने का कार्य अपेक्षाकृत अधिक करना पडता है।

बायॉ आलिन्द या बायॉ एट्रियम – 

बायॉ आलिन्द , हृदय की बायें भाग का ऊपर वाला कक्ष है। आकार की दृष्टि से चर दायें एट्रियम से थोड़ा से छोटा होता है। दायें एट्रियम की तुलना में इसकी भित्तियॉ भी थोड़ी मोटी होती है। इयमे चार फुफ्कुसीय शिरायें खुलकर शुद्ध रक्त को बायें एट्रियम तक ले जाने का कार्य करती है।

बायॉ निलय या बायॉ वेन्ट्रिकल –

हृदय का चौथा कक्ष बायॉ निलय है। यह भाग का निचला तथा हृदय का सभी कक्षो में सर्वाधिक बड़ा कक्ष है। इसकी भित्तियॉ शेष सभी कक्षो की अपेक्षा मोटी होती है। इसमें महाधमनी नामक एक छिद्र होता है, जिससे महाधमनी निकलकर शरीर के विविध भागों मे रक्तापूर्ति का कार्य करती है। जैसे की बायें एट्रियम मे संकुचन होता है शुद्ध रक्त बायें वेन्ट्रिकल में आ जाता है। बायें वेन्ट्रिकल के संकुचित होते ही शुद्ध रक्त महाधमनी के छिद्र को खोल देता है और उसी मे से होकर वह प्रभावित होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि बायॉ निलय शरीर के सभी भागो में शुद्ध रक्त पहुचाने मे सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है।

हृदय के कपाट 

क्या आपने कभी विचार किया है कि हृदय मे कपाट एवं वाल्व क्यों होते है ? वस्तुत: हृदय मे रक्त प्रवाह गलत दिशा मे न हो सके इस हेतु ही कपाठ या वाल्व होते है। हृदय मे मुख्य रूप से चार वाल्व होते है।

टाइकस्पिड वाल्व – 

दायें आलिन्द तथा बायें निलय के बीच में स्थित छेद , जिसमे ढॅाचा एट्रियोवोन्ट्रिकुलर छिद्र कहा जाता है, उसके वाल्व को ट्राइकस्पिड या जिकपर्दी वाल्व कहते है। इस वाल्व मे तीन त्रिकोण के आकार वाले कास्पस पाये जाते है। वाल्व के इन अस्पस का एट्रियेवेन्द्रिकुलर छेद के ऊपर पूरी तरह से नियंत्रण होता है आलिन्द मे संकुचन के कारण खून कस्पस को धक्का देता है और वेन्ट्रिकल मे पहॅुचता हैं इस प्रक्रिया के ठीक बाद ही कस्पस बन्द हो जाते है और ठीक इसी क्षण क्षपिलरी केशियों में संकुचन हाने के करण ये कांर्डी टेन्डिनी पर खिंचाव डालती है, परिणामस्वरूप कस्पस आलिन्द में नही अकेले जाते है और खून वापस नहीं लौट पाता है।

माइटल वाल्व – 

बायें आलिन्द तथा दॉयें वेन्ट्रिकल के मध्य के बॉयें एट्रियोवेन्ट्रिकुलर छिद्र का कपाट द्विकपर्दी कपाट या माइट्रल वाल्व या बाइकस्पिटु वाल्व कहलाता है। इसमे दो कस्पस (cusps) होने के कारण ही इसे द्विकपर्दी कपाट करा जाता है। इसकी संरचना भी ट्राइकस्पिटु वाल्व के समान ही होती है। इसका कार्य है – बायें वेन्ट्रिकल के संकुचित होने पर रक्त को बायें एट्रियम मे वापस न जाने देना ।

पल्मोनरी वाल्व – 

दायें वेन्ट्रिकल एवं फुफ्कुसीय धमनी के बीच का वाल्व पल्मोनरी वाल्व या फुफ्कुसीय कपाट कहलाता है। इसे अर्द्धचन्द्राकार वाल्व के साथ जाना जाता है क्योंकि इसमें तीन अर्द्धचन्द्राकार कस्पस होते हैं।

एऑटिकल वाल्व – 

महाधमनी कपाट बायें वेन्ट्रिकल एवं महाधमनी के मध्य स्थित होता है। रचना तथा कार्य की दृष्टि से यह पल्योनवरी वाल्व के समान ही होता है।

हृदय की गतिशीलता एवं हृदय स्पंदन

एक स्वस्थ मनुष्य का हृदय 72 से 75 बार मिनट धड़कता है। हृदय के स्पन्दन की यह गति कम भी हो सकती है और अधिक भी। हर एक सपन्दन के साथ सर्वप्रथम दोनों एट्रियम का और उसके बाद दोनों वेन्ट्रिकल्स संकुचन होता है। संकुचन के बाद दोनों एक साथ शिथिल होते है। हृदय में यह स्पन्दन आधीवन निरन्तर चलता ही रहता है। हृदय के कार्य करते समय जैसे ही दोनों वेन्ट्रिकल्स में संकुचन होता है, वैसे ही हृदय का एपेक्स छाती की दीवार से टकराता है। इससे इसकी ध्वनि उत्पन्न होती है। उसी से हम हृदय की धड़कन या स्पन्दन के रूप में सुनते तथा अनुभव करते है।

बड़ो की तुलना में बच्चों में हृदय के स्पन्दन की गति अधिक तीव्र होती है। हृदय के स्पन्दन की गति को अनेक कारक प्रभावित करते है। जैसे कि व्यक्ति की आय , उसकी शारिरिक एवं मानसिक स्थिती इत्यादि। जैसे-जैसे व्यक्ति की आयु बढ़ती है वैसे-वैसे उसके हृदय के स्पन्दन की गति क्रमष: कम होती जाती है। तीव्र संवेग जैसे क्रोध अत्यधिक खुशी इत्यादि में हृदय की धड़कन अत्यधिक तेज हो जाती है। हृदय की मॉशपेशियों के संकुचन की प्रक्रिया को सिस्टोल तथा इनके शिपिल होने को डायस्टोल कहते हैं। सिस्टोल तथा डायस्टोल दोनों ही 0.4 तथा 0.4 सेकण्ड का समय लेती है। इन दोनों के मिलने से 0.8 सेकण्ड मे एक हृदय चक्र पूरा होता है। सिस्टोल तथा डायस्टोल दोनों के मिलने से ही रक्तचाप की क्रिया होती है।

हृदय की रक्त आपूर्ति 

हृदय की गतिशीलता एवं स्पन्दन के बारे में जानने के बाद अब हम चर्चा करते है – हृदय की रक्त आपूर्ति के विषय में।

हृदय की रक्तापूर्ति के लिए विभिन्न प्रकार की रक्त नलिकायें होती है। जो रक्त नलिकायें हृदय से शरीर के विभिन्न हिस्सों में रक्त को पहॅुचाने कार्य करती है उन्हें धमनियॉ कहते है तथा जो शरीर विभिन्न भागों से रक्त को हृदय में लाने का कार्य करती है , उन्हें शिरायें कहा जाता है।

मायोकर्डियम (हृदयपेशी) में खून की आपूर्ति दायॉ तथा बॉयी कोरानरी धमनियो के माध्यम से होती है। बॉयी कोरोनरी धमनीकी एन्टीरियर इन्टरवेन्ट्रिकुलर शाखा हृदय की एन्टीरियर सतह पर विद्यमान इन्टरवेन्ट्रिकुलर में जाकर दोनों निलयों को रक्त प्रदान करती है। बायें वेन्ट्रिकल में रक्त की आपूर्ति कोरोनरी धमनियों की अतिरिक्त शाखाओं के माध्यम से होती है। ये शाखायें हृदय के बॉये किनारे के साथ फैली हुई होती है। दॉयी कोरोनरी धमनी की मार्किनल शाखा दॉये वेन्ट्रिकल तक रक्त पहॅुचाने का कार्य करती है। ये हृदय के निचले किनारे के साथ फैली हुयी होती है। मध्य हृदीय शिरा पोस्टीरियर इन्टरवेन्ट्रिकुलर इसमें पहुॅचकर कोरोनरी साइनस के मध्य भाग में रक्त की आपूर्ति करती है। कोरोनरी साइनस से रक्त दायें आलिन्द में छोटी – छोटी शिराओं , कार्डियम शिरा तथा बॉये आलिन्द भी ऑब्लिक शिरा से आता है। इसके आलावा दॉये आलिन्द की एन्टीरियर सतह से एन्टीरियर

कार्डियल शिराएॅ खून को सीधे ही दॉये आलिन्द में पहुॅचा देती है। कोरोनरी के पिलरीज मे से जो कार्डिस मिनिमी निकलती है, वह सीधे ही हृदय के समस्त चैम्बर में पहॅुचती है , जेकिन अधिकतर दॉये आलिन्द में ही पहॅुचती हैं। 

यदि किसी कारण से हृदय की रक्त आपूर्ति में कोई समस्या उत्पन्न हो जाती है तो यह हृदय की क्रियाशीलता को प्रभावित करती है। यदि कोई नरी धमनी की किसी शाखा में पूर्ण अवरोध आता जाता है तो हृदय के उस भाग में माचोकार्डिलनल इन्फारवशन हो जाता है , जिसको वह रक्त पहुॅचाती है। तो पाठकों इस प्रकार आपने जाना कि किस प्रकार हृदय की रक्त आपूर्ति होती है।

हृदय के कार्य 

हृदय एक पम्प की तरह कार्य करता है जो खून को अन्दर खींचता है तथा धमनियों के द्वारा शरीर के विभिन्न भागों में पहुॅचता है।
हृदय शरीर के सभी हिस्सों से उघ्र्व महाशिरा तथा निन्म महाशिरा के द्वारा अशुद्ध खून की दॉए एट्रियम में इकट्ठा करता है। पूरी तरह से भर जाने पर दॉयें एट्रियम में यंकुचन होता है और रक्त दॉए वेन्ट्रिकल मे आ जाता है। इस प्रक्रिया के बाद ट्राइकस्पिड वालव बन्द हो जाता है। इसके बाद दायेें वेन्ट्रिकल के संकुचित होने पर रक्त पल्मोनरी वाल्व से होकर फुफ्फसीय धमनी आगे जाकर उपशाखाओं में विभक्त हो जाती है , जिसे दॉयी एवं बॉयी फुफ्फसीय धमनी कहा जाता है। इन धमनियों का कार्य है अशुद्ध रक्त को शुद्ध करने के लिए फुफ्फसो तक ले जाना। फेफड़ों से शुद्ध रक्त चार फुफ्फसीय शिराओं के माध्यम से हृदय के बॉयी एट्रियम में संकुचन की क्रिया होती है धक्के के साथ बॉयें एट्रियों वेन्ट्रिकुलर वाल्व से होते हुए बॉये वेन्ट्रिकल में आता है।
इसके बाद एट्रियों वेन्ट्रिकुलर वाल्व बन्द हो जाता है। इसके बाद बॉया वेन्ट्रिकल संकुचित होता है , जिसके कारण शुद्ध रक्त महाधमनी में पहुॅचता है। महाधमनी शुद्ध रक्त को सम्पूर्ण शरीर के अंगो तक पहुॅचाने का कार्य करता है। आपने जाना है कि जिस प्रकार से हमारा हृदय निरन्तर एक पम्पिंग मषीन की तरह कार्य करता रहता है।

हृदय की कार्यिकी 

हृदय रक्त संचरण क्रिया का सबसे मुख्य अंग है यह नाशपती के आकार का मांशपेशियों की एक थैली जैसा होता है। हाथ की मुट्ठी बॉधने पर जितनी बड़ी होती है , इसका आकार उतना ही बड़ा होता है। इसका निर्माण धारीदार (Striped) एवं अनैच्छिक मांशपेशी (involuntar muscles ) द्वारा होता है। वक्षोस्थि से कुछ पीछे की ओर तथा बायें हटकर दोनों फेफड़ो के बीच इसकी स्थिती है। यह पाचवी, छठी, सातवी, तथ आठवीं पृष्ठ देशीय – केशरूका के पीछे रहता है इसका शिरोभाग बायें क्षेपक कोष्ठ से बनता है। निम्न भाग की अपेक्षा इसका ऊपरी भाग कुछ अधिक चौड़ा होता है। इस पर एक झिल्लीमय आवरण चढ़ा रहता है। जिसे हृदयावरण (Periaerdium) कहते हैं। इस झिल्ली से एक प्रकार का रस निकलता है ,जिसके कारण हृत्पिण्ड का ऊपरी भाग आदर््र (तरल) बना रहता है।
हृत्पिण्ड का भीतरी भाग खोखला रहता है। यह भाग एक सूक्ष्म मांषपेशी की झिल्ली से ढ़का तथा चारो भागो में विभक्त रहता है। इस भाग मे क्रमश: ऊपर -नीचे तथा दॉये -बॉये 4 प्रकोष्ठ (Chambers) रहते हैं। ऊपर के दायें-बायें हृदकोषों को उध्र्व हृदकोष्ठ अथवा ग्राहक-कोष्ठ (Auricle) कहा जाता है तथा नीचे के दायें-बायें दोनों हृदकोष्ठों को क्षेपक कोष्ठ (Ventricle) कहते हैं। इस प्रकार हृत्पिण्ड दोनों ओर दायें तथा बायें ग्राहक कोष्ठ तथा क्षेपक कोष्ठों को अलग करने वाली पेशी से बना हुआ है। ग्राहक कोष्ठ से क्षेपक कोष्ठ में रक्त आने के लिए हर ओर एक-एक छेद रहता है तथा इन छेदो में एक-एक कपाट (Value) रहता है। ये कपाट एक ही ओर इस प्रकार से खुलते हैं कि ग्राहक कोष्ठ से रक्त क्षेपक कोष्ठ में ही आ सकता है , परन्तु इसमें लौटकर जा नही सकता, क्योंकि उस समय यह कपाट अपने आप बन्द हो जाता है। दायीं ओर के द्वार में तीन कपाट है। अत: इसे त्रिकपाट कहते हैं। बायीं ओर के द्वार में केवल दो ही कपाट होते है, अत: इसे द्विकपाट कहा जाता है।

इससे ग्राहक कोष्ठों का काम रक्त को ग्रहण करना तथा क्षेपक कोष्ठक का काम रक्त को निकालना है। दायीं ओर हमेशा अशुद्ध रक्त भरा रहता है। इन कोष्ठो का आपस में कोई संबंध नही होता हृदय के संकोच के कारण ही उसके भीतर भरा हुआ रक्त महाधमनी (Aorta) तथा अन्य धमनियों में होकर शरीर के अंग -प्रत्यंग तथा उनकी कोषाओं (Cells) में पहुॅचकर , उन्हें पुष्टि प्रदान करता है तथा उनके भीतर स्थित विकारों को अपने साथ लाकर , उत्सर्जन अंगों को सौंप देता है, ताकि वह शरीर से बाहर न निकल जायें। शरीर में रक्त संचरण धमनी शिराओं तथा कोशिकाओं द्वारा रहता है। ये सभी शुद्ध रक्त को हृदय स ेले जाकर शरीर के विभिन्न भागों में पहुॅचाती है तथा वहॅा से विकार मिश्रित अशुद्ध रक्त को लाकर हृदय को देती रहती हैं। शुद्ध रक्त का रंग चमकदार लाल होता है तथा अशुद्ध रक्त बैंगनी रंग का होता है। हृदय ये निकलकर शुद्ध रक्त जिन नलिकाओं द्वारा शरीर के विभिन्न भागों में जाता है उन्हें क्रमश: (Artery) तथा कोशिकाएॅ (Capillaries) कहते हैे तथा अशुद्ध रक्त लौटता हुआ जिन नलिकाओं में होकर हृदय में पहुॅचता है, उन्हें शिरा (Veins) कहते हैं।

शिराओं द्वारा लाए गये अशुद्ध रक्त को हृदय शुद्ध होने के लिए फेफड़ो में भेज देता है। वहॉ पर अशुद्ध रक्त बैंगनी रंग का अपने विकारों (Carbon-di-Oxide) की फेफड़ो से बाहर जाने वाली हवा (नि:श्वास) के साथ मिलकर , मुॅह अथवा नाक के मार्ग से बाºय- वातावरण में भेज देता है तथा श्वास के साथ भीतर आयी हुई शुद्ध वायु से मिलकर पुन: हृदय मे लौट आता है और वहॉ से फिर सम्पूर्ण शरीर के चक्कर लगाने के लिए भेज दिया जाता है। इस क्रम की निरंतर पुनारावृत्ति होती रहती है इसी को रक्त परिभ्रमण क्रिया (Blood Circulation) की जाता है। फेफड़े परिसंचरण अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। फुफ्फुसो में रक्त शुद्ध होता है –

फुफ्फुसो को रक्त पहॅुचाने का कार्य फुफ्फसीय परिसंचरण तंत्र के द्वारा सम्पन्न होता है। वाहिकाएॅ शुद्ध रक्त को हृदय के फुफ्फुसो तक ले जाती है वहॉ रक्त शुद्ध होकर उसे पुन: हृदय में ले जाती है यहॉ ये आक्सीजन युक्त रक्त शेष शरीर में वितरित होता है। फुफ्फुसीय परिसंचरण मे 4 से 8 सेकण्ड का समय लगता है। हृदय के दाएँ निलय से फुफ्फुसीय धमनी के द्वारा फुफ फुफ्फुसीय रक्त का आरम्भ होता है। महाधमनी से अनेक
छोटी-छोटी शिराएॅ निकलती है, जो निरंतर क्रमश: रक्त को ले जाने तथा लाने का कार्य काती है।

रक्त का संचरण दो घेरो में होता है- (1) छोटा घेरा तथा (2) बड़ा घेरा। छोटा घेरा, हृदय ,पल्मोनरी धमनी , फेफड़ो तथा पल्मोनरी के सिरे से मिलकर बना है तथा बड़ा घेरा महाधमनी एवं शरीर भर कोशिकाओं तथा ऊतको से मिलकर तैयार हुआ है। ग्राहक कोष्ठों (Atrium) को आलिन्द तथा क्षेपक कोष्ठों (Venticle) को निलय कहा जाता है।
जब अशुद्ध रक्त उध्र्व तथा अध: महाशिरा द्वारा हृदय के दक्षिण आलिन्द में प्रविष्ट होता है तब वह धीरे-धीरे फैलना आरम्भ कर देता है तथा पूर्ण रूप से भर जाने पर सिकुड़ना शुरू करता है फलस्वरूप आलिन्द के भीतर के दबाव में वृद्धि होकर , महाशिरा का मुख बन्द हो जाता है तथा त्रिकपाट खुलकर रक्त दक्षिण निलय मे प्रविष्ट हो जाता है दक्षिण निलय भर जाने पर जब सिकुड़ना आरम्भ करता है तब द्विकपाट बन्द हो जाता है तथा पल्मोनरी धमनी कपाट (Pulmonary Valve) खुल जाता है। उस समय शुद्ध रक्त के दक्षिण निलय से निकल कर पल्मोनरी धमनी (Pulmonary Artery) द्वारा वाम आलिन्द में गिरता है। इस क्रिया को छोटे घेरे में
रक्त संचरण (Circulation of Blood through Pulmonary circuit) नाम दिया जाता है।

पल्मोनरी धमनी द्वारा वाम आलिन्द में रक्त के भर जाने पर वह सिकुड़ना प्रारम्भ कर देता है और उसके भीतर दबाव बढ जाता है। वाम निलय के भर जाने पर वह भी सिकुड़ना प्रारम्भ कर देता है, तब द्विकपर्दी कपाट बन्द हो जाता है तथा महाधमनी कपाट खुल जाता है, फलत: वह शुद्ध रक्त महाधमनी में पहुॅच कर सम्पूर्ण शरीर में भ्रमण करने के लिए विभिन्न धमनियों तथा काशिकाओं में जा पहुॅचता है। इस प्रकार रक्त सम्पूर्ण शरीर मे घूम कर शिराओं से होता हुआ अन्त में उध्र्व महाशिरा तथा अध: महाशिरा से होकर दक्षिण आलिन्द में पहुॅच जाता है। रक्त भ्रमण की इस क्रिया को बड़े घेरे का रक्त – संचरण (Circulation of Blood through larger Circuit ) कहते हैं।

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